13 जुलाई 2009

छत्तीसगढ़ : डीजीपी विश्वरंजन के नाम एक खुला ख़त

महोदय,
सादर अभिवादन !
आशा है, आप अच्छी तरह हैं।
जैसा कि आपको मालूम ही है, आपके द्वारा रायपुर में 10-11 जुलाई, 2009 को आयोजित की जा रही दो--दिवसीय 'राष्ट्रीय आलोचना संगोष्ठी ' के एक सत्र 'आलोचना का प्रजातंत्र ' में अपना वक्तव्य प्रस्तुत करने के लिए आपने मुझे आमंत्रित किया था। इस सम्बन्ध में आपका पत्र ---दिनांक 15 मई , 2009 मुझे ई-मेल की मार्फ़त 18 जून, 2009 को भेजा गया और उसी दिन मिला था। उपर्युक्त संगोष्ठी में अपनी शिरकत की स्वीकृति मैंने आपको ई-मेल के ज़रिए दिनांक 19 जून, 2009 को भेज दी थी और उस पत्र में इस बात की ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि आप सार्थक तथा उदात्त चिन्ताओं से प्रेरित होकर यह अहम संगोष्ठी करा रहे हैं और अपनी इस कृतज्ञता को भी व्यक्त किया था कि आपने मुझ जैसे अदना लेखक को इसमें आमंत्रित करने लायक़ समझा। यों रायपुर आने के लिए मैंने रेलवे रेज़र्वेशन्स करा लिए थे. मगर कल , यानी 6 जुलाई, 2009 को सहसा मेरी नज़र हिन्दी पाक्षिक ' द पब्लिक एजेंडा' के 8 जुलाई, 2009 के पृ . सं. 13 पर छतीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक के तौर पर प्रकाशित आपके साक्षात्कार पर गयी और इसे पढ़कर मैं इतना विचलित हुआ कि मुझे उपर्युक्त संगोष्ठी में हिस्सेदारी करने का अपना फ़ैसला रद्द करना पड़ा और रायपुर आने के अपने रेलवे रेज़र्वेशन्स भी. कृपया इस असहयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे और मेरी वैचारिक असहमति को हरगिज़ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं ग्रहण करेंगे ! दरअसल आप अपने साक्षात्कार में 'सलवा जुडूम ' सरीखी सरकार द्वारा संरक्षित ,पोषित और संचालित -----साधनहीन, विपन्न और अत्यंत सामान्य मानवाधिकारों से भी महरूम आदिवासियों का दमन करनेवाली-----संस्था का बेझिझक और सम्पूर्ण समर्थन करते हैं, जो मेरे जैसे लोगों के लिए एक बहुत तकलीफ़देह मामला है. आपने कहा है-----"इस समय बस्तर में हम पूरे ज़ोर-शोर से माओवादियों से लड़ रहे हैं. " सवाल है कि ये 'माओवादी ' कौन हैं ? क्या ये वही आदिवासी नहीं हैं, जिन्हें माओवादी बताकर हाल ही में पश्चिम बंगाल पुलिस ने लालगढ़ में न सिर्फ़ उन पर अत्याचार किये हैं ; बल्कि बकौल मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी, " उनकी हत्याएँ भी की हैं. " बहरहाल. आपने अपने इस साक्षात्कार में यह आत्मविश्वास भी व्यक्त किया है कि "उनके खिलाफ़ पुलिस ही लड़ेगी और अंत में जीतेगी. " तो महोदय, पुलिस के आखिरकार जीत जाने में भला किसको संशय हो सकता है ? कुछ ही समय पहले दिवंगत हुए महान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर ने कभी अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि "हमारे देश का सबसे शक्तिशाली आदमी पुलिस कांस्टेबल होता है. " फिर जहाँ पूरे देश की पुलिस लालगढ़ से छत्तीसगढ़ तक आदिवासियों के बेरहम दमन में शामिल हो ; वहाँ उसके अकूत पराक्रम की तो केवल कल्पना की जा सकती है ! इस अद्भुत बल-विक्रम का एक सुबूत पेश करते हुए आपने कहा है -----"उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया है ." गौरतलब है कि आपने यह नहीं बताया कि ऐसे लोगों को खदेड़कर पहुँचाया कहाँ गया है ! दूसरे शब्दों में, उनके पुनर्वास का क्या इंतिज़ाम सरकार ने किया है ? ' सलवा जुडूम ' का साथ देते हुए आप कहते हैं कि "इसके खिलाफ़ जिस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है , उसके लिए माओवादियों को दाद देनी चाहिए ." दिलचस्प है कि फिर आप यह भी जोड़ते हैं-----' सलवा जुडूम ' माओवादियों के खिलाफ़ जनता की बगावत है.' सवाल