16 अक्तूबर 2012

‘लाइक’ भी एक धंधा है!


फेसबुक के जनक मार्क ज़करबर्ग की जीवनी (पांचवा और अंतिम भाग)
दिलीप खान

पहले पढ़ें- पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा भाग।

दुनिया में कई कंपनियां ऐसी हैं जो सिर्फ़ फेसबुक विज्ञापन के लिए क्लाइंट मुहैया कराती है। तो बाज़ार में फेसबुक एक तरह से मकड़े की जाल की तरह फैली है और जिसके हर सिरे से लगकर कोई न कोई धंधा बुलंद हो रहा है। लंदन की टीबीजी कंपनी फेसबुक विज्ञापन मुहैया कराने वालों में एक चर्चित नाम है। इसी तरह स्टारबक्स और बड्डी मीडिया भी यही काम करती है। ये कंपनियां फेसबुक और विज्ञापकों के बीच बिचौलिए का काम करती हैं और करोड़ों कमाती है।इसके अलावा कंपनियां अपने-अपने पेज बनाती और बनवाती हैं। आप पेज को लाइक कीजिए कंपनी का मैसेज, स्टेटस आपके होम पेज पर दिखना शुरू हो जाएगा। कुछ कंपनियां ऐसी हैं जो दूसरी कंपनियों के लिए पेज बनाने का ठेका लेती है। इनका दावा होता है कि वो फेसबुक पेज के जरिए संबंधित कंपनी को लोकप्रिय बना देगी। ये लाइक करती है और करवाती है। जितना ज़्यादा लाइक मिलेगा उतना ही ऊपर आपका प्रोडक्ट आएगा। लोग देखेंगे कि कंपनी को हज़ार लोग पसंद कर रहे हैं तो कई बार दबाव में वो भी पसंद करना शुरू कर देंगे। फेसबुक में ऐसा होता है।आप अगर लाइक नहीं कर रहे हैं तो भी आपके होम पेज पर कंपनी का नाम चमक उठेगा, यदि आपका दोस्त उसे लाइक कर रहा हो। हालांकि कई कंपनियों का मानना है कि फेसबुक एक व्यावसायिक माध्यम न होकर एक सोशल माध्यम यानी सामाजिक मंच है इसलिए इसका इस्तेमाल बिक्री के लिए कम जनसंपर्क के लिए ज़्यादा होना चाहिए। चूंकि मार्क व्यवसाय के इस मॉडल के शुरुआती प्रयोगकर्ता हैं इसलिए नवाचार के मामले में वो बेहद द्रुत हैं।2010में मार्क ने फेसबुक के मंच पर एक नए एप्लिकेशन से यूजर्स का परिचय कराया। ज़करबर्ग ने इसे ओपन ग्राफ का नाम दिया। इसकी खासियत यह है कि आप जान पाएंगे कि आपके दोस्त ने सीएनएन.कॉम या फिर वॉशिंगटन पोस्ट डॉट कॉम पर कौन सा लेख पढ़ा। कंपनियों को भरोसा है कि दोस्तों की सिफ़ारिश पर लोग चीज़ों को ज़्यादा गंभीरता से लेते हैं चाहे वो लेख पढ़ने का मामला हो या फिर शॉपिंग का। इस मामले में फेसबुक गूगल सेसैंकड़ों मील आगे निकल गया है। 
नास्डॉक में उतारा कंपनी को
अक्टूबर 2008 में फेसबुक कंपनी ने यह घोषणा की कि वह आयरलैंड के डब्लिन शहर में फेसबुक का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय खोलने जा रही है। मार्क ने कहा कि अमेरिका से बाहर एक बड़े दफ़्तर का होना बहुत ज़रूरी है। फेसबुक के मामले में तक़रीबन हर बार मार्क ने समय से पहले ही हवा के रुख को भांप लिया। फेसबुक पर यूजर्स की आवाजाही पर ग़ौर करें तो 2009 से इसमें तेज वृद्धि हुई है। धीरे-धीरे आलम ये हो गया कि 2010 में फेसबुक ने आवाजाही के मामले में गूगल को भी पीछे छोड़ दिया। नवंबर 2010 में सेकेंडमार्केट ने अपने आकलन में बताया कि ई-बेज को पार करते हुए फेसुबक अमेरिका में गूगल और अमेज़ॉन के बाद तीसरी सबसे बड़ी वेब कंपनी बन गई है। डबलक्लिक नामक संस्था के मुताबिक जून 2011 में फेसबुक पर पेज देखने की संख्या 10 खरब को पार कर गई और इस तरह यह दुनिया में सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली वेबसाइट बन गई। हालांकि डबलक्लिक के इस आकलन में एक ढिलाई यह थी कि इसमें गूगल सहित कुछ अन्य महत्वपूर्ण वेबसाइटों को शामिल ही नहीं किया गया था। लेकिन इससे फेसबुक की