04 फ़रवरी 2013

विश्वरूपम बवालिया नहीं सवालिया फ़िल्म है


-दिलीप खान
आतंकवाद के मसले पर जिस ट्रीटमेंट के साथ देश में फ़िल्में बनती रही हैं, विश्वरूपम उससे अलग नहीं है। हमें एक अदद अभिनेता की दरकार होती है जो पहले दूसरे रूप धड़कर अपनी मासूमियत से लोगों को मोहे और फिर अचानक फुर्तीले, गठीले और बहादुर बनते हुए हमें अपनी ग़लती का एहसास वो हॉल में ताली बजवाकर करवाएं। किसी देश के इंटेलिजेंस अधिकारी के किरदार को फ़िल्मों ने ज़्यादातर इसी रूप में हमारे सामने पेश किया है। ऐसी फ़िल्मों को देखते हुए दर्शकों की जो कुल भावना विकसित होती है उसकी दिशा अभिनेता के मायावी होने की ओर केंद्रित रहती है, राजनीतिक विषयों पर ध्यान नहीं जाता। मार-धाड़-एक्शन से भरपूर थ्रिलर फ़िल्मों में तो दर्शक चकित-चौकन्ने होकर अभिनेता के करतब देखता है। मसलन उनका अभिनेता कठिनतम क्षणों में भी हार नहीं मानेगा, वो 50-60 लोगों को कभी भी चित्त कर सकता है और ख़ासकर अगर फ़िल्मों में दक्षिण भारतीय टच ज़रा-सी भी रह जाए तो हीरो का फ़ौलाद में तब्दील होना लाजिमी है। 
विश्वरुपम फ़िल्म का एक दृश्य
बॉलीवुड में ये गौरव सन्नी देओल और उनके पिताश्री धर्मेंद्र सहित बहुत कम लोगों को हासिल है। कमल हासन इस फ़िल्म के भीतर रॉ के अधिकारी हैं और हिंदी के अलावा मूल रूप से फ़िल्म तमिल में बनाई गई है तो ऊपर के सारे गुणों को अपने भीतर समेटे पर्दे पर वो नमूदार होते हैं। स्त्रैण व्यवहार के साथ कृष्ण और गोपी वाले गाने में नाचते हुए वो जब पहली बार फ़िल्म में दिखते हैं तो तालियां बजती हैं। डॉ निरुपमा (पूजा कुमार) का ऑफ़िस में अफ़ेयर है और उसको शक रहता है कि उनके पति विश्वनाथ (कमल हासन) की ज़िंदगी भी बिना किसी अफ़ेयर के नहीं चलती होगी, चाहे वो औरत के साथ हो या फिर किसी मर्द के साथ।  

तो, सबकुछ पारिवारिक नोंक-झोंक व शक-सुबहा के इर्द-गिर्द चलता रहता है और इसी क्रम में पत्नी एक प्राइवेट जासूस कमल हासन के पीछे लगा देती है। होता कुछ ख़ास नहीं है बुद्धू से दिखने वाले विश्वनाथ को पता चल जाता है कि पत्नी ने उसके पीछे जासूस छोड़ रखा है जो खोजी कुत्ते की तरह उसके पीछे चिपका हुआ है। शेखर कपूर की सलाह पर कमल हासन उससे पीछा छुड़ाने के लिए तेज दौड़ लगाता है और एक दीवार की ओट से चकमा देकर उसी दिशा में वापस भाग लेता है। अब एक नौसिखिए की तरह वो जासूस सामने की इमारत में ताक-झांक करता है और फिर जो कुछ होता है, फ़िल्म की असल शुरुआत भी वहीं से होती है। इमारत से निकलने वाला आदमी जासूस के सर पर ज़ोर से लोहे का सरिया दे मारता है और बाद में पड़े कुछ और चोटों से उसकी मौत हो जाती है। असल में वो इमारत उमर (राहुल बोस) की प्रयोगशालानुमा जगह है जहां आतंकी गतिविधियों को उनके शागिर्द अंजाम देने का हुनर सीखते हैं। 

