31 मार्च 2011

साग-भात का खाना और तालाब का पानी


चन्द्रिका
(अहा-जिंदगी के अप्रैल अंक में प्रकाशित यात्रा)
कुछ तालाबों की तस्वीर आँखों में अभी बची हुई हैं जिसमे बच्चे, बूढ़े, महिलायें पानी भर रहे हैं, कुछ नहा रहे हैं और शोर मचा रहे हैं, आस-पास कई छोटे-छोटे गाँव है और इन तक पहुंचने के कई छोटे-छोटे रास्ते. राष्ट्रीय राजमार्गों से कटती सड़कें और उनसे निकलती पतली राहें फिर पगडन्डियाँ जिन पर घास उगी हुई है. घास साइकिलों और पैरों के दबाव से भूरी हो चुकी है. इनके सहारे पिथौरा से बसना होते हुए छत्तीसगढ़ को पार कर उड़ीसा के बरगड़ जिले के एक छोटे से गाँव घुटाथुडा में जाना अमीरी से गरीबी की तरफ जाने जैसा है. कुछ घंटो के रास्ते में बहुमंजिली इमारते छूटती और छोटी होती जाती हैं और आखिर में किसी झोपड़ियों और छप्परों वाले गाँवों के पास आपकी यात्रा खत्म हो जाती है. चौड़ी सड़कें अक्सर मुझे डरावनी लगती हैं और कुचले जाने का एहसास हर वक्त बना रहता है. यह दृष्टि का फेर हो सकता है पर पगडण्डियों में एक निरीहता का बोध होता है. इनके चौराहे आतंकित नहीं करते, यहाँ खड़ा हर आदमी लगता है आप ही का इंतजार कर रहा है. आप किसी गुमटी पर पता पूछते हैं और गुमटी वाला जब अपनी याददास्त की सूची में उतर रहा होता है तो बगल की दूकान पर चाय पी रहा आदमी आपको ठहरने के लिये कहता है और आपके साथ बतियाते हुए चल देता है. रास्ते में पड़ने वाले घरों के लोग आपको निहार रहे होते हैं और मुमकिन है कि कोई बच्चा आपको मामा कहकर बुला दे.
मुझे उन गाँवों में जाना था जो कालाहांडी से कुछ किलोमीटर दूरी पर बसे हुए हैं पर जिंदगी जीने के तजुर्बे कालाहांडी जैसे ही हैं. बसना में दो या चार घंटे या दिन भर के इंतजार के बाद एक गाड़ी मिल सकती है जो किसी नजदीकी सड़क पर छोड़ दे. इसके बाद की यात्रायें पैदल होती हैं या किसी सायकिल सवार की रहम पर आपकी यात्रा थोड़ी सुगम हो सकती है. पहाड़ियों की उबड़-खाबड़ जमीने और जाने क्या-क्या जो आखों में नहीं सिमट पाया और यादास्तों से फिसल कर महीनों पहले कहीं गिर गया उस सबका मलाल है. किसी यात्रा की पूरी तस्वीर आप कहाँ समेट पाते हैं, कुछ न कुछ छूट ही जाता है. मेरे ज़ेहेन में एक लिफाफा पड़ा हुआ है जिसमे इन यात्राओं की कुछ तस्वीरें सुरक्षित बची हुई हैं. ये ठहरे हुए चित्र हैं, पर इनमे बीती हुई यात्रायें चलती रहती हैं. जिनमें मैं लौटता हूँ और उनसे मिल आता हूँ जिन्हें वर्षों पहले मिल कर लौट आया था. उनसे बतियाता हूँ कि वे इस बार किस राज्य के भट्ठे पर मजदूरी के लिये जा रहे हैं. उनसे पूछता हूँ कि बिश्नु तांडी की भौजाइ भट्ठे से लौटी की नहीं और विश्नु उदास हो जाते हैं. न लौटने का कारण न तो वह बताना चाहते हैं और न ही मैं पूछता हूँ.
