18 मई 2010

संसद की बातें और युद्ध का सच --- अनिल चमड़िया

लाल कृष्ण आडवाणी ने नवंबर 1999 में जब ये कहा कि आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैनिक बलों की संख्या पर्याप्त नहीं है तो राज्यसभा में इस बाबत एक सवाल किया गया।तब सरकार ने जवाब दिया था कि इस समय जम्मू कश्मीर में मिलिटेंसी से प्रभावित जिलों की संख्या 12 है। इंसर्जेसी से प्रभावित उत्तर पूर्व के चार राज्यों के 44 जिले है। वाम उग्रवाद से पीड़ित आंध्र प्रदेश के 6 , बिहार के 10, मध्यप्रदेश के 7, महाराष्ट्र के तीन एवं उड़ीसा के 5 जिले प्रभावित हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा संख्या देश के विभिन्न राज्यों के 112 जिले साम्प्रदायिक स्तर पर संवेदनशील बताए गए थे। जातीय तनाव की चपेट में मात्र 24 जिलें थे। लेकिन 15 अगस्त 2006 को देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले की प्राचीर से आतंकवाद और नक्सलवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में घोषित किया। महज छह वर्षों में नक्सलवाद का तेजी से इतना विकास कैसे हो गया ? कैसे मिटिलेंसी, इंसर्जेसी, वाम उग्रवाद आदि शब्द एक होकर आतंकवाद के पर्याप्य के रूप में माओवाद सामने आ गया ?

अजात शत्रु के बारे में पढ़ते हुए एक वाक्या आता हैं। उसे पिता को कैद में रखना था। लेकिन पिता को कैद में रखने के रूप में कोई फैसला लिया जाता तो लोगों के बीच उसका गलत संदेश जाता। लिहाजा राजा ने अपने फैसले की भाषा बदल दी। उसने फैसला किया कि वह अपने पिता को कड़ी सुरक्षा में रखना चाहता है और उसने उनके इर्द गिर्द सख्त पहरा बैठा दिया।उस पिता के लिए कैद और सुरक्षा शब्दों में क्या फर्क था?किसी फैसले की भाषा से राजनीतिक उद्देश्य समझ में नहीं आता है। उस फैसले के क्या परिणाम निकलने वाले है, उसके राजनीतिक उद्देश्यों को समझने के लिए उस पर गौर करना ही महत्वपूर्ण होता है। राज्यसभा में छोटे लोहिया के रूप में विख्यात जनेश्वर मिश्र ने 17 मई 2000 को सरकार से एक सीधा सवाल किया कि क्या नक्सलवाद को नियंत्रित करने के लिए बनाए गए टास्क फोर्स के गठन के बाद से देश में नक्सलियों के प्रभाव और उसके कार्यक्षेत्र में तेजी से विस्तार हुआ है? दूसरा क्या झुठे मुठभेड़ के नाम पर नक्सलियों को मारने की घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई है?अब ऐसे सवाल नहीं पूछे जाते हैं।अब सूचनाएं मांगी जाती है कि सरकार नक्सलवाद से निपटने के लिए क्या कर रही है। सरकार के पास जनेश्वर मिश्र के दूसरे प्रश्न का जवाब नहीं था। सीधा जवाब पहले प्रश्न का भी नहीं था। सरकार ने केवल इतना बताया कि 1998 में नक्सलवादी प्रभावित राज्यों के बीच पुलिस वालों की एक समन्वय समिति बनाई गई हैं। अब सवाल यहां ये पूछा जा सकता है कि क्या देश में नक्सलवाद से निपटने के नाम पर राज्यों को केन्द्र द्वारा पैसा मुहैया कराने का सिलसिला शुरू किया गया है या फिर नक्सलवाद को एक बड़े खतरे के रूप में पेश करने के लिए विनियोग किया जाता रहा है? यह सवाल जनेश्वर मिश्र के सवाल से जुड़कर ज्यादा महत्वपूर्ण और गौरतलब हो जाता है।

संविधान के मुताबिक कानून एवं व्यवस्था राज्य का विषय है। राज्यों की माली हालत खराब बिगड़ती चली गई है।कमजोर होते राज्यों को केन्द्र सरकार ने सुरक्षा के नाम पर राज्यों के कई तरह से राशि मुहैया कराती रही है। एक तो पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के नाम पर राशि दी जाती रही है।दूसरे सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत पचास प्रतिशत राशि मुहैया कराई जाती रही है। 1999-2000 में केन्द्र सरकार ने सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत आंध्र प्रदेश को सबसे ज्यादा 30.46 करोड़ रूपये मुहैया कराया था। आज जिन आदिवासी प्रदेशों झारखंड , मध्यप्रदेश, उड़ीसा को माओवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित बताया जा रहा है उन राज्यों में तब की स्थिति क्या थी, ये यहां गौर तलब है। तब संयुक्त बिहार को 9 करोड़, मध्यप्रदेश को 5 करोड़ और उड़ीसा को 3.58 करोड़ रूपये इस मद में मुहैया कराए गए थे। उपर इन राज्यों में वाम उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या भी बतायी गई है।

संसद में सरकार ने 2010 तक माओवाद और नक्सलवाद की जो तस्वीर देश को बतायी है, उस पर भी गौर करें। सरकार ने पुलिस ढांचे के आधुनिकीकरण के लिए आंध्र प्रदेश को 2008-09 में 83.83 करोड़, बिहार16.24 करोड़, छत्तीसगढ़ को 41.72 करोड़, झारखंड़ को 50.95 करोड़, मध्यप्रदेश को 57.68 करोड़, महाराष्ट्र को 75.86 करोड़, उड़ीसा को 42.52 करोड़ यानी बाकी दो राज्यों उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल को कुल मिलाकर 515.05 करोड़ रूपये राशि मुहैया करायी है। सुरक्षा संबंधी खर्चों की भरपायी योजना के तहत उपरोक्त राज्यों को 10433.20 लाख रूपये की कार्य योजना को मंजूरी दी गई । एक तीसरा नया खर्चा और जुड़ा है। वाम उग्रवाद से निपटने के लिए कई तरह के ढांचे खड़े करने के लिए विशेष ढांचागत योजना के तहत राज्यों को राशि मुहैया करायी जा रही है। छत्तीसगढ़ के केवल वीजापुर और दंतेवाड़ा के लिए क्रमश- 1615 लाख और 1135 लाख रूपये दिए गए।बिहार के गया और औरंगाबाद के लिए 986 लाख और 619 लाख रूपये और झारखंड के चतरा जिले के लिए 960 लाख एवं पलामू के लिए 1420 लाख रूपये दिए गए। कुल 9999.92 लाख रूपये उपरोक्त राज्यों के अलावा आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश को सुरक्षा के ढांचे खड़े करने के लिए दिए गए। इसमें दो तरह की राशि शामिल है। राशि एक तो सहायता के नाम पर तो दूसरे कर्ज के रूप में होती है।राज्यों पर केन्द्र का कर्ज बढ़ता चला गया है।

नक्सलवाद के विस्तार को किस रूप में देखा जाए। सरकारी दस्तावेजों में नक्सलवाद का जो विस्तार पिछले पांच वर्षों के दौरान दिखाई देता है वह किस वजह से है? आखिर देश में ऐसी क्या परिस्थितियां पैदा हुई है कि इतनी तेजी के साथ नक्सलवाद का विस्तार दिखाई देता है।जब सारी दुनिया में वाम खासतौर से क्रांतिकारी वाम की समाप्ति की घोषणा की जा रही हो उस समय नक्सलवाद का इतनी तेजी से बढ़ते प्रभाव का दावा सरकार द्वारा किया जा रहा है ।खुद मनमोहन सिंह इस बात को दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद के प्रति बुद्दिजीवियों में आकर्षण खत्म हुआ है। बुद्दिजीवी किसी वाद के विस्तार के मापक है तो फिर नक्सलवाद का इस रूप में विस्तार उनके द्वारा क्यों बताया जा रहा है।

अमेरिका ने रीगन के कार्यकाल के दौरान 80 के दशक में राज्य पोषित आतंकवाद को दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने की योजना बनाई थी। लेकिन वह आकार नहीं ले सकी।क्योंकि उस समय आतंकवाद के नाम पर निशाने की एक शक्ल तैयार नहीं की जा सकी थी।लगभग यही स्थिति भारत के संदर्भ में है।नई आर्थिक नीतियों के संभावित बुरे नतीजें जब सामने आने लगे तब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने नक्सलवाद को देखने के नजरिये में परिवर्तन लाना शुरू किया।उसने नक्सलवाद को केवल कानून एवं व्यवस्था की समस्या के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।लेकिन अमेरिका उस समय आतंकवाद को एक इस्लामी आतंकवाद के रूप में खड़ा कर रहा था।कहा जाए कि भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद बुश के जमाने में आतंकवाद को एक ठोस शक्ल दी गई।एनडीए ने उसी तर्ज पर मार्क्स-माओ और मुल्ला के रूप में विकसित कर आतंकवाद के सिक्के के दो पहलू के रूप में उसे पेश करने की कोशिश की थी।मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने प्रथम कार्यकाल में आर्थिक नीतियों के विस्तार की जो योजना तैयार की उसे आतंकवाद की समस्या से जोड़े बिना आगे बढ़ाना संभव नहीं था। देश के जिन अमीर इलाकों में कब्जा जमाने से उसका विस्तार हो सकता था वो बदकिस्मती से दुनिया के सबसे बदहाल आबादी आदिवासियों के पैर के नीचे था।लेकिन यह संभव नहीं था कि आदिवासियों को विकास के बाधक के रूप में खड़ा करके उनके खिलाफ अभियान चलाया जा सकें। उसे एक नए वैचारिक शक्ल में पेश करना जरूरी था। माओवाद इसका चेहरा बना और उसे सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाने लगा। दुनिया भर में भूमंडलीकरण के दौर में सत्ता का चरित्र बदला हैं और उसके तदानुरूप उसकी भाषा के अर्थ भी बदले हैं। यदि बुश जिस आतंकवाद को दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया यह उनका आकलन नहीं था। बल्कि यह उनकी भूमंडलीकरण की परियोजना का एक हिस्सा था।जैसे जब शरद पवार मंहगाई के संदर्भ में इस तरह का बयान देते है कि वह कितने महीने तक बनी रह सकती है तो वह आकलन नहीं संदेश के रूप में होता है। संदेश उन आर्थिक वर्ग के लिए जो मंहगाई की व्यवस्था को सुदृढ़ कर और लाभ उठा सकें।इस तरह से संदेश देने की रणनीति का विकास हुआ है। विकास का जब संदेश दिया जाता है तो विकास से लाभ उठाने वालों के लिए वह और आक्रमक और संगठित होने का आह्वान होता है। मनमोहन सिंह ने जब नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया तो यह दमन के लिए प्रशिक्षित नौकरशाही के लिए संदेश के रूप में सामने आया। एक लंबा सिलसिला देखा जा सकता है जब सत्ता अपनी प्रशिक्षित मशीनरी के सामने अपने एजेंडे को पेश करने का इस तरह का तरीका विकसित किया है।

भारत के संदर्भ में इस बात को आकलन किया जा सकता है कि जिस समय मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने का सिलसिला शुरू किया उस समय उसे इस रूप में पेश करने के क्या ठोस आधार थे।उस समय गृह मंत्रालय के आंकड़े बता रहे थे कि 2005 में नक्सलवादी हिंसा की 1608, 2006 में 1509, 2007 में 1565 और 2008 में 1591 घटनाएं हुई।लेकिन इन संख्याओं के भीतर भी घुसने की कोशिश करनी चाहिए। मसलन जब बिहार में नक्सलवादी हिंसा को लेकर विधानसभा में बातचीत होती थी तो सरकार जो आंकडे पेश करती थी उसमें कपूर्री ठाकुर सरीखे नेता पूछा करते थे कि नक्सलवादी हिंसा में मारे गए दलितों की संख्या कितनी है।नक्सली के नाम पर मारे गए जवानों में कितनी संख्या पिछड़े व दलितों की है। बहरहाल कुल घटनाओं की मात्रा में कोई बड़ा अंतर नहीं दिखाई दे रहा था जिसके आधार पर नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाए।तब के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने तो उस समय कहा कि कई राज्यों में नक्सलवादी हिंसा में कमी आई है।उन्होने बताया कि केवल झारखंड और छत्तीसगढ़ में स्थिति बदत्तर है।उन्होने तो यहां तक कहा कि नक्सलवाद के खतरे को देखने के अपने अपने नजरिये हो सकते हैं।संसद में सरकार कहती रही है कि नक्सलवादियों को बाहरी मुल्क से किसी तरह के हथियार वगैरह मिलने की खबर नहीं है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा अपने इलाके में जमा किए जाने वाली लेवी से आता है।प्रचार तंत्र ने रेड कैरिडोर का हौवा जरूर तैयार किया हो लेकिन सरकार ने ये कई मौके पर स्पष्ट किया है कि उसे रेड कैरिडोर बनाने जैसी कोई जानकारी नहीं है।प्रधानमंत्री के खतरे वाले बयान से पहले संसद में देशभर में हथियार बंद नक्सलियों की संख्या लगभग नौ सौ बतायी गई थी। दंतेबाडा में 75 केन्द्रीय पुलिस के जवानों के मारे जाने के बाद पी चिंदबरम उस संख्या के बढ़कर 14-15 हजार होने की बात कह रहे हैं।नक्सलियों के पास हथियारों के संबंध में जो आंकड़े पेश किए गए थे वे देश के पांच सात बड़े जिलों में लाईसेंसधारी हथियारों से ज्यादा नहीं बताए गए है।तब क्या इस आधार पर नक्सलवाद को सुरक्षा के लिहाज से सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाना चाहिए था?दरअसल नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप पेश करने के पीछे भले कोई ठोस बात नहीं हो लेकिन नौ फीसदी की विकास दर को जिन इलाकों पर कब्जे के जरिये हासिल किया जा सकता था उसकी ठोस योजना थी और उसमें आने वाली बाधाओं का भी आकलन था।जब गृह मंत्री दो राज्यों के हालात बदत्तर बता रहे थे तो इसका अर्थ उन दोनों राज्यों के संपूर्ण हिस्से में भी बदत्तर हालात नहीं बता रहे थे।क्या देश के किसी वाद के कारण कुछेक जिलों में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बदत्तर होने के आधार पर उसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जा सकता है।1999 में साम्प्रदायिकता से ग्रस्त जिलों की संख्या सबसे ज्यादा बताई गई है क्या उसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया गया ? देश में इस समय सबसे ज्यादा मौतें सड़कों पर होती है । एक लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। क्या इस आधार पर इसे इस समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में पेश किया जाना चाहिए।हिंसा और मौत खतरे का पैमाना नहीं होता है।किसी राजनीतिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक उसकी नीतियों और कार्यक्रमों को चुनौती देना होता है। भूमंलीकरण की नीतियों की वाहक राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये रही है कि वह कैसे विरोध की तमाम तरह की धाराओं का एक चेहरा तैयार कर दें।कैसे तमाम तरह के विरोधों को दबाने का एक नाम तैयार कर लें। माओवाद और आतंकवाद इसी दो तरह के प्रयासों के रूप में सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आया।

