04 नवंबर 2009

सरकार को लोकतंत्र से बाहर आ जाना चाहिये

मणिपुर के पत्रकार युमनाम रूपचंद्र से वहां की स्थितियों पर बात-चीत


मणिपुर की राष्ट्रीयता को लेकर वहाँ के लोगों की भागीदारी?

जहाँ तक नागरिक भागीदारी का सवाल है तो मैं प्रतिशत में नहीं बता सकता और यह मुश्किल भी है। वैसे देखा जाय तो मणिपुर की आज जो स्थिति है उसमे लोग बंटे हुए हैं, क्योंकि आज वहाँ ३० से अधिक संगठन काम कर रहे हैं. इसलिये यह बताना मुश्किल है कि कितने लोग किस संगठन में काम कर रहे हैं या कितने किसके साथ जुडे हैं. मगर हम यह जरूर कह सकते हैं कि इस आंदोलन को जारी रखने के लिये बहुत बड़ी तादात है क्योंकि भारत सरकार की जितनी भी पालिसी है उसमे बहुत सी चीजें असुविधा जनक हैं और यह लोगों को संगठित होने के लिये बाध्य करता है. हाँ लेकिन खुलकर लोग उस तरह से हमेशा सामने नहीं आते इनके समर्थन को हम तब पहचान सकते हैं जब कोई बड़ी दुर्घटना होती है तो सड़कों पर हुजूम निकल आते हैं. २००२ में ऐसे कई मौके देखने को मिले हैं जब बड़ी संख्या में लोग समर्थन में उतरे हैं. लोग संगठन के सदस्य के रूप में भी नहीं हैं कि हम इस संगठन या उस संगठन से जुड़े हैं बल्कि वे जन विरोधी मुद्दों के आधार पर एकजुट होते हैं.



आंदोलनकारी संगठनों में विभाजन के आधार?
राज्य में आफ्सपा लगने के बाद राष्ट्रीयता की मांग करने वाले संगठनों की संख्या बढ़्कर ३० के करीब पहुंच गयी है, पर अलग राष्ट्र की मांग ही इन सबके लक्ष्य हैं। शुरुआती दौर यानि १९५८ में जो ग्रुप था उसका भी विभाजन हुआ है और कुछ इस दौर में स्वंय निर्मित भी हुए हैं, और इन सभी संगठनों का मानना यही है कि मणिपुर एक अलग राष्ट्र है. मुख्यतः मणिपुर में दो तरह के संगठन हैं एक स्थानिक ग्रुप हैं जो कई संगठनों को लेकर बने हैं जैसे यूनाइटेड नेशन लिब्रेसन फ्रंट, पीपुल्स लिब्रेसन आर्मी आदि. इनके मकसद एक हैं पर तरीके अलग-अलग हैं. इस तरीके में यह है कि यूनाइटेड नेशनल लिब्रेसन फ्रंट जैसे संगठन भारत से बातचीत करने के लिये राजी है, पर इस शर्त पर कि भारत अपनी सेना को वापस बुलाये और फिर उनका कहना यह भी है कि यह मणिपुर के लोग तय करेंगे कि वह भारत के साथ रहना चाहते हैं या नहीं. लेकिन कईयों का यह मानना है कि यह सशस्त्र विद्रोह से ही संभव है और वे सशस्त्र लड़ाई लड़ रहे हैं. एथनिक ग्रुप का यह भी मानना है कि उन्हें भारत में ही होम लैंड चाहिये जैसे नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल आफ नागा फ्रंट एक बड़ा समूह है और वह इसी को मानता है. इस फ्रंट को अब नागा लिम बोलते हैं. इन लोगों का अभी भारत सरकार के साथ बातचीत चल रही है पर यह दस साल से जारी है और कोई परिणाम लोगों को देखने को नहीं मिले हैं. इनकी मांग को लेकर भारत सरकार का यही कहना है कि जो भी बात होगी वह संविधान के अंदर ही होगी, पर इसके सकारात्मक परिणाम आने के कम ही उम्मीद हैं.



