09 नवंबर 2009

नागरिक समाज के लिए लालगढ़ आंदोलन से जुड़ी एक ज़रुरी बहस

लालगढ़ में जारी आंदोलन ने कई चीज़ों को जन्म दिया है। इसने जनआंदोलन को एक ऐसे ऊंचे स्तर पर पहुंचाया है जहां विभिन्न रूपों में राज्य के दमन के ख़िलाफ़ चल रहा आंदोलन आदिवासी भाषा तथा लिपि के विकास, जनोन्मुखी विकास के एक नए मॉडल तथा ’औद्योगीकरण’ के नाम पर जारी स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट और उन्हें देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों के हाथों सौंपे जाने के ख़िलाफ़, निर्णायक लड़ाई से जुड़ गया। यह ऐतिहासिक आंदोलन अपनी प्रकृति में कई तरह के विवादों को भी ग्रहण किए हुए है; इसमें माओवादियों के शामिल होने, पुलिसिया अत्याचार विरोधी जनसाधारण समिति और माओवादियों के बीच के रिश्‍ते तथा इस आंदोलन के विकास के विभिन्न चरणों में शामिल नागरिक समाज तथा जनता के विभिन्न हिस्सों द्वारा महसूस की जा रही समस्याओं की प्रकृति के बारे में काफ़ी विवाद है। इस बारे में कोलकाता से निकलने वाले दैनिक समाचार पत्रों में कई आलेख छपे हैं जो अन्य राज्यों में लोगों को उपलब्ध नहीं हैं। ये बहसें अपने विषयवस्तु में मज़बूत हैं अतः हमने सोचा कि तर्कों और प्रति-तर्कों को जितने लोगों तक संभव हो सके पहुंचाया जाए। लोकतंत्र की कार्यपणाली, ग़लत धारणाओं को ठीक करने तथा किसी दृष्‍टिकोण को निर्मित करने/बदलने/सुधारने/ठोस करने में ये बहसें बहुत अच्छी हैं। हमने तीन आलेखों को चुना है। ये सभी खुले पत्र तथा प्रतिक्रियाओं के रूप में आए हैं। पहला आलेख ’माओवादियों के नाम एक खुला ख़त’ शीर्षक से पश्‍चिम बंगाल के जाने माने नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र का है। दूसरा और तीसरा उसके जवाब में हैं। दूसरा ’जंगल महल से जवाब’ शीर्षक से माओवादियों के सर्वाधिक चर्चित नेता किशनजी का है और तीसरा लेख ’हिंसा तथा अहिंसा’ शीर्षक से जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में इतिहास के प्रोफ़ेसर तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता अमित भट्टाचार्या का है। ये सारे आलेख बंगाली दैनिक ’दैनिक स्टेट्समैन’ में प्रकाशित हुए थे। पहला 26 सितंबर को छपा तथा दूसरा और तीसरा 10 अक्टूबर के एक ही संस्करण में प्रकाशित हुए। मूल बंगाली से अनूदित अंग्रेज़ी आलेखों का यह हिंदी अनुवाद है। अंग्रेज़ी के ये आलेख रैडिकलनोट्स नामक पोर्टल से साभार लिए गए हैं।

माओवादियों के नाम एक खुला ख़त
सुजातो भद्र
यह लेखक पश्‍चिम बंगाल में कुछ दशकों से नागरिक अधिकार/मानवाधिकार आंदोलन से जुड़ा भारत का नागरिक है। आप लोगों को मालूम ही होगा कि इस राज्य में आपकी सशस्त्र गतिविधियों तथा उसको आधार बनाकर राज्य द्वारा छेड़े गए भयंकर हिंसक तथा निर्दयी दमन ने एक बहस खड़ी की है।
जैसा कि आप जानते हैं, पिछले नवंबर (2008) में लालगढ़ सहित जंगल महल में जारी पुलिसिया दमन तथा आतंक के ख़िलाफ़ नागरिक समाज मुखर हुआ था। पुलिसिया दमन विरोधी जनसाधारण समिति द्वारा रखे गए मांग पत्र को नागरिक समाज तथा कई संगठनों को पूरा पूरा समर्थन मिला था। जून 18 के बाद जो कुछ घटित हो रहा था उसके बारे में नागरिक समाज सचेत था; संयुक्‍त बलों द्वारा किए जा रहे दमन के बारे में इसने हर समय अपनी आवाज़ उठाई; संयुक्‍त बलों की वापसी की मांग उठाई तथा सरकार से सभी दलों से बातचीत करने की मांग की। हमने (राज्य द्वारा) आपके संगठन पर ’आतंकवादी’ का ठप्पा लगाने का पुरज़ोर विरोध किया। नागरिक समाज का एक असहमत हिस्सा ग़ैर क़ानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (UAPA) को भी हटाने की प्रबलता से मांग कर रहा था। संक्षेप में, नागरिक समाज राज्य-दमन तथा आतंक को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है। हममें से अधिकतर ’विस्फ़ोटक स्थिति’ जैसे नमूने के कोई पक्षधर नहीं है।