अब यहां से घटनाओं की कड़ियां जुड़ती चली जाती हैं। जासूस की डायरी से क्लाइंट का नाम पता हासिल करने के बाद अंतत: पत्नी के बॉस-कम-प्रेमी दीपक के रास्ते विश्वनाथ  और डॉ निरुपमा आतंकियों के कब्जे में आते हैं। और यहीं पर निरुपमा के साथ-साथ दर्शकों को पहली बार पता चलता है कि कमल हासन असल में है कुछ और ही बला। वो सिर्फ़ घूंघरू बांध के नाचता नहीं है बल्कि दर्ज़नों लोगों को अकेले मारकर बिल्कुल हीरो की माफिक पिछले दरवाज़े से पत्नी के साथ भाग लेता है। उमर (राहुल बोस) कमल हासन को पहचानता है और यही पहचान दिखाने के लिए फ़िल्म फ्लैशबैक में चली जाती है। फिर अमेरिका से निकलकर फ़िल्म सीधे अफ़गानिस्तान में आ गिरती है। फ़िल्म में भारत कहीं नहीं है। है तो सिर्फ़ अमेरिका और अफ़गानिस्तान। ज़िक्र में भारत भी है, पाकिस्तान भी, नाइजीरिया भी और कुछ और देश भी। भारतीय ज़मीन पर तो विश्वरूपम-2 उतरेगी जिसकी मुनादी फ़िल्म के बिल्कुल आखिर में की जाती है। ख़त्म होने के बाद। तो, रहस्योद्घाटन ये होता है कि कमल हासन ने उमर (राहुल बोस) के साथ अल-क़ायदा में साथ-साथ काम किया है।  
कश्मीर के मुजाहिद के तौर पर कमल हासन का नया परिचय हमें मालूम होता है और नया नाम भी- विसाव अहमद कश्मीरी। ये भी पता चलता है कि उसके पिताजी उससे भी बड़े मुजाहिद थे। विसाव अहमद कश्मीरी (हासन) के नाम पर 5 लाख रुपए (शायद रुपए ही) का ईनाम भारत सरकार ने घोषित कर रखा है ये पोस्टर पूरी फ़िल्म में दो-तीन बार स्क्रीन पर चमकता है। और कहानी यही कहती है कि ईनामी आतंकवादी होने की वजह से भारत छोड़कर वो अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के साथ जुड़कर कुछ अलग करना चाहता है। राहुल बोस अल-क़ायदा से जुड़ा है। हासन उसके पास पहुंचता है और पहली मुलाक़ात में ही ये साबित करता है कि वो न सिर्फ़ शानदार लड़ाका है बल्कि लोगों को जानने-पहचानने का भी उसमें बेहद बारीक हुनर है। अल-क़ायदा के लड़ाकों को प्रशिक्षित करने के क्रम में ही वो उमर यानी राहुल बोस के काफ़ी करीब हो जाता है। वो उमर से अमेरिकी बंधकों का ठिकाना जानना चाहता है, अल-क़ायदा के लड़ने के तरीके जानना चाहता है और ये भी जानना चाहता है कि अफ़गानी उमर को हिंदी बोलना कैसे आता है? इस दौरान छोटी-छोटी घटनाओं के आइने से ये दिखाया गया कि हासन के भीतर बर्बरता का एलिमेंट मुजाहिद बनने के हिसाब से कम है। 
अल-क़ायदा के मुजाहिद उमर की भूमिका में राहुल बोस

बहरहाल, मैं यहां पूरी कहानी लिखने की बजाय फ़िल्म से निकल रहे संदेश पर बात करना पसंद करूंगा। फ़्लैशबैक से तीन-चार इस्तेमाल से अलग-अलग सेगमेंट में बंटे विश्वरूपम में दर्शकों के सामने खुलासा होता है कि कमल हासन न तो सामान्य गृहस्थ है और न ही आतंकवादियों के गुट का कोई लड़ाका, बल्कि वो भारतीय खुफ़िया एजेंसी का कोई अधिकारी है। एक जांबाज अधिकारी! और अल-क़ायदा के भीतर सेंधमारी कर वो उसे भीतर से नष्ट करने की तैयारी में था। उसी क्रम में जब हासन सा’ब उमर से सवाल पूछते हैं कि उसने हिंदी कहा सीखी, तो जवाब मिलता है- अयोध्या, मुंबई, कश्मीर और मालेगांव के दौरे से। फ़िल्म को विशुद्ध मनोरंजन मानने वाले लोगों को ऐसे डॉयलॉग से कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन जब फ़िल्मों में किसी वास्तविक जगह और घटनाओं का ज़िक्र होता है तो उसे पेश करने में राजनीतिक ईमानदारी बरतनी चाहिए। उमर के जवाब से ये ध्वनित होता है कि इन जगहों पर अल-क़ायदा ने आतंकी वारदातों को अंजाम दिया और उसी मिशन को पूरा करने के लिए वो गलियों की खाक छानते रहे और हिंदी सीख ली। यानी अयोध्या में जब-कभी (याद है न कब?) जो-कुछ हुआ उसके लिए अल-क़ायदा और मुस्लिम ज़िम्मेदार है और मालेगांव में भी। विश्वरूपम के रिलीज होने से महीनों पहले कोर्ट का (जिस पर लोग यक़ीन करते हैं) फ़ैसला आ गया कि मालेगांव धमाके में पकड़े गए 9 मुस्लिम निर्दोष हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एंड कंपनी ने उस धमाके में संलिप्तता पर अपनी सहमति जाहिर की है। फ़िल्म में कई जगह ऐसी चालाकियां बरती गई हैं।

