23 फ़रवरी 2015

धर्म-परिवर्तन, घरवापसी और देशद्रोह: खतरा क्या है?

२८ जुलाई १९८९ को राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने अदालत के भीतर स्थापित मनु की प्रतिमा को हटाने का फैसला सर्वसम्मति से पारित किया था. उस समय डा. सुरेन्द्र कुमार ने इस फैसले को वापस लेने के तर्क में १४ सूत्रीय बातें रखीं. उन्होंने मनु के पक्ष में कहा कि “बादशाह शाहजहाँ के लेखक पुत्र दाराशिकोह ने मनु को वह प्रथम मानव कहा है, जिसे यहूदी, ईसाई, मुसलमान आदम कहकर पुकारते हैं.” कोर्ट ने उनका हर तर्क गौर से सुना और अपना फैसला वापस लिया. याचिकाकर्ता ने ब्रिटेन, अम्रेरिका, जर्मन से प्रकाशित ‘इनसाइक्लोपीडिया’ को भी इस विषय पर बतौर प्रमाण रखा. यह बताया कि इसमें भी ‘मनु’ को आदि पुरुष, आदिम धर्मशास्त्रकार, आदि विधि धर्मप्रणेता, आदि न्यायशास्त्री और आदि समाजव्यवस्थापक वर्णित किया है. अगर यह सही है तो वेदों का पूरी तरह द्विज की श्रेणी में रख दिया जो कि मनुस्मृति से पूर्व रचे गये.
ये कैसे हिन्दू समुदाय हैं जो वेदों से पहले मनुस्मृति को तरजीह देते हैं. इसका मतलब है कि कहीं कुछ है जो वेदों और मनुस्मृति के बीच अलग है. जो गंभीर चिंता पैदा करता है. एक वजह तो यह हो सकती है कि मतभेद धर्मशास्त्रों को मानने वाले धर्माचार्यों के अंदरूनी मतभेद या कलह का नतीजा हो. या फिर मनुस्मृति को इसलिए तो नहीं रचा गया कि उससे एक ख़ास वर्ण या समुदाय को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा सके और दूसरे को निम्न वर्ण कहकर उसका हर तरीके से शोषण किया जाए. सनातन धर्मग्रंथ वेद हैं जिनकी प्रामाणिक तिथि भले ही गौण है. मनुस्मृति को ५७१ ईस्वी के शिलालेख में प्रामाणिक घोषित किया गया है. वेदों और मनुस्मृति को मानने वाले वर्ण भले ही एक हों मगर जातीय समुदाय अलग-अलग हैं. मतलब यह कि दोनों एक ही धार्मिक अस्मिता के दो अलग-अलग समुदायों का वर्गीय संघर्ष है. जिसमें मनुस्मृति के मानने वालों ने वर्ण-व्यवस्था दी, जातियां निर्धारित कीं. शंकराचार्य पैदा किये और इसको प्रचारित किया.
सवाल यह है कि अगर याचिकाकर्ता की चौदह सूत्रीय बातें मान ली जाएँ तब किसी भी व्यक्ति या समुदाय द्वारा इस्लाम क़ुबूल करने पर धार्मिक हिन्दू समुदायों को आपत्ति कतई नहीं होनी चाहिए. धर्म परिवर्तन के बावजूद इस्लाम क़ुबूल करने पर भी आखिर वे रहेंगे तो आदम (मनु) की ही औलादें. उन्होंने आगे और भी बहुत कुछ कहा  “महर्षि दयानंद ने वेदों के बाद मनुस्मृति को ही धर्म में प्रमाण माना है” अब अगर वेद मनुस्मृति से पहले लिखे गये थे तो मनु सृष्टि का पहला व्यक्ति (आदम) कैसे घोषित हुआ? इसका मतलब है वेद लिखने वाले आदम-मानव, मनु से पहले भी धरती पर मौजूद थे. फिर मनु को दुनिया का पहला व्यक्ति किस तरह माना जाय? श्री अरविन्द अगर मनु को अर्द्ध देव मानते हैं तो पूर्णदेव कौन थे? वह आदम की शक्ल में पैदा नहीं हुए. फिर किस रूप में जन्मे? अगर वेद की रचना मनुस्मृति से पहले हुई तो वैदिक ऋचाओं को हिन्दू ला में शामिल क्यूँ नहीं किया गया? मनु के विधानों को ही हिन्दू ला के लिए अथारिटी क्यों माना गया?
एक और महत्त्वपूर्ण बात, अम्बेडकर जिन्दगी भर मनुस्मृति का विरोध करते रहे. कभी भी ख़ुद को मनु की औलाद नहीं माना. जबकि उनकी मूर्ति का अनावरण करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने  अम्बेडकर को ‘आधुनिक मनु’ कहकर संबोधित किया. इस तरह वे दलितों के संघर्ष, और उनकी समूची जातीय अस्मिता पर एक बड़ा हमला करते है. क्या धर्मगुरू आधुनिक मनु को स्वीकारेंगे? जो शख्सियत हिन्दू नहीं रहा. बौद्ध हो गया, उसे अंत में आधुनिक मनु घोषित किया जाना दलितों के जातीय संघर्ष को कुचलना है. उनकी मृत्युपरांत हिन्दू धर्म में वापसी करने का एक तरीका निकाल लिया.
धर्म परिवर्तन के मामले में लम्बे समय से तमाम तरह की जद्दोजहद जारी रही है. फिलहाल आगरा के उन ६० मुस्लिम परिवारों को देखें. कबाड़ बेचकर गुजर बसर कर रहे इस छोटे से समुदाय को हिन्दू धर्म में शरणागत किया गया. इस्लाम से हिन्दू बनाने के लिए जिनका शुद्धिकरण किया गया. इस शर्मनाक कारनामे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धर्म जागरण प्रकल्प और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया.
किसी भी समुदाय में रहने वाले लोगों को जबरदस्ती मजहब बदलने के लिए प्रलोभन देना, संविधान के विरुद्ध है. धर्म बदलने के लिए बलपूर्वक मजबूर करना गलत है. अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहे तो उसे इस बात की आजादी है. यह अपराध नहीं है. सैकड़ों लोग अब तक हिन्दू से बौद्ध धर्म में जा चुके हैं. इनकी घरवापसी पर हिन्दू समुदायों ने बात क्यों नहीं की ? कोई बहस नहीं छिड़ी ? इसमें दिलचस्प यह है कि जो दलित नेता उदित राज दलितों को सबसे अधिक संख्या में बौद्ध धर्म की ओर ले गये. भले ही उन्हें वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण होने का दर्जा नहीं मिला. उन उदित राज को बगैर धर्मांतरण के राजनीतिक दल ने स्वीकार कर लिया.  वह खुद ही हिन्दू सम्प्रदाय और धर्म को रिप्रेजेंट करने वाली राजनीतिक पार्टी में शामिल हो गये.
जिन वेदों को हिन्दू धर्म के भीतर मान्यता दी गई. वह आदिम सभ्यता में सनातन धर्म के रूप में जाना जाता रहा है. बौद्ध धर्म का कोई सम्बन्ध हिन्दू कहे जाने वाले सनातन धर्म से कभी नहीं रहा. बौद्ध दीक्षा लेने वाली ज्यादातर जातियां दलित हैं. इस्लाम क़ुबूल करने वाले ज्यादातर समुदाय दलित हैं. हिन्दू होने का दर्जा दलितों को किसने दिया? हिन्दू क्या किसी भौगोलिक दायरे के ख़ास समुदाय में जीने वाले लोगों को माना जाता है. अगर ऐसा है तब तो आदिवासी सबसे पुराने आदि हिन्दू हुए. किन्तु वह तो किसी मनुस्मृति को नहीं जानते. न ही मनु उनके आदि देव हैं. दूसरी तरफ दलितों के आदि देव भी मनु नहीं हैं. फिर ये घरवापसी कराने वाले लोग किन हिन्दुओं को वापस लाने की बात करते हैं. आखिर किसी दलित या आदिवासी के इस्लाम क़ुबूल करते ही ये हंगामा क्यों? इस्लाम क़ुबूल करते ही इंसान में ऐसा क्या बदल जाता है कि कट्टर हिन्दू समुदाय के भीतर खलबली मच जाती है, घरवापसी के लिए हंगामा होता है. इसे समझने की जरूरत है.
अगर आर्य ही मनु की संतानें हैं और आर्य अगर वेद लेकर धरती पर हिमालय से आये और “सनातन धर्म ही हिन्दू धर्म है. जो अपने मन, वचन, कर्म से हिंसा को दूर रखे, वह हिन्दू है. और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है।“ अगर हिन्दू धर्म की यह परिभाषा है तो फिर सदियों से कट्टर हिन्दूवादियों ने दलित जातियों का शोषण क्यूँ किया. यहाँ तक कि वेदों में ‘जाति’ केवल एक ‘वर्ण’ न होकर रंग, कर्म और गुण पर आधारित थी. जबकि मनु का ‘मानव धर्मशास्त्र’ जिसे कहा गया वहां वर्ण-व्यवस्था में ‘जाति’ भेदभाव पूर्ण है. ये वैदिक धर्म और मनु के धर्मशास्त्र का कैसा विभेद है ? जिसके चलते मनुवादियों ने अपने ही आदिम देव मनु की संतानों को यानी आदिवासियों और अश्वेतों को कभी धार्मिक रूप से बनी सामाजिक व्यवस्था में कोई जगह नहीं दी. कभी सामाजिक सम्मान नहीं दिया और जहां तक संभव था हर तरह से दबाया कुचला गया.
हालाँकि यह सवाल मनुवादी, संघी और उनके राजनीतिक दल भाजपा के लोग अच्छी तरह समझते हैं. किन्तु हमेशा से सत्ता की राजनीति और मुख्यधारा में बने रहने के लिए क्या कुछ नहीं हुआ. सवाल तो और भी हैं. बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म की प्राचीन शाखा किस तरह रही है? क्या वजह थी कि संघियों ने बौद्ध धर्म को बौद्ध-हिन्दू होने का गौरव दिया. गौतम बुद्ध हिन्दू राजघराने में पैदा हुए. इसलिए? बौद्ध हिन्दू कब से हो गये? हिन्दू संगठनों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है.
यदि आर्यों की ही एक शाखा ने दो हज़ार ईसा पूर्व यहूदी धर्म की स्थापना की. इसकी अन्य शाखाओं के रूप में  ५०० इसा पूर्व बौद्ध धर्म आया. दो हज़ार वर्ष पूर्व इसाई धर्म, १४०० वर्ष पूर्व इस्लाम आया तो फिर हिन्दुओं को आर्यों की अन्य शाखाओं से इतनी नफरत क्यों है? क्या हिन्दू स्वयम को आर्यों की संतान नहीं मानते? इसका एक ही कारण समझ में आता है. इन सभी शाखाओं का अस्तित्व में बने रहने के लिए सतत संघर्ष. यह संघर्ष हर शाखा के धर्माचार्य और उसके सम्प्रदाय के अस्तित्व को मुख्यधारा में लाने के लिए लड़ी जा रही साम्पदायिक, जातीय लड़ाई है. इसके लिए वह राजनैतिक आश्रय लेती है. धार्मिक सत्ता का राजसत्ता के शीर्ष पर आने के लिए युद्ध और छल-छद्म ही एकमात्र रास्ता है. इस सोच पर आधारित हर धार्मिक शाखा की अस्मितावादी लड़ाकू सेनायें बनीं. ऐसे में धार्मिक सेनाभर्ती के नागरिकों का खून बहना स्वाभाविक है. क्योंकि सत्ता धर्म की हो या राजनीति की, उसे बने रहने के लिए संघर्ष में धर्म की अन्य साम्प्रदायिक अस्मिताओं से युद्ध होता रहा है. सत्ता कभी भी केवल धर्म से हासिल नहीं की जा सकी. इसलिए धार्मिक सम्प्रदायों की हरेक अस्मिता को बचाने की लड़ाई अनवरत चलेगी. सत्ता हमेशा से ही तमाम सम्प्रदायों की लड़ाई के बीच किसी एक शाखा के बहुसंख्यक समुदाय का समर्थन लेकर ही ताकतवर बनी रही. सत्ता केवल धार्मिक अस्मिता के लिए शास्त्रार्थ से हासिल नहीं होती. शास्त्रार्थ केवल धर्म दर्शन के विस्तार के लिए उसकी ख्याति के लिए शास्त्रीय लड़ाई तक सीमित रहा है. अतः धर्म के सभी सम्प्रदायों का राजनीतिक दखल पहचान बचाने की खातिर बेहद जरूरी होता गया.
अगर हम ऐसे में धर्मांतरण की बात करें तो जब स्वेच्छा से कुछ लोग इस्लाम क़ुबूल करते है. या इसाइयत क़ुबूल करते हैं ज्यादातर मामलों में दबे कुचले लोगों का बहुसंख्यक तबका ही ऐसा करता है तो यह इस बात का सूचक है कि एक ही धार्मिक सम्प्रदाय में मेहनतकश तबका धर्म की जिस शाखा में रह रहा है वहां उसे बुनियादी अधिकारों से महरूम रखा गया है. उन्हें सत्तासीन लोगों द्वारा दबाया, कुचला जा रहा है. उसके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. उसे जीने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. मगर मनुवादी हैं कि जिद पर अड़े हैं चाहे कुछ भी हो हिन्दू शाखा की दलित शोषित जाति इस्लाम क़ुबूल नहीं कर सकती. धर्माचार्यों और हिन्दू सम्प्रदाय का ये कैसा भेदभावपूर्ण रवैया है ? जबकि अलग-अलग समुदायों और धर्म के लोग एक ही राजनीतिक दल में रहते हुए कभी भी अपना दल बदल सकते हैं. उनका शुद्धिकरण क्यों नहीं किया जाता. उनकी घरवापसी का सवाल कभी क्यों नहीं उठाया गया? मगर धर्म परिवर्तन करते ही मनुवादी सम्प्रदाय के लोग घरवापसी की जिद पर अड़ जाते हैं. धार्मिक दलों से ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया तो राजनीतिक दलों की है. जिसमें अर्थ वैभव का दबदबा और लोकतांत्रिक पदों पर चयनित लोग हिन्दू हों या मुसलमान, दोनों ही हर राजनीतिक दल में पाए जाते हैं. यहाँ जातीय या धार्मिक तरीके से किया जाने वाला भेदभाव नहीं है. तो फिर धर्म की शाखाओं में भेदभाव पूर्ण रवैया क्यों ? क्या यह केवल धर्म की राजनीति करने वालों की धूर्तता है जिसमें आम नागरिक मरता है, सर फुटौवल होता है. हत्याएं होती हैं. एक ही देश की दो भौगोलिक सीमाएं, सनातन धर्म के दो सम्प्रदाय जिन्हें भारत (हिन्दू बाहुल्य) और पाकिस्तान (मुस्लिम बाहुल्य) के रूप में बांटा गया. उनके बीच युद्ध होते हैं. राष्ट्रवाद के नाम पर लाखों हत्याएं हुई हैं. कौन थे वे लोग जो मारे गये. और कौन थे वो लोग जिन्होंने हत्याएं की. दोनों ही धार्मिक समुदाय से सम्बंधित थे. किन्तु राजनीतिक दुश्मन. ये रंजिश जिसे भौगोलिक बंटवारे ने पैदा किया. धर्म के आधार पर जमीन का बंटवारा. धर्म जिसने पैदा की मानवता. धर्म जिसने रची सभ्यताएं. धर्म के नाम पर ये कैसी घिनौनी राजनीति हो रही है.
सत्ता और धर्म की ये कैसी जहरीली राजनीति है. जिसमें राजनीति और धर्म ध्वजारोही दिग्गज निजी हित साधे देश पर हत्याओं का कलंक चस्पा कर रहे हैं और जनता की जानें ले रहे हैं. नृशंस हत्याओं को राष्ट्र और धर्म के लिए वाजिब बताया जा रहा है.
ये लोग कैसे भूल सकते हैं कि इस्लाम (भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में) हिन्दुस्थान और आर्यावर्त की आदिम सभ्यताओं में पैदा हुआ. फिर मनुवादियों को हिन्दू होने का गर्व इस्लाम के गर्वीले अस्तित्व से अधिक क्यों है? धर्म दर्शन की मानें तो दोनों धर्म आर्यावर्त में ही जन्मे. इनकी भौगोलिक स्थिति और सम्प्रदायों में शैलीगत अंतर था. चूंकि भौगोलिक अंतर होने के कारण समय के साथ-साथ दोनों सम्प्रदायों की मूल मान्यताओं में अंतर आता गया. मूल निवासी ‘पूर्वज’ दोनों समुदायों के एक ही थे. फिर इन दोनों के बीच कैसा धर्मांतरण और कैसी घरवापसी? इसलिए कि हिन्दुओं की एक शाखा की आबादी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हो रही है. और दूसरी कौम की बढ़ोतरी से हिन्दुओं को हर हाल में आगे रहना है. धर्म का अन्धानुकरण करने वाले मठाधीशों का यह चरित्र समझना जरूरी है.