हमारे प्रतिरोध का मूल आधार लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति हमारी निष्‍ठा, मानवतावाद तथा नैतिकता से उत्पन्न चेतना है। हम मानते हैं कि ऐसे तत्त्व वर्गीय दृष्‍टिकोण से निर्देशित राजनीति के भी अंग तथा मूल्य होने चाहिए। यही वे विचार हैं जिनके कारण मुझे लगता है कि आपकी कुछ गतिविधियों में तार्किक चिंतन की कमी है। कुछ घटनाएं यहां तक कि हमारी चेतना पर भी चोट करती हैं और हमें दर्द पहुंचाती हैं।
आपकी पार्टी पहले भी ऐसे सवालों का सामना करती रही है। आपने आंध्रप्रदेश के ’चिंतित नागरिकों’ (Concerned Citizens) को खुले पत्र द्वारा जवाब दिया था, मैंने कुछ प्रसिद्ध लोगों (जैसे रामचंद्र गुहा तथा अन्य) द्वारा उठाए गए (छत्तीसगढ़ केंद्रित) सवालों पर आपके जवाबों को भी देखा है। उस समय भी आप लोग भूमिगत पार्टी के रूप में काम कर रहे थे। हाल में, घोषित प्रतिबंधों तथा दमनकारी काले क़ानूनों की वजह से स्थितियां निस्संदेह, आप लोगों के लिए और कठिन हो गई हैं।
अब हमारे पास कोई क़ानूनी जगह नहीं है जहां से हम आपके विचारों को जान सकें और उन्हें अपनी तरफ़ से जवाब दे सकें। हम इस तथ्य की सराहना करते हैं कि ऐसे राज्य दमन तथा घुटन भरे वातावरण का सामना करते हुए भी आप लोग खड़े हैं। आपके आक्रोश को समझते हुए भी, आपकी कुछ गतिविधियों पर मुझे संदेह है। मैं उन चीज़ों को, आप लोग जिन कठिन स्थितियों में हैं उसका ख़याल रखते हुए, सामने रख रहा हूं। आप लोगों से विनम्र आग्रह है कि इनका (आलोचनात्मक और मुश्‍किल निरीक्षणों का) जवाब देंगे।
आपके ’माओवादी हिंसा’ नामक एक लीफ़लेट में कहा गया है:
“.... हिंसा का दृष्‍टिकोण वर्गीय होता है, यह कभी तटस्थ नहीं होती.... सिर्फ़ सशस्त्र संघर्ष और जन-युद्ध ही जनता के जनवादी संघर्षों का विकास तथा विस्तार करेगा..... हमारा काम हिंसक नहीं है, हिंसा को ख़त्म करने के लिए यह जनता की हिंसा है जो जन युद्ध का हिस्सा है।“ (दिनांक: 18-07-09)
मैं इस राजनीतिक नज़रिए का पक्षधर नहीं हूं। एक वैकल्पिक राजनीतिक दृष्‍टिकोण के आधार पर मैं इसका विरोध भी नहीं कर रहा हूं। इसके प्रतिकूल, मैं अपने आप को आपकी तार्किक संरचना में रखकर सवाल उठाऊंगा: कोई हिंसा की धारणा पर बातचीत कर सकता है और इसे एक सैद्धांतिक धरातल पर लागू करेगा; क्रियान्वयन के वक़्त इसमें समस्याएं खड़ी हो सकती हैं और इससे निश्‍चित तौर पर एक सामाजिक प्रभाव जन्म लेता है। इसका संबंध लालगढ़ तथा अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों के समर्थकों के बीच उपजी गहन प्रतिक्रियाओं से है।