नक्सलवाद के सबसे बड़े खतरे के रूप में स्थापित होने के क्या अर्थ हो सकते हैं, इस प्रश्न पर लोकतंत्र के बारे में तनिक भी संवेदनशील रहने वाले लोगों को सोचना पड़ेगा। इन वर्षों में क्या हुआ है। सरकार का संसद में ही जवाब है कि सरकार ने वाम उग्रवाद से निपटने के लिए एक ऐसे नजरिये को स्वीकार किया है जिसमें कई बातें शामिल हैं। इसमें सुरक्षा, विकास और लोगों की समझ के पहलू शामिल हैं।लोगों की समझ का पहलू अब जुड़ा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गृह मंत्रालय गरीब इलाकों में माओवादियों को लेकर तरह तरह के विज्ञापन जारी कर रहा है। कई शहरों में बतौर विज्ञापन होर्डिंग लगाए गए हैं।यदि इन विज्ञापनों की सामग्री का विश्लेषण किया जाए तो सत्ता के वास्तविक चरित्र को और खोलकर सामने रखा जा सकता है।विज्ञापन ये नहीं होता है कि विकास के इतने बड़े दावे के बीच आदिवासियों के बीच अंग्रेजों के जमाने से भी बदत्तर बदहाली की स्थिति बनी हुई है। बहरहाल फिलहाल विज्ञापन विषय नहीं है। केन्द्र सरकार के अनुसार राज्य सरकारें अपने यहां नक्सलवाद से जुड़े कई पहलूओं पर सक्रिय रहती है और केन्द्र सरकार कई तरह से उन्हें मदद करती हैं। इसमें केन्द्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती, रिजर्व बटालियन की स्वीकृति , आतंकवाद विरोधी और काउंटर इंसर्जेंसी स्कूलों की स्थापना , राज्य की पुलिस की सेना द्वारा ट्रेनिंग के लिए रक्षा मंत्रालय से मदद, सामुदायिक पुलिस लोगों को कार्रवाई में उतारने के लिए मदद उपर उल्लेखित पुलिस के आधुनिकीकरण आदि स्कीमों के तहत दी जाने वाली राशि के अलावा है।यहां जिस सामुदायिक और नागरिकों को कार्रवाई में उतारने के लिए मदद देने की बात जो कहीं गई है उसके बारे में स्पष्ट कर लेना चाहिए। सरकार ने ही स्वीकार किया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में उसने नागरिक सुऱक्षा समितियों के गठन में मदद करती है। देश के कई हिस्सों में ग्रामीण सुरक्षा समितियां सक्रिय है जिन्हें सरकारी फंड के अलावा हथियार और संरक्षण मिलता है।दूसरा छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने बताया था कि केन्द्र के कहने पर ही उनके राज्य में विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।मुख्यमंत्री के मुताबिक अब उनकी बटालियन तैयार करने पर विचार किया जा रहा है। असंतोष से भरे इलाके में गरीब और जागरूक युवाओं को एक राजनौतिक जगह जमा होने से रोकने की सरकारी नीति के तहत कई तरह की योजनाएं चलती रहती है। एसपीओ यानी विशेष पुलिस अधिकारी, सुरक्षा समितियां उनमें एक हैं। स्थानीय युवाओं के एक हिस्से को सेना या अर्द्धसैनिक बलों में ले लिया जाता है।जैसे कश्मीर के दो हजार युवाओं को सेना में लेने का फैसला किया गया। असम में जिस समय असंतोष गहराया उस समय वहां के युवाओं को सेना में भर्ती करने का सिलसिला तेज किया गया। अभी आदिवासी इलाकों में ये सिलसिला तेज हुआ है। पुलिस और सेना में भर्ती के लिए लंबी लाइनें लग जाती है।आदिवासी बटालियन बनाने की प्रक्रिया तेज हुई है। देश में असंतोष से भरे राजनीतिक आंदोलनों के दौरान इस तरह की योजनाओं का एक लंबा सिलसिला हैं।लेकिन युवाओं की चाहें जितनी भर्ती सेना या पुलिस में कर ली जाए उससे समस्या के खिलाफ असंतोष के घनत्व को तो कमजोर किया जा सकता है लेकिन समस्याएं कैसे खत्म हो सकती है? वह तो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों के आधार पर ही हो सकती है।नई आर्थिक नीति और राजनीतिक सरोकार इसकी इजाजत नहीं देते हैं। लोकतंत्र में हासिल अधिकार इसका विरोध करने की इजाजत देते है।सैन्य ढांचा इसी लोकतंत्र से निपटने की दूरगामी योजना का हिस्सा है।

नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किए बिना आतंकवाद विरोधी ढांचे का निर्माण नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसे आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक समस्या मानने के दृष्टिकोण के रहते ऐसा करना संभव नहीं हो सकता था।इस नजरिये के बिना विभिन्न तरह के राजनीतिक पर्दों में छिपे लोकतंत्र विरोधी तमाम शक्तियों को एकजूट नहीं किया जा सकता था। इसके बिना उस छोटे से बौद्धिक वर्ग पर भी हमले की स्थितियां तैयार नहीं की जा सकती है जो भूमंडलीकरण के तमाम दबावों के बावजूद अपनी संवेदनशीलता और सरोकारों को बचाए हुए है। इसीलिए देखा जा सकता है कि कल राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से जुड़े संगठन बौद्धिक आतंकवाद के नाम पर लोकतांत्रिक समूहों पर हमला बोलते थे अब मनमोहन सिंह के स्वर में स्वर मिलाने वाले आर्थिकवादी गृहमंत्री पी चिंदबरम भी बौद्धिक वर्ग पर माओवाद के समर्थन के लिए सबसे जोरदार हमला बोलते हैं।जैसे सल्वा जुड़ुम में भाजपा और कांग्रेस साथ साथ हो गई। अमीर परस्त आर्थिकवादियों का राजनीतिक लक्ष्य एक ही होता है। गणतंत्र में राज्यों की ताकत को कमजोर नही किया जा सकता है।ये अब दावे के साथ कहा जा सकता है कि राज्यों के नाम कानून एवं व्यवस्था केवल एक विषय के रूप में रह गया है जैसे देश के नाम समाजवादी संविधान रह गया है।राज्य के नाम केवल विषय है , निपटने के लिए सारी योजनाएं केन्द्र की है। नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने में गरीब और राजनीतिक तौर पर कमजोर राज्यों के भीतर लालच की प्रवृति का बढ़ना स्वभाविक है। अमेरिका ने मुशर्रफ के कार्यकाल में पाकिस्तान को आतंकवाद के नाम तब तब बहुत पैसा दिया जब जब पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवादी घटनाओं में तेजी के साथ इजाफा दिखाया।सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश करने में लोकतंत्र की कार्रवाईयों पर चोट करने में सबसे ज्यादा आसानी होती है। देश के लोकतंत्र में पहली बार एक पुलिस अधिकारी रिबेरो ने साहस किया कि बुलेट का जवाब बुलेट से देंगे।लेकिन उस समय सवाल उठे तो उसने कई बार सफाई दी। उसकी झिझक आज एक शोर के रूप में सुनायी पड़ रही है। हर राज्य का पुलिस अधिकारी बुलेट का बुलेट से देने के लिए दहाड़ रहा है। पहले एक गिल थे जो धरना प्रदर्शन को आतंकवाद की शुरूआत मानते थे। अब देश के किसी भी हिस्से में घरना प्रदर्शन असंभव होता जा रहा है।राजनीतिक नेता लोकतंत्र में बातचीत की प्रक्रिया से इंकार कर रहे हैं।लोकतंत्र के सैन्यकरण की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया और होती कैसी है? इसके अलावा कोई दूसरा रूप नहीं होता। मात्र दस वर्ष में नक्सलवाद के नाम पर पर युद्ध छेड़ने की बात सुनाई पड़ने लगी है।ठीक वैसे ही अमेरिका ने आतंकवाद की एक शक्ल तैयार करने के बाद उसके खिलाफ युद्द छेड़ने की घोषणा कर दी। युद्ध किसके खिलाफ हुए? अफगानिस्तान और इराक ने क्या बिगाड़ा था। क्या वकाई नक्सलवाद की विचारधारा में इतनी ताकत है कि उसके सामने सभी राजनीतिक धाराएं लगातार खुद को बौना महसूस कर रही है ? क्या भूमंडलीकरण में एक तरफ सभी सत्ताधारी धाराएं एक हो गई है और दूसरी तरफ विरोध का एक चेहरा तैयार कर लिया गया है? युद्ध के लिए हथियार बंद चेहरा चाहिए और नक्सलवाद व माओवाद बहाना है। सबसे सुंदर कहावत गढ़ी जा रही है कि सबसे कमजोर लेकिन सबसे अमीर लोगों को लूटने के लिए सबसे सुंदर बहाना क्या हो सकता है?कमजोर हिंसक नहीं हो सकता और अमीर होने का तो उसे एहसास भी नहीं। तब ऐसी कहावत का उत्तर क्या होगा? कमजोर और अमीर एक साथ होना इस समयका सबसे बड़ा खतरा हैं।

