05 अगस्त 2010

माओवादियों से बातचीत ही एकमात्र रास्ता है

स्वामी अग्निवेश से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
माओवादियों और भारत सरकार के बीच बातचीत की कोशिश कर रहे सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश का मानना है कि भारत सरकार और माओवादी मजबूरी में शांति वार्ता कर रहे हैं. उनका कहना है कि दोनों के सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. माओवादी प्रवक्ता आज़ाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले स्वामी अग्निवेश का कहना है कि इस घटना ने शांति वार्ता को गहरा झटका पहुंचाया है. यहां पेश है उनसे हाल ही में की गई बातचीत.

• नक्सलियों के साथ बातचीत की कोशिशें पहले भी हुई है। आंध्र में कई-कई दौर की बातचीत हुई लेकिन उसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. अब जबकि सरकार और नक्सलियों के बीच संघर्ष अपने चरम पर है तब ऐसे समय में नए सिरे से नक्सलियों से बातचीत का औचित्य क्या है?
नए सिरे से तो मैं कैसे कहूं, क्योंकि इससे पहले कभी भी केंद्र सरकार ने किसी को इस तरह की बातचीत के लिए अधिकृत नहीं किया था। 11 मई को चिदंबरम जी ने पहली बार मुझे चिट्ठी लिखी। चिदंबरम जी का अपना दावा है कि भारत के किसी गृहमंत्री ने इससे पहले किसी को बातचीत के लिए अधिकृत किया हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। पहले भी आंध्रप्रदेश में बातचीत हुई थी और वह खत्म भी हो गई, ठीक से नहीं चली। ये जो केंद्र के स्तर पर और सभी सात-आठ राज्यों की ओर से केंद्र जो बातचीत करना चाह रही है, ये पहली बार हो रहा है। और उसके लिए जो पहल की गई, मैं समझता हूं कि उसमें बहुत वजन है। सरकार एक तरफ जहां कह रही है, प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि ये भारत की सबसे बड़ी समस्या है, आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सरकार अपनी तरफ से इसमें अर्धसैनिक बलों को बहुत बड़ी तादाद में झोंक रही है। अकेले छत्तीसगढ़ में बताते है कि 12 हजार ऐसे अर्धसैनिक बल के जवान तैयार बैठे हुए है। हथियारों का पूरा का पूरा जखीरा उनके हवाले किया जा रहा है। इसके बावजूद भी सैनिक मर रहे हैं, बारूदी सुरंगों में उड़ाए जा रहे हैं। नक्सलियों के जो छापामार युद्ध के तरीके हैं, उसके मुकाबले में इनके पास कोई प्रशिक्षित जत्था नहीं है। ये समझ नहीं पा रहे है कि क्या करे। ऐसी परिस्थितियों में सेना का भी उपयोग नहीं कर सकते। वायु सेना का नहीं कर सकते। हेलीकाप्टर आप दे देंगे तो सैनिक एक जगह से दूसरी जगह चले जाएंगे, ये अलग बात है। लेकिन सेना जिसको कहते है, उसका उपयोग आप नहीं कर सकते। अर्धसैनिक बल उसके लिए नाकाफी है. पुलिस इस तरह के कामों के लिए ट्रेंड नहीं है. तो जाएंगे कहा?आखिरी से आखिरी इनको बातचीत के लिए ही आना पड़ेगा. हालांकि बातचीत पर ये एक पैसा भी खर्च नहीं कर रहे हैं. मेरे जैसे सन्यासी को एक चिट्ठी पकड़ा के कह रहे हैं कि आप बातचीत करवा दीजिए. मैं उसके लिए भी लगा हुआ हूं. और मैं उसमें ज्यादा जल्दी सफलता दिला सकता हूं. मैं से मेरा मतलब बातचीत की जो प्रक्रिया है, वह अपने आप में इतनी जबरदस्त, इतनी अच्छी है, सही है कि उसमें जल्दी सफलता मिल सकती है बजाय इस तरह की टकराहट से

• दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे के प्रति अविश्वास से भरे हुए हैं। सरकार कहती है कि नक्सली बातचीत के लिए गंभीर नहीं हैं और नक्सली कहते हैं कि सरकार दिखावा कर रही है। ऐसे में आप इतनी उम्मीद कैसे धरे हुए है?

मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि सरकार की हालत तो अखबारों के माध्यम से भी और चिंतलनार में 76 जवानों के मारे जाने के बाद राम मोहन कमेटी की जो रिपोर्ट आयी है, उससे भी पता चलती है. इसके बाद नारायणपुर में सीआरपीएफ के 27 जवान फिर मारे गये. तो इन दोनों की जो रिपोर्ट आयी है, उसके अनुसार ये जवान अपनी कमी से मारे गये. ये जवान मारे जा रहे है, इसलिए नहीं कि नक्सली हिंसा ज्यादा बढ़ गई है. इनकी गलतफहमी और जो तौर तरीके है, जिससे ये खुद ही मौत के मुंह में जा रहे हैं. उन रिपोर्टों में इसी तरह की बात है. पुलिस से या बेस कैंप से इन्हें जो सपोर्ट मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रही है.

अब जाकर ये कह रहे है कि यूनिफाईड कमांड बनाएंगे. दो-तीन-चार राज्यों को मिलाकर. उसमें भी कई राज्यों ने साफ मना कर दिया है. बिहार ने मना कर दिया, बंगाल ने मना कर दिया. वो अपना स्वतंत्र अभियान चलाएंगे. कहने का मतलब ये कि सरकार के लिए ये सब परिस्थितियां ऐसी हैं कि बड़बोलापन तो चाहे कितना भी कर लें ये और उसके नाम पर हथियारों की खरीद-बिक्री में, सिपाहियों की नियुक्ति में जितना कमीशन खा लें (यह भी एक बड़ा उद्योग-धंधा है) लेकिन वास्तव में इनके बल पर ये नक्सलियों पर काबू पा लेंगे, ऐसा मुझे नहीं दिखता नहीं है.दूसरी तरफ रिपोर्ट आ रही है कि 15-15 हजार सीआरपीएफ के जवान या तो इस्तीफा दे रहे हैं या छुट्टी पर जाने के लिए तैयार बैठे हैं कि हम इस तरह कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए नहीं बने हैं, नहीं चाहिए तुम्हारी नौकरी. रखो अपनी नौकरी तो ये जो असंतोष उभर करके आ रहा है, ये भी इनको अंदर ही अंदर सता रहा है. इनको लग रहा है कि हम एक लड़ाई हारने वाले हैं. जितना-जितना ये बल तेज कर रहे हैं, उतनी-उतनी उनकी संख्या बढ़ती जा रही हैं.
जो रमन सिंह कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की संख्या पांच हजार बताते थे, वो अब दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में उनकी संख्या 50 हजार बता रहे हैं. पहले नक्सलियों के पास जो हथियार होते थे, वो साधारण थे. अब एक से एक अत्याधुनिक हथियार, एके-47 से लेकर राकेट लांचर तक उनके पास हैं. तो ये सब किसकी कृपा से हो रहा है? किनकी बदौलत हो रहा है? इनकी ही बदौलत हो रहा है. इन्हीं के हथियार उनके हाथों में जा रहे हैं. अगर कहीं से आ भी रहे हैं तो उनके पीछे कोई न कोई सरकारी सूत्र भी है, जो उनकी मदद कर रहा है. सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार, सरकार की अपनी ढील ये सब चीजें जिम्मेदार हैं, जो नक्सलियों को ताकत दे रही हैं. फिर सरकार की तरफ से अब जो स्वीकारबोध आया है कि हमें अपनी विकास की नीति में परिवर्तन करना है. अब वो जग रहे हैं कि जो पेसा एक्ट है, प्राविजन ऑव पंचायत एक्सटेंशन टू द शिड्यूल्ड एरिया कानून है, अब उसे लागू करना चाहिए. ताकि आदिवासी नक्सलियों के चंगुल से छूटकर इधर आ जाएं. अब इतने दिनों बाद स्वीकारबोध हुआ है, अब चिट्ठी-पतरी हो रही है. आपस में एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय पूछ रहे हैं. गृहसचिव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को चिट्ठी लिख रहे हैं कि आदिवासियों को वनोपज का अधिकार दे दो, ये दे दो, वो कर दो. इस तरह की जो बातें चल रही है, वह नीचे तक नहीं आ रही हैं. नीचे तक लाने के लिए उन्हें अपना विभाग तो खोलना पड़ेगा. किसी अधिकारी को किसी गांव में तो भेजना पड़ेगा. उसके लिए जरूरी है कि रोज-रोज के जो हमले हैं, उसे शांत किया जाये. विकास का कोई भी काम करने के लिए, जंगल में जाने के लिए जो परिस्थितियां चाहिए, आज उपलब्ध नहीं हैं. आप लगाते रहिये 14 हजार करोड़ रुपया. पहले दिन योजना आयोग ने घोषणा कर दी, फिर दूसरे दिन कहा- अरे, पहले का दिया हुआ पैसा ही खर्च नहीं हुआ है. तो क्यों नहीं हुआ खर्च? क्योंकि किसी की जाने की हिम्मत नहीं है वहां. आपका पैसा पड़ा हुआ है, किसी काम का नहीं है. नक्सलियों की पकड़ तगड़ी होती जा रही है. मैं नहीं चाहता कि उनकी पकड़ तगड़ी हो, पहले से मजबूत हो. उन्हें शिकस्त मिलनी चाहिए. वो उस रास्ते को छोडऩे के लिए मजबूर किये जाने चाहिए, क्योंकि उनका हिंसा का रास्ता भी गलत है. खास तौर पर जब वे किसी नागरिक समाज के व्यक्ति की हत्या कर देते हैं. बस में वे मार देते हैं तो माफी मांग लेते हैं. लेकिन बहुतो को वे यह कहकर मारते है कि वह पुलिस का मुखबिर है. वो चाहे इस लोकतंत्र को कितनी भी गालियां दें लेकिन लोकतंत्र के नाम पर कुछ तो ये करते हैं. भले दिखावा करें, नाटक करें. नक्सलियों के कई बड़े नेता जेलों में बंद है. सरकार ने इनके नेताओं की तो गला रेतकर हत्या नहीं कर दी, जैसा नक्सली कर रहे हैं. इस तरह की हिंसा के सहारे, आतंक और दहशत फैलाकर नक्सली अपने विस्तार की सोच रहे हैं. ये गलत है, उनको इसकी इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.दोनों तरफ से हिंसा बंद होनी चाहिए, बातचीत होनी चाहिए. मैं इसको एकमात्र रास्ता मान रहा हूं. इसलिए मेरी आशावादिता है. ऐसा नहीं है कि सरकार का अचानक हृदय परिवर्तन हो गया हो. मैं उनकी मजबूरी समझ रहा हूं. उधर नक्सलियों को भी ऐसा ही लग रहा है. उनके जो 43 शीर्षस्थ नेता थे, उनमें से मुश्किल से 23 ही लोग रह गए हैं. 20 से ज्यादा मारे गए या जेलों में बंद हैं. उनका हाल भी बुरा चल रहा हैं. उनके नाम पर नक्सलियों का ओढऩा ओढक़र बहुत से गैर नक्सली, गैर माओवादी घूम रहे हैं. अपना रोज का धंधा चला रहे हैं. कहने का मतलब ये है कि नक्सलियों के सामने भारी संकट है. अपने आंदोलन को अगर नक्सली इसी तरह भटकने देंगे तो आगे चलकर के अपने आंदोलन को संभाल पाना मुश्किल होगा. ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की जब घटना हुई तो माओवादी नेताओं ने कहा कि इसमें हमारा हाथ नहीं है. फिर जब पता चला कि इस घटना के पीछे पीसीपीए है तो माओवादी कहने लगे कि वो किसी और संगठन का है. लेकिन है तो माओवादी ग्रुप का ही! माओवादियों के साथ संकट है कि उसे अपने साथ जोड़ें तो संकट है, उसे छोड़ें तो संकट है.

ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की घटना के बाद इनके ऊपर एक बड़ा संकट आ गया है। सीबीआई की जो जांच हो रही है, उसमें अगर इनका नाम आ गया कि ये माओवादी संगठन ही है, दूसरे नाम से, सीपीआई माओवादी के बजाय किसी और नाम से उनका ही जनसंगठन है. ऐसे में माओवादी इस बात से कैसे बचेंगे कि वो केवल माओवादी नहीं है बल्कि आतंकवादी भी है. आतंकवादियों का लेबल इन पर पूरी तरह से लगा नहीं है, जिस दिन लगेगा, उस दिन इस कलंक को धो पाना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा.

• मतलब आप यह कह रहे हैं कि आप जिस शांति वार्ता की पहल कर रहे हैं, वह वार्ता असल में संकट में घिरे हुए दो लोगों के बीच की बातचीत है?

दोनों की मजबूरी है कि रास्ता निकले कुछ। मैं इसके लिए समझता हूं कि इससे बढिय़ा मौका नहीं मिलेगा. दोनों को नजदीक लाना, बातचीत कराना, हिंसा दोनों की तरफ से बंद कराना. बातचीत में तुम लड़ो-झगड़ो, विरोध करो, दस दिन करो, दस महीने करो, सारे मीडिया में आनी चाहिए. तुम एक-दूसरे की पोल खोलो, सब कुछ करो. इससे देश का फायदा होगा. जो बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं, इन दोनों के झगड़े में, आदिवासी समाज के जो बहुत से लोग मारे जा रहे हैं, उनको कम से कम एक राहत मिलेगी. लिंगाराम जैसे लोगों को पुलिस कह देती है कि ये दंतेवाड़ा में अवधेश गौतम के रिश्तेदारों की हत्या का मास्टरमाइंड है. आज़ाद के बाद सीपीआई माओवादी में उसकी नियुक्ति प्रवक्ता के रूप में की गई है. कल्लूरी जैसा एक बदनाम अफसर बिना हस्ताक्षर के एक बयान भेज देता है और प्रेस वाले उसे लपालप छाप देते हैं. पहले पन्ने पर. इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार उसे फ्रंट पेज पर छाप देता है, जो सच्चाई की बहुत दुहाई देता है, बड़े-बड़े गोयनका अवार्ड देता है, राष्ट्रपति के द्वारा पत्रकारिता के लिए अवार्ड दिलवाता है, उसको इस बात का जवाब देना पड़ेगा कि कल्लूरी के बिना हस्ताक्षर के एक बयान को अपने मुख्य पृष्ठ पर कैसे छाप दिया? लिंगाराम को तुमने मास्टरमाइंड छाप दिया? लिंगाराम से मैं मिला हूं. वह एक सीधा-साधा लडक़ा है. वह नक्सलियों से भी परेशान है और सलवा जुडूम से भी. एसपीओ लोगों से भी परेशान है. वह कह रहा है कि मैं सीधा-साधा अपनी गाड़ी से सब्जी बेच लेता था. अब मैं मीडिया की पढ़ाई के लिए दिल्ली में हूं. उसको आपने बता दिया कि वो अवधेश गौतम के रिश्तेदारों की हत्या में शामिल है, मास्टरमाइंड है, किंगपिन है. आज़ाद के बाद वो प्रवक्ता नियुक्त किया गया है. सब कुछ गड्ड-मड्ड, झूठी से झूठी बातें हैं. उसमें अरूंधति राय का नाम भी डाल दिया गया है... विदेश में ट्रेनिंग लेकर आया है, भले ही उसके पास पासपोर्ट न हो. उसने गुजरात में भी ट्रेनिंग ली है. पता नहीं क्या-क्या बकवास... पुलिस का एक अधिकारी, जो ऐसे ही बदनाम है, उसके बयान पर यूं ही ध्यान नहीं देना था लेकिन बिना हस्ताक्षर वाले उसके बयान को इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों ने पहले पन्ने पर छापा. ये ज्यादा बड़ी गैर जिम्मेदारी है. मेरे कहने का मतलब है कि इस तरह के बहुत से निरपराध आदिवासी लडक़े-लड़कियों के साथ रोज ऐसी घटनाएं हो रही हैं. मैं समझता हूं कि हम लोगों को इस तरह की घटनाओं को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए. इसका इलाज होना चाहिए. ताकि बातचीत से ये सब चीजें सामने आए. बातचीत ही एकमात्र हल है. सन् 1962 के युद्ध के बाद चीन ने हमारी 80 हजार वर्गमील जमीन दबा कर रखी है, उसके बावजूद आप रोज के हिसाब से उससे बातचीत कर रहे हैं, उसको अपना दोस्त बता रहे हैं. उससे पीट-पिटाकर और अपनी जमीन दबवा करके, दलाई लामा और तिब्बत को पीछे धकेलकर हम उससे बात कर रहे हैं. बात के दौर चल रहे हैं. पाकिस्तान से चार-चार युद्ध करने के बाद और सब कुछ होने के बाद और कई बार उससे कुटनीतिक तमाचे खाने के बाद भी आप तैयार हैं कि उससे बातचीत करेंगे. बातचीत ही तो कर रहे हैं आप, और क्या करेंगे? तो माओवादियों के साथ बातचीत करने में क्या तकलीफ आ रही है?

• आप बातचीत की शुरूआत करते हैं। चिदंबरम साहब की चिट्ठी आपको आती है, सीपीआई माओवादी के प्रवक्ता आज़ाद का जवाब आता है और ... नागपुर में वरिष्ठ पत्रकार एस.एन.विनोद एक अखबार निकालते हैं-दैनिक 1857. उसके पहले पन्ने पर खबर आती है कि नागपुर से गिरफ्तार किए गए खूंखार नक्सली नेता आज़ाद को आंध्र में मार गिराया गया. इन सब चीजों को आप किस तरह देखते हैं ?

