02 मई 2010

पंकज विष्ट कों एक खुला ख़त

समयांतर के मार्च, 2010 अंक में नवीन पाठक के नाम से आपने पृश्ठ 39 पर लिखा है:

... इधर उभरे वामपंथी प्रकाषनगृहों से मुख्य तौर से वे किताबें नए सिरे से छप कर आई हैं जो सोवियत रूस के जमाने में प्रगति प्रकाषन मास्को से छपती थीं. इनकी लोकप्रियता देखते हुए यह तो कहा ही जा सकता है कि हिंदी में वामपंथी साहित्य का बड़ा बाजार है. कुछ ऐसे प्रकाषक भी थे जो साहित्य के नाम पर अनुवादों से पटे थे और ये अनुवाद 19 वीं और बीसवीं सदी के अंग्रेजी के लेखकों की रचनाएं थीं. यह अच्छा धंधा है क्योंकि इसमें किसी को रॉयल्टी नहीं देनी होती. जहां तक अनुवादों की गुणवत्ता का सवाल है उन पर जो न कहा जाए थोड़ा है...

यह जानने की बलवती इच्छा हुई कि --

1. प्रथम टिप्पणी किस / किन वामपंथी प्रकाषनों के बारे में है?
2. आपने पुस्तकों के बड़े ‘बाजार’ षब्द का उल्लेख किया है. तो यह बताएं कि बाजार क्या होता है, उसके घटक क्या होते हैं, प्रोडक्षन से लेकर और इस्तेमाल तक किसी वस्तु के वितरण में प्रयुक्त शृखला किस स्थिति में बाजार कहलाती है? और अंत में यह बताएं कि 10 प्रांतों के 50 करोड़ की हिंदी भाशी आबादी के बीच पुस्तकों के इस तथाकथित बाजार की ‘स्ट्रेंथ’ कितनी है? यह ‘बाजार’ कितनी प्रतियों या कितने लाख / करोड़ रुपयों का है?
3. यह सारी बातें आपने विष्व पुस्तक मेले के संदर्भ में कही हैं, जो दो साल में एक बार 9 दिनों के लिए होता है. बेषक इस मेले में स्टॉलों पर भीड़ दिखती है, और पुस्तकें भी खरीदी जाती हैं. परंतु इसका दूसरा यह पहलू यह भी है कि ‘बाजार’ किसी भी उत्पाद को षहर, गांव, कस्बे तक उसके ग्राहक के लिए सुलभ बनाता है. और मान्यवर बाजार का अर्थ मार्केट प्लेस मात्र नहीं होता, यह किसी उत्पाद के वितरण की पूरी प्रक्रिया होती है, जिसमें संलग्न ढेरों परिवारों का पालन पोशण इस पर निर्भर होता है. तो दूसरा पहलू यह है मान्यवर, कि गांव कस्बे तो दूर बड़े-बड़े षहरों तक में हिंदी की किताबें उपलब्ध नहीं हैं, वामपंथी पुस्तकों की तो बात ही छोड़िए. बहुत से लोगों के विष्व पुस्तक मेले में किताबें खरीदने का एक मुख्य कारण यह भी है कि बाद में ये किताबें उन्हें सहज रूप से मिल नहीं पाएंगी. विष्व पुस्तक मेले की भीड़ और पाठकों द्वारा पुस्तक खरीद से कुछ भी सिद्ध नहीं होता, मान्यवर.
4. जहां तक मेरी जानकारी है, यदि हिंदी पुस्तकों के व्यापार की बात की जाए तो यह आपकी ही भाशा में दो तरीके के ‘बाजारों’ में गतिषील है --
1- वैयक्तिक पाठकों के बीच
2- पुस्तकालय खरीद के देषव्यापी नेटवर्क के बीच जिसकी षक्ति में हिंदी के राश्ट्रभाशा होने के कारण सरकारी पैसा बड़े पैमाने पर षामिल है.