13 मई 2010

छत्तीसगढ़ में हुयी शांति-न्याय यात्रा

देवाशीष प्रसून
एक तरफ, वर्षों से शोषित व उत्पीड़ित आदिवासी जनता ने माओवादियों के नेतृत्व में अपने अधिकारों को हासिल करने के लिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नाकाफी समझते हुये हथियार उठा लिया है। दूसरी तरफ, असंतोष के कारण उपजे विद्रोह के मूल में विद्यमान ढ़ाँचागत हिंसा, लचर न्याय व्यवस्था, विषमता व भ्रष्टाचार को खत्म करने के बजाए केंद्रीय व राज्य सरकारों ने अपने सशस्त्र बलों के जरिये विद्रोह को कुचलने की प्रक्रिया शुरू कर दी। सरकार नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा मान रही है और नक्सलवादी मौज़ूदा सरकारी तंत्र को इंसानियत के लिये सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं। हालाँकि, यह जग जाहिर है कि सारी लड़ाई विकास के अलग एवं परस्पर विरोध अवधारणाओं को ले कर है। विकास किसका, कैसे और किस मूल्य पर? इन्हीं प्रश्नों के आधार पर देश के न जाने कितने ही लोगों ने स्वयं को आपस में अतिवादी साम्यवादियों और अतिवादी पूँजीवादियों के खेमों में बाँट रखा है। यह अतिवाद और कुछ नहीं, हिंसा के रास्ते को सही मानने और मनवाने का एक तरीका है बस। ऐसे में, देश का आंतरिक कलह गृहयुद्ध का रूप ले रहा है। इस गृहयुद्ध में छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल व विदर्भ म्रें फैला हुआ एक बहुत बड़ा आदिवासी बहुल इलाका जल रहा है। लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन गये हैं।
इस विकट परिस्थिति से परेशान, देश के लगभग पचास जाने-माने बुद्धिजीवी ५ मई २०१० को छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर में इकट्ठा हुये। नगर भवन में यह फैसला लिया गया कि वे छत्तीसगढ़ में फैली अशांति और हिंसा के विरोध में रायपुर से दंतेवाड़ा तक की शांति-न्याय यात्रा करेंगे। यह भी तय हुआ कि इस यात्रा का उद्देश्य हर तरह के हिंसा की निंदा करते हुये सरकार और माओवादियों, दोनों ही से, राज्य में शांति और न्याय बनाये रखने की अपील करना होगा। शांति की इस पहल में कई चिंतक, लेखक, पत्रकार, वैज्ञानिक, न्यायविद, समाजकर्मी शामिल हुये। इनमें गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति नारायण देसाई, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यलय के कुलाधिपति प्रो. यशपाल, वर्ल्ड फोरम ऑफ़ फिशर पीपुल्श के सलाहकार थामस कोचरी, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश, गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्षा राधा बहन भट्ट, रायपुर के पूर्व सांसद केयर भूषण, सर्वसेवा संघ के पूर्वाध्यक्ष, लाडनू जैन विस्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व पूर्व सांसद प्रो. रामजी सिंह, नैनीताल समाचर के संपादक राजीवलोचन साह व यात्रा के संयोजक प्रो. बनवारी लाल शर्मा जैसे वरिष्ठ लोगों ने अगुवाई की।
यात्रा शुरू करने से पहले इन लोगों ने रायपुर के नगर भवन में इस यात्रा के उद्देश्य, देश में शांति की अपनी राष्ट्रव्यापी आकांक्षा व विकास की वर्तमान अवधारण को बदलने की प्रस्ताव को रायपुर के शांतिप्रिय जनता के सामने व्यक्त करने के उद्देश्य से एक जनसभा का आयोजन किया। जनसभा के दौरान कुछ उपद्रवी तत्व सभा स्थल में ऊल-जुलूल नारे लगाते पहुँचे और कार्यक्रम में व्यवधान डालना चाहा। प्रदर्शनकाररियों द्वारा इन लब्धप्रतिष्ठित गांधीवादी, हिंसा-विरोधियों वक्ताओं को नक्सलियों का समर्थक बताते हुये छत्तीसगढ़ से वापस जाने को कह रहे थे। प्रदर्शनकारियों को इन बुद्धिजीवियों के द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध पर आपत्ति थी। उनका कहना था कि नक्सली एक तो विकास नहीं होने देते, दूसरे पूरे राज्य में हिंसक माहौल बनाये हुये हैं। अतः इन्हें चुन-चुन के मार गिराना चाहिए। प्रदर्शनकारी ऐसे में किसी तरह की शांति पहल को नक्सलवादियों का मौन समर्थन समझ रहे थे। हालाँकि, यह बात क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि इस प्रदर्शन में भारतीय जनता पार्टी और कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ व्यापारिक समुदाय के मुट्ठी भर लोग थे, पर इन चंद लोगों के साथ विरोध में कोई मूल छत्तीसगढ़ी जनता नहीं दिखी। इस खींचातानी के माहौल के बाद भी सभा विधिवत चलती रही और सुनने वाले अपने स्थान पर टिके रहे।
तमाम तरह की धमकियों की परवाह किये बगैर, शांति और न्याय के यात्रियों ने अगले सुबह महात्मा गांधी की प्रतिमा के आगे नमन करने के बाद दंतेवाड़ा की ओर अपनी यात्रा को शुरू किया। दोपहर बाद यात्रा के पहले पड़ाव जगदलपुर में काफ़िला रुका, जहाँ भोजनोपरांत एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया था। शांति यात्री ज्यों ही पत्रकारों से मुख़ातिब हुये, जगदलपुर के कुछ नौजवानों ने इस शांति-यात्रा के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। लगभग दो दर्जन लोगों की इस उग्र भीड़ ने वहीं सारे तर्क-कुतर्क किये जो रायपुर के जनसभा में प्रदर्शनकारियों ने किये थे। इन लोगों के सर पर खून सवार था।
इसी दौरान पत्रकारों के साथ वार्ता के दौरान प्रो. बनवारी लाल शर्मा ने कहा कि यह अशांति सिर्फ़ छत्तीसगढ़ की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है। इस विकट समस्या का कारण देश में आयातित जनविरोधी विकास की नीतियाँ है। सरकार को चाहिए कि वह निर्माण-विकास की नीतियों पर फिर से विचार करे और जनहित को ध्यान में रखते हुये भारतीय प्रकृति व जरूरतों के हिसाब से विकास की नीतियों का निर्माण करे। उन्होंने जोर देते हुये कहा कि हिंसा से सत्ता बदली जा सकती है, व्यवस्था नहीं। अतएव नक्सलवादियों द्वारा की जाने वालि प्रतिहिंसा का भी उन्होंने विरोध किया। नारायण भाई देसाई ने कहा कि शांति का मतलब बस यह नहीं होता कि आप किसी से नहीं डरें, बल्कि ज़रूरी यह भी है कि आपसे भी कोई नहीं डरे। उन्होंने कहा कि हम शांति का आह्वाहन इसलिये कर रहे हैं, क्योंकि हम निष्पक्ष, अभय और निर्वैर हैं। थॉमस कोचरी ने हिंसा के तीनों ही प्रकारों- ढाँचागत, प्रतिक्रियावादी व राज्य प्रयोजित हिंसा - की भर्स्तना की।
इधर शांति और न्याय का अलख जगाने के लिये पत्रकारों के समक्ष शांति के विभिन्न पहलूओं पर विमर्श चल ही रहा था कि उधर शांति यात्रियों के वाहनों के पहियों से हवा निकाल दिया गया, बस यही नहीं, अपितु टायरों को पंचर कर दिया गया। शांति की बातें शांति-विरोधियों को देशद्रोह और अश्लील लग रही थी। फिर, इन प्रबुद्ध यात्रियों के द्वारा वार्ता के आह्वाहन करने पर जगदलपुर के प्रदशनकारियों और यात्रियों के बीच एक लंबी बातचीत हुयी। इसके बाद भी, जगदलपुर के नौजवानों का रवैया सब कुछ सुन कर अनसुना करने का रहा और उन्होंने शांति यात्रियों को आगे न जाने की हिदायत दे डाली।
अगले दिन, शांति और न्याय के लिए निकला यह काफ़िला जगदलपुर से दंतेवाड़ा की ओर रुख्सत हुआ। जगदलपुर के एस.पी. ने शांति यात्रियों के सुरक्षा की जिम्मेवारी लेते हुये पुलिस की एक गाड़ी शांति यात्रियों के वाहन के साथ लगा दिया था। बावज़ूद इसके गीदम में स्थानीय व्यापारियों व साहूकारों ने शांति का मंतव्य लिये जा रहे बुजुर्ग बुद्धिजीवियों को रोका ही नहीं, दहशत का माहौल बनाने का भरसक प्रयास किया। महंगी गाड़ी से उतर कर एक आदमी ने लगभग डेढ़ दर्जन पुलिसकर्मियों के सामने शांति यात्रियों के वाहन चालक को यह धमकी दी, कि अगर वह एक इंच भी गाड़ी दंतेवाड़ा की ओर बढ़ायेगा तो बस को फूँक दिया जायेगा। माँ-बहन की गालियाँ देना तो इन लपंटों के लिए आम बात थी। पुलिस की मौज़ूदगी में स्थानीय व्यापारियों का तांडव तब तक जारी रहा, जब तक दंतेवाड़ा डी.एस.पी. ने आकर सुरक्षा की कमान नहीं संभाली।
इसके बाद काफिला दंतेवाड़ा के शंखनी और डंकनी नदियों के बीच में बना माँ दंतेश्वरी की मंदिर में जाकर ठहरा, जहाँ इन लोगों ने प्रदेश में शांति एवं न्याय के स्थापना के लिए शांति प्रार्थना किया। फिर एक पत्रकार गोष्ठी व जनसभा का संयुक्त आयोजन किया गया था, जहाँ स्थनीय व्यापारियों ने नक्सलवाद के कारण अपने परेशानियों से शांतियात्रियों से रु-ब-रु करवाया। तत्पश्चात इन लोगों ने आस्था आश्रम में भी शिरकत किया, जो कि राज्य संचालित अति संपन्न विद्यालय है। हालाँकि, यहाँ विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या और उनका अनुपात इस विद्यालय के प्रासंगिकता पर कई सवाल खड़े कर रहे थे। आश्रम के बाद शांति यात्री सीआरपीएफ़ के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने उनके कैंप में गये और अपनी संवेदना व्यक्त की।
दंतेवाड़ा में शांतियात्रियों का आखिरी पड़ाव चितालंका में विस्थापित आदिवासियों का शिविर था। पुलिस के अनुसार इस शिविर में बारह गाँवों से विस्थापित १०६ विस्थापित परिवार गुज़र बसर कर रहे हैं। पुलिस की उपस्थिति में इन विस्थापित आदिवासियों ने नक्सलवादी हिंसा के कारण उन पर हुये अत्याचर का दुखड़ा रोया। उन्होंने बताया कि नक्सलवादी कितने क्रूर और तानाशाह होते हैं। गौर किजिये कि इस विस्थापित लोगों के शिविर में ज्यादातर पुरूषों को नगर पुलिस व विशेष पुलिस अधिकारी(एसपीओ) की नौकरी मिल गयी है, तो कुछ सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के रूप में काम कर रहे हैं। औरतों के लिये संपन्न लोगों के घरों में काम करने का विकल्प खुला हुआ है।
अपने दंतेवाड़ा तक की यात्रा में शांतियात्रियों की बातचीत हिंसा-प्रतिहिंसा के दूसरे पक्ष नक्सलवदियों से कोई संपर्क नहीं हो सका। राजनीतिक कार्यकर्ता व व्यापारिक समुदाय के लोगों के नुमाइंदों के अलावा किसी की मूल छत्तीसगढ़ी आमजनता की जनसभा को संबोधित करने में शांतियात्री कामयाब नहीं रहे। फिर भी, इस शांति व न्याय यात्रा को एक पहल के रूप में सदैव याद रखा जायेगा कि देश के कुछ चुनिंदा शांतिवादियों ने शांति और न्याय के मंतव्य से छत्तीसगढ़ की यात्रा की। उम्मीद है कि इस पहल से प्रभावित हो कर शांति और न्याय के प्रयास के लिए लोगों में हिम्मत बढेगा और भविष्य में कुछ परिवर्तन देखने को मिलेंगे।
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संप्रति: पत्रकारिता एवं शोध
संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001दूरभाष: 09555053370, ई-मेल:
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12 मई 2010

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उपेक्षित

देश का कोई भी संस्थान जब नयी नीतियां पारित करता है तो यह अपेक्षा की जाती है कि नयी नीतियों के तहत बनने वाले नियम, कानून, पहले की अपेक्षा ज्यादा सरल और जन सुलभ होंगे. उच्च शिक्षा के विकास के लिये जब १९५३ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) बनाया गया तो उसके आधार में १९४८-४९ में शिक्षा को लेकर बनायी गयी राधाकृष्णन कमेटी की वह रिपोर्ट थी जिसमें कुछ महत्वपूर्ण सिफारिसें की गयी थी. उन सिफारिसों में शिक्षा को लोगों के जीवन से जोड़ते हुए उसे लोगों की आवश्यकता और अभिरुचि के मुताबिक बनाना था. इसमे राष्ट्रीय समरसता कायम करने और लोगों की उत्पादकता को बढ़ाते हुए आधुनिक शिक्षा पर जोर देने की बात कही गयी थी. पिछले ५७ वर्षों के अपने इतिहास में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कई महत्वपूर्ण काम भी किये. मसलन जहाँ देश में १९४७ के वक्त महज २० विश्वविद्यालय थे उनकी संख्या बढ़कर आज ४०० से अधिक हो चुकी है, ५०० से कालेज की संख्या २० हजार से ऊपर पहुच गयी है और पाँच लाख से अधिक अध्यापक उच्च शिक्षा में अध्यापन कर रहे हैं, भले ही इनकी गुणवत्ता में कमी हो पर संसाधन के तौर पर यह एक बेहतर स्थिति बन पायी.
राधाकृष्णन आयोग के बाद उच्च शिक्षा को लेकर १९६४-६६ में “कोठारी आयोग” बनाया गया. उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने के लिये उसने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिसे की थी. जिसमे जी.डी.पी. का ६ प्रतिशत उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाने की बात कही गयी थी ताकि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में बृद्धि की जा सके और समान व समता परक शिक्षा उपलब्ध करायी जा सके. इसके पीछे निहित उद्देश्य यह थे कि ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में जो विभेदीकृत शिक्षा प्रणाली है उसे सुधारा जा सके. चूंकि एक बड़ा तबका है जो गाँवों में रहते हुए उच्च शिक्षा से वंचित रह जा रहा था. कोठारी आयोग की ज्यादातर सिफारिसे कागजों पर धरी रह गयी और गांवों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र यू.जी.सी. द्वारा कई अन्य वंचनाओं का शिकार होते गये.
२००६ में राष्ट्रीय मान्यता मूल्यांकन परिषद (एन.ए.ए.सी.) ने उन कालेजों की गुणवत्ता पर एक सर्वे किया जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अंतर्गत थे, जिनकी संख्या १४ हजार के करीब थी. इनमे से महज ९ प्रतिशत कालेज ही ऐसे थे जो उच्च गुणवत्ता की शिक्षा मुहैया करा रहे थे. निम्न गुणवत्ता के ज्यादातर कालेज ग्रामीण क्षेत्रों से ही थे.
सुखदेव थोराट के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आध्यक्ष बनने के बाद कुछ जरूरी कदम इस तौर पर उठाये गये जिससे समता व समानता आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिला. यहाँ दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों व महिलाओं की कम भागीदारी को न सिर्फ चिन्हित किया गया बल्कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों के असमान अनुपात को भी चिन्हित किया गया. जहाँ २००३ में ग्रामीण क्षेत्रों से प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या ७.७६ थी वहीं शहरी क्षेत्रों से २७.२० प्रतिशत छात्र उच्च शिक्षा में प्रवेश पा रहे थे. नवम्बर २००६ में मुम्बई के अपने एक उद्बोधन में सुखदेव थोराट द्वारा इस असमानता को दूर करने की घोषणायें भी की गयी पर उसके लिये जो प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये थी वह नहीं अपनायी गयी बल्कि उसके विपरीत कुछ ऐसे नीतियां अपनायी गयी जिससे ग्रामीण क्षेत्र से उच्च शिक्षा लेना महज डिग्रीधारी होना ही रह जाता है.
गत वर्ष नेट और जे.आर.एफ. परीक्षाओं के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कई बदलाव किये जिसमे आवेदन पत्रों को आन लाइन कर दिया गया ऐसी स्थिति में बड़ी तादात में वे छात्र जो गाँवों में रहते हैं और इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाओं से वंचित है आवेदन करने से भी वंचित रह गये. उच्च शिक्षा में अध्यापन की पात्रता सुनिश्चित करने वाले इस परीक्षा में आवेदन प्रक्रियाओं को पहले से भी ज्यादा जटिल बना दिया गया. आखिर किसी भी संस्थान द्वारा प्रक्रिया को जटिल बनाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं. क्या इसे इस तौर पर नहीं देखा जाना चाहिये कि इन जटिलताओं के बढ़ने से एक बड़ा समुदाय अपने को प्रक्रिया से बहिस्कृत पायेगा. इन परीक्षाओं के लिये जब इंटरनेट के आवेदन पत्र अनिवार्य किये गये तो क्या उन ग्रामीण क्षेत्रों का भी खयाल नहीं रखा जाना चाहिये था जो दूर दराज के इलाकों में बसे हैं क्या नीति निर्माताओं को इस बात का भान बिल्कुल नहीं था कि आज भी देश के कई हिस्सों में बिजली नहीं पहुंच पाती. दरअसल यह नीति निर्माताओं की चिंतन प्रणाली के बाहर इसलिये हो जाता है कि उनके ज़ेहन में शिक्षा का सम्बंध शहरं से ही जुड़ पाता है. ग्रामीण क्षेत्र इंटरनेट की पहुंच से बाहर हैं साथ में एक बड़ा वर्ग एस.सी., एस.टी., ओबीसी जो अधिकांसतः इन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों से उच्च शिक्षा बमुश्किल पा रहा है वह ऐसी परीक्षाओं से वंचित रह जायेगा. चूंकि आधुनिक तकनीक के रूप में न तो इंटरनेट इनकी पहुंच में न ही इनकी इसमे दक्षता है. लिहाजा विश्वविद्यालयों में अध्यापन के लिये जिस मापदण्ड को जरूरी किया गया है उसे पूरा करने में यह ग्रामीण वर्ग अक्षम ही रह जायेगा. इसके साथ-साथ एक नये तरह का आरक्षण अघोषित रूप में लागू हो चुका है जिसमें उच्च शिक्षा में अध्यापन के लिये आपका शहरी क्षेत्रों से होना अनिवार्य हो है, जहाँ इंटरनेट जैसी आधुनिक तकनीक मौजूद हो और उसमे दक्षता भी.

