03 फ़रवरी 2009

बीते बरस के हाथ एक पत्र:-

हर बरस कुछ इसी तरह बीतता है कि अपने साथ लेकर चला जाता है न जाने कितनी उन चीजों को जिन्हें अभी बचा रहना था दुनिया में और वे बच ही जाती हैं जिन्हें दुनिया से मिटना था. कि पिछला बरस जाते-जाते कितना कुछ तो लेता गया अपने साथ. नये साल की उम्मीदें जार-जार होती दिखती हैं. फिलिस्तीन को होना ही था आबाद पर ऎसा नहीं हो सका. बचे रहना था महमूद दरवेश को कि किया जा सके पानी और बहते लहू में फर्क, पैदा होते ही बच्चों की सांसो में नहीं जाना था बारूद की गंध पर बीते वर्ष की पीठ पर महमूद दरवेश लद कर चले गये और माओं के गर्भ से पैदा होने के पहले बच्चों ने सुने धमाके. क्या बीते बरस से यह शिकायत करूं कि वे जिन्हें तुम लेकर चले गये, दुनिया बदलने के उनके सपने अभी भी आबाद हैं. लोगों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि दुनिया के सबसे बडे़ तानाशाह पर एक अदना सा पत्रकार जूते मार रहा है. वे लोग जिन्हें रोटी नहीं मिल रही है अपने हाँथ का इश्तेमाल बंदूक के लिये करना सीख रहे हैं. गाँधी के नाम पर जो लोग विश्व अहिंसा दिवस मना रहे हैं उनके हाँथों में इराक का कितना खून सना है इसका जिक्र होना ही चाहिये. जेल की सलाखों से बिनायक सेन को निकलना था पर वर्तमान लोकतंत्र का यही तकाज़ा है. वह सब कुछ जिसे धीरे-धीरे दूर होना था वह लोगों के और करीब हो रहा है चाहे वह भूख हो बेरोजगारी या असमानता. मुम्बई में आतंकी हमले हुए जिनमे सैकडो़ लोग मारे गये क्या यह चंद युवावों का जुनून था कि वे आये और कुछ लोगों को मार कर मर गये या दुनिया की तमाम परिस्थितियों से उभरी हुई घटनाओं में यह भी एक घटना थी जिसके कार्य कारण संबंधों पर बात नहीं की जा सकी और करकरे की मौत के बाद अचानक अखबारों से हिन्दूवादी आतंक का एक चेहरा "साध्वी" गायब हो जाता है. हमे यह नहीं पता कि कब पड़ोसी देश से युद्ध शुरू हो जाये पर यह जरूर पता है कि अन्ततः दो देशों के सत्ता की लडा़ई में हम ही मारे जायेंगे. जब दुनिया आर्थिक मंदी की मार झेल रही है इसलिये कि दुनिया का आका अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था में ढह रहा है. उस समय बाराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के जस्न पर ३७० करोण रूपये खर्च किये जा रहे हैं. ऎसे समय में एक बरस का बीत जाना हासिये पर पडी़ सदी के कलेण्डर की उम्र कम होने से ज्यादा और क्या है? हमे सोचने की जरूरत है कि हम एक रास्ता चुने जहाँ से उम्मीदों का नया साल शुरू हो सके.

कविता

पंचटीला और लड़की:-

१।

वह आयेगी

और धर देगीअपनी उदासी

तुम्हारे भीतर

रात गये तुम गाओगे

उसके प्रेम और विछोह के गीत

कैसे जानेगा कोई कि

तुम्हारी कठोरता में

धर दी गयी

हैएक पूरी की पूरी लड़की॥

२-

लड़की तुम नहीं रहोगी

इसके पास

इसकी देह में उतरेगा

हर हमेश

हर दिन

पूरा सप्ताह

उदास होगा पंचटीला

अपने दुख में

थोडा़ सा टूटेगा रोज

दिनों को पूरा करता हुआ॥

३-

वह तुम्हें

उतना भर करेगी प्रेम

जितना भर बचा है उसके पास

उमर ढलने के पहले

लड़की छोड़ देगी तुम्हें

तब किससे पूछोगे तुम

कि कब लौटेगी लड़की॥


गौहर रज़ा पिछले दिनों हमारे वि.वि. में आये और एक काव्य गोष्ठी के दौरान उनके द्वारा सुनायी गयी नज़्म का आज़ाद अंसारी द्वारा रिकार्डिंग हमें उपलब्ध हुआ जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं॥
ये साल भी यारॊं बीत गया

