05 मार्च 2011

मातृभाषा का मर्म

रुद्र भानु प्रताप सिंह
मैं अपनी मातृभाषा से बहुत प्यार करता हूँ। जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करता वह अपनी मातृभूमि का अपमान करता है । आज बहुत दिनों बाद मुझे ऐसा मौका मिला है जब मैं अपनी मातृभाषा में किसी मंच पर कविता सुना रहा हूं । कविता खत्म होने से पहले ही मणिपुरीशोधार्थी अथोबा के आंखो मे आँसू आ गए। बड़ी मुश्किल से अपने आँसू को रोकते हुए अथोबा ने कहा आज मेरी मातृभाषा संकट के दौर से गुजर रही है हम लाख कोशिश करने के बाद भी इसे संकट से नहीं उबार पा रहें हैं। अथोबा 21 फरवरी को अंतर राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर महात्मा गांधी अंतर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम में छात्र जब अपनी मातृ भाषाओं यथा मणिपुरी, आसामिया , सिघली , पंजाबी , तेलगू , बंगाली, मराठी, भोजपुरी, मैथली , अंगिका, वज़्जिका,मेवाड़ी आदि भाषाओं में अपने मनोभाव व्यक्त कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो हम अपने घर के आँगन में बैठे हों और माँ लोरी सुना रही हो । भावविह्वल हो कर प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा ने भोजपुरी में और एलिना सेन ने बांग्ला में कविता सुनाई। लगभग दो घंटे चला यह छोटा सा आयोजन हमें अपने घर-आँगन के इतने करीब ला देगा शायद ही किसी को इस बात का अंदाजा था । कार्यक्रम तो खत्म हो गया पर अथोबा की वह बात मेरी मातृ भाषा संकट के दौर से गुजर रही है एक प्रश्न की तरह मेरे जेहन में बैठ गयी, क्या वास्तव में हमारी मातृभाषा संकट में है ? क्या हमारी समृद्धि के साथ-साथ हमारी मातृ भाषा भी समृद्ध हो रही है? सुनकर अजीब लगता है, पर यह सच है. हाल ही में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तकरीबन 65000 साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा हमेशा के लिए विलुप्त हो गई । वस्तुत: कुछ दिन पहले अंडमान में रहने वाले बो कबीले की आखिरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर के निधन के साथ ही इस आदिवासी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बो भाषा भी लुप्त हो गई। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अध्ययन के मुताबिक 5300भाषाओं/बोलियों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। अरुणाचल प्रदेश की कम से कम 36 स्थानीय भाषाएँ विलुप्ति की कगार पर पहुँच गई हैं। यूनेस्को ने इन भाषाओं को विलुप्त होती जा रही भाषाओं की अपनी सूची में शामिल किया है। इन 36 भाषाओं की इस सूची में कोरो, मिजी, नाथ, बुगुन, मेयर, तंगाम और पुरोइक जैसी भाषाएँ शामिल हैं दुनिया भर में अंग्रेजी के वर्चस्व और संरक्षण के अभाव में सैकड़ों भाषाएं समाप्ति के कगार पर हैं और ऐसे देशों की सूची में भारत में स्थिति सर्वाधिक चिंताजनक है जहां 196 भाषाएं लुप्त होने को हैं। संयुक्त राष्ट्र ने ये आंकड़े 21 फरवरी 2009 को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर जारी किए थे। भाषाओं के कमजोर पड़कर दम तोड़ने की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक दर्जन लोगों से भी कम है।