सिर्फ़ आप लोग ही क्यों, समूचे युग में ऐसे कई दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने स्पष्‍टतः कहा है कि न्याय की स्थापना सिर्फ़ हिंसा के सहारे ही की जा सकती है।(?) उदाहरण के लिए, सार्त्र ने लिखा है, “हिंसा स्वीकार्य है क्योंकि सभी महान बदलाव हिंसा पर आधारित रहे हैं।“ (द आफ़्टरमथ ऑफ़ वार, पृ. 35) वे यह जोड़ना भूल गए कि इतिहास ने ख़ुद साबित किया है कि हिंसक साधनों के द्वारा गढ़ा गया समाज ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। हिंसा के द्वारा कुछ अच्छा भी हासिल किया जा सकता है इसमें भी भारी संदेह है। यह अवधारणा कि “साध्य साधन को न्यायनिर्णीत साबित करेगा” न्याय तथा नैतिकता की धारणा को ख़ारिज़ करती है; और परिणाम यह होता है कि “साधन साध्य पर भारी पड़ता है।“
आपने बड़ी ही तरल शब्दावली में घोषित किया है कि क्षेत्र (जंगल महल) की जुझारू जनता ने सीपीआई (माओवादी) के नेतृत्त्व में जन अदालत लगाई और उन लंपट तत्त्वों (सीपीएम के हरमद) को वो सज़ा दी जिसके, पुलिस मुखबिर होने के वे नाते पात्र थे। (प्रेस विज्ञप्ति, दिनांक, 16-08-09)
हमारा विरोध यहां इस मृत्यु दंड के सवाल पर है। पूरी दुनिया में भारत समेत कई लोगों तथा नागरिक अधिकार संस्थाओं ने मृत्यु दंड (क़ानूनी हत्या) के अंततः उन्मूलन के लिए एक जनमत तैयार किया। परिणामस्वरूप, दुनिया के अधिकतर देशों (224 देश) ने मृत्यु दंड को ख़त्म कर दिया गया। इसका कारण यह है कि यह प्रचलन बर्बर तथा क्रूर है। सर्वोपरि, यह किसी रोकथाम/निवारक के रूप में भी काम नहीं करता। सर कलम करना एक दोषी को अपने आप को सुधारने का मौक़ा नहीं देता। इतना ही नहीं, निर्णय में किसी चूक की भी संभावना हो सकती है। दंडित करने के बाद अगर यह पाया जाता है कि सज़ायाफ़्ता व्यक्‍ति निर्दोष था तो कोई भी उसका जीवन नहीं लौटा सकता। प्रतिकूलतः, ऐसी हिंसक सज़ाएं समाज को और अमानवीय तथा और हिंसक बनाती हैं। बहुत समय पहले, टॉम पेन ने कहा था, “आदमी अपनी प्रकृति से हिंसक नहीं होते, वे राज्य द्वारा इस्तेमाल किए गए क्रूर तरीक़ों को सिर्फ़ पुनः आजमाते हैं।“ हम राज्य द्वारा इस्तेमाल में किए जाने वाले इन क्रूर तरीक़ों का प्रबल विरोध करते हैं। साथ ही साथ, हम यह भी कहते हैं कि इस असमान तथा वंचित समाज में शोषित लोगों के बीच अगर ’आंख के बदले आंख’ या ’जीवन के बदले जीवन’ जैसी धारणाएं जड़ें जमा लीं तो जनता की ओर से हिंसक मानसिकता का भयंकर विस्फ़ोट होगा; अभी यही हो रहा है। आप लोग सामाजिक रूपांतरण के लिए संघर्ष करने वाले सर्वोच्च तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। नेतृत्त्वकारी दस्ते के रूप में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए? आप हिंसक भावनाओं को बढ़ावा देंगे, या सर्वोच्च लोकतांत्रिक भावनाओं का विस्तार करेंगे और उस रास्ते पर चल रहे अपने से प्रभावित लोगों को दिशा-निर्देश देंगे?
’जन’ अदालत का सांगठनिक ढांचा क्या है? क्या यही कि आरोप लगाने वाले ही न्यायाधीश हैं और कलम करने वाले भी वे ख़ुद ही है? यह याद करना ज़रूरी होगा कि राज्य द्वारा स्थापित किए गए न्यायिक व्यवस्था में कुछ निश्‍चित मान्य चरण होते हैं, न्यायिक प्रक्रियाएं होती हैं, नियमित और अलग से व्यवस्थित न्यायिक संरचना होती है, उच्च न्यायालयों में अपील करने का अधिकार होता है और राष्‍ट्रपति के हाथों क्षमादान का अधिकार होता है। इन सबके बावजूद, हम वैधानिक हत्या की व्यवस्था के उन्मूलन की मांग करते हैं। अतः हम कैसे और किन लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों अथवा न्यायसंगत मुक़दमे के मूल्यों के अंतर्गत ऐसी ’जन अदालतों’ के मुक़दमों तथा सज़ा देने के फ़ैसले को स्वीकार कर लें?