असल में सबसे बड़े देशद्रोही तो वो लोग हैं जो न्याय और समतामूलक जमीन पर धार्मिक राजनीति के लिए रणभूमि तैयार करने में लगे हैं. अलगाव की बारूदी बिसातें बिछा रहे हैं, धार्मिक युद्ध छेड़ने की तैयारी में हैं. जिनके मार्फत यह बड़ी चतुराई और कुटिलता से फैलाया गया कि जो हिन्दू नहीं हैं वह देशद्रोही है. हिन्दू क्या केवल मुख्यधारा में शामिल धर्मगुरुओं और सियासतदारों की सत्ता का नाम है. जो मुख्यधारा में नहीं है वह बहुसंख्यक आबादी तो दलित, मुसलमान और आदिवासी जनों की है. मगर ज्यादातर आबादी सत्ता की बोई जहरीली फसल काटने में मसरूफ है. जबकि अनुसूचित, जनजाति, अल्पसंख्यक समुदायों को संविधान में अथक संघर्षों के बाद जगह मिली. जिस हिन्दू या इस्लाम की बात करने वाले सियासतदार धर्म के अन्य सम्प्रदायों, शाखाओं को फलने फूलने की बजाय उनका सरेआम क़त्ल कर रहे हैं उसे न्यायोचित ठहरा रहे है. वे सचमुच कभी मानेंगे कि किसी भी सम्प्रदाय का धार्मिक होना कोई गुनाह नहीं, बल्कि व्यापक जीवन दर्शन का होना है. 

03 फ़रवरी 2015

दिल्ली में कांग्रेस यानी डूबने-उबरने का आख्यान


-दिलीप ख़ान

(24 जनवरी को ये लेख मासिक 'सबलोग' के लिए लिखा गया। दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस की हालत की पड़ताल इसमें की गई है।)

माकन के सर पर हिमालय-सा बोझ
पिछले दिल्ली चुनाव में अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस के लिए उसके बाद लगातार झटके मिलते रहे हैं। लोक सभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने के बाद केंद्र में सत्ता का तक़रीबन पर्याय बन चुकी इस पार्टी के पूरे तौर-तरीके में ज़बर्दस्त मायूसी पसरी हुई दिख रही है। दिल्ली में पिछले एक साल से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली लगातार अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन करते हुए अपनी पार्टी के लिए खोया हुआ जनाधार जुटाने की कोशिश करते तो दिखे, लेकिन जैसे ही चुनाव की घोषणा हुई प्रचार के मोर्चे पर बीजेपी और आम आदमी पार्टी की तुलना में कांग्रेस कहीं नहीं दिख रही। आख़िर वजह क्या है? क्या 2004 का लोक सभा चुनाव लड़ने के बाद दिल्ली की स्थानीय राजनीति से ऊपर उठ चुके अजय माकन का अचानक पूरे परिदृश्य में उतरने के बाद नई शैली को आजमाने का इरादा पार्टी ने बनाया? सवाल और भी हैं। 

पिछले चुनाव में जब कांग्रेस को 8 सीटों पर सिमटना पड़ा था तो उस सत्ता विरोधी लहर में भी 30 हज़ार से ज़्यादा वोटों से जीतने वाले कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को टिकट देने की बजाय उनके हाथों प्रचार का ज़िम्मा सौंपकर क्या कांग्रेस अपनी पूरी मरम्मत करना चाहती है? 8 में से उन 5 सीटों पर पिछली बार कांग्रेस को जीत मिली जहां अल्पसंख्यकों की तादाद ज़्यादा हैं। क्या इस बार अल्पसंख्यकों का भरोसा पार्टी जीत पाएगी?

दिल्ली में इस वक़्त (लेख लिखे जाने तक) जो हालात हैं उसमें आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर दिख रही है और किसी भी चमत्कार की उम्मीद को दरकिनार करते हुए ये माना जा रहा है कि कांग्रेस तीसरे स्थान से बेहतर प्रदर्शन करने की हालत में नहीं है। फिर भी, चांदनी चौक लोक सभा के दायरे में आने वाली मटियामहल विधान सभा सीट पर पिछला चुनाव जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट से जीतने वाले शोएब इक़बाल ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। बिल्कुल चुनावी सीज़न में। जदयू से कांग्रेस में ना सिर्फ़ इक़बाल शामिल हुए बल्कि मुंडका से निर्दलीय जीतने वाले रामबीर शौकीन भी कांग्रेस में आ गए हैं। इन सब समीकरणों का कांग्रेस के लिहाज से क्या मायने हैं?

शीला दीक्षित को घोषणापत्र बनाने में भी जगह नहीं दी गई
प्रचार समिति के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की तरफ़ से अजय माकन इस चुनाव में पार्टी के आधिकारिक चेहरे हैं। शीला दीक्षित को सिर्फ़ प्रचार का ज़िम्मा दिया गया है। घोषणापत्र बनाने में भी दीक्षित को नहीं रखा गया। ए के वालिया को इसकी ज़िम्मेदारी मिली। शीला दीक्षित पर पिछले चुनाव में आक्रामक तेवर अख़्तियार करने वाले अरविंद केजरीवाल को दोबारा ये मौक़ा नहीं देने के उद्देश्य से उन्हें मुख्य भूमिका नहीं दी गई या फिर कांग्रेस यहां नया नेतृत्व खड़ा करना चाहती है?नेतृत्व का सवाल इसलिए अहम है क्योंकि ये सिर्फ़ मौजूदा चुनाव भर का मामला नहीं है बल्कि जिस तरह दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी का आगमन हुआ उसके बाद चुनावी मैदान में बाइनरी मुक़ाबले का दौर भी ख़त्म हो गया, जिसमें कांग्रेस के सामने सिर्फ़ बीजेपी थी। केंद्रीय राजनीति में सबसे बुरी हार देखने वाली कांग्रेस के कई नेताओं ने धीरे-धीरे पार्टी का हाथ छोड़ कर दिया और कुछ छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। लेकिन इसी दौर में क्या कांग्रेस के कुछ कद्दावर नेता केंद्रीय सत्ता से दूर होने के बाद स्थानीय ज़मीन पकड़कर अपनी टिकाऊ राजनीति करना चाहते हैं?

अजय माकन को लोक सभा चुनाव में नई दिल्ली सीट पर तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। पार्टी में अब भी वो कई मामलों में निर्णायक भूमिका में हैं, लेकिन अगर उनकी अगुवाई में कांग्रेस ज़रा भी अपने पुराने नतीजे में सुधार कर पाई तो नीतिगत मामलों में वो अगली पांत में खड़े हो जाएंगे। कांग्रेस के इतिहास की जानकारी जिन नेताओं के पास है वो जानते हैं कि डूबते-डूबते ये पार्टी कई बार फिर से अमरबेल की तरह पनपी है क्योंकि पुराने भरोसे और कई प्रदेशों में विकल्पहीनता की स्थिति में लोगों ने अंतत: कांग्रेस पर भरोसा जताया। शोएब इक़बाल और रामबीर शौकीन के कांग्रेस में शामिल होने को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए। शोएब इक़बाल पांच बार सांसद रहे हैं और वो प्रदेश की राजनीति को लंबे समय से जानते हैं। जनता दल, जनता दल (एस) और जदयू के प्रतिनिधि के तौर पर वो लगातार विधान सभा तो पहुंचते रहे, लेकिन दिल्ली के भीतर इस पार्टी के भविष्य को देखते हुए इक़बाल के पास बहुत कुछ हासिल होने की उम्मीद नहीं थी। 

मटियामहल से इस बार कांग्रेस से अगर वो जीतते हैं तो इसका कई मोर्चों पर वो फ़ायदा उठाने की स्थिति में होंगे। अपने अनुभव के दम पर कांग्रेस के भीतर उन्हें बेहतर ज़िम्मेदारी मिल सकती है जो जदयू में मुमकिन नहीं था। दूसरा, मटियामहल इकलौती सीट है जहां बीजेपी को भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारना पड़ा। अल्पसंख्यकों के भीतर इस बार वोट का बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी की तरफ़ मुड़ जाने की बात कई जानकार बता रहे हैं। लिहाजा, कांग्रेस और ‘आप’ के बीच की टक्कर में अगर शोएब ने कांग्रेस खेमे में जाकर अपनी पुरानी जान-पहचान को वोट में तब्दील किया तो कांग्रेस उनके लिए बेहतर प्लेटफॉर्म बन जाएगी।

दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस के लिए यही दोहरी स्थिति पनप रही है। पार्टी मुक़ाबले में है भी नहीं और कुछ लोग इस बुरे दौर में कांग्रेस को प्लेटफॉर्म मानकर भविष्य की मज़बूती देख रहे हैं। लेकिन असल सवाल तो ये हैं कि मोटे तौर पर इस चुनाव में कांग्रेस कहां खड़ी है और उसकी क्या रणनीति है? क्या कांग्रेस की राजनीति के तौर-तरीक़ों में पहले के मुक़ाबले बदलाव आया है? अजय माकन जिस दिन नामांकन भरने जा रहे थे तो उन्होंने जनसभा की। जनसभा में भाषणों और उनके बयानों से ज़्यादा जिस चीज़ पर ग़ौर किया जाना चाहिए था वो थी उनके सिर पर हाथ छाप और कांग्रेस लिखी टोपी। ये पारंपरिक ‘कांग्रेसी टोपी’ से अलग थी। ये आम आदमी पार्टी की शैली वाली टोपी थी। यानी कांग्रेस अपने वोट का दायरा जिन वर्गों के बीच देख रही है उसमें इसे असल टक्कर ‘आप’ से ही मिलती दिख रही है। बीजेपी को जिन तबकों का वोट मिलता रहा है उसको हथियाने में कांग्रेस फ़िलहाल तो असफ़ल मालूम पड़ती है क्योंकि नरेन्द्र मोदी की छवि के पीछे मध्य वर्ग का बड़ा तबका जिस तरह अभी भी लहालोट है वैसे में कांग्रेस वापस अवैध कॉलोनियों, बिजली, पानी और ठेका-मज़दूरी के प्रश्न पर टिक गई है।

चुनाव लड़ने के बदले प्रचार का ज़िम्मा
पिछली बार की तुलना में कांग्रेस ने तरीके तो बदले हैं लेकिन पूरी भाव-भंगिमा ऐसी है जैसे हारने का नतीजा पार्टी को पहले से पता हो। ना प्रचार में चुस्ती, ना पुरानी आक्रामकता और ना ही नेताओं में आत्मविश्वास। राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ-साथ 100 से ज़्यादा प्रचारकों की सूची तो माकन ने बना ली, लेकिन जनवरी के लगभग आख़िर तक गांधियों की कोई चुनावी सभा और रैली नहीं हो पाई। पिछली बार जिस तरह ख़ाली कुर्सियों के सामने राहुल गांधी को भाषण देना पड़ा था उस लिहाज से पार्टी शायद भविष्य के लिए उन्हें बचा लेना चाहती है। अरविंदर सिंह लवली जैसे नेताओं को चुनाव ना लड़ाकर प्रचार के मैदान में उतारना शायद इसी रणनीति का हिस्सा है। 

हालांकि इस बार लवली की तरह बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय भी चुनाव नहीं लड़ रहे और दोनों पार्टियों का दावा है कि उनके अध्यक्ष सभी 70 सीटों पर निगरानी रख रहे हैं। लेकिन, इसके बावजूद मौजूदगी दर्ज कराने के लिए दोनों के समर्थकों ने टिकट ना मिलने के चलते ‘नाराजगी’जताते हुए पार्टी दफ़्तरों पर विरोध प्रदर्शन किया। लवली का एक समर्थक तो बिजली के टावर पर चढ़कर कूदने की धमकी भी दे रहा था। क्या टावर पर चढ़ा वो आदमी दिल्ली के भीतर कांग्रेस की पतली होती हालत का रूपक है?

