09 अगस्त 2009

फासीवाद हर बार हिटलर के नाम से नहीं आयेगा

समारोहों में सिरकत करने वाले प्रगतिशील लेखकों, क्या आप तक यह खब़र नहीं पहुंची? कि आदिवासियों की निर्मम हत्या करने वाली सरकार ने "चरणदास चोर "पर प्रतिबंध लगा दिया है. आपके समारोह में सरीक होने के परिणाम आने लगे हैं. क्या अब भी आप रमन सिंह के चरणों के दास बने रहेंगे और सरीक होने के पक्ष में तर्क देते रहेंगे?

सरकार
ने अपनी छवि के अनुकूल ही आचरण करते हुए १९७४ से खेले जा रहे हबीब तनवीर के अंतर्रष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नाटक 'चरण दास चोर' पर शनिवार जुलाई से प्रतिबंध लगा दिया. मूलत: राजस्थानी लोककथा पर आधारित यह नाटक श्री विजयदान देथा ने लिखा था जिसका नाम था 'फ़ितरती चोर'. हबीब साहब ने इसे छ्त्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति, लोक नाट्य और संगीत परंपरा में ढालने के क्रम में मूल नाटक की पटकथा और अदायगी में काफ़ी परिवर्तन किये. 'चरनदास चोर' अनेक दृष्टियों से एक समकालीन क्लासिक है. एक अदना सा चोर गुरू को दिए चार वचन- कि सोने की थाली में वह खाना नहीं खाएगा, कि अपने सम्मान में हाथी पर बैठ कर जुलूस में नहीं निकलेगा, राजा नहीं बनेगा और किसी राजकुमारी से विवाह नहीं करेगा के अलावा गुरू द्वारा दिलाई गई एक और कसम कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, का पालन अंत तक करता है और इन्हीं वचनों को निभाने में उसकी जान चली जाती है. चरनदास को कानून और व्यवस्था को चकमा देने की सारी हिकमतेंती हैं. वह बड़े लोगों को चोरी का शिकार बनाता है. नाटक में चरनदास के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था, प्रभुवर्गों और समाज के शासकवर्गीय दोहरे मानदंडों का खेल खेल मे मज़े का भंडाफ़ोड़ किया गया है.
एक
चोर व्यवस्था के मुकाबले ज़्यादा इंसाफ़पसंद, ईमानदार और सच्चा निकलता है. ज़ाहिर है कि यह नाटक लोककथा पर आधारित है, छ्त्तीसगढ़ मे चल रहे संघर्षों पर नहीं. फ़िर सत्ता को इस नाटक से कैसा खतरा महसूस होने लगा? यह नाटक तो १९७४ में पहली बार खेला गया जब छत्तीसगढ़ राज्य के गठन तक की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती थीं. छ्त्तीसगढ़ के आज के तुमुल-संघर्षों की आहटें भी नहीं थीं. नाटक जाने कितनी भाषाओं में अनुवाद कर खेला गया, देश और विदेश में खेला गया. १९७५ में श्याम बेनेगल ने इसपर फ़िल्म भी बनाई. दरअसल क्लासिक की खासियत यही है कि वह अपने ऊपरीथ्य से कहीं ज़्यादा बड़ा अर्थ संप्रेषित करती है. अपने ऊपरी कथ्य, पात्र, देश-काल को लांघ कर बिलकुल भिन्न युग-परिवेश में प्रासंगिक हो उठती है. क्यों महाभारत के तमाम द्वंद्व अलग अलग युग-परिवेश में बारंबार प्रासंगिक हो उठते हैं? फ़िर 'चरनदास चोर' तो हबीब साहब के हाथों पूरी तरह छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में ही ढल गया. कहीं यह नाटक छ्त्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से से ही उस राजसत्ता के चरित्र को तो ध्वनित नहीं कर रहा, जो उस प्रदेश के सारे ही प्राकृतिक संसाधनों के कार्पोरेट लुटेरॊं के पक्ष में आदिवासी जनता के खिलाफ़ युद्ध छेड़े हुए है? कहीं यह नाटक दर्शकों और पाठकों के अवचेतन में दबे व्यवस्था विरोधी मूल्यों और आकांक्षाओं को वाणी तो नहीं दे रहा? कहीं यह नाटक अपनी क्लासिकीयता के चलते एक बिलकुल अप्रत्याशित तरीके से आज के छ्त्तीसगढ़ की सता और लोक के बीच जारी संग्राम की व्यंजना तो नहीं कर करने लगा? यह सारे ही सवाल इस प्रतिबंध के साथ उठने स्वाभाविक हैं.
वे
लोग भोले हैं जो छत्तीसगढ़ सरकार की इस दलील को मान बैठे हैं कि सतनामी गुरु बालदास की आपत्तियों के मद्देनज़र यह प्रतिबंध लगाया गया. बालदास जी की आपत्तियां अगर कुछ महत्व रखती हैं, तो उनपर 'नया थियेटर' के साथियों से बातचीत भी की जा सकती थी और आपत्तियों को दूर किया जा सकता था. संस्कृतिकर्मियों और सतनामी धर्मगुरुओं की पंचायत भी बैठ सकती थी, हल निकल सकता था. लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी. याद आता है कि किस तरह 'दलित अकादमी' नामक एक संस्था ने कुछ साल पहले प्रेमचंद की 'रंगभूमि' की प्रतियां जलाई थीं. बाद में बहुतेरे दलित लेखकों ने इसकी निंदा करते हुए इस बात का पर्दाफ़ाश किया कि यह सब संघ संप्रदाय द्वारा प्रायोजित था. धार्मिक और जातिगत अस्मिताओं का दमन और विद्वेष के लिए इस्तेमाल संघ-भाजपा की जानी पहचानी रणनीति है. खुद सरकार और बालदास के बयानों पर ध्यान दिया जाए तो सतनामी संप्रदाय ने इस नाटक पर २००४ से पहले कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं कराई थी, जबकि नाटक १९७४ से खेला जा रहा था और बहुधा इसके अभिनेता भी सतनामी संप्रदाय से आते थे. छत्तीसगढ़ सरकार ज़बरदस्त तरीके से दुरंगी चालें खेल रही है. एक ओर तो 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' के ज़रिए मुख्यमंत्री और संस्कृतिमंत्री के साथ तमाम जनवादी और प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों को बैठाया और दूसरी ओर महीना खत्म होते होते 'चरनदास चोर' को प्रतिबंधित कर दिया. ज़ाहिर है कि बालदास जी की चिट्ठी ' प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' से पहले की घटना है और प्रतिबंध का मन भी सरकार इस सम्मान समारोह से पहले ही बना चुकी थी. सम्मान समारोह का तात्कालिक उपयोग यह हुआ कि जिन हलकों से प्रतिबंध के विरोध की आवाज़ उठ सकती थी उन्हें इस आयोजन के ज़रिए 'डिफ़ेंसिव' पर डाल दिया गया. उन्हे सरकार ने इस स्थिति में ला छोड़ा है कि वे अगर इसका विरोध करें भी तो उस विरोध की कोई विश्वसनीयता लोगों की निगाह में रह जाए.
हबीब
साहब के नाटकों पर संघ-भाजपा का हमला कोई नया नहीं है. अपने जीते जी उन्होंने इसका बहादुरी से सामना किया था. महावीर अग्रवाल को दिये एक साक्षात्कार में हबीब साहब ने कहा, " 'नया थियेटर' की दुसरी चुनौतियों में प्रमुख है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के खिलाफ़ कलात्मक संग्राम. आप जानते हैं फ़ासिज़्म का ही दूसरा नाम है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'. नएत्तीसगढ़ राज्य में २९ जून २००३ से २२ जुलाई २००३ तक 'पोंगवा पंडित' और 'जिन लहौर नई देख्या वो जन्मई नई' के २५ मंचन हुए........... नाटक का केवल विरोध ही नहीं हुआ, वरन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सोची समझी रणनीति के तहत हमले किए गए हैं. संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लाठी का प्रयोग संघ परिवार समय समय पर करता रहा है. .......हमले की शुरुआत १६ अगस्त २००३ को ग्वालियर में हुई. फ़िर १८ अगस्त को होशंगाबाद में, १९ अगस्त को सिवनी में, २० अगस्त को बालाघाट और २१ अगस्त को मंदला सहित अलग अलग शहरों में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और आर.एस.एस. के लोग उपद्रव करते रहे. २४ अगस्त २००३ को भोपाल के संस्कृतिकर्मियों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय के ठीक सामने 'पोंगवा पंडित' पर संवाद करने की कोशिश की. वहां हमारे पोस्टर्स, बैनर छीनकर आग के हवाले कर दिए गए. गाली गलौज के साथ ईंट पत्थर फेंकने का काम फ़ासीवादी ताकतों ने किया.... मैनें उन्हें बारंबार समझाने की कोशिश की कि 'पोंगवा पंडित' कोई नया नाटक नहीं है. नाटक बहुत पुराना है और पिछले ७०-७५ वर्षों से लगातार खेला जा रहा है. १९३० के आसपास छ्त्तीसगढ़ के दो ग्रामीण अभिनेताओं ने इसे सबसे पहले 'जमादारिन' के नाम से प्रस्तुत किया था." ( सापेक्ष-४७, पृष्ठ ३८-३९) क्या पता था हबीब साहब को कि उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद कोई अपनों में से ही गोरखपुर जाकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के कसीदे पढ़ आएगा. 'छायानट' पत्रिका, अप्रैल,२००३ के अंक १०२ में मोनिका तनवीर ने महावीर अग्रवाल को दिए इंटरव्यू में कहा, "... १९७० में 'इंद्रलोक सभा' नाटक हमने तैयार किया तो जनसंघ के कुछ गुंडों ने हबीब पर हमला किया. और एक मुसलमान की पत्नी होने के कारण मुझे भी बहुत धमकाया गया." २६ सितम्बर, २००४ को 'दि हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में हबीब साहब ने एक और वाकया बयान किया है. कहा, " महज दो हफ़्ते पहले 'हरिभूमि' नामक रायपुर के एक दैनिक ने पूरे दो पन्ने 'बहादुर कलारिन' पर निकाले और मेरे खिलाफ़ तमाम तरह के आरोप लगाए. यह नाटक 'ईडिपल समस्या' पर आधारित एक लोक नाट्य है. हज़ारों छत्तीसगढ़ी नर=नारियों ने इसे दत्तचित्त होकर देखा, जबकि मुझे आशंका थी कि वे अगम्यागमन (इंसेस्ट) की थीम को ठीक समझेंगे कि नहीं. लेकिन भाजपा के दो सांसदों ने आपत्ति की कि मैनें यह थीम क्यों उठाई. ....मैनें कहा कि 'ईडिपल काम्पलेक्स हमारे लोक ग्यान का हिस्सा है'. .... वे बोले कि यदि ऎसा है भी, तो पूरी दुनिया में इसका ढिंढोरा पीटने की क्या ज़रुरत है? इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था."
दरअसल 'चरनदास चोर' पर प्रतिबंध को भाजपा सरकारों की 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादी' मुहिम का ही हिस्सा समझा जाना चाहिए, बहाना चाहे जो लिया गया हो. किसी भी लोकतंत्र में ऎसे फ़र्ज़ी आधारों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.
मैं व्यक्तिश: और अपने संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से सभी जनपक्षधर ताकतों से अपील करुंगा कि 'चरनदास चोर' पर प्रतिबंध पर चौतरफ़ा विरोध दर्ज़ कराएंप्रणय कृष्ण

07 अगस्त 2009

इतिहास के द्वन्द अभी सलामत हैं, नामवर जी ........