तारीखें ठीक-ठीक याद नहीं पर ये जून की गर्मियों के दिन थे. लम्बे दिनों और छोटी रातों वाले दिन, जब उदासी के लिये आपको कोई वजह नहीं ढूंढ़नी होती. मैं रायपुर से होते हुए पिथौरा पहुंच चुका था. यह एक छोटी सी बाज़ार है जहाँ घरों में दुकानें हैं और दुकानों में घर. किसी सामान की खरीदारी के लिये इन पर घंटो खड़ा रहना पड़ सकता है, जब तक कि दुकान मालिक खाना खत्म न कर ले, जब तक कि चूल्हे पर रखी हुई सब्जी में नमक और मसाले न पड़ जायें, जब तक कि भैंस का दूध दुहा जाता रहे या ऐसा कोई भी काम खत्म होने का इंतजार. ऐसे वक्त उन घरों के बच्चों के साथ बातचीत करिये और उनके स्कूल के बारे में पूंछिये, उनके पापा का नाम पूछिये जो झुकी नजरों और हिलते छोटे होंठों के साथ कई बार में समझ में आयेगा. वे बता भी सकते हैं या आपको अकेला छोड़ घर के अंदर जा सकते हैं. यदि यह सब आपकी आदतों में सुमार हो तो. झल्लाहटों से कोई फायदा नहीं होता और न ही दूसरे दुकानों के विकल्प की मौजूदगी.
यहाँ मुझे एक अपरिचित व्यक्ति से मिलकर परिचित होना था और उसके साथ आसपास के गाँव घूमने थे. उन गाँवों में जहाँ लोग अपने घरों को छोड़ कश्मीर जैसे दूर और खूबसूरत प्रदेश तक ईंट भट्ठों पर काम के लिये जाते हैं और सात-आठ माह बाद चेहरों पर झुर्रियां टांग वापस चले आते हैं. इनके लिये कश्मीर की किसी पहाड़ी पर कोई देवी नहीं रहती और डल झील, ईट भट्ठा की मिट्टियों में सने इनके कपड़े धोने के काम आ सकती है बशर्ते वह इनके नजदीक हो. कश्मीर की वादियां इनके लिये ईंट पाथने की जगह है और किसी भट्ठे का मालिक इनका अकेला परिचित.
जिनके साथ मुझे इन गाँवों में घूमना था उनका नाम सतीश था और उनकी बाइक का नाम टीपू. शायद यह सतीश का घर में बुलाया जाने वाला नाम था जिसे बाइक पर उन्होंने लिख रखा था. हम दोनों ने गाँव का चक्कर लगाना शुरु किया. छोटे गाँव, बड़े गाँव और गाँवों के अंदर एक गाँव जो दिन में पूरी तरह खाली हो जाते हैं जैसे एक गाँव हो और आदमी की जगह पर रिक्त स्थान. कुछ सोते हुए बच्चे और कुछ बूढ़ी औरतें जो लगातार बुदबुदाती रहती हैं. अपनी बढ़ी हुई उम्र के कारण गाँव में लोगों के मौजूदगी का जरूरत पूरा करती हुई. किसी के आने और चले जाने के देर बाद तक और दूर तक निहारती हुई. जाने क्या-क्या सोचती हुई. जबकि पूरा गाँव आसपास के इलाकों और छोटी बाजारों में बिखरा हुआ होता है. निर्माणाधीन घरों की दीवारों पर जो आदमी ईंटें जोड़ रहा है, जो उसे मिट्टियाँ पहुंचा रहा है, जो औरतें ईंटों के सफाई और ढुलाई का काम कर रही हैं गाँवों में पड़े उस रिक्त स्थान को शाम ढले यही भरते हैं. शाम के बाद भी जिन घरों में ताले लगे होते हैं उनसे मिलने के लिये मुझे कुछ दिन, हप्ते भर या महीनों का इंतजार करना पड़ सकता है. ये छत्तीसगढ़ की सीमा लांघ चुके वे लोग होते हैं जो अपने गाँवों में धान की बुवाई और कटाई के लिये ही वापस आते हैं. शायद इनके लिये घर का एक मतलब बेघर भी होता है या दोनों बराबर-बराबर होते हैं. यहाँ घूमते हुए मुझे धान के कटोरे में भूख की खुदबुदाहट का एहसास हुआ और उस गुस्से का भी जो तमाम रूपों में यहाँ के लोग जाहिर कर रहे हैं. हम गाँव के लोगों से मिलते और उनसे बातचीत करते वे हमे अजनबी निगाहों से देखते पर बीड़ी और तम्बाकू की लेन-देन हमारे रिश्तों में एक निश्‍चिन्तता ला देती.