जम्मू और कश्मीर तथा उत्तर-पूर्व में सशस्त्र बल सोचते हैं कि वहां रहने वाले सभी लोग ’संदेहास्पद’ हैं; वे ’सभी पर संदेह करो’ के नारे के साथ बड़ी होर्डिंग्स टांगते हैं। क्या आप भी उसी तरह नहीं कर रहे हैं। आपके निर्णय में प्रत्येक सीपीएम समर्थक या व्यक्‍ति हरमद गैंग का अंग है और छद्‍म रूप में पुलिस बल के लिए काम कर रहा है। जब तक वे जनता के सामने आत्म-समर्पण नहीं कर देते, तब तक उन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी। ऐसे तरीक़े आपकी सत्ता के लिए ज़रूरी होंगे, लेकिन ये मूल्यों की भावना से रहित हैं। आप लोगों ने कई ’मुखबिरों’ को मृत्यु दंड दिए हैं; कोई नहीं जानता कि अभी और कितनों का ऐसा ही हश्र होगा जब तक कि बाक़ी लंपट लोग जनता के आगे आत्मसमर्पण नहीं कर देते। यह इसलिए क्योंकि सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि इस बारे में आप क्या सोचते हैं। आपने कहा है : “उन लंपटों को खुला छोड़ देने का मतलब संघर्षशील तथा क्रांतिकारी जनता को संयुक्‍त बलों के हाथों सौंपना होगा।“ (प्रेस विज्ञप्ति, 16-08-09) मनोवैज्ञानिक क्रिस्टोफ़र बोलास ने जो कहा है उसके प्रकाश में देखिए, “जब हत्यारा किसी को मारता है तो प्रत्येक समय यह उसकी ही मौत होती है जिसे वह टालता है।“ इसका मतलब है कि ऐसे आक्रमण भय तथा आशंका के चलते होते हैं। सवाल है कि: अगर उस क्षेत्र में आपका सामाजिक आधार है, तो मुखबिरों को सामाजिक तौर पर अलग-थलग कर देना संभव है। वहीं दूसरी तरफ़, अगर आपके राजनीतिक विरोधी विचारधारात्मक संघर्ष करते हैं, और ऐसे ठप्पा लगाकर उन्हें शारीरिक रूप से ख़त्म कर देते हैं, तो इससे स्पष्‍ट प्रतीत होता है कि आप लोगों की गतिविधियों में कहीं प्रचंड ’अतार्किकता’ का समावेश है। यथार्थ में, लालगढ़ मृत्यु की घाटी हो गया है, और वहां से मौत का संदेश चारो तरफ़ घूम रहा है। क्या जासूसों/गुप्‍तचरों से लड़ने के लिए उनको मारने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है? आप लोगों के नेतृत्त्व में उन मुखबिरों का पर्दाफ़ाश करने के लिए लोग क्या कोई तरीक़ा नहीं अपनाते? मार्क्स ने गुप्‍तचरों का पर्दाफ़ाश करने के लिए दास कैपिटल को लिखना छोड़, हेर वोग्ट नामक एक पूरी किताब ही लिख डाली थी। और माओ तो इनमें से कुछ ही को ख़त्म करने के पक्ष में थे।
ऐसे मामलों में, प्रचार और पर्दाफ़ाश करने की कोशिश जहां एक तरफ़, कोई नकारात्मक सामाजिक प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न करेगी, वहीं दूसरी ओर, राज्य आपको ख़त्म करने की न सिर्फ़ किसी ग़ैर-क़ानूनी कोशिश में बल्कि सामाजिक तौर पर भी सक्षम नहीं हो पाएगा। अगर यह नहीं किया जाता है, तो हम एक भयंकर स्थिति का सामना करेंगे: अचलायमान, उसी तरह के मानव जन होंगे। हिंसा, प्रति-हिंसा, दमन तथा प्रति-आक्रमण से ग्रस्त स्थितियों में लोकतांत्रिक लोगों को गोलबंद करना और प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद करना संभव नहीं होगा। हम जो तीसरी शक्‍ति (जो न तो राज्य के साथ हैं और विचारधारात्मक आधारों पर न तो आपके साथ) से ताल्लुक़ रखते हैं अपने आप को असहाय स्थितियों में पाएंगे। एक विकल्प के रूप में, लालगढ़ में निर्मम राज्य दमन के ख़िलाफ़ लोकतांत्रिक आदोलनों को एकताबद्ध कर एक तूफ़ान खड़ा करने में हम सक्षम थे, तभी तो हमने यह पाया कि हम नागरिक समाज के लोग, जो लोकतांत्रिक भावनाओं से ओतप्रोत तथा सिंगूर तथा नंदीग्राम में मिले सबक़ से प्रेरित हैं, शक्‍तिशालियों पर कमज़ोरों की विजय सुनिश्‍चित कर सकेंगे। प्रारंभिक दौर (नवंबर ’08 से जून ’09) में यह विजय निश्‍चित तौर हासिल हुई थी।