आलोक श्रीवास्तव के द्वारा नामवर सिंह को लिखा गया एक खुला ख़त, जिसे ब्लाग पर पहले ही आ जाना था. कुछ व्यस्तताओं के कारण नहीं आ सका. उम्मीद है कि यह ख़त आज की चुनौतियों पर रोना रोने के बज़ाय एक नयी दिशा देगा.
"जीवन में सपना नही रहा, क्योंकि सोवियत संघ नहीं रहा..... ” नामवर जी, यह पुरानी बात हो गई। ” समाजवाद कैंप नहीं रहा एक ही महाशक्ति का वर्चस्व हैं........ ”
ये और इस तरह की तमाम बातें अनैतिहासिक हैं और अप्रमाणिक मन से जन्मी हैं. क्या जब नाज़ी कैंपों में, बंगाल के अकाल में और साम्राज्यवादी विश्व युध्द में 5 करोड़ से ज्यादा लोग जिबह कर दिए गए थे, सपना खत्म हो गया था? जब मध्ययुगीन बर्बरों ने दुनिया को अपने अश्वों की टापों से रौंद दिया था -- तब दुनिया के संज्ञान और मानव-नियति से साक्षात के उपक्रम खत्म हो गए थे?
नामवर जी, वे सपने कमज़ोर थे, जो समाजवाद कैंप पर टिके थे, क्या इतिहास में बारंबार ऐसे दौर नही़ आए जब सिर्फ पराजय क्षितिज तक दिखाती हो, सिर्फ़ धूसर हो गए स्वप्न दूर तक नज़र आते हों? माना कि यह युग कड़ा बहुत है -- पर इतिहास के व्दंव्द सलामत हैं और उपजाऊ हैं. सपनों की ज़मीन अभी भी ज़रखेज है. वैयक्तिक निराशा को इस प्रकार प्रचारित तो न करें. हिंदी की दुरिया वैसे भी अनुचरों की दुनिया हैं.
आज अधिक बड़े सपनों की और ज्यादा गहरे कर्मों की दरकार हैं. आप अपनी उम्र और अपने सपने जी चुके. नई पीढ़ी को यह सिखाएं कि उधार के सपने मत देखना -- हमारी तरह. अपनी जागृति में अपने स्वप्न गढ़ो और उन्हें मशाल की तरह आनें वालों को सौंपो. इस विश्व और जीवन को जानने और बदलने का संज्ञान अभी भी मौजूद हैं, समाजवादी कैंपों के टूटने से सपने नही मरे हैं, बक्लि यह बात रेखांकित हुईग् है कि सपनों के लिए जीना भी पड़ता है. वे सडी-गली व्यवस्थाए खत्म हुई थीं, जिन्हें समाजवाद या माक्र्सवाद नहीं खत्म हुआ था. तथाकथित समाजवादी कैंपों के धराशाई होने से यह बात रेखांकित हुई थी कि क्रांति की भावना, विचार और तंत्र किन्हीं देशों में गुमराह हो चुके थे.
सोवियत संघ के विघटन से न इतिहास खत्म हुआ न वर्ग युध्द --बक्लि वह और पैना, और उजागर हुआ है. उसने अब ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी हैं कि पूंजीवादी वैश्विक तंत्र के खिलाफ़ मानव-भविष्य की वैकल्पिक विचारधारा, चेतना और कर्म को स्थापित करने के लिए ज्यादा यथार्थवादी और वैज्ञानिक ढंग से काम किया जाए. ” सोवियत संघ का विघटन पूंजीवादी षडयंत्र था, सी आई ए की साजिश थी.............. ” इन कुतर्कों से इतिहास बहुत आगे निकल आया है. इस बात की संपूर्ण वैचारिकी अब मौजूद है कि सोवियत संघ क्या बन गया था? सोवियत संघ और चीन की बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की राजनीति और इतिहास विश्व सर्वहारा से विश्वासघात का इतिहास है. उस इतिहास को कलपने वाले शायद इतिहास को ठीक से जानने की जरूरत नही समझते. और यह ज़रूरत न समझना उनकी कमज़हनी से नहीं निहित स्वार्थें से जुड़ी बात है. साम्राज्यवाद बेशक आज बहुत मजबूत स्थिति में है, पर उसको मजबूती दी किसने? चीन विश्व राजनीति में तमाम प्रतिक्रियावादी देशों को अपना दुमछल्ला बना कर विश्व-सर्वहारा के साथ गद्दारी करता रहा और सोवियत संघ भारत सहित अनेक देशों के प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग के साथ तीसरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षो को पीछे घसीटता रहा. जिस समाजवादी कैंप की बात आप कह रहे हैं, उसके ठीक स्वरूप् केा समझने की ज़रूरत है, न कि उसका रोना रोने की, 1960 से 1990 तक के तथाकथित समाजवादी कैंप की राजनीति और विश्व सर्वहारा संघर्ष पर उसके प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन ही भारत जैसे देशों में और उसमें हिंदी पट्टी औ हिंदी पट्टी के साहित्य को वास्तव में जन का साहित्य बनाने की राह पर ले जाएगा. अन्यथा जनवाद और इसी पतनशील व्यवस्था में जम कर मलाई खाते रहे, वह कई और पीढ़ियों तक जारी रह सकता है.
दुनिया इनते पराभव इतनी इसहायता की स्थिति में नही पहुंची है. साम्राज्यवाद आज अपनी सैन्य-शक्ति में, पूंजी के फैलाव में, अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व में बेशक अतीत के किन्हीं भी युगांे से बहुत मजबूत है, पर याद रखें कि एक जगह वह बेहद कमजोर हुआ है, और आने वाले दशकों में और भी कमजोर होगा-- वह है पूंजी के रह रह कर दोहराने वाले संकट की रिपेयरिंग में --- अब ये संकट ग्लोबल होंगें, ज्यादा मारक होंगें, और समाजों में उथल-पुथल ला देंगें. दो-तीन दशक बाद यह पूंजीवाद के वश का नहीं रह जाएगा िकवह किन्हीं कीन्स और किन्हीं अन्य अर्थशास्त्रियों के सिध्दांतों के बलबूत इन संकटों से निपठ सके. दूसरी बात यह होने जा रही है कि अब ये संकट ज्यादा आवत्र्तिता के साथ होंगें, आने वाली पूरी सदी में माक्र्स --- जहां तक आर्थिक विश्लेषण की बात है क्लासिक ढंग से और कह लें कि पैगंबरी ढंग से सच प्रमाणित होने जा रहे हैं. लेकिन साम्राज्यवाद इन संकटों के आगे घुटने टेक देगा, इस खुशफ़हमी में न रहें, इन संकटों के निदान निरंतर युध्दों और विश्व-प्रभुत्व में ढूंढ़े जाएंगें. सभ्यता का संकट ठीक यहीं पर है. वह संकट यह है कि माक्वर्स जहां इतिहास की हर करवट के साथ आर्थिक रूप् से एक भविष्यवक्ता की तरह डेढ़ सौ साल बाद भी सही सिध्द होते जाएंगे सिध्द होंगे, और हुए हैं, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि निदान की जो रूपरेखा थी, वह उनके अपने युग के लिए थी. माक्र्स के समय में पूंजीवाद में मानव-आबादी की चेतना और संस्कृति में इतनी फेरबदल नहीं की थी, पर आज इक्कीसवीं सदी में यह फेरबदल बहुत बड़े पैमाने पर हो चुकी है, श्रमिक वर्ग की पूरी संरचना में भी बड़े पैमाने की फेरबदल कर दी गई है. तो वास्तविक चुनौती इस युग के लिए जनता के पक्ष में प्रतिरोध के निर्णायक स्वरूपांे का निर्माण है. इस कार्य की पहली मंजिल संस्कृति और चेतना का प्रबोध नही है, उस संस्कृति और चेतना का जिसे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने पिछले दो-तीन दशकों में तो बहुत तेजी से भष्ट और स्वप्नहिन बनाया है, नामवर जी हम हिंदी के किसी साहित्यिक अखाड़े की भाषा में नहीं इतिहास को जानने की इसी जन-नैजिकता के तकाजे से आपको यह बताना चाहते हैं कि आपके इस तरह के विचार इस स्वप्नहीनता के पक्ष में जात हैं -- बजाय उसका प्रतिरोध बनने के, और आप पिछले डेढ़ दशक से निरंतर, ठीक यही काम कर रहे हैं-- अपने तमाम व्याख्यानों आदि के जरिए. सोवियत संघ के टूटने के बाद भी हिंदी जगत का यह जीवंत सत्य है कि दिल्ली से लेकर आरा-पटना तक और राजेंद्र यादव से लेकर नवजात कविगण तक लोग आपकी कितनी भी भत्र्सना निजी या साहित्यिक कारणें या हताशाओं के चलते करते हों , फिर भी आपके उवाच आज भी हिंदी की दुनिया में व्यापक रूप् से प्रसारित होते हैं और उनका असर भी पड़ता है।
ठीक यही वजी है कि आपको यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि सोवियत संघ के परजीवी समाजवाद और सपनों का ज़माना खत्म हुए युग बीत चुका हैं. उस तथाकथित समाजवाद और उस समाजवादी सपने की कमाई खाने वाली और उससे अपनी दुकानें चलाने वाली प्रतिभओं के कुचक्रों ने हिंदी में वास्तविक माक्र्सवादी चेतना और स्वप्न को उठाना ही नहीं लेेने दी. यह राज्य समर्थित प्रतिरोध का बोदा साहित्य और विचारधारा थी, जो हिंदी में मठाधीशों व्दारा प्रत्यारोपित की गई थी. सोवियत संघ के तथाकथित समाजवादी कैंप व्दारा समर्थित भारत के माक्र्सवादी राजनीतिक दलों और भारत की बुर्जुआ राजसत्ता से उनके गठबंधन ने हिंदी साहित्य को क्षरित किया है. विभाजित व्यक्तित्व और विभजित मूल्यों वाले समाजचेता रचनाकर्मियों ने हिंदी साहित्य का जो हाल किया वह किसी बड़ी प्रतिभा को जन्म नहीं दे पाया. माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र को अपनी चेतना का अंग बना पाने का संघर्ष इसीलिए मुक्तिबोध का अकेले का संघर्ष बन कर रह गया, न कि इसलिए कि मुक्तिबोध कोई बिरली प्रतिभा थे, जो अपने अवसान के साथ हिंदी साहित्य के माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र की समस्त संभावनाएं और उसका समस्त भावी आत्मसंघर्ष भी लेते गए. स्वतंत्रता के बाद का और उसके आगे 1960 के बाद का तो अधिकांश हिंदी साहित्य व्यवस्था से पोषित लेखकों-आलोचकों का साहित्य रहा, न कि संघर्ष का साहित्य. यह संघर्ष का स्थूल अर्थ न लें वरना हिंदी लेखकों के पास मध्यवर्गीय जीवन और उसके लिए नौकरी के जुगाड़ वाले गर्दिश के दिनों की एक से एक कहानियां चिनी हुई होंगी. यहां संघर्ष से आशय माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र के लिए किए गए आत्मसंघर्ष और उसके जरिए व्यक्तित्व के रूपांतरण के लिए किए गए संघर्ष से है।
नामवर जी जिस चीज का स्यापा कर रहे हैं, वह कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक ज़रूर थी, पर वह किन्हीं मूल्यों, संघर्षों और वैचारिकता को सत्ता का गुलाम बनाने वाली थी. क्या आज सन 2008 में इस बात के दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य प्रमाणें की आवश्यकता है कि समाजवादी कैंप ने हिंदी साहित्य को किस तरह बधिया और अवसरवादी बना दिया? ऐसे मिथ्या स्वप्नों के लिए बिसूरने वालों के लिए नागार्जुन की यह पंक्ति ही अलम है--- ” भूल जाओ पुराने सपने ”
आलोक श्रीवास्तव -मुंबईफोन- 09320016684