ज़मीनी प्रचार में भले ही कांग्रेस पिछड़ती रही, लेकिन घोषणापत्र सबसे पहले जारी कर एक बढ़त बनाने की कोशिश की गई। दिलचस्प ये है कि कांग्रेस के घोषणापत्र का आधा हिस्सा आम आदमी पार्टी और आधा हिस्सा बीजेपी जैसा लग रहा था। मिसाल के लिए 200 यूनिट तक बिजली के दाम 1.50 रुपए करने से लेकर मुफ़्त सीवर देने जैसे कांग्रेस से वादों के बाद आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने बाक़ायदा प्रेस कांफ्रेस करके ये कह दिया कि ये मुद्दा उनकी पार्टी है जिसको कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जगह दी है, लेकिन जनता आम आदमी पार्टी में ही भरोसा जताएगी। मेट्रो से लेकर अस्पताल जैसे जो मुद्दे कांग्रेस के घोषणापत्र में हैं वो मध्य या उच्च मध्य वर्ग को लुभाने वाले हैं। तो क्या कांग्रेस बीजेपी और ‘आप’ के बीच संतुलन बनाते हुए सत्ता के लिए बीच का रास्ता पकड़ना चाहती है? 

क्या इस देश की राजनीति में सबसे लंबी सक्रियता के बावजूद कांग्रेस अपनी मज़बूत लकीर खींच पाने में अक्षम हो चली है? दिल्ली के भीतर बीजेपी और आप को लेकर कांग्रेस तीखी भी रही। दोनों पर हवाई वायदे करने के आरोप कांग्रेस ने लगातार लगाए और ये भी कहा कि कांग्रेस ही इक़लौती पार्टी है जो ऐसे वायदे कर रही है जिसे डेलिवर करना मुमकिन है। हालांकि कांग्रेस के पास बयानों में ये आक्रामकता जताने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि इस बार खोने के लिए पार्टी के पास ज़्यादा है नहीं। अल्पसंख्यकों के वोट में आम आदमी पार्टी ने सेंधमारी कर ली और पार्टी का एक दलित चेहरा कृष्णा तीरथ अचानक खेमा बदल कर पटेल नगर से बीजेपी की उम्मीदवार बन गई। ये वो तबके हैं जो बीजेपी की बजाय कांग्रेस में भरोसा जताते आए हैं, लेकिन कांग्रेस ये जानती है कि अगर दिल्ली में इस बार पिछले परिणाम को भी बचाने में असफ़ल रही तो अगले कई वर्षों तक दिल्ली में भी वही हालात बन जाएंगे जैसा बिहार या उत्तर प्रदेश में बने।

केजरीवाल फेनोमिना को जिस तरह पिछले चुनाव में कांग्रेस ने नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की उसके नुकसान का आकलन पता नहीं पार्टी ने किया या नहीं, लेकिन इस बार चुनाव आयोग के सामने केजरीवाल को लेकर शिकायतों में कांग्रेस ने सबसे ज़्यादा तत्परता दिखाई। यानी कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को लेकर ज़्यादा चिंतित है और उसकी चिंता का असल कारण यही है कि दिल्ली के परिदृश्य में यही वो पार्टी है जिसने कांग्रेस के वोट का मोटा हिस्सा ‘चुरा’ लिया। बीजेपी पहले भी थी और अब भी है। तो लड़ाई में पैनापन बीजेपी के ख़िलाफ़ लाए या आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़, ये कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति का बड़ा सवाल है। 

लेकिन, आलम ये है कि ऐसी रणनीतियों पर विचार करने में ही कांग्रेस के हाथों प्रचार का ज़्यादातर वक़्त फ़िसल गया और मैदान में मौजूदगी से ज़्यादा रणनीति बनाने में ही पार्टी लगी रह गई। चेहरे के चुनाव में तब्दील हुआ दिल्ली का ये चुनाव हाल के वर्षों का पहला चुनाव है जिसमें सभी तीनों पार्टियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर अपने-अपने मुख्यमंत्रियों के दावेदारों को सामने कर दिया। लोकसभा चुनाव में सिर्फ़ बीजेपी के पास मोदी थे, लेकिन यहां आम आदमी पार्टी के पास केजरीवाल, बीजेपी के पास पहले मोदी फिर बेदी और कांग्रेस के पास अजय माकन हैं। 

लेकिन, पिछले दो साल में दिल्ली की राजनीति जिस धुरी पर घूमती रही है वो अन्ना हज़ारे के बाद का शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उससे उपजे अरविंद केजरीवाल हैं। लिहाजा चेहरे की दावेदारी ‘आप’ के पास भी है और उसी आंदोलन की जड़ से निकली किरण बेदी के रूप में बीजेपी के पास भी, लेकिन अजय माकन की लंबी राजनीतिक यात्रा के बावजूद फ़ौरी मसलों पर दिल्ली की राजनीति के साथ जनता उनको कितना कनेक्ट करेगी ये फ़रवरी महीने में ही सबको मालूम पड़ सकेगा।

24 जनवरी 2015

जेटली जी विज्ञापन को छुट्टा रखेंगे

-दिलीप ख़ान

अभी टीवी मीडिया में विज्ञापन की सीमा को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के प्रस्ताव को दो साल भी नहीं हुए थे कि नए सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने इसको लागू करने पर अनचाहापन जाहिर किया। जेटली के मुताबिक़ ऐसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ धोखा होगा। पहला जे एस वर्मा स्मृति संबोधन देते हुए उन्होंने कहा कि टीवी न्यूज़ मीडिया के लिए प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की बाध्यता अंतत: संविधान के अनुच्छेद 19(1) के साथ मेल नहीं खाती। ट्राई ने 2013 के मार्च महीने में सारे टीवी न्यूज़ चैनलों को एक एक नोटिस दिया था कि अक्टूबर 2013 से प्रति घंटे 12 मिनट से ज़्यादा विज्ञापन नहीं दिखाए जा सकते। उस वक़्त ब्रॉडकास्टरों ने अपने राजस्व में कमतरी का तर्क देते हुए कहा था कि इतनी कम समयावधि में अगर इसे लागू किया गया तो सारे न्यूज़ चैनल घाटे में चले जाएंगे। 
मूल रूप से राष्ट्रीय सहारा में छपा लेख

मंत्रालय ने इसके लिए दिसंबर 2014 तक के लिए समय सीमा बढ़ाई जब तक डिज़िटाइजेशन की प्रक्रिया पूरा करने का मंत्रालय ने लक्ष्य रखा था। डिज़िटाइजेशन के साथ इसको लागू करने का तर्क ये था कि एक बार अगर ये प्रक्रिया पूरी होती है तो राजस्व का जो हिस्सा चैनलों को विज्ञापन से हासिल होता है उसका बड़ा टुकड़ा सब्सक्रिप्शन पर शिफ्ट हो जाएगा। यानी सेट टॉप बॉक्स और सब्सक्रिप्शन के ज़रिए चैनलों को होने वाली मात्र 10 फ़ीसदी की आमदनी बढ़कर 30-40 फ़ीसदी के स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन ना ये पूरा हुआ और ना ही विज्ञापन की समय सीमा निर्धारित हो पाई। सब्सक्रिप्शन के चलते ग्राहकों पर तो बोझ बढ़ गया लेकिन ना ही उनके सामने टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन कम हुए ना ही पुरानी दर में न्यूज़ देखा मुमकिन हो पाया।

पूरे मीडिया उद्योग में ये अफ़वाहें तैरती रही कि ट्राई का ये नियम 'नया' और प्रतिकामी है। हक़ीकत ये है कि केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स रूल्स 1994 के तहत ही उसने चैनलों को ये हिदायत दी थी। इस सरकारी क़ानून को मंत्रालय ने जब मंजूर किया है तो फिर मंत्रालय इसको लागू कराने के प्रति गंभीरता क्यों नहीं दिखा रहा? अगर नियम में कोई पेंच है तो उसमें संशोधन होना चाहिए या पूरे क़ानून को निरस्त कर देना चाहिए फिर नियम लागू होना चाहिए। लेकिन हो ये रहा है कि क़ानून भी है क़ानून का पालन भी नहीं हो रहा। उसी अधिनियम में एडवर्टाइज़मेंट कोड ऑफ़ टीवी नेटवर्क (विनियमन) रूल 1994 के तहत ये भी चर्चा की गई है कि टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन इस तरह के होंगे ताकि वो उसके मुख्य विषय सामग्री से अलग दिखे। क्या टीवी में इस नियम को फॉलो किया जाता रहा है? 

अगर नहीं, तो इस पर मंत्रालय ने क्या कार्रवाई की? निर्मल बाबा का प्रायोजित शो (विज्ञापन) जब चैनलों के लिए झमाझम टीआरपी का ज़रिया बना तो एक के बाद एक चैनलों पर उसका प्रसारण शुरू हुआ। उसमें स्क्रीन पर बेहद छोटे अक्षर में चालाकी बरतते हुए एडीवीटी (Advt.) लिखा होता था जिसे किसी दर्शक के लिए देख पाना मुश्किल था। तमाम आलोचनाओं के बाद इस शो को कुछ चैनलों ने बंद कर दिया और जो चलाते रहे उन्होंने एडीवीटी का फोंट बढ़ा दिया।

विज्ञापन के मोर्चे पर नियम-क़ायदे को लागू करने का मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी से टकराव का मामला नहीं है। किसी भी टीवी न्यूज़ चैनल को जब मंत्रालय लायसेंस देता है तो वो न्यूज़ नाम की सामग्री के प्रसारण के लिए होता है। विज्ञापन उसकी आमदनी का ज़रिया है ताकि ख़बर को चलाए रखने लायक राजस्व चैनल बना पाए। इस तरह ये पूरा मामला मीडिया के पत्रकारिता वाले पक्ष का नहीं बल्कि उद्योग वाले पक्ष का है। उद्योग के लिए नियम लागू करना कहीं से भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ना तो चोट है ना ही किसी भी तरह का अंकुश। दूसरी बात, क्या विज्ञापन का जो मौजूदा स्लैब है जिसमें चैनल मनमाना तरीके से 20-22 मिनट तक विज्ञापन दिखाते रहते हैं, इसमें छोटे-मझोले चैनलों के लिए प्रतियोगिता में टिके रहने का कोई स्कोप है? 

अगर विज्ञापन पर बने नियम को हम अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ भी दें तो इसमें लोकतांत्रिक रवैया कहां है? बड़े चैनलों और बड़े समूहों के पास ज़्यादा विज्ञापन झटकने के सौ तरीके हैं और छोटे चैनल इस पूरे परिदृश्य में टिक नहीं पाते। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने भी चैनलों के रवैये पर दो-तीन बार गंभीर टिप्पणी की है। विज्ञापन लाने का जो प्रमुख जरिया चैनलों के पास है वो है टीआरपी। लिहाजा विज्ञापन को लुभाने के लिए चैनल टीआरपी को लुभाते हैं और टीआरपी को लुभाने के लिए कई दफ़ा विषय सामग्री में गंभीरता की बजाए सनसनी और हल्केपन की चाशनी लपेट देते हैं। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन जुटाने का संबंध सीधे तौर पर कंटेंट से भी जुड़ा है। चैनलों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए इस तरह का कोई आयोग नहीं है जो उन्हें दिशा-निर्देश दे सके। चैनलों के स्व-नियमन की कुछ संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में इतने मौक़ों पर असफ़ल साबित होते रहे हैं कि ऐसे किसी भी संस्था का वजूद सतह पर मालूम ही नहीं पड़ता।

प्रिंट मीडिया के लिए समाचार और विज्ञापन का अनुपात बहुत पहले से निश्चित है। टीवी इससे बाहर क्यों रहे? लेकिन टीवी मीडिया ने इतनी आक्रामकता से अपनी मौजूदगी दर्ज की है कि इसको लेकर नियम-क़ायदे बनाने के लिए सरकार के पास कोई समय मिलता ही नहीं दिख रहा। 2013 में ही 'पेड न्यूज़' पर संसद की स्थाई समिति की लंबी चौड़ी-रिपोर्ट में भी विज्ञापन को लेकर कई चिंताएं जताई गईं। पेड न्यूज़ ख़ुद में विज्ञापन का ही रूप है। क्या नई सरकार उस रिपोर्ट को लागू कराने के पक्ष में है? अगर विज्ञापन को लेकर खुली छूट जारी रही और एडवर्टाइज़मेंट स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया के हाथ में मौजूद शक्ति असल में विज्ञापनदाताओं को ताक़तवर बनाने को लेकर झुकी रही तो टीवी की ख़बरों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहेंगे। 

09 जनवरी 2015

शार्ली एब्दो प्रकरण विवाद

-दिलीप ख़ान
[फ़ेसबुक पर टुकड़ों में  बात करने के बदले एक साथ ही यहां अपना पक्ष लिख दे रहा हूं।]

शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ़्तर पर हुए ख़ूनी हमले के बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी का पुराना विमर्श फिर से सामने आ गया है। पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस चल रही है उसको मोटे तौर पर तीन-चार खांचों में बांटा जा सकता है। पहला तबका ऐसे लोगों का है जो ऐसे किसी भी हमले के ख़िलाफ़ हैं और पत्रिका में छपे कार्टूनों से जिन्हें कोई परेशानी नहीं है। दूसरा तबका ऐसे लोगों का है जो हमले के ख़िलाफ़ हैं, लेकिन कार्टून्स के भी ख़िलाफ़ हैं। तीसरा तबका वो है जो कार्टून्स के कारण हमले तक के पक्ष में दबी ज़ुबान हामी भर रहे हैं।