आप लोगों ने कुछ प्रसिद्ध लोगों के बारे में अपना निर्णय करते हुए उन्हें मृत्यु दंड देने का फ़ैसला किया है। जैसा कि आपने कहा है, यह जनता की मांग थी। सालबनी विस्फ़ोट में मुख्यमंत्री को जान से मारने की कोशिश की गई। यह सच है कि मुख्यमंत्री जनसंहार का आरोपी है। यह भी सच है कि नंदीग्राम में 14 मार्च के संहार के बाद पोस्टर और तख़्तियों द्वारा “मुख्यमंत्री को फांसी दो” की मांग की गई थी। लेकिन हम सभी महसूस करते हैं कि ऐसा भयंकर ग़ुस्सा तात्कालिक व्यथित भावनाओं की उपज था। लेकिन अगर उसे मारने के लिए इसे जनता की गंभीर और तार्किक मांग के रूप में व्याख्यायित किया जाता है, तो, मैं कहने के लिए बाध्य हूं, कि यह पूरी तरह बचकाना है। किसी पर ’तानाशाह’ का ठप्पा लगाकर उसे मारने की कोशिश करना, बेतुका और अराजक दर्शन का प्रतीक है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अराजकतावादी दर्शन को नकार कर मार्क्सवाद का दर्शन पूरी दुनिया में स्थापित हुआ है। मार्क्सवाद से लेकर माओवाद तक में दार्शनिक तथा सैद्धांतिक स्तर पर कभी ऐसे व्यक्ति केंद्रित आक्रमणों को स्थापित किया गया हो, मेरी जानकारी में ऐसा नहीं है।
माओ त्से-तुंग के पसंदीदा सैन्य रणनीतिकार कार्ल वॉन क्लॉजेवित्ज़ ने लिखा है, राजनीति की तरह, युद्ध का भी एक विशेष उद्देश्य होता है; लेकिन वहीं युद्ध उस समय राजनीति का निषेध करता है; संबंधित पार्टियां अपने सैन्य बलों को परेड कराने में व्यस्त हो जाती हैं। युद्ध और उन्मूलन विध्वंस को जन्म देते हैं, लेकिन ऐसा विध्वंस न सिर्फ़ दुश्मन का होगा, बल्कि यह आपके पक्ष को भी कुछ नुक़सान पहुंचाएगा। और इस युद्ध का कोई अंत भी नहीं है।
दोस्त और दुश्मन हमेशा एक दूसरे को ’दुष्ट शक्तियां’ ठहराते आए हैं। सवाल है कि; दुष्टों से छुटकारा पाने के लिए हम ख़ुद उसकी ताक़त से प्रभावित हो जाते हैं। हमें एक चेतावनी के महान संदेश को नहीं भूलना चाहिए: “ जो लोग राक्षसों से लड़ते हैं उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में कहीं वे ख़ुद राक्षस न बन जाएं“ (अच्छाई और बुराई से परे)। प्रति-हिंसा, प्रति-आक्रमण – यह सभी मानव जाति की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं हैं। इनके लिए किसी विशेष दर्शन की आवश्यकता नहीं होती। दर्शन, दूसरी ओर, तार्किक चिंतन के साथ ऐसी प्रतिक्रियाओं को रोक सकता है, नीतियां बनाते समय नैतिकता तथा मानवीय मूल्यों की धारणाओं को अविछिन्न तत्त्व बना सकता है। मुझे लगता है कि इन मामलों पर आप लोगों की गंभीर सीमाएं हैं।
अभी हाल ही में, पुलिस ने आपके दो प्रमुख सदस्यों को गिरफ़्तार किया, लेकिन उन्हें समय से न्यायालय में नहीं पेश किया। अपनी प्रेस विज्ञप्ति में आपने ठीक ही दावा किया था कि पुलिस ने 24 घंटों के भीतर उन्हें न्यायालय में पेश न करने क़ानून का उल्लंघन किया है और नागरिक अधिकार संगठनों से हस्तक्षेप करने की अपील की थी। आपने उन्हें फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार दिए जाने की उचित आशंका ज़ाहिर की थी। लोगों के प्रतिरोध को देखते हुए पुलिस को उन्हें न्यायालय में पेश करने के लिए बाध्य होना पड़ा। उसके पहले, आपने बुद्धिजीवियों से अपील की थी कि वे लालगढ़ आकर स्वयं देखें कि संयुक्त बलों ने वहां किस तरह का बर्बर उत्पात मचाया है।