05 अगस्त 2009

गोरखालैंड तो बन चुका है

कृपाशंकर चौबे
लंबे समय से चल रही अलग गोरखालैंड राज्य की लड़ाई एक संवैधानिक संकट के मोड़ पर पहुंच गई है। दरअसल व्यवहार में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने अलग गोरखालैंड राज्य हासिल कर लिया है।पूरे दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दुकानों के साइनबोर्ड में पश्चिम बंगाल का नाम मिटाकर गोरखालैंड कर दिया गया है तो गाड़ियों के नंबर प्लेट में भी डब्लू बी (वेस्ट बेंगाल) की जगह जीएल (गोरखालैंड) लिखवा दिया गया है। और तो और, जीजेएम ने पूरे पहाड़ में गोरखालैंड की अपनी सुरक्षा व्यवस्था लागू कर रखी है। पहाड़ में पश्चिम बंगाल पुलिस को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। जगह-जगह गोरखा जनमुक्ति के साढ़े दस हजार सशस्त्र जवान तैनात हैं। इन्हें जीएलपी यानी गोरखालैंड पर्सनल कहा जाता है। वैसे ये काम पुलिस का करते हैं इसलिए जीएलपी को पहाड़वासी पुलिस ही कहते हैं। जीएलपी के इन लाठीधारी जवानों ने सेना के पूर्व कर्नल रमेश दीक्षित से प्रशिक्षण हासिल किया है। जीजेएम ने अपना अलग प्रशिक्षण शिविर बना रखा है और उसके अध्यक्ष विमल गुरुंग ने कहा है कि जीएलपी जवानों की संख्या बढ़ाई जाएगी। गुरुंग ने जीएलपी के लिए प्रशिक्षण देकर कुल पचीस हजार जवानों को तैयार करने का ऐलान किया है। पहाड़ में जीएलपी के जवानों, पहाड़ की दुकानों और गाड़ियों को देखकर लगता है कि गोरखालैंड तो व्यवहार में बन ही गया है।
व्यवहार में गोरखालैंड हासिल हो जाने के बाद अब उसे संवैधानिक स्वीकृति दिलाने के लिए जीजेएम ने पहाड़ में बीते तेरह जुलाई से हड़ताल कर रखी है। इस हड़ताल को टलवाने के लिए केंद्र सरकार ने अगले महीने अगस्त में तितरफा बैठक बुलाई है। उस प्रस्तावित बैठक की घोषणा किए जाने के बावजूद जीजेएम ने हड़ताल जारी रखने का ऐलान किया है और संकेत दिया है कि इस बार उनकी हड़ताल डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय तक चल सकती है। दरअसल पहाड़ में अब गुरुंग की ही चलती है। वे ही आजकल दार्जिंलिंग के एकछत्र सम्राट हैं। पहाड़ पर दो दशकों से ज्यादा समय तक एक छत्र राज करनेवाले गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (जीएनएलएफ) के अध्यक्ष सुभाष घीसिंग भी गुरुंग की लोकप्रियता के आगे बौने पड़ गए हैं। उनका खुद का दार्जिलिंग में प्रवेश करना मुहाल हो गया है। उन्हें पहाड़ से निर्वासित होना पड़ा है। घीसिंग को पहाड़ के केंद्र से परिधि में फेंकने के बाद गुरुंग अब घीसिंग द्वारा सबसे लंबे समय तक की गई हड़ताल के रेकार्ड को भी इस बार तोड़ देना चाहते हैं। घीसिंग ने अपने आंदोलन के उत्कर्ष के जमाने में 45 दिनों तक लगातार हड़ताल की थी। गुरुंग उससे ज्यादा दिनों तक हड़ताल करने को आमादा हैं। गुरुंग की सलाह पर पहाड़वासियों ने जब दो महीने का राशन अपने यहां रख लिया, उसके बाद ही हड़ताल आरंभ की गई। इसके अलावा ऐहतियात के तौर पर जीजेएम ने खाद्यान्न के तीन गोदाम भरकर रखवा लिए हैं। पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न रखे जाने से भले हड़ताल के दौरान पहाड़वासियों को भोजन की असुविधा न हो पर जीजेएम का सारा आंदोलन एक गंभीर खतरे की तरफ इशारा करता है। हड़ताल के कारण जिस तरह पहाड़ को बाकी देश से काट दिया गया है, उसे किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जीएलपी के जवान जिस तरह पहाड़ में कानून-व्यवस्था को संभाले हुए हैं और विभिन्न सामाजार्थिक विकासमूलक योजनाओं के क्रियान्वयन, पर्यटकों की सहायता, यहां तक कि महाकाल मंदिर की सुरक्षा संभाल रहे हैं, उसके बाद स्वतंत्र गोरखालैंड राज्य को हासिल करने के लिए बाकी क्या बचा है? तब क्या बुद्धदेव सरकार ने व्यवहार में अलग गोरखालैंड की मांग को स्वीकार कर लिया है ?तथ्य यह है कि आज पूरे दार्जिलिंग में बुद्धदेव सरकार के प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। बुद्धदेव सरकार की प्रशासनिक मशीनरी पहाड़ में क्यों फेल हो गई? देश-विदेश से आए पर्यटकों-छात्र-छात्राओं की सुरक्षा बंगाल पुलिस के बजाय जीएलपी पर क्यों निर्भर है? पुलिस के आईजी तक पहाड़ में क्यों नहीं प्रवेश कर पा रहे हैं? तथ्य यह भी है कि जीजेएम के हड़ताली अलग राज्य की मांग के अलावा आईजी व दो अन्य आईपीएस अधिकारियों को हटाने की मांग भी कर रहे हैं। सुभाष घीसिंग ने जब अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था तो राज्य प्रशासन मुखर था और तब राज्य प्रशासन ने पहाड़ के जन-जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए थे। लेकिन आज क्या इस तरह के आंदोलनकारियों के आगे समर्पण कर देना ही बुद्धदेव सरकार की नीति है? कहना न होगा कि यह कापुरुष सरकार की निशानी है और उसकी अयोग्यता का प्रमाण भी।
दार्जिलिंग में तो बंगाल पुलिस कानून-व्यवस्था की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के लिए भी सक्रिय नहीं होती जबकि जहां जरूरत नहीं होती, वहां अति सक्रिय हो उठती है। पुलिस विभाग चूंकि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के पास है, इसलिए पुलिस की किसी भूमिका की जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। नंदीग्राम में बंगाल पुलिस ने नाहक अति सक्रिय होकर ही गोली चलाई थी और दोषी पुलिसवालों पर आज तक कोई कार्रवाई बुद्धदेव ने नहीं की। अदालत के आदेश के बावजूद आज तक नंदीग्राम गोलीकांड के हताहतों व क्षतिग्रस्त लोगों को मुआवजा नहीं दिया गया। नंदीग्राम से सटे खेजुरी में माकपा नेताओं के यहां से बरामद हथियारों के जखीरे के बारे में पुलिस मंत्री के नाते बुद्धदेव ने यह पता लगाने का जहमत नहीं उठाया कि उतने हथियार आए कहां से? जिनके यहां से हथियार बरामद हुए, इन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लालगढ़ में बंगाल पुलिस ने रात में तलाशी के नाम पर आदिवासी महिलाओं के साथ जो ज्यादती की, उसकी जिम्मेदारी मंत्री के नाते लेने से बुद्धदेव इंकार कर सकते हैं? कहना न होगा कि बुद्धदेव की इन्हीं प्रशासनिक विफलताओं के कारण आज दार्जिलिंग मुक्तांचल बना हुआ है। इसके बाद अब दुआर्स की बारी है। दार्जिलिंग की तर्ज पर उत्तर बंगाल में ग्रेटर कूचबिहार व अलग कामतापुर आंदोलन की मांग कब जोर पकड़ लेगी, नहीं कहा जा सकता। लोकमत से साभार

03 अगस्त 2009

यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है

आशुतोष कुमार
अशोक वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार' 19 जुलाई, 2009, 'जनसत्ता') कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है।

यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ।
बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर समर्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सहयोगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस-अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.

क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है ?

अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम ' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था: 'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है। आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.' विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन. क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम 'जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?

'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों'(एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे. 'सलवा-जुडूम' क्या है?
countercurrents.org पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं-----अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.
'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था। इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा-हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों'(एसपीओज़) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं. स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है-----महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W. ) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है. 'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.

छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं। वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीस, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त-----अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं. राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है. नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (सपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है .

सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है। अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार ' लिख गये। नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि 'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े। इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़ 'में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर. " घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर! अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा!

यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो. गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है ? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग"?

('जनसत्ता', दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार)



