30 जून 2009

आतंकित होकर आतंकवाद का ठप्पा

हम देशद्रोही हैं और अब आतंकवादी भी, ऎसा कुछ देशप्रेमियों का कहना है. लालगढ़ पर लिखे पिछले दो टिप्पणियों पर कई लोगों की प्रतिक्रियायें मेल व फोन पर आयी, जिनमे कुछ लोगों ने अभद्र शब्दों के साथ हमे यह सर्टिफिकेट दे डाला। इन देश प्रेमियों के देश प्रेम के बारे में हमे नहीं पता कि इनका देश प्रेम क्या है और देश का ये क्या मायने लगाते हैं, जिससे उन्हें प्रेम है और जिसके हम खिलाफ हैं। मसलन देश का अर्थ क्या देश की वह पुलिस है जो लालगढ़ के गाँवों बेलासोल, कुलदहा, कोरमा, अमचोर, महतोपुर, बिमटोला, जम्बोनी आदि में लूट रही है, वहाँ के बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं पर अत्याचार कर रही है या देश वह जमीन का टुकडा़ है जिसे जिंदल को दिया जा रहा है या देश वहाँ के राज्य सरकार की इच्छा है या देश चिदम्बरम मनमोहन के हाँथ का डंडा है या फिर देश वहाँ के वे आदिवासी लोग जिन्हें बेदख़ल किया जा रहा है. देश के इतने सारे खाँचों में हम उस देश के साथ हैं जो वहाँ के लोगों की इच्छा से निर्मित हो शायद एक लोकतांत्रिक देश के मायने यही होंगे. ऎसे में इनकी स्थितियों को लिखना यदि देशद्रोही होना है तो जनलोकतंत्र की व्यवस्था ही देशद्रोही हो जायेगी. इस आधार पर किसी को देशद्रोही या आतंकी साबित करना महज़ चिदम्बरम व मनमोहन सिंह की जुबान होना भर है. दरअसल मीडिया उद्योग ने हमारी मानसिकता का ऎसा निर्माण कर दिया है कि हम सरकारी सोच के हो गये हैं, मसलन सरकार की सभी क्रियायें हमारे लिये लोकतांत्रिक हो गयी हैं. सरकार जिसे आतंकवादी कहती है वह आतंकवादी है, और जिसे देशद्रोही, वह देशद्रोही. हम लोकतंत्र की अवधारणा में रखकर घटनाओं को देखना भी भूल चुके हैं. क्योंकि लोकतंत्र के चौथे खंभे का ढोल पीटती मीडिया सत्ता का चौथा खम्भा बन चुकी है जिस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है कारण कि देश दुनिया की घटनाओं पर हमारी राय मीडिया से ही निर्मित होती है और हम घटनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर न देख पाने में मजबूर हैं. पर हमें मीडिया को समझने के तरीके इज़ाद करने होंगे.
जय हो के नारे के साथ केन्द्र में आयी सरकार ने २२ जून को भारतीय राज्य में माओवादी संगठन को आतंकवादी घोषित कर उन पर प्रतिबंध लगा दिया और लालगढ़ में पुलिस ने कब्जा कर लिया. इस पुलिस कब्ज़ेदारी के साथ गाँवों की तलाशी जारी है. सुरक्षाबल अपने कैम्प जमाकर देश की सुरक्षा में तैनात हैं, यानि देश के एक छोटे से हिस्से की सुरक्षा. जहाँ के अधिकांश लोग असुरक्षित होकर गाँवों से भाग गये हैं पर सुरक्षा जारी है, जंगलों के उन पेडो़ की जो भाग नहीं सकते, जमीन की जो खिसक नहीं सकती, बाकी जितने लोग बचे हैं उनके लिये उतनी बंदूकें सरकार ने भेज दी हैं, पर वे या तो बूढे़ हैं या बच्चे इनके लिये लात, घूंसे और डंडे ही काफी हैं. अब ऎसे में लोकतंत्र की परिभाषा जिसे हम रटा करते हैं वह बदल चुकी है. जिसे हम सबको वर्तमान लोकतंत्र के लिये सुधार लेना चाहिये. यानि जनता पर, पुलिस द्वारा, बंदूकों का शासन लोकतंत्र है. यह महज़ पश्चिम बंगाल की स्थिति नहीं है बल्कि कश्मीर, मणिपुर, अरूणाचल, नागालैंड, आंध्र, छत्तीसगढ़......