14 मार्च 2012

काज़मी केस: आतंकवाद का नया फॉर्मूला


-दिलीप खान

बीते एक दशक से आतंकवाद को लेकर खुफ़िया एजेंसियों के बीच दुनिया भर में तमाम प्रयोग हो रहे हैं। भारत में इस आधार पर 9/11 के बाद के समय को तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है। पहले भाग में वह दौर है जब किसी भी बम विस्फ़ोट के बाद पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इसमें सब कुछ पाकिस्तानी इशारों पर देश में घटित होता है। पाकिस्तान से आतंकवादी आते हैं, बम फोड़कर चले जाते हैं या फिर पुलिस की गिरफ़्त में आ जाते हैं। जिन मामलों में कोई सबूत नहीं मिलते उसमें मीडिया पाकिस्तान की ओर उंगली उठाना शुरू कर देता है और पुलिस और ख़ुफिया महकमों में मीडिया ख़बरों के आधार पर पाकिस्तान पर दोष मढा जाता है। फिर पुलिस के हवाले से आई ख़बर को मीडिया प्रमाणिकता के साथ लोगों के बीच पेश करता है।

26/11 के बाद यह दौर सुस्त पड़ गया, लेकिन अब भी पाकिस्तान निशाने में नंबर वन है। दूसरा दौर 2008 के आस-पास शुरू होता है और इसमें विदेश से आए आतंकवादी की जगह होम ग्रोन टेररिस्ट ले लेते हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन नाम का एक ख़ौफ़नाक आतंकी संगठन ज़्यादातर बम विस्फोट को अंजाम देता है। जयपुर धमाके में पहली बार इस संगठन का नाम आता है। इस संगठन के साथ-साथ ही एक और संगठन अस्तित्व में आता है-हूजी। जयपुर और बंगलौर धमाके में इन दोनों के नाम लिए जाते हैं। कभी आईएम तो कभी हूजी। लेकिन बीते 9 (और उससे पहले के 3 यानी सभी) मामलों में हूजी को लेकर एक भी सबूत खुफिया एजेंसियां इकट्ठा नहीं कर पाई है। हूजी के अड्डे को लेकर खुफ़िया एजेंसी भी अभी तक साफ़ नहीं है कि इसका मुख्यालय कराची में है या ढाका में, लेकिन ये ज़रूर स्थापित किया जा रहा है कि आईएम और हूजी देश में आतंकवाद का जखीरा तैयार कर रहा है। बड़े पैमाने पर इन संगठनों के नाम पर देश में गिरफ़्तारियां हुईं। मालेगांव से लेकर मक्का मस्जिद तक, हर मामले में मुसलमानों को पकड़ा जाता है। (बाद में 2006 के मालेगांव मामले में 5 साल से ज़्यादा जेल काटने के बाद 7 लोगों को रिहा किया जाता है। उधर आंध्र प्रदेश सरकार अपनी ग़लती सुधारने के लिए चरित्र प्रमाणपत्र जारी कर लोगों को रिहा करती है और हर्जाना भी भरती है।)

मालेगांव विस्फोट मामले में फ़र्ज़ी गिरफ़्तारी के 5 साल बाद निर्दोष
करार दिए गए अभियुक्त

इसी दौर में एक नया खुलासा होता है। समझौता एक्सप्रेस में पाकिस्तानी हाथ होने का हल्ला मचाने वाला मीडिया और ख़ुफ़िया बाद में उससे मुकरते हैं और असीमानंद एंड कंपनी अपना जुर्म कबूल कर जेल जाती है। आंतरिक आतंकवाद का मामला बड़े स्तर पर हमारे बीच उपस्थित होता है। असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा जैसे उदाहरणों के बावजूद आतंकवादी के रूप में मोटे तौर पर मुस्लिमों को ही हमारे बीच पेश किया जाता है। ख़ुफ़िया एजेंसी आंतरिक आतंकवाद को इस समय विदेशी आतंकवाद से ज़्यादा बड़ा ख़तरा करार दे रहे हैं। ये दोनों दौर एक-दूसरे को ओवरलैप करते हुए चलते हैं लेकिन ट्रेंड में आ रहे अंतर को साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है।