06 मई 2010

नारको टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने नारको टेस्ट पर कानूनी प्रतिबंध लगाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया है. नारको टेस्ट का मामला व्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन से जुड़ा है जिसमे उसे बोलने या चुप रहने दोनों का अधिकार दिया जाता है. एक आरोपी को अपने ऊपर लगे आरोप को कुबूल करने या न कुबूल करने दोनों का अधिकार होना चाहिये, जिसका उलंघन ब्रेन मैपिंग के आधार पर किये जाने वाले इस तरह की जाँच में अब तक होता रहा. इस निर्णय के बाद एक अहम सवाल यह है कि अब तक किये गये नारको टेस्ट व उन बयानों के आधार पर जाँच एजेंसियों द्वारा की गयी तफ्सीस को किस रूप में देखा जायेगा. पिछले वर्ष जब माओवादी आंदोलन के कथित कार्यकर्ता अरूण फ़रेरा का नारको टेस्ट किया गया था तो उसके दौरान आये बयान और उस पर शिवसेना की टिप्पणी ने कई प्रमुख सवाल खड़े कर दिये थे. जिसमे अरुण फ़रेरा ने अपने नारको टेस्ट में पूछे गये सवाल के जवाब में ए.बी.बी.पी. व बालठाकरे से मदद मिलने की बात कही थी और शिवसेना ने उसे सिरे से खारिज भी किया था. शिवसेना का सिरे से खारिज करना इस बात को इंगित करता है कि दोनों में से एक गलत है. वैचारिक रूप से शिवसेना और वामपंथी आंदोलन दो ध्रुव हैं जिस बात को शिवसेना ने स्वीकार करते हुए किसी तरह कि मदद से इनकार किया था. ऐसे में नारको परीक्षण से सच उगलवाने को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने कुछ अहम सवाल उठाये थे और इस पर प्रतिबंध की मांग की थी. पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइट (एक मानवाधिकार संगठन) ने अरुण फरेरा के नारको परीक्षण को लेते हुए एक रिपोर्ट जारी की है जिसमे कहा गया था कि नारको टेस्ट एक प्रताणना के अलावा और कुछ नही है क्योंकि इस तरकीब से सच उगलवाना संभव नहीं है.पर इन सारे आधारों की अनदेखी की गयी और अरुण फरेरा आज भी नागपुर जेल में कैद हैं.
हाल के वर्षों में देश में बढ़ते नारको परीक्षण की सच्चाई यह रही है कि बंग्लूरू में स्थापित टेस्ट सेंटर मे अब तक ३०० से अधिक नारको परीक्षण हो चुके हैं जिसके कोई खास नतीजे सामने नहीं आये हैं और पुलिस उन सबूतों के बल पर कुछ भी करने में अक्षम रही है. इसके पीछे ठोस कारण ये है कि नारको परीक्षण के जरिये पुख्ता सबूत निकालने में ५% मदद ही मिल पाती है और यह भी कई बातों पर निर्भर करता है. नारको परीक्षण के दौरान जिन नशीले पदार्थों का प्रयोग किया जाता है उसमें सोडियम पेंटोथाल, सेकोनाल, सोडियम एमिटोल, स्कीपोलामाइन है. अब तक इस दावे के आधार पर नारको टेस्ट होते रहे कि इसके प्रयोग से आरोपी अपने विचारों को बदलने में असमर्थ हो जाता है और वह सब कुछ उगलता है जो कि उसके मस्तिस्क में होता है परन्तु तथ्य यह भी हैं कि यदि उसने टेस्ट के पहले ही जिद बना ली है कि वह झूठ बोलेगा या कुछ और बोलेगा तो दवा का प्रवाह उसकी इस जिद को बलवती बनाता है. इस टेस्ट का तरीका इतना अमानवीय होता है कि संयुक्त राष्ट्र के द्वारा निर्धारित शारीरिक शोषण के अन्तर्गत आने वाले लगभग सभी तरकीबों का प्रयोग अभियुक्त पर किया जाता है और प्रयोग किये गये सीरम से व्यक्ति का शारीरिक संतुलन भी गड़बड़ हो जाता है. जिसका सीधा प्रभाव उसकी यादास्त और स्वसन क्रिया पर पड़ता है. इस बात को ध्यान में रखते हुए दुनियाँ के कई देशों ने इस अमानवीय तरीके को अपनाना बंद कर दिया.
१९२२ में जब टेक्सास में पहली बार राबर्ट अर्नेस्ट द्वारा वहाँ के दो बंदियों पर यह तरीका अपनाते हुए कोर्ट में उन्हें पेश कर बयान दिलाया गया तो अभियुक्तों के अपराध स्वीकारने के बावजूद भी न्यायाधीस ने यह कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि नशे की हालत में दिया गया यह बयान अवैधानिक है. १९३० तक ही दुनियाँ के कई देश की न्यायालयों ने नारको टेस्ट से जुटाये गये सबूतों को अमान्य कर दिया और १९५० तक कई देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया. भारतीय कानून में धारा १६४ के अनुसार बिना किसी दबाव के न्यायाधीस के सामने दिये गये ही बयान न्यायालय को मान्य होंगे. इस आधार पर भारतीय न्यायालय परीक्षण के आधार पर जुटाये गये सबूत को मानती भी नही. परन्तु दुनियाँ के सबसे बडे़ लोकतंत्र कहे जाने वाले देश में इस प्रक्रिया का जारी रखना और ड्रग का इश्तेमाल कर शारीरिक यातना अभी तक जारी रही. नारको टेस्ट अवैज्ञानिक इस लिहाज से भी था कि सीरम के प्रयोग के बाद अभियुक्त से प्रश्न पूछने की शैली भी अभियुक्त के जवाब को निर्धारित करती है. यानि इसके मुताबिक जाँचकर्ता वह सब उगलवा सकता है जो वह उगलवाना चाहे. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के इस अहम फैसले के बाद जाँच एजंसियों द्वारा अभियुक्त पर की जा रही अमानवीयता पर फर्क जरूर पड़ेगा. पर सवाल नारको टेस्ट द्वारा अब तक अभियुक्तों पर हो चुकी अमानवीयता और मानवाधिकार हनन का भी है. कुछ मामले ऐसे है जिनमे अभियुक्त को छः-छः बार परीक्षण करवाना पडा़ है. आरुसी हत्या मामले में कम्पाउंडर कृष्णा की दो बार नारको टेस्ट हुई जिसका कोई खास नतीजा सामने नही आया ऐसे में टेस्ट के आधार पर जिन अभियुक्तों की तफ्सीस को आगे बढ़ाया जा रहा होगा उनका क्या होगा.
अब तक भारतीय न्यायालय जाँच में इसकी भूमिका को सही ठहराती रही क्योंकि वह मानती थी कि इससे पुलिस को कुछ पुख्ता सबूत मिलते हैं. पर इसके अलावा अब तक हुए ३०० से अधिक परीक्षण व इससे भी कहीं अधिक की गयी मांगों में न्यायालय व पुलिस का रवैया साफ तौर पर देखा जा सकता है. तेलगी प्रकरण में किये गये नारको परीक्षण के दौरान कई बडे़-बडे़ नेता और आला अधिकारियों के नाम पूछ-ताछ के दौरान लिये गये थे पर अब तक उन सुरागों का पुलिस ने कही इस्तेमाल नही किया है. यहाँ तक कि इन नेताओं और अधिकारियों से पुलिस ने सवाल-जबाब तक नहीं किये. दूसरे मामले में यदि न्यायालय का रुख देखें जिसमें शेख शोहराबुद्दीन के फर्जी मुठभेड़ और कौसर बी की हत्या पर गुजरात की अदालत ने आई.पी.एस. अधिकारियों जिसमे डी.जी.पी. बजारा समेत अन्य छः पुलिस कर्मी भी सम्मलित थे, के नारको टेस्ट की याचिका खारिज कर दिया था. ये घटनाये यह स्पष्ट करती हैं कि अब तक नारको टेस्ट किसका होता रहा है और सबूत किनके लिये जुटाये जाते हैं और कौन हरबार बचा लिये जाते रहे हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अभियुक्तों के साथ हो रहे अमानवीय व अलोकतांत्रिक व्यवहार पर लगाम लगाने की दिशा में देर से ही सही एक महत्वपूर्ण कदम है.

04 मई 2010

मजदूरों का बंधुआ बनना जारी है...

- देवाशीष प्रसून

अगर भारत सरकार या देश के किसी भी राज्य सरकार से पूछा जाये कि क्या अब भी हमारे देश में मजदूरों को बंधुआ बनाया जा रहा है, तो शायद एक-टूक जबाव मिले - नहीं, बिल्कुल नहीं। सरकारे अपने श्रम-मंत्रालयों के वार्षिक रपटों के जरिए हमेशा ऐसा ही कहती हैं। सन 1975 से देश में बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन का कानून लागू है। इस कानून के लागू होने के बाद से सरकारों ने अपने सतत प्रयासों के जरिए बंधुआ मजदूरी की व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंका है, सरकारी सूत्रों से बस इस तरह के दावे ही किए जाते हैं। हालाँकि, हकीकत इसके बरअक्स कुछ और ही है।

गौर से देखें तो आज ठेके पर नौकरी का मतलब ही बंधुआ मजदूरी है। कारपोरेट जगत में भी एक नियत कालावधि के लिए कांट्रेक्ट आधारित नौकरी में अपने नियोक्ता के बंधुआ बनते हुये कई पढ़े-लिखे अतिदक्ष प्रोफेसनल्स देखने को मिल जायेंगे। क्योंकि एक तो उनके पास विकल्पों का आभाव है और दूसरा नौकरी छोड़ने पर एक भाड़ी-भड़कम रकम के भुगतान की बाध्यता। लेकिन श्रम के असंगठित क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी व्यवस्था का होता नंगा नाच दिल दहला देने वाला है।

बीते दिनों, बीस राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के कई शहरों में हुये एक सर्वेक्षण आधारित अध्ययन ने देश में बंधुआ मजदूरी के मामले में सरकारी दावों की पोल खोल रख दी है। असंगठित क्षेत्रों के कामगारों के लिये बनायी गई राष्ट्रीय अभियान समिति के अगुवाई में मजदूरों के लिए काम कर रहे कई मजदूर संगठनों व गैर-सरकारी संगठनों के द्वारा किये गये इस राष्ट्रव्यापी अध्ययन से पता चलता है कि देश में बंधुआ मजदूरी अब तक बरकरार है। भले ही इसका स्वरूप आज के उद्योगों की नयी जरूरतों के हिसाब से बदला है, लेकिन असंगठित क्षेत्रों में हो रहा ज्यादातर श्रम, किसी न किसी रूप में, बंधुआ मजदूरी का ही एक रूप है। बार-बार यह तथ्य सामने आया है कि आज देश के ज्यादातर इलाकों में बंधुआ मजदूरी की परंपरा के फिर से जड़ पकड़ने के पीछे पलायन और विस्थापन का अभिशाप निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

किसी मजदूर को अपना गाँव-घर छोड़ कर दूसरी जगह मेहनत करने इसलिये जाना पड़ता है, क्योंकि उसके अपने इलाके में आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं होते हैं। कहीं सूखा, कहीं बाढ़ और तो किसी के पास खेती के लिए अनुपयुक्त या नाकाफी जमीन, ऐसे में, वे लोग, जो बस खेतिहर मजदूर हैं, अपने इलाकों में खेती के बदतर स्थिति के कारण एक तो मजूरी बहुत कम पाते हैं और दूसरे समाज में विद्यमान सामंती मूल्यों के अवशेष भी उन्हें बार-बार कुचलते रहते हैं। बेहतरी की उम्मीद में ही वे पलायन करने को मजबूर होते हैं। बंधुआ मजदूरी का नया स्वरूप जो सामने आया है, उसमें मजदूरों का सबसे बड़ा हिस्सा पलायन किये हुये मजदूरों का है।

खेती, ईंट-भट्टा, निर्माण-उद्योग और खदानों जैसे कई व्यवसायों में अपना खून-पसीना एक करने वाले मजदूरों को बडे ही सुनियोजित तरीके से बंधुआ बनाया जाता हैं। मजदूरों को नियुक्त करवाने वाले दलाल शुरुआत में ही थोड़े से रूपये बतौर पेशगी देकर लोगों को कानूनन अपना कर्जदार बना देते हैं। रूपयों के जाल में फँसकर मजदूर अपने नियोक्ता या इन दलालों का बंधुआ बन कर रह जाता है।

अधिकतर मामलों में, ये दलाल संबंधित उद्योगों के नजर में मजदूरों के ठेकेदार होते हैं। इन ठेकेदारों से प्रबंधन अपनी जरूरत के मुताबिक मजदूरों की आपूर्ति करने को कहता है और मजदूरों के श्रम का भुगतान भी आगे चलकर इन्हीं ठेकेदारों के द्वारा ही किया जाता है। बाद में ये ठेकेदार या दलाल, आप इन्हें जो भी संज्ञा दें, मजदूरों के श्रम के मूल्यों के भुगतान में तरह तरह की धांधलियाँ करते हैं। नियोक्ता और श्रमिक के बीच में दलालों की इतनी महत्वपूर्ण उपस्थिति मजदूरों के शोषण को और गंभीर बना देती है। दलाल मजदूरों का हक मारने में किसी तरह का कोई गुरेज नहीं करते है, उन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देना तो दूर की बात है। मजदूरों का मारा गया हक ही इन दलालों के लिए मुनाफा है। ऐसी स्थिति में मजदूरों के प्रति किसी भी प्रकार की जिम्मेवारी, जैसे कि रहने और आराम करने के जगह की व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, खाने के लिए भोजन और पीने के लिए पानी को सुलभ बनाना और दुर्घटनाओं के स्थिति में उपचार आदि से अमूमन नियोक्ता अपने आप को विमुख कर लेता है। नियोक्ता इन सब के लिए ठेकेदारों को जिम्मेवार बताता है तो ठेकेदार नियोक्ता को और ऐसे में मजदूर बेचारे बडे बदतर स्थिति में यों ही काम करने को विवश रहते हैं।

सबसे पहले, महानगरों में काम करने वाली घरेलू नौकरानियों का उदाहरण लें। गरीबी और भूख के साथ-साथ विकास परियोजनाओं के चलते विस्थापित हो रहे छत्ताीसगढ़ और झाड़खंड के आदिवासी रोजी-रोटी के लिए इधर उधर भटकते रहते हैं। ऐसे में आदिवासी लड़कियों को श्रम-दलाल महानगरों में ले आते हैं। उन्हें प्रशिक्षित करके दूसरों के घरों में घरेलू काम करने के लिए भेजा जाता है। इन घरों में ऐसी लड़कियों की स्थिति बंधुआ मजदूरों से इतर नहीं होती। अठारह से बीस घंटे रोज मेहनत के बाद भी नियोक्ता का व्यवहार इनके प्रति अमूमन अमानुष ही रहता है और इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन महिला मजदूरों का यौन शोषण भी होता होगा। इतने प्रतिकूल परिस्थिति में भी इनके बंधुआ बने रहने का मुख्य कारण आजीविका के लिए विकल्पहीन होने के साथ-साथ नियोक्ता के चाहरदीवारी के बाहर की दुनिया से अनभिज्ञता भी है। मजबूरन अत्याचार सहते रहने के बाद भी घरेलू नौकरानियाँ अपने नियोक्ता के घर में कैद रह कर चुपचाप खटते रहने के लिए बाध्य रहती हैं, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।

श्रमिकों पर होने वाला शोषण यहाँ रुकता नहीं है। ईंट-भट्टों में काम करने वाले मजदूरों में महिलाओं के साथ-साथ पुरूष और बच्चे भी काम करते हैं। इन्हें भी काम दिलाने वाले दलाल गाँवों-जंगलों से कुछ रूपयों के बदौलत बहला फुसला कर काम करवाने के लिए लाते हैं। ईंट भट्टे का काम एक मौसमी काम है। पूरे मौसम इन श्रमिकों के साथ बंधुआ के तरह ही व्यवहार किया जाता है और इन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देने का चलन नहीं है। और तो और, अध्ययन के अनुसार महिलाओं के प्रति यौन-हिंसा ईंट भट्टों में होने वाली आम घटना है। ईंट-भट्टों में काम करने वाले मजदूरों की खस्ताहाल स्थिति पूरे देश में एक सी है।