बहुत ही गलत संदेश जा रहा है. मैंने तो इसको अपने जीवन का बहुत बड़ा झटका भी बताया था. मेरी अपनी जो विश्वसनीयता है, मुझे लगता है कि यह संकट में पड़ रही है. क्योंकि मैं मध्यस्थ बनकर एक भूमिका में आया था और मुझे मेरा मन कचोट रहा है. कई-कई रात मैं सो नहीं पाया. ऐसा क्यों हुआ?
सरकार मुझे माध्यम बनाकर बातचीत करा रही है और उस चिट्ठी का जवाब लेकर, मेरे पत्र को लेकर आखिरी दौर की बातचीत की सहमति के लिए आज़ाद दंडकारण्य जाने वाले थे, नागपुर स्टेशन पर उतर करके. पत्रकार हेमचंद पांडेय पिछले दिन शाम को दिल्ली से चला. निजामुद्दीन से फोन करके अपनी पत्नी बबीता पांडेय को कह रहा है कि वह नागपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गया है और कल नागपुर से ट्रेन पकडक़र परसो सुबह सात बजे घर पहुंच जाउंगा. तो जो व्यक्ति नागपुर के लिए रवाना हुआ है, उसकी लाश आज़ाद के साथ आदिलाबाद के जंगल में कैसे मिल गई?इन सब चीजों पर थोड़ी सी भी जांच हो जाए तो सरकार ने जो दावा किया है कि आज़ाद आदिलाबाद के जंगल में मुठभेड़ में मारे गए हैं, इसकी तस्वीर साफ हो जाएगी. मैं तो कह रहा हूं कि सरकार जांच कराए या न कराए, पत्रकारों को इसकी जांच गहराई से करनी चाहिए. ये पोल निकलनी चाहिए, सच्चाई सामने आनी चाहिए. क्यों नहीं आ रही है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं.

• आप कह रहे हैं कि यह फर्जी मुठभेड़ है?

दिखाई पड़ रहा है, लेकिन मैं नहीं कहूंगा उसको. मैं चाहूंगा कि न्यायिक जांच इसको कहे. सच्ची मुठभेड़ है तो बताए और फर्जी मुठभेड़ है तो बताए. और फर्जी है तो कौन जिम्मेवार है इसके लिए. केवल फर्जी मुठभेड़ की जिम्मेवारी पर बात खतम नहीं होगी यहां. इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया को sabotage करने के लिए, जो केंद्र के स्तर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि आजादी के बाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नक्सलवाद से है और उसमें यदि आपने एक सन्यासी को बातचीत करने के लिए आगे किया तो उसमें मैं जानना चाह रहा हूं कि कौन जिम्मेवार है इसके लिए? माओवादियों द्वारा जब 27 सीआरपीएफ के जवानों की हत्या की गई तो मैंने उसकी निंदा की. इससे पहले जब 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या की गई मैंने तब उसकी निंदा की. गला रेतकर या पुलिस का मुखबिर बताकर किसी की हत्या की गई, मैं उसकी भी निंदा करता रहा हूं. नक्सलियों की किसी भी हिंसक गतिविधि को मैं सही नहीं बता रहा. लेकिन आज़ाद की मुठभेड़ में हत्या हुई है तो आज़ाद की हत्या अपने आप में संदिग्ध परिस्थितियों में दिखाई पड़ रही है. जबकि किशनजी का बयान है, जबकि गुडसा उसेंडी का बयान है कि वह स्वामी अग्निवेश की चिट्ठी लेकर आखिरी दौर की बातचीत के लिए दंडकारण्य आ रहे थे. मैं स्वयं इंतजार कर रहा था. जुलाई के तीन,चार या पांच तारीख तक मुझको जवाब मिलता जिसको लेकर मैं 15 या 20 जुलाई को, केंद्र सरकार की ओर से चिदंबरम जी ने मुझे जो चिट्ठी लिखी थी, उसके अनुसार बातचीत शुरू करा देता. तो कौन जिम्मेवार है? आजाद कैसे मार दिया गया 1 तारीख या 2 तारीख की रात को? यह एक सवाल आता है. यह केवल फर्जी या सही मुठभेड़ का सवाल नहीं है, इसमें पूरी शांति प्रक्रिया को किसने ध्वस्त किया है? और यदि ये विश्वास सरकार खो बैठेगी कि किसी को आप बुलाइए थोड़ा नजदीक या उसको झांसा दीजिए कि आओ बेटे, बातचीत करने के लिए, और फिर उसे पकडक़र मार डालो. तो फिर कोई सरकार पर विश्वास कैसे करेगा? हम जैसे लोग तो भुगत लेंगे जो कुछ हमारी जिंदगी में होगा लेकिन सरकार की विश्वसनीयता यदि खत्म हो जाती है तो कहां जाएगी ये?

• आप सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और उसी सरकार से बातचीत की भी उम्मीद कर रहे हैं?

उम्मीद मैं उनकी मजबूरी की वजह से कर रहा हूं। ये उनकी कोई दरियादिली जैसी कोई चीज नहीं है. मैं जानता हूं कि वो अपने हथियारों के बल पर इसका समाधान नहीं कर सकते. जितना करेंगे, उतना ही नक्सलियों को वो बढ़ावा देंगे. जो पिछले दिनों के आंकड़ों से साबित हो रहा है. सलवा जुडूम पैदा करके आपने नक्सलियों को ताकत दी है, नक्सली कमजोर नहीं हुए है. सरकार नक्सलियों को खत्म करने के नाम पर जो-जो काम कर रही है, उससे नक्सलियों को फायदा हो रहा है. तो सरकार आखिर चाहती क्या है?

मैं कहता हूं कि रणनीति के हिसाब से भी और आज की परिस्थिति में बातचीत करना सरकार की मजबूरी है. नक्सलियों के लिए भी मजबूरी मैं मान रहा हूं इसलिए बीच में मैं रहूं या कोई रहे, बातचीत से ही रास्ता निकलेगा, इसलिए मैं उम्मीद रखता हूं.
• नक्सल मुद्दों पर नजर रखने वाले और इस मुद्दे को जानने-समझने वाले कई लोग ऐसा मानते हैं कि नक्सली आपको मोहरा बना रहे हैं।

नक्सलियों ने तो मुझे फोन करके या चिट्ठी लिख के ऐसी बात आज तक नहीं कही. पहली बार यदि किसी ने चिट्ठी लिखी, सीलबंद लिफाफे में मुझे दिया तो भारत के गृहमंत्री चिदंबरम जी ने दिया, जिनसे मेरा कोई व्यक्तिगत संपर्क, परिचय नहीं था. उन्होंने पहली बार मुझे मध्यस्थ बनने की पेशकश की. तो पहल तो उन्होंने ही की है और उनकी दी हुई चिट्ठी को मैंने नक्सलियों को भिजवाया. जिसका जवाब मुझे पूरे सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी की ओर से आज़ाद ने दिया. फिर तीसरी चिट्ठी मैंने 26 जून को लिखी. तो मैं उनका मोहरा कैसे बन सकता हूं? मैं नक्सलियों का सिद्धांतत: विरोधी हूं. आज से नहीं हूं. जब मैं कलकत्ता के सेंट जेवियर्स कालेज में पढ़ाता था और जब नक्सली आंदोलन नक्सलबाड़ी से चल कर कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कालेज तक पहुंच गया था, जब ये चेयरमैन माओ को अपना चेयरमैन बताते थे, लाल किताब को लेकर सब काम किया करते थे, तब से मैं इनका विरोधी रहा हूं. मैं तो हिंसक गतिविधियों से कभी भी सहमत नहीं हो सकता. एक मुर्गी तो क्या एक कीड़ा भी मुझसे जानबूझ कर नहीं मारा जा सकेगा. मैं सिद्धांत रूप से हिंसा को गलत मानता हूं. जो मांस, मुर्गी, अंडा खाते हैं, उनको मैं गलत मानता हूं. मैं पूर्ण रूप से अहिंसक समाज के लिए समर्पित हूं तो नक्सली मुझे कैसे मोहरा बना पाएंगे? मुझे बनाएंगे तो और भारी पड़ेगा उनको.

सरकार मोहरा बना रही है?

सरकार ने कोशिश की कि मुझे चिट्ठी देकर इन परिस्थतियों में कोई रास्ता निकाले. तो मैंने रास्ता निकालकर लगभग उनके नजदीक ला दिया था. अब भी मैं उनसे एक बात कह रहा हूं, मेरी अपनी पूरी प्राणप्रण से चेष्टा रहेगी लेकिन आपने जो मेरे लिए दिक्कत पैदा की है, उसको थोड़ा सा दूर कीजिए. इतना कीजिए कि आज़ाद के मुठभेड़ की न्यायिक जांच करा दीजिए. न्यायिक जांच का आदेश दे दीजिए बस. ताकि मैं माओवादी नेताओं से कह सकूं कि देखो आपका आरोप है कि फर्जी मुठभेड़ है, ये न्यायिक जांच में सामने आ जाएगी. आप भी जांच में मदद करो लेकिन साथ ही साथ आप वहां से शुरू करो, जहां से आज़ाद ने मारे जाने से पहले अपना काम छोड़ा था. ये आज़ाद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. अगर वो सचमुच मेरी चिट्ठी को लेकर के कोई तारीख देने के लिए जा रहे थे तो वो तारीख यदि अब भी मुझे मिलती है तो उसका बहुत बड़ा लाभ होगा.

• आपको ऐसा लगता है कि सरकार उस मामले को लेकर कोई न्यायिक जांच करेगी?

न्यायिक जांच करना उनके लिए जरूरी है, क्योंकि ज्यादातर लोग जो भी मेरे संपर्क में आ रहे हैं, और विपक्ष के तमाम नेताओं से मैं मिला हूं, वो भी कह रहे हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि ये कैसे मुठभेड़ हो गई? पत्रकार की हत्या ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया। पत्रकार हेमचंद पांडेय का आदिलाबाद के जंगल में मारा जाना भी संदिग्ध है. इस मुठभेड़ में एक भी पुलिसवाला घायल नहीं हुआ. साढ़े तीन घंटे की मुठभेड़ और गोलाबारी हुई जंगल में रात को, तो केवल वे दोनों मारे गए. तीसरा आदमी कोई घायल नहीं हुआ, न इधर से न उधर से. पुलिसवालों को एक छर्रा तक नहीं लगा. ऐसा कैसे हुआ मुठभेड़ में? जब आज़ाद के पास एके-47 दिखाया आपने तो उसकी गोलियां कहां गईं? ऐसा संभव नहीं है कि सीपीआई माओवादी का तीसरे नंबर का नेता अपने गले में एके-47 लटकाकर जंगल में अकेला 12 बजे रात को पत्रकार को इंटरव्यू देता घूम रहा हो और इन्होंने मुठभेड़ में उसे मार दिया. पुलिस के बयान पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा है. सरकटपल्ली गांव के लोग कह रहे हैं कि हमारे गांव में रात को इस तरह की कोई घटना नहीं हुई है. वरना रात को इतनी गोलियां चलती तो गांव वाले जाग जाते, कुछ तो सुनते. अब तक जो कुछ भी जानकारियां मिल रही है, उससे ये लग नहीं रहा कि ये वास्तविक मुठभेड़ हुई है.

• चिदंबरम जी आपसे बातचीत में न्यायिक जांच से इनकार कर चुके हैं.

न्यायिक जांच से इनकार किया भी है लेकिन उन्होंने मुझे इशारे से जरूर कहा कि आप चाहें तो आंध्रप्रदेश सरकार से जांच करा लें. लेकिन मैं आंध्रप्रदेश सरकार के पास क्यों जाऊं? मैं सेंट्रल का मध्यस्थ बनकर बातचीत करा रहा था, तो सेंट्रल की जिम्मेवारी बनती है. इसलिए मैं प्रधानमंत्री से मिला हूं और उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया है कि वे इसे गंभीरता से लेंगे. पूरी संवेदना के साथ मेरी बात उन्होंने सुनी है. मुझे विश्वास है कि प्रधानमंत्री इसमें हस्तक्षेप करेंगे.
• सरकार जैसा चाहती है और नक्सली जैसा चाहते है, उसी के अनुरूप अगर सारी बातचीत हो भी जाए तो अंतत: क्या होगा?

अंतत: यह होगा कि गोलियों पर जो आज दोनों तरफ का भरोसा है, वह समाप्त होकर बातचीत की तरफ, समाधान की तरफ आएगा. सरकार कहेगी कि आप क्यों ऐसा कर रहे हैं? वो कहेंगे कि आपने आदिवासियों के साथ ये-ये जुल्म किए हैं. सरकार कहेगी कि अच्छा आज तक जो हो गया, सो हो गया. अब हम इसे सुधारना चाहते हैं. आदिवासी उसके ऊपर अपनी शर्त लगाएंगे कि खनिज संपदा जो है, उसे आप इस तरह से मत दीजिए. फिर पूरा देश भी इस बहस के अंदर उसमें शामिल होगा. क्योंकि छिटपुट-छिटपुट बहस तो हो रही है लेकिन एक पूरा घनीभूत होकरस एक बहस होगी कि विकास का जो आपने मॉडल बनाया है, उसमें जिनकी जमीन छीनकर तुम विकास कर रहे हो, जिनकी खनिज संपदा का तुम दोहन कर रहे हो, उनका क्या हिस्सा है, उसके अंदर. ये सब बातें आएंगी उसके अंदर. मुझे लगता है कि इससे सकारात्मक परिणाम निकलेंगे.
बातचीत से ही कुछ निकलेगा. अभी तो कुछ नहीं हो रहा है. अंधाधुंध गोलियां दोनों तरफ से चल रही हैं और बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं. नेता जो बैठे हैं, दिल्ली में या रायपुर में, उनका तो घर से कुछ नुकसान नहीं हो रहा है. जनता का पैसा हथियारों में जा रहा है. जनता के गरीब किसान, मजदूर के बेटे फौज में हैं या अर्धसैनिक बलों में हैं, वो मारे जा रहे हैं, तो मर जाओ. नेताओं का तो कुछ बिगड़ नहीं रहा है. उनकी तो सुरक्षा और बढ़ गई. सुना है कि चिदंबरम जी की और गृहसचिव की सुरक्षा एकदम अचानक बढ़ गई. कहीं से उनको सूचना मिली कि नक्सली उनको मारना चाहते हैं. बताइए ! तो ये नेता अपनी-अपनी सुरक्षा बढ़ा रहे हैं जनता के खर्चे पर. टैक्स देने वालों के धन का आज नंगा नाच हो रहा है.

जीडीपी का growth हो रहा है, देश का विकास हो रहा है, देश में जो अरबपति हैं, उनकी संख्या बढ़ रही है...

तो गरीबों की संख्या भी बढ़ रही है. गरीबी की रेखा के नीचे वालों की संख्या भी बढ़ रही है. हर दूसरा बालक या बालिका कुपोषण का शिकार है. हर रोज 7 हजार बच्चे भूख से तड़प कर मर रहे हैं. इस देश के अंदर अनाज गोदामों में पड़ा हुआ है या सुअर खा रहे हैं या चूहे खा रहे हैं, बर्बाद हो रहा है अनाज. भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है. एक-एक अधिकारी के घर से सौ-सौ करोड़, पांच-पांच सौ करोड़ निकल रहे हैं. ये सब चीजें देश को भयावह परिस्थतियों की तरफ ले जा रहे हैं.

• क्या सरकार व नक्सलियों के बीच जो बातचीत होगी, उससे ये भयावह परिस्थितियां बदल जाएंगी?

जरूर। मैं समझता हूं कि इन मुद्दों पर भी बातचीत होगी। बातचीत में केवल और केवल ये नहीं होगा कि तुम्हारे ऊपर से प्रतिबंध हटा देंगे, तुम्हारे साथियों को जेल से बाहर निकाल देंगे, यह इतने तक नहीं रहेगा. पूरे विकास की अवधारणा से लेकर सभी मुद्दों पर बातचीत होगी. मुझे लगता है कि तब भ्रष्टाचार के ऊपर भी बहस होगी. स्विस बैंकों में जो पैसा जमाकर रखा है, भ्रष्ट नेताओं ने, यह भी बहस का मुद्दा होगा. Governance के ऊपर भी सवाल आएगा कि ये जल किसका, ये जमीन किसकी, ये जंगल किसके, मालिक असली मायने में कौन है? उन इलाकों में रहने वाला या इनके वोटों की सौदेबाजी करके जो ऊपर पहुंच गया है, और वो कार्पोरेट जगत से सौदा करके बेच रहा है, इन सब चीजों को ? जो कर्नाटक में हो रहा है, जो मुख्यमंत्री खुद कह रहा है. तो इस तरह के जो माफिया है, माइनिंग माफिया, वो मालिक है इस देश के, देश की संपत्ति के. ये सारी चीजें आएंगी. बातचीत ही एकमात्र रास्ता है. मीडिया का तो मतलब ही है बातचीत. आपके पास कैमरा है, कलम है, बंदूक तो नहीं है आपके पास. उस पर अगर हम ज्यादा विश्वास रखेंगे और बंदूक पर कम रखेंगे तभी हमारा भविष्य बेहतर है. साभार- रविवार.

29 जुलाई 2010

विकास तो चाहिए, पर किस तरह?