02 अगस्त 2009

हरियाणा: दलित उत्पीड़न का क्रूर चेहरा॥

सदी के चेहरे पर क्रूर प्रताड़ना का लेप इतना गहरा है और उसके रंग इतने ज्यादा कि प्रिज़्म के रंगों में उन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. क्रूरता और अपमान ने कभी अपने चेहरे को एक आकार में नहीं ढाला. वह जब भी बुना गया उसके रूप बदले हुए दिखे. शब्दों के प्रतिरोध के मायने इतने कम होते गये कि बडे निहितार्थों वाले शब्दों को दीमक की जुबान चाट गयी. एक पूरा का पूरा तंत्र समानता, समता का ढोंग करता रहा और उत्पीड़न पूर्ववत जारी रहे. समानता और समता को तंत्र के मूल में रखकर एक मोटी पोथी तैयार हुई जो आज थोथी दिख रही है.
पूरे देश में दलित उत्पीड़न की अनगिनत घटनायें घटती हैं पर कितनी कम घटनायें हैं जिनकी ख़्बर हम तक पहुंच पाती है. पिछले कुछ वर्षों में हरियाना राज्य में दलितों पर हुए अत्याचारों को देखें तो पता चलता है कि मानवाधिकारों का कितने बेखौफ तरीके से मज़ाक उडाया गया है. राज्य में २० प्रतिशत जनसंख्या दलितों की है. पूरी राज्य मशीनरी पर अधिकांशतः सवर्णों का कब्जा है.यह कब्जेदारी महज़ नौकरियों और पदों तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि देखा जाय तो एक सांस्कृतिक संरचना का व्यक्ति जब सत्ता के किसी मशीनरी में में आता है तो वह अपने पारंपरिक रीतियों के साथ संस्थान में जीता है.
धर्म निरपेक्षता का ढोंग भले ही किया जाय पर देश की कोई ऎसी सरकारी ऑफिस नहीं है जो हिन्दू प्रतीकों, मूर्तियों कलेंडरों व देवी देवताओं से मुक्त हो. क्या देश की कानून व्यवस्था व संविधान की देख रेख करने वाली न्यायालयों की निगाह कभी इस बात पर गयी कि एक सार्वजनिक संस्थान में, धार्मिक कर्मकान्डों को बद किया जाना चाहिये व प्रतीकों को हटाया जाना चाहिये. इस रूप में पूरी मशीनरी यहाँ तक कि न्यायालय भी हिन्दूवादी मानसिकता से ग्रसित होकर काम कर रहे हैं. हिन्दू मानसिकता अपने मूल से जातीय वर्चस्व व विभेदीकरण के आधार पर काम करती रही है. हरियाणा राज्य में घट रही घटनायें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कि सत्ता मशीनरी व वर्चस्वशाली वर्ग किस तरह से एक होकर दलितों पर अत्याचार कर रहे हैं.
पिछले कुछ वर्षों में देखा जाय तो जमीदारों ने दलितों का खेतों में प्रवेश बंद कर दिया. झूठे मामले के तहत उन्हें जेलों में डाला जा रहा है. पानीपत के जुलना गाँव में गुर्जरों व जाटों द्वारा दलितों की पिटायी की गयी, कजरकरा गाँव में दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे कितने मामले हैं जो घट रहे हैं. आखिर यह प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ना वहाँ की सत्ता के मदद के बगैर कैसे संभव है. जबकि इस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है.
झज्जर में २००२ में जब पाँच दलितों को पीट-पीट कर पुलिस चौकी के सामने ही जला दिया गया तो क्या यह वहाँ की पुलिस की मदद के बगैर संभव था. सरकारी संस्थाओं के ढांचे में जब किसी सवर्ण को लाया जाता है तो उसकी मानसिकता में बदलाव के लिये सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास नहीं किया जाता. वे अपने सवर्णवादी समाज के ढांचे से आते हैं और ऊंच-नीच की भावना के साथ तंत्र में कार्य करते हैं. दलितों को जब जलाया गया तो राज्य एजेंसियों ने उसे यह कहते हुए सही ठहराया कि दलितों ने बहुसंख्यक की भावना को ठेस पहुंचाया है. जबकि मामला यह था कि दलितों ने मरी हुई गाय की खाल निकाली थी.
१० फरवरी २००३ को कैथल जिले में उच्च जाति के लोगों ने २७५ दलित परिवारों को गाँव से पीट-पीटकर इसलिये बाहर खदेड़ दिया क्योंकि ये दलित ११ फरवरी को गुरू रविदास की जयंती मनाना चाह रहे थे. सवर्ण इस जयंती मनाये जाने के खिलाफ थे. कुछ दिनों बाद जब वे लौटकर आये तो फिर से सवर्णों द्वारा जुलूस निकाल तांडव किया गया और दलितों को दुबारा गाँव छोड़ना पडा. कई महीने तक उन्हें बेघर होकर कैंपों में दिन गुजारने पडे. इसके बावजूद आरोपियों को गिरफ्तारी के बाद जल्द ही छोड़ दिया गया. इतने बडे जुल्म का यदि यही अंजाम हो तो जाहिराना तौर पर सवर्णों के हौसले बुलंद ही होंगे.
राज्य में दलित बडे पैमाने पर बंधुआ मजदूर बनने के लिये आज भी मजबूर हैं जबकि बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. पर राज्य में यह सब बेमानी हो चुका है. कुछ वर्ष पहले ही एक बाल्मीक मजदूर को हुकुम सिंह नामक जमीदार ने ट्रैक्टर से कुचलकर इसलिये मार डाला क्योंकि वह बंधुआ मजदूरी की खिलाफत कर रहा था.
अब इस दमन चक्र को नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है जिसे कानूनी तौर पर जायज ठहराया जा सके. बीते दिनों २५ दलितों को माओवादी बताकर गिरफ्तार किया गया जिनमें तीन महिलायें भी शामिल हैं. इन्हें जेल में डाल दिया गया. आरोपी के रूप में करनाल जेल में बंद मुकेश कुमार नामक व्यक्ति के साथ जेल में जो बर्ताव किया गया वह अमानवीय है. मुकेश को जब जज अश्वनी मेहता के कोर्ट में लाया गया तो वह फफक पडा उसने अपने वकील के हवाले से एक पत्र लिखा जिसमे उसने बताया है कि दलित होने के कारण जेल प्रशासन के दो व्यक्तियों “ जोगिंदर सिंह, व “डांगी, द्वारा २२ जुलाई को पीटा गया, उससे शौचालय धुलवाये गये वदलित सूचक गालियाँ दी गयी. जब उसने इसका प्रतिरिध किया तो उसका सिर मुड़वा दिया गया और मूंछें काट दी गयी. प्रशासन द्वारा उसे इनकाउंटर में मारने की धमकी भी दी गयी. पर अभी तक न तो राष्ट्रीय मानवाधिकार और न ही दलित रक्षा करने वाली किसी संस्था ने इसकी खबर लेने का प्रयास किया.
राज्य में एक तरफ सामाजिक ढांचे से बहिस्कृत व प्रताडित किये जाने के बाद जब सत्ता तंत्र भी इस भेद-भाव को प्रश्रय देने लगे तो आखिर उनके सामने रास्ता क्या बचता है. इसकी क्या वज़ह है कि देश में आदिवासी और दलित ही माओवाद के नाम पर पकडे जा रहे हैं. प्रतिरोध की ताकत आज आदिवासियों और दलितों के बीच ही बची है क्योंकि वे झारखंड में आदिवासियों के नेतृत्व का शासन, उत्तर प्रदेश में मायावती का शासन भी देख चुके हैं. अब वे इस असमान ढांचे को तोड़, नया ढांचा बनाने के पक्ष में हैं.

31 जुलाई 2009

क्या ये साहित्यकार इतने नासमझ हैं

आप का कहने का निहितार्थ क्या है. यह समझ में नहीं आया. एक तरफ आप उदय प्रकाश का विरोध करने का समर्थन करते हैं. साथ ही यह कहकर -- "कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो?" आप इस मामले में उदय प्रकाश के स्टैंड कि उनके साथ साजिश कि जा रही है. का समर्थन कर रहें हैं. यदि लेखकों ने छत्तीसगढ़ में हुए कार्यक्रम का विरोध नहीं किया तो क्या इसका आशय यह है कि उन्होंने एक फासीवादी गुंडे से उदय के सम्मानित होने का विरोध कर ठीक नहीं किया.और आपके 'इस बहाने' का क्या मतलब है? क्या आपको यह सिर्फ बहाना लगता है.दूसरी बात आप उदय प्रकाश कि माफ़ी से लगता है पूरी तरह सहमत है. ऐसा क्यों है?आपका कहना है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यदि ऐसा है तो खौपनाक सच्चाईओं के प्रति सचेत इस लेखक को यह पता नहीं था कि योगी आदित्यनाथ कौन है. क्या उदय कि इस बात पर विशवास किया जा सकता है कि वे "राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।"और ध्यान से देखा जाये तो उन्होंने यह भी नहीं कहा है.उन्होंने व्यावहारिक राजनीतिक निहितार्थों की बात की हैमतलब उनके लिए अब भी यह "व्यावहारिक राजनीति" का सवाल है.
दूसरी बात, आपने लिखा है -- "उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं।"यह दावा तो स्वयं उदयप्रकाश भी नहीं करेंगे।आखिर उनकी किस कहानी में ऐसे तत्वों के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का आह्वान है. जवाब है किसी में भी नहीं. यहाँ मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि उदय प्रकाश की कहानियों में कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है. मेरा विनम्र आग्रह इतना ही है कि मनगढ़ंत तरीके से उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध दिखा देना कोरा भाववाद है. आप उदय प्रकाश कि कहानियों में दरअसल वह बात डाल देना चाहते है जो आपको लगता है कि किसी अच्छे कहानीकार कि कहानियों में होनी चाहिए. और उदय प्रकाश के प्रति आप इतने मोहासक्त है कि जबरन उनकी कहानियों में साहसी प्रतिरोध घुसेड रहें है.

तीसरी बात, यह बात एकदम सही है कि छत्तीसगढ़ के कार्यक्रम में शिरकत के प्रश्न पर चर्चा होनी चाहिए. सत्ता और बुद्धिजीविओं के बीच के सम्बन्ध के बारे में बातचीत होनी चाहिए.कृष्णमोहन जी जो वहां गए थे. यह तर्क दे रहे हैं कि कार्यक्रम में रमण सिंह के आ जाने से ही वह प्रतिक्रियावादी नहीं हो जाता है. शायद सलवा जुडूम जैसे दमन अभियान कि गंभीरता को भूल रहे हैं. वे भूल रहे हैं कि यह अपने ही नागरिकों पर वियतनाम युद्ध की शैली में छेडा गया एक बर्बर युद्ध है. वे भूल रहें हैं कि इस युद्ध का नायक और निर्माता वही 'कवि' विश्वरंजन है. जो उस कार्यक्रम का कर्ता धर्ता था.लेकिन अनिल जी, बहुत से लोग इन कृष्णमोहन जी के प्रति भी मोहासक्त हैं. और इसकी तो वजहें भी है. मुक्तिबोध जैसे कवि के सरोकारों को समझ कर उन्होंने उनके रचना कर्म पर एक अच्छी पुस्तक भी लिखी है. लेकिन क्या मुक्तिबोध के काव्य व्यक्तित्व और उनकी पक्षधरता पर लिख कर ही कोई आलोचक आज जनपक्षधर हो सकता है. मुक्तिबोध जिन षड्यंत्रों कि पड़ताल कर रहे थे -- "किसी जन क्रांति के दमन निमित्त यह मार्शल ला है". क्या मुक्तिबोध इस तरह के कार्यक्रम में संम्मिलित होते ?कहा जाता है कि साहित्य जीवन और समाज की आलोचना है. इस तरह साहित्य की आलोचना तो उस आलोचना की भी आलोचना हुई. जीवन और समाज अपने गहनतम और संश्लिष्टतम रूप में आलोचना में आलोचना में मौजूद होते हैं.लेकिन क्या किया जाय जब हिंदी के उभरते हुए और स्थापित आलोचकों को अपनी जनता के जीवन और अपने समाज में चल रहे युद्धों की बुनियादी जानकारी भी नहीं है. अकेले कृष्णमोहन ही नहीं है. विश्वरंजन को भेजे अपने पात्र में कवि- आलोचक पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि सलवा जुडूम और उसमें विश्वरंजन कि भूमिका का पता उन्हें एक दिन पहले ही 'द पब्लिक एजेंडा' नामक पत्रिका से हुई. हद है!३ साल हो गए हैं सलवा जुडूम को शुरू हुए. २ साल तो बिनायक सेन ने जेल में गुजारे और हिंदी के एक संभावनाशील आलोचक को उसका पता एक दिन पहले चला है।
विजय गौड़-
अनिल जी इस बिना पर कि कोई लेखक बहुत पढा जाता है या कि लेखक ने बहुत जनपक्षधर रचनाएं लिखी हैं तो वह यदि अमानवीय अत्याचारियों के साथ खडा हो तो बहुत ही भोलेपन के साथ उसके पक्ष में हम भी खडे हों,कोई ठीक बात नहीं। और न ही इसे किसी दूसरे सवाल के साथ जोड कर ही कोई बचाव किया जा सकता है। रही बात छतीसगढ वाले मामले की (जिसके बारे में मेरी जानकारी मात्र उन दो-तीन आलेखों तक ही है जो इस ब्लाग में भी पहले प्रकाशित हुए हैं- जिसमें एक पंकज जी का पत्र और दूसरा कृष्णमोहन जी का खत) तो उसमें जो सवाल आपने उठाएं हैं निश्चित ही वे जरूरी सवाल हैं। उन पर बात होनी चाहिए। लेकिन छायी हुई चुप्पी से यह समझ में आता है कि हिन्दी का रचनाजगत किस तरह से आत्ममुग्ध है जो सिर्फ़ पुरस्कार प्रकरण पर तो, वो भी आधे-अधूरे तरह से (आधे-अधूरे : क्योंकि उदय प्रकाश का नाम तो उठा, जो उठना जरूरी था, पर वहीं एक आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव के नाम पर चुप्पी है) खूब उत्तेजित होता है, पर सत्ता के चरित्र के सवालों पर वहां वैसी बेचैनी नहीं होती।
हम पढ़े लिखे सेकुलरों का एक ही काम रह गया है और वो है हन्दू विरोध तसलीमा नसरीन को जब धकियाया गया तब हिंदी से सेकुलर रहनुमा कहाँ थे ? कुछ मुस्लिम संगठनों ने गोदरेज को धमकी दी की यदि गोदरेज सलमान रुश्दी को भोज पे आमंत्रित करेंगे तो मुस्लिम समुदाय गोदरेज products का इस्तेमाल बंद कर देंगे हिंदी सेकुलर्स को सहाबुद्दीन, लालू या मुलायम से कोई दिक्कत नहीं है ये लोग सिर्फ अपनी राजनितिक रोटी सकने मैं लगे हैं मेरा ये पोस्ट देखिये शायद कुछ लोगों की आँखें खुले :
http://raksingh।blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html

