17 नवंबर 2009

नक्सलवाद के बहाने असहमतियों पर निशाना



देवाशीष प्रसून (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के
मीडिया विभाग में शोधार्थी व स्वतन्त्र लेखन संपर्क- prasoonjee@gmail.com)


नक्सलवाद के नाम पर सरकार तमाम तरह की असहमतियों के स्वर पर निशाना साध रही है। सरकारें कुछ ऐसे चीजों का हौव्वा बना कर रखती हैं जिन्हें वो किसी भी गंभीर असहमति या असहमति से उपजे प्रतिरोध के स्वर के विरोध में खड़ा कर सकें। ऐसा करने के बाद प्रतिरोधी लोगों की सारी लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकारों को खत्म मान लिया जाता है। फिर सरकारों को मनमाने तरीके से अपने विरोधियों को चुप कराने में आसानी होती है। जैसे, अमरीका के पास आतंकवाद नाम का हौव्वा है, जिसे वह उन देशों के खिलाफ इस्तेमाल करता है, जो अमरीका के वर्चस्व को नहीं स्वीकारते हैं। भारतीय सत्ता तंत्र के पास भी नक्सल नाम का एक ऐसा ही हौव्वा है, जिसे वह तमाम असहमतियों के स्वर के विरोध में इस्तेमाल कर धड़ल्ले से उनका दमन करता फिरता है।

छत्तीसगढ़ के पीयूसीएल, वनवासी चेतना आश्रम, दांतेवाड़ा और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, दिल्ली के पीयूडीआर, मल्कानगिरी के मन्नाधिकार व जिला आदिवासी एकता संघ और उड़िसा के एक्शन एड के संयुक्त 15 सदस्यीय जाँच दल द्वारा हुए एक अध्ययन के मुताबिक नक्सल विरोधी अभियान ग्रीन हंट के तहत 17 सितंबर को दांतेवाड़ा के गचनपल्ली में 6 लोगों की कोबरा, स्थानीय पुलिस, विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) और सलवा जुडूम के कार्यकर्ता बोड्डू राजा के नेतृत्व में हत्याएँ की गई। दांतेवाड़ा के ही गोमपद और चिंतागुफा में 1 अक्टूबर को फर्जी मुठभेड़ में भी कई हत्याएँ हुई। पीयूसीएल, उत्तर प्रदेश के हवाले से पता चलता है कि 8 नवंबर को रोहतास जिले से पाँच लोगों को पुलिस ने उठाया और इनमें से किसी को भी न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने अगले दिन सोनभद्र के चोपन जंगलों में उनमें से एक कमलेश चैधरी को सीपीआई(माओवादी) का एरिया कमांडर बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया। बाकी चार लोग अब तक लापता हैं। ऐसी सैन्य कार्रवाईयों का सिलसिला पूरे देश में लगातार चल रहा है।

बीते दिनों, पुलिस संत्राश बिरोधी जनसाधारणेन समिति(पीसीएपीए) ने पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में जबरन भू-अधिग्रहन के खिलाफ हल्ला बोला था। इस जन आंदोलन को कई जाने-माने बुद्धिजिवियों के साथ-साथ ममता बैनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस और सीपीआई(माओवादी) का भी समर्थन प्राप्त है। इसके नेता छत्रधर महतो को मुख्यमंत्री की हत्या के कोशिश और सीपीआई(माओवादी) से संबंध के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारी के विरोध में पीसीएपीए कार्यकर्ताओं ने झाड़ग्राम में भुवनेश्वर-दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन को चार घंटे तक घेरे रखा। किसी को हताहत करने के बजाय इस दौरान उन्होंने सरकार से उनके साथी छत्रधर महतो को रिहा करने की माँग रखी। एक ओर जहाँ, देश में रेल का घेराव विरोध प्रदर्शन का आम तरीका रहा है, वहीं सरकार ने इसे माओवादियों के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा और तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों से लैस इन आदिवासियों को नक्सली समझा।