5. तो मान्यवर, यदि आपका यह लेख और इसमें की गई आप्त टिप्पणियों का स्रोत यदि सचमुच उस मनस् में है जो हिंदी पुस्तकों की दुनिया और इससे पाठक के संबंध को लेकर जेनुइन तरीके से चिंतित है तो आपको इस दूसरे विशय पर लिखना चाहिए -- यानी स्पश्ट रूप से इस विशय पर कि हिंदी पुस्तकों के नाम पर पाठकों से छल करते हुए किस तरह की थोक पुस्तकालय खरीद की धंधेबाजी और कालाबाजारी चल रही है और इसमें हिंदी के बड़े बड़े लेखक और संस्थाएं सहअभियुक्त हैं. जबकि आप इस एकमात्र करणीय काम को छोड़ कर ठीक उल्टा काम कर रहे हैं, कि जो भी लोग निजी प्रयासों से हिंदी पुस्तकों और पाठकों के बीच एक सेतु बनाने के संघर्श में लगे हैं, आप उनका अप्रत्यक्ष रूप से चरित्र-हनन कर रहे हैं.
6. जहां तक मेरी जानकारी है आप जब धंधा, बाजार आदि षब्दों का इस्तेमाल करते हुए हिंदी के कुछ प्रकाषनों की आलोचना कर रहे हैं, तब आपकी बातों से यह स्पश्ट नहीं हो पाता कि आप उपरोक्त दो तरह के बाजारों में से किस बाजार की बात कर रहे हैं? क्योंकि यह स्पश्ट है कि सरकारी खरीद का बाजार अरबों रुपए का है, और बहुत बड़ा है और हिंदी के कतिपय बड़े प्रकाषकों का इस पर पूर्ण एकाधिकार है. बेषक यह एकाधिकार बड़े प्रकाषकों का है, परंतु इसके संचालन की एक अत्यंत प्रभावी धुरी हिंदी के स्वनामधन्य बड़े लेखकों का एक षक्तिषाली समूह भी है, जिनमें कई आपके मित्र भी हैं, और एक तो अत्यंत घनिश्ठ और समयांतर के अतिथि संपादक भी.
7. आप जिन प्रकाषकों को लक्षित कर रहे हैं, वे इस भ्रश्ट सरकारी खरीद से बिल्कुल बाहर के संघर्शषील और सचमुच मिषन की भावना से काम करने वाले प्रकाषक हैं.
8. अब आप यदि प्रकाषन, पुस्तक खरीद और पाठक के इस मुद्दे पर सचमुच ईमानदार हैं, और सिर्फ सनसनी पैदा कर समयांतर के एक प्रतिबद्ध पाठक-समुदाय के बीच झूठी आत्मगरिमा से संतुश्ट नहीं हो जाना चाहते तो आपका दायित्व है और आपके लिए अपने संपर्कों, हिंदी लेखन-प्रकाषन से लंबी संबद्धता के कारण यह बहुत आसान भी है कि थोक सरकारी खरीद के इस बाजार के बारे में -- इससे गलत ढंग से लाभान्वित होने वाले प्रकाषकों और निष्चय ही इसके जरिए ही षक्तिषाली होने वाले लेखकों / बुद्धिजीवियों पर तथ्यपरक लेख समयांतर में लिखें और बताएं कि कैसे हिंदी में नकली लेखकों का पूरा एक वर्ग उभर आया है, कैसे प्रकाषकों को इस बात से कुछ लेना देना नहीं रह गया है कि वह जो छाप रहे हैं, वह सचमुच पढ़ा जाने लायक / बिकने लायक है या नहीं. और इस पूरी तफतीष में यह भी लिखें कि समयांतर में छपे आपके लेखों का पुस्तकाकार संग्रह पुस्तक रूप में छापे जाने की क्या आवष्यकता थी? और वह भी हार्डबाउंड में और इसकी मंहगी कीमत का खरीदार कौन था? आप अपनी ही सिर्फ इस एक किताब के जरिए हिंदी के पूरे पुस्तक बाजार का यथातथ्य चित्र खींच सकते हैं.
9. हिंदी पुस्तकों की थोक सरकारी खरीद के रैकेट का बाजार कितना है, उसमें हिंदी के कौन कौन से लेखक षामिल हैं और इस थोक खरीद की चयन-समितियों में बैठकर वे किन प्रकाषकों को उपकृत करते हैं -- यदि इस पर पड़ताल कर थोड़ा लिख सकें तो हिंदी के वर्तमान परिदृष्य में एक महत्वपूर्ण काम होगा. इस संबंध में आपको काफी जानकारियां थोक सरकारी खरीद के अरबों रुपए का कारोबार जिस मानव संसाधन मंत्रालय के तहत आता है उसके पूर्व मंत्री अर्जुन सिंह पर दो दो किताबें लिखने वाले और उस मंत्रालय के उस संस्थान -- राजा राममोहन राय फाउंडेषन, कोलकाता, जो अरबों रुपए की सरकारी खरीद का संचालक है की समिति में रह चुके आपके मित्र, समयांतर के लेखक और समयांतर के अतिथि संपादक श्री रामषरण जोषी जी प्रचुर मात्रा में मुहैया करवा सकते हैं और वे प्रकाषक भी ये जानकारियां उपलब्ध करवा सकते हैं, जहां से स्वयं आपकी मौलिक किताबें छपी हैं.
