25 अप्रैल 2011

तानाशाहों के वारिस


-- अनिल पुष्कर कवीन्द्र की यह कविता विश्वरंजन के हिन्दुस्तान(२३ फरबरी २०११) में छपे लेख "ये माओवादियों से हमदर्दी रखने वाले "को पढ़ने के बाद लिखी गयी .अपनी राज्यपोषित हिंसा को महिमामंडित करते हुए विश्वरंजन दुनिया भर के तानाशाहों की याद दिलाते हैं .हिंसा और बर्बर ज़हनियत से भरा उनका लेख किसी भी संवेदन शील व्यक्ति को झकझोर देगा.
वो लोहा काटने का शौकीन था
उसकी पसलियां लोहे की थीं
कितने ही हिरण्यकश्यप ढेर हो जाया करते
जब अँगुलियों की पोर में जोर का दर्द उठता
वो तूलिका से सफ़ेद खाली आसमान में
परिंदों के चित्र रंगता.
वैसे तो उसे रंगमंच पर
दहाड़ने की आवाज निकालने को रखा गया
पर जब कभी उसका कंठ रुंधता
वो जन-आंदोलित हृदयविदारक गीत गाता.
उसे रंगमंच से तब निकाला गया
जब उसका कूबड़ निकलना जगजाहिर हुआ
उसकी जगह एक चाबुकधारी क्रूर
सिपहसालार तैनात हुआ और जब कभी
उसकी हथेली के गूलर नहीं खिलते
वो कैदखाने में बंद गुलामों को कतार में दावत देता.
जब तक दाढ़ में दर्द नहीं उठा
वो खाकी ओढ़े लोकतांत्रिक समाजवादी शैली
को कसकर दांत गडाता और जब
जोर का दर्द उठता, अनायास ही चीख फूटती
वो दासी को वीणा थमाए
दुखियारी आबादी की प्रार्थनाओं में शरीक होता.
उसके आँगन में उगा था
बर्षों पुराना वटवृक्ष
असंख्य विस्थापितों की शरणगाह
वो रोज उन्हें दाने डाल दुलराता पुचकारता
और ज्यूँ ही परवाज़ की फडफडाहट में
आजादी का शोर सुनता
दीवार के कोनों में बंधक बनी
मकड़ियों का बुना जाल फैलाए
परिंदों को बेड़ियों में फांसने का करतब दिखाता.
पुरखों से विरासत में मिली थी
महल में पनिहारन
बाग के फूलूँ को मटके से सींचती
उसके दरबार की मिट्टी में दबे थे नवरत्न
भोर बाँसुरी की मिठास पर सपनों की रास लीला से
पाँव निकाले जब चुभ जाता था कोई तिनका टीस दिए
वो चित्त में बसे नवरत्नों को आदेश दे कहता-
इस दर्द को शाश्वत अर्थ में ढाल दो.
बासी देह गंध से बिदका नवरसों के जल सरोवर में उतर
रगों में बह रहे विकार, लहू का विरेचन करता
अपनी मांद में घुसकर तानाशाही अंगिका पहने
बाग के मेहनतकश शावकों का स्वाद लेता
अंतड़ियों में उबासी आते ही
जंगल की समूची प्रगतिशील योजनाओं का पाठ करता
हर सांझ कबीर की तकली से बुनता झीनी-झीनी, भीनी चदरिया.
रोम-रोम में जब भक्ति रंग रस उफनाता
लहू में दौडती उन्माद की बूंद-बूंद
वो हवन के तहखाने में घुसा
आदिवासी का धड़ गडासे की धार पर रख
देवी की प्रतिमा को अर्पित किये
मशाल थामे बाजुओं का धार-धार बहता लहू माथे लगा
शहादत औ कुर्बानियों का इतिहास रचता.
जब कभी ऊबता
सत्ताधारी कवच उतार जनतंत्र के भेष में
लोकतंत्र की ज़मीन पर दस्तक देता
पता ही नहीं चलता था कि वो
शेर की खाल में भेडिया था या
भेडिये की खाल में जनाधार का अगुवा
जय हो जंगल, जय हो पर्वत, जय हो दरिया काल का
जंगली फलों छत्ते की मिठास में डूबा,
जंगली छाल, नदियों की दूधिया चाल में तिरता
जंगल की छतरी, सतरंगी आकाश में
बाँधता जाता सैन्य-शिविर और
जंगल की उत्तर-आधुनिक व्याख्याएं करता.
मिलिये मौलाना बिनायक सेन से

1 टिप्पणी:

  1. अपनी बात को सिद्ध करने के लिये किसी भी हद तक आप लोग जा सकते हो। आतंकवाद के समर्थन के सिवा और क्या है आपकी इस कलमघसीटी में। उस पर पढने योग्य तो कुछ लिखो तो वह भी झेल लेते।

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