30 जुलाई 2009

उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार - अनिल

गोरखपुर के भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों हिंदी के सर्वाधिक पढे़ जाने वाले लेखक उदय प्रकाश द्वारा एक ’स्मृति सम्मान’ लेने की ख़बर के साथ ही समूची हिंदी पट्टी के लेखकों, कवियों, आलोचकों और उदय प्रकाश के आत्मीय शुभचिंतकों में गहरी निराशा, क्षोभ, आक्रोश और असहमति की लहर फैल गई। हिंदी भाषा में अभी परिपक्वता की दहलीज की ओर अग्रसर नये-नवेले माध्यम ब्लॉग पर इस पूरी परिघटना के पक्ष-विपक्ष में व्यापक बहस हुई। उदय प्रकाश के अनुसार यह आयोजन नियाहत पारिवारिक था, जिसके राजनीतिक निहितार्थों के बारे में वे इतने सजग और सावधान नहीं थे।
बहरहाल, उदय प्रकाश ने अपने पाठकों, शुभचिंतकों को विचलित और दुखी कर देने की लापरवाही के कारण सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांग ली है। आख़िर उदय हिंदी के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं। उदय प्रकाश की रचनाएं चाहे वह पद्य हो या गद्य, हिंदी जगत में एक ऊर्जावान हलचल के साथ आदर पाती हैं। उनकी रचनाएं हमारे समय के शुभ्र, उज्ज्वला और ’वैधानिकता’ की खोल में छिपे अपराधियों की ख़ौफ़नाक कार्रवाइयों का कच्चा चिट्ठा भर ही नहीं है, बल्कि वे ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ साहसी प्रतिरोध का भी आह्वान करती हैं। और उनकी रचनाओं में इस ताक़त को चीन्हकर अभी कुछ दिनों पहले महाराष्‍ट्र के अमरावती जिले में, खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या के विरोध में हो रहे जनांदोलनों का दमन करने वाली राज सत्ता के ख़िलाफ़ वास्तविक, जुझारू लड़ाई लड़ने वाले दलित संगठनों ने उदय प्रकाश के सम्मान में सर झुकाते हुए उन्हें ’भीम सेना’ का प्रतीकात्मक सेनाध्यक्ष बनाकर रथ में घुमाया था। इसका जीवंत विवरण पाठक ख़ुद उदय प्रकाश के हिंदी ब्लॉग में पढ़ सकते हैं।

यह कोई कहने की बात नहीं है कि हिंदी भाषा के एक ऐसे जनपक्षधर, लोकप्रिय तथा मूर्धन्य समकालीन लेखक द्वारा बर्बर हिंदुत्व की आतंकी राजनीति करने वाले बाहुबली सांसद के हाथों सम्मान लेना हिंदी जगत के लिए अपमानजनक ही नहीं, बल्कि घोर आपत्तिजनक है। हिंदी के सुधी रचनाकारों से इस मामले में उदय से असहमति ज़ाहिर करना, उनका विरोध करना बहुत स्वाभाविक और जायज़ है।

लेकिन सवाल कुछ और भी गहरे, जटिल तथा एक-दूसरे से गहरे संबद्ध हैं, जो समूचे हिंदी परिदृश्य के दोहरे मापदंडों और छद्‍म को उजागर करते हैं। जिन दिनों उदय प्रकाश के मामले पर समूचा हिंदी जगत अपना सिर खपा रहा था, उन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ’प्रमोद वर्मा’ स्मृति न्यास की ओर से पहले प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान के तत्वावधान में दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन का प्रबंध था। न्यास के अध्यक्ष छत्तीसगढ़ पुलिस के मुखिया अर्थात डीजीपी विश्‍वरंजन इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजक थे। कार्यक्रम के दौरान छत्तीसगढ में सत्तारूढ़ भाजपा विधायक दल के नेता अर्थात मुख्यमंत्री रमन सिंह सहित कई अन्य मंत्रीगण भी बिना किसी पूर्वघोषणा के पहुंचे। कार्यक्रम में चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, नंदकिशोर आचार्य जैसे हिंदी के कई ’चर्चित’, ’बड़े’ प्रगतिशील और जनवादी लेखक, कवि और आलोचक उपस्थित थे।
आज दुनिया को यह बताने की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है कि छत्तीसगढ़ सरकार और उसके नुमाइंदों का वास्तविक चरित्र क्या है? देशी शासकों द्वारा देश के जल, जंगल, ज़मीन को बड़ी कार्पोरेट कंपनियों को सौंपे जाने के विरोध में जिन आदिवासी, मज़दूर, दलित या महिला संगठनों ने आवाज़ उठाई, उन पर सरकार के फौज़ी ’विजय अभियान’ का ’वीरता चक्र’ पूरे देश में चल रहा है। छत्तीसगढ़ इस दमन के नंगे रूप का प्रत्यक्ष बयान है, जहां ’सलवा जुडुम’ जैसे बर्बर, हत्यारे अभियान सरकारी एजेंडे में सर्वोपरि हैं, जहां अंग्रेज़ी औपनिवेशिक शासन की तर्ज़ पर आधारित ’विशेष जन (विशिष्ट जन) सुरक्षा अधिनियम’ जैसे अपराधी कानून ’लोकतंत्र’ की दुहाई दे देकर असहमति रखने वाले ’विरोधियों’ को सबक़ सिखाने के लिए हैं।

इन सारी स्थितियों का भंडाफोड़ पूरी दुनिया में हो चुका है। इसके कई ठोस उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। और इन परिघटनाओं से अब अधिकांश लोग परिचित हैं। बावजूद इसके, सत्ता तथा सरकारों के ऐसे नुमाइंदों के बीच हमारे ’बड़े’, ’चर्चित’ प्रगतिशील तथा जनवादी रचनाकारों ने क्यूं शिरकत की? यह सवाल मन को कचोटता है। कार्यक्रम की एक रपट के अनुसार मुख्यमंत्री रमन सिंह ने साहित्यकारों को विचारधारा से ’मुक्‍त’ होकर रचना करने की सलाह दी। इस बात पर यक़ीन करने का कोई मज़बूत आधार नहीं है कि रमन सिंह के राजनीतिक (कु) कृत्य और साहित्यिक क़द के बारे में वहां मौजूद हमारे प्रिय रचनाकारों को कोई जानकारी नहीं रही होगी। और इस कारण उन्होंने किसी तरह के प्रतिवाद की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की होगी। एक अन्य महत्त्वपूर्ण सवाल यह है, कि जिन लोगों ने फ़ासीवादी सांसद के हाथों सम्मान लेने वाले लेखक का प्रतिकार किया, उन लोगों ने छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ फ़ासीवादी पार्टी के मुखिया के साथ मंच शेयर करने वाले कई हिंदी लेखकों का प्रतिकार क्यों नहीं किया? पूर्वी उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की धमकी देने वाले योगी आदित्यनाथ और सल्वा जुडुम के कारण कई हज़ार लोगों को मार डालने तथा साठ हज़ार आदिवासियों को जड़ से उखाड़ देने के लिए ज़िम्मेदार रमन सिंह में क्या अंतर है?

एक ऐसे समय की धार में जब कुछ दिनों पहले ही पश्‍चिम बंगाल के बुद्धिजीवी और रचनाकार लालगढ़ में भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के सुनियोजित संहार के ख़िलाफ़ सड़कों पर खुल कर आ रहे थे, पत्र पत्रिकाओं में विरोध के स्वर को तेज़ कर रहे थे, हिंदी के लेखकों और बुद्धिजीवियों के छत्तीसगढ़ में सरकारी साहित्यिक जलसे में शामिल होने के निर्णय पर हिंदी के अन्य रचनाकारों की चुप्पी भविष्‍य के लिए भयावह संकेत हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य के दुखते रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

(लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोध छात्र हैं।)

28 जुलाई 2009

जनसंस्कृति मंच की बयानबाज़ी पर टिप्पणी - कृष्णमोहन (आलोचक)