पहले खांचे में वो लोग भी शामिल हैं जो हाल-हाल तक ‘पीके’ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते थे। अचानक धार्मिक दायरा बदलने से वो शार्ली एब्दो की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक हो गए। ऐसे लोग, एक ही मसले पर अपने धर्म पर अलग और दूसरे धर्म पर अलग स्टैंड लेने वाले ढुलमुल प्रजाति के होते हैं। 

दूसरे और तीसरे खांचे के लोगों में से तीन-चार तर्क ज़ोरों से दिए जा रहे हैं। पहला, पैग़ंबर की कोई आकृति नहीं है तो फिर उनपर कार्टून बनाना धार्मिक भावना को आहत करने वाला कदम है। दूसरा, शार्ली एब्दो पत्रिका लगातार धर्म पर चोट करने के चलते विवादों से घिरी रही है। तीसरा, वो ना सिर्फ़ इस्लाम बल्कि कैथोलिक और यहूदियों को भी समय-समय पर नाराज़ करती रही है। कुल जमा मतलब ये कि उस पत्रिका के कंटेंट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम लगातार किया है। तर्कों को खींचकर उस समूची पत्रिका को ही अश्लील, हल्की और फसाद पैदा करने का कारखाना बताया जा रहा है। 

विवादित कार्टून्स

2006 में इस साप्ताहिक पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद पर एक कार्टून छापा और इसके चलते बड़ा विवाद हुआ। इसके बाद सीरीज़ में इस्लाम पर इस पत्रिका ने अंक निकाले। सर्वाधिक विवादित कार्टूनों में से एक में पैगंबर मोहम्मद कह रहे हैं कि “कट्टरपंथियों की हरक़त से पैगंबर खुश हुआ है”। इस व्यंग्य में अगर इस्लामिक चरमपंथियों के नकार के बजाए पैगंबर का कैरीकेचर ध्यान खींचता है तो कार्टून नाम की पुरानी विधा के अब-तक के सफ़र पर समाज की कूपमंडूकता का झटके में भारी पड़ना तय हो जाता है। अगर पैगंबर के नाम पर ही मार-काट मचाने वाले कुछ चरमपंथी अपनी राजनीति को समाज में पैबस्त करने पर जुटे हुए हैं तो एक कैरीकेचर वाली पत्रिका के सामने कोई विकल्प नहीं बचता कि वो यह बात सीधे पैगंबर के मुंह से कहलवाए कि उनके नाम के आधार पर ये तमाम हमले बंद होने चाहिए। 

इस अंक का फ्रांस सहित दुनिया के कई मुल्क़ों में विरोध हुआ। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति यॉक शिरॉक ने इसे भड़काऊ बताया था और अंतत: पत्रिका को लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। फ्रांस में अदालती लड़ाई जीतने के बाद पत्रिका में साप्ताहिक प्रकाशन जारी रहा, जिनमें अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक मसले (सिर्फ़ धार्मिक नहीं) शामिल थे। बाद के दिनों में निकोलस सरकोज़ी और फ्रांस्वा ओलांद ने “फ्रांस की पुरानी व्यंग्य परंपरा” का हवाला देते हुए पत्रिका का बचाव किया। 2011 में एक बार फिर पत्रिका को लेकर विवाद हुआ। पत्रिका ने एक अंक में पैगंबर मोहम्मद को अतिथि संपादक बना दिया और उस अंक में पत्रिका के मॉस्टहेड के नीचे एक उपशीर्षक दिया और अंक का नाम रखा ‘शरिया एब्दो’। ये शरिया क़ानून पर चोट करने वाला अंक था। 
क्या शार्ली रेसिस्ट पत्रिका है?

सवाल ये है कि क्या शार्ली एब्दो सिर्फ़ इस्लाम पर कार्टून्स छापकर उस एकमात्र धर्म को निशाने पर अब तक रखती आई है या फिर क्या ये पत्रिका सिर्फ़ धार्मिक मामलों पर ही कार्टून्स और व्यंग्य छापती है?  मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ये दोनों सवाल काफी अहम हैं। शार्ली एब्दो में व्यंग्य, कार्टून और कैरीकेचर ही प्रमुख सामग्री है और हफ़्तेवार प्रकाशन में विवाद का मामला सिर्फ़ धर्म को लेकर ही बार-बार आया। इसलिए पत्रिका के बारे में पढ़ने पर ऐसा लगता है गोया पत्रिका हर अंक में धार्मिक मामलों पर विवादित कार्टून प्रकाशित करती रही हो। जबकि ऐसा है नहीं। जिस दूसरे कार्टून पर ज़्यादा विवाद है वो है- पोप का कंडोम पहनना। ये तब की ख़बर है जब ख़बर आई थी कि पोप चर्च के भीतर सेक्स करते हैं। हालांकि अब तो ब्रूसेल्स मे एक पोप पर बाल तस्करी, बलात्कार सहित कई मामले अदालत में साबित हुए। इसलिए पोप पर चोट करने पर हैरानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन हैरानी सिर्फ़ इसलिए होती है क्योंकि पोप को आलोचना से परे कर दिया गया है। 

ठीक पराशक्ति अल्लाह या ईश्वर की तरह। अगर पोप के सेक्स करने के तथ्य को कार्टून का रूप दे दिया गया तो धार्मिक असहिष्णुता का मामला कैसे हो गया? तथ्य, तथ्य है। चर्च के भीतर सेक्स पर पाबंदियों पर व्यंग्य करते हुए किसी कार्टून में अगर नन को हस्तमैथुन करते दिखाया गया है तो ये व्यक्तिगत और निजी मामला नहीं है। किसी ख़ास नन के बारे में नहीं है, बल्कि उस ट्रेंड पर बात करता हुआ ये कार्टून है जिसमें नन की सैक्सुअल ज़रूरत को पूरा करने के तरीके को रेखांकित किया गया है। क्या सेक्स पर बात करना या सेक्स पर कार्टून छापना अश्लील है? या, धार्मिक लोगों के सेक्स पर बात करना अश्लील और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है? या, धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए राजनीतिक यथार्थ को बयां करने के लिए पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बना देना दुनिया के लिए ख़तरनाक है?  अभिव्यक्ति के टूल हर दफ़े अगर समाज के हर तबके से पूछकर तलाशे जाए तो शायद कार्टून और कैरीकेचर में दर्ज़ होने वाले कैरेक्टरों की संख्या मुट्ठी भर रह जाएगी। 

राजनीतिक मामलों को लेकर प्रतिबंध

1970 के दशक में प्राकृतिक आपदा को लेकर निकाले गए एक अंक के बाद इस पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब तक ये दूसरे नाम से निकलता था। प्रतिबंध के दायरे से बाहर निकलने के लिए इसका नाम शार्ली एब्दो रखा गया। हालांकि इस पत्रिका में कई बार ये आरोप भी लगे हैं कि इसके कुछ कार्टून्स नस्लवादी रहे हैं। लेकिन, नस्लीयता का मामला जहां भी रहा शार्ली एब्दो के भीतर भी विरोध हुए। कोई भी पत्रिका ग़लती करती है, शार्ली ने भी की। कुछ लोग निकलकर नई पत्रिका भी निकाले। लेकिन नस्लीयता के जितने इल्ज़ाम है, उनमें से ज़्यादातर धार्मिक संगठनों ने ही लगाए। लिस्ट उठाकर चेक कर लीजिए।  मैं फ्रेंच नहीं जानता, इसलिए ये दावा नहीं कर सकता कि मैंने पत्रिका पढ़ी है। 

लेकिन, इस पत्रिका पर हमले के बाद इंटरनेट सहित समाचार एजेंसियों पर जितनी सामग्रियां थीं, उनमें से ज़्यादातर को पढ़ा क्योंकि अगले दिन आधे घंटे को प्रोग्राम बनाना था इस पर। कुल जमा इस नतीजे पर हूं कि असहमत हैं तो असहमति जताइए लेकिन जो सहमत हैं उनपर क्यों पिल पड़ रहे हैं? आपकी असहमति किसी कार्टून पर ठीक वैसे ही हो सकती है जिस तरह आपकी किसी बात पर किसी और की असहमति। आपकी असहमति के चलते कोई बात करना बंद नहीं कर देगा। आप आहत हैं तो आहत होना मुबारक़। कार्टून और कैरीकेचर के नाम पर ज़रा-ज़रा सी बात पर आहत होने के चलन को जिस तरह सिद्धांत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है वो अंतत: बहुत संकुचित दिशा की तरफ़ लेकर हमें बढ़ेगा। 

23 दिसंबर 2014

मृत्यदंड के बारे में: रोबेस्पिया

(मृत्युदंड का विरोध किस तरह आज से ही नहीं बल्कि फ्रांस की क्रांति के समय से ही समाज के जनवादीकरण से जुडा हुआ है. और यह भाषण आज भी किस तरह प्रासंगिक बना हुआ है. यह 22 जून 1791 को महान क्रांतिकारी रोबस्पेरे द्वारा फ़्रांस की संविधान सभा में दिये गए भाषण का हिंदी अनुवाद है.)

एथेंस में जब खबर पहुंची कि अर्गोस नगर के नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया है तो वहां के लोग भाग कर देवालयों में गए और उन्होंने देवताओं को आह्वान किया कि वे एथेंस के लोगों को ऐसे भयानक और क्रूर विचारों से बचाएं. मेरा आह्वान देवताओं से नहीं कानून निर्माताओं से है, उनसे जो देवत्व के शाश्वत नियमों के संचालक और भाष्यकार हैं, कि ऐसे खूनी कानूनों को फ़्रांस की संहिता से मिटा दे जो न्यायिक हत्याओं को निर्देशित करते हैं और जिनको उनकी नैतिकता और नया संविधान ख़ारिज करते हैं. मैं उनके समक्ष साबित करना चाहता हूँ : 1. कि मृत्युदंड सारतः अन्याय है. और 2. कि यह दण्डो में से सबसे दमनकारी नहीं है और यह अपराधों को रोकने से ज्यादा उन्हें संगुणित करता है.

नागरिक समाज के दायरे से बाहर यदि एक कटु शत्रु मेरा जीवन ख़त्म करने की कोशिश करता है, या बीसियों बार धकेलने पर भी मेरे द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने वापस आ जाता है. तो क्योंकि मेरे पास विरोध के लिए केवल मेरी व्यक्तिगत शक्ति का ही सहारा है इसलिए मुझे उसे अनिवार्यतः नष्ट करना होगा या उसे ख़त्म कर देना होगा और प्राकृतिक रक्षण का नियम मुझे औचित्य और स्वीकृति प्रदान करता है. लेकिन समाज में, जब सभी की शक्ति केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लामबंद है तो न्याय का कौन सा सिद्धांत उसकी हत्या की स्वीकृति दे सकता है? कौन सी अनिवार्यता इसे दोषमुक्त कर सकती है? एक विजेता जो अपने बंदी शत्रु की हत्या करता है बर्बर कहलाता है! एक प्रौढ़ जो किसी बालक को शक्तिहीन कर उसे दंड देने की सामर्थ्य रखता है यदि उसकी हत्या कर दे तो राक्षस समझा जाता है! एक अभियुक्त जिसे समाज द्वारा सजा दी गई है एक पराजित और शक्तिहीन शत्रु के सिवा कुछ भी नहीं है और वह एक प्रौढ़ के सामने बालक से भी ज्यादा असहाय है.

अतः, सत्य और न्याय की नज़र में मौत के ये नज़ारे जिन्हें यह अनुष्ठानपूर्वक आदेशित करता है, कायराना कत्लों के सिवा कुछ भी नहीं है, ये केवल कुछ व्यक्तियों के बजाय समूचे राष्ट्र के द्वारा कानूनी तरीको से किये गये गंभीर अपराध है. कानून चाहे कैसे भी निर्मम और वैभवशाली क्यों न हों, हैरान मत होइए, ये चंद उत्पीड़कों के कारनामों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. ये ऐसी काराएं हैं जिनसे मानव जाति को अधोपतित किया जाता है. ये ऐसी भुजाएं हैं जिनसे उसे पराधीन किया जाता है,
ये कानून खून से लिखे गए हैं. किसी भी रोमन नागरिक को मौत की सजा देना वर्जित था. यह जनता द्वारा बनाया गया कानून था. लेकिन विजयी स्काईला ने कहा : वे सभी जिन्होंने मेरे विरुद्ध अस्त्र उठाये मृत्यु के भागी हैं. ओक्टावियन और अपराध में उसके सहभागियों ने इस नए कानून की पुष्टि की.

तिबेरियस की अधीनता में ब्रूटस की प्रशंसा करना मृत्युयोग्य अपराध था. कालिगुला ने उन सबको मृत्युदंड दिया जिन्होंने भी सम्राट के चित्र के समक्ष नग्न होने की धृष्टता की. एक बार जब आतताई शासकों द्वारा राजद्रोह के अपराध – जो अवज्ञापूर्ण या नायकोचित कृत्य हुआ करते थे – का आविष्कार कर लिया गया तो फिर कौन बिना स्वयं को राजद्रोह का भागी बनाए यह सोचने की हिम्मत कर सकता था कि इनकी सजा मृत्युदंड से थोड़ी कम होनी चाहिए?

अज्ञानता और निरंकुशता के राक्षसी मिलन से पैदा हुए उन्माद ने जब दैवीय राजद्रोह के अपराध का आविष्कार कर लिया, जब इसने अपने मतिभ्रम में स्वयं ईश्वर का प्रतिशोध लेने का बीड़ा उठा लिया, तब क्या यह जरुरी नहीं हो गया था कि यह उन्हें रक्त अर्पित करे, और स्वयं को ईश्वर का ही रूप मानने वाले, उसे दरिन्दे की श्रेणी में पहुंचा दें?

