15 अक्तूबर 2012

अमीबा के डीएनए से बना है फेसबुक!



फेसबुक के जनक मार्क ज़करबर्ग की जीवनी (चौथा भाग)

दिलीप खान

इससे पहले पढ़ें- पहला, दूसरा और तीसरा भाग।

बाकी कंपनियों से मुकाबला करने की बजाय मार्क अब भी इस बात पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं कि जिन देशों में फेसबुक बिल्कुल नया है या फिर जिस ज़मीन पर अब तक ये उतरा भी नहीं है, पहले वहां के लोगों से इसका परिचय कराया जाय। इस लिहाज से देखें तो संभावना ऐसी लग रही है कि ग्लोब पर फेसबुक यूजर्स देश को एक रंग से रंगने पर जो चकती उभरती है वो भविष्य में भी लगातार फैलती रहेगी, अमीबा की तरह। इस फैलाव के लिए पूरी सजगता से मेहनत हो रही है। मार्क ज़करबर्ग ने अपने फेसबुक खाते पर खुद के बारे में सिर्फ एक वाक्य लिखा है, मैं दुनिया को ज़्यादा खुलापन देने की कोशिश कर रहा हूं। फेसबुक बनाने के शुरुआती दिनों में मार्क अपने दोस्तों, खासकर डस्टिन मोस्कोविच और क्रिस ह्यूग, को यह बताते रहते कि चूंकि दुनिया में ज़्यादातर लोगों के पास ऐसा कोई मंच नहीं है जहां पर वो अपनी बात रख सके, इसलिए उनकी आवाज़ असरदार नहीं बन पाती। वे न सिर्फ कंप्यूटर वैज्ञानिक तरीके से चीज़ों को देखते-समझते हैं बल्कि मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के नज़रिए से भी घटनाओं और समाज की व्याख्या करते हैं। इसी वजह से मार्क ने लोगों के अभिव्यक्त करने की दमित इच्छा को समझा। अपनी बात कहने की कुलबुलाहट हर व्यक्ति के भीतर है और यही वजह है कि आज भारत में लगभग पांच करोड़ और दुनिया में 83 करोड़ से ज़्यादा लोग फेसबुक पर हैं और बिना किसी विभेद के हैं। बात कहने-सुनने में यहां पर कोई रौब नहीं दिखा सकता। ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ भी फेसबुक पर हैं तो सहरसा या भभुआ जिले का कोई इंटरमीडिएट का विद्यार्थी भी। इस मंच पर कोई किसी के अधीनस्थ नहीं है। दूसरे तरीके से कहें तो अपने खाते के भीतर आपको जो आज़ादी हासिल है वो अब तक दुनिया के किसी भी शासन व्यवस्था में एक नागरिक को हासिल नहीं हुई है। फेसबुक खाते का जो आपने अखाड़ा बना रखा है, आज़ादी के मामले में आप उसके सबसे बड़े पहलवान हैं। आप मतलब हर कोई। पहलवानी के गुमां में किसी दूसरे के अखाड़े की मिट्टी आप बिना उससे पूछे नहीं काट सकते। सबकी अपनी-अपनी सल्तनत है। हर कोई नागरिक है और हर कोई शासक। इसलिए यहां फतवा कारगर नहीं है, कारगर है तो सिर्फ निवेदन, बराबरी की बहस, असहमति और प्रत्युत्तर। मार्क से जब एक बार फेसबुक को एक वाक्य में समझाने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि इसके भीतर समाजशास्त्र और कंप्यूटर का डीएनए मौजूद है।
द एक्सिडेंटल बिलिनॉयर और द सोशल नेटवर्क की कहानी
मार्क ज़करबर्ग एक ऐसी परिघटना में तब्दील हो गए जो लोगों के भीतर भव्यता, उत्साह, कौतूहल, ईर्ष्या, रोमांच और अनोखेपन का एहसास जगाने लगे। अपने समकालीनों में तक़रीबन हर क्षेत्र के लोगों पर इन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। बीते पांचेक साल में फेसबुक इंटरनेट पर समय गुजारने की एक तरह से मुहर में तब्दील हो गई है। मार्क की शुरुआती सफ़लता के बाद ही अमेरिकी बेस्ट सेलर लेखकों में शुमार बेन मेज़रिच ने उनके ऊपर किताब लिखने की सोची। जल्द ही उनका प्रोजेक्ट शुरू हो गया। हालांकि उन्होंने मार्क पर किताब लिखने की प्रक्रिया में कई साक्षात्कार किए लेकिन उन्होंने एक बार भी मार्क से बातचीत नहीं की और उनके पक्ष से चीज़ों को बहुत कम ही देखा, इसकी बजाय वह कैमरॉन और टेलर विंकलवॉस जैसे प्रतिद्वंद्वियों के अनुभवों को समेटते हुए किताब लिखी।