ऐसा करते हुए आपने साबित किया है कि, अगर इस संरचना में भी, ’क़ानून के शासन’ को सही तरीक़ों से लागू किया जाए और अगर इसके समर्थन में लोकतांत्रिक आवाज़ें बुलंद की जाएं तो तो राज्य की कुछ ग़ैर-क़ानूनी, मानवाधिकार विरोधी तथा बुरे उद्देश्यों से संचालित गतिविधियों का प्रतिरोध किया जा सकता है। हमारी ज़िम्मेदारी क्या ऐसे सभी मोर्चों को मज़बूत करने की नहीं है ताकि राज्य द्वारा जनता को नागरिक अधिकारों की रक्षा के वायदे के क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके। ऐसे दायरे जैसे ही और बढ़ेंगे, वैसे ही फ़र्ज़ी मुठभेड़ों, संघर्षशील जनता की हत्याओं को रोका जा सकेगा और ’अपराध की संस्कृति’ को अलग थलग तथा परास्त किया जा सकेगा।
यह सब करने के बदले, हम किसी को अपहृत करें, उसे दमित करें और उसके बाद उसे मार कर उसकी लाश गलियों में फेंक दे तो हम ख़ुद राज्य की ही तरह शोषक हो जाएंगे। आपको उन बच्चों के सदमों की ज़िम्मेदारी लेनी ही चाहिए जो उन्हें अपनी ही आखों के सामने हत्या होते देखकर लगेगा। हत्याओं का यह तरीक़ा संवेदनशील लोगों को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा। हम कैसे राज्य के विकृत चेहरे के बदले मानवीय मूल्यों पर टिका समाज निर्मित करने में लोगों को ख़्वाब देखने में सक्षम बना पाएंगे? उसी तरह के निंदनीय तौर-तरीक़ों को अपनाकर हम कैसे इन सपनों को साकार कर सकेंगे?
आपने दावा किया है कि जंगल महल ने सभी लोगों के सामने यह सवाल उपस्थित किया है कि: “आप लालगढ़ में संयुक्त बलों के जारी दमन अभियान का समर्थन करेंगे या हरमद वाहिनी सहित संयुक्त सशस्त्र बलों द्वारा छेड़े गए अत्याचारों के ख़िलाफ़ पुलिसिया दमन विरोधी जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में लालगढ़ की जुझारू जनता के साहसी प्रदर्शन तथा प्रतिरोध आंदोलनों का समर्थन करेंगे? (वक्तव्य, दिनांक, 16-08-09) आपने सभी लोगों से लालगढ़ आंदोलन के पक्ष में खड़े होने की अपील की है।
हममें से कई लोग पुलिसिया अत्याचारों के ख़िलाफ़ आंदोलन को समर्थन और लालगढ़ की जनता की मांगों को निःशर्त पूरा करने की मांग करते रहे हैं। सवाल यह नहीं है। हममें से कई लालगढ़ आंदोलन में आपके समर्थन को भी ग़लत नहीं मानते रहे हैं।
आंदोलन के चरित्र में रूपांतरण के साथ ही समस्या खड़ी होने लगी। यह आपके हिंसा के अनुप्रयोग से जुड़ने लगा। कहने की ज़रूरत नहीं है कि, आप इसे अंतर्विरोधों को देखने के बनाये मार्क्सवादी ’दो-युग्मी’ मॉडल के खांचे का इस्तेमाल कर रहे हैं – या तो कोई इस तरफ़ है या उस तरफ़ यानी दुश्मन की तरफ़; आपमें से कोई इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि कोई तीसरे, चौथे या पांचवी जगह पर भी खड़े होकर आंदोलन के पक्ष में खड़ा हो सकता है। इस ’देखने के इतिहास’ पर विद्वानों ने काफ़ी कुछ लिखा है।
