11 मार्च 2011

क्रिकेट का भीतरी खेल


-दिलीप खान
क्रिकेट विश्वकप जैसे-जैसे अगले चरण की ओर बढ़ रहा है नतीजों को लेकर तस्वीरें साफ होती जा रही हैं. कुछेक अप्रत्यासित जीतों के बावजूद कमजोर मानी जाने वाली टीमें नीचे की ओर खिसकती जा रही है. इस स्थिति को सामने रखते हुए विश्वकप के तकरीबन शुरुआत में ही आईसीसी ने यह मंशा जाहिर की कि छोटी टीमों के लिए मौजूदा क्रिकेट विश्वकप आख़िरी साबित हो सकता है. यदि आईसीसी अपने फ़ैसले पर कायम रहा तो चौथे साल जब विश्वकप आयोजित किया जाएगा तो उसमें ग़ैर-टैस्ट टीमों की भागीदारी नहीं होगी. असल सवाल यहीं पैदा होता है. विश्वकप में रुचि का औंचक खयाल इस समय आईसीसी के मन में क्यों आया? क्रिकेट में जिस तरह के ढ़ांचागत परिवर्तन हुए हैं और खेल की संरचना को जिस तरह व्यावसायिक हितों ने हाल में प्रतिस्थापित किया है उनके मद्देनज़र यह सवाल भी उठता है कि इस फ़ैसले का स्रोत क्या है और खेलों के लिए यह कैसी ज़मीन तैयार कर रहा है? जब दुनिया के अधिकांश देशों में क्रिकेट को प्रसारित करने के उद्देश्य से आईसीसी ने अपने कुछ बड़े टूर्नामेंटों में अमेरिका और बरमूडा जैसे देशों को हिस्सेदारी दी तो उसका तर्क था कि जल्द ही ये देश बेहतर क्रिकेट खेलना सीख जाएंगे और क्रिकेट के विकास के लिए दुनिया में नए क्षेत्र विकसित होंगे. ऐसा कुछ नहीं हुआ या यों कहें कि आईसीसी ने ऐसा कुछ नहीं किया.
पिछले दस सालों में क्रिकेट की संरचना में जो बदलाव आए हैं उनकी प्रकृति पर गौर किया जाना चाहिए. इस दौरान इसमें बेहिसाब पैसा आया है, इसकी गति तेज हुई है, आईसीसी के भीतर भारत की स्थिति और मजबूत हुई है, 20-20 ओवरों वाले मैच होने लगे हैं और काउंटी क्रिकेट को आईपीएल ने प्रतिस्थापित किया है. लेकिन जो सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं वे ये कि एकदिवसीय विश्वकप के रोमांच को आईपीएल तथा 20-20 विश्वकप ने लील लिया. मनोरंजन प्रमुख हो गया और मैदान में चीयर लीडर्स आ गईं. इस जमीन से उठने वाले फैसले को इसी रूप में तब्दील होना था. मास मीडिया के युग में मनोरंजन के तरीके का चुनाव करना दर्शकों की व्यक्तिगत रुचि का मसला नहीं है बल्कि इसे तीव्र प्रचार के जरिए दर्शकों के मन में स्थापित किया जाता है. टीवी पह जब यह कहा जाता है कि आईपीएल के दौरान भारत बंद रहेगा तो दर्शकों के बीच उत्सुकता और घृणा का मिला-जुला असर होता है. इस तीव्र प्रचार और आक्रामकता ने एकदिवसीय विश्वकप को परदे के पीछे का विषय बना दिया. दर्शकों के लिए वास्तविक टूर्नामेंट यह रह ही नहीं गया. जब आईसीसी यह तर्क देती है कि तटस्थ मैदान पर कीनिया और जिंबाबवे के मैच के लिए दर्शक नहीं जुट रहे तो उन्हें होने वाले ढ़ांचागत परिवर्तनों की ओर भी ध्यान दिलाना चाहिए कि क्यों दक्षिण अफ्रीका के मैदानों पर राजस्थान और दिल्ली के मैचों के लिए स्टेडियम भर जाता था. इसलिए, इस दलील में जितना बताया जा रहा है उससे कहीं अधिक छुपाया जा रहा है.
80 के दशक में जब कैरी पैकर ने वर्ल्ड सीरीज की शुरुआत की और वहीं से फिर रात-दिन के मुकाबले की शुरुआत हुई तो आईसीसी ने शुरुआती हिचकिचाहट के बाद इस परिवर्तित स्वरूप से अधिकाधिक देशों को जोड़ने की योजना बनाई. इस ढांचे को अपनाने के पीछे भी प्रमुख कारण यही था कि उस दौर में वह संरचना अधिक पैसा पीटने का जरिया साबित हुई. एक टूर्नामेंट के खात्मे के बाद जब यह बताया जाता है कि इसमें इतने करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ या फिर किसी टीम ने इतने करोड़ रुपए महंगी ट्रॉफी जीती तो इन आयोजनों का अर्थशास्त्र खुल कर सामने आ जाता है. कोई कंपनी क्यों अरबों रुपए फंसाकर खरीदे गए मैच के प्रसारण अधिकार में कीनिया और नीदरलैंड्स के मैच दिखाना पसंद करेगी? सवाल स्टेडियम में दर्शक जुटने से अधिक महत्त्वपूर्ण टीवी पर दर्शक जुटाने का है. जब कोई कंपनी 20-20 दिखाकर कम समय में विश्वकप से अधिक कमा सकती है तो उसकी स्वाभाविक इच्छा ऐसे टूर्नामेंटों को ही प्रोत्साहित करने में होगी. आईसीसी के भीतर भारत के बढ़ते प्रभाव के बारे में जब बात की जाती है तो क्या यह खेल के स्तर में आए सुधारों के मुतल्लिक की जाती है अथवा बीसीसीआई के धनकुबेर होने की वजह से? दुनिया भर में तमाम बड़ी खेल संस्थों का व्यवहार व्यापारिक कंपनी की तरह होता जा रहा है. पूंजीवाद अपने भीतर ऐसी संरचनाओं को समेटता है जो बहस के प्रचलित दायरे से बाहर होती है. इन खेल संस्थाओं के भीतर से राष्ट्र-राज्य तक को चुनौती देने के वाकये देखे गए हैं. बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जब यह कहा था कि यहां के क्रिकेटर भारत के लिए नहीं बल्कि बीसीसीआई के लिए खेलते हैं तो इसे दुःसाहस का पराकाष्ठा बताया गया था जबकि यह दुःसाहस से अधिक इन संस्थाओं की राजनीति और अर्थशास्त्र को रेखांकित करता है. मौजूदा विश्वकप में जब न्यूजीलैंड के हाथों कीनिया को दस विकेट की हार मिली तो उसके कप्तान जिमी कमांडे ने कहा कि उन्हें टैस्ट टीमों से भिड़ने का मौका दो साल में एक बार मिलता है. अगर उन्हें इन देशों से लगातार खेलने का मौका मिले तो टीम में ज़्यादा सुधार होगा. आईसीसी को कीनिया के सुझाव को मानने का क्या गरज है!
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1 टिप्पणी:

  1. very good points... seriously I don't think ICC is serious when they talk about development of cricket . what they do is just to make money. every year India-Aus tour is proposed just to make money, but it is so unfortunate to see such team as Kenya, Ireland to struggle for even test membership.

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