  • देवाशीष प्रसून

द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्ति तक साम्राज्यवादी ताक़तों को यह समझ में आ गया था कि अब केवल युद्धों के जरिए उनके साम्राज्य का विस्तार संभव नहीं है। उन्हें ऐसे कुछ तरक़ीब चाहिए थे, जिसके जरिए वे आराम से किसी भी कमज़ोर देश की राजनीति व अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप कर सकें। इसी सिलसिले में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र के फलक पर ’विकास’ को फिर से परिभाषित किया गया। इससे पहले विकास का मतलब हर देश, हर समाज के लिए अपनी जरूरतों व सुविधा के मुताबिक ही तय होता था। पर, संयुक्त राष्ट्र संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश व विश्व व्यापार संगठन जैसे ताकतवर प्रतिष्ठानाओं के उदय के बाद से विकास का मतलब औद्योगिकरण, शहरीकरण और पूँजी के फलने-फूलने के लिए उचित माहौल बनाए रखना ही रह गया। दुनिया भर के पूँजीपतियों की यह गलबहिया दरअसल साम्राज्यवाद के नये रूप को लेकर आगे बढ़ी। इस प्रक्रिया में दुनिया भर में बात तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत करने की हुई, लेकिन हुआ इससे बिल्कुल उलट।

भारत का ही उदाहरण लें। शुरु से ही विकास के नाम पर गरीबों का अपने ज़मीन व पारंपरिक रोजगारों से विस्थापन हुआ है। जंगलों को हथियाने के लिए बड़े बेरहमी से आदिवासियों को बेदख़ल किया गया जो आज भी मुसलसल जारी है। आँकड़े बताते हैं कि सन ’४७ से सन २००० के बीच सिर्फ़ बाँधों के कारण लगभग चार करोड़ लोग विस्थापित हुए है, अन्य विकास परियोजना के आँकड़े अगर इसमें जोड़ दिए जायें तो विस्थापन का और भयानक चेहरा देखने को मिलेगा। विकास के इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में सरकारों द्वारा बड़े स्तर पर मानवाधिकार उल्लंघन, सैन्यीकरण और संरचनात्मक हिंसा की घटनाओं में लगातार इज़ाफा हुआ है।

औद्योगीकरण, शहरीकरण, बाँध, खनिज उत्खनन और अब सेज़ जैसे पैमानों पर विकास की सीढ़ियों पर नित नए मोकाम पाने वाले हमारे देश में इस विकास के राक्षस ने कितना हाहाकार मचाया है, यह शहर में आराम की ज़िंदगी जी रहे अमीर या मध्यवर्गीय लोगों के कल्पना से परे है, पर देश में अमीरी और ग़रीबी के बीच बढ़ता दायरा इस विभत्स स्थिति की असलियत चीख़-चीख़ कर बयान करता है। बतौर बानगी, देश में बहुसंख्यक लोग आज भी औसतन बीस रूपये प्रतिदिन पर गुज़रबसर कर रहे हैं और दूसरी ओर कुछ अन्य लोगों के बदौलत भारत दुनिया में एक मज़बूत अर्थव्यव्स्था के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है। अलबत्ता, सरकार अपनी स्वीकार्यता बनाये रखने के लिए महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी सरीखे योजनाएं भी लागू करती हैं। पर, इस तरह की योजनाओं का व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते क्या हश्र हो रहा है, सबको पता है और फिर भी अगर साल भर में सौन दिन का रोज़गार मिल भी जाए तो बाकी दिन क्या मेहनतकश आम जनता पेट बाँध कर रहे? हमारी सरकार विकास को शायद इसी स्वरूप में पाना चाहती है?

देश में विकास में मद्देनज़र ऊर्जा की बहुत अधिक खपत है और विकास के पथ पर बढ़ते हुए ऊर्जा की जरूरतें बढ़ेंगी ही। ऊर्जा के नए श्रोतों में सरकार ने न्यूक्लियर ऊर्जा के काफी उम्मीदें पाल रखी हैं। जबकि कई विकसित देशों ने न्यूक्लियर ऊर्जा के ख़तरों को ध्यान में रखते हुए इनके उत्पादन के लिए प्रयुक्त रियेक्टरों पर लगाम लगा रखा है, वहीं भारत सरकार को अपने यहाँ इन्हीं यम-रूप उपकरणों को स्थापित करने की सनक है। और अब आलम यह है कि न्यूक्लियर क्षति के लिए नागरिक देयता विधेयक पर सार्वजनिक चर्चा किए बिना ही इसे पारित करवाने की कोशिश की गई। इसमें यह प्रावधान था कि भविष्य में बिजली-उत्पादन के लिए लग रहे न्यूक्लियर संयंत्रों में यदि कोई दुर्घटना हो जाए, तो उसको बनाने या चलाने वाली कंपनी के बजाय भारत सरकार क्षतिपूर्ति के लिए ज़िम्मेवार होगी। अनुमान है कि ऐसी किसी भी स्थिति में भारत सरकार को जनता के खजाने से हर बार कम से कम इक्कीस अरब रूपये का खर्च करने पड़ेंगे। विदेशी निगमों को बिना कोई दायित्व सौंपे ही, उनके फलने-फूलने के लिए उचित महौल बनाए रखने के पीछे हमारी सरकार की क्या समझदारी हो सकती है? सरकार के लिए विकास का यही मतलब है क्या?

छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों – बस्तर, दंतेवाड़ा और बीजापुर में उन्नत गुणवत्ता वाले लौह अयस्क प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है। यह जगह पारंपरिक तौर पर आदिवासियों का बसेरा है और वे इस इलाके में प्रकृति का संरक्षण करते हुए अपना जीवन-यापन करते हैं। इन आदिवासियों का जीवन यहाँ के जंगलों के बिना उनके रोजगार और सांस्कृतिक व सामाजिक जीवन से विस्थापन जैस होगा। सरकार को विकास के नाम पर यह ज़मीन चाहिए, भले ही, ये आदिवासी जनता कुर्बान क्यों न हो जायें और पर्यावरण संरक्षण की सारी कवायद भाड़ में जाए। इस कारण से जो ज़द्दोजहद है, उसकी परिणति गृहयुद्ध जैसी स्थिति में है। इसमें एक तरफ, आदिवासी लोग जंगल पर अपने अधिकार को बनाये रखने के लिए लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ, सरकार के प्रोत्साहन पर केंद्रीय पुलिस बल और उसके द्वारा समर्थित सलवा जुडूम अपनी नौकरी बजा रहे हैं। सूत्रों से पता चलता है कि यह पूरा खूनी खेल टाटा स्टील और एस्सार स्टील के इशारे पर लौह अयस्क से संपन्न गांवों के अधिग्रहण करने हेतु खेला जा रहा है। बहरहाल, आदिवासियों को उनके आजीविका के साधनों, जीवन का आधार और अविवादित रूप से उनकी अपनी संपत्ति - इन जंगलों से महरूम करने वाले इसी व्यवस्था का एकमात्र उद्देश्य विकास करना है। सवाल यह है कि यह विकास किसका होगा और किसके मूल्य पर होगा?

विकास के इस साम्राज्यवादी मुहिम में उलझे अपने इस कृषिप्रधान राष्ट्र में आज खेती की इतनी बुरी स्थिति के लिए कौन जिम्मेवार है? विदेशी निगम के हितों को ध्यान में रखकर वैश्विक दैत्याकार प्रतिष्ठानोंके शह पर हुई हरित क्रांति अल्पकालिक ही रही। जय किसान के सारे सरकारी नारे मनोहर कहानियों सेअधिक कुछ नहीं थे। खेती में अपारंपरिक व तथाकथित आधुनिक तकनीकों के प्रवेश ने किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयों सिंचाई, कटाई और दउनी आदि कामों के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा नियंत्रित उद्योगों के उत्पादों पर निर्भर कर दिया है। हरित क्रांति के आह्वाहन से पहले भारतीय किसान बीज-खाद आदि के लिए सदैव आत्मनिर्भर रहते थे। लेकिन कृषि क्षेत्र में सरकार द्वारा लादे गये आयातित विकास योजनाओं ने किसानों को हर मौसम में नए बीज और खेतीबाड़ी में उपयोगी ज़रूरी चीज़ों के लिए बाज़ार पर आश्रित कर दिया है। बाज़ार पैसे की भाषा जानता है। और किसानों के पास पैसे न हो तो भी सरकार ने किसानों के लिए कर्ज की समुचित व्यवस्था कर रखी है। इस तरह से हमारी कल्याणकारी सरकारों ने आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और संपन्न किसानों को कर्ज के चंगुल में फँसाते हुए ’ऋणं कृत्वा, घृतं पित्वा’ की संस्कृति का वाहक बनाने का लगातार सायास व्यूह रचा है। छोटे-छोटे साहूकारों को किसानों का दुश्मन के रूप में हमेशा से देखा जाते रहा है, पर अब सरकारी साहूकारों के रूप में अवतरित बैंकों ने भी किसानों का पोर-पोर कर्ज मेंडुबाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी है। कर्ज चुकाने की बेवशी से आहत लाखों किसानों के आत्महत्या का सिलसिला जो शुरु हुआ, ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है।

कृषि में विकास का कहर यहाँ थमा नहीं है, हाल में पता चला है कि हरित क्रांति के दूसरे चरण को शुरु करने को लेकर जोर-शोर से सरकारी तैयारियाँ चल रही है। छ्त्तीसगढ़ में धान की कई ऐसी किस्में उपलब्ध हैं, जिनकी गुणवत्ता और उत्पादन हाइब्रिड धान से कहीं अधिक है और कीमत बाज़ार में उपलब्ध हाइब्रिड धान से बहुत ही कम। फिर भी, दूसरी हरित क्रांति की नए मुहिम में कृषि विभाग ने निजी कंपनियों को बीज, खाद और कीटनाशक दवाइयों का ठेका देने का मन बना लिया है। ठेका देने का आशय यह है कि उन्हीं किसानों को राज्य सरकार बीज, खाद या कीटनाशक दवाइयों के लिए सब्सिडी देगी, जो ठेकेदार कंपनियों से ये समान खरीदेंगे, अन्यथा किसी तरह की कोई मदद नहीं मिलेगी। गौरतलब है कि इस तरह से ये निजी कंपनीयां किसानों को अपने द्वारा उत्पादित बीज महंगे दामों पर बेचेगी और एक बड़ी साजिश के तहत किसानों के पास से देशी बीज लुप्त हो जायेंगे। बाद में फिर किसानों को अगर खेतीबाड़ी जारी रखनी होगी तो मज़बूरन इन कंपनियों से बीज वगैरह खरीदने को बाध्य होना पड़ेगा। यह किसानों को खेती की स्वतंत्रता को बाधित करके उन्हें विकल्पहीन बनाने का तरीका है। कुल मिलाकर खेतीबाड़ी को एक पुण्यकर्म से बदल कर अभिशाप में तब्दील करने के लिए सरकार ने कई प्रपंच रचे हैं। जिससे कोफ़्त खाकर लोग आत्मनिर्भर होने के बजाये पूँजीवादी निगमों की नौकरियों को अधिक तवज्जों देने को मज़बूर हो।

विकास के तमाम उद्यमों के वाबज़ूद, हमारा देश पिछले कुछ महीनों से कमरतोड़ महंगाई के तांडव को झेलता आ रहा है। दाल, चावल, खाद्य तेलों और सब्जियों जैसी ज़रूरी खाद्य वस्तुओं के आसमान छूती कीमतों के आगे सरकार हमेशा घुटने टेकती ही दिखी। पेट्रोल व डीज़ल के उत्पाद के बढ़ते दाम से ज़रूरत की अन्य चीज़ों की कीमत महंगे ढुलाई के कारण बढेगी ही और यों बढ़ रही कीमतों से पूरा जनजीवन त्राहिमाम कर रहा है। बेहतर जीवन स्थिति बनाना भर ही सरकार का काम है। असामान्य रूप से बढ़ती कीमतों के लिए एक तरफ अपनी लाचारी दिखाते हुए सरकार दूसरी ओर, यह डींग हाँकने से परहेज़ भी नहीं करते कि देश ने इतना विकास कर लिया है कि भारत की गिनती अब विश्व के अग्रनी देशों में हो रही है। अगर किसी देश की अधिकतर जनता को यह नहीं पता हो कि वह जी-तोड़ मेहनत के बाद वह जितना कमायेगा, उसमें उसका और उसके परिवार का पेट कैसे भर पायेगा, तो इससे ज्यादा अनिश्चितता क्या हो सकती है? बढ़ती महंगाई को एक सामान्य परिघटना के रूप में प्रस्तुत करना सर्वथा अनुचित है। देश की सरकार की नैतिक ज़िम्मेवारी है, कि देश की जनता को अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए वह अनुकूल परिस्थिति बनाए रखे, जिसमें विकासवादी सरकारों को कोई मतलब नहीं दिखता। लोग सोचने को मज़बूर हो रहे हैं कि इस देश में विकास तो रहा है, जोकि बकौल सरकार होना ही चाहिए, लेकिन यह किस तरह और किनके लिए हो रहा है?

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संप्रति: पत्रकार और शोधार्थी
संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001,
दूरभाष: 09555053370

26 जुलाई 2010

संसदीय लोकतंत्र का नैतिक पतन

चन्द्रिका
बिहार विधान सभा में हुए हंगामा न तो पहला है न ही आखिरी बिहार के अलावा भी यदि अन्य राज्यों की एक सूची बनाई जाय तो लम्बी फेहरिस्त बनेंगी. अलबत्ता इस घटना के बाद ६७ सांसदों को निलम्बित कर दिया गया है. इस पूरी घटना को क्या इस रूप में लिया जाना चाहिये कि विपक्ष, नितीश सरकार के द्वारा की गयी ११,४१२ करोड़ की कथित अनियमितता को उजागर करना चाहता था जिसकी प्रतिरोध स्वरूप यह हंगामा किया गया या फिर यह संसदीय राजनीति का क्रमवार नैतिक पतन है. दरअसल यह एक नाटक है जो संसदीय राजनीति में खेला जाना जरूरी हो गया है और तब इसकी अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है जब चुनाव नजदीक हों. जिस सी.ए.जी. की रिपोर्ट को लेकर यह हंगामा हुआ वह जुलाई २००९ में ही सदन में प्रस्तुत की गयी थी तब से लेकर अब तक कोई खास विरोध विपक्ष के द्वारा नहीं किया गया. अब जबकि बिहार में चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो ऐसी स्थिति में यह नाटक खेला जाना राजनीतिक परिदृष्य में एक अहम भूमिका अदा करेगा और मीडिया के जरिये इन्हें प्रचार या कुप्रचार मिल सकेगा. यह ऐसा ही मसला है जैसे कुख्याति की भी एक ख्याति होती है और अब तक इसे देश की राजनीति में कई आपराधिक तत्व इस प्रवृत्ति को भुनाते रहे हैं. अपने आपराधिक कुख्यातपन को ख्याति में बदल कर भीड़तंत्र का समर्थन हासिल करने में वे कामयाब हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में मीडिया सर्वसुलभ होती है जिसके जरिये परिदृष्य से वर्षों से गायब एक नेता लोगों के सामने दृष्यमान हो उठता है, वह भी प्रतिरोध करता हुआ, अनियमितताओं के खिलाफ जूझता हुआ, कुमारी ज्योति की तरह जो शारीरिक अक्षमता के बावजूद गमले तोड़े जा रही थी.

कुछ वर्ष पूर्व ही जब बिहार विधान सभा में एक पत्रकार के प्रसाशनिक दमन के बाद पत्रकारों ने सदन से वहिस्कार का फैसला लिया था ऐसी स्थिति में सदन के सदस्यों द्वारा यह कहा गया था कि मीडिया की अनुपस्थिति में शोर सराबे का कोई मतलब नहीं है और उस दिन शोर सराबा स्थगित रहा, तो क्या यह मान लिया जाय कि सदन में किया जाने वाला शोर सराबा मीडिया के लिये किया जाता है ताकि नेताओं और विपक्षि दलों के दिखावटी विरोध लोगों तक मीडिया के जरिये पहुंच सके और लोगों को लगे कि उनके नेता मुद्दों के प्रति कितने जुझारू हैं. निश्चित तौर पर सदन के प्रतिरोध महज दिखावटी ही रह गये है क्योंकि सत्तारूढ़ और विपक्ष दोनों ही इस संरचना में एक पॉलिसी के तहत कार्य कर रहे हैं जहाँ विपक्ष के लिये प्रतिरोध एक अनुष्ठानिक कार्यक्रम बन जाता है.
विधायिका संसदीय राजनीति का एक अहम स्तम्भ है पर इसमे क्रमवार गिरावट देखी जा सकती है राज्य सभा के सभापति के रूप में जब डा. शंकर दयाल शर्मा को रोते हुए यह कहना पड़े कि “लोकतंत्र की हत्या न करें चाहें तो मेरी जान ले लें” इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि सदन के कार्यवाही की स्थितियां किस रूप में विद्रूप होती चली गयी हैं. जबकि वास्तविक स्थिति ये है कि सदन के कार्यवाहियों का जो हिस्सा मीडिया के जरिये प्रस्तुत किया जाता है वह सम्पादित किया हुआ रहता है. जिसमे सदन में हुए अशोभनीय आचरण को पहले ही निकाला जा चुका होता है. आखिर देश की जनता जिन नेताओं को चुनाव कर अपने प्रतिनिधि के तौर पर भेजती है उनके आचरण को ठीक उसी रूप में देखने का हक क्यों नहीं मिल पाता जिस रूप में वे सदन में आचरण करते हैं.