प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान कार्यक्रम (रायपुर, 10-11 जुलाई, 09) के बारे में जनसंस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी (दिल्ली, 11-12 जुलाई) द्वारा पारित प्रस्ताव तथ्यहीन लफ़्फ़ाजी का नमूना भर है। यह इस बात का उदाहरण है कि कोई सांस्कृतिक संगठन रचनात्मकता से कटकर जब नौकरशाही प्रवृत्तियों के चंगुल में फँस जाता है तो उसका रवैया कैसा गरिमाहीन, अलोकतांत्रिक और ग़ैरज़िम्मेदार हो जाता है। दिनोदिन स्मृतिहीन होते जा रहे हमारे समाज में एक लगभग भुलाए जा चुके लेखक की स्मृति को संरक्षित करने के कार्यक्रम को यह ‘साज़िश’ करार देता है, क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने भी शिरकत की। छत्तीसगढ़ और देश के तमाम संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी को भी इसी तर्ज पर यह उनका ‘शर्मनाक पतन’ मानता है। यही नहीं, इस आरोप से बचने का एक ‘पापमोचक’ नुस्खा भी यह सुझाता है कि ये संस्कृतिकर्मी इसे अपनी ‘नादानी’ मान लें। इस उद्यण्ड प्रस्ताव के मुताबिक शिवकुमार मिश्र, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर, अशोक वाजपेई, प्रभाकर श्रोत्रिय, नन्दकिशोर आचार्य, चन्द्रकांत देवताले, प्रभात त्रिपाठी जैसे तमाम वरिष्ठ लेखक अपने पतन अथवा नादानी के कारण ही उस कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं। इसकी कोई जायज वजह उनके पास नहीं हो सकती। वैसे भी, इन बौने तानाशाहों का गुट जिसे नहीं मानता वह कोई वैध वजह कैसे हो सकती है।
बहरहाल, यह रवैया एक ऐसे संगठन के सर्वथा अनुरूप है, जो खुद तो कहीं जवाबदेह नहीं लेकिन पूरी दुनिया को अपने सामने जवाबदेह मानता है। किसी कार्यक्रम से सैकड़ों मील दूर लगभग उन्हीं तिथियों पर बैठे इसके कर्ता-धर्ता उसके ‘स्वरूप की कल्पना’ कर लेते हैं, जो वैसे भी कुछ मुश्किल नहीं, और फिर उसे अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि उस ‘खास समय’ की राजनीतिक ज़रूरत के मुताबिक़ यह कार्यक्रम सरकार की मदद के लिए कर लिया गया होगा। उन्हें इससे क़तई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इस अवसर की तैयारी वर्षों से चल रही थी। ‘प्रमोद वर्मा समग्र’ की लगभग ढाई हजार पृष्ठों की सामग्री के संकलन, संपादन और प्रकाशन के अलावा ‘स्मृति-सम्मान’ के निर्णय की प्रक्रिया, जिससे केदारनाथ सिंह, विजय बहादुर सिंह, धनंजय वर्मा और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे वरिष्ठ लेखक जुड़े हुए थे, से गुज़रकर यह आयोजन संभव हुआ। ‘समग्र’ के संपादक विश्वरंजन को प्रस्ताव में हर जगह ‘पुलिस महानिदेशक’ के रूप में याद करने की वजह भी यही है कि शब्दों की सत्ता से इस संगठन पर हाॅवी गुट का नाता टूट चुका है। इसीलिए गोरख पाण्डेय से लेकर चन्द्रशेखर तक, अपने लेखकों की विरासत को सहेजने की इसके अंदर न तो इच्छा बची है, न दूसरों के श्रम का सम्मान करने की तमीज।
जहाँ तक पुलिस महानिदेशक होने का सवाल है तो इस पद अथवा अन्य प्रशासनिक पदों से जनसंस्कृति मंच को कभी कोई समस्या नहीं रही। राज्यसत्ता का चरित्र समूचे देश में एक जैसा है और शासन-तंत्र उसकी नीतियों को लागू करने का औजार है। न इससे कम, न इससे ज़्यादा। इसलिए इस मामले में भी, अन्य मामलों की तरह, दुहरे मानदंड नहीं चल सकते। पुलिस महानिदेशक होने से किसी के व्यक्तिगत अथवा लेखकीय अधिकार कम नहीं हो जाते। दूसरों की ही तरह सत्ता से जुड़े लोगों की भी अन्य सामाजिक भूमिकाओं का वस्तुगत मूल्यांकन किए बिना उन भूमिकाओं के बारे में कही गई कोई बात निरर्थक बकवास से अधिक महत्व नहीं रखती।
इस अहंकारग्रस्त प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘वहाँ जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था।’ नैतिकता के ऊँचे पायदान पर खड़े इन महानुभावों को अगर रत्ती भर भी ज़िम्मेदारी का एहसास होता तो उन लेखकों के वक्तव्यों का भी पता करते, जिनके प्रतिनिधित्व का वे दम भरते हैं। चन्द्रकांत देवताले, कमला प्रसाद, खगेन्द्र ठाकुर और शिवकुमार मिश्र जैसे वरिष्ठ लेखकों के साथ इन पंक्तियों के लेखक ने भी अपने वक्तव्य में स्पष्ट शब्दों में मुख्यमंत्री की बात का खण्डन करते हुए विचारधाराओं के संघर्ष की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। इस प्रतिवाद को सभा ने कई बार उत्साहपूर्ण समर्थन भी दिया था। जसम के इन अधिकारियों से यही कहना है कि मुख्यमंत्री की बात सुनने में कोई ज़िल्लत नहीं थी, क्योंकि हम उनके विरोधी हैं और उनको जवाब दे सकते हैं। लेकिन आपके श्रीमुख से इन उपदेशों को सुनना सचमुच ज़िल्लत भरा है, क्योंकि आपसे हम किसी न किसी रूप से जुड़े हुए हैं। वसीम बरेलवी की पंक्तियाँ याद आती हैं -

तुम्हारे हाथ गरेबाँ तक आ गए बढ़कर
कोई बताए कि ये वार टाल दें कैसे
जो होता पाँव में काँटा निकाल सकते थे
तुम्हारी अक्ल का काँटा निकाल दें कैसे।

सच तो यह है कि देश की जनता और राज्यसत्ता में युद्ध छिड़ा हुआ है जो आगे और तीखा होने वाला है। लेखकों और बुद्धिजीवियों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्वजनिक मंचों पर कई बार उन्हें सत्ता के नुमाइंदों की मौजूदगी के बावजूद उपस्थित होना पड़ता है। हम ऐसे मौक़ों पर अपनी जनता के सम्मान की हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी के साथ जाते हैं, और किसी को ये हक़ नहीं देते कि वो हमारी इस भूमिका पर अनर्गल टिप्पणी करे। हाँ, अगर किसी को सचमुच कोई सार्थक राजनीतिक बहस चलानी हो तो वो ऐसा कर सकता है। दूसरों को नसीहत देने वाले अगर अपने गिरेबान में झाँकने को तैयार हों तो उनका स्वागत है।

15 जुलाई 2009

संस्कृतिकर्मियों की शिरकत शर्मनाक:


प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच

११-१२ जुलाई को नई दिल्ली मे सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की शिरकत को शर्मनाक बताते हुए खेद व्यक्त किया गया। स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसला उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। यह संभव है कि इस कार्यक्रम में शरीक कई लोग ऎसे भी हों जिन्हें इस कार्यक्रम के स्वरूप के बारे में ठीक जानकारी न रही हो। लेकिन जिस राज्य में तमाम लोकतांत्रिक आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, बिनायक सेन जैसे मानवाधिकारवादी चिकित्सक, अजय टी.जी. जैसे फ़िल्मकार, हिमांशु जैसे गांधीवादी को माओवादी बताकर राज्य दमन का शिकार बनाया जाता हो, जहां 'सलवा जुडुम' जैसी सरकार प्रायोजित हथियारबंद सेनाएं आदिवासियों की हत्या, लूट, बलात्कार के लिए कुख्यात हों और ३ लाख से ज़्यादा आदिवासियों को उनके घर-गांव से खदेड़ चुकी हों, जहां 'छ्त्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिट ऎक्ट' जैसे काले कानून मीडिया से लेकर तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोंटने के काम आते हों, वहां के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन (जिनके नेतृत्व में यह दमन अभियान चल रहा हो), के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के स्वरूप की कल्पना मुश्किल नहीं थी। वहां जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था। बहरहाल, यह घटना वामपंथी, प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए चिंताजनक और शर्मसार होने वाली घटना ज़रूर है। हम यह उम्मीद ज़रूर करते हैं कि जो साथी वहां नाजानकारी या नादानी में शरीक हुए, वे सत्ता द्वारा धोखे से अपना उपयोग किए जाने की सार्वजनिक निंदा करेंगे और जो जानबूझकर शरीक हुए थे, वे आत्मालोचन कर खुद को पतित होने से भविष्य में बचाने की कोशिश करेंगे और किसी भी जनविरोधी, फ़ासिस्ट सत्ता को वैधता प्रदान करने का औजार नहीं बनेंगे। हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुऒं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है।

13 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ : डीजीपी विश्वरंजन के नाम एक खुला ख़त