फ़िल्म साल 2011 आस-पास चलती है, जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और अफ़गानिस्तान पर हमले को जायज ठहराने वाला सबसे बड़ा प्रमाणपत्र ओसामा-बिन-लादेन मारा जाता है। फ़िल्म के शुरुआती कुछ दृश्यों में ओबामा को टीवी पर भाषण देते दिखाया जाता है और विश्वरूपम इसी से काल को भी स्थापित करता है। फ़िल्म के भीतर ये दिखाया गया है कि दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी एक-दूसरे से गहरे नेटवर्क के साथ जुड़े हैं और अफ़गानिस्तान में लगभग हर घर में बम-बारूद-बंदूक का जखीरा है और लोग धर्म के नाम पर ही मर-मिटने को तैयार हैं। वे बंदूक चलाते हैं धर्म के नाम पर, हत्या करते हैं धर्म के नाम पर और धर्म के नाम पर खुद को उड़ा लेना चाहते हैं। सबकुछ धर्म तय कर रहा है। 9/11 कब का बीत चुका है और लादेन को ढूंढने के लिए अमेरिका और नाटो ने अफ़गानिस्तान को गर्द में तब्दील कर दिया है। लेकिन नहीं, वे सिर्फ़ लादेन को ही नहीं ढूंढ रहे हैं बल्कि अपने बंधक सैनिकों को बचाने के लिए वो बम फोड़ते हैं। नाटो की ज़्यादातर कोशिश ‘निर्दोषों’ को गुफा से बाहर निकालकर दुनिया की रोशनी दिखाने की है। और, भारत उसका सक्रिय सहयोगी है। अफ़गानिस्तान का मिशन नाटो ने भारतीय मदद से जारी रखी है। 

फ़िल्म ये भी दिखाती है कि अफ़गानिस्तान में अभी नाटो के रहने की कितनी ज़रूरत है! [अब ये तथ्य दिमाग में मत लाइए कि 2014 तक सैन्य वापसी की बात अमेरिका सहित नाटो कर रहे हैं क्योंकि फ़िल्म ने शुरुआत में ही घोषणा कर दी है कि वो काल्पनिकता की डोर थामे हैं। ये भी दिमाग़ में मत लाइए कि हॉलीवुड की कई फ़िल्में सिर्फ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद को लोकप्रिय संस्कृति के जरिए वैधता देने के लिए बनाई गईं।] फ़िल्म की माने तो ये वापसी वैश्विक शांति के लिए ग़लत साबित होगी। संक्षेप में कहें तो विश्वरूपम ‘वॉर ऑन टेरर’ की अमेरिकी मुहिम को जायज ठहराने के लिए मनोरंजक तरीके से जनमत निर्माण करती है। 

राहुल बोस एक अच्छे अभिनेता हैं इस स्थापना को इस फ़िल्म के मार्फ़त कुछ और अंक हासिल कर उन्होंने मज़बूत किया है। डॉ. निरुपमा की भूमिका में पूजा कुमार को देखकर बरबस चक्रव्यूह फ़िल्म की रिया मेनन (एशा गुप्ता) याद आएगी जिन्हें पता ही नहीं कि भोलेपन को भी किस भोलेपन के साथ निभाना होता है। शेखर कपूर और कमल हासन बड़े नाम हैं और एक्टिंग के जरिए उन्होंने निराश भी नहीं किया। फ़िल्म में ख़र्चा हुआ है इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बुढ़ाते कमल हासन को स्टंट कराते दिखाने में ही काफ़ी मेहनत और धन जेब से निकल गया होगा। एडिटिंग बहुत अच्छी नहीं है, दो-तीन जगह तो जर्क साफ़-साफ़ पता चल रहा था और हिंदी का जो प्रिंट हमने देखा वो शायद बिना कट के रिलीज हुई फ़िल्म थी, तो वास्तविक एडिटिंग में ही कोई गड़बड़ी है। 

ये फ़िल्म मिक्स फ्रूट चाट है। इसमें दबंग भी है, ए वेडनसडे भी, रोजा भी और द हीरो भी। रिलीज होने पर बवाल उन लोगों ने काटा होगा जिन्हें इससे पहले की फ़िल्मों के बारे में कोई जानकारी नहीं रही होगी। जो भारतीय फ़िल्म परंपरा से परिचित हैं वो काहे को बवाल काटे भई! नमाज अता कर बम फोड़ना है, फोड़ो। फ़िल्म देखने आप जाएंगे तो पाएंगे कि रॉ के अधिकारी विश्वनाथ (कमल हासन) इतने जांबाज हैं कि समूची एफ़बीआई को अकेले हैंडल करते हैं, अपने इशारों पर नचाते हैं और पूरी फ़िल्म में हैरान-परेशान रहने वाली अपनी पीएच.डी पत्नी के साथ मिलकर अमेरिका को नाभिकीय बम (सिसमिक बम) के प्रकोप से बचा डालते हैं। जाहिर है इतने बहादुर प्रोटैगोनिस्ट अगर निर्माता-निर्देशक और कहानीकार की जेब में हो तो फ़िल्म का सीक्वल ज़रूरी है। तो, अमेरिका को बचाने की अपार सफ़लता के बाद अगली फ़िल्म में विश्वरूपम साहब भारत में होंगे और भारत को बचाएंगे। इंतज़ार कीजिए विश्वरूपम-2 का दबंग-2, रेस-2, जिस्म-3 के माफ़िक। 

1 टिप्पणी:

  1. सुंदर समीक्षा..ये लेख फ़िल्म देखने के लिए प्रेरित करता है। आपके आलेख अहा जिंदगी में भी पड़ता हुं..सुंदर विवेचन शैली।।।

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