द एक्सिडेंटल बिलिनॉयर। इस बात को लेकर मार्क ज़करबर्ग अब तक ख़फ़ा रहते हैं, लेकिन पूछने पर वो टका-सा जवाब देते हैं,“मशहूर लोगों पर ही किताब लिखी जाती है, चाहे पक्ष कुछ भी हो। मेज़रिच ने ये तो साबित कर ही दिया कि मैं मशहूर हूं। मेज़रिच का दावा है कि यह किताब फेसबुक के हर पहलू पर भले ही प्रकाश न डालता हो लेकिन इसमें ज़करबर्ग की ज़िंदगी की ऐसी कहानियां दर्ज़ है जिन्हें मार्क ने दुनिया से साझा नहीं किया। मेज़रिच ने जिस समय इस किताब पर काम करना शुरू किया लगभग उसके हफ़्ते बाद ही फ़िल्म निर्माता स्कॉट रीड ने उनकी किताब की कॉपीराइट लेने पर बातचीत का दौर चालू कर दिया। मेज़रिच तैयार हो गए। किताब पूरी होने के बाद रीड ने मेज़रिच से कहा कि मार्क का पक्ष चूंकि किताब में कम है इसलिए उनसे अतिरिक्त बातचीत की जानी चाहिए। बाद में खुद स्कॉट रीड ने मार्क से संपर्क साधा, लेकिन शुरुआती कवायदों से नाराज मार्क ने रीड को मना कर दिया। रीड ने किताब को पटकथा में तब्दील करने का ज़िम्मा आरोन सोरकिन को सौंप दिया। जिस समय सोरकिन के हाथों में कहानी आई उस समय तक फेसबुक के बारे में सोरकिन को ज़्यादा जानकारी नहीं थी, वो बस ये जानते थे कि कोई मार्क ज़करबर्ग है जिसने फेसबुक नाम की कोई चीज़ बनाई है और जिसके पीछे पूरा अमेरिका पगलाया हुआ है। इसके अलावा उन्होंने कुछ पत्रिकाओं की कवर स्टोरी में भी उस नवयुवक को देखा था, जो अपनी स्नातक की पढ़ाई बीच में छोड़ने के महीने बाद ही अरबपति कहलाने लगा था। पटकथा को जीवंत करने का उनके ऊपर भारी दबाव बन गया। आरोन सोरकिन के मुताबिक, मैं सोशल नेटवर्किंग के बारे में बहुत कम जानता था। ऐसे में मेरी चुनौती कहीं बड़ी थी। फेसबुक का मैने नाम तो ज़रूर सुना था, लेकिन ठीक उतना ही जितना मैंने कार्बुरेटर का सुन रखा है। मैं जानता तो हूं कि मेरी कार में कार्बुरेटर है, लेकिन कार खोलकर कोई मुझे उस पर उंगली रखने बोले तो मैं चकरा जाऊंगा। बहरहाल 2010 में फिल्म रिलीज हो गई। किताबी नाम को बदल दिया गया। फ़िल्म का नाम रखा गया- द सोशल नेटवर्क। इसमें हॉर्वर्ड कनेक्शन वाले क़िस्से को लंबा खींचा गया है और आधे से ज़्यादा हिस्से में मार्क को आइडिया चोर के तौर पर पेश किया गया है। मार्क के मुताबिक़ फ़िल्म कई बार उनके बारे में ग़लतबयानी करती है। हालांकि सोरकिन को वो पसंद करते हैं और सोरकिन का द वेस्ट विंग मार्क के पसंदीदा टीवी शो में शुमार है। मार्क की नाराजगी और सोरकिन की सीमाओं के बावज़ूद फ़िल्म रिलीज हुई और लोगों ने उसे खूब सराहा भी। इसमें मार्क के रुप में परदे पर नज़र आए जेसी आइज़नबर्ग।
मैं मार्क ज़करबर्ग हूं, माइक दीजिए मुझे