लोकप्रियता कम नहीं हो जाती। तक़रीबन सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं ने इसे ऊंचा पायदान दे रखा है। प्रसिद्ध सर्वे कंपनी नील्सन मीडिया रिसर्च स्टडी के मुताबिक दिसंबर 2011 में फेसबुक अमेरिका में दूसरी सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की गई साइट थी। मार्क के लिए यह संख्या सुकूनदेह तो है लेकिन सिर्फ़ संख्या बढ़ाना उनका उद्देश्य नहीं है। वह जानते हैं कि कंपनी के ब्रांड की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी विश्वसनीयता है और इसीलिए लगातार उन्नति कर रही कंपनी में भी वो सुरक्षा का पेंच लगाते रहते हैं। यह एक तरह की चौकसी है। मार्च 2011 में मार्क ने कहा कि फ़र्ज़ी खातों, कम उम्र और अलग-अलग तरह की अशालीन व स्पैम हरकतों की वजह से रोज़ाना लगभग 20 हज़ार खातों को फेसबुक से हटाया जा रहा है। इस साल की शुरुआत से ही मार्क की यह योजना थी कि वो शेयर बाज़ार में फेसबुक को सूचीबद्ध करेंगे। अंतत:17 मई 2012 को फेसबुक ने इनिशियल पब्लिक ऑफर यानी आईपीओ की शुरुआत की। पहले दिन शेयर की क़ीमत 38 डॉलर थी। हालांकि नॉस्डॉक पर मार्क कुछ ख़ास नहीं कर पाए और अमेरिकी मीडिया के सघन प्रचार के बावज़ूद शेयर की दर में लगातार गिरावट देखी गईलेकिन क़ीमत में गिरावट के बावज़ूद फेसबुक ने एक कीर्तिमान रचा। आईपीओ के पहले दिन राजस्व के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी होने का तमगा इसके हाथ आ गया।
आभासी माध्यम की हक़ीकी दुनिया
ऐसा नहीं है कि मार्क की आलोचना कम होती है। हर धड़े में उनके आलोचक हैं। कुछ लोगों का मानना है कि मार्क ने लोगों के गुस्से, खुशी और मिलने-जुलने को इंटरनेट तक महदूद कर दिया है। एक हद तक यह सच भी है। फेसबुक उसी दौर की उपज है जब दुनिया में एक ख़ास संस्कृति का वर्चस्व लगातार बढ़ा है, लेकिन अपनी राजनीति और अपने विचार को सामने लाने के वास्ते फेसबुक का आप कितना इस्तेमाल करते हैं, इस पर कोई बंदिश नहीं है। यह आप पर निर्भर करता है कि फेसबुक पर गुजारे गए समय को आप किस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। बतकही के लिए भी कर सकते हैं, हंसी-मज़ाक के लिए भी, गंभीर सामाजिक-साहित्यिक चर्चा के लिए भी और चाहे तो इसके माध्यम से बड़ी राजनीतिक आंदोलन भी शुरू कर सकते हैं। मिस्र में 2010 के आखिरी दिनों में जो कुछ हुआ उसमें फेसबुक की बड़ी भूमिका रही। तहरीर चौक पर जमावड़े की शुरुआत फेसबुक से हुई। यह पहला वाकया था जिसने फेसबुक की राजनीतिक शक्ति को इतने बड़े फलक पर खोलकर सामने रख दिया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि जिस दुनिया को वर्चुअल यानी आभासी दुनिया के तौर पर अब तक लोग जानते रहे हैं, वो हक़ीकी दुनिया के साथ इतनी गहराई से जुड़ी है। यह एक नए तरह का प्रयोग था। जींस पैंट पहनने वाले फंकी युवाओं की संख्या लाखों थी, जो एक हाथ से नारे के हर्फ वाले तख्त हवा में उछालते और दूसरे हाथ से मोबाइल के जरिए फेसबुक अपडेट करते। आंदोलनों की राजनीति अपनी जगह है लेकिन फेसबुक ने ये तो साबित कर ही दिया कि इसको इस्तेमाल करने का पक्ष असल में न्यू मीडिया के विर्मश का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। यानी यह वो तीर है जिसका जो इस्तेमाल करेगा, वह उसके पक्ष में जाएगा। फेसबुक का खुला आमंत्रण है- आओ, मुझे अपनाओ, मैं तुम्हारी मदद करूंगा। युवाओं के बीच लोकप्रियता को मापने का एक तरीका ये है कि उनके रोजमर्रा के फैशन में