यही नहीं बल्कि सदन में कई बार प्रतिनिधियों के साथ वर्गीय व जातीय आधार पर भेदभाव के मसले भी खुलकर सामने आये और हंगामा भी हुआ पर उन्हें सदन की कार्यवाही से बाहर करार दिया गया है. चाहे वह झारखंड में आदिवासी विधायक करिया मुंडा के हड़िया पीकर सदन में आने का मसला हो या उत्तर प्रदेश में गाजीपुर के विधायक काशीनाथ यादव के बिरहा गाने का. झारखंड में आदिवासी विधायक करिया मुंडा के हड़िया पीकर आने पर सदन के कई सदस्यों द्वारा उनका उपहास किया गया था और मुंडा रोते हुए बोले थे कि जब कोई सदस्य व्हिस्की और रम पीकर आ सकता है तो वे हड़िया पीकर क्यों नहीं आ सकते, उन पर कोई आवाज क्यों नहीं उठाता. इसी तौर पर गाजीपुर के विधायक काशीनाथ यादव ने कुछ वर्ष पूर्व सदन में कहा कि वे अपनी बात बिरहा से शुरू करना चाहते हैं और सदन में हो हल्ला मचने लगा लालजी टंडन ने तो यहाँ तक कहा कि सदन में एक पतुरिया की कमी और रह जायेगी कहिये तो उसे भी पूरी कर दें ऐसी स्थिति में अध्यक्ष ने हस्तक्षेप करते हुए कहा था कि जब लोग सदन में दुष्यंत कुमार, निदा फाजली, गालिब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं तो बिरहा में बात क्यों नहीं रखी जा सकती जबकि यह एक लोक विधा है. ये ऐसी घटनायें हैं जो देश के उस सदन में घटित होती हैं जो समता, समानता के नारे की संरचना निर्मित करता है और अपनी कार्यप्रणाली में असमानता की संस्कृति को बनाये हुए है.

14 जुलाई 2010

मैं माओवादी नहीं हूं, मुझे फंसाया जा रहा है : लिंगाराम

छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये।
एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि कोडोपी के रिश्ते अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर, हिमांशु कुमार और नंदिनी सुंदर से है। कल्लुरी के उस दावे के बाद सोमवार को लिंगाराम कोडोपी की यह प्रेस कानफ्रेंस हुई। कोडोपी के साथ मानवाधिकार की आवाज़ बुलंद करने वाले जाने-माने वकील प्रशांत भूषण और सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश थे।
पत्रकारों से बात करते हुए लिंगाराम के आंसू निकल गये। उन्होंने बताया कि उनका माओवादियों से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस बस उन्हें परेशान कर रही है। उनका उत्पीड़न कर रही है। पिछले साल सितंबर में पुलिस ने उन्हें उनके गांव से बिना बात उठा लिया और 40 दिन तक हिरासत में रखा। पुलिसवाले उन्हें जबरन स्पेशल पुलिस ऑफिसर बनाना चाहते थे। और उन्हें तब छोड़ा गया घरवालों ने बिलासपुर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लिंगाराम के वकील ने कहा कि उन्हें पूछताछ से इनकार नहीं है, लेकिन उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। लिंगाराम ने कहा कि वो माओवादी नहीं है और इस आरोप में पुलिस का उत्पीड़न झेलने की बजाय वो मर जाना पसंद करेंगे।
प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने कहा है कि वो पुलिस के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा करने का मन बना रही हैं। यह पुलिसिया रवैया बेहद अपमानजनक और ख़तरनाक है। इस बीच छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विश्वरंजन ने कहा है कि जांच खुफिया जानकारियों के आधार पर चल रही है और एक मुखबिर ने उन्हें जो सूचना दी, उसी के आधार पर एसएसपी कल्लुरी ने बयान दिया था। उन्होंने कहा कि लिंगाराम की गिरफ्तारी बिना पूछताछ के नहीं होगी। किसी सबूत के आधार पर नहीं होगी।


अरुंधती और मेधा के ख़िलाफ भूमिका बना रही है पुलिस
अगर यह खबर सही है तो छत्तीसगढ़ पुलिस एक बेहद खतरनाक साजिश रच रही है। यह साजिश है मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले लोगों की ईमानदारी और नीयत पर सवाल उठा कर उन्हें फंसाने की। इंडियन एक्सप्रेस की खबर और पीटीआई की तरफ से जारी रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है। इस प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि छह जुलाई को बस्तर में कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले की साजिश रचने वाले शख्स का अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर और गांधीवादी तरीके में यकीन रखने वाले एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार से रिश्ता है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक पुलिस की तरफ से भेजे गये बिना हस्ताक्षर वाली प्रेस रिलीज में दावा किया गया है कि कांग्रेस नेता अवधेश गौतम के घर पर हमले की साजिश लिंगाराम को़डोपी में रची थी। को़डोपी दिल्ली और गुजरात में आतंकी गतिविधियों की ट्रेनिंग ले चुका है। माओवादी नेता चेरुकरी राजकुमार उर्फ आजाद के मारे जाने के बाद को़डोपी को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बना दिया गया है।
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने पुलिस के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में बहुत से लिंगाराम हैं और वो नहीं जानती की पुलिस किसकी बात कर रही है। उन्होंने कहा कि पुलिस के आरोप फर्जी हैं और उनमें कोई दम नहीं है।
यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।
mohalla live se.

28 जून 2010

संरचना में एकल नायकत्व

चन्द्रिका
देश की सभी संसदीय पार्टियों के सामने आज नायकत्व का संकट है. मनमोहन सिंह को जब प्रधानमंत्री बनाया गया तो वे किसी भी रूप में जन लोकप्रिय नेता नहीं थे. लोगों ने देश की जिस पार्टी को अपना समर्थन दिया उसके पास एक ऐसे नेता का आभाव था जिसकी देश में लोकप्रिय छवि हो. हाल के दिनों में कांग्रेस का यह अंतर्विरोध और भी उभर कर सामने आया जब आदिवासी प्रतिरोध के विरोधी गतिविधियों और सैन्य कार्यवाहियों के चलते पी. चिदम्बरम की लोकप्रियता बढ़ने लगी. चाहे वह जिस भी रूप में रही हो. अब तक राजनीति में लोकप्रियता के आधार इसी तौर पर निर्मित होते रहे हैं जिसमे व्यक्ति का चेहरा और नाम लोगों की नजर और जुबान पर चढ़ जाय. राहुल गांधी के अनूठे कारनामे और सनसनी दौरे इसी स्थापना के लिये जारी हैं. लिहाजा कांग्रेस के भीतर एक नये तरीके का अंतर्विरोध बढ़ा. माओवादियों को लेकर दिग्विजय सिंह के जो बयान आये वह चिदम्बरम की रणनीति के खिलाफ थे, पर पॉलिसी के आधार पर कांग्रेस ही नहीं बल्कि देश की सभी पार्टियाँ माओवाद को लेकर एक जैसा ही रुख रखती हैं. इस बयान से कांग्रेस पार्टी लोगों और बुद्धिजीवी तबके में पनप रहे विमोह को एक लोकतांत्रिक और उदार चेहरे के रूप में दिग्विजय सिंह को प्रस्तुत कर कम करना चाहती थी. दरअसल देश में अब तक जो ढांचा निर्मित हुआ है उसमे किसी भी संगठन में व्यक्ति का नायकत्व और उच्चता क्यों उभारी जाती है जबकि इसके साथ ही कोई संरचना अपने में असमान हो जाती है. किसी भी ढांचे में पदों की श्रेष्ठता और निम्नता उसे असमान आधारों पर ला खड़ा करती है. यह असमानता महज देश की संसदीय पार्टियों में ही नहीं बल्कि गैर संसदीय पार्टियों और संगठनों में भी व्याप्त है, जो इस असमानता के खिलाफ लड़ रहे होते हैं.
कोई भी संरचना अपने लिये एक मूल्य का विकास करती है. व्यवस्था के एक ढांचे में रहते हुए वैचारिक तौर पर उससे बाहर की सोच तो पैदा हो जाती है पर व्यव्हारिक तौर पर उसे लागू करना कम सम्भव होता है, जब तक कि कोई नया ढांचा निर्मित न हो जाय. इस देश में जो संरचना विकसित हुई उसने समूह के बजाय व्यक्ति को उभारने का काम किया यानि सामूहिकता के विरोध में व्यक्ति केन्द्रीयता ज्यादा हावी रही, चाहे वह आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, खेल किसी भी क्षेत्र में देखा जा सकता है. व्यक्ति की ब्रांडिंग की जाती रही और उसे सेलीब्रिटी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा. एक ऐसा मूल्य विकसित हुआ जहाँ लोगों ने समूह, संगठन को तरजीह देने के बजाय व्यक्ति आधारित ब्रांडिंग के लिहाज से समूह व संगठन को चुनने लगे. भाजपा में रहते हुए अटल बिहारी बाजपेयी के साथ लोगों का यही बर्तव था, एक बड़ा तबका एक व्यक्ति के प्रभाव से एक पार्टी को समर्थन करता था.
इस केन्द्रीयता का विकास अचानक नहीं हुआ बल्कि यह धीरे-धीरे समाज के सभी आयामों में विकसित हुई. फिल्मों में सांगठनिक प्रतिरोध के बजाय एक व्यक्ति का नायकत्व, पार्टियों में समूह के बजाय व्यक्ति का उभारा जाना या अन्य विभिन्न सांस्कृतिक विधाओं में एक विधा को श्रेष्ठता प्रदान करना. एक ऐसे निर्माण का दौर चला जहाँ केन्द्रीयता हावी होती गयी. लिहाजा देश में राष्ट्रीय स्तर की पार्टीयों के पास बड़ा जनाधार होने के बावजूद नेतृत्व की कमी उभर कर सामने आयी क्योंकि नायक के अवसान से आये खालीपन को भरने में या नया नायक निर्मित करने में समय लगता है.
इससे संरचना को सहूलियत इस आधार पर हुई कि उस एकल नायकत्व को डिगा पाने में आसानी हो गयी जो समूह में कम सम्भव थी. हर क्षेत्र में केन्द्रीकृत प्रणाली मजबूत होती गयी और एक ही उद्देश्‍य के लिये निर्मित किये गये समूह में स्तरीकरण व्यापक गैरबराबरी के साथ सामने आया. केन्द्रीयता की अवधारणा पर बने मॉडल की यह मजबूत होती प्रणाली थी जिसमे हमेशा एक छोटे वर्ग की ही कब्जेदारी होनी तय है. देश में विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रतिरोध करने वाले जो संगठन थे उनका टूटना भी आसान हो गया. वे इस स्वरूप से अलग कोई ढांचा विकसित नहीं कर पाये. मजदूर संगठन, किसान संगठन अनगिनत समस्याओं के बावजूद संगठित होने में नाकामयाब हुए क्योंकि कोई भी प्रतिरोध एक नायक की मंशा पर निर्भर करने लगा और सत्ता को उनकी खरीद फरोख्त में आसानी हो गयी. लिहाजा देश के परिदृष्य से बड़े और लम्बे संघर्ष गायब होते चले गये.
सत्ता संरचना से बाहर जो प्रतिरोध बचे वे या तो आदिवासियों के या फिर दलितों का एक तबका। जिसने यह मान लिया कि इस संरचना में उन्हें उपयुक्त स्थान मिलना सम्भव नहीं है. देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संगठित आदिवासीयों के प्रतिरोध जो वर्तमान संरचना में विद्रोह के तौर पर आ रहे हैं न चाहते हुए भी यह प्रवृत्ति कम-ओ-बेस उनमे भी दिखायी पड़ती है. यह एक सत्तासीन ढांचे का प्रभाव होता है जहाँ ढांचे के बाहर लोकतांत्रिक और अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाले संगठन अपने स्वरूप में अलोकतांत्रिक हो जाते हैं और इसी स्वरूप में समाहित हो जाते हैं. संगठन और उद्देश्य से हटकर पदों की लोलूपतायें वहाँ भी प्रभावशाली हो जाती हैं वर्ग-संघर्ष करने वाले संगठनों में भी एक ऐसे वर्ग की श्रेष्ठता हावी हो जाती है जहाँ सबको समान अवसर नहीं मिल पाते.

22 जून 2010

''फ्लेम्‍स ऑफ दी स्‍नो'' को सेंसर बोर्ड का प्रमाणन नहीं मिलेगा



बोर्ड ने कहा, माओवाद का प्रचार करती है फिल्‍म
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड ने नेपाल पर बने वृत्तचित्र ''फ्लेम्स ऑफ दि स्नो'' को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इंकार कर दिया है। बोर्ड का मानना है कि 'यह फिल्म नेपाल के माओवादी आंदोलन की जानकारी देती है और उसकी विचारधारा को न्यायोचित ठहराती है।' बोर्ड की राय में हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में फैली माओवादी हिंसा को देखते हुए इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती। 'ग्रिन्सो' और 'थर्ड वर्ल्ड मीडिया' के बैनर तले बनी 125 मिनट की इस फिल्म के निर्माता नेपाल मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा हैं और इसका निर्देशन किया है आशीष श्रीवास्तव ने। फिल्म की पटकथा भी आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखी है।
बोर्ड के इस फैसले पर हैरानी प्रकट करते हुए पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि इस फिल्म में भारत में चल रहे माओवादी आंदोलन का जिक्र तक नहीं है। इसमें बस निरंकुश राजतंत्र और राणाशाही के खिलाफ नेपाली जनता के संघर्ष को दिखाया गया है। 1770 ई. में पृथ्वी नारायण शाह द्वारा नेपाल राज्य की स्थापना के साथ राजतंत्र की शुरुआत हुई जिसकी समाप्ति 2008 में गणराज्य की घोषणा के साथ हुई। इन 238 वर्षों के दौरान 105 वर्ष तक राणाशाही का भी दौर था जिसे नेपाल के इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। फिल्म में बताया गया है कि किस प्रकार 1876 में गोरखा जिले के एक युवक लखन थापा ने राणाशाही के अत्याचारों के खिलाफ किसानों को संगठित किया जिसे राणा शासकों ने मृत्युदंड दिया। लखन थापा को नेपाल के प्रथम शहीद के रूप में याद किया जाता है। निरंकुश तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ 'प्रजा परिषद' और 'नेपाली कांग्रेस' के नेतृत्व में चले आंदोलनों का जिक्र करते हुए फिल्म माओवादियों के नेतृत्व में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष पर केंद्रित होती है और बताती है कि किस प्रकार इसने ग्रामीण क्षेत्रों में सामंतवाद की जड़ों पर प्रहार करते हुए शहरी क्षेत्रों में जन आंदोलन के जरिए जनता को जागृत किया।
फिल्म राजतंत्र की स्थापना से शुरू हो कर, संविधान सभा के चुनाव, चुनाव में माओवादियों के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित होने, राजतंत्र के अवसान और गणराज्य की घोषणा के साथ समाप्त होती है। सेंसर बोर्ड की आपत्ति को ध्यान में रखें तो ऐसा लगता है कि नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाने की यह अनुमति नहीं देगा। कारण यह कि आज माओवादियों की प्रमुख भूमिका को रेखांकित किए बिना नेपाल पर कोई राजनीतिक फिल्म बनाना संभव ही नहीं है। नेपाल में माओवादी पार्टी की मई 2009 तक सरकार थी और इस पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड प्रधनमंत्री की हैसियत से भारत सरकार के निमंत्रण पर भारत की यात्रा पर आए थे। नेपाल की मौजूदा संविधान सभा में माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और प्रमुख विपक्षी दल है।
श्री वर्मा अब अपनी इस फिल्म को बोर्ड की पुनरीक्षण समिति के सामने विचारार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।