लेकिन आतंकवाद के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर दुनिया में बहुचर्चित ओसामा-बिन-लादेन की प्रचारित हत्या के बाद देश में नया प्रचलन देखने को मिल रहा है। अब आंतरिक आतंकवाद, पाकिस्तानी-बांग्लादेशी आतंकवाद के साथ-साथ भारतीय आतंकवाद के नेटवर्क को वैश्विक इस्लामी आतंकवाद के साथ जोड़ने की कोशिश चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट बम विस्फोट में पहले हूजी और फिर आईएम का नाम आया और अब हिज़बुल मुजाहिद्दीन का नाम बताया जा रहा है। लेकिन शुरुआती दौर में दो स्कैच जारी करने के बाद इसकी जांच प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं देखी गई। स्कैच को लेकर भी एनआईए ने बाद में आपत्ति जाहिर की थी कि वो स्कैच ठीक नहीं है और नए खेप में स्कैच बनाने के लिए मुंबई से टीम बुलाई गई थी। हमेशा की तरह एनआईए सहित बाकी जांच एजेंसियों ने अब तक कोई ठोस सबूत हासिल नहीं किए हैं, लेकिन अपनी जांच-पड़ताल के समय ही खुफ़िया विभाग ने ये बारीक इशारा ज़रूर कर दिया था कि अब देश में आतंकवाद के नेटवर्क को कहां से जोड़ा जाएगा! हाई कोर्ट बम विस्फ़ोट में सबसे ज़्यादा एनआईए और मीडिया ने जिस बात पर ज़ोर दिया वो था विस्फोटक के तौर पर पीईटीएन का इस्तेमाल। पीईटीएन को अलक़ायदा के ट्रेड-मार्क के तौर पर सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफ़िया सहित पुलिस विभाग ने लोगों के बीच पेश किया। इस घटना के बाद भारत में आतंकवाद को पहली बार अलक़ायदा से सीधे-सीधे जोड़ा गया और इस तरह दुनिया में जिस आतंक के ख़िलाफ़ वार ऑन टेरर छेड़ा गया है भारत के साथ उसका सिरा जुड़ जाता है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों में अलकायदा का जो भूत नाच रहा है वो अब भारत पर भी नाचने लगा। इस तरह इन देशों के बीच कुछ साझापन-सा बन गया है। इसके बाद दिल्ली में इज़रायली दूतावास के सामने कार में विस्फोट होता है। दिल्ली पुलिस की घोषणा से पहले ही इज़रायल ये घोषणा करता है कि इसमें ईरान का हाथ है। रॉयटर्स से ईरान को लेकर ख़बरें चलने लगती हैं। इसके ठीक एक दिन बाद बैंकॉक में तीन विस्फोट होते हैं। फिर ईरान का हाथ बताया जाता है। इज़रायल-ईरान के रिश्तों पर मैं यहां सिर्फ़ एक वाक्य में चर्चा करूंगा कि नाभिकीय बम के बहाने ईरान पर अमेरिका और इज़रायल उसी तरह आक्रमण करने के फिराक में है जिस तरह जैविक हथियार के बहाने इराक पर किया था। दिल्ली पुलिस ये बताती है कि कोई मोटरसाईकिल सवार कार से बम चिपकाकर भाग गया। फिर लाडो सराय से एक लाल बाईक पकड़ी जाती है। बाद में पुलिस कहती है कि वो ग़लत बाईक पकड़ ली थी।  
पत्रकार काज़मी की गिरफ़्तारी खुफिया विभाग के नए और ज़्यादा
ख़तरनाक फॉर्मूले की तरफ़ इशारा कर रहा है।

इसके बाद ख़बर आती है कि सीसीटीवी में किसी भी बाईक सवार को नहीं देखा गया। बाईक फॉर्मूले को पुलिस छोड़ देती है और फिर अचानक काज़मी को गिरफ़्तार करते समय पुलिस ये तर्क देती है कि काज़मी के घर से लावारिस स्कूटी बरामद हुई है। बाईक फॉर्मूले को पुलिस फिर से जीवित करती है जो सीसीटीवी वाली बात के मुताबिक झूठी है। जिन आरोपों के आधार पर काज़मी को पकड़ा गया उसकी चर्चा इससे पहले वाली रिपोर्ट में की जा चुकी है।

अब सवाल है कि काज़मी को गिरफ़्तार करने के पीछे क्या हित हो सकते हैं? असल में भारत इस समय सबसे ज़्यादा तेल ईरान से खरीद रहा है, जाहिर है ईरान के साथ भारत के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं इसलिए इस बम विस्फ़ोट को लेकर इज़रायली बयान के बाद गृह मंत्रालय ने ये सफ़ाई दी थी कि उसे ईरान के हाथ होने के सबूत नहीं मिले हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर भारत ईरान के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता। लेकिन भारत इज़रायल से सबसे ज़्यादा हथियार खरीदता है और अमेरिका के साथ अपने संबंध को हमेशा मधुर देखना चाहता है। जाहिर है दूसरे पक्ष को यह बिल्कुल इग्नोर नहीं कर सकता। तो खुफिया स्तर पर जांच-पड़ताल के बाद काज़मी को पकड़ा गया।

काज़मी को गिरफ़्तार कर देश में पहली बार ईरानी आतंकवाद के साथ सीधे संबंध को स्थापित किया जा रहा है। आतंकवाद को लेकर देश में ये सबसे नया ट्रेंड है। एक नए दौर की शुरुआत। ऐसे में राजनीतिक तौर पर भारत ईरान को ये जवाब देने की स्थिति में अब है कि ये तो खुफिया विभाग की कार्रवाई है और पूरा मामला राजनीतिक दबाव से मुक्त है। दूसरा, आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर अब शहरी और शिक्षित लोगों को गिरफ़्तार करने की गति तेज हुई है और काज़मी भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। इस गिरफ़्तारी के बाद अब देश में ये तस्वीर बन गई कि भारत वैश्विक आतंकवाद के साथ सीधा जुड़ा हुआ है। इस स्थापना के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो अपनी वैश्विक पहुंच रखते हो और काज़मी इसके लिए उपयुक्त थे!

4 टिप्‍पणियां:

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    Сына мы отправили к бабушке, купили преступление, накрыли пища, и подобно желание


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    капельки смазки. Если ёлочка вошла наполовину, муж застонал.
    Она сжала мою голову посреди своих ног и мне в единица ударили её соки. Она опала для скамью, я высвободился через неё, присел близко её лица... Она нередко дышала... С трудом она остановила лицезрение на мне и прошептала сколько то не вовсю разборчиво.

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