द सोशल नेटवर्क फिल्म में मार्क ज़करबर्ग का किरदार निभाने वाले जेसी आइज़नबर्ग में इस फिल्म के बाद कई लोग ज़करबर्ग के अक्स देखने लगे। आइज़नबर्ग भी मस्ती-मज़ाक में कई बार खुद को ज़करबर्ग के तौर पर लोगों के बीच पेश कर देते हैं। उनकी इस शरारती कारस्तानी की वजह से फेसबुक के कार्यक्रम में एक दिलचस्प वाकया हुआ। हुआ यूं कि कार्यक्रम शुरू होना था और ज़करबर्ग मंच पर नहीं पहुंचे थे। तो, मौका ताड़कर आइज़नबर्ग ने माइक संभाला। गला खंगालते हुए ठीक मंच के बीचो-बीच आकर उन्होंने लोगों का इस्तकबाल किया। फिर फेसबुक की कामयाबी को लेकर अपने अनुभव इस तरह शेयर करने लगा गोया वो सचमुच के ज़करबर्ग हो! इस बीच ज़करबर्ग स्टेज के बगल में परदे के पीछे से आइज़नबर्ग को देख-देखकर मजे ले रहे थे। थोड़ी देर तक चुप-चाप देखने के बाद हॉवर्ड का शरारती अंदाज़ ज़करबर्ग पर भी तारी हो गया। बीच में ही मंच पर आकर वो बोले, ओह! ये नामुराद कौन हैं?” अपने भाषण में रमे आइज़नबर्ग ने बिल्कुल उसी लहजे में जवाब दिया जैसे यह जवाब भी उनके भाषण का ही अंश हो, मैं मार्क ज़करबर्ग हूं। इस जवाब को सुनकर पूरा हॉल हंसी के मारे दोहरा हो गया। ज़करबर्ग ने दर्शकों से मुखातिब होकर कहा, नहीं, मैं मार्क ज़करबर्ग हूं। माइक दीजिए मुझे।
प्रिसिला, क्या तुम फेसबुक के लिए काम करोगी?
ज़करबर्ग को याद करते ही फेसबुक, कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर इस तरह दिमाग में एक साथ गुथ जाते हैं कि जीवन के अन्य पहलुओं पर ध्यान बहुत कम ही जा पाता है, लेकिन मार्क ने अब तक अपना जीवन बेहद संतुलित, सामान्य और उसमें रंग भरने वाले हर पहलुओं को समेटकर जिया है। हॉवर्ड के शुरुआती दिनों में एक शुक्रवार पार्टी में मार्क के साथ सबकुछ उसी तरह था, जैसे अमूमन पार्टी में होता है। लेकिन पार्टी के बाद दुनिया वैसी नहीं रही, जैसे पहले थी। मार्क ने दोस्तों से गप्प-शप्प की, ठहाके लगाए, खाया-पिया और बाथरूम की तलब लगने पर उधर का रुख किया। पुरुष और महिलाओं के लिए जहां से रास्ता फूटता था, वह एक साझा हॉल था। लाइन में जब मार्क लगे तो बाजू वाली कतार में प्रिसिला चैन भी थीं, जिनसे मार्क अब तक अपरिचित थे। दोनों की यह पहली मुलाकात थी। प्रिसिला चैन ने बाद में एक साक्षात्कार में बताया कि पहली मुलाकात के वास्ते बाथरूम का संयोग दुनिया में कितना कम होता होगा! बहरहाल, पता-परिचय के बाद नियमित मिलना-जुलना शुरू हुआ। और धीरे-धीरे यह मुलाकात प्रेम में तब्दील हो गई। प्रिसिला भी हॉर्वर्ड में ही थीं। इस तरह से साझेपन की बुनियाद में हॉर्वर्ड का बड़ा योगदान रहा। फेसबुक इस समय नवजात ही था। मार्क फेसबुक को लेकर उत्साहित होने के साथ-साथ बेहद महत्वाकांक्षी भी हो रहे थे और इसी चलते उन्होंने हॉर्वर्ड छोड़ने का फैसला लिया। मार्क का कैलिफॉर्निया जाना सपाट तरीके का जाना नहीं था, वह फेसबुक नामक मंच को साथ लेकर कैलिफॉर्निया गए थे जिसकी पैदाइश हॉर्वर्ड थी और मौजूदा पता कैलिफॉर्निया। इस तरह न सिर्फ मार्क और प्रिसिला के शहर का बंटवारा हुआ था, बल्कि फेसबुक भी बंट गया था और दोनों का एक-एक सिरा दो अलग-अलग शहरों में ये दोनों थामे थे। प्रेम चलता रहा बल्कि यूं कहिए कि लगातार गहराता गया। सिलिकॉन वैली में फेसबुक ने जब अच्छी धाक जमा ली तो नए कर्मचारियों की भर्ती के लिए मार्क ने सबसे सटीक जगह के तौर पर हॉर्वर्ड को चुना और प्लेसमेंट की खातिर वो कुछ दिनों के लिए हॉर्वर्ड आ गए। विश्वविद्यालय से निकलने वाले समाचारपत्र द क्रिमसॉन के मुताबिक भर्ती प्रक्रिया के दौरान मार्क ने प्रिसिला को ऑफर दिया का वो फेसबुक के लिए काम कर सकती है! यह बेहद मज़ाकिया तरीका था मार्क का। प्रिसिला की प्रतिभा से मार्क वाकिफ़ थे। जिस वक्त याहू ने फेसबुक को 1 अरब डॉलर में ख़रीदना चाहा था तो चैन ने मार्क से लंबी जिरह के बाद उसे ठुकराने को कहा था। आप कह सकते हैं कि वो फैसला ज़करबर्ग का कम प्रिसिला का ज़्यादा था।