हम लगातार जारी राज्य हिंसा तथा इस राज्य में मुख्य सत्ताधारी दल द्वारा किए जा रहे दमन की निंदा करते हैं। साथ ही, हम यह भी महसूस करते हैं कि आप लोगों की घोषित उपस्थिति ने जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में हुए जनउभार तथा आंदोलन की दिशा को पृष्ठभूमि में धकेल दिया। वहीं दूसरी तरफ़, आपके नेतृत्त्व में चल रहे सशस्त्र संघर्ष में कुछ ऐसे नकारात्मक तत्त्व हैं जो इससे राज्य हिंसा के विरुद्ध जनसमर्थन हासिल करने के पक्ष में खड़े हैं। आप इसे महसूस करते हैं या नहीं, हम नहीं जानते। इस इक्कीसवी सदी में – मानवाधिकारों की चेतना के युग में, किसी भी प्रतिरोध आंदोलन में, विशेषकर जो सशस्त्र हो, कुछ वैश्विक चुनौतीपूर्ण धारणाएं उभरी हैं, जिसे हम ’न्यूनतम अमूर्तन दृष्टि’ कहते हैं, जिन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर सूत्रबद्ध करते समय इन्हें ’बुर्जुवाजी’ कहना सिर्फ़ आत्मघाती ही होगा।

जंगल महल से जवाब
किशनजी
बंगाल में मानवाधिकार आंदोलन की शुरुआत 1970 के दशक के प्रारंभ में नक्सलबाड़ी आंदोलन के कमज़ोर पड़ने के बाद हुई। अगला कुछ दशक क्रांतिकारी आंदोलन में रिक्तता का दौर था; मानवाधिकार आंदोलन इस संदर्भ में विकसित हुआ।
मानवाधिकार आंदोलन ने पिछले चार दशकों में, शोषित जनता के पक्ष में खड़े होकर एक स्वर्णिम भूमिका निभाई है। सुजातोबाबू उन्हीं दिनों से संघर्ष की अगली पंक्ति में रहे हैं। उन दशकों में नागरिक अधिकार आंदोलन ने भी कुछ ठोस आकार गृहण किया। यह मॉडल शोषित जनता के पक्ष में खड़े होने का मॉडल था। जब, 1980 के दशक में आंध्रप्रदेश तथा भूतपूर्व बिहार में क्रांतिकारी आंदोलन फिर से उठ खड़ा हुआ, नागरिक अधिकार आंदोलन अपनी सीमाओं में एक संकट से जूझने लगा। यह वह समय था जब जनता ’शोषित जनता’ की छवि से निकलने के लिए उठ खड़ी हुई और उसने ”प्रतिरोधी बहादुर जनता” के रूप में अपनी पहचान क़ायम की। अतः नई स्थितियों में नागरिक अधिकार आंदोलन का पुराना मॉडल उपयुक्त नहीं बैठ पा रहा था। राज्य ने आंदोलन को निर्धारित सीमाओं में बांधने के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। इसने मानवाधिकार अंदोलन के भीतर बहसों तथा अंतर्विरोधों को जन्म दिया। रामनाथन आर पुरुषोत्तम उस दौर में आंध्र प्रदेश में मानवाधिकार आंदोलन के बेहतरीन प्रतिनिधि थे।
पश्चिम बंगाल का मानवाधिकार आंदोलन इन संकटों से अभी भी अछूता था। ऐसा इसलिए कि बंगाल का क्रांतिकारी आंदोलन, अभी भी, राजनीतिक परिदृष्य में अपनी प्रासंगिकता हासिल नहीं कर पाया था।
आज लालगढ़-जंगल महल के आंदोलन ने मानवाधिकार आंदोलन के सामने एक सवाल उपस्थित किया है। क्या नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, जो ’शोषित जन’ के पक्ष में अपने आप को खड़ा पाते थे, उसी तरह अपने आप को ’प्रतिरोधी बहादुर जनता’ के पक्ष में खड़ा करने में सफल होंगे? लालगढ़-जंगल महल आंदोलन ने दो प्रमुख सवालों को ज्वलंत बनाया है:
1) अंतिम विश्लेषण में, क्या जनांदोलन को मुख्यधारा के नेताओं\नेत्रियों को अपना शोषण करने देने का मौक़ा देना चाहिए? या जनता को इसे श्रेणीबद्ध करने में सक्षम होना होगा कि वे ख़ुद अपना उत्थान कर सकें?
2) क्या फ़ासीवादी क़ानूनों के ख़िलाफ़ लड़ने वाली जनता को इन नेताओं/ नेत्रियों का हाथ थामते हुए संवैधानिक रास्तों से अपनी चमड़ी बचाकर संतुष्ट हो जाना चाहिए? या फ़ासीवादी दुर्गों को बास्तील जैसे ध्वस्त कर जनता को ख़ुद अपनी रक्षा करनी चाहिए?