21 जून 2010

किताबें नहीं, लड़ने की जिद

चन्द्रिका
(तहलका के साहित्य विशेषांक में छपे इस आलेख कों सम्पादक द्वारा इतना संपादित कर दिया गया कि इसका मर्म ही नहीं बचा लिहाजा इसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है. )
किताबें पढ़कर कोई क्रांति नहीं की गयी, पर क्रांतियों के घटित होने में किताबों की भूमिका अहम रही और किताबें क्रांति का दस्तावेज बनी. शब्द जब चलना शुरू किये होंगे, इंसान के ज़ेहन से निकलकर जुबानों तक और जुबानों से निकलकर कई जुबानों तक विस्तार पाते गये होंगे और न जाने कितने वर्षों तक इसी तरह भटकते रहे होंगे. इस प्रक्रिया में जाने कितने शब्द और वाक्य विलीन हो गये होंगे और अपने अस्तित्व को बचाते-बचाते दम तोड़ दिया होगा. दादियों के मुंह की कितनी कहानियां, गर्मी की छुट्टियों में नानियों के कितने किस्से उनके गुजरने के साथ-साथ गुजर गये होंगे. अलाव सेंकते बाबा के मुंह से पुरखों की सुनाई गयी शौर्य गाथायें असहाय और साहस विहीन होकर न जाने किस गाँव में बस गयी कि अब कोई आवाज ही नहीं सुनती. आज अपनी उम्र के साथ वे कितनी जर्जर और बेबस होंगी. हम नाकामयाब रहे उनमे से कितनों को बचाने में जबकि दुनिया की किताबों में उनकी जगह आज भी सूनी सी है कोई रसूल हमजातोव नहीं हुआ जो हिन्दी समाज के दागिस्तान को कह दे.
अलबत्ता कुछ प्रकाशन संस्थान ऐसे हुए जो अब तक के समय और घटनाओं के लेखन को प्रकाशित कर इतिहास के दृष्यों को रंगते रहे, धूमिल होती घटनाओं से धूल झाड़ते रहे. बीता हुआ वह सब, जो हमारे बीच मौजूद हैं या यूं कहें कि किताबों ने जिन्हें बचाये रखा है, हर अगली पीढ़ी उनसे रूबरू हो रही है. हिन्दी समाज के कई ऐसे प्रकाशन हैं जिन्होंने पुस्तकों का प्रकाशन व्यवसाय के लिये नहीं बल्कि बीते हुए समय को संरक्षित कर, दस्तावेजों, गुजरे समय की कथाओं, कविताओं, उपन्यासों, जीवनी, आत्मकथाओं, नाटकों को सजो कर रखा. इन्होंने किताबों को मनोरंजन के साधन के रूप में नहीं बल्कि जीवन जीने के नशे की एक जरूरी खुराक के रूप में पाठकों के बीच में प्रस्तुत किया. यह एक आंकड़ा विहीन तथ्य है कि ये पुस्तकें ऐसी पुस्तकें रही जिनसे कितनों ने दुविधा के क्षण में अपने जीवन को बचाया कि कितने सारे जीवन इन किताबों के रिणी हो गये.
समाज परिवर्तन और संघर्ष के कई तरीके और कई पहलू होते हैं लिहाजा सत्ता व संरचना दोनों के बदलाव के बावजूद जरूरी नहीं कि समाज के अंतर्विरोध खत्म हो जायें जोकि संरचना बदलने के साथ अपेक्षित थे, उनके बदलाव के लिये चेतना का विकास व मनोदशा की दिशा को ही बदलना पड़ेगा. यह बदलाव ज्ञान आधारित उपक्रमों से ही सम्भव है, एक आदमी के अपने भीतर का संघर्ष जाति, सम्प्रदाय, धर्म से लड़ने का, समाज में व्याप्त गैरबराबरी को समझने का, लोकतंत्र के दायरे को बढ़ाने का, जिनसे सही मायने में पुस्तकें ही मुखातिब करवाती हैं. जब एक अन्यायपूर्ण समाज में खामोशी और चुप्पी जी रही होती है तो ये किताबें ही हैं जो बीज के रूप में इंसान में अन्याय के प्रति प्रतिकार को जिंदा रखती हैं और बदलाव के अंकुर वहीं कहीं से फूटते हैं.
संवाद प्रकाशन इसी अन्याय के प्रतिकार की एक अकेली कोशिश से शुरू की गयी मुहिम है. आलोक श्रीवास्तव एक पत्रकार, कवि, लेखक के साथ संवाद प्रकाशन के एक कर्मठ श्रमिक भी हैं. एक कवि, लेखक को श्रमिक कहते हुए शायद हम सब मे जो महसूसियत होती है वह समाज में कामों के बटवारे की श्रेणीबद्धत्ता को तोड़ती है, यह उस संरचना को भी तोड़ना है जिसमे एक लेखक या पत्रकार अपनी भूमिका के साथ अपना ओहदा तय कर लेता है और उस ओहदे की ऊंचाई भी. जिसे तोड़ते हुए आलोक श्रीवास्तव ने १९९६ में संवाद प्रकाशन की शुरूआत की. संवाद प्रकाशन के पास विचारों की पूजी थी यह आलोक श्रीवास्तव का जुझारुपन था जो २०० के आस-पास दुनिया के तमाम उत्कृष्ठ साहित्य को हिन्दी में अनुवाद के जरिये व हिन्दी की कुछ उकृष्ठ रचनाओं को मूल रूप में लाया जा सका. इन पुस्तकों को लाने के पीछे यह मकसद नहीं था कि जो ज्यादा बिकें उन्हें प्रकाशित किया जाय बल्कि इसके पीछे का मकसद हिन्दी में ऐसे विचारों का बौद्धिकवर्ग पैदा करना जो विचारों और सृजन की दुनिया से जुड़ना चाहता है. संवाद ने एक ऐसा पाठक वर्ग बनाया भी जो हर साल उसकी नयी प्रकाशित होने वाली किताबों का इंतजार करता है. अधिकांस किताबों को पेपर बैक में इसलिये छापा गया ताकि ये पाठकों के लिये सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करायी जा सकें. यह किसी संगठन के बजाय अकेले आंदोलन छेड़ने जैसा था, जिसकी ये मुहिम थी कि देश-दुनिया के श्रेष्ठतम पुस्तकों को लोगों तक पहुंचाया जाय और हिन्दी में वैचारिक व कलात्मक आकर्षण के साथ विभिन्न भाषाओं की किताबों का अनुवाद संवाद के जरिये प्रकाशित हुआ. दरअसल संवाद प्रकाशन के जरिये यह मुहिम किसी समाज के बदलाव के पहले व बदलने की प्रक्रिया में चेतना की ऐसी खुराक है जो वह जमीन तैयार करती है जिस पर परिवर्तनकामी शक्तियों को एक सही दिशा मिल सके. संवाद प्रकाशन के इस मुहिम में बदलाव का कोई उतावलापन जैसा नारा नहीं है. “किताबें जिनसे झांक रहा है एक सपना” ये स्वप्न दिखाती हैं एक मानवीय समाज का. ये एक पाठक को तब संवेदित करती हैं, जब समाज में घट रही हर घटना किसी कहानी से और घटनाओं में शामिल वे लोग किसी पात्र से टकरा जाते हैं और यह सब हमारे अंदर ही घटित होता है. कई ऐसे दार्शनिकों की जीवनी, जिनके दर्शन के साथ जीवन भी हमें जीने और घोर हतासा के बीच जीकर स्व का परित्याग कर दुनिया के जोखिम को उठाने का सबब देते हैं. इजाडोरा की प्रेमकथा, रूसो की आत्म कथा ऐसी किताबें हैं जो एक व्यक्ति के द्वारा अपने किये हुए को कुबूल करने का असीम साहस पैदा कराती हैं जहाँ जीवन संघर्ष की अप्रतिम ऊंचाई मिलती है. संवाद के जरिये विचार दर्शन, उपन्यास, इतिहास व विमर्ष की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद प्रकाशित किया गया है जो निश्चित तौर पर हिन्दी समाज की वैचारिक उर्जा को संवेग प्रदान करने वाला है. यह चालीस करोड़ हिन्दी भाषी समाज को एक समृद्ध परम्परा के जरिये ऐसी वैज्ञानिक चेतना की मौलिकता प्रदान कर सकता है जो किसी भी संकीर्णता की सीमा को तोड़ते हुए मानव विकास के आंतर्राष्ट्रीयतावादी परिदृष्य को खोलता है.
फर्नांदो पेसेवा, विस्साव सिम्बोर्सका के साथ दुनिया के कई अन्य महत्वपूर्ण कविताओं का हिन्दी में आना आज के समय में हिन्दी कवियों को एक सीख देगा, जबकि वे घटनाओं की सपाट बयानी को कविता के रूप में रख रहे हैं. इंसान की उन छोटी-छोटी हरकतों को, उनकी मनोदशा को पेसेवा और सिम्बोर्सका की कवितायें एक बुककर की तरह बुनती हैं. इस रूप में संवाद एक प्रकाशन नहीं बल्कि अपनी स्वीकारोक्ति के साथ “एक अभियान, एक आंदोलन है” जो हिन्दी भाषा में बुद्धिजीवी वर्ग के तलास की सम्भावना में है, भविष्य में उन नये बुद्धिजीवियों से संवाद करना और उनको तैयार करना जिनसे नवजागरण की संस्कृति को मजबूत किया जा सके.
हिन्दी समाज में आंदोलनों के स्वर जब धीमे पड़ रहे थे खास तौर से २००० के बाद का समय, उस वक्त इलाहाबाद के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिनमें लाल बहादुर वर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ने इतिहास बोध प्रकाशन की शुरूआत की. कुछ मित्रों ने मिलकर महज़ बीस-तीस हजार रूपये लगाये. ये बाजार की सबसे सस्ती किताबें थी जिनके प्रथम संस्करण साल भर में ही खत्म हो जाते थे इससे इन पुस्तकों की उपयोगिता को समझा जा सकता है. इन पुस्तकों की जरूरत ने ही इन्हें सीमित नहीं रहने दिया और जब इसका दायरा बढ़ने लगा तो सम्न्वय में परेशानियां आने लगी फिर इसका भार साहित्य उपक्रम ने उठा लिया. इलाहाबाद सांस्कृतिक आंदोलन की एक विरासत के रूप में था ऐसे में इस प्रकाशन की शुरुआत निश्चित तौर पर एक छटपटाहट की उपज थी जो बौद्धिक स्तर पर एक जमीन तैयार कर सके या फिर उस जमीन को बचाये रखे जिसके लिये किन्हीं दिनों में इलाहाबाद को जाना जाता था. एक इतिहास का प्रख्यात लेखक लालबहादुर वर्मा अपने कंधे पर उन पुस्तकों को वर्षों ढोता रहा जिनसे उसे भविष्य के बेहतर इतिहास की सम्भावना दिख रही थी. यह लोगों को, बुद्धिजीवियों को संघर्षों के इतिहास का बोध कराने जैसा ही था. इसके तहत तकरीबन २५ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया गया जो देश-दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य में से हैं. ये किताबें जनता की जरूरत और जेब के मुताबिक थी, प्रकाशन ने इतिहास बोध नाम की पत्रिका का भी नियमित प्रकाशन किया जिसने दुनिया के इतिहास को नये रूप में हिन्दी समाज को परिचित कराया. इतने परिश्रम के बावजूद इतिहास बोध प्रकाशन कुछ ही वर्षों तक चल पाया और एक कड़ी के रूप में ४ वर्ष पूर्व साहित्य उपक्रम नाम से इसे चलाया जाने लगा जहाँ से कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन अभी भी जारी है.
जन चेतना, राहुल फाउंडेशन, परिकल्पना जैसे हिन्दी के महत्वपूर्ण प्रकाशन हैं जिन्होंने दो दशक पूर्व प्रगतिशील व जनपक्षधर साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के लिये छोटी सी मुहिम से अपनी शुरुआत की. शुरुआत कुछ पुस्तिकाओं के साथ हुई एक समूह था जो आपस में पढ़ने लिखने का काम किया करता था, उसमे एक मित्र के पास कम्प्यूटर था और इसी से कम्पोजिंग की शुरुआत की गयी. परिकल्पना साहित्यिक किताबों के प्रकाशन और राहुल फाउंडेशन राजनैतिक किताबों के प्रकाशन के उद्देश्य से शुरू किये गये. इसके साथ जनचेतना इन पुस्तकों व अन्य समाज की जन पक्षधर साहित्य की पुस्तकों के वितरण का काम करने लगा. बाद में बच्चों के लिये अनुराग ट्रस्ट नाम से भी प्रकाशन की शुरूआत की गयी. धीरे-धीरे इसका विस्तार भी हो गया, एक टीम बनायी गयी जो यह तय करती है कि किन पुस्तकों का प्रकाशन जरूरी है इसके बाद समूह के सदस्यों में इसे टाइपिंग के लिये बांट दिया जाता है फिर आपस में अदल-बदल कर प्रूफ चेक कर लिये जाते हैं. आज के समय में सबसे ज्यादा जिन पुस्तकों को लोग पसंद कर रहे हैं वे भगत सिंह, राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचंद, है पर युवा पीढ़ी में मार्क्सवाद की किताबों की मांग बढ़ी है वे चाहते हैं कि सरल रूप में मार्क्सवाद की पुस्तकें उन्हें उपलब्ध कराई जायें, साथ में राजनीतिक पुस्तकों की भी मांग बढ़ी है. बड़े पैमाने पर पहुंचाने की दरकार है पर अपनी सीमित क्षमता के कारण यह काम बहुत कम पूरा हो पा रहा है. हिन्दी समाज के लिये यह एक बहुत जरूरी काम था जो चल रहा है. यह एक वैचारिक परियोजना और सांस्कृतिक मुहिम थी जो झोलों और ठेलों से शुरु हुई थी. इस तरह की जनपक्षधर किताबें प्रकाशित करने व उन्हें लोगों तक पहुंचाने की एक सांगठनिक व सजग पहल शायद हिन्दी समाज में पहली बार हुई. किताबों के साथ जनता का सम्बन्ध इन प्रकाशकों के लिये कई रूप में था मसलन ये मानते थे कि बेहतर ज़िंदगी का रास्ता, बेहतर किताबों से होकर जाता है. किताबों को लेकर इन प्रकाशकों ने कई तरह के नारे दिये और लोगों में किताबों के प्रति रुचि पैदा करने के लिये किताबों के बारे में कवितायें लिखी. इनकी प्रतिबद्धता सपनों के हरकारे और विचारों के डाकिये के रूप में थी. इनके द्वारा प्रकाशित किताबों ने देश में द्वन्दात्मक भौतिकवाद और वैज्ञानिक चिंतन की एक समझ जरूर पैदा की. यह मुहिम इतनी सफल हुई कि इसने न सिर्फ हिन्दी समाज बल्कि पंजाब के सुदूर गाँवों में अपने विचारों को घर की आलमारियों तक पहुंचाया. अंग्रेजी, हिन्दी और पंजाबी में इन प्रकाशनों ने सैकड़ों किताबें प्रकाशित की. एक हिन्दी समाज के वामपंथी कार्यकर्ता के लिये उसकी वैचारिक उर्जा का आधार यही पुस्तकें बनी. प्रकाशन ने अभियान के रूप में दुनियाँ की तमाम बहसों को सरल भाषा में प्रकाशित किया गया. यह एक सुनियोजित मुहिम थी, लिहाजा इसने एक व्यक्ति के निर्माण में उसके बदलते उम्र के साथ वैचारिक खुराक की जरूरत का ख्याल रखते हुए कुछ ऐसी किताबों और बाल साहित्य का प्रकाशन किया जो समाज में वंचित तबके का सवाल बाल मन से उठा सके, नौजवानों के लिये सस्ते दर में भगत सिंह व पीटर क्रोपोटकिन की पुस्तकों का प्रकाशन हिन्दी समाज की जड़ता से मुक्ति के लिये व वैज्ञानिक चिंतन और द्वन्द पैदा करने का एक सपना था. देश के अन्य कई ऐसे प्रकाशन हैं जो किसी के कंधों पर किन्हीं झोलों में और साईकिलों से आज भी चल रहे हैं और दुनिया को बदलने की जिद को अपनी कोशिशों के साथ मजबूत कर रहे हैं.
आम लोगों के लिये
जरूरी हैं वे किताबें
जो उनकी जिंदगी की घुटन
और मुक्ति के स्वप्नों तक
पहुंचाती हैं विचार
जैसे कि बारूद की ढेरी तक
आग की चिंगारी.