पूरी सरकारी मशनरी ने नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया है और ऐसा मानना उनके लिए आप्तवचन है। वर्ष 2005-06 में सरकार ने कई महत्वाकांक्षी विकास परियोजनाओं के मद्देनजर कुछ अहम फैसले लिए। इसी वर्ष नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा संबंधी व्यय स्कीम में केन्द्र सरकार ने नक्सली राजनीति के असर वाले प्रदेशों के लिए प्रतिपूर्ति की दर पचास प्रतिशत से बढ़ाकर शत- प्रतिशत कर दिया गया। इस राशि के अग्रिम भुगतान की व्यवस्था की गई। राज्यों की सरकारों को पुलिस आधुनिकीकरण स्कीम के तहत आधुनिक हथियारों, मोबीलिटी, संचार उपकरण और प्रशिक्षण के आधारभूत ढाँचे के उन्नयन हेतु खर्च राशि के कम से कम तीन-चैथाई प्रतिपूर्ति का इंतजाम किया गया। साथ ही, नौ राज्यों के 76 नक्सल प्रभावित जिलों को प्रति जिला दो करोड़ रुपये प्रति वर्ष के हिसाब से पुलिसिया ढाँचे को मजबूत करने के लिए मिलनी शुरू हुई। नक्सल प्रभावित राज्यों में, प्रत्यक्ष तौर पर, युवाओं को रोजगार प्रदान करने के लिए इंडिया रिजर्व बटालियनों के गठन का फैसला लिया गया। लेकिन, असलियत यह थी यह राज्यों में पीड़ित जनता के असहमति के स्वर को दबाने के लिए पीड़ित लोगों में ही कुछ को सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करना के जुगाड़ था । छत्तीसगढ़ में ’सलवा जुडूम’, झारखंड में ’नागरिक सुरक्षा समिति’, तथा बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में ’संत्रास प्रतिरोध समिति’, ’घोस्कर वाहिनी’ और ’हरमद बलो’ जैसे ग्राम सुरक्षा या नागरिक सुरक्षा समितियों के लिए केन्द्र सरकार की ओर से एकमुश्त अनुदान और विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) के लिए मानदेय का प्रबंध किया गया। फलस्वरूप आमलोगों पर अत्याचार बढ़ा। “फूट डालो, शासन करो” की नीति अपनाते हुए सरकार ने किसानों-आदिवादियों को अपनी जमीन और रोजगार से विस्थापित करने के लिए उनमें से ही कुछ लोगों का इस्तेमाल किया। लोगों के मन आतंक पैदा करने के लिए जनसंहार, आतंक, बलात्कार तथा घरों को जलाने की कई वारदातें हुईं।