अति तो तब है, तब मजदूरों पर यह होता अन्याय एक तरफ सरकारों को सूझता नहीं, दूसरी ओर, खुलेआम सरकार अपने कुछ योजनाओं के जरिए बंधुआ मजदूरी को प्रश्रय भी देती हैं। बतौर उदाहरण लें तो बंधुआ मजदूरी का एक स्वरूप तमिलनाडु में सरकार के प्रोत्साहन पर चल रहा है। बंधुआ मजदूरी का यह भयंकर कुचक्र सुमंगली थित्ताम नाम की योजना के तहत चलाया जाता है। इस योजना को मंगल्या थित्ताम, कैंप कूली योजना या सुबमंगलया थित्ताम के नामों से भी जाना जाता है। इसके तहत 17 साल या कम उम्र की किशोरियों के साथ यह करार किया जाता है कि वह अगले तीन साल के लिए किसी कताई मिल में काम करेगी और करार की अवधि खत्म होने पर उन्हें एकमुश्त तीस हजार रूपये दिये जायेंगे, जिस राशि को वह अपनी शादी में खर्च कर सकती हैं। तमिलनाडु के 913 कपास मिलों में 37000 किशोरियों का इस योजना के तहत बंधुआ होने का अंदाजा लगाया गया है। इनके बंधुआ होने का कारण्ा यह है कि करार के अवधि के दौरान अगर कोई लड़की उसके नियोक्ता कपास मिल के साथ काम न करना चाहे और मुक्त होना चाहे तो उसके द्वारा की गयी अब तक की पूरी कमाई को मिल प्रबंधन हड़प कर लेता है। साथ ही, कैंपों में रहने को विवश की गयी इन लड़कियों के साथ बड़ा ही अमानवीय व्यवहार होता है। इन्हें बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग रखा जाता है, किसी से मिलने-जुलने की इजाजत नहीं होती है। एक दिन में 17-18 घंटों का कठोर परिश्रम करवाया जाता है। हफ्ते में बस एक बार चंद घंटे के लिए बाजार से जरूरी समान खरीदने के लिए छूट मिलती है। इनके लिए न तो कोई बोनस है, न ही किसी तरह की बीमा योजना और न ही किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा। दरिंदगी की हद तो तब है, जब एकांत में इन अल्पव्यस्कों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक में आयी एक खबर के मुताबिक शांति नाम की गरीब लड़की को ढ़ाई साल मिल में काम के बाद भी बदले में एक कौड़ी भी नहीं मिली। उलटे, मिल के मशीनों ने उसे अपाहिज बना दिया और प्रबंधन का यह बहाना था कि दुर्घटना के बाद शांति के इलाज में उसकी पूरी कमाई खर्च हो गई।

बंधुआ मजदूरी की चक्कर में फँसने वाले अधिकतम लोग या तो आदिवासी होते हैं या दलित। आदिवासियों का बंधुआ बनने का कारण उनके पारंपरिक आजीविका के उन्हें महरूम करना है। तमिलनाडु की एक जनजाति है इरुला। ये लोग पारंपरिक रूप से सपेरे रहे हैं, लेकिन साँप पकड़ने पर कानूनन प्रतिबंध लगने के बाद से कर्ज के बोझ तले दबे इस जनजाति के लोगों को बंधुआ की तरह काम करने के लिए अभिसप्त होना पड़ा है। चावल मिलों, ईंट-भट्टों और खदानों में काम करने वाली इस जनजाति को हर तरह के अत्याचारों को चुपचाप सहना पड़ता है। तंग आकर जब रेड हिल्स के चावल मिलों में बंधुआ मजदूरी करने वाले लगभग दस हजार लोगों ने अपना विरोध दर्ज किया तो उन्हें मुक्त कराने के बजाए एक सक्षम सरकारी अधिकारी ने उन्हें नियोक्ता से कह कर कर्ज की मात्रा कम करवाने के आश्वासन के साथ वापस काम पर जाने को कहा। सरकारी मशीनरी की ऐसी भूमिका मिल मालिकों और अधिकारियों की साँठ-गाँठ का प्रमाण है।

कुल मिला कर देखे तो बंधुआ मजदूरी के पूरे मामले में एक बहुत बड़ा कारण आजीविका के लिए अन्य विकल्पों और अवसरों का उपलब्ध नहीं होना है। साथ ही, अब तक जो हालात दिखे हैं, उनके आधार पर सरकारी लालफीताशाही के मंशा पर भी कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। बंधुआ मजदूरी का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण स्थायी नौकरी के बदले दलालों के मध्यस्था में मजदूरों के श्रम का शोषण करने की रणनीति अंतर्निहित है। ऐसे में संसद और विधानसभा में बैठ कर उन्मूलन के कानून बनाने के अलावा सरकार को इसके पनपने और फलने-फूलने के कारणों पर भी चोट करना पड़ेगा।

संप्रति: पत्रकारिता एवं शोध

संपर्क-सूत्र: रामायण, बैद ले आउट, सिविल लाइन्स, वर्धा-442001

02 मई 2010

पंकज विष्ट कों एक खुला ख़त

समयांतर के मार्च, 2010 अंक में नवीन पाठक के नाम से आपने पृश्ठ 39 पर लिखा है:

... इधर उभरे वामपंथी प्रकाषनगृहों से मुख्य तौर से वे किताबें नए सिरे से छप कर आई हैं जो सोवियत रूस के जमाने में प्रगति प्रकाषन मास्को से छपती थीं. इनकी लोकप्रियता देखते हुए यह तो कहा ही जा सकता है कि हिंदी में वामपंथी साहित्य का बड़ा बाजार है. कुछ ऐसे प्रकाषक भी थे जो साहित्य के नाम पर अनुवादों से पटे थे और ये अनुवाद 19 वीं और बीसवीं सदी के अंग्रेजी के लेखकों की रचनाएं थीं. यह अच्छा धंधा है क्योंकि इसमें किसी को रॉयल्टी नहीं देनी होती. जहां तक अनुवादों की गुणवत्ता का सवाल है उन पर जो न कहा जाए थोड़ा है...

यह जानने की बलवती इच्छा हुई कि --

1. प्रथम टिप्पणी किस / किन वामपंथी प्रकाषनों के बारे में है?
2. आपने पुस्तकों के बड़े ‘बाजार’ षब्द का उल्लेख किया है. तो यह बताएं कि बाजार क्या होता है, उसके घटक क्या होते हैं, प्रोडक्षन से लेकर और इस्तेमाल तक किसी वस्तु के वितरण में प्रयुक्त शृखला किस स्थिति में बाजार कहलाती है? और अंत में यह बताएं कि 10 प्रांतों के 50 करोड़ की हिंदी भाशी आबादी के बीच पुस्तकों के इस तथाकथित बाजार की ‘स्ट्रेंथ’ कितनी है? यह ‘बाजार’ कितनी प्रतियों या कितने लाख / करोड़ रुपयों का है?
3. यह सारी बातें आपने विष्व पुस्तक मेले के संदर्भ में कही हैं, जो दो साल में एक बार 9 दिनों के लिए होता है. बेषक इस मेले में स्टॉलों पर भीड़ दिखती है, और पुस्तकें भी खरीदी जाती हैं. परंतु इसका दूसरा यह पहलू यह भी है कि ‘बाजार’ किसी भी उत्पाद को षहर, गांव, कस्बे तक उसके ग्राहक के लिए सुलभ बनाता है. और मान्यवर बाजार का अर्थ मार्केट प्लेस मात्र नहीं होता, यह किसी उत्पाद के वितरण की पूरी प्रक्रिया होती है, जिसमें संलग्न ढेरों परिवारों का पालन पोशण इस पर निर्भर होता है. तो दूसरा पहलू यह है मान्यवर, कि गांव कस्बे तो दूर बड़े-बड़े षहरों तक में हिंदी की किताबें उपलब्ध नहीं हैं, वामपंथी पुस्तकों की तो बात ही छोड़िए. बहुत से लोगों के विष्व पुस्तक मेले में किताबें खरीदने का एक मुख्य कारण यह भी है कि बाद में ये किताबें उन्हें सहज रूप से मिल नहीं पाएंगी. विष्व पुस्तक मेले की भीड़ और पाठकों द्वारा पुस्तक खरीद से कुछ भी सिद्ध नहीं होता, मान्यवर.
4. जहां तक मेरी जानकारी है, यदि हिंदी पुस्तकों के व्यापार की बात की जाए तो यह आपकी ही भाशा में दो तरीके के ‘बाजारों’ में गतिषील है --
1- वैयक्तिक पाठकों के बीच
2- पुस्तकालय खरीद के देषव्यापी नेटवर्क के बीच जिसकी षक्ति में हिंदी के राश्ट्रभाशा होने के कारण सरकारी पैसा बड़े पैमाने पर षामिल है.

5. तो मान्यवर, यदि आपका यह लेख और इसमें की गई आप्त टिप्पणियों का स्रोत यदि सचमुच उस मनस् में है जो हिंदी पुस्तकों की दुनिया और इससे पाठक के संबंध को लेकर जेनुइन तरीके से चिंतित है तो आपको इस दूसरे विशय पर लिखना चाहिए -- यानी स्पश्ट रूप से इस विशय पर कि हिंदी पुस्तकों के नाम पर पाठकों से छल करते हुए किस तरह की थोक पुस्तकालय खरीद की धंधेबाजी और कालाबाजारी चल रही है और इसमें हिंदी के बड़े बड़े लेखक और संस्थाएं सहअभियुक्त हैं. जबकि आप इस एकमात्र करणीय काम को छोड़ कर ठीक उल्टा काम कर रहे हैं, कि जो भी लोग निजी प्रयासों से हिंदी पुस्तकों और पाठकों के बीच एक सेतु बनाने के संघर्श में लगे हैं, आप उनका अप्रत्यक्ष रूप से चरित्र-हनन कर रहे हैं.
6. जहां तक मेरी जानकारी है आप जब धंधा, बाजार आदि षब्दों का इस्तेमाल करते हुए हिंदी के कुछ प्रकाषनों की आलोचना कर रहे हैं, तब आपकी बातों से यह स्पश्ट नहीं हो पाता कि आप उपरोक्त दो तरह के बाजारों में से किस बाजार की बात कर रहे हैं? क्योंकि यह स्पश्ट है कि सरकारी खरीद का बाजार अरबों रुपए का है, और बहुत बड़ा है और हिंदी के कतिपय बड़े प्रकाषकों का इस पर पूर्ण एकाधिकार है. बेषक यह एकाधिकार बड़े प्रकाषकों का है, परंतु इसके संचालन की एक अत्यंत प्रभावी धुरी हिंदी के स्वनामधन्य बड़े लेखकों का एक षक्तिषाली समूह भी है, जिनमें कई आपके मित्र भी हैं, और एक तो अत्यंत घनिश्ठ और समयांतर के अतिथि संपादक भी.
7. आप जिन प्रकाषकों को लक्षित कर रहे हैं, वे इस भ्रश्ट सरकारी खरीद से बिल्कुल बाहर के संघर्शषील और सचमुच मिषन की भावना से काम करने वाले प्रकाषक हैं.
8. अब आप यदि प्रकाषन, पुस्तक खरीद और पाठक के इस मुद्दे पर सचमुच ईमानदार हैं, और सिर्फ सनसनी पैदा कर समयांतर के एक प्रतिबद्ध पाठक-समुदाय के बीच झूठी आत्मगरिमा से संतुश्ट नहीं हो जाना चाहते तो आपका दायित्व है और आपके लिए अपने संपर्कों, हिंदी लेखन-प्रकाषन से लंबी संबद्धता के कारण यह बहुत आसान भी है कि थोक सरकारी खरीद के इस बाजार के बारे में -- इससे गलत ढंग से लाभान्वित होने वाले प्रकाषकों और निष्चय ही इसके जरिए ही षक्तिषाली होने वाले लेखकों / बुद्धिजीवियों पर तथ्यपरक लेख समयांतर में लिखें और बताएं कि कैसे हिंदी में नकली लेखकों का पूरा एक वर्ग उभर आया है, कैसे प्रकाषकों को इस बात से कुछ लेना देना नहीं रह गया है कि वह जो छाप रहे हैं, वह सचमुच पढ़ा जाने लायक / बिकने लायक है या नहीं. और इस पूरी तफतीष में यह भी लिखें कि समयांतर में छपे आपके लेखों का पुस्तकाकार संग्रह पुस्तक रूप में छापे जाने की क्या आवष्यकता थी? और वह भी हार्डबाउंड में और इसकी मंहगी कीमत का खरीदार कौन था? आप अपनी ही सिर्फ इस एक किताब के जरिए हिंदी के पूरे पुस्तक बाजार का यथातथ्य चित्र खींच सकते हैं.
9. हिंदी पुस्तकों की थोक सरकारी खरीद के रैकेट का बाजार कितना है, उसमें हिंदी के कौन कौन से लेखक षामिल हैं और इस थोक खरीद की चयन-समितियों में बैठकर वे किन प्रकाषकों को उपकृत करते हैं -- यदि इस पर पड़ताल कर थोड़ा लिख सकें तो हिंदी के वर्तमान परिदृष्य में एक महत्वपूर्ण काम होगा. इस संबंध में आपको काफी जानकारियां थोक सरकारी खरीद के अरबों रुपए का कारोबार जिस मानव संसाधन मंत्रालय के तहत आता है उसके पूर्व मंत्री अर्जुन सिंह पर दो दो किताबें लिखने वाले और उस मंत्रालय के उस संस्थान -- राजा राममोहन राय फाउंडेषन, कोलकाता, जो अरबों रुपए की सरकारी खरीद का संचालक है की समिति में रह चुके आपके मित्र, समयांतर के लेखक और समयांतर के अतिथि संपादक श्री रामषरण जोषी जी प्रचुर मात्रा में मुहैया करवा सकते हैं और वे प्रकाषक भी ये जानकारियां उपलब्ध करवा सकते हैं, जहां से स्वयं आपकी मौलिक किताबें छपी हैं.
10. यदि आप सचमुच चिंतित हैं, तो हिंदी में पुस्तक खरीद के जो-जो रैकेट हैं, उन्हें उजागर करें न कि अपनी सीमा भर हिंदी में कुछ बेहतर करने का संघर्श कर रहे प्रकाषकों पर एकसार ढंग से लाठी घुमा दें. अब आप बताएं कि --
11. अनुवाद से पटे ये प्रकाषक कौन हैं?
12. ये अनुवाद से पटे प्रकाषक क्या सचमुच इसलिए किताबें निकाल रहे हैं कि इन पर रॉयल्टी नहीं देनी पड़ती और यह अच्छा धंधा है?
13. आपको यह कैसे पता कि किन किताबों पर रॉयल्टी दी जाती है और किन पर नहीं, और क्या आपने इन प्रकाषनों द्वारा छापी गई प्रत्येक किताब के बारे में आवष्यक तफतीष कर ली है?
14. हिंदी की मौलिक पुस्तकों पर आने वाले खर्च से इन किताबों पर आने वाले खर्च कम नहीं कई गुना ज्यादा पड़ते हैं -- क्या इस तथ्य को आप जानते हैं? और इस तथ्य को भी कि हिंदी की मौलिक किताबों को सरकारी खरीद में बिकवाने के लिए उसका लेखक या उसके संपर्क मददगार हो सकते हैं, परंतु ‘19 वीं सदी का’ कोई लेखक या उसका कोई षागिर्द अपनी पुस्तक भारत की राश्ट्रभाशा स्कीम की थोक खरीद में नहीं बिकवा पाएगा. इस बात को और स्पश्ट करना चाहें तो आपकी ही पत्रिका में नियमित विज्ञापन देने वाले ग्रंथषिल्पी की 10 किताबें चुनें और उसी वर्श उतने ही पेज की हिंदी के किसी बड़े स्थापित ‘मौलिक कृतियों’ के प्रकाषक की 10 मौलिक किताबें चुनें और उन पर आई लागत और उनकी बिक्री की तुलना करें. विष्वास करें चित्र अपने आप स्पश्ट हो जाएगा. लंतरानियां, तथ्यों का स्थानापन्न नहीं होतीं.
15. हिंदी में मौलिक या अनूदित सभी प्रकार की गंभीर साहित्यिक पुस्तकें आपके अनुमान से कुल कितनी बिक जाती होंगी?
16. आपने अपने लेख में एक तरह से अनूदित साहित्य के बरक्स हिंदी के समकालीन मौलिक साहित्य को रखने की चेश्ट की है. हालांकि इसकी न तो कोई जरूरत थी और न ही संदर्भ. दरअसल दुख की बात तो यह है कि हिंदी में विष्व भर का अनूदित साहित्य अब भी बहुत कम है. जिस बड़े पैमाने पर उसका अनुवाद और प्रसार होना चाहिए था, वह नहीं हुआ. बहरहाल यह एक गंभीर और व्यापक विशय है. इस पर फिर कभी. फिलहाल तो आप सिर्फ इतना जनहित में बता दें कि हिंदी की सभी विधाओं में पिछले पांच वर्शों में वे कौन सी महत्वपूर्ण मौलिक कृतियां आई हैं (कृपया सभी विधाओं से दस-दस कृतियों का नाम देने का कश्ट करें) महोदय जान पड़ता है हिंदी के समकालीन मौलिक साहित्य को लेकर आप काफी उत्साही हैं, पर यह उत्साह आप की किसी भी सार्वजनिक गतिविधि में कभी दिखाई नहीं पड़ा. और क्या यह सच नहीं है कि हिंदी का समकालीन मौलिक लेखन एक गंभीर संकट काल से गुजर रहा है. यह भी एक वृहत्तर विशय है. इस पर भी फिर कभी.
17. हिंदी प्रकाषन, पाठक, लेखक की वास्तविक समस्याएं क्या हैं? उनका समाजिक-सांस्कृतिक कारण क्या है? ये गंभीर सवाल हैं, कृपया इनसे गंभीरता से ही मुखातिब हों, और सच्चे हृदय से उपजी वास्तविक चिंता के साथ, न कि हिसाब चुकाने की भावना से प्रेरित हो कर या सस्ती लोकप्रियता पाने के इरादे से.