15 जून 2010

नक्सलवाद और सरकार के अंतर्विरोध

देवाशीष प्रसून
भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा हर साल प्रकाशित वार्षिक रपटों के मुताबिक़ नक्सलवादी, प्रशासनिक और राजनैतिक संस्थानों की अकर्मण्यता द्वारा सृजित माहौल में कार्य करते हैं, स्थानीय मांगों को भड़काते हैं और जनसंख्या के शोषित वर्गों के बीच विद्यमान अविश्वास और अन्याय का लाभ उठाते हैं। ऐसा कह कर सरकार खुलेआम स्वीकार करती है कि देश में प्रशासनिक और राजनैतिक संस्थाओं की अकर्मण्यता की स्थिति है और जनसंख्या के शोषित वर्गों के बीच अविश्वास और अन्याय की स्थिति विद्यमान है। यानी, देश के सत्ता तंत्र का इस मोर्चे पर विफल होने को लेकर कोई दो-राय नहीं है।
एक और सरकारी दस्तावेज़ का उद्धहरण लें। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक आयोग का गठन किया, जो यह जायजा लेता कि भू-सुधार के अधूरे कामों के मद्देनज़र राज्य के कृषि संबंधों की अभी क्या स्थिति है? माननीय ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता में काम कर रहे इस आयोग द्वारा मार्च ’०९ में ड्राफ़्ट किये गए रपट के पहले भाग के चौथे अध्याय में जिक्र है कि छत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों – बस्तर, दंतेवाड़ा और बीजापुर में गृहयुद्ध जैसी स्थिति है। इसमें एक तरफ, आदिवासी लोग जंगल पर अपने अधिकार को बनाये रखने के लिए लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ, सरकार के प्रोत्साहन पर केंद्रीय पुलिस बल और उसके द्वारा समर्थित सलवा जुडूम अपनी नौकरी बजा रहे हैं। रपट में अपनी ज़मीन के लिए संघर्षरत आदिवासियों को ही भाकपा(माओवादी) के सदस्य के रूप में संबोधित किया गया है। उल्लेखनीय है कि यह सरकारी दस्तावेज़ कहता है कि यह पूरा खूनी खेल टाटा स्टील और एस्सार स्टील के इशारे पर लौह अयस्क से संपन्न सात गांवों व आसपास के इलाकों का अधिग्रहण करने हेतु खेला जा रहा है। ये कोलंबस के बाद आदिवासी जमीन की लूट खसोट का सबसे बड़ा मामला है। ये वाक्य मैं नहीं कह सकता, क्योंकि ऐसा कहने पर नक्सल समर्थक होने की चिप्पी लगाकर मुझे प्रताड़ित किया जा सकता है, अब हर कोई अरुंधती जैसा बहादुर तो नहीं हो सकता! सच मानिये लूट-खसोट का यह आरोप उपरोक्त बताये गए ड्राफ्ट रपट से ही उद्धृत है। आश्चर्य है कि यहाँ जिस ड्राफ्ट रपट का जिक्र हो रहा है, जब इसका अंतिम स्वरूप जब अधिकृत रूप में प्रस्तुत किया गया तो रपट का उपरोक्त पूरा हिस्सा ही गायब था। बहरहाल, आदिवासियों को उनके आजीविका के साधनों, जीवन का आधार और अविवादित रूप से उनकी अपनी संपत्ति - इन जंगलों से महरूम करने वाले इसी व्यवस्था के गोरखधंधा को धूमिल ने अपनी कविता पटकथा में यों व्यक्त किया है कि “ एक ही संविधान के नीचे...भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम...’दया है’...और भूख में...तनी हुई मुट्ठी का नाम...नक्सलवाड़ी है।
हालांकि, कोई भी संवेदनशील व्यक्ति हिंसा का समर्थन नहीं कर सकता है। लेकिन जब जनसाधारण पर व्यवस्था की संरचनात्मक हिंसा की सारी हदें पार हो जाती हैं तो इतिहास साक्षी रहा है कि आत्मरक्षा में लोगों की प्रतिहिंसा को टाला नहीं जा सका है। इस वर्गसंघर्ष में हो रही हिंसा-प्रतिहिंसा के सिलसिले में, हाल में, नक्सलियों द्वारा छत्तीसगढ़ में लगाये गए प्रेशर बम से दो बार बड़ी संख्या में लोग मरे हैं। यह दिल दहला देने वाली घटना थी। पहले हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के ७६ सशस्त्र जवान मारे गए। सरकार ने इसे जनसंवेदना से जोड़ना चाहा जैसे कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हुआ सबसे बड़ा हमला था। माहौल बनाया गया कि थलसेना और वायुसेना की मदद से नक्सलवाद जैसे ठोस जनसंघर्ष को बिल्कुल वैसे ही कुचला जाये, जैसे श्री लंका में तमिलों के जनसंघर्षों को कुचला गया। लेकिन, लोग जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध की स्थिति है और युद्ध में सैनिक तो शहीद होते ही हैं। बुद्धिजीवियों ने नक्सली हिंसा के बरअक्स छत्तीसगढ़ में चल रहे इस युद्ध का विरोध किया। थल व वायु द्वारा नक्सलियों पर हमले पर आम-राय नहीं बन पायी। पर, नक्सलियों के अगली घटना ने कई लोगों के मन में नक्सलियों के लिए घृणा भर दिया है। इसमें एक ऐसी बस को निशाना बनाया गया जिसमें सवार कई निहत्थी औरतों और बच्चों की जान गयी। लेकिन, इस मामले में एक सवाल ऐसा है जो परेशान किये जाता है। एक युद्धक्षेत्र में हथियारबंद विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) को आमलोगों, महिलाओं और बच्चों के साथ एक ही बस में क्यों भेजा गया? जबकि सैन्य बलों पर नक्सलियों का मंडराता खतरा दक्षिणी छत्तीसगढ़ में आमबात है, तो फिर क्या निर्दोष लोगों को एसपीओ के साथ भेज कर बतौर ’चारा’ इस्तेमाल किया गया, जिससे नक्सलियों के ख़िलाफ़ हवाई हमले के लिए जनमानस तैयार हो सके? यह बस एक प्रश्न है, कोई इल्ज़ाम नहीं है सरकार पर। जबकि बकौल भारतीय वायुसेना जाहिर है कि वे चुनिंदा लोगों से लड़ने (सेलेक्टड कॉमवेट) में दक्ष नहीं है, इनकी दक्षता निशाने का मुकम्मल विनाश(टोटल कॉमवेट) करने में है, तो ऐसे में नक्सलियों के विरुद्ध अगर हवाई हमला हुआ तो स्पष्ट है कई निर्दोष जाने जायेंगी।
हाल में ही एक घटना पश्चिम बंगाल में घटी है, ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी, डेढ़ सौ लोग मारे गए और दो सौ घायल हुए। आनन-फानन में बिना जाँच पड़ताल किये ही इसे नक्सली आतंक का नाम दिया गया। जबकि पाँच जून को एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक में आयी ख़बर के मुताबिक माओवादियों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और भरोसा दिलाया कि माओवादियों द्वारा किसी यात्री ट्रेन व आमलोगों पर हमला नहीं किया जायेगा। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के पीछे कौन है, वे इसकी जाँच कर रहे हैं और इसके दोषियों बख्शा नहीं जायेगा।
अलबत्ता सरकारी रपटों के मुताबिक नक्सलवाद की जड़े सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक विषमता में है। पर, दूसरी ओर सरकार और उनका पूरा प्रचार तंत्र नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा ख़तरा मान रहा है। विचारने वाली बात है कि नक्सलवाद से किसको ख़तरा है? क्या गरीब, विपन्न, आदिवासी लोगों व उद्योगों, ख्रेतों और अन्य जगहों पर विषम परिस्थितियों में काम करने वाले बहुसंख्य मेहनतकश जनता को नक्सलवाद से ख़तरा है? या फिर देश के मुट्ठी भर पूँजीपतियों और उनकी ग़ुलामी घटने वाली करोड़ों मध्यवर्गीय जनता के लिए नक्सलवाद संकट का विषय है। ठंडे दिमाग से इस बारे में सोचना होगा।
शोधार्थी व स्वतंत्र पत्रकार
दूरभाष: 09555053370
ई-मेल:
prasoonjee@gmail.com

14 जून 2010

भास्‍कर समूह की मासिक पत्रिका अहा जिंदगी और लक्ष्‍य के नये संपादक होंगे आलोक श्रीवास्‍तव।

कभी धर्मयुग, साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान जैसी पत्रिकाएं हिंदी क्षेत्र में जो सांस्‍कृतिक प्रभाव रखती थीं, वैसे ही कुछ इरादों के साथ भास्‍कर समूह ने अहा जिंदगी का प्रकाशन छह साल पहले शुरू किया था। अहा जिंदगी यशवंत व्‍यास के संपादन में शुरू हुई थी और लोकप्रियता की अपनी तरह की कहानी इसने रची। धर्मयुग और साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान के बाद यही एक पत्रिका थी, जो सौंदर्य और समझदारी के साथ निकली और ज्‍यादातर घरों में जगह बनाने में कामयाब हुई। अभी कुछ महीनों पहले यशवंत व्‍यास भास्‍कर से अलग होकर अमर उजाला से जुड़ गये। उनके बाद भास्‍कर के लिए अहा जिंदगी के सफर को आगे बढ़ाने और नये आयाम देने की चुनौती थी। भास्‍कर के प्रबंध निदेशक सुधीर अग्रवाल की खोजी नजर ने मुंबई में लंबे समय से अपने किस्‍म की अलग पत्रकारिता करने वाले आलोक श्रीवास्‍तव को खोज निकाला।
आलोक श्रीवास्‍तव आईआईएमसी के 1988-89 बैच के पास आउट हैं। वहां से निकलने के बाद उन्‍होंने लगभग एक वर्ष अमर उजाला के मेरठ संस्‍करण में काम किया। फिर फरवरी 1990 में बतौर उपसंपादक धर्मयुग गये। धर्मयुग में छह वर्ष तक काम किया। धर्मयुग बंद होने के बाद हाल तक नवभारत टाइम्‍स के मुंबई संस्‍करण में रहे। आलोक हिंदी के युवा कवियों में अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं। 1996 में आये उनके पहले ही कविता संग्रह वेरा, उन सपनों की कथा कहो ने हिंदी के कविता प्रेमियों को सघन ढंग से अपने प्रभाव में लिया था। इस संग्रह का चौथा विशेष सचित्र संस्‍करण आने जा रहा है। उनके बाद के संग्रहों ने भी पाठकों को भरपूर मोहित किया। जब भी वसंत के फूल खिलेंगे (2004), यह धरती हमारा ही स्‍वप्‍न है! (2006), दिखना तुम सांझ तारे को (2010), दुख का देश और बुद्ध (2010) जैसे कविता संग्रहों के अलावा कथादेश में आठ वर्षों तक छपा उनका स्‍तंभ अखबारनामा एक बहुपठित स्‍तंभ था, जो बाद में अखबारनामा : पत्रकारिता का साम्राज्‍यवादी चेहरा (2004) के रूप में पुस्‍तकाकार छप कर भी काफी पढ़ा-सराहा गया। प्रख्‍यात पत्रकार कुलदीप नैयर की भगत सिंह के जीवन और विचारों पर लिखी अनूठी पुस्‍तक शहीद भगत सिंह : क्रांति के प्रयोग (2004) का उन्‍होंने अनुवाद किया।
मुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्‍ट के संयुक्‍त सचिव रह चुके आलोक श्रीवास्‍तव ने संवाद प्रकाशन के जरिये हिंदी में दो बेहतरीन ग्रंथमालाओं, विश्‍व ग्रंथमाला और भारतीय भाषा ग्रंथमाला के जरिये 200 से अधिक पुस्‍तकों का संपादन-प्रस्‍तुति की है, जिसमें विश्‍व साहित्‍य की अनेक महानतम एवं दुर्लभ निधियां हैं। वे बतौर एक रचनाकर्मी, हिंदी क्षेत्र के सांस्‍कृतिक उन्‍नयन को आज के समय की प्रमुख जरूरत मानते हैं। उम्‍मीद है, उनके संपादन में अहा जिंदगी देश-काल-समाज की खोयी-उलझी परतों के ईमानदार दस्‍तावेज तैयार करेगी। साभार- मोहल्ला

11 जून 2010

लोकतंत्र में जाति का सवाल

चन्द्रिका
२०११ की जनगणना में जाति गिनाने का सवाल आरक्षण के सवाल से जुड़ा हुआ नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण को लेकर ५० प्रतिशत का जो मानक तैयार किया था वह ४९.५ प्रतिशत के साथ लगभग पूरा हो चुका है, लिहाजा जनगणना में अब जाति गिनवाने से जो अहम फायदा पहुंचने वाला है, वह देश में चुनाव लड़ने वाली पार्टीयों को. वह भी इस रूप में कि इसी आधार पर ये पार्टीयां अपने वोट बैंक और जाति आधारित प्रतिनिधियों का खाका तैयार कर सकेंगी. आखिर देश के लोकतांत्रीकरण के कार्यक्रम में वे कौन से तत्व छूट गये कि ६३ वर्षों बाद भी देश की तस्वीर में जातिवीहीन समाज बनाने की कोई स्पष्ट रूपरेखा अभी तक नहीं दिखती. देश के संस्थानों में आरक्षण लागू होने के बाद समाज में व्याप्त जो जातिबोध था वह कम नहीं हुआ. आरक्षण ने निश्चित तौर पर संस्थानों में जो जातीय वर्चस्व था उसे कम किया है, पर विभेद कम-ओ-बेस अभी भी उसी रूप में बरकरार हैं. एक व्यक्ति जो जातीय समाज में जी रहा है वह जब घर से अलग एक संस्थान में कार्य करने के लिये किसी पद पर आसीन होता है तो वह क्या है जो उसे पदासीन होते ही जाति मानसिकता से मुक्त कर देता है, दरअसल, ऐसा होता नहीं. वास्तविक स्थितियाँ यह हैं कि देश के संस्थानों में पदों पर लोग नहीं काम करते बल्कि जातियां ही उस पद की कार्यवाहियों को पूरा करती हैं. किसी संस्थान के दफ्तर में चले जाइये सवर्ण जातियाँ, उपनाम के तौर पर गौरवान्वित होकर गूंजती रहती हैं. भले ही संस्थानों में सभी जातियों के लोग काम करते हों पर जातीय हीनता और श्रेष्ठता का फर्क स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. जातीय विभेद खत्म करने को लेकर जो हल देश की सरकारों ने अब तक ढूंढ़ा है फिर वह किन स्तरों पर कारगर साबित हुआ है.
जाति को लेकर समाज में विभेद का जो स्वरूप था उसके केवल भौतिक आधार ही नही थे बल्कि यह मानसिक स्तर पर विद्यमान था और इसे समाप्त करने के लिये देश में ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों को चलाये जाने की जरूरत थी जो विभेद के इस बोध को ज़ेहन से मिटा सके. व्यवस्था की इस संरचना में ऐसी कोई भी परियोजना नहीं चलायी गयी जो सांस्कृतिक रूप से अम्बेडकर और लोहिया के जातिविहीनता के स्वप्न को पूरा कर सके. देश में अब तक जो भी कार्यक्रम प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना के लिये चलाये गये वे एक हद तक वामपंथी पार्टीयों द्वारा, पर एक समय के बाद उन्होंने भी यह संघर्ष व्यवहारिक स्तर पर छोड़ दिया और इसे सिद्धान्तों तक ही सीमित कर दिया. यह तब हुआ जब वामपंथ के एक धड़े ने संसदीय चुनाव में सिरकत करनी शुरू की. इसके पीछे का कारण यह था कि भारतीय समाज के साथ जातिविहीनता का संघर्ष करना, लोगों के बने-बनाये मूल्यों के विरुद्ध जाना था. जो एक रूढ़ीवादी समाज के लिये तात्कालिक रूप से स्वीकृत होने वाला नहीं था. अतः यह चुनावी राजनीति के लिये किसी भी रूप में फलदायी नहीं था क्योंकि चुनाव में सफलता इन्हीं जातीय जोड़-तोड़ से ही मिलने वाली थी. एक हद तक हिन्दी भाषी प्रदेशों में वामदलों की असफलता का कारण यह भी रहा. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में जातीय संरचना अन्य राज्यों के अपेक्षा और ज्यादा जटिल थी और जातीय सच्चाई को दरकिनार करते हुए किसी भी पार्टी का यहाँ चुनाव में सफल होना मुश्किल था, जो कि आज भी बरकरार है. बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी पार्टी अम्बेडकर व लोहिया के विचारों को अपना अधार बना कर अस्तित्व में आये, पर जाति प्रश्‍न पर ये पार्टीयां कभी उस लक्ष्य की ओर मुखरित नहीं हुई जो इन महापुरुषों के स्वप्न में थे. बल्कि जातीय जनगणना के फार्मूले को ही अपना कर ये सत्ताशीन हो सकी, बावजूद इसके कि इनके द्वारा कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम जातिबोध मिटाने को लेकर तैयार किये जाते, अपने जातीय समीकरण के आधार पर ही एक कुलीन वर्ग को ही कुछ सुविधायें इन्होंने प्रदान की और दमित जातियों में भी एक कुलीन वर्ग तैयार हो गया. यह दमित और वंचित जातियों की वोट के आधार पर एकजुटता भी थी, पर इसने विभेद की मानसिकता को रत्तीभर भी खत्म नहीं किया, बल्कि दमित जातियों में ही वर्गीय अंतर्विरोध पैदा किये.
सांस्कृतिक आधार पर जातीयबोध बिना संघर्ष के समाप्त नहीं किया जा सकता. यह संघर्ष जाति के आधार पर वर्ग विभाजन के साथ ही चलाया जा सकता है क्योंकि जाति और वर्ग का सवाल कई आधारों पर एकरूप में दिखता है. जातीय स्तरीकरण के तौर पर ही वर्गीय स्तरीकरण की समरूपता को देखा जा सकता है. इसलिये जातिविहीनता के संघर्ष का नेतृत्व सही मायने में वही दल कर सकता है जो चुनावी राजनीति और जातीय जोड़-तोड़ से बाहर आकर एक ऐसे संघर्ष की रूपरेखा तैयार कर सके जिससे समता और समानता आधारित लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने का स्वप्न हो. यह एक अल्पकालिक संघर्ष नहीं होगा बल्कि एक ऐसा संघर्ष होगा जो पीढ़ीगत रूप से व्याप्त मानसिकता को खारिज कर नयी मानसिकता को स्थापित भी करेगा.

02 जून 2010

प्रेम एक राजनीतिक मसला है...


· देवाशीष प्रसून
समगोत्रीय शादियों के ख़िलाफ़ खाप पंचायतों ने ख़ूब हो-हल्ला मचा रखा है। डंके के चोट पर उन दंपत्तियों की हत्या कर दी जा रही है, जो एक ही गोत्र होने के बावज़ूद अपने प्रेम को तवज्जो देते हुए परिवार बसाने का निर्णय लेते हुए शादी करते हैं। अंतर्जातीय विवाहों पर भी इन मनुवादियों का ऐतिहासिक प्रतिबंध रहा है। देश में लोकतंत्र की कथित रूप से बहाली के तिरसठ सालों के बाद भी इन सामंती मूल्यों का वर्चस्व हमारे समाज में क़ायम है। इसके पीछे इन कठमुल्लाओं और पोंगा पंडितों का शादी-विवाह के संबंध में दिया जाने वाला रूढ़िवादी तर्क यह है कि इस तरह के वैवाहिक रिश्ते भविष्य में इंसानों की नस्लें खराब करेंगी। सोचना होगा कि इस तथाकथित वैज्ञानिक तर्क में कितना विज्ञान है और कितनी राजनीति? लेकिन एक बात तो सुस्पष्ट है कि अगर अपारंपरिक तरीकों से विवाह करने पर अगली नस्ल पर आनुवांशिक कुप्रभाव पड़ता है, जैसा कि ये लोग कहते हैं, तो एक दूसरी बात वैज्ञानिक तौर सिद्ध है कि प्रदूषित खान-पान, शराब-सिगरेट-तंबाकू का इस्तेमाल और रोजमर्रा में उपयोग किये जाने वाले अन्य अप्राकृतिक जीवन-व्यवहारों का भी आनुवांशिकी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में इस प्रदूषित जीवन-स्थिति के लिए जिम्मेवार लोगों की हत्या क्यों नहीं होती, जैसे कि समगोत्रीय या अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपत्तियों की हत्या की जाती है? आजकल यह चर्चा और चिंता का मौजूँ मुद्दा है कि कृत्रिम तरीकों से उपजाये बीटी फल-सब्जियों से मानव आनुवांशिकी को सबसे ज्यादा खतरा है। अगर इन खापों को अपने नस्ल की आनुवांशिकी से इतना ही लगाव है तो बीटी फल-सब्जियों को उपजाने वालों का वही हश्र क्यों नहीं करते, जो उन प्रेमी युगलों का करते हैं, जिन्होने प्रेम को अपने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण माना। लेकिन सच तो यह है कि खाप पंचायतों की परेशानी नस्लों की बिगड़ती आनुवांशिकी से नहीं है। क्योंकि कई बार यह भी देखा गया है कि पारंपरिक दायरों में रह कर भी प्रेम-विवाहों को मान्यता नहीं मिल पाती है। दरअसल यह मामला स्त्री की आज़ादी, उसका अपने श्रम, शरीर और यौनिकता पर नियंत्रण की राजनीति का है।