पुरातन बर्बर कायदे के समर्थक कहते है कि मृत्युदंड अनिवार्य है, बिना इसके अपराध पर लगाम लगाना संभव नहीं है. यह आपसे किसने कहा? क्या आपने उन सभी अंकुशों का आकलन कर लिया है जिनके द्वारा दंडविधान मनुष्य की संवेदना पर काम करता है? अफ़सोस, मृत्यु से पहले मनुष्य कितना शारीरिक और नैतिक कष्ट सहन कर सकता है?

जीने की इच्छा उस आत्मसम्मान के सामने नतमस्तक हो जाती है, जो ह्रदय पर शासन करने वाले आवेगों में सबसे प्रबल होता है. एक सामजिक मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक सजा अपमानित होना है, सार्वजनिक निंदा का पात्र बन जाना है. यदि कानून निर्माता नागरिक को इतनी सारी नाजुक जगहों पर चोट पहुंचा सकता है तो उसे मृत्युदंड के इस्तेमाल करने की हद तक क्यों गिर जाना चाहिए? दंड दोषी को यातना देने के लिए नहीं होता है, वरन वह उसके भय से अपराध को रोकने के लिए दिया जाता है.

जो कानून निर्माता मृत्यु और उत्पीड़नकारी सजाओं को अन्य तरीकों के ऊपर वरीयता देता है वह जनभावनाओं को आहत करता है और शासितों के बीच अपनी नैतिक साख को कमजोर करता है. एक ऐंसे ढोंगी गुरु की तरह जो बार बार की क्रूर सजाओं से अपने शिष्य की आत्मा को जड़ और अपमानित बना देता है. वह कुछ ज्यादा ही जोर से दबाकर सरकार की स्प्रिंगों को ढीला और कमजोर कर देता है.

जो कानून निर्माता म्रत्युदंड का विधान स्थापित करता है वह इस उपयोगी सिद्धांत का निषेध करता है कि किसी अपराध को दबाने का सबसे सही तरीका उन आवेगों की प्रकृति के अनुसार दंड तय करना है जोकि उसको पैदा करते हैं. मृत्युदंड का विधान इन सभी विचारों को धूमिल कर देता है यह सभी अन्तःसम्बन्धों को विघटित कर देता है और इस प्रकार दंडात्मक कानून के उद्देश्य का ही खुलेआम निषेध करता है.

आप कहते हैं कि मृत्युदंड अनिवार्य है. यदि यह सत्य है तो क्यों बहुत सारे लोगों को इसकी जरुरत नहीं पड़ी. विधि के किस विधान के तहत ऐसे लोग ही सबसे बुद्धिमान, सबसे खुश और सबसे स्वतंत्र थे? यदि मृत्युदंड ही बड़े अपराधों को रोकने के लिए सबसे उचित है तो ऐसे अपराध वहां सबसे कम होने चाहिए जहाँ इसे अपनाया और प्रयोग किया गया. किन्तु तथ्य एकदम विपरीत हैं. जापान को देखिये: वहां से ज्यादा मृत्युदंड और यातनाएं और कहीं नहीं दी जाती परन्तु वहां से अधिक संख्या में और वहां से अधिक जघन्य अपराध और कहीं नहीं होते. कोई कह सकता है कि जापानी लोग भीषणता में उन बर्बर कानूनों को चुनौती देना चाहते हैं जो उन्हें आहत और परेशान करते हैं. क्या यूनानी गणतन्त्रों -जहाँ सजाएँ नरम थी और जहां मृत्युदंड या तो बहुत कम थे या थे ही नहीं- में खूनी कानूनों द्वारा शासित देशों से ज्यादा अपराध और कम अच्छाइयां थी? क्या आपको लगता है की रोम में पोर्सियाई ज़माने में जब इसके वैभवशाली दिन थे, जब सारे कड़े कानूनों को हटा दिया गया था, स्काईला जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, के जमाने की तुलना में ज्यादा अपराध होते थे, जब सभी कठोर कानूनों को वापस ले आया गया था? क्या रूस के निरंकुश शासक ने जब से मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया है वहां किसी प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ है? ऐसा लगता है कि इस तरह की मानवता और दार्शनिकता का प्रदर्शन करके वह लाखों लोगों को अपनी निरंकुश सत्ता के अधीन रखने के जुर्म से दोषमुक्त होना चाहते हैं.

न्याय और विवेक की बात सुनिए. ये आपको चिल्ला कर कह रहे हैं कि मानवीय निर्णय कभी भी इतने निश्चित नहीं होते कि वे कुछ मनुष्यों द्वारा जो कि गलतियाँ कर सकते हैं, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के बारे में तय करने के औचित्य का प्रतिपादन कर सकें. यदि आप सबसे सम्पूर्ण न्यायिक फैसले की भी कल्पना कर लें, यदि आप सबसे ज्यादा ज्ञानी और ईमानदार जजों की भी व्यवस्था कर लें तब भी गलतियों की संभावना बची रहती है. आप इन गलतियों को सुधारने के औजारों से स्वयं को क्यों वंचित कर देना चाहते हैं? स्वयं को किसी उत्पीडित निर्दोष की मदद करने में अक्षम क्यों बना देना चाहते हैं? क्या किसी अदृश्य छाया के लिए, किसी अचेतन राख के लिए आपके बाँझ पाश्चाताप का, आपकी भ्रामक भूलसुधार का कोई अर्थ है? वे आपके दंड विधान की बर्बर तत्परता के त्रासद साक्ष्य हैं. अपराध को पाश्चाताप और अच्छे कार्यों के द्वारा सुधार सकने की संभावना को किसी व्यक्ति से छीन लेना, अच्छाई की तरफ उसके लौट आने के सारे रास्ते निर्ममता से बंद कर देना, उसके पतन को शीघ्रता से कब्र तक पहुंचा देना जो अब भी उसके अपराध से दागदार है, मेरी नज़र में क्रूरता का सबसे भयावह परिष्करण है.

एक कानून निर्माता का सबसे पहला कर्तव्य उन सार्वजनिक नैतिक मूल्यों की स्थापना करना और उन्हें बचाए रखना है, जो सभी आज़ादियों और सभी सामाजिक खुशियों के मूल स्रोत हैं. किसी विशिष्ट उद्देश्य को पाने के प्रयास में यदि वह सामान्य और आवश्यक उद्देश्यों को भूल जाता है तो वह सबसे भौंडी और भयानक गलती करता है. अतः राजा को लोगों के सामने न्याय और विवेक का सबसे आदर्श उदहारण पेश करना चाहिए. यदि इस को परिभाषित करने वाली शक्तिशाली, संयत, और उदार सख्ती की जगह क्रोध और प्रतिशोध से काम लेते हैं, यदि वे बिना वजह के खून बहाते हैं, जिसको बचाया जा सकता था और जिसे बहाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. और वे लोगों के सामने निर्मम दृश्य, और यातना से विकृत लाशों को प्रस्तुत करते हैं तो यह नागरिकों के जेहन में न्याय और अन्याय के विचार को बदल देता है. वे समाज में ऐसे तीखे दुराग्रहों के बीज बो देते हैं जो उतरोतर बढ़ते जाते हैं. मनुष्य, मनुष्य होने की गरिमा खो देता है जब उसके जीवन को इतनी आसानी से जोखिम में डाला जा सकता है. हत्या का विचार तब इतना डरावना नहीं रह जाता जब कानून खुद ही इसे एक मिसाल और तमाशे की तरह पेश करता है. अपराध की भयावहता तब कम हो जाती है जब उसे एक और अपराध के जरिये दण्डित किया जाता है. किसी दंड की प्रभावपूर्णता को उसकी कठोरता की मात्रा से मत आंकिये: ये दोनों एक दूसरे के एकदम उलटी बाते हैं. हर कोई उदार कानूनों की सहायता करता है. हर कोई कठोर कानूनों के खिलाफ षड्यंत्र करता है.

यह देखा गया है की स्वतंत्र देशों में अपराध कम हैं और दंडात्मक कानून ज्यादा उदार हैं. कुल मिलाकर, स्वतंत्र देश वे हैं जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और इसके फलस्वरूप जहाँ के कानून न्यायपूर्ण हैं. जहाँ अतिशय कष्ट देकर मानवता का उल्लंघन किया जाता है यह इस बात का प्रमाण है कि वहां मनुष्यता की गरिमा को अभी पहचाना नहीं गया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वहां कानून निर्माता स्वामी है जो दासों को चलाता है और अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे उन्हें सजाएं देता है. अतः मेरा निष्कर्ष है कि मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए.

अनुवाद: कुलदीप प्रकाश साभार

15 अक्टूबर 2014

महिषासुर दिवस के मायने

दिलीप ख़ान
(जब जेएनयू में पहली या दूसरी बार महिषासुर दिवस मनाया गया था तो उस वक़्त ये टिप्पणी लिखी थी। मेल से निकालकर यहां पेस्ट कर रहा हूं। इसे सवर्णों से लड़ने के तौर-तरीके की भीतरी आलोचना के तौर पर लिखा गया है।) 

दुनिया और भारत के प्राचीन इतिहास को पढ़ते हुए कोई भी इतिहास का विद्यार्थी कभी किसी दुर्गा नाम के चरित्र से नहीं टकराया। इतिहास के मुताबिक़ ऐसा कोई चरित्र मानव सभ्यता के विकासक्रम में था ही नहीं। अगर होता तो यह अरब या यूरोप-अमेरिका के देशों में रहने वाले वहां के निवासियों के लिए परिचित चरित्र होता। यानी एक ख़ास भूगोल में रहने वाले ख़ास धर्म के भीतर ख़ास तबके ने अपने धर्म की गाथा फैलाने के उद्देश्य से इस चरित्र को गढ़ा। अनेक चरित्र गढ़े गए, जिनमें दुर्गा भी एक हैं। दुर्गा की कहानी अकेले पूरी नहीं हो सकती, तो महिषासुर के अलावा और भी चरित्र बने। अब इस चरित्र को लेकर मोटे तौर पर तीन वर्ग बंटे हैं। पहला, जो दुर्गा की मौजूदा कहानी को मान्यता देता है और उसके साथ है। दूसरा, जो दुर्गा की कहानियों को नए सिरे से डीकोड करके उसमें खलनायक के तौर पर प्रस्तुत किए गए पात्रों को मौजूदा दमित अस्मिता के साथ खड़ा करता है और दुर्गा को इस आधार पर चुनौती देता है। तीसरा, जो दुर्गा और महिषासुर को काल्पनिक चरित्र मानता है और इन दोनों को खारिज करता है। 

मिथक किसी भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। धार्मिक दायरे के भीतर चरित्र जैसे ही घुसता है तो उसके होने-ना होने या फिर कितना होने और कैसा होने के सवाल का आम तौर पर लोप हो जाता है। क्योंकि धर्म के मसले पर सवाल से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि आप उसमें वर्णित प्रसंगों को कितना फॉलो करते हैं। जितना यक़ीन, उतने धार्मिक। उतने मिथक के करीब और उतने मिथक बनाने वाले की राजनीति के भी। मिथकों में मौजूद चरित्रों की कहानियों या फिर उनकी प्रस्तुति पर जैसे ही शक शुरू होता है मिथकों का क़िला भी ढहने लगता है। नई व्याख्याओं के ज़रिए हो सकता है कि मिथक के मुख्य (हीरो या हीरोइननुमा) चरित्र की सादगी, राजनीति, सच्चाई और ईमानदारी पर सवाल उठे और मिथक के भीतर उनकी मौजूदगी का लुभावना पक्ष सवालों के घेरे में आ जाए। व्याख्याओं के ज़रिए ऐसा होता है, चाहे वो कहानियों की हो, चाहे फ़िल्मों की। इसलिए व्याख्या अच्छी चीज़ है। समाज जब गतिशील होता है तो व्याख्याओं की संभावना लगातार बनी रहती है। मिथक में खलनायक के तौर पर पेश किए गए चरित्र को बिल्कुल नए सिरे से नायक भी बनाया जा सकता है और नायक/नायिका को खलनायक वाले खांचे में पहुंचाया जा सकता है। 

ऐसा करने का सबको बराबर हक़ है। ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद, निराला या फिर जयशंकर प्रसाद के पात्रों की व्याख्या होती है और नए अर्थ खुलते हैं। व्याख्या करने का हक़ नहीं छीना जा सकता। ये बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर किसी को दुर्गा स्थापना करने का हक़ है तो किसी को महिषासुर स्थापना का भी। एक कर रहा है तो दूसरा भी करे। मौजूदा वर्चस्वशाली धार्मिक आख्यान को चुनौती देने के लिए व्याख्याओं के ज़रिए जो प्रति-नायक खड़ा करने की बात है, एक अर्थ में है तो वो ठीक, लेकिन जैसे ही व्याख्याओं से आगे जाकर पूरा मामला उसी तरह श्रद्धा में टिक जाता है, तब मिथकीय घटना दोनों तरफ़ से सच्चाई के तौर पर स्थापित हो जाती है। यानी पूरा मामला ऐसा हो जाता है कि घटना तो घटी थी, मसला सिर्फ़ व्याख्या का है। यानी एक दुर्गा थी, एक महिषासुर थे। अपने समूचे अस्तित्व में वो इतिहास के किसी कालखंड में किसी जगह पर जन्में थे। पता नहीं किस काल में, लेकिन जन्में थे। हड़प्पा के बाद या फिर मौर्य काल में या फिर हद से हद दिल्ली सल्तनत के दौरान।

जब भक्ति का जवाब भक्ति से दिया जाने लगे तो बदले की कार्रवाई जैसा कुछ तो हो सकता है लेकिन एक वैज्ञानिक तर्कशील समाज की रचना की दिशा में बढाया गया कदम नहीं हो सकता। फ़र्ज कीजिए कि कल को 60 करोड़ लोग दुर्गी के बदले महिषासुर को पूजने लगे, क्या फ़र्क पड़ जाएगा? क्या पूजने से राजनीतिक मानस बदल जाएगा? इस देश में पूजा, भक्ति और राजनीति के बीच के बहुस्तरीय संबंध को देखने के बाद इस स्थापना को मान पाना बहुत मुश्किल है। एक वैज्ञानिक समाज बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि श्रद्धा के ऐसे मामलों पर प्रमाण के लिए दबाव बनाया जाए। मसलन जैसे ही कोई बोले कि दुर्गा थी तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि दुर्गा का जन्म किस ईस्वी में हुआ। ठीक इसी तरह महिषासुर को अगर सच्चाई के रूप में पेश किया जा रहा है तो उनके जन्म और मृत्यु का साल बताया जाना चाहिए। 