मणिपुर में बड़े समूह कौन से हैं?
यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि कौन सबसे बड़ा है क्योंकि ग्रुप के सदस्यों की गिनती नहीं की जा सकती पर शक्तिशाली समूह के रूप में यूनीलेफ (यूनाइटेड नेशन लिब्रेसन फ्रंट), आर।पी.एफ. (रिव्यूल्युसनरी पीपुल्स फ्रंट), जिसका श्स्त्र विंग काफी मजबूत है, पी.एल.ए. (पीपुल्स लिब्रेसन आर्मी) मजबूत संगठन हैं. इसके अलावा के.वाई.के.एल., प्रीपाक, के.सी.पी. कंगलइपा कम्युनिस्ट पार्टी) ये सब वहाँ पावर फुल स्थिति में हैं.



सरकार और आंदोलनकारियों के बीच पत्रकारिता की स्थिति?
मणिपुर में पत्रकारिता की स्थिति ये है कि कुछ भारत सरकार की तरफ हैं जो संगठनों की मांगे व उनकी बातों को पत्रों में डालने से रोकना चाहते हैं पर पत्रकार ऐसे भी हैं जो चाहते हैं कि दोनों तरफ के मामले लोगों के सामने लाया जाय। कई बार संगठनों के दबाव से ही उनकी बातें आ पाती हैं, पर बड़े ग्रुप कभी प्रेसर नहीं बनाते जितना कि छोटे ग्रुप. बड़े ग्रुप का कहाना है कि जितना हो सके उतना छापिये. पत्रकारों का मणिपुर में एक संगठन है आल मणिपुर टाकिंग जर्नलिस्ट यूनियन, इसके साथ संगठनों के कई बार संघर्ष हो चुके हैं. कई बार पत्रकार निकलकर सड़क पर आये हैं, रैली किया है, धरना दिया है और संगठनों से यह मांग की गयी कि पत्रकारों में इंटरफेयर नहीं करेंगे तो इनमे से बड़े समूहों जैसे प्रीपाक, यूनीलेफ्ट आदि ने यह भरोसा जताया कि वे इंटरफेयर नहीं करेंगे संगठन अपने अलग से पत्र भी नहीं निकालते क्योंकि उनकी बात किसी न किसी अखबार द्वारा आ ही जाती है, लेकिन सरकार की तरफ से बीच-बीच में आदेश निकलता रहता है. सरकार चैनलों को बंद करवाती है पर कोर्ट के आर्डर से ये फिर चलने लगते हैं. सरकार क्या अच्छा कर रहा है यानि कामन लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करने के लिये जो भी करती है अखबार उसका प्रचार भी करते हैं जैसे सरकार सिविल एक्सन कार्यक्रम करती है जिसके तहत वह लोगों को क्लब, फुटबाल, टी.वी. आदि देती है और इसे अखबारों में छापने के लिये भेजा जाता है. यह सब पत्रकारों को भी दिया जाता है ताकि वे सुरक्षा बलों की तरफ से खड़े रहें. पर हमारा ये प्रयास रहता है कि हम दोनों पक्ष को रख दें फिर लोग खुद तय करें कि उन्हें किधर जाना है.



मणिपुर और भारत के सशस्त्र आंदोलनों के साथ संबंध?
भारत के किसी सशस्त्र संगठन के साथ मणिपुर के किसी संगठन के तालुकात की जहाँ तक बात है तो वह पी।एल.ए. (पीपुल्स लिब्रेसन आर्मी) है जिसने अपने साइट से यह घोषणा की है कि उसके भारत के माओवादियों के साथ कुछ रणनीतिक फैसले का करार हुआ है. पी. एल. ए. उसके बाद मणिपुर में काफी मजबूत स्थिति में है.