असल में, जर्जर हो चुकी सनातनी परंपरा के झंडाबरदारों को इन संबंधों से दिक्कत इसलिए है कि इन प्रेम संबंधों के जरिए कोई स्त्री अपने जीवन और अपने श्रम के इस्तेमाल पर अपना स्वयं का दावा पेश करती है। वह कहती है कि हम आज़ाद हैं, यह तय करने को कि हम अपना जीवनसाथी किसे चुने। इन संबंधों से इशारा है कि तमाम तरह की उत्पादन-प्रक्रियाओं में स्त्रियाँ अपने श्रम का फैसला अब वह खुद लेंगी। यह आवाज़ है उन बेड़ियों के टूटने की, जिसने स्त्रियों के पुनरूत्पादक शक्तियों पर पुरूषों का एकाधिकार सदियों से बनाये रखा है। यह विद्रोह है पितृसत्ता से विरुद्ध। ऐसे में प्रेम-विवाह पितृसत्ता के खंभों को हिलाने वाला एक ऐसा भूचाल लाता है कि बौखलाये खाप-समर्थक प्रेमी-युगलों के खून के प्यासे हो जाते हैं।

हमारे देश में खाप पंचायत, संस्कारों के जरिए लोगों के दिल-ओ-दिमाग में बसता है। बचपन से ही यह संस्कार दिया जाता है कि अपने बड़ों का आदर और छोटों को दुलार व उनका देखभाल करना चाहिए, पर कोई प्रेम सरीखे समतामूलक रिश्तों का पाठ बच्चों को नहीं पढ़ाता। गो कि यह कोई नहीं सिखाता कि घर में पिता भी उतने ही बराबर और प्रेम के पात्र हैं, जितना कि एक छोटा बच्चा। बराबरी के संबंधों को बनने से लगातार रोका जाता है। बड़े गहराई से एक वर्चस्व-क्रम हमेशा खड़ा किया जाता है। मानता हूँ कि माता-पिता की जिम्मेवारी अधिक होती है, लेकिन अधिक जिम्मेवारी के चलते परिवार में उनकी शासकों-सी छवि का निर्माण करना, सूक्ष्म स्तर पर एक विषमता आधारित समाज का निर्माण करना है। भारत में सदियों से जीवित सामंती समाज के पैरोकारों ने प्रेम को अपने आदर्शवादी या भाववादी सोच-समझ के मुताबिक ही व्याख्यायित किया है। मसलन, बार-बार यह आदर्शवादी समझ बच्चों के दिमाग में डाली जाती है कि विपरीत लिंगों के बीच का स्वभाविक प्रेम भी दो बस आत्माओं के बीच पनपा एक बहुत पवित्र भाव मात्र है और इसका देह और यौनैच्छाओं से कोई संबंध नहीं है। मानव जीवन में यौन-व्यवहारों को वर्जनाओं के रूप में स्थापित करने में धर्म और परंपराओं ने एक लंबी साजिश रची है। जाहिर है कि मानव प्रकृति के विरुद्ध प्रेम के संबंध में इस तरह की सायास बनायी गई पवित्रावादी धारणाएं मनगढंत व अवैज्ञानिक हैं और इसका उद्देश्य सहज मानवीय व्यवहारों पर नियंत्रण करना है।

एक तरफ, हम हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान आदि इलाकों में दहशत का माहौल बनाने वाले खापों और चौधराहटों की बात करते हैं, लेकिन सच मानिये इस देश में हर घर में किसी न किसी रूप खाप अपना काम करता रहता है। कहीं, जाति के स्तर पर, तो कहीं आर्थिक हैसियत के आधार पर तो कहीं किसी अन्य सत्ता संबंध के मुताबिक प्रेम और वैवाहिक रिश्तों पर लगाम लगाया जाता है। युवा पत्रकार निरुपमा पाठक का ही मामला लें। वह पढ़ी लिखी थी, आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर थी। इन परिस्थितियों में अर्जित किए आत्म-विश्वास के चलते उसमें यह हौसला था वह अपनी मर्ज़ी से अपना जीवनसाथी चुन सकें और उसने समाज के रवायतों को जूती तले रखते हुए किया भी ऐसा ही। लेकिन, उसकी इस हिमाकत के चलते उसके बाप और भाई की तथाकथित इज़्ज़त को बड़ा धक्का लगा। फिर साज़िशों का एक सिलसिला चला। घरवालों ने अपना प्यार और संस्करों का हवाला देकर उसे घर बुलाया गया। भावुक होकर जब निरुपमा अपने पिता के घर एक-बार गयी तो फिर कभी लौट नहीं सकी। दोबारा उसे अपने प्रेमी से नहीं मिलने दिया गया। जब समझाइश काम नहीं आई तो उसको अपनी जान से ही हाथ धोना पड़ा। उसकी मौत ने हमारे सामने कई सवालों को एक बार फिर से खड़ा कर दिया है। इस घटना ने हमारे समाज के चेहरे पर से पारिवारिक प्रेम के आदर्शवादी नक़ाब को नोच कर फेंक दिया है और साबित हो गया है कि हम एक प्रेम विरोधी समाज में रहते हैं। साथ ही, यह साफ़ है कि मामला सिर्फ़ ऑनर किलिंग का नहीं है, बल्कि यह एक स्त्री का अपने जीवन पर अधिकार, उसकी स्वतंत्रता और उसके अपने ही श्रम और यौनिकता पर हक को बाधित करने का मसला है। यह पितृसता दारा जारी किया गया एक फतवा भी है कि अगर निरुपमा जैसी लड़कियाँ, अपने अधिकारों पर अपना दावा पेश करती हैं तो यह विषमतामूलक पुरूषवादी समाज के पुरोधाओं के नज़र में यह संस्कृति पर हुआ एक ऐसा हमला बन जायेगा, जिसकी पुरूषवादी दरिंदों ने नज़र में सज़ा मौत भी कम हो सकती है।
गौर से देखें तो इसी तरह के अप्राकृतिक और सत्‍ताशाली व दबंग ताक़तों द्वारा लादे हुए मानव व्यवहारों ने ही समाज में अन्याय और विषमता के काँटे बोये हैं। इससे ही स्त्रियों सहित हाशिये पर जीवन जी रहे दलितों और आदिवासियों जैसे तमाम लोगों का शोषण और उन पर अन्याय अनवरत जारी है। मानवीय गुणों में प्रेम है और स्वतंत्रता है, जो स्थापित सत्ताचक्र को बनाये रखने के लिए एक बड़ी मुश्किल चुनौति है। अतः समाज मानवीय गुणों का हर संभव दमन करता है।

संप्रति: पत्रकारिता व शोध

31 मई 2010

शुड वी एब्यूज आर......

खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियाँ फिर से गुजरने लगी हैं........ देश की सरकार ने लासों की कीमत अदा करनी शुरु कर दी है..... हर मरने वाले के जिंदगी की कीमत छः लाख रूपये, छः लाख की रकम का मतलब, वह रकम है जिसका आधा भी देश के ८० प्रतिशत लोगों द्वारा उनकी जिंदगी में नहीं कमाया जाता (सेन-गुप्ता कमेटी रिपोर्ट- २० रूपये प्रति दिन × ३६५ एक वर्ष में दिन × ३५ वर्ष एक व्यक्ति के कमाने की उम्र = २५५५०० रूपये). तो क्या आप सरकार की लापरवाहियों के वास्ते मरने के लिये तैयार हैं. इस आंकड़े को थोड़ा और बढ़ाया जाय, २०११ की जनगणना अभी नहीं आयी है इसलिये २००१ की जनगणना में देश की जनसंख्या १ अरब ६ करोड़ को लिया जाय और अगर सरकार को पूरा देश खाली कराना पड़े (अंबानी, मित्तल और अन्य कुछ पूजीपतियों के साथ कुछ नेताओं को देश की जरूरत पड़ जाय तो) तो देश के जनता की कीमत - १ अरब ६ करोड़ × ६ लाख = ६३६०००००००००००० रूपये है (सम्भवतः छः हजार तीन सौ साठ ख़रब रुपये). शायद मुवाबजे के तौर पर यह कीमत अदा की जा सकती है, मसलन जिंदगीयों को रूपये में आंका जा सकता है. हम इसे महज आंक रहे हैं और हमारी सरकार इसे दे भी सकती है, दे सकती है कि पंचवर्षीय परियोजनाओं के बजट जीरो हो जायेंगे कि एक बार देश जनता की तमाम समस्याओं से मुक्त हो जायेगा..... कि हमारे देश के संसद में बैठे नेताओं के लिये...... क्या देश की सबसे बड़ी समस्या देश के लोग नहीं हैं.
खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियां फिर से गुजरने लगी हैं.........पश्चिम बंगाल में चुनाव हो रहे हैं.....शायद अब तक वोट पड़ भी चुके हों. गुजरात में २००२ के साबरमती एक्सप्रेस की घटना याद है, ठीक बाद चुनाव के नतीजे भी याद करिये.... हमारे देश के चुनावों में रेल घटनायें बड़ी अहम भूमिका अदा करती हैं. ममता बनर्जी बहुत निर्भीक रेल मंत्री हैं, पुलिस के रोकने के बावजूद घटना स्थल पर गयी, एन. डी. टी. वी. की पत्रकार ....बनर्जी को जब वे बाइट दे रही थी तो उनकी आवाज़ में गमगीनियत को आपने नहीं सुना? उनकी आंखों में आँसू जैसा कुछ था... अगर वह आँसू नहीं था तो उसे आँसू मान लीजिये, अब रेलमंत्री इस तरह तो नहीं रोयेंगी जैसे कि हादसे में मरने वालों के परिजन......फिर तो मीडिया के लिये स्टोरी ही बदल जाती. अपने आंसुओं के साथ ममता बनर्जी ने सारी तोहमत राज्य सरकार पर लगा दी, और राज्य सरकार ने पी.सी.पी.ए. (पीपुल्स कमेटी अगेन्स्ट पुलिस एट्रोसिटि) पर, घटना स्थल से संगठन के पर्चे भी बरामद कर लिये गये. पी.सी.पी.ए. के साथ ममता बनर्जी के सम्बंध लालगढ़ आंदोलन के समय जगजाहिर थे. यह चुनाव के दरम्यान लोगों की लासों के आंच पर वोट की रोटी का सेंका जाना था..... किसने कितनी रोटियाँ सेंकी, हाल में आने वाले चुनावी नतीजों से इसका पता चल जायेगा. एक अरब से ज्यादा की आबादी में १००-२०० का मरना बड़ी बात नहीं होती..... चुनावों के दरम्यान उस राज्य की यात्रा न करें जहाँ चुनाव होने वाले हों.....
खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियां फिर से गुजरने लगी हैं......... आइ.बी.एन.सेबन का पत्रकार पटना से चलकर वहाँ सबसे पहले पहुंचा था ऐसा दावा उस चैनल का है..... बस थोड़ी सी चूक हुई और उस थोड़ी सी चूक और थोड़ी देरी का अफसोस हर चैनल को रहेगा और रहना भी चाहिये..... कि वे उन माओवादियों की तस्वीर नहीं ले पाये जिन्होंने हमले किये थे, शायद किसी चैनल के पत्रकार ने इन्हें भागते हुए भी देखा हो.....पर सबूत का आभाव...खैर सबूत कोई मायने नहीं रखते. खबर हमारी और फैसला आपका... देश के गृहमंत्रालय के पास इस बात की खबर भले न हो, देश की आई. बी. को इस बात की जानकारी रही हो या नही, अलबत्ता माओवादी पार्टी के नेताओं को भी इस बात की भनक नहीं थी कि इस घटना को वे अंजाम दे रहे हैं...ट्रेन ड्राइवर बी. के. दास के एफ.आइ.आर. में भले ही यह महज एक दुर्घटना के रूप में दर्ज किया गया हो.... नागपुर पहुंचने वाले उस ट्रेन के यात्री भले ही इनकार करें पर.... यदि घटना को अंजाम देने वालों के बारे में जानकारी थी तो मीडिया चैनलों और अखबारों को उनके पास पुख्ता सबूत थे कि इस घटना को अंजाम माओवादियों ने दिया है, क्या सी.बी.आई. इस बात की तफ्सीस करेगी कि यह जानकारी मीडिया को कैसे थी.... पर यह माओवादियों द्वारा देश में किया गया सबसे बड़ा हमला था, यह बात मीडिया द्वारा स्थापित की जा चुकी है और इस पर इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई घंटे व प्रिंट मीडिया के कई पन्ने रगें जा चुके हैं, यह इसलिये भी था क्योंकि माओवाद का भूत चैनलों की टी.आर.पी बढ़ाता है, यह इसलिये था क्योंकि झूठ बोलने के एवज में माओवादियों ने अभी तक किसी मीडिया संस्थान पर हमला नहीं किया है.... फिर बात क्यों न भविष्य की आसंकाओं पर की जाय कि यदि माओवादी मीडिया संस्थानों पर झूठ बोलने व मुखबिरी करने के एवज में हमला करें तो उसके क्या-क्या विश्लेषण होंगे? पी.सी.पी.ए. प्रवक्ता असित महतो का बयान आ चुका है जिसे किसी भी मीडिया द्वारा नहीं दिखाया या बताया गया कि इस घटना में उनके हाँथ नहीं है और माओवादी प्रवक्ता और राज्य समिति के सदस्य राकेश व कंचन नाम से भी बयान आ चुके हैं कि यह घटना उनके द्वारा नहीं की गयी है साथ में यह मांग भी कि इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिये. उनके बयान में यह भी कहा जा चुका है कि रेलविभाग द्वारा जिन रेलगाड़ियों को माओवादियों के भय से रोका जा रहा है या उनके समय में बदलाव किया जा रहा है, उन्हें इस बात से भय मुक्त रहना चाहिये, माओवादियों द्वारा इस तरह की कोई भी जनविरोधी कार्यवाही नहीं की जायेगी.

26 मई 2010

छत्तीसगढ़ में ...(डायरी के कुछ अंश):- - देवाशीष प्रसून

९ दिसंबर
सूचना मिली कि १२ और १३ दिसंबर २००९ को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पूरे देश से लगभग पच्चीस नारी अधिकार संगठनों की कार्यकर्त्ताएँ इकट्ठा होने वाली हैं, जो राज्य सत्ता द्वारा किए जाने वाले दमनों के दौरान किए जाने वाली यौन-हिंसा पर अपनी जानकारियों, अनुभवों और इसके खिलाफ़ किए गए अपने संघर्षों को साझा करेंगी। यह कार्यक्रम २४ और २५ अक्टूबर २००९ को भोपाल में हुए यौन हिंसा एवं राजकीय दमन के विरुद्ध महिलाओं के साझा अभियान की निरंतरता में था। कार्यक्रम के अगले चरण में यह भी यह तय था १४ तारीख को इस सम्मेलन से कुछ प्रतिनिधि दंतेवाड़ा जिले के नेंड्रा गाँव में जाकर बलात्कार-पीड़ित महिलाओं के प्रति अपनी हमदर्दी व्यक्त करेंगी। मैंने निर्णय लिया कि मुझे भी इस आयोजन का एक हिस्सा बनना है। कारण - अव्वल तो ऐसे आयोजनों से देश के सुदूर इलाकों में हो रहें सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का पता चलता है। दूसरा यह है कि इन आयोजनों में शिरकत करने से आमलोगों और जनजीवन से जुड़ी उन ख़बरों की जानकारी होती है, जो आज व्यावसायिक मीडिया के जरिए लोगों तक नहीं पहुँच रही हैं। वहाँ जाने का तीसरा और सबसे मह्त्वपूर्ण आकर्षण दंतेवाड़ा जाकर अपने देश के एक ऐसे हिस्से को समझना-बूझना था, जिसे तनावग्रस्त घोषित करके सरकार ने विदेशवत कर दिया है, जहाँ आप प्रशासन की इच्छा के विरुद्ध नहीं आ-जा सकते हैं।

१२ दिसंबर
सुबह रायपुर पहुँचा। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्त्ताओं ने इस सम्मेलन में ठहरने और भोजन आदि की व्यवस्था संभाल रखी थी। नियत समय पर बैठक शुरू हुई। कार्यक्रम की शुरूआत में ही नारायणपटना में हुई राजकीय दमन पर चिंता व्यक्त की गई। वहाँ के आदिवासियों इस बात के लिए संघर्षरत हैं कि जिन ज़मीनों को उनके पूर्वजों ने जंगल की सफाई करके खेती योग्य बनाया था, उस पर उनका हक़ होना चाहिए। लेकिन पुलिस ने मौज़ूदा ज़मींदारों का साथ दिया। आदिवासियों के प्रति अपने सौतेला रवैये के कारण पुलिस इस आंदोलन को कुलचने में लगी रही। आंदोलनकारियों की धर-पकड़ शुरू हुई। महिलाओं के खिलाफ यौन-हिंसा की गई। त्राहिमाम करते हुए जब आदिवासी जनता थाने में पहुँची, तब पुलिस ने उन पर गोलियाँ दागनी शुरू की, जिसके कारण दो लोगों की हत्या हुई और पच्चीसों लोग घायल हुए। इस मामले के तह तक जानने के लिए नारी अधिकार आंदोलनों से जुड़ी हुई कुछ महिलाएं उड़ीसा के कोरापुट जिले के नारायणपटना ब्लॉक गई। मैं यह जानकर पहले दंग हुआ और फिर क्रोधित कि किस तरह से ज़मींदारों के गुंडों ने पुलिस की शह पर इस प्रतिनिधिमंडल की महिलाओं पर फब्तियाँ कसी, उन्हें लिंग आधारित गालियाँ दी और उनके वाहन चालक पर जानलेवा हमला किया। आज बैठक के पहले दौर में ही नारायणपटना के इन वारदातों की भर्त्सना करते हुए निंदा प्रस्ताव पारित किया गया।
बैठक के अगले चरण में नारी अधिकार संगठन की प्रतिनिधियों ने अपनी-अपनी समस्याओं और उनसे जूझने के अपने संघर्षों से वाक़िफ़ कराया। अगर मैं नारी अधिकार संगठनों की मौज़ूदा स्थिति में समस्याओं का सूत्रीकरण करूँ तो मैं बाज़ार के वर्चस्व को उनका दुश्मन पाता हूँ। जैसे एक प्रतिनिधि से यह जानकारी मिली कि किस तरह से यौन शक्तिवर्धक दवाओं के कारण स्त्रियों पर उनके पतियों के द्वारा बर्बर यौन-हिंसा के मामले सामने आये हैं। जान कर दिल दहल गया कि एक महिला ने तो अपने पति के यौन-अत्याचारों से तंग आकर अपने योनिद्वार पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग़ लगा लिया। बाज़ार में सर्वत्र उपलब्ध ब्लू फ़िल्मों की सीडी पर चर्चा करते हुए एक प्रतिनिधि कहा कि इन फ़िल्मों के कारण पुरूष दाम्पत्य जीवन में स्त्रियों को उपभोग की वस्तु तक सीमित करके देखने लगे है और इस तरह से महिलाओं पर यौन हिंसा में इज़ाफ़ा हुआ है। पूरे बैठक के दौरान कई नारी अधिकार कार्यकर्ताओं ने कई बार शराब के चंगुल में फँसे पुरूषों द्वारा की जाने वाली हिंसा के लिए चिंता व्यक्त करते हुए इसके ख़िलाफ़ अपने संघर्षों के बारे में अपनी बात रखी।