दलित-ओबीसी के वास्तविक राजनीतिक संघर्ष को प्रतीकों के ज़रिए श्रद्धा के सवाल पर टांगना चिंताजनक है। ज़रूरी ये है कि मिथक की व्याख्या तो हो, लेकिन व्याख्या के दौरान ये पूरी तरह स्पष्ट हो जाए कि मिथक काल्पनिक चीज़ है। एक डिसक्लेमर हो- इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं।’ 

हिंदी की मुश्किलें कहां हैं

-दिलीप ख़ान

हिंदी दिवस और पखवाड़ा बीत चुका है। लिहाजा, हिंदी पर ‘बातचीत और चिंतन’ की इस सरकारी सक्रियता के बाद के वक़्त में इस पर बात करनी ज़रूरी लग रही है क्योंकि अब अगले सितंबर में ही इस भाषा की सुध लेने की कोशिश होगी। और, इस कोशिश के दरम्यान लाखों-करोड़ों रुपए ख़र्च कर चर्चा और जागरुकता अभियान जैसी कवायद के संकल्प के साथ इसे फिर अगले सितंबर में दोहराने को छोड़ दिया जाएगा। मैं इस बहस में नहीं पड़ रहा हूं कि हिंदी दिवस मनाए कि नहीं मनाए, कि दिवस अमूमन कमज़ोर चीज़ों का मनाया जाता है। मैत्रेयी पुष्पा ने 14 सितंबर को एक संगोष्ठी में इसी पसोपेश के साथ अपनी बातों की शुरुआत की थी। इशारा ये था कि सेठों, पुरुषों और अंग्रेज़ी का दिवस नहीं होता बल्कि इसकी बायनरी में खड़ी चीज़ों (मज़दूरों, स्त्रियों और हिंदी) का होता है। 

हिंदी की तमाम उत्सवधर्मिता और रुदाली के तमाम आख्यानों से निकलकर ठोस ज़मीनी हालात पर बहस करने की ज़रूरत अब भी शेष है। चंद सवाल ऐसे हैं, जिन पर दशकों से चर्चा हो रही हैं और ऐसा लग रहा है कि दशकों ये चर्चा के केंद्र में रहेंगे। इनमें हिंदी का भविष्य क्या है, हिंदी ज्ञान की भाषा क्यों नहीं बन पा रही, हिंदी को दोयम दर्ज़े का बरताव हासिल है, हिंदी बाज़ार और करियर की भाषा बन पा रही है या नहीं आदि प्रमुख हैं। लेकिन इनसे आगे का सवाल ये है कि हिंदी की बेहतरी के लिए क्या किया जाए और हिंदी के नाम पर चल रहे आंदोलनों, प्रदर्शनों और संवेदनात्मक धरातल पर इससे उपजीं खीझ-खिसियाहट की राजनीतिक दिशा क्या हो?
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग या फिर कई दफ़ा राजभाषा और राष्ट्रभाषा में फर्क नहीं कर पाने की स्थिति में इसे सचमुच राष्ट्रभाषा के तौर पर रेलवे प्लेटफॉर्म सहित कई जगहों पर नीली-लाल स्याही से लिखने की रूमानियत से ना तो हिंदी की बेहतरी मुमकिन है और ना ही ये मज़बूत बनने वाली है। 

हिंदी क्यों राष्ट्रभाषा हो? क्या इसलिए कि ये देश में सबसे ज़्यादा लोगों द्वारा बोली-बरती जाती है? जब इतने लोग बोलते-बरतते हैं तो भाषा की उन्नति का आत्मविश्वास राष्ट्रभाषा जैसे जुमले में क्यों तलाशा जा रहा है? संख्या को आधार बनाए तो फिर समस्या का समाधान ही हो गया। फिर क्यों कम लोगों द्वारा बोले जाने वाली अंग्रेज़ी को आक्रामक भाषा के तौर पर हिंदी पट्टी और हिंदी को लेकर चिंतित लोग देख रहे हैं? जाहिर है कि अंग्रेज़ी को जिस तरह का सरकारी प्रश्रय मिला है और जिस तरह व्यवस्था में अंग्रेज़ी जानने वालों को सिर्फ़ इस आधार पर लाभ मिल रहा है कि वो अंग्रेज़ी में ख़ुद को संप्रेषित कर सकते हैं, वो चिंता का मूल मुद्दा है। यानी, भाषा के आधार पर किसी भी तरह के विभेद को ख़त्म करना हिंदी के भविष्य, चुनौतियों, बेहतरी आदि तमाम प्रश्नों के केंद्र में है।
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित

इसलिए इस विभेद को ख़त्म करके ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी का प्रभुत्व स्थापित करना हिंदी वालों के लिए लाभदायक, खुशफ़हम लेकिन राजनीतिक तौर पर प्रतिगामी कदम होगा। जब हिंदी के लोग ये अपेक्षा करते हैं कि तमिल, तेलुगू या मणिपुरी जानने वाले लोगों को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए तो ये सवाल पलटकर भी पूछा जा सकता है कि कितने हिंदीभाषी अपनी सहूलियत को त्यागकर दूसरी भारतीय भाषा सीखने की कोशिश करते हैं? हिंदी को लेकर मोह अगर सिर्फ़ इसलिए है कि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते और अंग्रेज़ी से मात खा रहे हैं तो इस मोह में भाषाई उन्नति की ईमानदार कोशिश कम और हिंदी में ही सीमित अपने ज्ञान को स्वीकार करवाने की मजबूरी ज़्यादा है।
हिंदी आंदोलन एक ख़ास भौगोलिक हितों की रक्षा के अंतर्निहित भाव का अगर आंदोलन बनता है तो निश्चित तौर पर आगे चलकर ये दूसरी अंग्रेज़ी बनकर रह जाएगी। लेकिन, हालात अभी इसके ठीक उलट हैं। अभी हिंदी और तमाम भारतीय भाषाओं के लोग ज्ञान की धरातल पर भाषा की दीवार को तोड़ने की कोशिश में हैं ताकि अंग्रेज़ी को सिर्फ़ अंग्रेज़ी होने का बेजा लाभ ना मिल सके। 

मसला ये है कि हिंदी की परवाह और चिंता करने वाले लोग कौन हैं? क्यों हिंदी भाषा पर बात करते समय हिंदी साहित्य को इसका पर्याय मान लिया जाता है? क्यों हिंदी के इतिहास की चर्चा में अमूमन साहित्य का ही ज़िक्र होता है? हिंदी की इस चिंतनपद्धति ने भाषा का सबसे ज़्यादा नुकसान किया है। सिर्फ़ साहित्य की पीठ पर सवार होकर कोई भाषा टिकाऊ नहीं बनी रह सकती। साहित्य बदलाव, रसास्वादन, इंक़लाब और समय काटने का ज़रिया एक साथ बन सकता है और किसी भाषा को टिकाए भी रख सकता है लेकिन उसे समाज की मांगों के अनुरूप इज़्ज़त और रुतबा नहीं दिला सकता। ये इज़्ज़त और बराबरी तब मिलेगी जब ज्ञान के बाक़ी अनुशासनों में हिंदी को व्यावहारिक समानता हासिल हो। 

अगर सरकार हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को माध्यम के बतौर प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाती है तो क्या कारण है कि वही सरकार नौकरियों में अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देती नज़र आती है? अगर सरकार को अंग्रेज़ी की ज़रूरत मालूम पड़ती है तो फिर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी क्यों नहीं है? दरअसल ये व्यवस्था से जुड़ा बुनियादी सवाल है। ये एक साथ भाषा, वर्ग और गांव-शहर के बीच के फासलों से नत्थी सवाल है। लिहाजा ये सामाजिक न्याय का सवाल है। 

गांव में हिंदी माध्यम में पढ़ा कोई दलित-आदिवासी अगर उच्च शिक्षा के लिए देश के किसी अग्रणी विश्वविद्यालय में आरक्षण के अधिकार के बूते नामांकन पाता है, तो क्या कक्षा में अचानक दूसरी भाषा को माध्यम के बतौर अपनाने की हालत में वो सहजता हासिल कर सकेगा? हालांकि ये बात एक साथ आरक्षित-अनारक्षित किसी भी ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी लोगों पर लागू हो सकती है, लेकिन अलग-अलग सर्वेक्षणों के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ें हमें बताते हैं कि सबसे ज़्यादा संख्या में दलित और आदिवासी ही अभी अपनी पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। 

हिंदी में उच्च शिक्षा नहीं होने के क्या कारण हैं? क्या हिंदी में शिक्षण सामग्री उपलब्ध नहीं है या फिर हिंदी में उच्च शिक्षा की शब्दावली विकसित नहीं हुई है? ये दो सवाल ऐसे हैं जिनका कोई आसान जवाब नहीं है और सबसे ज़्यादा इन्हीं मोर्चे पर काम करने की भी दरकार है। हिंदी में लोग पढ़ना नहीं चाहते, ये सवाल नितांत बेमानी है। सबसे ज़्यादा बिकने वाली हिंदी पत्रिकाओं की सूची पर नज़र दौड़ाइए तो इसमें प्रतियोगिता दर्पण शीर्ष पर हैं। यानी रोज़गार की सामग्री लेपेटे हिंदी अगर लोगों के बीच जा रही है तो लोग उसे अपना रहे हैं। जाहिर है जिस भाषा में रोज़गार नहीं मिलेगा उसमें बोल-चाल और हंसी-मज़ाक से ज़्यादा उन्नति वाले सिरे पर कोई व्यक्ति क्यों ज़ोर लगाएगा? सामाजिक विज्ञान से लेकर दूसरे अनुशासनों में हिंदी माध्यम की सामग्रियों में अल्प मात्रा में आए अनुवादों को छोड़ दें तो मूल लेखन कितने हुए हैं? 

सच मानिए तो इन विधाओं में हिंदी में जिस तरह रवां-दवां तरीके से लेखन हो रहे हैं उसमें बौद्धिक स्तर का अभाव, सिद्धांतों-अवधारणाओं का लोप और सतहीपन ज़्यादातर मौक़ों पर साफ़ झलकता है। पुरानी कुछ किताबों को छोड़ दीजिए तो हाल में हिंदी की कितनी श्रेष्ठ किताबें इन विधाओं में लिखी गई हैं? हिंदी की बेहतरी की दिशा में कोशिश करने की बजाए लेखक बनने की छटपटाहट और किताब लिखने से विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बनने की दावेदारी के मज़बूत होने की कवायद ज़्यादा झलकती हैं। जो समाज वैज्ञानिक हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों जानते हैं और हिंदी में लिख सकने के बावजूद अंग्रेज़ी में लिखते हैं वो हिंदी में रॉयल्टी की मात्रा से परिचित हैं लिहाजा अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से ये उनका ये फ़ैसला बिल्कुल मुफ़ीद है। 

हिंदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उच्च शिक्षा और रोज़गार में इसके साथ बरते जाने वाला भेद-भाव है। वरना, हिंदी बाज़ार में फर्राटेदार दौड़ रही है। कटरीना कैफ़ सरीखी अभिनेत्री अगर पेशानियों पर ज़ोर डालकर हिंदी के संवाद याद करती हैं तो इसलिए कि बॉलीवुड में हिंदी को मथने से पैसा निकलता है। भारत (और पाकिस्तान भी) के बड़े हिस्से में पहुंच अंग्रेज़ी की बदौलत नहीं बनाई जा सकती। बॉलीवुड अपनी सुविधा, अपने मुनाफ़े के लिए हिंदी को पकड़े हुए है और इसमें कोई भी ऐसी क्रांतिकारी इच्छाशक्ति नहीं है कि वो हिंदी का प्रचार करे। फर्ज कीजिए कि किसी दिन अंग्रेज़ी ने हिंदी को अपदस्थ कर दिया, तो बॉलीवुड के लिए अंग्रेज़ी में स्विच करना बहुत देरी वाला काम नहीं होगा। हिंदी चिंतन और रोज़गार की भाषा जब तक नहीं बनेगी और जब तक एकाग्र होकर इस दिशा में ज़ोर नहीं लगाया जाता तब तक हिंदी के नाम पर तमाम चिंतन-मनन अधूरी और बेमानी रहेगा। 

इसे दुरुस्त करने के लिए दो प्रयासों के ज़िक्र को दोहराने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। पहला, सरकार उच्च शिक्षा में इसे बराबरी का दर्ज़ा दे और दूसरा हिंदी के लिए चिंता करने की बजाए इस भाषा को जानने-समझने वाले लोग इसमें ज्ञान का सृजन करें। यह सृजनात्मकता अगर स्थगित रही तो बहुत मुमकिन है कि भविष्य में हिंदी का कोई भी बेहतर लेखन पाठकों को ये भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहेगा कि वो सचमुच मौलिक और बौद्धिक स्तर पर उच्च मानदंड पर खरा उतरने वाला लेखन है। क्योंकि, इस दौरान हिंदी में इतनी लद्धड़ क़िस्म की किताबें इसी रफ़्तार से छपनी जारी रही तो सचमुच हिंदी में इन अनुशासनों को पढ़ने से विश्वास ही उठ जाएगा। 

विश्वविद्यालयी शिक्षा के दौरान जब पत्रकारिता के हिंदी माध्यमों की किताबों में नारद मुनि को आदि पत्रकार के मिसाल के बतौर हम पढ़ते थे तो हंसी, विस्मय, जुगुप्सा और अजीब सी उदासी हमें घेर लेती थी। हर साल इस तरह की किताबों में इजाफ़ा हो रहा है। लिहाजा, हिंदी को बाहर के साथ-साथ भीतरी चौहद्दी में भी लड़ने की ज़रूरत है। अगर ये लड़ाई नहीं लड़ी गई तो हिंदी में ज्ञान के नाम पर नकली चीज़ें परोसी जाती रहेंगी और दूसरी तरफ़ एक अच्छे सुबह रैपीडैक्स हिंदी को निगलकर डकार मारते हुए चलता बनेगा। 