ग्रैजुएशन नहीं, शादी की पार्टी है
हॉर्वर्ड से पढ़ाई खत्म करने के बाद प्रिसिला चैन सैन जोस, कैलिफॉर्निया चली गई जहां उन्होंने हार्कर स्कूल में चौथे और पांचवे दर्जे के विज्ञान शिक्षिका की नौकरी शुरू कर दी। इस अदद नौकरी के साथ-साथ वह डॉक्टरी की पढ़ाई भी कर रही थी। जो भी हो, प्रिसिला का कैलिफॉर्निया आना अच्छा रहा, मार्क के साथ उनकी दूरी कम हो गई। नियमित अंतराल पर दोनों एक-दूसरे से मिलने लगे। लेकिन फेसबुक को लगातार मिलने वाले विस्तार की वजह से मार्क के पास समय की किल्लत दिन-ब-दिन बढ़ने लगी। इस व्यस्तता के कारण दोनों की मुलाकातें बाधित होती और फिर दोनों इस चीज़ को लेकर झगड़ पड़ते। झगड़ों की संख्या जब बढ़ने लगी तो प्रिसिला ने इसका हल ढूंढा। उसने मार्क के सामने यह प्रस्ताव रखा कि हफ़्ते में एक दिन दोनों साथ-साथ गुजारेंगे और इसमें कम से कम 100 मिनट ऐसे होंगे जहां उन दोनों के अतिरिक्त और कोई न हो। और यह 100 मिनट मार्क के अपार्टमेंट और फेसबुक के दफ़्तर के कहीं दूर होना चाहिए। जाहिर है मार्क सहमत हो गए। इस बीच प्रिसिला चैन ने अपने मूल देश यानी चीन घूमने की इच्छा जताई तो ज़करबर्ग भी साथ हो लिए। वहां पहुंचने के बाद मार्क को लगा कि वह दुनिया की एक बेहद ज़रूरी भाषा का भी नहीं जानते। बचपन से ही भाषाओं के प्रति आसक्त रहने वाले मार्क ने मंडारिन सीखनी शुरू कर दी। यह एक तरह से मार्क की ज़रूरत भी थी क्योंकि प्रिसिला की दादी अंग्रेज़ी नहीं जानती और  उनके साथ स्वतंत्र संवाद स्थापित करने की लाख चेष्टा के बावज़ूद मार्क को लगा कि मंडारिन के बग़ैर यह संभव नहीं है। चीन में अच्छा समय गुजारने के बाद दोनों वियतनाम घूमने निकल गए। इस दौरे से पहले ही मीडिया में दोनों की प्रेम कहानी पर हज़ारों पन्ने रंग चुके थे, लेकिन विदेश में साथ गुजारने पर मीडिया सैर-सपाटे वाले अंदाज़ में लगातार दोनों को छापता रहा। मीडिया रिपोर्टों से ऐसा लगता है कि अमेरिका की ज़्यादातर लड़कियां प्रिसिला चैन से रस्क करने लगी। सितंबर 2010 में प्रिसिला ने अपना घर छोड़ दिया। उनके घर छोड़ने से कुछ दिन पहले मार्क ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा,प्रिसिला घर छोड़ रही है। अगर किसी को कप, डिश, ग्लास जैसे घर-गृहस्थी से संबंधित कोई भी सामान लेना हो तो जल्दी संपर्क करें। कहीं ऐसा न हो कि आपके आने से पहले उनको ठिकाने लगा दिया जाए। लंबे समय बाद जब 19 मई 2012 को ज़करबर्ग ने अपने फेसबुक खाते में इंगेज्ड के बदलेमैरिड लिखा तो उस दिन की यह बड़ी ख़बर बन गई। तो अंतत: मार्क और प्रिसिला चैन ने अपने 9 साल पुराने प्रेम संबंध को शादी में तब्दील कर दिया। शादी की ख़बर ज़्यादातर लोगों को नहीं थी, यहां तक कि पार्टी में मौजूद कई लोगों को लगा कि यह प्रिसिला के ग्रैजुएट होने की खुशी में दी जाने वाली पार्टी है। शादी का पूरा आयोजन एक तरह से खुलासे की मानिंद हुआ। लोगों का मालूम हुआ कि अरे, यह तो ग्रेजुएटहोने की नहीं, बल्कि शादी की पार्टी है!