१३ दिसंबर
सुबह नाश्ते के वक्त भोपाल से आयी एक कार्यकर्ता से बातों-बातों में बताया कि लेधा के मामले में आगे क्या हुआ? तारीख ठीक-ठीक याद नहीं है, लेकिन यह मामला सन २००५-६ का रहा होगा। लेधा की शादी सरगुजा जिले के रमेश नगेशिया से हुई थी। चूँकी रमेश माओवादी विचारधारा का समर्थक था, इसलिए पुलिस ने लेधा पर भी नक्सली होने का ठप्पा लगाकर तीन सीआरपीफ जवानों की हत्या के अरोप में धर लिया। गिरफ़्तारी के वक्त वह गर्भवती थी। वकील अमरनाथ पाण्डेय की कोशिशों के बल पर उसे प्रसव के लिए एक महीने की जमानत मिली, लेकिन कुल ढेड़ साल के कारावास के बाद ही उसे झूठे आरोप से मुक्त करवाया जा सका। पुलिस के बहलाने-फुसलाने पर लेधा ने अपने पति को आत्मसमर्पण के लिए राजी कर लिया। परंतु जब रमेश आत्मसमर्पण के लिए थाने में उपस्थित हुआ तो पुलिस अधीक्षक एस आर पी कल्लूरी के इशारे पर उसे गोली मार दी गई। लेधा का मुँह बंद करने के लिए उसे भी मारने क आदेश कल्लूरी ने दिया, लेकिन फिर यह कह कर उसकी हत्या नहीं की गई कि एक औरत की जान लेने की क्या ज़रूरत है? उसे चुप करने के लिए मौत से बड़ी प्रताड़ना भी हो सकती है। भय और शोक में लेधा तीन महीनों के लिए अपने मायके अंबिकापुर चली गयी। उसके लौटने पर घात लगा बैठी पुलिस उसे बलरामपुर थाने ले गई, जहाँ कल्लूरी ने उस पर यौन-अत्याचार किया। विद्रुप मानसिकता के पुलिस कर्मियों ने उसके योनि में हरी मिर्च डाल कर हैवानियत की सारे हदें लाँघ ली। लगातार दस दिनों तक यह सिलसिला चलते रहा। इस इलाके का कुख्यात एसपीओ धीरज जायसवाल एक ऐसा अतातायी है, जो जब चाहे किसी के साथ बलात्कार कर सकता है या किसी को भी नक्सली बताकर उसकी हत्या कर दे। धीरज ने भी थाने में लेधा के साथ शराब पी कर बलात्कार किया। पीयूसीएल की मदद से लेधा ने कल्लूरी और अन्य के ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मुकदमा किया था। भोपाल की जिस महिला से मैं लेधा के बारे में बातें कर रहा था, उन्होंने बड़े अफ़सोस के साथ बताया कि दवाब में आकर लेधा ने अपनी शिक़ायत वापस ले ली है।


१४ दिसंबर को दंतेवाड़ा जाने की योजना पर बातचीत होने पर पता चला कि वहाँ पहुँच कर हम हिमांशु कुमार के वनवासी चेतना आश्रम में जायेंगे और फिर वहाँ की आदिवासी महिलाओं से मुलाक़ात होगी। यह भी पता चला कि हिमांशु दंतेवाड़ा के नेंड्रा से शांति स्थापना और न्याय का माहौल बनाने की अपील के साथ पदयात्रा शुरू करने वाले हैं। हिमांशु एक गांधीवादी कार्यकर्ता है, जो अपने एनजीओ वनवासी चेतन आश्रम के जरिए जनकल्याण की सरकारी योजनाओं को पूरा करते रहे है। लेकिन जब से हिमांशु ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आदिवासियों को शिविरों से निकाल कर वापस गाँवों में उनका पुनर्वास करने का मुहिम छेड़ी है, तब से सरकार और व्यापारी वर्ग उन्हें नक्सली संबोधित करने लगा है। एक अख़बार से पता चला कि १० दिसंबर, मानवाधिकार दिवस के रोज राज्य समर्थित प्रतिक्रियावादी व्यापारियों के समूह ने माँ दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच के नाम से हिमांशु की गिरफ़्तारी की माँग की। जबकि विडंबना यह है कि वनवासी चेतना आश्रम के कार्यकर्ता दंतेवाड़ा में जो काम कर रहे हैं, उसे छत्तीसगढ़ सरकार को ही करना चाहिए था। इसके बरअक्स, सरकार आश्रम के कार्यकर्ताओं का दमन कर रही है। आश्रम के एक युवा कार्यकर्ता सुखनाथ पर विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई। १० दिसंबर की ही बात है कि लगभग दिन के ढ़ाई बजे भैरामपुर पुलिस थाने के टीआई आश्रम से स्वयंसेवी कोपा कुंजाम को दंतेवाड़ा पुलिस कोतवाली में पूछताछ के बहाने ले गये। अल्बन टोप्पो एक अधिवक्ता हैं और इस समय आश्रम में मौज़ूद थे। क़ानूनविद होने के नाते उन्होंने कोपा के साथ कोतवाली जाना ज़रूरी समझा। उन दोनों को दंतेवाड़ा के बदले जबरन बीजापुर ले जाया गया, जहाँ दोनों की बुरी तरह पिटाई की गई।


१३ दिसंबर की रात और १४ का पूरा दिन
रात को ग्यारह बजे चार गाड़ियों पर सवार हम दंतेवाड़ा की ओर रुख्सत हुए। हमारे दल में ३४ महिलाएँ और ५ पुरूष थे। हमलोग आराम से रायपुर से निकले और धमतरी में भी हमें कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन जैसे ही हम कांकेर की सीमा पर पहुँचे प्रतिकूल स्थितियाँ सामने आने लगी ।

रात के साढ़े बारह बज रहे थे। यह चारामा बस पड़ाव था। पड़ाव के सामने ही पुलिस की चौकी थी, जहाँ हमें रोका गया था। पहले लगा कि यह रूटीन जाँच-पड़ताल है, फिर महसूस होने लगा कि हमें जानबूझ कर परेशान किया जा रहा है। ज्यादातर पुलिस वाले नशे में थे। एक वर्दीधारी कहता है कि महिलाओं वाली गाडी को जाने दो और बाकी को रोक लो। हमने विरोध किया, वैसे भी सभी गाड़ियों में महिलाएँ थी। खैर, फिर चारों गाड़ी के चालकों को थाने के अंदर ले जाया गया। हमारे साथ आए लोगों को नाम, उम्र, पिता का नाम, पता आदि दर्ज किया जाने लगा। वह भय का माहौल बना रहे थे। लड़कियों से जानकारी लेते वक्त उनके लहज़े से अश्लीलता झलकती थी। एहतियातन जब मैं एक पुलिसकर्मी के पीछे जाकर खड़ा हो गया, यह देखने के लिए कि वह महिला साथियों से कैसा व्यवहार कर रहा है तो उसने बड़े सहज भाव में मुझसे कहा कि “नाम ही लिख रहे हैं, रेप नहीं कर रहे हैं”। मैं स्तब्ध रह गया। कितना आसान है इस आदमी के लिए महिलाओं पर क्रूरतम अत्याचार करना। मैं समझ गया कि यह उनके लिए आम बात थी। आये दिन वो ऐसी ज़्यादतियाँ करते होंगे। मैं सहम कर कुछ देर वही खड़ा रहा। कुछ देर बाद मैं एक और पुलिसकर्मी से बात करने लगा। मैंने उससे पूछा कि वह कहाँ का है। वह कानपुर का था। मैंने जब यह जानना चाहा कि उसे इस तनावग्रस्त इलाके में अपने घर से दूर रह कर काम करना कैसा लगता है, तो मेरी उम्मीद के विपरीत उसने कहा कि बहुत मज़ा आता है, क्योंकि यहाँ लड़ने के मौके खूब मिलते हैं। आत्ममुग्धता के साथ उसने बताया कि दस नक्सलियों को मार कर ही वह हवलदार बना है। मैंने जानना चाहा कि वह कैसे आम ग्रामीण आदिवासी और नक्सली के बीच में फ़र्क़ करता है तो वह निरुत्तर हो गया। कुछ देर के रुक कर उसने कहा कि मेरा काम मारना है, बस मारना। घंटे भर में हमारे साथ के सभी लोगों का परिचय लिखा जा चुका था। पुलिस ने हमारी चार गाड़ियों में से एक गाड़ी के दस्तावेज़ अधूरे पाये और एक चालक का लाइलेंस नहीं था। मज़बूरन हमारी एक गाड़ी को रोक लिया गया। बाकी की तीन गाड़ियाँ अपने-अपने सवार को लेकर आगे बढ़ीं और जिस गाड़ी को रोक लिया गया था, उसके सवार बस से आगे बढ़े।

लगभग बीस मिनट में हम माकड़ी में थे। डेढ बज रहे थे। बाकी के तीनों चालकों ने आगे जाने को एमदम मना कर दिया। शायद उन्हें चारामा थाने में बहुत डराया-धमकाया गया हो। और पुलिस को भी जो दस्तावेज़ चाराम में ठीक लग रहे थे, यहाँ गड़बड़ लगने लगे थे। जो भी हो, हम अब बिना गाड़ी के थे। महेंद्रा कंपनी की दो बसें माकड़ी ढाबे पर लगी हुई थी। उसके चालकों ने सवारियों को चढ़ाने की पहलकदमी दिखायी। हमें भी दंतेवाड़ा पहुँचाने को कोई जरिया चाहिए था, सो हमने तय किया कि हम आगे की सफ़र इन्हीं बसों से करेंगे। ढाई-तीन बजे हम माकड़ी ढाबे से निकले। लगभग बीस किलोमीटर की ही दूरी तय की होगी कि केशकाल में हमें फिर रोका गया, हमसे हमारी पूरी जानकारी दोबारा ली गई। केशकाल के बाद फरसगाँव में भी जाँच-पड़ताल की पुनः सारी औपचारिकताएँ पूरी की गई। वो हमें रोक नहीं सकते थे तो लग रहा था कि वो हमें ज्यादा से ज्यादा जितना विलंब करवा सकते थे, करवा रहे थे ।


बस में हल्की झपकी लगी होगी कि ऐसा महसूस किया कि बस रुकी हुई है। सुबह साढ़े पाँच-छ बज रहे थे। हमारी बस को कोंडागाँव पुलिस चौकी के नज़दीक रोक दिया गया था। फिर से वही जाँच-पड़ताल। साथ के लोग जो हमारे दल का हिस्सा नहीं थे, वे असहज महसूस करने लगे थे। वे लोग इस रास्ते से हमेशा गुज़रते रहते थे। कंडक्टर ने कहा कि पुलिस का हमारी कंपनी के बस के साथ पिछले पाँच सालों में पहली बार ऐसा व्यवहार रहा है। साथी सवारियों में गुस्सा बढ़ रहा था। उन्हें बताया गया कि माकड़ी से चढ़े ३९ लोग जब तक बस में रहेंगे, उन्हें ऐसे ही परेशान किया जायेगा। तब इन लोगों ने हम पर बस से उतर जाने का दबाव बनाया। हमें लगा कि पुलिस हमसे बस छोड़ने को कह रही है, इसलिए हम ३९ लोग तत्काल बस से उतर गए। सामने ही कोंडागाँव पुलिस चौकी थी। हमारे पूछने पर पुलिस के एक कर्मचारी ने कहा कि हमने तो आपको उतरने के लिए नहीं कहा है, हम तो बस रुटीन जाँच-पड़ताल करे रहे थे। हमलोग ठगे से रह गए। वापस लौट कर हमने बस को पकड़ना चाहा, लेकिन जाहिर है पुलिस का दवाब बस वाले पर बना हुआ था। दरअसल पुलिस जाहिर तौर पर हमें रोक नहीं रही थी, सिर्फ़ बार-बार किए जाने जाँच-पड़ताल के नाम पर हमें समय पर दंतेवाड़ा पहुँचने नहीं देना चाहती थी, लेकिन बिना जाहिर किए वह बस वालों पर दवाब बनाकर हमें रोक भी रही थी। फिर हमने थाना प्रभारी के समक्ष अपनी सारी बातें रखी और छ्त्तीसगढ़ की आथितेय को धिक्कार देते हुए उस पर दवाब बनाने की कोशिश की। हमारे कुछ साथी उससे अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। उन्हें बार-बार कहा गया कि पूरे देश में इसका बहुत ग़लत संदेश जायेगा। तब अचानक हमसे हमदर्दी जताते हुए हमारे लिए तीन जीप की व्यवस्था की गई। हमें यह भी कहा गया कि आगे कोरेनार के पास तीन-चार हज़ार लोग रास्ता जाम किए हुए हैं और पुलिस उनसे हमारी रक्षा नहीं कर सकती है। यह इशारा था कि पुलिस से आप तो बच सकते हैं, लेकिन सलवा जुडूम से आपको कौन बचायेगा?

आठ-नौ बजे तक स्पष्ट हो गया कि हमें दंतेवाड़ा पहुँचने के लिए कुछ और उपाय करने होंगे। कोंडागाँव का बस पड़ाव नज़दीक ही था। हमने तय किया कि अब वहीं से जगदलपुर के लिए बस करेंगे। जगदलपुल में एसपी से मिलकर आगे की योजना के बारे में सोचा जायेगा। स्थितियों को देखते हुए या तो आगे जाया जायेगा या वहीं प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके वापस रायपुर लौटना पड़ेगा। कुछ देर बाद हम जगदलपुल जाने वाली एक बस पर चढ़े, लेकिन अभी सभी लोग चढ़े भी नहीं होंगे कि बस मैनेजर ने कहा कि वह हमलोगों को जगदलपुर नहीं ले जा सकता है। कारण पूछने पर कोई जवाब नहीं मिला, फिर पता चला कि उसे पुलिस ने निर्देशित किया है। हम बुरी तरह थक चुके थे और दंतेवाड़ा जाने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था। आखिरकार, वापस रायपुर जाने के अलावा कोई उपाय नहीं था। देखते ही देखते कोंडागाँव बस पड़ाव पर कुछ पत्रकार जमा होने लगे। उनमें कौन पत्रकार था और खुफ़िया पुलिस यह जानना बहुत मुश्क़िल था। आसपास के लोगों और तथाकथित पत्रकारों से हमारे दल के लोगों ने बातचीत कर अपने पक्ष से उनलोगों को अवगत कराया।

फिर हम सब एक बस पर बैठे, जो हमें वापस रायपुर ले जाती। बस जब कांकेर के नये बस अड्डे पर पहुँची तो १५-२० लोगों वहाँ हमारा इंतज़ार कर रहे थे। हमें देखते ही वह नारा लगाने लगे कि “नक्सलियों के नेता वापस जाओ”, “नक्सल समर्थक वापस जाओ”। हम हतप्रभ थे। मेरे मन में एक सवाल कौंधा कि क्या छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के हित में सोचना नक्सली होना है? आश्चर्य है इस राज्य के मानवता पर ! नारे लगाते कुछ लोगों में से यह भी सुनने में आया कि “उतारो उनको, मारो सालों को”। स्वाभाविक है, हम डर गये थे। कांकेर के पुराने बस अड्डे पर आते ही तुरंत तीन-चार लोग कैमरा ले कर बस में घुस गये और हमारे दल की युवा लड़कियों की तस्वीरें लेने लगे। मेरे विरोध करने पर उनमें से एक ने कहा कि “हम पत्रकार हैं, हमें अपना काम करने दो, तुम अपना काम करो”। इसी तथाकथित पत्रकार ने नीचे उतर कर बस के पहिये का हवा निकाल दिया। जाहिर है, वो पत्रकार नहीं कोई लंपट असामाजिक तत्व ही थे। इसी तरह कुछ देर तक जूझने के बाद हमारी बस आगे बढ़ी। इस बार हम सही-सलामत रायपुर पहुँच गये।

लेकिन, मामला यहाँ ख़त्म नहीं हुआ था। जब शाम को हम रायपुर में प्रेस से मुख़ातिब होना चाह रहे थे, तो भाजपा के कुछ नेताओं ने प्रेस का ध्यान बँटाने के लिए फिर वही बेबुनियादी नारे लगाने शुरू किए, जो कांकेर के बस अड्डे पर लग रहे थे।