11 सितंबर 2014

सरकारी विदेश दौरे और मीडिया

-दिलीप ख़ान


फोटो राज्य सभा टीवी से साभार
पिछले दिनों कुछ टेलीविज़न चैनलों पर एक साथ कई पत्रकारों ने इस बात को लेकर चिंता जाहिर की कि मौजूदा प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे। अलग-अलग मसलों पर शामिल स्टूडियो परिचर्चा में जो सूत्र इन पत्रकारों को जोड़ता है वो यही बात है। चिंता ये जताई गई कि इससे पत्रकारिता को नुकसान पहुंच रहा है और फर्स्ट हैंड ऑब्जर्वेशन के अभाव के चलते आधिकारिक बयानों का ही सहारा लेना पड़ रहा है। एक हद तक इस बात से सहमति जताई जा सकती है कि किसी इवेंट में पत्रकारों की मौजूदगी नहीं होने के चलते ख़बरों के संकलन पर इसका असर पड़ सकता है, लेकिन मीडिया उद्योग के लिए इस सवाल के सिरे को पलट कर देखना चाहिए।
क्या लगातार विस्तार पा रहा भारत का मीडिया उद्योग किसी इवेंट में शिरकत के लिए ख़ुद अपने बूते पत्रकार नहीं भेज सकता? क्या वजह है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित किसी भी मंत्री के साथ विदेश दौरे पर जाने के लिए मीडिया संस्थान उत्साही रवैया दिखाता है? क्या ये महज पत्रकारिता के लिए ख़बरों के संकलन तक सीमित मामला है या फिर इसके जरिए सैर-सपाटा, सत्ता के गलियारे में जान-पहचान और व्यावसायिक गुणा-गणित भी साधने की कोशिश होती है। इस बात को प्रमुखता से इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इन दौरों पर कई मौक़ों पर सक्रिय पत्रकार के बदले मीडिया संस्थान के मालिक ख़ुद शामिल हो जाते हैं।

जापान में मोदी. फोटो- Salon.com से साभार
अगर चिंता पत्रकारिता संबंधी है तो फिर पूरे साल नफ़ा-नुकसान की गणना करने वाले मालिक के मन में अचानक रिपोर्टिंग की भावना कैसे पनप जाती है? दूसरी बात ये कि अगर चिंता सचमुच पत्रकारिता और ख़बरों के संकलन की है तो मीडिया संस्थानों को सत्ता गलियारे की रिपोर्टिंग के अलावा देश-विदेश के बाक़ी मुद्दों की खोज-बीन पर साल भर ध्यान देना चाहिए। लेकिन देश के कथित राष्ट्रीय टीवी चैनलों का कोई भी स्थायी रिपोर्टर पड़ोस के किसी भी देश में नहीं है और ना ही देश के सभी राज्यों में। रिपोर्टिंग के ख़र्च को जिस तरह कतरब्यौंत किया जा रहा है उससे वो पत्रकार भी सहमत दिखते हैं जो विदेश यात्रा पर पत्रकारों को नहीं ले जाने को लेकर चिंताभाव प्रकट कर रहे हैं।

पिछले 5-6 साल में भारत का मीडिया उद्योग लगभग दोगुना विस्तार पा चुका है। केपीएमजी और फ़िक्की के आंकड़ों के मुताबिक़ 2008 में मीडिया का कुल बाज़ार 58,000 करोड़ रुपए का था, जो 2013 में बढ़कर 91,800 करोड़ तक पहुंच गया। अनुमान है कि 2018 में यह बाज़ार 1,78,600 करोड़ तक पहुंच जाएगा। अगर बाज़ार इतना विस्तार पा रहा है तो पत्रकारिता के सिमटते दायरे का सवाल इस धंधे में लगे मालिकों के सामने उछाला जाना चाहिए। विश्व कप फुटबॉल कवर करने अगर कोई मीडिया संस्थान दो-तीन रिपोर्टर भेज सकता है तो इराक़-सीरिया कवर करने एक अदना रिपोर्टर क्यों नहीं भेज सकता? अगर विदेशों की रिपोर्टिंग प्रधानमंत्री दौरे के इंतज़ार में स्थगित रहती है तो ये मीडिया उद्योग में घटते पेशेवर रवैये पर सवाल है। दूसरी बात ये कि मीडिया संस्थान अगर अपने ख़र्च से पत्रकारों को इन दौरों की रिपोर्टिंग के लिए भेजते हैं तो उसकी वस्तुनिष्ठता कहीं अलहदा क़िस्म की होगी। लिहाजा सवाल करने और असंतोष प्रकट से पहले ये बेहद ज़रूरी है कि वो वाक़ई ईमानदार क़िस्म की हो और जिस उद्योग की तरफ़ से सवाल उठाए जा रहे हैं उसके भीतर भी सवाल उठे।
                   [राज्य सभा टीवी से साभार]

03 सितंबर 2014

मीडिया ओनरशिप के मसले और मौजूदा हालात

-    दिलीप ख़ान
ट्राई ने 12 अगस्त को मीडिया ओनरशिप पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट दी
जिस पर मीडिया में चर्चा नहीं हुई। फोटो- मिंट से साभार

भारत में मीडिया को लेकर हाल के वर्षों में जो चिंता जताई गई है उस पर मीडिया के बाहर और भीतर लगातार चर्चा हुई, लेकिन उसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम ना के बराबर उठे। पिछले पांच-छह वर्षों में बड़े निगमों ने जिस स्तर पर मीडिया में निवेश किया है उसकी वजह से इसका चरित्र भी तेज़ी से बदला है। बिल्कुल नई क़िस्म की चुनौतियां इसके सामने खड़ी हुईं जो पहले या तो नहीं थीं, या फिर थीं भी तो सतह पर नहीं दिखती थीं। लेकिन इसके सूक्ष्म चारित्रिक बदलाव को अगर छोड़ भी दें तो तीन-चार ऐसे विचलन हैं जो असल में मीडिया की संरचना के साथ सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इनमें मीडिया के मालिकाने में आया बदलाव, निजी संधियां और पेड न्यूज़ सबसे अहम हैं। इन तीन समस्याओं के इर्द-गिर्द ही बाक़ी मुश्किलों की झोपड़ियां बसती हैं। इन तीनों के संबंध को भी अगर आपस में तलाशा जाए तो मीडिया ओनरशिप सबसे अहम चुनौती के तौर पर दिखता है। अब सवाल ये है कि जब मीडिया में इन बदलावों को साफ़ तौर पर चौतरफ़ा नोटिस किया जा रहा है तो इस पर लगाम कसने की कोई ठोस रणनीति क्यों नहीं बन पा रही? क्या सरकार और संसद की तरफ़ से कोताही बरती जा रही है या फिर मीडिया नाम के उद्योग की संरचना को लेकर ये पसोपेश कायम है कि इसे बाक़ी उद्योगों से अलग किस रूप में अलगाया जाए? ज़्यादा पीछे ना जाए तो पिछले 6 साल में संसद, सरकार और इसके अलावा कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं ने मीडिया को लेकर दर्ज़न भर से ज़्यादा रिपोर्ट्स जारी की हैं, पचासों टिप्पणियां की हैं और सैंकड़ों बार चिंता जताई हैं।
 
अभी हाल में 12 अगस्त को भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मीडिया ओनरशिप पर अपनी सिफ़ारिश सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सौंप दी। इस मसले पर ट्राई का ये तीसरा अध्ययन है। सबसे पहले साल 2008 में मंत्रालय ने ट्राई को मीडिया ओनरशिप के पैटर्न का अध्यन करने के बाद सुझाव देने को कहा था। 25 फ़रवरी 2009 को प्राधिकरण ने मीडिया पर चंद लोगों के नियंत्रण से उपजे हालात और क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर अपने सुझाव सौंप दिए। इसमें ख़ास तौर पर क्रॉस मीडिया ओनरशिप के ख़तरों से मंत्रालय को अवगत कराया गया था और बताया गया था कि देश के भीतर इसके चलते ख़बरों और विचारों की बहुलता किस तरह प्रभावित हो रही है। साथ ही विदेशों में इस पर बने नियम-क़ायदों से भी मंत्रालय को अवगत कराया गया था। 16 मई 2012 को मंत्रालय ने ट्राई को अपने इन सुझावों का पुनर्वालोकन करने को कहा जिसमें कुछ तकनीकी मसलों पर विस्तार देने की बात अंतर्निहित थी।
 
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित
मिसाल के लिए होरिजोंटल ओनरशिप और वर्टिकल ओनरशिप। होरिजोंटल क्रॉस मीडिया ओनरशिप का मतलब हैं एक ही समूह का प्रसारण के अलग-अलग माध्यमों पर कब्जा होना। यानी अख़बार, टीवी, रेडियो और पत्रिका अगर एक ही मालिक निकाल रहा हो तो ये होरिजोंटल ओनरशिप है। इसी तरह वर्टिकल ओनरशिप उसको कहेंगे जिसमें प्रसारण और वितरण के अलग-अलग व्यवसाय एक ही मालिक के कब्जे में हो। यानी अगर एक ही समूह का टीवी चैनल भी है और उसके वितरण के लिए डीटीएच और केबल प्रसारण भी तो ये वर्टिकल ओनरशिप है। इन दोनों मसलों की तहकीकात करते हुए 15 फ़रवरी 2013 को ट्राई ने मंत्रालय को एक परामर्श पत्र सौंपा जिसमें कुछ अंतिम टिप्पणियां की गईं थी। परामर्श पत्र सौंपने के बाद 22 अप्रैल से लेकर 29 अप्रैल 2013 तक प्राधिकरण ने मीडिया मालिकों के अलग-अलग पक्षों से पूरे मामले पर टिप्पणियां मांगी। 33 पक्ष में और 6 विपक्ष में आईं दलीलें थीं जो ट्राई की वेबसाइट पर चस्पां कर दी गईं। यही नहीं, इसके बाद देश के अलग-अलग पांच शहरों में खुली बहस भी कराई गईं। इसमें ट्राई के नज़रिए से अहमति जताते हुए जो तर्क आए उनमें सबसे प्रमुख ध्वनि ये थी कि भारत दुनिया के अन्य मुल्क़ों से कुछ महत्वपूर्ण अर्थों में भिन्न है। यहां पर जितनी भाषाओं में और जितनी तादादा में अख़बार और टीवी चैनल हैं उतने कहीं और मुमकिन नहीं, लिहाजा विचारों और ख़बरों की बहुलता यहां प्रभावित नहीं हो रही है। लेकिन ट्राई ने इस 12 अगस्त को जो अंतिम सिफ़ारिश सौंपी है उसमें ऐसे तमाम तर्कों के जवाब दिए गए हैं।
 
देश में अख़बारों, टीवी चैनलों और रेडियो स्टेशनों की बड़ी तादाद के बावजूद ये महसूस किया गया है कि असर और प्रसार के मामले में सब बराबर नहीं हैं। प्राधिकरण ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया है। रिपोर्ट में दिल्ली से निकलने वाले अख़बारों के उदाहरण से बताया गया है कि भले ही यहां दर्जन भर से ज़्यादा अख़बार निकलते हो, लेकिन दो-तीन अख़बार यहां के बाज़ार पर वर्चस्व बनाए हुए है, इसलिए उसकी तुलना छोटे-मझोले अख़बारों से करना ख़बरों की विविधता के अर्थ में बेमानी है। विविधता के मसले और कॉरपोरेट ओनरशिप के साथ-साथ धार्मिक व्यक्तियों और संस्थाओं तथा राजनीतिक ओनरशिप पर विस्तार से टिप्पणी की गई है। ये बात देश में अब शिद्दत से महसूस की जा रही है कि यदि किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी से जुड़े किसी व्यक्ति के हाथ में मीडिया हो तो वो उसका इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने या फिर विरोधी पार्टी के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा के लिए करता है। आंध्र प्रदेश में दो-तीन महीने पहले टीवी चैनलों और केबल प्रसारण पर राजनीतिक पार्टियों के बीच तकरार इतना तेज़ हो गया था कि तेलंगाना और आंध्र के कुछ इलाकों में हिंसक झड़पों के साथ-साथ ये मसला संसद में भी उठा। राजनीतिक मालिकाने को आम तौर पर दक्षिण भारत और उत्तर पूर्व के साथ लोग जोड़कर देखते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये अख़िल भारतीय चलन के तौर पर उभरा है।
रिलायंस का 'इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट' क्रॉस मीडिया ओनरशिप
की बड़ी मिसाल है। फोटो- इंडिया टुडे से साभार
 
पार्टी मुखपत्र को लोग उसी राजनीतिक दायरे और पार्टी लाइन का मानते हुए पढ़ते हैं, लिहाजा मुखपत्र में छपी बातों पर वो अपने तर्कों के ज़रिए राजनीतिक विभेद ढूंढ लेते हैं, लेकिन सामान्य समाचार मीडिया ने जो अपनी साख स्थापित की है, उसमें सेंधमारी के ज़रिए अगर कोई राजनेता ख़बरों को मरोड़ता है तो एक दर्शक/पाठक के लिए उसको नकार पाना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन ये सब ना सिर्फ़ जारी है, बल्कि इसे लगातार विस्तार दिया जा रहा है। ट्राई की सिफ़ारिश में इसको तत्काल प्रभाव से बंद करने की बात कही गई है और बताया गया है कि अगर पहले से कोई ऐसा मीडिया चालू हालात में है तो उसे बंद करने के रास्ते निकाले जाए।
 