है कि अगर यह सच है, तो उनकी विचारधारा और उनको उसी "जनता" की सहानुभूति और समर्थन कैसे प्राप्त होता है ? हम हिंसा के रास्ते के हामी नहीं हैं , लेकिन जिनसे उनका सब-कुछ छीन लिया गया हो, कई बार हथियार उठाना उनके लिए अपने वुजूद की रक्षा का आख़िरी उपाय होता है. दूसरे, जिनकी जीवन-स्थितियों में बदलाव और बेहतरी के सारे राजनीतिक रास्ते इस व्यवस्था में सदियों से बंद रहे आते हों और जिनके खुलने की कोई उम्मीद उन्हें आज भी-----आज़ादी मिलने के साठ बरस बाद भी-----नज़र न आती हो, वे आखिर क्या करें , कहाँ जायें, कैसे जियें, इस निज़ाम के नियंताओं से अपने अधिकार और अपने लिए न्याय कैसे माँगें ? इस समूचे अंतर्विरोध, विडम्बना और त्रासदी की भौतिक परिणति आसन्न अतीत में लालगढ़ में दिखायी पड़ी ; जहाँ पूरी दुनिया ने देखा है-----सरकारें चाहे जो कहती रहें-----कि हथियार कथित माओवादियों ने नहीं, बल्कि निरीह आदिवासियों ने उठाये हुए थे, भले उस सबका अंत उनके निर्मम और अप्रत्याशित पुलिस दमन में ही हुआ है. यह सब तब हो रहा है और लगातार हो रहा है, जब दुनिया भर के सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और प्रतिबद्ध राजनीतिग्य एक आवाज़ में यह माँग कर रहे हैं कि इन सभी समस्याओं को राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है और यह कि इस सन्दर्भ में राजनीतिक प्रक्रिया को अपनाने का कोई भी मानवीय विकल्प न है, न हो सकता है. इसके विपरीत, आप कहते हैं कि पहले उन्हें "हथियार शासन को सौंपने होंगे, तभी कोई बातचीत संभव है. " सवाल है कि जब उनके पास ये हथियार नहीं थे , तब उनकी समस्याओं का कौन-सा राजनीतिक हल तलाशा गया और जहाँ-जहाँ इन हथियारों और हथियार उठानेवालों को-----आपके ही शब्दों में कहूँ , तो "खदेड़" दिया गया है-----वहाँ वर्तमान में तमाम प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों द्वारा समाधान के लिए कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया चलायी जा रही है ? आपके राज्य छत्तीसगढ़ में तो आलम यह है कि बक़ौल गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, " सरकार और माओवादियों की लड़ाई में आदिवासी मारे जा रहे हैं और विस्थापित हो रहे हैं . हिंसा का रास्ता छोड़ बातचीत के ज़रिए ही कोई हल निकाला जाना चाहिए , जिसकी पहल न राज्य कर रहा है , न माओवादी. " 'द पब्लिक एजेंडा ' के कार्यालय संवाददाता ( दिल्ली ) अजय प्रकाश के अनुसार-----"हिमांशु कुमार की यही साफ़गोई उनके लिए घातक साबित हुई है और दंतेवाड़ा प्रशासन ने 17 मई , 2009 को उनका आश्रम ढहा दिया . दंतेवाड़ा से लौटकर सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय बताते हैं ,'हिमांशु के बारे में पूरा क्षेत्र जानता है कि ' सलवा जुडूम ' अभियान से विस्थापित और उजड़े आदिवासियों के पुनर्वास जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. लेकिन सरकार हिमांशु को माओवादियों का शुभचिन्तक बताकर दंतेवाड़ा से खदेड़ने की फिराक में है. " लगता है कि " खदेड़ना " छत्तीसगढ़ पुलिस-प्रशासन का तकियाकलाम बन गया है , उसकी केन्द्रीय रणनीति . हिटलर के ' फ़ाइनल सॉल्यूशन ' की तरह . उसका कहना था कि 'जो लोग तुम्हें पसंद न हों , उन्हें ख़त्म कर दो .' यहाँ यह कहा जा रहा है कि जो लोग तुम्हारे आड़े आते हों , उन्हें " खदेड़ " दो ! हालत यह है कि अगर कोई गाँधीवादी भी आपसे असहमत है , तो आपके मुताबिक़ वह "माओवादी " है ! छत्तीसगढ़ में जो सरकार के बताये रास्ते पर बिना कुछ सोचे-समझे नहीं चल रहा है ; वह इन दिनों माओवादी या नक्सली के तौर पर ' ब्रांडेड ' किये जाने , पुलिस उत्पीड़न झेलने , वहाँ से बेदख़ल किये जाने या " खदेड़ " दिये जाने और सज़ा भुगतने