-आलोक श्रीवास्तव
मुंबई

27 अप्रैल 2010

तुम्हारी चुप्पियाँ और उनकी हत्यायें

वहाँ की खबरें नहीं रही हैं बेसक ये खबरें हत्या और कत्ल के रूप में आयेंगी पर युद्ध की खबरों के चेहरे ऐसे ही होते हैं. उनके लिये और उन सबके लिये सूचना क्रांति असफल हो चुकी है, जो जंगलों की रक्षा महज खनिज संसाधनो की लूट के लिये नहीं करते, जिनके लिये आदिवासियों को अपनी जमीन पर जीने का उतना ही हक है जितना दिल्ली में प्रधानमंत्री को. उन्हें अपनी सुरक्षा का भी हक है जबकि बारूद और बंदूक आदिवासियों की खोज नहीं रहे.
उन तक संसद में महिला आरक्षण की चर्चायें वर्षों बाद तक नही पहुंच पायेंगी और पहुंचने के कोई अर्थ भी नहीं, उन्हें शायद दिल्ली का नाम ही इसलिये पता है कि वहीं कहीं के आदेश पर सेना उनकी महिलाओं के स्तन काटने के लिये भेजी जाती है और दो वर्ष के बच्चों की उंगलिया भी, कहीं ये उंगलियाँ बड़ी होकर तीर चलाने लायक हो जाय कि देश का भविष्य इन उंगलियों से असुरक्षित है. आस-पास जब हत्या या हत्या का भय इतना फैला हो जितना जंगल, तो जीने के लिये भूख मिटाने की भी जरूरत कितनी कम होती है. भय से उपजा क्रोध शरीर में सिथिलता नहीं आने देता. भूख से उनके मौत की ख़बर कितनी पीछे छूट गयी है, मलेरिया से हो रही मौतें और सूखे की तबाही दब सी गयी है. शिक्षा के बारे में बात करना कितना हास्यास्पद होगा जबकि स्कूल सेना के कैम्प बन चुके हैं.
२५ साल से एक पूरी आबादी ने इस तथाकथित सभ्य दुनिया से हत्या का दंश ही झेला है. जिस समाज को तुम पिछड़ा कहते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करना चाहते हो उसका पिछड़ापन क्या यही है कि वह अपनी संस्कृति को बचाना चाहता है, बाजार में नहीं ढालना चाहता, जबकि बाजार कोसों दूर रहते हुए उसे अपने दुकान पर ला रहा है. रायपुर की सड़कों पर बस्तर की नकली कलायें सजाइ जा रही हैं. एक महिला अपनी पीठ पर लकड़ी का गट्ठर और कांख में बच्चे को दबाये हुए जा रही है, तीर कमान लिये एक आदिवासी की निगाह कुछ ढूंढ़ रही है. जंगल से उनकी तमाम मुद्रायें तक उठा लाई गयी हैं. रायपुर की सड़कों पर क्या वे सच में इतनी सहज होंगी. यह सहजता उसी वक्त छीन ली गयी थी जब फूलोबाई को जलावन लकड़ी लाने के जुर्म में पीटा गया. जिस समाज के नकलीपन को लाकर राजधानी की सड़क पर खड़ा किया गया है, उसकी असली दुनिया को जलाकर कितना तबाह किया गया पिछले सालों में, कि खुद पता नहीं उन्हें जंगल में कितने ठिकाने बदलने पड़े. शान्ति अभियानों के झूठ शायद अब किसी से छुपे हुए नहीं रहे. वे गाँव, इतिहास लिखे जाने के इंतजार में हैं जिन्हें बार-बार जलाया गया, पहाड़ों में छुपाये गये जिनके अनाजों को इसलिये नष्ट किया गया कि लोगों को मजबूरन सरकारी कैम्पों पर निर्भर होना पड़े. अब जबकि वहाँ सेनायें कूच कर चुकी हैं और जंगलों को घेरा जा रहा है कितने चुप हैं अखबार सिवाय यह कहने के कि अंबानी दुनिया के पाँच सबसे धनी लोगों में शामिल हो गये हैं.
बस्तर के कोंडा, तुरपुरा और कनेरा गाँवों को छोड़कर जलधर, मनकू और पैतू अपनी कमसिन उम्र में ही रायपुर गये हैं, इनकी कुशलता इतनी ही है. बाकी ये इतने अकुशल हैं कि न्यूनतम मजदूरी का एक हिस्सा ही इन्हें मुनासिब हो पाता है. इन्हें न्यूनतम मजदूरी के बारे में कोई जानकारी नहीं यह उनके मजदूर बनने की शायद पहली पीढ़ी है जो इन बड़ी मशीनों के बीच अपने को सहज कर रही है. स्पंज आयरन की फैक्ट्रीयों से उड़ती धूल और जंगलों की हवाओं का फर्क इन्हें कितना सालता है, यह सोचने की मोहलत इन्हें नहीं ही मिल पाती होगी. बड़ी मशीनों के बीच इनके काम के घंटे भी बड़े हैं और बारह घंटे काम करने के बाद वक्त इतना ही बचता है कि उसे नींद साथ ही गुजारा जा सके. अपने रंग और गंध के साथ किसी भी बाहरी आदमी से इन्हें मिलने में संकोच है. सिलतरा की सैकड़ों फैक्ट्रीयों के अहाते के किसी कोने में इनकी झुग्गियाँ बना दी गयी हैं और ठेकेदारों के रहम--करम पर ये सब जीने को मजबूर हैं, बस्तर लौटने का खयाल इन्हें मजदूरी मिलने के साथ हर बार आता है और उनमे से कोई एक जाकर सबके हिस्से का थोड़ा-थोड़ा बस्तर ले आता है. इनके लिये अपना गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर जाना एक नयी शुरुआत है इससे पहले बस्तर ने इन्हें छोड़ा था इन्होंने बस्तर को, सूखे में जब छत्तीसगढ़ दूसरे राज्यों के ईंट भट्ठों पर होता, तब भी इस जिले के आदिवासियों कों जंगलों ने कहीं जाने से बचा लिया. यह आंकड़ा शायद कभी दर्ज नहीं किया जा सकेगा कि देश में बनाये गये कंक्रीट के मकानों में जो ईंट लगी है, देर तक जलने के बावजूद छत्तीसगढ़ी पसीने की महक उसमे बची हुई है.
तथाकथित सभ्य समाज ने अपनी पहचान के खिलाफ लड़ना छोड़ दिया और अब तो इनकी सभ्यता उस देश की सभ्यता में लगभग ढल चुकी है जो बर्बर युद्ध के जरिये दुनिया के तमाम देशों को लकतंत्र का पाठ पढ़ा रहा है. क्या आदिवासियों को सभ्य बनाने के लिये, उनके जमीन पर कब्जेदारी के लिये, देश की फौज द्वारा छेड़े गये गृहयुद्ध में कोई फर्क नजर आता है भले ही स्थानों का नाम इराक, अफगान या बस्तर हों.