10. यदि आप सचमुच चिंतित हैं, तो हिंदी में पुस्तक खरीद के जो-जो रैकेट हैं, उन्हें उजागर करें न कि अपनी सीमा भर हिंदी में कुछ बेहतर करने का संघर्श कर रहे प्रकाषकों पर एकसार ढंग से लाठी घुमा दें. अब आप बताएं कि --
11. अनुवाद से पटे ये प्रकाषक कौन हैं?
12. ये अनुवाद से पटे प्रकाषक क्या सचमुच इसलिए किताबें निकाल रहे हैं कि इन पर रॉयल्टी नहीं देनी पड़ती और यह अच्छा धंधा है?
13. आपको यह कैसे पता कि किन किताबों पर रॉयल्टी दी जाती है और किन पर नहीं, और क्या आपने इन प्रकाषनों द्वारा छापी गई प्रत्येक किताब के बारे में आवष्यक तफतीष कर ली है?
14. हिंदी की मौलिक पुस्तकों पर आने वाले खर्च से इन किताबों पर आने वाले खर्च कम नहीं कई गुना ज्यादा पड़ते हैं -- क्या इस तथ्य को आप जानते हैं? और इस तथ्य को भी कि हिंदी की मौलिक किताबों को सरकारी खरीद में बिकवाने के लिए उसका लेखक या उसके संपर्क मददगार हो सकते हैं, परंतु ‘19 वीं सदी का’ कोई लेखक या उसका कोई षागिर्द अपनी पुस्तक भारत की राश्ट्रभाशा स्कीम की थोक खरीद में नहीं बिकवा पाएगा. इस बात को और स्पश्ट करना चाहें तो आपकी ही पत्रिका में नियमित विज्ञापन देने वाले ग्रंथषिल्पी की 10 किताबें चुनें और उसी वर्श उतने ही पेज की हिंदी के किसी बड़े स्थापित ‘मौलिक कृतियों’ के प्रकाषक की 10 मौलिक किताबें चुनें और उन पर आई लागत और उनकी बिक्री की तुलना करें. विष्वास करें चित्र अपने आप स्पश्ट हो जाएगा. लंतरानियां, तथ्यों का स्थानापन्न नहीं होतीं.
15. हिंदी में मौलिक या अनूदित सभी प्रकार की गंभीर साहित्यिक पुस्तकें आपके अनुमान से कुल कितनी बिक जाती होंगी?
16. आपने अपने लेख में एक तरह से अनूदित साहित्य के बरक्स हिंदी के समकालीन मौलिक साहित्य को रखने की चेश्ट की है. हालांकि इसकी न तो कोई जरूरत थी और न ही संदर्भ. दरअसल दुख की बात तो यह है कि हिंदी में विष्व भर का अनूदित साहित्य अब भी बहुत कम है. जिस बड़े पैमाने पर उसका अनुवाद और प्रसार होना चाहिए था, वह नहीं हुआ. बहरहाल यह एक गंभीर और व्यापक विशय है. इस पर फिर कभी. फिलहाल तो आप सिर्फ इतना जनहित में बता दें कि हिंदी की सभी विधाओं में पिछले पांच वर्शों में वे कौन सी महत्वपूर्ण मौलिक कृतियां आई हैं (कृपया सभी विधाओं से दस-दस कृतियों का नाम देने का कश्ट करें) महोदय जान पड़ता है हिंदी के समकालीन मौलिक साहित्य को लेकर आप काफी उत्साही हैं, पर यह उत्साह आप की किसी भी सार्वजनिक गतिविधि में कभी दिखाई नहीं पड़ा. और क्या यह सच नहीं है कि हिंदी का समकालीन मौलिक लेखन एक गंभीर संकट काल से गुजर रहा है. यह भी एक वृहत्तर विशय है. इस पर भी फिर कभी.
17. हिंदी प्रकाषन, पाठक, लेखक की वास्तविक समस्याएं क्या हैं? उनका समाजिक-सांस्कृतिक कारण क्या है? ये गंभीर सवाल हैं, कृपया इनसे गंभीरता से ही मुखातिब हों, और सच्चे हृदय से उपजी वास्तविक चिंता के साथ, न कि हिसाब चुकाने की भावना से प्रेरित हो कर या सस्ती लोकप्रियता पाने के इरादे से.

-आलोक श्रीवास्तव
मुंबई

1 टिप्पणी:

  1. इतना क्यों चिढ गए आलोक जी, आप प्रकाशन के व्यवसाय में है खरीदने बेचने का काम करते है फिर बाज़ार शब्द से इतनी कोफ़्त क्यों है आपको. मै मेले में आपके स्टाल पर आया करीब १०० से ऊपर किताबें निकाली है आपने अच्छा काम किया है. पर जाहिर है बिना मुनाफे के आपने इतनी पूँजी तो नहीं लगाईं होगी. आखिर जब आप इस व्यवसाय में हैं तो इस तरह को शुद्धतावादी स्टैंड क्यों ले रहे हैं कि बाज़ार से आपका कोई वास्ता ही नहीं हैं. और क्या आपको इस बात की कोफ़्त है कि आपके हाथ भी सरकारी खरीद तक नहीं पहुँच पायें हैं. और सच बताऊँ तो सरकारी खरीद भी कोई इतनी बुरी चीज़ नहीं है. आखिर पुस्तकालयों में किताबें कहाँ से आएगी.

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