बाकी के नाम आप खुद याद करें. क्या देश में फासीवाद तभी आता है जब मुसोलिनी नाम का कोई व्यक्ति पैदा हो या फिर यह बुद्धदेव, मनमोहन, रमन, चिदम्बरम नाम के साथ भी आ सकता है. २२ जून को लालगढ़ की स्थिति जानने के लिये कार्यकर्ताओं व बुद्धिजीवियों की एक टीम जिसमें अभिनेत्री अपर्णा सेन, सोनाली मित्रा, कौशिक सेन, कवि जय गोस्वामी, बोलन गंगोपाद्याय गये. उन लोगों ने वहाँ की स्थितियों को देखा और वहाँ के लोगों से बातचीत की, लौटने के बाद सरकार द्वारा जारी प्रताड़ना की निंदा करते हुए इसे रोकने की मांग की तो उन पर केस लगा दिये गये. मेल्दा गाँव में संवाद प्रतिदिन पत्र के फोटोग्राफर ने पुलिस द्वारा पीटे जा रहे महिलाओं, बच्चों के फोटो लेने का प्रयास किया तो पुलिस द्वारा उन्हें पीटा गया. २७ जून को 'नेशनल फैक्ट फाइंडिंग' टीम जिसमे फिल्मकार के.एन.पंडित, पद्मा, दामोदर, टिंकू, एम. श्रीनिवास, राजकोशोर व सुसन्तो जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं व लेखकों को जाने से पहले मिदिनापुर पुलिस स्टेशन में गिरफ्तार कर लिया गया. यानि अब खबर वही मिलेगी जो पुलिस बतायेगी. बाकी सब पर प्रतिबंध, इसे हम क्या कहें? महाश्वेता देवी ने कहा है कि यदि ग्राम रक्षा समिति के मुखिया चक्रधर महतो को गिरफ्तार किया गया तो वे मुख्यमंत्री आवास के सामने घरना देंगी. निश्चित तौर पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लालगढ़ के आंदोलन में माओवादी पार्टी भी सम्मलित थी. जिसे माओवादी नेता ''विकास'' ने स्वीकार भी किया, पर वे किस भूमिका में काम कर रहे थे इसे हमे देखने की जरूरत है. जब आदिवासियों से जमीने छीनी जाने लगी, उन्हें प्रताड़ित किया जाने लगा और सालबोनी प्रोजेक्ट को एक नये आधुनिक राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगी. यानि लालगढ़ में एक ऎसा वाशिंगटन उन आदिवासियों की जमीन पर बन रहा था (ये सारी संज्ञायें मीडिया व नेताओं की हैं ) जिन्हें दो जून की रोटी तक नहीं मिलती. ऎसे में देश की एक मात्र पार्टी चाहे उसे आतंकवादी कहा जायें या कुछ और ने वहाँ के लोगों को संगठित करने का कार्य किया. आधुनिक विकास के ढांचे को नकारते हुए लोगों की मूलभूत जरूरतों को मुखरित किया और उन्हें सम्बल पहुचाया. क्या यह उनका देशद्रोह था? माओवादी पार्टी को लेकर तमाम तरह के भ्रामक प्रचार किये गये मसलन विकास विरोधी होना. वे निजीकरण से चल रहे विकास के खिलाफ़ जरूर हैं पर शिक्षा, स्वास्थ, जैसी सुविधाओं के खिलाफ़ नहीं. भले ही शिक्षा प्रणालियां व नीतियाँ अपने आप में समाज विरोधी हों. ऎसा माओवादी नेताओं से रूचिर गर्ग की हुई बातचीत