आप कितना पैबस्त हो पाते हैं। स्लोगन टी-शर्ट के जमाने में फेसबुक लिखा टी-शर्ट पहनकर इतराते कॉलेज स्टूडेंट्स शहरों में आसानी से मिल जाते हैं। फेसबुक से संबंधित कई स्लोगन टी-शर्ट पर लोकप्रिय है। उसमें लिखा कुछ भी हो सकता है, लेकिन सबका अर्थ अंतत: यही है कि फेसबुक उनकी ज़िंदगी में शामिल है। टी-शर्ट पर लिखा हो सकता है, फेसबुक रियून्ड मी या फिरफेस द बुक डांट सिट ऑन फेसबुक या फिर सीधे-सीधे फेसबुक। और इन युवाओं से पूछे तो साफ़ पता चलेगा कि फेसबुक के पर्याय के तौर पर लोग मार्क ज़करबर्ग को ही जानते हैं। बाकी सह-संस्थापकों डस्टिन मोस्कोविच या फिर क्रिस ह्यूग्स के नाम लोगों को अजनबी सरीखा लग सकता है। 
तीन कदम आगे और एक कदम पीछे
मार्क ने यूजर्स को खुली जगह दी है। उन्होंने शिकवा-शिकायत को दबाया नहीं है। हालांकि यह एक तरह की उनकी व्यावसायिक कूटनीति है और वे जानते हैं कि इंटरनेट की दुनिया दब्बू दुनिया नहीं है और जिस दिन यूजर्स को परेशानी महसूस होने लगेगी उसी दिन से फेसबुक नामक संस्था का पतन शुरू हो जाएगा। इसलिए जब फेसबुक पर विज्ञापन से लोग आजिज आ गए, तो फेसबुक पर ही फेसबुक के विरोध में पेज बना दिया। इन पेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई तो ज़करबर्ग ने सोचा कि सामाजिक मंच है, माफी मांग लेनी चाहिए। उन्होंने मांगी। फेसबुक बीकन एप के जरिए उन्होंने ऐसा किया। मार्क ने रुसी क्रांतिकारी लेनिन की तर्ज पर कहा कि हम तीन कदम आगे और एक कदम पीछे की रणनीति पर काम कर रहे हैं। लोगों ने अपना काम जारी रखा। फेसबुक स्टॉप इनवेडिंग माई प्राइवेसी जैसे पेज बने। मार्क ने इन दिक्क़तों का हल ढूंढा और बिना घाटा सहे जिस हद तक लोगों की आज़ादी और निजता को विस्तार दिया जा सकता था, उन्होंने दिया। असल में वो व्यावसायिक धंधे में भी कहीं ज़्यादा चौकस और संवेदनशील हैं। देश, समाज, राजनीति से लेकर अर्थनीति तक को वो समझते हैं और समझने की कोशिश करते हैं। यह वर्ष 2009 था और मार्क ने इस समूचे साल टाई पहनने का फैसला लिया था। 2009 के ही किसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मंदी, अर्थव्यवस्था, कटौती, रक्षा बजट, पेंटागन और शिक्षा जैसे गंभीर मसले पर बोल रहे थे। यूं कहिए कि जवाब दे रहे थे और जो व्यक्ति सवाल कर रहा था उनका नाम था, मार्क ज़करबर्ग। दोनों एक ही रंग के जैकेट और टाई में थे। मंदी को लेकर ज़करबर्ग ने ओबामा से जो सवाल किए वो खांटी पत्रकारों वाले सवाल थे। अंत में ओबामा ने मज़ाकिया लहजे में मार्क से कहा कि आप और हम जैसे लोग अगर टैक्स जमा करें तो अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। इस पूरे कार्यक्रम को ओबामा ने अपनी सफ़ाई के मंच के तौर पर इस्तेमाल किया। आप समझ सकते हैं कि अमेरिका में फेसबुक और मार्क की लोकप्रियता कितनी है।
सबसे दरिद्र धनी
टाइम मैगज़ीन के कवर पर छपना मार्क की लोकप्रियता को मापने का आधार नहीं है और न ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति की सूची में बार-बार शुमार किया जाना उनकी ताक़त को मापने का पैमाना। फेसबुक को इस्तेमाल करने वाले दुनिया भर के करोड़ों लोगों ने इन पत्रिकाओं और रेटिंग एजेंसियों से पहले ही मार्क पर मुहर लगा रखी है। दुनिया भर में फेसबुक और मार्क से कई दिलचस्प वाकये जुड़े हुए हैं।