किसानों के लिए ज़्ामीन और आदिवासियों के लिए जंगल उनके जीवन और आजीविका का आधार है। सरकार सेज़्ाों, बाँधों और औद्योगिकरण के जरिए जिस विकास का सपना देखती है, उसमें किसानों को ज़्ामीन से और आदिवासियों को जंगल से महरूम होना पड़ता है। किसी की चाहे कोई भी विचारधारा हो, लेकिन जब उससे उसके जीवन का आधार छीना जायेगा तो वह इसका आखिरी दम तक विरोध करेगा। इन विरोधों पर काबू करने के लिए सरकार ने नक्सलवाद का एक ऐसे हथियार के रूप में चिह्नित किया, जिसके नाम पर सारी असहमतियों को निर्ममता से दबाया जा सके। वक्त आने पर हुआ भी ऐसा ही। सिंगूर, नंदीग्राम, कलिंगनगर और लालगढ़ जैसे कई जगह पर देश में सेज के विरोध में लोकतांत्रिक व शांतिपूर्ण तरीकों से संघर्षरत आम भुक्त-भोगी जनता को नक्सली या नक्सल समर्थित बताकर निशाना बनाया गया। संभव है कि बाद में मजबूरन, उनमें से कई लोगों को आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाया हो, लेकिन इसके लिए सरकार ने ही उन्हें उकसाया। हिंसा जायज नहीं है, लेकिन क्या उसे सहना भी वाजिब है? परंतु भारत सरकार ने पूर्णतः अहिंसक असहमतियों पर नक्सलवाद के नाम पर निशाना साधने से भी कोई गुरेज नहीं किया है। छत्तीसगढ़ में कार्यरत गांधीवादी एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम को ही बतौर उदाहरण लें, जो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सलवा जुडूम के बाद हुए विस्थापित आदिवासियों के पुनर्वास के सिफारिशों को लागू करवाने के लिए काम करती है। सरकार ने इनके द्वारा लिंगागिरी, बासगुडा और नेंद्रा में आदिवासियों के लिए भेजे जाने वाले चावल को यह आरोप लगाते हुए अपने कब्जे में ले लिया कि यह चावल नक्सलियों के लिए भेजे जा रहे थे। इस संगठन के एक कार्यकर्ता सुखदेव पर विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई। याद ही होगा कि इसी सरकार ने आदिवासियों के स्वास्थ्य और मानवाधिकार के लिए समर्पित चिकित्सक डॉ. बिनायक सेन पर भी नक्सली डाकिया का आरोप मढ़ कर लगभग दो सालों तक उन्हें सलाखों के पीछे रखा था।


आदिवासी देश की ज्यादातर खनिज संपदा के रखवाले रहे हैं। सरकार के नजरों में आज इसकी जरुरत वैश्विक पूँजी को फलने-फूलने के लिए है। ऐसी स्थिति में सरकारों की नजरें आदिवसियों की पारंपरिक संपत्तियों पर गड़ी हुई है। सरकारें औद्योगीकरण के लिए निगमों के साथ गुप्त समझौते कर रही है। आदिवासियों से बेशकीमती जमीन छीन कर निगमों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है। जल, जंगल और जमीन का अंधाधून लूट जारी है। देशी-विदेशी पूँजीपतियों को सस्ते या मुफ्त में ही बिजली, पानी, खनिज और सुरक्षा मुहैय्या कराने में सरकारें प्रतिबद्ध है। विकास के प्रति सरकार की यह सनक भारतीय लोकतंत्र के धराशाही होने की ओर इशारा करता है। विरोध और असहमतियों की सभी आवाजों को दबाने के लिए नए-नए हथकंडे तैयार किये जा रहे हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. भूल सुधार: गांधीवादी एनजीओ वनवासी चेतना आश्रम के जिस कार्यकर्त्ता पर छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई उनका नाम सुखदेव नहीं, बल्कि सुखनाथ है।

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  2. एकतरफा आलेख । नक्सवाद यानी माओवादी हिंसा, आंतक, लूटपाट और अराजकता का समर्थन यदि अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के छात्र या शिक्षक ही करने लगें तो फिर इस देश को कौन बचायेगा ?

    कभी आदिवासियों की वह दुर्दशा भी देख आईये जो नक्सलवादियों के कारण हुआ है, हो रहा है । जिस हिमांशु की बात आप कर रहे हैं उससे कभी पूछा आपने कि उसने गांधीवादी रास्तों पर चलकर किन किन हिंसक नक्सलियों को समझाया कि भाई मेरे आदिवासियों को नाहक न मारो, परेशान न करो...

    आपको तो वश रूमानी खयालों में जीना है,, बस्स

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  3. एकतरफा आलेख । कभी उस मासुम से मिल लिजिये जिसके बाप को नक्सलियों ने बेरहमी से गला काट कर मार डाला । केवल विश्वविद्यालय के छाञावास मे रहने से या थोडी सी जानकारी ले लेने से नही होती। जब आपके परिवार का कोई मारा जायेगा तब पता चलेगा की नक्सलियों का असली चेहरा कैसा होता है । तब रूमानी खयालों का भुत सर से उतर जायेगा।

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