मणिपुर की घरेलू आर्मी और बाहरी आर्मी के व्यवहार में अंतर?
अब इनमे कोई अंतर नहीं रह गया है. ये जो मणिपुर के लोग हैं वे भी सरकार के टूल के रूप में काम करते हैं. पर संगठनों ने इससे भिन्न स्टैंड लिया है मणिपुर के जो लोग सेना में हैं उनको हांथ नहीं लगाना है क्योंकि वे मानते हैं कि ये अपने देश के लोग हैं, मणिपुरी हैं, उन्हें जीना है इसलिये नौकरी करनी है फिर चाहे किसी तरह की नौकरी क्यों न हो. पर भारत सरकार ने अपनी नीति बदल दी है और यह कह दिया है कि आंतरिक समस्या से घरेलू पुलिस ही निपटेगी. इसके बाद से जो मणिपुरी आर्मी में हैं वे वैसा ही कर रहे हैंजैसे बाहर के लोग. २३ जुलाई को जो कुछ हुआ वह बाहर की फोर्स नहीं थी. वर्दी पहनने के बाद ये लोग एक ही हो जाते हैं, बाहर या अंदर का कोई मामला नहीं रह जाता इन्हें जो आर्डर मिलता है बस उसे फालो करते हैं.

अभी चिदम्बरम जी वार्ता से सुलझाने की बात कह रहे हैं। क्या मानना है आपका?
चिदम्बरम ने एक बात कही है कि जम्मू-कश्मीर में और मणिपुर में दोनों और साथ में माओवादियों से भी कि ये लोग पहले हथियार छोड़ें फिर बात करेंगे. यदि भारत का गृहमंत्रालय यह स्टैंड लेता रहा तो यह सुलझने वाला नहीं है ५० सालों से यह आंदोलन चल रहा है और आज उत्तर-पूर्व इतना सैन्यीकृत हो चुका है कि आप सोच भी नहीं सकते. इसके बावजूद आंदोलन में कमी होने की कोई स्थिति नहीं दिख रही है बल्कि वे और मजबूत हुए हैं. उत्तर-पूर्व का समाधान आर्मी से नहीं होगा यह तो निश्चित है. इन सारी समस्याओं में भारत के ऊपर माओवाद सबसे बड़ा है. ये पूरा २० राज्यों तक पहुंच चुका है. सवाल उठता है कि भारत सरकार अपनी सेना को कितना बढ़ायेगी. इनसे लड़ने के लिये क्या देश की जनता के एक बड़ी आबादी को हथियार थमा देगी. क्या सरकार इसके लिये तैयार है? फिर इसे लोकतंत्र से बाहर जाना चाहिये. इस रास्ते से इसका सुलझना मुमकिन नहीं है. और ये मेरा विचार है कि अगर समस्या को सुलझाना है तो भारत सरकार को सोचना चाहिये कि पिछले ५० से अधिक सालों में जब कोई परिणाम नहीं मिल पाया है तो इस माओवाद के जमाने में इसे दोहराने से नार्थ-ईस्ट की समस्या नहीं सुलझेगी.

2 टिप्‍पणियां:

  1. vaakai sarkaar ko is samashya par gambhirta se sochna chahiye
    jyotishkishore.blogspot.com

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  2. "उत्तर-पूर्व का समाधान आर्मी से नहीं होगा यह तो निश्चित है. इन सारी समस्याओं में भारत के ऊपर माओवाद सबसे बड़ा है. ये पूरा २० राज्यों तक पहुंच चुका है. सवाल उठता है कि भारत सरकार अपनी सेना को कितना बढ़ायेगी. इनसे लड़ने के लिये क्या देश की जनता के एक बड़ी आबादी को हथियार थमा देगी. क्या सरकार इसके लिये तैयार है? "

    सरकार यही करने जा रही है. ऐसे माहौल में जब की मणिपुर में इरोम शर्मीला १० वर्षों से भूख हड़ताल कर रही है और जब की साडी समस्याओं को छोड़ सरकार माओवादियों के खिलाफ अपना पराक्रम दिखने को आतुर है. वैसी भी उत्तर-पूर्व के बारे में हम सब कितना कुछ कम जानते है. युमनाम रूपचंद्र से मिलाने के लिए धन्यवाद !

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