कुछ खून बहा कुछ घर उजडे़

कुछ कटरे जल कर खाक हुए

इक मस्जिद की ईटों की तरह

हर मसला दब कर दफ्न हुआ

जो खा़क उडी़ वो ज़हनों पर

यूं छायी जैसे कुछ भी नहीं

अब कुछ भी नही है करने को

घर बैठो डर के अब के बरस

या जान गवां दो सड़कों पर

घर बैठ के भी क्या हासिल है

न मीर रहा न गा़लिब है

न प्रेम के जिंदा अफसाने

बेदी भी नही मंटो भी नहीं

जो आज की दहसत लिख डालें

मंसूर कहाँ जो ज़हर पिये

गलियों में बहती नफरत का

वो भी तो नही जो तकली से

फिर प्यार के ताने बुन डाले

क्यों दोष धरो पुरखों पर तुम

ख़ुद मीर हो तुम गा़लिब भी हो तुम

तुम प्रेम का जिंदा अफसाना

बेदी भी तुम्ही तुम मंटो हो

तुम आज की दहसत लिख डालो

नानक की नवा चिस्ती की सदा

मंसूर तुम्ही तुम बुल्ले शाह

कह दो कि अनल-हक जिंदा है

कह दो कि अनल-हक कर देगा

इस नुक्ते पर ग़ल नुक्ती है

हर बात यहीं से निकलेगी॥


महाश्वेता देवी भारत की एक मात्र लेखिका है जिन्होंने अपने लेखन कर्म व जीवन कर्म को एक साथ जनवादी तरीके से साधा है हाल में जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में आयी उस दौरान हमारे साथी देवाषीश प्रसून और प्रत्युष प्रशांत ने उनसे बात-चीत की जिसके अंश का हम प्रकाशन यहाँ कर रहे हैं॥


किसी रचनाकार की रचनाशीलता में उसका जीवन संघर्ष कितना मायने रखता है?

आदमी जो देखगा वही लिखेगा उसकी रचना का निर्माण उसके आस-पास के परिवेश से ही आता है इस रूप में किसी रचना कार की रचना शीलता उसके जीवन कर्म पर ही निर्भर करती है । जहाँ वह जीवन जीता है उसके परिवेश पर निर्भर करती है

१०८४ की मां की जो विषय वस्तु है या उस राजनीति को आज किस तौर पर देखती है?

वह जो राजनीति थी उसका समय अभी नहीं रहा उसका समय बीत चुका है । नक्सलवाडी़ की राजनीति को जिन्होंने समर्थन दिया आज वे उसे प्रांत-प्रांत तक बिखेर चुके हैंऔर वह कई प्रांतों में फैल गया है. कोई अच्छा आंदोलन खत्म हो जाय ऎसा नहीं होता उसमे उतार चढा़व आता है पश्चिम बंगाल में जैसे आज उसका प्रभाव कम है पर पूरे देश में एक बडा़ आंदोलन है वह और चल रहा है उसका चलना ही जरूरी है. यह समय की जरूरत है

देश में पनपती ढेर सारी समस्याओं के बीच जब जगह-जगह छोटेछोटे आंदोलन पनप रहे हैं (सेज, मानवाधिकार, बांध) युवाओं की को कहां देखती हैं?