महोदय,
सादर अभिवादन !
आशा है, आप अच्छी तरह हैं।
जैसा कि आपको मालूम ही है, आपके द्वारा रायपुर में 10-11 जुलाई, 2009 को आयोजित की जा रही दो--दिवसीय 'राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी ' के एक सत्र 'आलोचना का प्रजातंत्र ' में अपना वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया था। इस सम्बन्ध में आपका पत्र ---दिनांक 15 मई , 2009 मुझे ई-मेल की मार्फ़त 18 जून, 2009 को भेजा गया और उसी दिन मिला था। उपर्युक्त संगोष्ठी में अपनी शिरकत की स्वीकृति मैंने आपको ई-मेल के ज़रिए दिनांक 19 जून, 2009 को भेज दी थी और उस पत्र में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि आप सार्थक तथा उदात्त चिन्ताओं से प्रेरित होकर यह अहम संगोष्ठी करा रहे हैं और अपनी इस कृतज्ञता को भी व्यक्त किया था कि आपने मुझ जैसे अदना लेखक को इसमें आमंत्रित करने लायक़ समझा। यों रायपुर आने के लिए मैंने रेलवे रेज़र्वेशन्स करा लिए थे. मगर कल , यानी 6 जुलाई, 2009 को सहसा मेरी नज़र हिन्दी पाक्षिक ' द पब्लिक एजेंडा' के 8 जुलाई, 2009 के पृ . सं. 13 पर छतीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक के तौर पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार पर गयी और इसे पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि मुझे उपर्युक्त संगोष्ठी में हिस्सेदारी करने का अपना फ़ैसला रद्द करना पड़ा और रायपुर आने के अपने रेलवे रेज़र्वेशन्स भी. कृपया इस असहयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे और मेरी वैचारिक असहमति को हरगिज़ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ग्रहण करेंगे ! दरअसल आप अपने साक्षात्कार में 'सलवा जुडूम ' सरीखी सरकार द्वारा संरक्षित ,पोषित और संचालित -----साधनहीन, विपन्न और अत्यंत सामान्य मानवाधिकारों से भी महरूम आदिवासियों का दमन करनेवाली-----संस्था का बेझिझक और सम्पूर्ण समर्थन करते हैं, जो मेरे जैसे लोगों के लिए एक बहुत तकलीफ़देह मामला है. आपने कहा है-----"इस समय बस्तर में हम पूरे ज़ोर-शोर से माओवादियों से लड़ रहे हैं. " सवाल है कि ये 'माओवादी ' कौन हैं ? क्या ये वही आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें माओवादी बताकर हाल ही में पश्चिम बंगाल पुलिस ने लालगढ़ में न सिर्फ़ उन पर अत्याचार किये हैं ; बल्कि बकौल मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, " उनकी हत्याएँ भी की हैं. " बहरहाल. आपने अपने इस साक्षात्कार में यह आत्मविश्वास भी व्यक्त किया है कि "उनके खिलाफ़ पुलिस ही लड़ेगी और अंत में जीतेगी. " तो महोदय, पुलिस के आखिरकार जीत जाने में भला किसको संशय हो सकता है ? कुछ ही समय पहले दिवंगत हुए महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कभी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हमारे देश का सबसे शक्तिशाली आदमी पुलिस कांस्टेबल होता है. " फिर जहाँ पूरे देश की पुलिस लालगढ़ से छत्तीसगढ़ तक आदिवासियों के बेरहम दमन में शामिल हो ; वहाँ उसके अकूत पराक्रम की तो केवल कल्पना की जा सकती है ! इस अद्भुत बल-विक्रम का एक सुबूत पेश करते हुए आपने कहा है -----"उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया है ." गौरतलब है कि आपने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को खदेड़कर पहुँचाया कहाँ गया है ! दूसरे शब्दों में, उनके पुनर्वास का क्या इंतिज़ाम सरकार ने किया है ? ' सलवा जुडूम ' का साथ देते हुए आप कहते हैं कि "इसके खिलाफ़ जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है , उसके लिए माओवादियों को दाद देनी चाहिए ." दिलचस्प है कि फिर आप यह भी जोड़ते हैं-----' सलवा जुडूम ' माओवादियों के खिलाफ़ जनता की बगावत है.' सवाल है कि अगर यह सच है, तो उनकी विचारधारा और उनको उसी "जनता" की सहानुभूति और समर्थन कैसे प्राप्त होता है ? हम हिंसा के रास्ते के हामी नहीं हैं , लेकिन जिनसे उनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वुजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है. दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी-----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी-----नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें , कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इस समूचे अंतर्विरोध, विडम्बना और त्रासदी की भौतिक परिणति आसन्न अतीत में लालगढ़ में दिखायी पड़ी ; जहाँ पूरी दुनिया ने देखा है-----सरकारें चाहे जो कहती रहें-----कि हथियार कथित माओवादियों ने नहीं, बल्कि निरीह आदिवासियों ने उठाये हुए थे, भले उस सबका अंत उनके निर्मम और अप्रत्याशित पुलिस दमन में ही हुआ है. यह सब तब हो रहा है और लगातार हो रहा है, जब दुनिया भर के सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और प्रतिबद्ध राजनीतिग्य एक आवाज़ में यह माँग कर रहे हैं कि इन सभी समस्याओं को राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है और यह कि इस सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया को अपनाने का कोई भी मानवीय विकल्प न है, न हो सकता है. इसके विपरीत, आप कहते हैं कि पहले उन्हें "हथियार शासन को सौंपने होंगे, तभी कोई बातचीत संभव है. " सवाल है कि जब उनके पास ये हथियार नहीं थे , तब उनकी समस्याओं का कौन-सा राजनीतिक हल तलाशा गया और जहाँ-जहाँ इन हथियारों और हथियार उठानेवालों को-----आपके ही शब्दों में कहूँ , तो "खदेड़" दिया गया है-----वहाँ वर्तमान में तमाम प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों द्वारा समाधान के लिए कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी जा रही है ? आपके राज्य छत्तीसगढ़ में तो आलम यह है कि बक़ौल गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, " सरकार और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासी मारे जा रहे हैं और विस्थापित हो रहे हैं . हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत के ज़रिए ही कोई हल निकाला जाना चाहिए , जिसकी पहल न राज्य कर रहा है , न माओवादी. " 'द पब्लिक एजेंडा ' के कार्यालय संवाददाता ( दिल्ली ) अजय प्रकाश के अनुसार-----"हिमांशु कुमार की यही साफ़गोई उनके लिए घातक साबित हुई है और दंतेवाड़ा प्रशासन ने 17 मई , 2009 को उनका आश्रम ढहा दिया . दंतेवाड़ा से लौटकर सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय बताते हैं ,'हिमांशु के बारे में पूरा क्षेत्र जानता है कि ' सलवा जुडूम ' अभियान से विस्थापित और उजड़े आदिवासियों के पुनर्वास जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार हिमांशु को माओवादियों का शुभचिन्तक बताकर दंतेवाड़ा से खदेड़ने की फिराक में है. " लगता है कि " खदेड़ना " छत्तीसगढ़ पुलिस-प्रशासन का तकियाकलाम बन गया है , उसकी केन्द्रीय रणनीति . हिटलर के ' फ़ाइनल सॉल्यूशन ' की तरह . उसका कहना था कि 'जो लोग तुम्हें पसंद न हों , उन्हें ख़त्म कर दो .' यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो लोग तुम्हारे आड़े आते हों , उन्हें " खदेड़ " दो ! हालत यह है कि अगर कोई गाँधीवादी भी आपसे असहमत है , तो आपके मुताबिक़ वह "माओवादी " है ! छत्तीसगढ़ में जो सरकार के बताये रास्ते पर बिना कुछ सोचे-समझे नहीं चल रहा है ; वह इन दिनों माओवादी या नक्सली के तौर पर ' ब्रांडेड ' किये जाने , पुलिस उत्पीड़न झेलने , वहाँ से बेदख़ल किये जाने या " खदेड़ " दिये जाने और सज़ा भुगतने को अभिशप्त है. इस ट्रेजेडी का सबसे ज्वलंत उदाहरण डॉ. बिनायक सेन हैं , जो एक डॉक्टर के नाते छत्तीसगढ़ की आम जनता , ख़ास तौर पर वहाँ के आदिवासियों की चिकित्सा-सेवा में संलग्न थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने उन पर नक्सलियों और माओवादियों का साथ देने का इल्ज़ाम मढ़ते हुए उन्हें जेल पहुँचा दिया. क़रीब तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए रिहा किया कि उनके खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं पाये गये . मगर यह फ़ैसला आने तक एक निर्दोष और जन-सेवी डॉक्टर 3 साल जेल की सज़ा काट चुका था. इससे पुलिस-प्रशासन की अपरिमित दमनकारी ताक़त की कल्पना ही की जा सकती है. मुझे यह पता चला है कि आप कविता भी लिखते हैं . इसलिए मेरी यह जिग्यासा है कि अपने इस क़िस्म के सरकारी काम और कवि -कर्म के बीच क्या आपको कोई यातनाप्रद द्वंद्व महसूस नहीं होता या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अंतर्विरोध या द्वंद्व हो ही नहीं ? श्री प्रमोद वर्मा , जिनके नाम पर यह आयोजन हो रहा है और पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं -----------पहला सवाल तो यह है कि अगर वे कहीं हैं , तो उन्हें कैसा लग रहा होगा ? दूसरी बात यह कि उपर्युक्त सरकारी कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए ही क्या यह आयोजन नहीं किया जा रहा है ? कैसी विडम्बना है कि आपने इस संगोष्ठी में " आलोचना का प्रजातंत्र " शीर्षक एक पूरा सत्र ही रखा हुआ है ; जबकि आपके निज़ाम में न आलोचना की कोई वास्तविक गुंजाइश है और न निरीह प्रजा की ही कोई सुनवाई ! यह भी कोई महज़ संयोग नहीं कि पुरस्कृत और उपकृत करने के लिए आपने आलोचकों को ही निशाना बनाया ; जिससे 'आलोचना ' का रहा-सहा साहस , संवेदनशीलता, मूल्य्निष्ठता , प्रश्नाकुलता और विवेक का भी अपहरण किया जा सके और उसे निष्प्रभ एवं निस्तेज बनाया जा सके ! इस सन्दर्भ में मुझे रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता याद आ रही है ; जिसमें उन्होंने लिखा है----- "
आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से
जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा ?
हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए
जो कविता हम सबको लाचार बनाती है ?
" जहाँ तक मुझे मालूम है , श्री प्रमोद वर्मा , मुक्तिबोध के काफ़ी निकट थे. इसलिए इसे एक काव्य-न्याय ही मानता हूँ कि मुक्तिबोध की इन काव्य-पंक्तियों की स्मृति ने मुझे उपर्युक्त कार्यक्रम में शामिल होने से आखिरकार रोक लिया-----
" भीतर तनाव हो
विचारों का घाव हो
कि दिल में एक चोट हो आये
-दिन ठंडी इन रगों को गर्मी की खोज है
वैसे यह ज़िन्दगी भोजन है , मौज है । "
आदर और शुभकामनाओं के साथ ;
आपका ,
पंकज चतुर्वेदी कानपुर

06 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ व उड़ीसा के बंधुआ/विस्थापित मजदूरों के अध्ययन की एक संक्षिप्त रपट