रिपोर्ट में होरिजोंटल और वर्टिकल क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर भी एक हद तक पाबंदी की बात कही गई है। इसमें दो-तीन फॉर्मूलों के जरिए नियंत्रण की बात कही गई है और सुझाया गया है कि अगर प्रसारण और वितरण दोनों में किसी समूह का 32 प्रतिशत से ज़्यादा शेयर है तो किसी एक में उसे घटाकर 20 प्रतिशत के स्तर तक लाना होगा। इसी तरह अगर एक से अधिक मीडिया में उसका निवेश है तो उसे ‘प्रासंगिक बाज़ार में उसके असर’ को देखते हुए कतरा जाना चाहिए। प्रासंगिक बाज़ार की परिभाषा इस तरह की है कि अगर कोई मीडिया तेलुगू माध्यम का है तो ग़ैर-तेलुगू लोगों के लिए उसका कोई महत्व नहीं है, क्योंकि वो मीडिया ग़ैर-तेलुगू भाषी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकता। इसलिए भाषावार और क्षेत्रवार ऐसे प्रासंगिक बाज़ार तलाशे गए हैं। इसमें हिंदी बाज़ार के दायरे में 10 राज्यों को रखा गया है। लेकिन मुश्किल ये है कि प्राधिकरण की इस सिफ़ारिश से छोटे बाज़ार में सक्रिय मीडिया उद्यमियों पर तो लगाम लग जाएगा, लेकिन जो बड़े समूह है और जिनका एक साथ हिंदी, अंग्रेज़ी से लेकर दो-तीन भाषाओं के बाज़ार में दख़ल है उसके लिए मुश्किल उतनी बड़ी नहीं होगी क्योंकि उनके लिए हर बाज़ार में अलग-अलग हिस्सा तय होगा। 
 
मीडिया में जिस तरह गुपचुप तरीके से निवेश का चलन बढ़ा है उससे कई दफ़ा असली मालिक का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। इसको देखते हुए भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने रिलायंस के मीडिया समूह इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट का उदाहरण देते हुए दो साल पहले ये कहा था कि मीडिया उद्योग में ‘नियंत्रण’ को भी ओनरशिप की तरह देखा जाना चाहिए। अगर अध्ययनों का ही ज़िक्र किया जाए तो भारतीय प्रेस परिषद की 2009 में आई पेड न्यूज़ की रिपोर्ट के बाद संसद की स्थायी समिति ने पिछले साल इसी मसले पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट सौंपी। विधि आयोग ने मई 2014 में इस पर एक परामर्श पत्र दिया। एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया ने अपने अध्ययन के ज़रिए इस पर रोशनी डाली। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने इस चलन पर नए क़िस्म के तौर-तरीके अपनाने की वकालत की।
 
एक ही मालिक के हाथ में सारे मीडिया होने के चलते
विचारों की बहुलता ख़त्म हो रही
लेकिन इन तमाम अध्ययनों के बावजूद कोई ठोस रूप-रेखा अब तक तैयार नहीं हो पाई। ट्राई ने जो हाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफ़ारिशें सौंपी है, उसके बाद दो तथ्यों को देखते हुए उम्मीद जगती है। पहला, जब पहली दफ़ा मीडिया ओनरशिप पर ट्राई  ने 2008 में सुझाव दिए थे तो उस वक़्त इसके अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्रा थे, जो अब मोदी सरकार में प्रमुख सचिव हैं। दूसरा, संसद की स्थाई समिति ने पिछले साल जो पेड न्यूज़ पर रिपोर्ट दी थी उसके तत्कालीन अध्यक्ष राव इंद्रजीत सिंह अब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं और अब सत्ताधारी पार्टी के हिस्सा हैं। लेकिन मीडिया पर किसी भी तरह की कार्यवाही ना करने के पिछले कई साल के रिकॉर्ड को देखते हुए यही लग रहा है कि ये सरकार भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का काम आगे के लिए टाल देगी। टीवी में आत्म नियमन के तमाम निकाय बुरी तरह असफ़ल रहे हैं और प्रिंट के लिए भारतीय प्रेस परिषद कितना कारगर है ये मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है। ट्राई ने अपनी सिफ़ारिश अब सरकार को सौंप दी है। गेंद अब सरकार के पाले में है। लिहाजा देखना दिलचस्प होगा कि क्या उस गेंद पर शॉट भी लगाए जाते हैं या फिर पाले में आई हुई गेंद रखे-रखे पुरानी हो जाएगी।
 
                                


26 जून 2014

बसपा का शीराजा क्यों बिखरा: आनंद तेलतुंबड़े

आनंद तेलतुंबड़े ने अपने इस लेख में बसपा की पराजय का आकलन करते हुए एक तरफ मौजूदा व्यवस्था के जनविरोधी चेहरे और दूसरी तरफ उत्पीड़ित जनता के लिए पहचान की राजनीति के खतरों के बारे में बात की है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले आम चुनाव हैरानी से भरे हुए रहे, हालांकि पहले से यह अंदाजा लगाया गया था कि कांग्रेस के नतृत्व वाला संप्रग हारेगा और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता में आने वाला है. वैसे तो चुनावों से पहले और बाद के सभी सर्वेक्षणों ने भी इसी से मिलते जुलते राष्ट्रीय मिजाज की पुष्टि की थी, तब भी नतीजे आने के पहले तक भाजपा द्वारा इतने आराम से 272 का जादुई आंकड़ा पार करने और संप्रग की सीटें 300 के पार चली जाने की अपेक्षा बहुत कम लोगों ने ही की होगी. खैर, भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और संप्रग को 336 सीटें. महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह, बिहार में नीतीश कुमार जैसे अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप मुंह के बल गिरे. लेकिन अब तक चुनाव नतीजों का सबसे बड़ा धक्का यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी का उत्तर प्रदेश की अपनी जमीन पर ही पूरी तरह सफाया हो गया. लोग तो यह कल्पना कर रहे थे, और बसपा के नेता इस पर यकीन भी कर रहे थे, कि अगर संप्रग 272 सीटें हासिल करने नाकाम रहा तो इसके नतीजे में पैदा होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल में मायावती हैरानी में डालते हुए देश की प्रधानमंत्री तक बन सकती हैं. इस कल्पना को मद्देनजर रखें तो बसपा का सफाया स्तब्ध कर देने वाला है. आखिर हुआ क्या?

नतीजे आने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में मायावती ने दावा किया कि दलितों और निचली जातियों में उनका जनाधार बरकरार है और चुनावों में खराब प्रदर्शन की वजह भाजपा द्वारा किया गया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है. उन्होंने कहा कि जबकि ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और मुसलमान समाजवादी पार्टी की वजह से बिखर गए. बहरहाल उन्होंने इसके बारे में कोई व्याख्या नहीं दी कि ये चुनावी खेल अनुचित कैसे थे. मतों के प्रतिशत के लिहाज से यह सच है कि बसपा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राष्ट्रीय स्तर पर इसे 2.29 करोड़ वोट मिले जो कुल मतों का 4.1 फीसदी है. 31.0 फीसदी मतों के साथ भाजपा और 19.3 फीसदी मतों के साथ इससे आगे हैं और 3.8 फीसदी मतों के साथ सापेक्षिक रूप से एक नई पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इससे पीछे है. 15वीं लोकसभा में बसपा की 21 सीटें थीं जिनमें से 20 अकेले उत्तर प्रदेश से थीं. बसपा से कम मत प्रतिशत वाली अनेक पार्टियों ने इससे कहीं ज्यादा सीटें जीती हैं. मिसाल के लिए तृणमूल कांग्रेस को मिले 3.8 फीसदी मतों ने उसे 34 सीटें दिलाई हैं और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम को इससे भी कम 3.3 फीसदी मतों पर तृणमूल से भी ज्यादा, 37 सीटें मिली हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) महज 2.0 फीसदी मतों के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही. उत्तर प्रदेश में बसपा को 19.6 फीसदी मत मिले हैं जो भाजपा के 42.3 फीसदी और सपा के 22.2 फीसदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें भी एक खास बात है: चुनाव आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि बसपा इस विशाल राज्य की 80 सीटों में 33 पर दूसरे स्थान पर रही.

लेकिन देश में तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का संसद में कोई वजूद नहीं होने की सबसे बड़ी वजह हमारी चुनावी व्यवस्था है, जिसके बारे में बसपा कभी भी कोई शिकायत नहीं करेगी. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली यह चुनावी व्यवस्था (एफपीटीपी) हमें हमेशा ही हैरान करती रही है, इस बार इसने कुछ ज्यादा ही हैरान किया. भाजपा कुल डाले गए वोटों में से महज 31.0 फीसदी के साथ कुल सीटों का 52 फीसदी यानी 282 सीटें जीत सकी. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक कुल 66.36 फीसदी वोट डाले गए, इसका मतलब है कि भाजपा को जितने वोट मिले उनमें कुल मतदाताओं के महज पांचवें हिस्से (20.5 फीसदी) ने भाजपा को वोट दिया. इसके बावजूद भाजपा का आधी से ज्यादा सीटों पर कब्जा है. इसके उलट, हालांकि बसपा तीसरे स्थान पर आई लेकिन उसके पास एक भी सीट नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूं, एफपीटीपी को चुनने के पीछे हमारे देश के शासक वर्ग की बहुत सोची समझी साजिश रही है. तबके ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर उपनिवेशों ने इसी चुनाव व्यवस्था को अपनाया. लेकिन एक ऐसे देश में जो निराशाजनक तरीके से जातियों, समुदायों, नस्लों, भाषाओं, इलाकों और धर्मों वगैरह में ऊपर से नीचे तक ऊंच-नीच के क्रम के साथ बंटा हुआ है, राजनीति में दबदबे को किसी दूसरी चुनावी पद्धति के जरिए यकीनी नहीं बनाया जा सकता था. एफपीटीपी हमेशा इस दबदबे को बनाए रखने में धांधली की गुंजाइश लेकर आती है. इस बात के व्यावहारिक नतीजे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस या भाजपा का दबदबा इसका सबूत है. अगर मिसाल के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) व्यवस्था अपनाई गई होती, जो प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा चुनावों के लिए अपनाई गई अधिक लोकप्रिय और अधिक कारगर व्यवस्था है, तो सभी छोटे समूहों को अपना ‘स्वतंत्र’ प्रतिनिधित्व मिला होता जो इस दबदबे के लिए हमेशा एक खतरा बना रहता. दलितों के संदर्भ में, इसने आरक्षण कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के बहुप्रशंसित औजार की जरूरत को भी खत्म कर दिया होता, जिसने सिर्फ उनके अस्तित्व के अपमानजनक मुहावरे का ही काम किया है. कोई भी दलित पार्टी एफपीटीपी व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी. बसपा तो और भी नहीं. क्योंकि यह उन सबके नेताओं को अपने फायदे के लिए धांधली करने में उसी तरह सक्षम बनाती है, जैसा यह शासक वर्गीय पार्टियों को बनाती आई है.

दूसरी वजह पहचान की राजनीति का संकट है, जिसने इस बार पहचान की राजनीति करने वाली बसपा से इसकी एक भारी कीमत वसूली है. बसपा की पूरी कामयाबी उत्तर प्रदेश में दलितों की अनोखी जनसांख्यिकीय उपस्थिति पर निर्भर रही है, जिसमें एक अकेली दलित जाति जाटव-चमार कुल दलित आबादी का 57 फीसदी है. इसके बाद पासी दलित जाति का नंबर आता है, जिसकी आबादी 16 फीसदी है. यह दूसरे राज्यों के उलट है, जहां पहली दो या तीन दलित जातियों की आबादी के बीच इतना भारी फर्क नहीं होता है. इससे वे प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं, जिनमें से एक आंबेडकर के साथ खुद को जोड़ता है तो दूसरा जगजीवन राम या किसी और के साथ. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाटवों और पासियों के बीच में इतने बड़े फर्क के साथ इस तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और वे एक साझे जातीय हित के साथ राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकते हैं. इसके बाद की तीन दलित जातियों – धोबी, कोरी और वाल्मीकि – को भी उनके साथ मिला दें तो वे कुल दलित आबादी का 87.5 फीसदी बनते हैं, जो राज्य की कुल आबादी की 18.9 फीसदी आबादी है. कुल मतदाताओं में भी इन पांचों जातियों का मिला जुला प्रतिशत भी इसी के आसपास होगा. यह बसपा का मुख्य जनाधार है. इन चुनावी नतीजों में कुल वोटों में बसपा का 19.6 फीसदी वोट हासिल करना दिखाता है कि बसपा का मुख्य जनाधार कमोबेश बरकरार रहा होगा.

दूसरे राज्यों के दलितों के उलट जाटव-चमार बाबासाहेब आंबेडकर के दिनों से ही आर्थिक रूप से अच्छे और राजनीतिक रूप से अधिक संगठित रहे हैं. 1957 में आरपीआई के गठन के बाद, आरपीआई के पास महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत इलाके रहे हैं, कई बार तो महाराष्ट्र से भी ज्यादा. यह स्थिति आरपीआई के टूटने तक रही. महाराष्ट्र में आरपीआई के नेताओं की गलत कारगुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश में आरपीआई के दिग्गजों बुद्ध प्रिय मौर्य और संघ प्रिय गौतम भी क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के साथ गए. इस तरह जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में कदम रखे तो एक दशक या उससे भी अधिक समय से वहां नेतृत्व का अभाव था. उनकी रणनीतिक सूझ बूझ ने उनकी बहुजन राजनीति की संभावनाओं को फौरन भांप लिया. उन्होंने और मायावती ने दलितों को फिर से एकजुट करने और पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबकों को आकर्षित करने के लिए भारी मेहनत की. जब वे असल में अपनी इस रणनीति की कामयाबी को दिखा पाए, तो उन्होंने पहले से अच्छी तरह स्थापित दलों को एक कड़ी टक्कर दी और उसके बाद सीटें जीतने में कामयाब रहे. इससे राजनीतिक रूप से अब तक किनारे पर रहे सामाजिक समूह भी बसपा के जुलूस में शामिल हो गए. मायावती ने यहां से शुरुआत की और उस खेल को उन्होंने समझदारी के साथ खेला, जो उनके अनुभवी सलाहकार ने उन्हें सिखाया था. जब वे भाजपा के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनीं, तो इससे बसपा और अधिक मजबूत हुई. ताकत के इस रुतबे पर मायावतीं अपने फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करने लगीं.

कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.

बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.

जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.

जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.

भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.