यह गुमशुदा तलाश केंद्र है

मार्क ने फेसबुक को लेकर लगातार प्रयोग किया है। निजी ज़िंदगी की तमाम सामंजस्य और व्यस्तता के बावज़ूद वो फेसबुक को लेकर नएपन के साथ बाज़ार में उतरते रहे। वह जानते हैं कि भूमंडलीकरण के दूसरे चरण का यह उत्पाद है। 21वीं सदी का। लोकप्रिय संस्कृति के मज़बूत हो चले जड़ों के बीच फेसबुक युवा पीढ़ी के सामने उस वक्त उभरा है जब सबके जीवन की घड़ी तेज चलने लगी है। समूचा जीवन फास्ट मोड पर है। संगीत, गाड़ियां, गप्प-शप्प, खाना-पीना, पढ़ना-लिखना। सबकुछ। अब दूसरे के ख़यालात जानने में कोई चार मिनट का समय नहीं दे सकता और कोई चार सौ शब्द लिखकर अपनी बातें नहीं कहता। सबकुछ संक्षिप्त, सबकुछ तेज। फेसबुक की दुनिया में वही लेखन सबसे आकर्षक और लोकप्रिय है जो छोटा है। जाहिर है इस ज़माने में हर यूजर के पास इतना समय नहीं है कि वो बैठकर डेस्कटॉप या फिर लैपटॉप पर फेसबुक लॉग-इन करे। मार्क ने यूजर्स को विकल्प दिया कि वो राह चलते, पार्टी से या फिर घटनास्थल से बिना लैपटॉप तक पहुंच बनाए फेसबुक से जुड़ सकते हैं।उन्होंने 2007 के अंत में मोबाइल पर फेसबुक की शुरुआत की।आप कह सकते हैं कि वह समय की नब्ज को जानते हैं। वह जानते है कि मोबाइल पर फेसबुक शुरू करने का अर्थ क्या है। आज नतीजा ये है कि दुनिया में फेसबुक इस्तेमाल करने वाले आधे लोग मोबाइल के जरिए भी इससे जुड़े हैं। मार्क के फेसबुक ने देश-दुनिया-समाज में कई बदलाव किए। अपने विस्तार के बाद से फेसबुक संभवत: दुनिया की ऐसी सबसे बड़ी डायरेक्ट्री है, जिसने लोगों की ई-मेल और मोबाइल नंबर तक पहुंच आसान कर दी है। चेहरा अगर आप पहचानते हैं तो फेसबुक में सर्च कीजिए और दुनिया में मनचाहे यूजर्स का फोन नंबर हासिल कर लीजिए। हालांकि कई लोग सुरक्षा या फिर निजी वजहों से फोन नंबर सार्वजनिक नहीं करते, लेकिन इसके बावजूद खोए हुए मित्र को ढूंढने या फिर खुद का मोबाइल गुम होने के बाद ग़ायब हुए फोन नंबरों को वापस हासिल करने में फेसबुक लोगों के बड़े सहारे के तौर पर उभरा है। गूगल से यही चीज़ फेसबुक को अलग करती है। सर्च करने पर गूगल सार्वजनिक जानकारी देता है, लेकिन फेसबुक निजी।
...तो ये है कमाई का जरिया
2007 में ज़करबर्ग ने यह घोषणा की कि फेसबुक अब प्लेटफॉर्म बनने जा रहा है। इसका मतलब ये है कि जो दूसरे डेवलपर्स हैं वे अब फेसबुक पर आकर नए एप्लिकेशंस शुरू कर सकते हैं। यानी बाहर के दूसरे खिलाड़ियों को मार्क ने खेलने के लिए अपना मैदान दे दिया और हमेशा की तरह यह तरकीब भी कारगर रही। एप (एप्लिकेशन) वाला मामला चल निकला। इसमें न सिर्फ़ फेसबुक का फायदा होना था बल्कि खुद सोशल गेमिंग कंपनियों ने फेसबुक के पास इसके लिए मनुहार किया था। जाहिर है इन कंपनियों को फेसबुक के माध्यम से लोगों तक पहुंचने में बड़ी कमाई दिख रही थी। जबसे सोशल गेमिंग को इसपर जगह मिली है तब से फार्मविले और माफिया वार्स जैसी सोशल गेमिंग कंपनियों ने इसके मार्फत सैंकड़ों मिलियन डॉलर्स सालाना कमाए हैं। कई यूजर्स के दिमाग में यह सवाल रहता है कि आख़िरकार फेसबुक की कमाई का जरिया क्या है?