वह सवाल जिसकी खोज में मैं घूम रहा था, यानि उनकी हालत जानने की कोशिश, हर बार छूट जाता. जब हम उनके सामने खड़े होते तो उनकी मूक बयानी ही सबकुछ बयां कर देती. तिस पर कोई सवाल पूछना मुझे अश्लीलता के हद तक जाने जैसा लगने लगता. जब हम गाँवों के बाहर और बेहद नजदीक होते तो यह पेड़ों के किसी झुरमुट जैसा दिखता. मिट्टि से बने घरों के आकार इतने छोटे होते कि पेड़ों से सबकुछ ढंक जाता. गाँवों में घुसते हुए या किसी बाग से गुजरते हुए हमे गिरे हुए कच्चे या पक्के आम मिलते और हम उन्हें सहेज कर अपने झोले में डाल लेते. हमारे पास जाने के लिये न तो कोई निश्‍चित गाँव होता न ही कोई घर. हम जिस गाँव में होते उससे नजदीकी गाँव का चुनाव करते. रास्तों के भटकाव ने एकबार हमे उसी गाँव में ला पटका जिससे हम कुछ देर पहले निकल चुके थे पर इस बार हम पीछे के रास्ते से आये थे.
कई घंटे घूमने के बाद हम एक पेड़ के नीचे बैठ बीड़ी फूंक रहे थे. यह तेंदू का पेड़ था और हम इन्हीं की पत्तियों में लिपटी तम्बाकू की बीड़िया पी रहे थे. ये पेड़ यहाँ के आसपास बसने वाले बड़े आदिवासी समुदाय की आजीविका के साधन हैं. वे इनकी पत्तियों को तोड़ते हैं और सुखा कर सौ-सौ की गड्डियाँ बनाने के बाद किसी ठेकेदार के हाथ बेंच देते हैं. कम-अज-कम इन गाँवों से निकले पत्तों की सुलगती महक आपके नथुनों में एक बार जरूर पहुंची होगी. शायद आपको याद न हो किसी पैसेंजर ट्रेन की यात्रा में देर और दूर तक फैली महक. बीड़ी का कश लेते हुए इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है कि इन पत्तों को तोड़ने वाला आदिवासी समुदाय पेड़ों की कितनी ऊंचाईयों तक चढ़ता है और कितनी बार जख्मी होता है. हमने तेंदू के फल तोड़ कर खाये जो खजूर की मिठास लिये हुए थे पर खजूर से कहीं ज्यादा स्वादिस्ट. मुह में बनी बीड़ी की कड़ुवाहट इन फलों के मिठास में घुल मिल गयी. पूरे तीन दिन हम इन इलाकों में घूमते रहे. रात जहाँ भी गुजरी साग-भात खाया. हरे और पानी से भरे पोरों वाले साग, जो आसपास के तालाबों के किनारों से लाये जाते थे. मैंने इन गाँवों को अलविदा कहा जैसे कोई तारीख किसी साल को अलविदा कहती है और दुबारा लौट कर वापस नहीं आती है.
मैं एक छोटे से चौराहे पर खड़ा था जब दौलत तांडी मुझे लेने आये. उस चौराहे पर मैं अकेला था जिसे वे नहीं पहचानते थे, इसलिये वे सीधे मेरे पास चले आये. उनके पास एक चमकती हुई साइकिल थी, जिस पर हम दोनों सवार होकर उनके गाँव घुटाथुडा की तरफ चल दिये. दो घंटे के बाद हम उनके गाँव पहुंच चुके थे. घरों के छप्परों पर लौकियां लटक रही थी, मुर्गियां और बकरियां मुझे घूर रही थी. शायद अपरिचित चेहरे का गाँव में आना उन्हें रास नहीं आ रहा था या वे पहचानने की कोशिश कर रही थी. एक बड़ा सा तालाब जिस पर छोटा बांध बना हुआ था, इसी के इर्द गिर्द हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था. कपड़े धोता हुआ, जानवरों को नहलाता हुआ और खुद भी नहाता हुआ. इस गाँव के जीवन में तालाब अपनी पूरी गरिमा के साथ मौजूद.