अभी जब हाल में मैं कलकत्ता में थी ठीक आने के पहले उधर जो हुआ था जिसको लेकर केन्द्र सरकार ने एक एक्ट बनाया है जिसके खिलाफ प्रदर्सन भी हुए हैंजिसमे हमने जो बयान दिया है उसमे बोला है ज्यादा से ज्यादा जो मानवाधिकार की लडा़ई लड़ रहे हैं जैसे ए।पी.डी.आर. के आंदोलन ये एक्ट उसके खिलाफ जाता है अतः इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिये इसमे युवा भी हैं कोई आंदोलन खत्म होने की बात नहीं होती है वह अगले आंदोलन को इंस्पायर करता है.

नंदी ग्राम के आंदोलन ने संसदवादी कम्युनिस्ट पार्टी के चरित्र को पूरे देश में उजागर किया आप किस रूप में देखती हैं?

जिस समय तक वह मार्क्स वादी पार्टी थी उसको जो करने को था किया लेकिन उसका दिन खत्म हो गया इसलिये देखो यही पश्चिम बंगाल में जब पंचायती चुनाव हुआ था पंचायत में वोट देने वाला आदमी बहुत पढा़ लिखा तो नहीं है कामन मैन है पर वह सब कुछ समझता है। ये मजदूर किसान हैं ये सब उस पार्टी के खिलाफ हो गये और पार्टी हार गयी ३० साल से सत्ता में रहते हुए उसने न तो रास्ता बनाया न तो पानी दिया न बिजली कुछ नहीं दिया. जब पश्चिम बंगाल में भुखमरी पडी़ सरकार के पास कितना गेहूँ चावल सब था पर लोगों को मरना पडा़

वर्तमान लोकतंत्र में आप सुधार की कितनी गुंजाइश देखती हैं या फिर किसी विकल्प के बारे में सोचती हैं?

ज्यादा सोचना नहीं है न तो सोचने का समय है इसमे सोचने का क्या है आंदोलनों से जुडी़ हुई हूँ और यही है कि लडा़ई करने का है तो करने का है और कुछ नहीं.


युवावों के लिये कोई रास्ता सुझायें या कोई संदेस?

कोई संदेस नहीं देखो समझो और करो मैं कोई रास्ता क्यों बताऊ अपना रास्ता खुद चुनों लोगों की समस्याओं को देखो और उन्हें बिजली पानी सड़क उपलब्ध करवाओ।


श्रद्धांजलि:-

लवलीन

कथाकार लवलीन नहीं रही। इन निर्मम शब्दों के अलावा और क्या युक्ति है कि बयां हो जाय उनका न रहना. तुम्हें कैसे बताया जाय कि तुम्हारे पाठकों, दोस्तों और चाहने वालों ने किस तरह स्वीकार किया होगा तुम्हारा न रहना.कौन तुमसे बताये कि तुम्हारे चले जाने के बाद भी यह दुनियां उसी तरह आबाद है. कई शाम बीत चुकी है और और लोगों की यादों से हर रोज तुम खिसकती जा रही हो.


हेराल्ड पिंटर

काश! हेराल्ड पिंटर के नाटकों की तरह यह भी एक नाटक ही होता कि दुनिया के रगमंच पर हुई एक मौत, मौत न होती और बत्तियँ जलने के साथ वह पात्र उठ खडा़ होता और हम सब तालियाँ बजाते हुए उसका अभिवादन करते। अपने आंसुओं को पोछते हुए दर्शक दीर्घा से बाहर निकलते और कहते कि हेराल्ड पिंटर अभी जिंदा हैं.


नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होने चाहिये:-

कुछ दिन पहले ही हमारे देश के दो बडे़ पूजीपतियों अंबानी और मित्तल के द्वारा देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम प्रस्तावित किया गया। जिसे देश के लगभग समाचार पत्रों ने अपने पहले पन्ने पर छापा. यह चुनाव के पूर्व की तैयारी है जिसमे देश की मजदूर जनता के दो बडे़ शोषकों द्वारा एक बडे़ ह्त्यारे को चुना जा रहा है.जिसने २००२ के गुजरात दंगे में जाने कितने मुस्लिमों का नर संहार करवाया और जबकि आज भी गुजरात में उसके शासन काल में मुश्लिम वर्ग दहसत में जी रहा है. ऎसे में चुनाव के पूर्व अम्बानी मित्तल के इस प्रधानमंत्री पद के चुनाव का निहितार्थ क्या हो सकता है? एक तो यह कि आर्थिक मंदी से जूझ रही इस दुनिया में जब रोजगार दिनों दिन कम होते जा रहे है और बेरोजगारी के शिकार युवावों के लिये इस व्यवस्था ने कोई रास्ता नहीं छोडा़ है. वर्तमान मीडिया देश का सबसे बडा़ आदर्श उन्हें खडा़ कर रही है जिनके हाथ में देश की पूजी लूटने का सबसे बडा़ तंत्र है. ऎसे में इनके द्वारा किसी का भी चुना जाना युवाओं में आदर्शों का चुनाव होगा और यह चुनाव नरेन्द्र मोदी के लिये एक पक्षधरता तय करेगा. इसका दूसरा और अहम पक्ष यह भी है कि पूजीपतियों और हिन्दूवादी ताकतों की गठजोड़ को और मजबूत किया जा सके जिसके लिये नरेन्द्र मोदी वाकई में देश के सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं जिसने जन प्रतिरोध के चलते सिंगूर से हारकर भागी टाटा कम्पनी को अपने यहाँ संरक्षण दिया. टाटा की यह हार जनता की एक बडी़ जीत थी जिसे जन संघर्षों के इतिहास में दर्ज किया जायेगा.


आर्थिक मंदी से निपटने का कोई रास्ता नहीं है:-

अचानक से अमरीकी बैंकों का ध्वस्त होना और सरकारी सहायता से उसे संरक्षित करने का प्रयास बिफल ही होता दिख रहा है चूंकि पूजी के इस साम्राज्य में अमेरीका के ढहने से दुनिया के सभी राष्ट्रों पर इसका साफ तौर पर प्रभाव दिख रहा है. एक आंकलन के मुताबिक दुनिया के तकरीबन साढे़ छः करोड़ युवा बेरोजगार हुए हैं. ऎसी स्थिति में भारत के वे क्षेत्र जो निर्यात से जुडे़ हुए हैं उन पर गहरा असर पडा़ है खास तौर से मेडिकल आई.टी. आदि . क्योकि निर्यात के लिये जो डालर आते थे अमरीकी आर्थिक मंदी के कारण वे आना बंद हो गये और उन पैसो को वापस ले लिया गया और अचानक यहाँ के शेयर बाज़ार गिर गये. जिससे हुजेरी जो कि तिरुवंतपुरम में स्थित है टाटा जमशेदपुर जैसी फैक्ट्रीयाँ बंद हो गयी. जिन लोगों ने शेयर बाज़ार में पैसे लगाये थे वे धीरे धीरे वापस लेना शुरू कर दिये और शेयर बाज़ार का हाल बिगड़ता चला गया. अभी हाल में यह फैक्ट सामने निकल कर आया है कि पिछले तीन महीने में ४४ मिलियन डालर का प्रोडक्सन कम कर दिया गया है. ऎसी स्थिति में इस बाज़ार व्यवस्था को ढहता हुआ देखकर कम्पनियों ने अपनी प्लानिंग पर भी रोक लगा दी है जिससे नये रोजगार की संभावना तो खत्म ही दिखती है पर जहाँ से नये रोजगार की सम्भावना खत्म होती दिखती है वहीं से एक नये व्यस्था की सम्भावना खुलती है. क्योंकि आदमी सोचता है इसलिये वह अपने हाथ का बेहतर इश्तेमाल करना जानता है.








2 टिप्‍पणियां:

  1. एक साथ इतनी सूचनाएं और ढेरों सवाल!

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  2. आप सादर आमंत्रित हैं, आनन्द बक्षी की गीत जीवनी का दूसरा भाग पढ़ें और अपनी राय दें!
    दूसरा भाग | पहला भाग

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