दो-तीन उदाहरणोंऔर तथ्यों के जरिए फेसबुक की कमाई का राज़ आप आसानी से जान लेंगे। लंदन दुनिया में सोशल गेमिंग का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। फेसबुक पर गेमिंग का दरवाज़ा खुलते ही इस शहर की हलचल तेज हो गई।गेमिंग कंपनियां यूजर्स को गेम खेलने देने के बदले पैसा वसूलती है। पहले दो-एक खेल तो ये नमूने के तौर पर खेलने देती है लेकिन रुचि मज़बूत होते ही यूजर्स को पैसे देकर आगे खेलने का विकल्प पेश करती है। यूजर्स से जो पैसा गेमिंग कंपनियां इकट्ठा करती है सामान्य तौर पर फेसबुक उसका एक तिहाई रख लेता है। सामान्य रेट-चार्ट यही है। गेमिंग कंपनियों के लिए फेसबुक से सहूलियत ये होती है कि उन्हें बैठे-बैठे करोड़ो यूजर्स तक पहुंचने का रास्ता मिल जाता है। कुल मिलाकर कहें तो अरबों रुपए का ये सालाना धंधा है। प्लेफिश जैसी कंपनियां हर साल करोड़ों कमाती है। लेकिन फेसबुक और मार्क ज़करबर्ग की सबसे ज़्यादा कमाई विज्ञापनों से होती है। फेसबुक पर विज्ञापन का अंदाज़ निराला है। आपको पता भी नहीं चलेगा और ग़ौर करेंगे तो खूब पता चलेगा! असल में फेसबुक पर विज्ञापन देने से विज्ञापकों के पास अतिरिक्त उपभोक्ता तक पहुंचने की झंझट से मुक्ति मिलती है। जिनके लिए विज्ञापन है, वह पहुंच भी उन्हीं तक रहा है। यही फेसबुक की खूबी है। टीवी पर अगर महिलाओं के किसी सामान का विज्ञापन आ रहा है तो चैनल बदलने के अलावा और कोई उपाय नहीं है जिससे पुरुष दर्शक उसे नहीं देखे। ऐसे में विज्ञापक बड़ी तादाद में ऐसे दर्शकों को विज्ञापन दिखाता है, जो कभी भी उनका उपभोक्ता नहीं बनेंगे। फेसबुक कंपनी इसी असंतुलन को दुरुस्त करती है। वह विज्ञापकों को सूचना और संख्या बेचती है। मान लीजिए एक शहर में पांच लाख फेसबुक यूजर्स महिला हैं। उन पांच लाख में से ब्यूटी का शौक रखने वाली महिलाओं की संख्या दो लाख है और शादीशुदा महिलाओं की संख्या एक लाख 50 हज़ार है। तो विज्ञापकों को फेसबुक यह बताएगा कि अमुक शहर में ब्यूटी और फैशन की शौकीन शादीशुदा और अविवाहित महिलाओं की संख्या कितनी है। कितने लोगों को बाइक पसंद है कितने लोग चॉकलेट पसंद करते हैं। आदि, आदि। यही संख्या बेचकर फेसबुक पैसा वसूलता है। विज्ञापक आपका नाम नहीं जानता, लेकिन वह संख्या जानता है और आज के ज़माने में बाज़ार के लिए नाम से बड़ी चीज़ संख्या हो गई है।

पांचवां और आख़िरी भाग यहां पढ़ें।

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