उस सुबह हम पहला गाँव घूमने के बाद दूसरे गाँव में थे. जंगलों और पहाड़ियों से घिरे हुए ये गांव जिनमे सड़कों का मतलब पैरों से बनती चली गयी लकीरें थी. ये लकीरें हमें एक गाँव से दूसरे गाँव में छोड़ रही थी. रास्ते में मैं लोगों से नजदीकी गाँवों के बारे में पूछता तो वे पता बताते और साथ में अपने किसी रिश्तेदार का घर भी. यह थोड़ा सा बड़ा घर था जहाँ मैं अभी खड़ा था. गाँव में अकेला घर था जिसकी दीवालें सीमेंट से बनी हुई थी और मेरे सामने जो महिला थी उनका नाम कुनतुला था. मेरे लिये यह सोचना मुश्किल था कि छः मुट्ठी धान की बदौलत पिछले कई सालों से एक शरीर जिंदा रह सकता है और काम भी कर सकता है. इस घर में ये बधुआ मजदूर के रूप में काम करती थी जिसके एवज में इन्हें छः मुट्ठी धान मिलता था. एक बच्चा जो इनके कन्धे पर झूल रहा था उसने अपनी दो वर्ष की उम्र पूरी कर ली थी. बची हुई उम्र में शायद उसने चलना सीख लिया हो या शायद उम्र ने चलने से मना कर दिया हो. इन यात्राओं के दौरान ऐसी कितनी मुलाकाते हैं जिन्हें कागजों पर उतारना मुश्किल है. कोई उन आँखों को कागज पर उतारे जिनमे न सवाल थे, न जवाब और न ही कोई याचना. वे देर तक मेरी आँखों में गड़ी रहती और किसी किरकिरी की तरह तब तक चुभती जब तक मैं अगली मुलाकात पर न निकल जाता. इतनी सारी मुलाकातों के चेहरे, जो उदास परछाइ की तरह मेरी यादों में आते रहे उन सबको मैं बटोरने में अक्षम रहा.
मेरी यात्रा का ये आखिरी दिन था जब शाम के चार बजे मैं एक छोटी सी पहाड़ी पर था. यहाँ हाट लगी हुई थी अपने किस्म की यह अनोखी और मेरे द्वारा देखी जाने वाली पहली ऐसी हाट थी जहाँ बगैर पैसे के भी आप कुछ खरीद सकते थे. यहाँ सामानों की अदला-बदली थी. लोग हल्दियां देकर मछलियां खरीद रहे थे, आम देकर तम्बाकू खरीद रहे थे. मैने कुछ नहीं खरीदा मेरे लिये यह खरीदने बेचने से ज्यादा देखने की बाज़ार थी. थोड़ी देर बैठकर मैं यहाँ बज रहे एक गीत को सुनता रहा जो छत्तीसगढ़ी में बज रहा था- भाजी तोड़न के आवेली हमरे गाँव के संगवारी...... जिन चीजों को मैं समेटते हुए गया था उन्हें छोड़ते हुए वापस आना था, पगडण्डियाँ, पतली सड़कें, छोटी पहाड़ियों के उबड़-खाबड़ रास्ते और राजमार्गों से होते हुए मैं रायपुर के उस चौराहे पर था. जहाँ सड़कों के किनारे अपने जीवन के क्रिया-कलापों में लिप्त आदिवासियों की मूर्तियां बनाई जा रही थी और सड़कों के किनारे इन्हें सजाया जा रहा था. एक आदिवासी महिला अपने बच्चे को पीठ पर उठाये हुए, शिकारी के अंदाज में एक आदिवासी तीर धनुष लिये हुए, लकड़ियों के गट्ठर अपने सिर पर धरे एक. यह वास्तविक जीवन दृष्य से लेकर मूर्तियों में परिवर्धित होने की एक यात्रा थी. सम्पर्क-chandrika.media@gmail.com, 09890987458

3 टिप्‍पणियां:

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