19 अप्रैल 2010

सरकार अपना भरोसा खो चुकी है

जिंदगी की कीमतें रुपयों से नहीं चुकायी जा सकती। चाहे वह 40 लाख हो या उससे भी अधिक। आदिवासियों की जिंदगी की भी और सेना के जवानों की भी। न ही किसी की जिंदगी को कम करके आंका जा सकता है – पर यह होता रहा है। स्थान, व्यक्ति, वर्ग के लिहाज से घटनाओं की महत्ता कम या ज्यादा हो ही जाती है। यही विभेद है। ये वर्गीय विषमता की मानसिकता व वर्गीय संरचना की निष्पत्तियां हैं। जहां एक आदिवासी की जिंदगी, एक जवान की जिंदगी, एक नेता की जिंदगी और एक कॉर्पोरेट की जिंदगी, सबकी जिंदगियां अलग-अलग अहमियत रखती हैं चूंकि इनके काम स्तरीकृत हैं, उच्च और निम्न आधारों पर, कुछ-कुछ चतुर्वर्णीय व्यवस्था जैसा ही लगता है, हमारा लोकतंत्र भी।
ग्रीनहंट ऑपरेशन के दौरान दांतेवाड़ा में “शहीद” हुए 76 जवान और छह महीने में “मारे” गये 170 आदिवासी, जिनमें माओवादी भी शामिल हैं – इसके पीछे की वजह हमें तलाशनी होगी। जबकि इस घटना के बाद सरकार युद्ध की भाषा बोलने लगी है। क्योंकि किन्‍हीं भी आधारों पर यह देश के मानव संसाधन व आर्थिक संसाधन की क्षति का ही मामला बनता है और अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध, जो अघोषित रूप से जारी था, जिसे घोषित करने की मनोदशा में सरकार दिख रही है, अलोकतांत्रिक है।
जब भी यह कहा जाता है कि आदिवासी मारे जा रहे हैं, तो मानवाधिकार कार्यकर्ता व अन्य सामाजिक संगठनों के लोगों की आवाजें सरकार के खिलाफ निश्चित तौर पर बुलंद हो जाती है और आम जनमानस की भी यही धारणा बन चुकी है – पर माओवादियों का मारा जाना सहज है। मीडिया के लिए भी, मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए भी और उन लोगों के लिए भी, जो इन जंगलों से दूर हैं यानी हम सबके लिए। दरअसल इस पूरी प्रक्रिया में माओवादी अछूत की तरह हैं। बीते जमाने के वे अछूत जिन पर किसी तरह की प्रताड़ना, प्रताड़ना के दायरे से बाहर थी। जवानों का मारा जाना दुखद है। आदिवासियों का मारा जाना भी दुखद है। पर अगर आदिवासी ही माओवादी हों तो, जो कि है भी आदिवासियों का सशस्त्रीकरण व राजनीतिकरण ही उनका माओवादी होना है। पर माओवादियों पर जब भी बात होती है तो वह इस रूप में कि वे देश के भूभाग से कहीं बाहर की कोई प्रजाति हैं। जबकि ग्रीनहंट में मारे गये व पिछले कुछ वर्षों में चलाये गये तमाम अभियानों में जिन माओवादियों को निशाना बनाया गया है उनमें अधिकांश आदिवासी ही हैं। तो क्या अंततः आदिवासियों का ही कत्लेआम हो रहा है? यह एक कठिन सवाल है, जिसके उत्तर एक घटना को केंद्र में रख कर नहीं तलाशे जा सकते बल्कि पिछले 60 वर्षों के इतिहास का पन्ना हमें पलटना ही पड़ेगा। यदि इतना पीछे न भी जाएं तो 1990 के बाद जो आर्थिक सुधार हुए, उन सुधारों की खामियां हमे जरूर पहचाननी पड़ेगी। अब सवाल आदिवासियों के मारे जाने का नहीं, माओवादियों के मारे जाने का नहीं बल्कि आदिवासियों के माओवादी बनने की प्रक्रिया का है। क्योंकि माओवादियों का मारा जाना उन आदिवासियों का मारा जाना है जिन्होंने शस्त्र उठा लिये हैं, जिन्होंने अपने क्षेत्र में अपनी सरकारें बना ली हैं, भारत सरकार से अलग, जिन्हें उन लाखों आदिवासियों का समर्थन प्राप्त है जो जंगलों में रहते हैं और मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह गये हैं। यह अलग सरकार का चुनाव, अलग संरचना का निर्माण, ठीक वैसा ही है जैसा कि हम संसद को चुनते हैं, जैसा हमारे सांसदों को हमारा समर्थन प्राप्त है, दोनों की प्रणालियां कार्य करने के तरीके में फर्क हो सकता है पर शायद इसमे कोई फर्क नहीं दिखता कि सरकार वही चला रहा है, जिसका जनता समर्थन कर रही है। दंडकारण्य में भी और दिल्ली में भी। बावजूद इसके कि सरकार चलाने के तौर तरीके अलग-अलग हैं। मसलन पानी पीने के लिए वे तालाब खोदते हैं, कुंए खोदते हैं, तो हमारी सरकार एक और बोतलबंद पानी की कंपनी खोल देती है।
ऐसे में समस्या एक संप्रभु राष्ट्र में दो समानांतर सरकारों के होने का है, जो एक दूसरे को अमान्य घोषित कर रही हैं और शायद संघर्ष भी इसी बात का है। यह राज्य की वैधता की लड़ाई बन गयी है। वहां के आदिवासी भारत सरकार को वैध मानने से इनकार कर रहे हैं। भारत सरकार उनके द्वारा बनायी “जनताना सरकार” को। और खतरा इसी बात का है, जिसे सरकार सबसे बड़ा मान रही है कि यदि यही भ्रूण अलग-अलग हिस्सों में निर्मित होता गया, लोग सरकार से असंतुष्ट हो अपनी सरकारें बनाते गये, अपनी संरचना बनाते गये तो यह भारत राष्ट्र और संसदीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए खतरा होगा। संसदीय लोकतंत्र के लिए माओवादियों के शस्त्र उठाने से ज्यादा खतरा उस संरचना से है, जो वे निर्मित करते जा रहे हैं या जिसे उन्होंने मुक्त क्षेत्र में निर्मित कर रखा है।
1980 से लेकर अब तक भारत सरकार द्वारा अलग-अलग तरीके से कई प्रयास किये जा चुके हैं, विकास की योजनाएं चलाकर, सैन्य अभियान चलाकर, शांति अभियान “सलवा-जुडुम” के जरिये और अब ग्रीन हंट आपरेशन। ये अभियान एक तरफ तो विफल हुए हैं, दूसरी तरफ आदिवासी और भी सशस्त्रीकृत हुए हैं। भारतीय सेना जितने विकसित तकनीक के शस्त्रों का प्रयोग करती है, उनसे छीनकर ये भी अपने को समृद्ध बनाते गये हैं। आखिर इन अभियानों की विफलताओं के क्या कारण रहे हैं, क्या नये अभियान चलाने से पूर्व इन विफल अभियानों का ठीक-ठीक मूल्यांकन किया गया? शायद नहीं। यदि किया गया होता तो आदिवासियों का सशस्त्रीकरण और न बढ़ता जो सलवा जुड़ुम जैसे बर्बर अभियानों के बाद और भी बढ़ा। इन कार्यवाहियों ने आदिवासियों को और भी असुरक्षित बनाया व सुरक्षित होने के लिए और भी ज्यादा शस्त्रीकृत होने पर मजबूर किया। उन पर की गयी क्रूरताओं ने उनमें और भी ज्यादा असंतोष पैदा किये। अपने ऊपर हुए जुल्मों से वे और भी उग्र हुए। इसी उग्रता को सरकार ने उग्रवादी करार दिया। क्या उनका उग्र होना नाजायज था? अगर किसी आदिवासी परिवार ने किसी माओवादी को खाना खिला दिया, रास्‍ता बता दिया, तो इसके लिए उस परिवार के सदस्‍यों को पीटा जाना या उनके घर जला देना कहां तक जायज है?
यही वे कार्यपद्धतियां रही हैं, जिन्होंने आदिवासियों के मन में सरकार के प्रति असंतोष पैदा किये और माओवादियों से उनकी निकटता बनती गयी। क्योंकि माओवादी उनके जीवन की मूलभूत चीजों, रोजगार और तेंदू पत्ता की कीमतों, खेती की उनकी जमीनों व अन्य संसाधनों को मुहैया कराने व व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए एक संरचना, संघर्ष के साथ विकसित करते गये। उनके लिए एक अलग ढांचा विकसित किया जो सरकार के ढांचे से अलग जंगल की परिस्थितियों के अनुकूल था। न्यायिक व्यवस्था, सुरक्षा समिति, कृषक समिति आदि। इस ढांचे ने आदिवासियों में माओवादियों के प्रति विश्वास पैदा किया। माओवादी और आदिवासी पानी में मछली इसी तरह हुए, जिसे वे स्वीकार करते हैं। जिसमें सरकार विफल रही क्योंकि सरकार जिस तरह का विकास चाहती थी, उसके पैमाने अलग थे और आदिवासियों को उनकी परिस्थिति के मुताबिक अस्वीकार थे। टाटा और एस्सार के लिए लाखों आदिवासियों को अपने घर से विस्थापित होना अस्वीकार था और सरकार विकास के नाम पर यही कर रही थी। आदिवासी समाज का विकास निश्चित तौर पर इन कंपनियों की स्थापना से नहीं होना है, बल्कि यह उनके शोषण की एक और कुंजी ही बनेगी, उनकी जिंदगी में और भी खलल बढ़ेगा। वर्षों पूर्व की उनकी संस्कृति को यह नष्‍ट ही करेगी और इन सबके लिए आदिवासी समाज तैयार नहीं है।
आदिवासियों का विश्वास जीतने के बजाय उन पर क्रूर कार्यवाहियां की जा रही हैं। जिस दिन दंतेवाड़ा में 76 जवानों को मारा गया, उसके एक दिन पहले ही दंतेवाड़ा के तोंगपाल थाना के सिदुरवाड़ा गांव में 26 आदिवासी महिलाओं को जगदलपुर से आये कोबरा बटालियन के 200 जवानों ने पीटा, जिसमें महिलाओं के हाथ तक टूट गये। जबकि इन महिलाओं का दोष यह था कि जब कुछ ग्रामीणों को नक्सली समर्थक बताकर जवान ले जाने लगे तो इसका इन महिलाओं ने विरोध किया। क्या इन कार्यप्रणालियों से सरकार आदिवासियों में विश्वास पैदा कर सकती है। दमित बनाकर वह उन पर शासन जरूर कर सकती है पर यह गैरलोकतांत्रिक संरचना का ही हिस्सा होगा बल्कि यह आदिवासियों को सरकार के खिलाफ ही खड़ा करेगा। वहीं दूसरी तरफ माओवादियों ने आदिवासियों में इस विश्वास को इस हद तक अर्जित किया कि उन्होंने जिस मुक्त क्षेत्र का निर्माण किया, उसकी सुरक्षा के लिए आदिवासी शस्त्र लेकर अवैतनिक कार्य करने लगे। जैसे यह उनके अपने राज्य, उनकी अपनी जमीन व जमीन की रक्षा का मसला हो। निश्चित तौर पर यह एक सामुदायिक चेतना के तहत ही संभव था।
भारत सरकार रक्षा बजट पर सर्वाधिक खर्च करती है और आज भी यह स्थिति नहीं है कि वह अवैतनिक सेवा देश की जनता से ले सके। कारण कि जनता को यह महसूस होना ही चाहिए कि देश उसका उतना ही अपना है, जितना किसी नेता का। जितना प्रधानमंत्री का। जितना व्यवसायियों का। पर क्या उन्हें यह महसूस हो पाता है? क्या न्यायिक व्यवस्था में उन्हें बराबरी का न्याय मिल पता है? शायद नहीं। लिहाजा यह मामला सरकार की कार्यपद्धति के साथ उसकी संरचना से निर्मित हो रहा है। जहां सरकार एक बड़े वर्ग को बेहतर संरचना देने में असफल हुई है।
ग्रीनहंट जैसे ऑपरेशन या वायुसेना के प्रयोग से इस समस्या का समाधान संभव नहीं दिखता। सिवाय इसके कि बड़ी और बड़ी संख्या में आदिवासियों का कत्लेआम ही होगा, और प्रतिरोध के तौर पर सेना के जवानों के भी क्षत-विक्षत होने की संभावना बनती है। इस तरह की दमनपूर्ण कार्यवाहियों के बजाय सरकार को आदिवासियों की मूल समस्या को उनकी जमीनी हकीकत के मुताबिक चिन्हित करना होगा और वहां पर विकास की उन योजनाओं को चलाना होगा जो आदिवासियों के जीवन से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। मसलन वहां की स्वास्‍थ्‍य सेवाओं को बहाल करना होगा, स्कूल को सेना का कैंप बनाने के बजाय वहां शिक्षकों की नियुक्ति कर शिक्षा का बेहतर प्रबंध करना होगा ताकि वह विश्वास आदिवासियों में अर्जित किया जा सके जो कि माओवादियों ने अर्जित किया है। ♦ चंद्रिका

12 अप्रैल 2010

दंतेवाड़ा से भोथरी होती संवेदना

दंतेवाड़ा में ऑपरेशन ग्रीन हंट को अंजाम देने निकले सीआरपीएफ के 75जवानों का माओवादी हमले में मारा जाना माओवादियों पर भारी पड़ने वाला है. गृहमंत्री पी चिदंबरम अब सवाल करने पर यह बता रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के उस हिस्से में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं करने के बारे में पुनर्विचार करेंगे.

इससे घटना से दो दिन पहले लालगढ़ में जब पी चिदंबरम माओवादियों को कायर बता रहे थे ठीक उसी दिन माओवादियों ने उड़ीसा में सुरक्षा बल के दस जवानों को मार डाला. अब इस बड़े हमले को कई लोग चिदंबरम के कहे का जवाब मान रहे हैं. लेकिन ऐसा मान लेना मुश्किल लगता है कि माओवादियों ने सीआरपीएफ के एक बटालियन को इसलिए उड़ाया क्योंकि उन्हें गृहमंत्री का जवाब देना था. सवाल-जवाब की स्थिति तब बनती है जब एक प्लेटफार्म पर बैठकर बात की जाए. लालगढ़ के इस घोषणा से गृहमंत्रालय राजनीतिक लाभ की स्थिति में आना चाहती थी कि उसने अपनी तरफ से बातचीत की छूट दे रखी है और माओवादी कायर की तरह दुबके हुए है और यह भी कि कायरता के मारे दुबकना किसी डर का परिणाम नहीं है बल्कि वे लोकतांत्रिक स्पेस का उपयोग करना ही नहीं चाहते. पिछले कुछ दिनों में गृहमंत्रालय की तरफ़ से बातचीत करने की घोषणा को तमाम जगहों से दोहराया गया है. ख़बर यहां तक आई थी कि माओवादी महाश्वेता देवी और अरुंधति राय की मध्यस्थता में बातचीत करने को तैयार है. फिर ये उपक्रम पार्श्व में चले गए और कहीं पुलिस ने माओवादियों को गोली मारी तो कहीं माओवादियों ने पुलिस कैंप को जलाया और रेल की पटरी उड़ाई. ऐसे में गृहमंत्री ने लालगढ़ से पुनः बातचीत का प्रस्ताव रखा. माओवादियों ने बातचीत के लिए सरकार से यह अपील की थी कि पहले उन इलाकों से सशस्त्र बल हटाएं जाए जहां माओवादी सक्रिय है ताकि वे आश्वस्त हो सके कि यह वाकई एक ईमानदार पहल है. इस घोषणा के बाद दो-तीन दिनों के लिए युद्धविराम की स्थिति बनी थी लेकिन अर्धसैनिक बलों और पुलिस को उन इलाकों से नहीं हटाया गया जिसकी मांग की जा रही थी. इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवान माओवादी उन्मूलन के लिए ही गए थे. गृहमंत्री एक तरफ बातचीत की पहल करते है और दूसरी तरफ अर्धसैनिक बल की टुकड़ियों को जंगल में भेजते है कि जिनसे बातचीत करनी है उनकी संख्या को न्यून कर दिया जाए. सीआरपीएफ पर हुए हमले के बाद गृहमंत्री कह रहे हैं कि बातचीत अब बेमानी है. माओवादियों की यह स्पष्ट मांग है कि बातचीत तब तक नहीं की जा सकती जब तक पुलिस की तरफ से हमला (या हमले का प्रयास) बंद नहीं किया जाता. सरकार ने माओवादियों के इस मांग को नहीं माना. ऑपरेशन ग्रीन हंट पर सरकार पहले चुप्पी साधे रही लेकिन जब धीरे-धीरे मामला स्पष्ट होने लगा तो कई जगहों पर ऐसे संभावित ऑपरेशन को आंतरिक सुरक्षा के लिए ज़रूरी बताते हुए कुछ सरकारी नुमाइंदों ने इसके पक्ष में सहमति जताई.

दंतेवाड़ा में अगर सीआरपीएफ के जवानों को माओवादी नहीं मारते तो बहुत संभव है कि ख़बर इसके उलट होती और देश भर में ’आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े ख़तरे’ को निपटाने को लेकर जश्न मनाई जाती. हालांकि इस घटना के बाद माओवादियों के इस दुस्साहस को भारतीय अर्धसैनिक बल चुनौती के बतौर ले रही है और अगले कुछ दिनों में दंतेवाड़ा, जगदलपुर और बस्तर के इलाके में भीषण जनसंहार देखने को मिल सकता है. सेना की तरफ़ से त्वरित कार्रवाई की बात की जा रही है. पी चिदंबरम यह आश्वासन दे रहे हैं कि दो-तीन सालों के भीतर नक्सलियों का सफाया कर दिया जाएगा. ’जंगल वारफेयर स्कूल’ में पहले से इसकी कड़ी ट्रेनिंग चल रही है जिसमें यह बताया जाता है कि कैसे गुरिल्ला तरीके से गुरिल्लों को परास्त करना है? लिट्टे का अनुभव दक्षिण एशियाई देशों के सैनिकों में उन्माद भर रहा है. यह अलग बात है कि सेनाओं के बहुत सारे जवानों को यह मालूम नहीं होगा कि श्रीलंका में लिट्टे को ’ख़त्म’ करने के क्रम में बीस लाख से अधिक तमिलों को सुनियोजित तरीके से मार डाला गया.