भाषाओं और बोलियों पर यह संकट बहुत छोटे स्तर से शुरू होकर बहुत बड़े स्तर तक फैल रहा है। जाहिर है सबसे ज्यादा संकट मातृभाषाओं या निज-बोलियों पर ही है। सवाल है एक ऐसे दौर में जब दुनिया फैलती जा रही है, सरोकार वैश्विक हो रहे हैं। आखिर इन सबके बीच मातृभाषाएं क्यों सिकुड़ती जा रही हैं? इसके कई कारण हैं और इन कारणों में वही पारंपरिक कारण सबसे बड़ा है जिसे वर्चस्व कहते हैं। तरीका और तकनीक भले बदल गई हो, लेकिन वर्चस्व का खेल वही पुराना है। भूमंडलीकरण ने जहां एक तरफ दुनिया को एकरूपता देने की कोशिश की हैं वहीं यह प्रक्रिया अंतर्देशीय रूप में भी सामने आई है। एक तरफ जहां पूरी दुनिया तकनीकि और तेज रफ्तार संचार माध्यमों के चलते एक-दूसरे के निकट आ रही है, वहीं दूसरी तरफ यह प्रक्रिया देशों के स्तर पर भी बड़ी तेजी से शुरू हो गई है। भूमंडलीकरण के अनुरूप ही अंतर्देशीय समरूपीकरण भी तेजी से हो रहा है। अब जहां दिल्ली, मुंबई, बंगलौर, न्यूयार्क, लंदन, बर्लिन और टोकियो जैसे हो रहे हैं वहीं लखनऊ, इंदौर, पुणे, चंडीगढ़ और कानपुर मुंबई व दिल्ली के तरह बन रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि बड़े स्तर पर जहां पूरी दुनिया में एकरूपता आ रही है, वहीं स्थानीय स्तर पर या कहें छोटे स्तर पर देशों के अंदर भी इसी तरह की अंतर्देशीय एकरूपता अथवा समरूपता आ रही है। इस समरूपता ने कई चीजों को सार्वभौम बनाया है। मसलन खानपान, पहनावा, काम-धंधे और शिक्षा-दीक्षा के साथ-साथ संपर्क की भाषा को भी एकरूपता देने की कोशिश की गई है। दरअसल, मातृभाषाओं या निज-बोलियों के छीजने या उनके अस्तित्व पर संकट मंडराने का सबसे बड़ा कारण यह है कि बड़े पैमाने पर संपर्क भाषाएं सीमित हो रही हैं। इसके अलावा स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर तक लोगों में व्यापक इंटरैक्शन और अंतरनिर्भरता बढ़ी है। स्थानीयता मिटती जा रही है। जिस जगह की पहचान कभी अपने मिठाइयों , साड़ियों या किसी वस्तु से हुआ करती थी आज उसकी कोई कोई विशेष पहचान नहीं रह गई है । हर जगह एक सी दुकाने, एक सी संपर्क भाषा एक सा पहनावा हर चीज समान होती जा रही है । हमारी विविधता मिटती जा रही है। जिसका सीध असर हमारी भाषाओं पे पड़ रहा है । अब बात करते है उस माध्यम की जिसके द्वारा मातृ भाषा का प्रचार- प्रसार सबसे ज्यादा होता है या फिर हो सकता है वह है शिक्षा का माध्यम। मातृ भाषा को यदि शिक्षा के माध्यम के रूप में विकसित किया तो निश्चित हमारी भाषा समृद्ध होगी । हम किसी बात को सबसे पहले अपनी मातृभाषा में ही समझते हैं फिर उसे अन्य भाषाओं मे लिखते पढ़ते या बोलते हैं । यानि कि मातृभाषा का सीधा संबंध हमारी समझ से है । हमारी समझ के माध्यम के रूप में यह हमें जीवन कि नई दिशा देने का प्रयास करती है। महात्मा गांधी का स्पष्ट मत था कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम सदैव मातृभाषा ही होनी चाहिए । इस विषय में गुरुदेव रवीद्रनाथ टैगोर का मत था कि मातृभाषा में शिक्षा दी जाए या नहीं इस तरह की कोई बहस होना ही बेकार है, सबकोअपनी मातृभाषा में शिक्षा पाने का जन्मसिद्ध अधिकार है। फिर भी इस अभागे देश में यह तर्क और बहस का विषय बना हुआ है। आज मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था भी धीरे–धीरे समाप्त हो रही है। बच्चों को आधुनिक और बुद्धिमान बनाने के लिए उनकी शिक्षा का माध्यम ज्यादा से ज्यादा ऐसे भाषाओं को माध्यम बनाया जा रहा है जो रोजगार परक और बहूभाषी हो । इस प्रकार जाने अनजाने हम भाषाई साम्राज्यवाद को लागू कर रहे हैं और इस बात की चिंता कर रहे हैं कि कैसे हमारी मातृभाषा बची रहे और फले-फुले । अथोंवा जब कह रहे है कि लाख कोशिश करने के बाद भी अपनी लोक भाषा को नहीं बचा पा रहे हैं तो हमें समझना होगा की अथोबा सिर्फ लोक भाषा की नहीं बल्कि उसके बहाने मणिपुर के लोक की बात कर रहे हैं। भाषा सिर्फ भाषा नहीं होती वह लोक संस्कृतियों, समवेदनाओं की वाहिका होती है, लोक भाषा का खतरे में होने का मतलब लोक का खतरे में होना है। क्या आज हम खुद से यह सवाल कर सकते हैं की एक राष्ट्र के नागरिक होने के नाते अथोबा की चिंता से हम कितने चिंतित हैं?

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