अपने जन्मदिन के कार्यक्रम को फेसबुक पर सार्वजनिक करने के बाद एक युवती के घर जब 1600 लोग मेहमान बनकर आ धमके तो पता चला कि यहां की यारी-दोस्ती सिर्फ की-बोर्ड तक की सिमट के नहीं रह जाती। इसलिए मार्क को इसी वास्तविक दुनिया का उद्यमी कहा जाना चाहिए। लीक से हट कर चलने वाला उद्यमी। हालांकि सभी कॉलेज छोड़ने वाले लोग मार्क ज़करबर्ग नहीं बन जाते, लेकिन मार्क ने कम-से-कम ये तो दिखा ही दिया कि रचनात्मकता किसी कॉलेज की मोहताज नहीं है। द फेसबुक इफैक्ट के लेखक डेविड किर्कपैट्रिक ने मार्क को लेकर एक शानदार टिप्पणी की है। डेविड के मुताबिक, हर बाप की इच्छा होती है कि उसका बेटा बैचलर डिग्री पूरी कर ले, चाहे बेटा अरबपति ही क्यों न बन जाए। लेकिन पहले, दूसरे और तीसरे अरब के बाद बाप की इच्छा मर जाती होगी। मार्क ज़करबर्ग का नाम याद करते वक्त अब शायद किसी के दिमाग में यह तस्वीर नहीं उभरती होगी कि उन्होंने अपनी बैचलर डिग्री पूरी नहीं की है! सामंजस्य के मामले में मार्क एक मिसाल बन सकते हैं। जब वो प्रिसिला के साथ डेटिंग कर रहे थे तो एक साम्यता स्थापित करने की खातिर हर रविवार एशियाई डिश खाते थे। वो बहुत लटके-झटके वाले नहीं हैं। जब उन्होंने एक अपार्टमेंट में पहला फ्लैट ख़रीदा तो उसमें सिर्फ एक बेडरूम था, दोस्तों के तानों के बाद उन्होंने दूसरी जगह दो बेडरूम का एक फ़्लैट ख़रीद लिया। फिर तीसरी दफ़ा उन्होंने दोमंजिला मकान ख़रीदा है जिसमें चार बेडरूम है और मार्क के लिहाज से यह कुछ ज़्यादा ही बड़ा है। मार्क से ख़फ़ा रहने वाले टेलर विंकलवॉस कहते हैं, मैने अपनी ज़िंदगी में जितने धनी लोगों को देखा है मार्क उनमें सबसे दरिद्र है।
चलिए इस दरिद्रता के बावजूद इस समय वो17 अरबडॉलर के मालिक हैं। उनके बनाए गए फेसबुक को दुनिया के 200 से ज़्यादा देशों में 83 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं। लोगों को वे रोज़गार मुहैया कराते हैं। शादी के बाद हनीमून मनाने गए पांचेक शहर में मीडिया वालों के कैमरे से वो खुद को छुपाने की कोशिश में लगातार नाकाम साबित होते हैं। शहर-शहर, मुल्क-मुल्क पृथ्वी पर उनके चेहरे को हर कोने में पहचाना जाता है। करोड़ों युवा उनके भीतर खुद का अक्स ढूंढते हैं। फेसबुक की वजह से उद्यमियों के लिए वे आदर्श हैं तो युवाओं के लिए थैंक्यू सुनने के हक़दार। वे सुंदर हैं। शाहिद कपूर की तरह चॉकलेटी भी। 50 से ज़्यादा देश घूम चुके हैं। हर मिनट उनकी कमाई 9 लाख 50 हज़ार रुपए है। वे चार्टर्ड हवाई ज़हाज़ में सफ़र करते हैं और अगले साल 29वां जन्मदिन मनाने के लिए उनके पास कई महीने अभी बाकी हैं। तीन दशक बाद जब उनके जीवन के क़िस्सों पर नज़र दौड़ाई जाएगी तो यह लेख महज एक कोने में सिमट जाएगा।
संदर्भ – मार्क ज़करबर्ग इनसाइड फेसबुक, डॉक्यूमेंट्री- बीबीसी
             वेब 2.0 सम्मेलन में मार्क का भाषण
             न्यूयॉर्कर पत्रिका से मार्क की बातचीत
             मार्क ज़करबर्ग्स फेसबुक स्टोरी, प्रोड्यूसर- शैचर बैरॉन
             द फेसबुक इफ़ैक्ट विद मार्क ज़करबर्ग- मार्क किर्कपैट्रिक
             द सोशल नेटवर्क (फिल्म)
             इसके अलावा टुकड़ों में अलग-अलग वेबसाइट्स, अख़बारों, पत्रिकाओं पर ज़करबर्ग और फेसबुक पर आई ख़बरों, निबंध और विविध पाठ्य सामग्रियों का सहारा

4 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े ही चाव से पढ़ते रहे सभी भागों को.
    अत्यंत ही रोचक शैली में आपने हम सभी को प्रेरित किया.

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  2. विस्तृत और शानदार विवरण.......

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