जंगलों का सही ज्ञान नहीं होना और सुरक्षा (सतर्कता) में हुई चूक को कई बार सरकार की तरफ से चिंता का कारण बताया गया. इसको ख़त्म करने के लिए ’ट्राइबल बटालियन’ बना ली गई है. गुरिल्ले को गुरिल्ले की तरह मारो. आदिवासियों को आदिवासियों से लड़ाओ. सल्वा जुडूम का कार्यक्रम जब फ्लॉप होने लगा और दुनिया भर में इसकी तीखी आलोचना हुई तो सरकार ने इसको ’सब्सटीट्यूट’ कर ’ट्राइबल बटालियन’ बना डाला. यह उसी तरह है जैसे ’नगा बटालियन’, ’गोरखा बटालियन’, ’सिख रेजीमंट’, ’राजपुताना राइफल्स’. इस प्रयास में यह बात अंतर्निहित है कि जब इन बटालियनों की आलोचना नहीं हो रही है तो इसके बीच एक और बटालियन घुस जाने से उसकी आलोचना क्योंकर होगी? तो क्या इन तमाम उपक्रमों के बाद छत्तीसगढ़ के मानचित्र के दक्षिणी हिस्से से आदिवासियों की पूरी क़ौम ख़त्म हो जाएगी? हिटलर के समय जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को मार डाला गया था. यूरोप और अमेरिका मे धनी यहूदियों द्वारा अपनी धार्मिक अस्मिता का देश बनाने के क्रम में पश्चिमी एशिया के फिलीस्तीन में लाखों मुसलमान ख़त्म हो गए. उनकी कई पीढ़ियां कैंप में ही पलकर जवान हुईं और उन्होंने स्वाभाविक तौर पर विद्रोह का रास्ता चुना. छत्तीसगढ़ में भी आदिवासियों की एक पीढ़ी कैंप में पल रही है. यह सरकारी कैंप लोगों के असंतोष को किस सीमा तक बांध के रखती है यह भविष्य की राजनीतिक परिदृश्य तय करेगी.

हालिया घटना के बाद माओवाद को लोगों के बीच क़ानून व्यवस्था की समस्या के बतौर समझाने में अब सरकार ज़्यादा आसानी महसूस करेगी. लोगों में ऐसे तत्त्वों को लेकर नकार और घृणा का भाव और अधिक तीखा होगा. सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद का नारा देने वाली शक्तियां इस पूरी जंग में सत्ता पक्ष के साथ है. मीडिया ऐसी ख़बरों को सनसनीख़ेज तरीके से परोस कर माओवादियों को देश के आंतरिक भाग में ’बाहरी हमलावर’ बता रहा है. ऐसे में लोगों का इस बात में निश्चित तौर पर यक़ीन गहरा होगा कि इस समस्या पर क़ाबू पाया जा सकता है जैसे अफ़गानिस्तान में तालीबान पर पाया गया या फिर इराक में अब तक छिट-पुट तरीके से ’इस्लामी आतंकवाद’ पर पाया जा रहा है. लालगढ़ का हेलीकॉप्टर अब दंडकारण्य का रुख अधिक जनाधार और अधिक आक्रामकता के साथ कर सकेगा.

इस पूरी जंग मे लोग जिस तरह मारे जा रहें है और मारे जाने के बाद प्रत्येक दूसरे पक्ष में जिस तरह का उन्माद पसर रहा है वह बेहद ख़तरनाक हैं. इसमें तर्क-बुद्धि कम और एक-दूसरे को दुश्मन समझ लेने की प्रवृत्ति अधिक हावी हो रही है. ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करने वाले लोग अधिक टुकड़ों में बंट रहे हैं. जो टुकड़ा इन घटनाओं से अपने को अधिक जुड़ा हुआ महसूस करता है वही इसके बारे में सोच रहा है वरना अधिकतर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक शैली की है जो मुख्य तौर पर समाचार चैनल के प्रभाव के कारण व्यक्य हो रही हैं. हमारे सामने जिस अंदाज़ में ख़बरें पहुंच रहीं है और ख़त्म हो रहीं है उसने पूरी मानसिकता को ही बदल दिया है. बगदाद में ईरानी दूतावास के पास बम विस्फोट में तीस लोगों का मारा जाना या फिर रूस की मेट्रो बम विस्फोट और दागिस्तान में बम विस्फोट में सौ से अधिक लोगों का मारा जाना हमारी जमी हुई संवेदना को कुरेद नहीं पाता. ऐसा लगता है कि इराक में तो कई वर्षों से लोग मारे जा रहे हैं. मेट्रो मे बम फटना भी कोई नया नहीं हैं. माओवादियों और पुलिसों की आपस में ठनी है और इसमें कभी एक तो कभी दूसरा पक्ष एक-दूसरे को मारते ही रहते है. चार लोगों का मारा जाना और चार सौ लोगों का मारा जाना लोगों पर अलग-अलग असर नहीं डालती. लाश और घटनास्थल की विभीषिका पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और सामने महज संख्या भर रह जाती है. संख्य़ा के साथ कोई संवेदना को कैसे महसूस कर सकता है? युद्ध, बम विस्फोट और मुठभेड़ों ने हमारी चेतना में नियमित चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्थान पा लिया है. इसमें कुछ भी अलग नहीं है. इसने हमारी संवेदनशीलता को भोथरा बना दिया है. सामाजिक प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए यह सबसे आनंद और निश्चिंतता का क्षण होता है जब लोग ऐसी घटनाओं में प्रतिक्रिया करना बंद कर दे या फिर वैसी ही प्रतिक्रिया दें जैसा वे चाहते हैं. धीरे-धीरे यह आदत सवाल करने की प्रवृत्ति को बंद कर देगी.

लेखक म.गां.अं.हिं.वि. में मीडिया के जनपक्षधर छात्र हैं पिछले कुछ दिनों से लगातार लेखन व विश्लेषण कर रहे हैं इनसे dilipk.media@gmail.com या मो.- 9561513701 पर सम्पर्क किया जा सकता है

07 अप्रैल 2010

जब देश की सरकार बर्बर हो जाय.

छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में माओवादीयों द्वारा किया गया हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला है, कुछ महीने ही बीते हैं राजनांद गांव के उस हमले को जिसे सबसे बड़ा हमला माना गया था, उसके पहले गड़चिरौली में हुआ हमला सबसे बड़ा हमला था और उससे पहले बिहार का जहानाबाद जेल ब्रेक..........शायद हम इस तरह से १९६७ के उस अप्रैल माह तक पहुंच सकते हैं, अब शायद हम स्थान के लिहाज से सिलीगुड़ी के नक्सलवाड़ी गाँव तक पहुंच सकते हैं और शायद तेलंगाना से उसकी भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं या फिर वहाँ से जब आदिवासी बंदूकों और बारूदों से अनभिज्ञ रहे होंगे, जब संसद में भगत सिंह द्वारा बम फेंका गया था, शायद भारत में यह वामपंथ का पहला हमला था, जो हताहत करने के लिहाज से नहीं बल्कि किसान-मजदूर के खिलाफ बन रहे कानून का विरोध था जो अब आसानी से हर साल बनाये जाते हैं. सबसे बड़ा और सबसे पहला...... इसका चुनाव हम आप पर छोड़ते हैं, पर सवाल सबसे बड़े हमले या सबसे छोटे हमले का नहीं है, यह भाषा बोलते हुए हम सिर्फ व्यवसायिक मीडिया की बात अपनी जुबान में डाल लेते हैं इसके अलावा और कुछ नहीं, जब ये घटनायें घट चुकती हैं और सनसनी की आवाजें हमारे कानों में दस्तक देती है तो हम स्तब्ध रह जाते हैं “साक्ड” हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की तरह, हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की तरह जो हर बार कम-अज-कम मुंह से संवेदना और अफसोस जरूर जाहिर करते हैं. खेद प्रकट करना, श्रद्धांजलि देना, यह हमारे सरकार की रस्म अदायगी है, मौत के बाद की रस्म अदायगी और इस रस्म अदायगी में शामिल होते हैं हम सब लोग.
दिल्ली व अन्य शहरों में बैठकर हमारी भूमिका दूसरे दिन सब कुछ भूल जाने वाले दर्शक से ज्यादा और कुछ नहीं होती कि हम भूल चुके हैं कल की घटनाओं को और आज शोएब और सानिया की शादी को लेकर चिंतित हैं, कल ये चिंतायें किन्ही और चीजों में सुमार होंगी और इतने बड़े देश में परसों तक कोई और घटना तो घटित ही हो जायेगी, न भी हो तो समाचार चैनल घटित करवा ही देते हैं और ईश्वर व प्रेत अन्त्ततः हमारे देश के समाचार-चैनलों की रीढ़ हैं ही. कि इन पर प्रतिबंध इसलिये लग जाना चाहिये कि ये चैनल घटना घटित होने के बाद मारे गये लोगों की संख्या गलत बताते हैं और बाबाओं को बैठाकर एक वर्ष पहले लोगों का भविष्य अलबत्ता नापते रहते हैं.
बहरहाल, यह युद्ध है “ग्रीन हंट आपरेशन” पिछले ६ महीनों से जारी युद्ध किसी और देश में नहीं हमारे ही देश के उन जंगलों में जहाँ के आदिवासी माओवादी बन गये हैं, लालगढ़, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा के पहाड़ो और जंगलों में, चलाया जा रहा एक अघोषित युद्ध. शुक्र है कि आप महफूज हैं, इतने महफूज की इनकी खबरें भी आप तक नहीं पहुंचती, शुक्र है कि आप इन जंगलों में नहीं पैदा हुए कि इस युद्ध का अभिषाप आपको भी झेलना पड़ता कि जब इन ६ महीनों में मारे गये सैकड़ो लोगों के चेहरे आपके सपनों में आते और उनके घायल होने की खबरें बिना अखबारों के पहुंचती. खबर मिलती की अभिषेक मुखर्जी, जो लड़का जादवपुर विश्वविद्यालय से आया था, जिसे १३ भाषाओं और बोलियों की जानकारी थी, जिसने आई.ए.एस. का इन्टरव्यू देकर देश का प्रतिष्ठित आधिकारी बनने का रास्ता छोड़ दिया था, उसे ग्रीनहंट आपरेशन में पुलिस ने मार दिया कि पिछले कई दिनों से उसके अध्यापक पिता अपने बच्चे का फोटो लेकर थाने में घूम रहे हैं कि वे पूछ रहे हैं अगर वह मारा गया हो तो उसकी लाश सौंप दी जाय, इस लोकतंत्र में एक पिता को उसके बेटे की लाश पाने का अधिकार होना ही चाहिये, एक माओवादी के पिता को भी. आखिर वह माओवादी बना ही क्यों? हमारे समय का यह अहम सवाल है शायद इसे उस तरह नहीं भूलना चाहिये जैसे चुनाव के बाद नेताओं के जेहन से लोग भुला दिये जाते हैं, जैसे सुबह भुला दी जाती हैं रात सोने के पहले देखी गयी खबरें.
शांति अभियानों के नाम पर सलवा-जुडुम का सच निश्चित तौर पर आप तक पहुंच चुका होगा, ६ लाख लोगों का बार-बार विस्थापन, उनके घरों का जलाया जाना, उनकी स्त्रीयों के स्तन का काटा जाना और वे पाँच साल के बच्चे जिनकी उंगलियाँ इसलिये काट ली गयी कि ये तीर-कमान पकड़ने लायक हो जायेंगी, फिर तो यह देशद्रोह होगा. यह हमारे सरकार की क्रूरता थी, हमारे उस लोकतांत्रिक सरकार कि जिसने समता, समानता, बन्धुत्व को एक मोटी किताब में दर्ज कर ६० साल पहले रख दिया और जिसकी मूल प्रस्तावना को शायद दीमक चाट चुके हैं. आदिवासियों ने इसे अपनी सरकार मानना बंद कर दिया और अपने लोगों की एक सरकार बना ली “जनताना सरकार”. “एक देश में दो सरकारें” यह देश की सम्प्रभुता को खण्डित करना था लिहाजा देशद्रोह भी, पर भला ऐसे देश से कोई देशप्रेम क्यों करेगा, जो जीवन जीने के मूलभूत अधिकार तक छीनता हो, यकीनन आप भी नहीं और गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री भी नहीं, बशर्ते वे गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री न होकर उन जंगलों के आदिवासी होते जिनके घरों को १२ बार जलाया गया, जिनके बेटों का कत्ल उनके सामने इसलिये कर दिया गया कि उन्होंने माओवादियों को रास्ता बताया.
कुछ वर्ष पूर्व तक यह कायास लगाये जाते रहे कि माओवादियों के पास १०००-१५०० या उससे कुछ अधिक सशस्त्र कार्यकर्ता होंगे पर सलवा-जुडुम की क्रूर हरकतों से इनमे कई गुना इजाफा हुआ क्योंकि मुख्यमंत्री रमन सिंह का बयान था जो सलवा-जुडुम के कैम्प में नहीं हैं वे माओवादी हैं. अब जंगल के आदिवासियों को जीने के लिये माओवादी होना जरूरी था और वे सब जो कैम्पों में नहीं आये माओवादी बन गये, शायद सब नहीं भी बने हों पर मुख्यमंत्री ने यही माना और उनपर कहर जारी रहा. धीरे-धीरे कैम्प भी खाली होते गये और कैम्पों से भागकर भी आदिवासी जंगलों में और अंदर चले गये. यह सरकारी संरक्षण से भागकर आदिवासियों का माओवादी बनना था. पर यह सब हुआ क्यों? क्यों उन्हें कैम्पों में लाया जाता रहा? क्यों उन्हें विस्थापित होने के लिये मजबूर किया जाता रहा? क्योंकि टाटा, एस्सार और जिंदल को उन जमीनों पर कब्जा करना था, छत्तीसगढ़ की सरकार ने उनसे समझौते किये थे. सिर्फ जमीन देने के नहीं, आदिवासियों को विस्थापित करने के भी, इन समझौतों में लाखों आदिवासियों की जिंदगी के जुल्म और बेघरी लिखी गयी थी, स्याही से नहीं सरकारी बंदूकों से, बारूद और बंदूक की पहचान आदिवासियों को यहीं से हुई, ये तीर-कमान के परिवर्धित रूप थे, अपनी सुरक्षा के लिये और अपनी सरकार के लिये. जैसा कि हर बार होता है जीत या हार सरकारों की होती है, सिपाही सिर्फ मरने के लिये होते हैं, बस तंत्र का फर्क है.
ग्रीनहंट ऑपरेशन में मारे गये सैकड़ो आदिवासियों और माओवादियों, हमले में मारे गये सैकड़ों जवानों जो इनके विस्थापन के लिये लगाये गये थे किसके लिये मर रहे थे. क्या इसे इस रूप में देखना गलत होगा कि इन दोनों की मौत के जिम्मेदार टाटा, एस्सार, जिंदल के साथ सरकार है. क्या सरकार के लिये देश का मतलब टाटा, एस्सार, जिंदल हैं? क्या इन तीनों के लिये लाखों आदिवासियों को उनकी जंगलों से विस्थापित किया जाना चाहिये? और उस विस्थापन के लिये युद्ध छेड़ देना चाहिये जिसमे सैकड़ो आदिवासी और जवान मारे जायें. यदि अपनी जमीनों से विस्थापन के खिलाफ लड़ना देशद्रोह है तो देश की जनगणना में इन्हीं तीनों को देशप्रेमी के तौर पर शामिल कर लिया जाना चाहिये और देश का नाम पुराना पड़ चुका है इसे बदल देना चाहिये, टाटा, एस्सार और जिंदल, इनमे से कुछ भी रख देना चाहिये, इस देश का नाम. चन्द्रिका