को अभिशप्त है. इस ट्रेजेडी का सबसे ज्वलंत उदाहरण डॉ. बिनायक सेन हैं , जो एक डॉक्टर के नाते छत्तीसगढ़ की आम जनता , ख़ास तौर पर वहाँ के आदिवासियों की चिकित्सा-सेवा में संलग्न थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने उन पर नक्सलियों और माओवादियों का साथ देने का इल्ज़ाम मढ़ते हुए उन्हें जेल पहुँचा दिया. क़रीब तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए रिहा किया कि उनके खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं पाये गये . मगर यह फ़ैसला आने तक एक निर्दोष और जन-सेवी डॉक्टर 3 साल जेल की सज़ा काट चुका था. इससे पुलिस-प्रशासन की अपरिमित दमनकारी ताक़त की कल्पना ही की जा सकती है. मुझे यह पता चला है कि आप कविता भी लिखते हैं . इसलिए मेरी यह जिग्यासा है कि अपने इस क़िस्म के सरकारी काम और कवि -कर्म के बीच क्या आपको कोई यातनाप्रद द्वंद्व महसूस नहीं होता या कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अंतर्विरोध या द्वंद्व हो ही नहीं ? श्री प्रमोद वर्मा , जिनके नाम पर यह आयोजन हो रहा है और पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं -----------पहला सवाल तो यह है कि अगर वे कहीं हैं , तो उन्हें कैसा लग रहा होगा ? दूसरी बात यह कि उपर्युक्त सरकारी कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए ही क्या यह आयोजन नहीं किया जा रहा है ? कैसी विडम्बना है कि आपने इस संगोष्ठी में " आलोचना का प्रजातंत्र " शीर्षक एक पूरा सत्र ही रखा हुआ है ; जबकि आपके निज़ाम में न आलोचना की कोई वास्तविक गुंजाइश है और न निरीह प्रजा की ही कोई सुनवाई ! यह भी कोई महज़ संयोग नहीं कि पुरस्कृत और उपकृत करने के लिए आपने आलोचकों को ही निशाना बनाया ; जिससे 'आलोचना ' का रहा-सहा साहस , संवेदनशीलता, मूल्य्निष्ठता , प्रश्नाकुलता और विवेक का भी अपहरण किया जा सके और उसे निष्प्रभ एवं निस्तेज बनाया जा सके ! इस सन्दर्भ में मुझे रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता याद आ रही है ; जिसमें उन्होंने लिखा है----- "
आतंक कहाँ जा छिपा भागकर जीवन से
जो कविता की पीड़ा में अब दिख नहीं रहा ?
हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए
जो कविता हम सबको लाचार बनाती है ?
" जहाँ तक मुझे मालूम है , श्री प्रमोद वर्मा , मुक्तिबोध के काफ़ी निकट थे. इसलिए इसे एक काव्य-न्याय ही मानता हूँ कि मुक्तिबोध की इन काव्य-पंक्तियों की स्मृति ने मुझे उपर्युक्त कार्यक्रम में शामिल होने से आखिरकार रोक लिया-----
" भीतर तनाव हो
विचारों का घाव हो
कि दिल में एक चोट हो आये
-दिन ठंडी इन रगों को गर्मी की खोज है
वैसे यह ज़िन्दगी भोजन है , मौज है । "
आदर और शुभकामनाओं के साथ ;
आपका ,
पंकज चतुर्वेदी कानपुर

4 टिप्‍पणियां:

  1. एक ऐतिहासिक पत्र। जो परतें खोल सच की ओर झांकने को प्रेरित करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपके इस फैसले का नई पीढी स्वागत करती है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो मनमोहन सिंह अमरीका से पूछ कर बजट बनवाते हों उसकी सरकार में शामिल होने में हमें शर्म नहीं आती ?

    उत्तर देंहटाएं
  4. मदन मोहन गोयनका25 अगस्त 2009 को 8:45 pm

    पंकज जी, आपको बहुत बहुत बधाई. यह पत्र एक ऐतिहासिक पत्र है और हिंदी साहित्य के इतिहास में यह पत्र एक अमिट स्मृति बन जायेगा. इसने फिर इस यकीन को जिन्दा किया कि हिंदी कायरों या मुर्दों या उदासीन लोगों की भाषा नहीं है. वहां जो लोग गए वे इस पत्र को पढ़ कर आईने में अपने अक्स से आँखें चुराते रहेंगे. आपने अपने परम मित्र कृष्ण मोहन को वहां जाने से क्यों नहीं रोका ?

    मदन मोहन गोयनका

    उत्तर देंहटाएं