समय के साथ चीजों को बदलना था, गुलामी खत्म होनी थी, समाज में व्याप्त जड. प्रवृत्तियां बदलनी थी. अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद देश के एक बडे़ मनोजगत का यही सोचना था. पर अफसोस कि अंग्रेजों से मुक्ति जिसे आज़्ाादी कहा गया, महज़्ा सत्ता बदलाव तक ही सीमित रही यानि सामाजिक संरचना में कोई खास बदलाव नहीं आया छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कुछ जिलों में बंधुआ मजदूरों पर किये गये अध्ययन के दौरान निकलकर आये तथ्य तो यही कहते हैं.
अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति के बाद जनता को स्वतंत्र्ाता, समता व अन्य कई मौलिक अधिकार दिये गये, जिनका मिलना अपने को लोकतांत्र्ािक कहे जाने वाले देश में लाज़्ामी था. इन कानूनों के होने के बाद भी स्थिति ये रही कि देश के कई इलाकों में बंधुआ मजदूरी की प्रथा जारी रही अतः 19 फरवरी 1976 को बंधुआ मजदूर जो कि दुर्बल वर्ग के होते थे या आज भी हैं के शारीरिक व आर्थिक शोषण से मुक्ति हेतु ’बंधित श्रम प्रथा उन्मूलन नियम 1976’ सत्ता हस्तांतरण के 27 वर्ष बाद बनाया गया. इसके पश्चात अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति 1989 अधिनियम भी बनाया गया, जिसका सम्बंध बंधुआ मजदूरों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि देश में चल रही बंधुआ प्रथा में एक अंकडे के मुताबिक 98 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग प्रताड़ित होते हैं.
कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरों को लेकर कुछ अन्य नियम भी बनाये गये जैसे बंधुआ मजदूर व प्रवासी बंधुआ मजदूर जो किसी अन्य राज्य में जाकर बंधुआ के रूप में कार्य करते हैं उनके लिये जिले में सतर्कता समिति के गठन का भी सुझाव दिया गया और समिति निर्माण का कार्य जिला अधिकारी को दिया गया. साथ में बंधुआ मजदूरी कराने वाले व्यक्ति नियोक्ता ठेकेदार आदि को दंडित करने का नियम भी बनाया गया जो 3 वर्ष तक कारावास व 2000 रूपये जुर्माने के रूप में थी. सरकार द्वारा बंधुआ मजदूरों के सम्बंध में राहत राशि की व्यवस्था भी की गयी जो 25,000 रूपये उनके पुनर्वास हेतु व पानी भूमि आदि के रूप में की गयी.जिसे छत्तीसगढ के कुछ जिलों में जिनमे महासमुंद, रायपुर व उड़ीसा के बरगड़ नवापाड़ा आदि में गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा बंधुआ मजदूरों को इंगित कर उनमे से कुछ को यह सुविधा प्रदान कराई गयी पर कई बंधुआ मजदूरों को यह अभी तक नही मिली.
प्रस्तुत रिपोर्ट प्रथम व द्वितीय श्रोतों के अध्ययन का एक संक्षिप्तीकरण है. जिसमे यह बात गौर करने की है कि कानूनों के दबाव व नियमों को ध्यान में रखते हुए राज्यों में बंधुआ मजदूरों का स्वरूप बदल गया है. अध्ययन के दौरान इस बात का पता लगा कि बंधुआ मजदूरों को लेकर स्वामी अग्निवेश के अंदोलन के प्रभाव से बंधुआ मजदूरों की स्थिति में बदलाव आया या कहा जाय कि उनका स्वरूप बदल गया क्योंकि उनके प्रभाव में आकर राज्य के कई संस्थाओं व कार्यकर्ताओं ने बंधुआ मुक्ति अंदोलन चलाया जिनमें छत्तीसगढ़ बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने महती भूमिका निभाई है.कारणवस जो पारंपरिक स्वरूप था वह बहुत कम दिखता है परंतु यह बदले हुए स्वरूप में बड़ी मात्र्ाा में मौजूद है. मसलन छत्तीसगढ़ में विस्थापन एक बड़ी समस्या के रूप में रहा है और अधिकांसतः यह बधुआ मजदूरों के रूप में ही होता है. 1981 में मध्यप्रदेश के एक कमिश्नर (तब छत्तीसगढ़ अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में नही आया था ) लोहानी ने आब्रजन कानून बनाया ताकि यहां से बंधुआ बनकर जाने वाले मजदूरों को रोका जा सके जबकि उनके कारणों की खोज कर निदान करने का प्रयास नहीं किया गया.
अध्ययन के दौरान बंधुआ बनकर विस्थापित होने वाले मजदूरों के संदर्भ में जो कारण निकल कर आये वे कई आयामों के साथ हैं.
एक तो छत्तीसगढ़ के किसान जो भूमि युक्त हैं या जो छोटे किसान हैं बारिस के बाद यानि धान की फसल लगाने के पश्चात उनके पास अन्य फसल लगाने के अवसर नहीं होते हैं. अत बारिस के बाद वे खाली हो जाते हैं, उनके पास संग्रहित धान इतने नहीं होते कि वे वर्ष भर इससे अपनी आजीविका चला सकें. न ही राज्य में मजदूरी की इतनी उप्लब्धता जिस वज़्ाह से वे अपनी आजीविका हेतु किसी अन्य राज्य मसलन उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, जम्मू-काष्मीर, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक आदि राज्यों में पलायन कर जाते हैं जिस वर्ष छत्तीसगढ़ मे सूखा पड़ता है यह पलायन की दर और बढ़ जाती है. एक अंकडे़ के मुताबिक 2001 में पडे़ सूखे की वज़्ाह से 20,000 गांव से 6 लाख से अधिक मजदूरों का पलायन हुआ था.
वहीं 18 लाख के आस-पास यहां भूमिहीन मजदूर भी हैं खासतौर से पलायन जिन जिलों से अधिक होता है उनमें बिलासपुर, जांजी-चाम्पा, महासमुंद आदि हैं यहां जमीन प्रति एकड़ से भी कम है ऐसी स्थिति में ठेकेदार इन्हें एडवांस देकर लेजाते हैं और दिन-रात काम के बदले अपने मन मुवाफ़िक रकम ही देते हैं. कई बार दिया हुआ एडवांस चुकता नही होने पर इन्हें फिर से उसी रकम पर वहीं जाना पड़ता है या फिर नियोक्ता इन्हे आने की अनुमति ही नहीं देता. ऐसी स्थिति में महिलाओं के साथ दुवर््यवहार भी होता है. कुछ मामले ऐसे भी हैं जिनमे मजदूर बंधक बनकर गये और उन्हें छोड़ने के लिये परिजनों से पैसा भी मांगा गया.
बंधक बनकर जाने वाले मजदूरों के दवा पानी राशन आदि की सुविधा कई नियोक्ता करते भी हैं तो अंत मे उनकी मजदूरी जो प्रायः अनुबंधित मजदूरी से कम होती है उसमें से काट लिया जाता है. मजदूर अनपढ़ होते हैं अतः उन्हें सही-सही पता नहीं चल पाता कि उन्हें कितना मिलना चाहिये कितना नहीं. नियोक्ता लौटते वक्त जितना देता है उतना ही लेने के लिये वे मजबूर रहते हैं. विस्थापित होने वाले ज्यादातर बंधुआ मजदूर ईंट भट्ठों पर काम के लिये अपने परिवार के साथ जाते हैं जिन्हें 1000 ईंट बनाने का 120-130 रूपये दिया जाता है पर यह दर सभी के लिये समान रूप से लागू नहीं होती यह उनके द्वारा लिये गये दादेन ( एडवांस) पर निर्भर करती है कई बार वे मुफ्त में भी काम करते हैं .
कई मामले ऐसे भी हैं जहां उनके मजदूरी का पैसा एक वर्ष के लिये रोक लिया जाता है यानि इस वर्ष का अगले बरस. इससे होता यह है कि मजदूर अगली बार नियोक्ता तक खुद पहुंच जाता है और उससे बंधने के लिये मजबूर होता है. यह पलायन अक्टूबर माह से चालू होता है और मई तक मजदूर लौट कर फिर अपने गांव आते हैं.
छत्तीसगढ़ व अध्ययन के लिये चुने गये उड़ीसा के जिले आधिकांसतः आदिवासी बाहुल्य हैं. सतत क्रम में अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि आदिवासियों का विस्थापन हाल के वर्षों में बढ़ा है, इससे पहले उनका विस्थापन कम होता था. सरकारी तौर पर हाल में काफी सख्ती विस्थापित होने वाले मजदूरों को लेकर बरती गयी. मसलन गांव के स्तर पर समितियां भी बनायी गयी, ग्राम उत्कर्ष योजना के तहत विस्थापन के समय में गांव में कार्य हेतु पैसे आबंटित किये गये, स्टेशन बस स्टैंड पर पुलिस तैनात की गयी. पर पुलिस मजदूरों के साथ ज्यादती नही करती. वह 10 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से ठेकेदारों से ले लेती है और मजदूरों को जाने देती है.
बंधुआ मजदूर अक्सर सपरिवार ही पलायित करते हैं. गांव में केवल बूढे़ बचते हैं जो फसल से उपजे धान से अपनी जीविका चलाते हैं. अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि पलायित होने वाले बंधुआ मजदूर अधिकांशतः अनुसूचित जाति या जन जाति के हैं जिनमे बहुतों के पास न तो घर के जमीन का पट्टा है न ही खेत का, वे जंगल की जमीन पर रहते हैं.
वे अपने युवा बेटियों को कम ले जाते हैं क्योकि उनके साथ दुर्वयवहार होने की आशंका रहती है अतः एडवांस या दादेन लेकर उनकी शादी जल्दी कर देते हैं. ईट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर अक्सर जोड़ों के रूप में ही काम करते हैं. इन्हें किसी तरह की छुट्टी नही दी जाती जिस दिन नियोक्ता इन्हें पैसा देता है उस दिन सामान खरीदने जाने की छूट होती है. न तो नियोक्ता द्वारा इनके लिये किसी शौचालय की व्यवस्था होती है, न ही इन्हें बेतन कार्ड दिया जाता है, बच्चों के लिये पालना घर जैसी कोई सुविधा नहीं होती काम करते वक्त ये अपने बच्चों को साथ लिये होते हैं. इनके घर इनके द्वारा बनाये गये कच्चे ईंट पर घास लगाकर तैयार किये जाते हैं. और अधिकांश मजदूरों को सरकार के द्वारा तय की गयी मजदूरी का पता भी नहीं होता. अतः पलायित मजदूर असुरक्षा के बीच घोर अमानवीय व्यवस्था में जीते हैं.
अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि राज्य के कुछ जिलों में अभी भी ऐसे बंधुआ मजदूर मौजूद हैं जो पारंपरिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ बने हुए हैं. और ये अपने को बंधुआ मानते भी हैं. ये अपने पूरे परिवार के साथ नियोक्ता यानि मालिक के घर पर काम करते हैं और प्रति दिन 700 ग्राम धान प्राप्त करते हैं. ये पूरी तरह से अपने मालिकों के संरक्षण में रहते हैं साथ ही जब इनकी अगली पीढ़ी बड़ी होती है तो वह भी वही काम करने लगती है प्रायः ये खेती, किसानी व घरेलू काम ही करते हैं व मालिक द्वारा कहीं पर भेज कर भी काम करवाया जाता है. जिसका पैसा मालिक खुद प्राप्त करता है. बीमार होने पर मालिक की तरफ से दवा करवा दी जाती है पर यह बीमारी पर निर्भर करता है. किसी गंभीर बीमारी की वज़्ाह से कई बार इनके सदस्यों की मृत्यु भी हो जाती है.
छत्तीसगढ़ के कई जिले ऐसे हैं जिनका विकास औद्योगिक क्षेत्र्ा के रूप में हुआ है. मसलन सिलतरा, उर्ला, भिलाई, दुर्ग राजनांदगांव आदि इन औद्योगिक ईकाईयों में राज्य व राज्य के बाहर से मजदूर लाखों की संख्या में काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों से यहां नियमित मजदूरों की संख्या घटी है और ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा मिला है. स्वयं भिलाई स्टील प्लांट में 90 के दशक में जहां पहले 96,000 के आस-पास मजदूर थे, उनकी संख्या घटकर महज़्ा 27,000 के आस-पास पहुंच गयी है, और इतने ही के आस्-पास संख्या में मजदूर ठेकेदारों की नियुक्ति पर काम करते हैं. बाकी संख्या के मजदूर मशीनीकरण की वज़्ाह से हटा दिये गये. ठेकेदारों के मातहत काम करने वाले मजदूर एडवांस लेकर उनके बंधुआ बनते हैं जबकि उर्ला व सिलतरा क्षेत्र्ा में जहां स्पंज आयरन व पावर प्लांट की बहुलता है वहां अधिकांस संख्या में ठेकेदारी प्रथा लागू है जो कि एडवांस देकर बधुआ बने मजदूरों पर आधारित है. आने वाले बंधुआ मजदूर बस्तर, व दांतेवाडा जैसे जंगलों के आदिवासी भी हैं जो पहले अपनी आजीविका जंगलों में खोज लिया करते थे पर कम होते व कटते जंगलों से इनके आजीविका की समस्या बढ़ रही है और ये पलायित होने व बंधुआ बनने को मजबूर हो रहे हैं. इन मजदूरों के लिये न ही कोई षौचालय की व्यवस्था की गयी है न ही पीने के साफ पानी की आस-पास के तालाबों में ये स्नान करते हैं, जहां का जल इन कम्पनियों के प्रदूषण से काला हो चुका है. स्थिति ये है कि आधे घंटे सड़क पर रहने के बाद कई कि.मी. के इलाके में फैले प्रदूषण की वज़्ाह से मुंह पर कालिख जम जाती है. यहां की फसलें काली होने की वज़्ाह से बिक्री में भी समस्या होती है कई बार मजबूर होकर सरकार खरीदती है. अन्यथा किसानों के यहां सड़ जाता है. इन काम करने वाले मजदूरों को ठेकेदार 1500 से 2000 रूपये मासिक देता है और 12 घंटे से ज्यादा काम करना पड़ता है.प्रायः ये अकुशल श्रमिक के रूप में देखे जाते हैं यही हालत अन्य कई क्षेत्र्ा में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा बंधक मजदूरों के साथ भी है जो सड़क निर्माण से लेकर चावल मिल में काम करते हैं दृ अतः ठेकेदारी की बड़ती प्रथा ने बंधुआ मजदूरों के स्वरूप को बदल दिया है. जिससे बंधुआ का जो संवैधानिक विश्लेषण है उसके तहत इन्हें पहचानना मुश्किल है.
चन्द्रिका