से पता चलता है. माओवादीयों ने आदिवासियों की मूलभूत जरूरतों को लेकर लड़ने में उन्हें सम्बल दिया है व शिक्षा, स्वास्थ को लेकर अपने आधार इलाकों में जमीनी स्तर से विकास का एक ढांचा भी निर्मित किया है. जिससे उनकी पैठ वाकई सागर में मछली की तरह है. ऎसी स्थितियों में महेन्द्र कर्मा के बयान को सभी राज्य अमल करने पर तुले हैं कि वे सागर को ही सोख जायेंगे. ज़ाहिर है सागर को सोखने के बाद मछलियाँ वहाँ नहीं रह सकती तो क्या हम एक ऎसे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में जुटे हैं जहाँ आदिवासियों की प्रजाति को खत्म कर दिया जाय. माओवादियों ने अपने कई वक्तव्यों में इस बात को दोहराया है कि आइ.एस.आई., सिमी, जैसे संगठनों के साथ उनके रिश्ते नहीं हैं और वैचारिक आधार पर होना सम्भव भी नहीं है व सरकार का भी कोई बयान इस बात को लेकर नहीं आया है. इसके बावजूद मीडिया समय-समय पर यह प्रोपोगेंडा चलाती रहती है तो क्या सरकार को मीडिया संस्थानों में रा की जिम्मेदारी दे देनी चाहिये? क्योंकि सरकारी इंटेलीजेंस इसे साबित करने में विफल रहा है. दूसरी बात यह कि सरकार की तरफ से माओवाद को एक आर्थिक, सामाजिक समस्या के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है पर आज जब इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है तो इसके क्या मायने लगाये जाने चाहिये? कि आतंकवाद सामाजिक, आर्थिक कारणों की उपज है. फिर देश में उपजे सामाजिक आर्थिक कारणों के आंदोलन यदि आतंकवादी हैं तो असहमति के लिये वह कौन सी जगह है जहाँ हम आप बोल सकते हैं? अब हमें छोड़ना होगामरने के बाद मौन की परम्पराबटोरनी होगी मरने वाले की आख़िरी चीख़इतने सारे लोगों के रोज़ मरने का मौनहमारी उम्र भर की चुप्पी के लिये काफ़ी हैअपने मरने के पहले की आवाज़हमें अभी से ही निकालनी होगी॥ चन्द्रिका

3 टिप्‍पणियां:

  1. चन्द्रिका जी, सबसे पहले बधाई स्वीकारे की आप बहुत अच्छा लिखती है और आपके लेखन मे धार है।

    मैं आपकी इस बात से सहमत हूं की हमारी सोच मिडिया पर निर्भर हो गयी है।

    एक सलाह है आपके लिये लिखते वक्त पैराग्राफ़ बना दिया करें क्यौंकी इससे पढने मे आसानी होती है

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  2. सही बात है हमारी सोच मीडिया से काफी प्रबावित होती है।आप ने बहुत बढिया लिखा।

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  3. माओवादीयों ने आदिवासियों की मूलभूत जरूरतों को लेकर लड़ने में उन्हें सम्बल दिया है

    लेकिन उनका तरीका गलत है देश की प्रभु सत्ता के खिलाफ इस तरह हथियार उठाना राष्ट्र द्रोह की श्रेणी में ही गिना जायेगा | आज स्थानीय जनता को माओवादी बेशक अच्छे लगे लेकिन बाद में वे उसी तरह का व्यवहार करेंगे जैसा माकपा काडर ने इस क्षेत्र की जनता के साथ किया | इस तरह के प्रयास को सख्ती से दबा देना चाहिए |

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