हिंसा या प्रति-हिंसा? यह भारतीय राजनीति में कभी ’मुद्‍दा’ ही नहीं रहा। जिसे ’लोकतांत्रिक राजनीति’ कहा जाता है – उस मुख्यधारा की संवैधानिक राजनीति में हिंसा का प्रयोग क्रांतिकारी राजनीति में हिंसा के अनुप्रयोग से कहीं ज़्यादा होता है। अतः क़ानून की भाषा में, यह एक ’ग़ैर-मामला’ (नॉन इश्यू) है। यह राज्य के नीति निर्माताओं द्वारा लालगढ़ आंदोलन से पैदा हुए दो प्रमुख मुद्‍दों को दफ़नाने के लिए आगे किया हुआ एक ’ग़ैर-मामला’ (नॉन इश्यू) है।
यहां तक कि बुर्जुवाजी क़ानून में भी आत्म-रक्षा के अधिकार को मान्यता मिली है। आत्म-रक्षा के लिए आक्रमणकारी को मार देने के अधिकार को स्वीकार किया गया है, तथापि राज्य द्वारा इस अधिकार का इस्तेमाल क्रांतिकारी जनता तथा क्रांतिकारियों को मारने के बहाने के रूप में किया जाता है। लेकिन जब शोषित जन प्रतिरोधी बहादुर जनता के रूप में तब्दील होकर इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, पूरा संदर्भ बदल जाता है।
फ़ासीवादी शासन से क्या तात्पर्य है? यह रसूख वाले मुट्ठी भर राजनीतिक नेताओं तथा नौकरशाहों का शासन होता है। ज़मीनी स्तर पर, यह राज्य बलों तथा किसी पार्टी के गेस्टापो बलों द्वारा छेड़े गए संयुक्त आतंक के रूप में होता है।
हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि फ़ासीवाद एक अच्छी तरह से संगठित केंद्रीकृत तंत्र होता है। अगर कहीं कोई खामी होती है तो फ़ासीवाद उन कमज़ोरियों के माध्यम से गांवों में हत्याओं, बलात्कार तथा घरों की आगजनी करते हुए घुसता है। जनता के आत्म-रक्षा के अधिकार की मांग है कि कि गांवों में हरमद की परछाई नहीं दिखनी चाहिए, किसी क़िस्म की कमज़ोरियों को पैदा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी जिसके माध्यम से वे किसी भी समय घुस सकें। आज हम छत्तीसगढ़ में ’सल्वा जुडुम’, झारखंड में ’नागरिक सुरक्षा समिति’, तथा बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में ’संत्रास प्रतिरोध समिति’, ’घोस्कर वाहिनी’ और हरमद बलों के रूप में जनसंहार, आतंक, बलात्कार तथा घरों को जलाने वाले हिटलर की गेस्टापो शक्तियों को बल-गुच्छों की तरह उगते हुए देख रहे हैं। यह सब रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हो गया है -- संयुक्त बलों द्वारा जंगल महल पर क़ब्ज़ा करने के लिए 80 से 90 बंकरों की स्थापना, एलएमजी जैसे अत्याधुनिक हथियार तथा केशपुर तथा गोरबेटा की ओर से पुलिस सुरक्षा के साथ हरमद के बड़े शिविर स्थापित किए गए हैं। मीडिया को यह सब भलीभांति मालूम है। वहीं दूसरी ओर, राज्य मुखबिर तथा गुप्त नेटवर्क बनाने के लिए पैसों भरे थैले लेकर एक गांव से दूसरे गांव में घूम रहा है, पुलिस बल भेद किए बिना लोगों को पीट पीट कर दहशत पैदा कर रहे हैं, सभी विद्यालयों को पुलिस कैंप में तब्दील कर दिया गया है और फलस्वरूप युद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न कर दी गईं हैं। ऐसी युद्ध स्थिति में, न्यायिक सिद्धांत के क्या वही डंडे बनें रहेंगे? फ़ासीवादी शासन की स्थितियों तथा सामान्य स्थितियों दोनों में क्या एक ही तरह के डंडे होंगे? गृह युद्ध तथा फ़ासीवाद मानव जीवन में परिवर्तन ला देते हैं। अतः न्यायसंगत सिद्धांतो के डंडे तथा उसकी धारणाओं में भी उसी तरह तात्कालिक तौर पर बदलाव आ जाता है।
मुख़बिरों से छुटकारा पाने के लिए, लोग कई तरह के तरीक़े आजमा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, उनके लालच का दोहन करने के लिए राज्य भी अपनी यथा-शक्ति के हर-संभव सब कुछ करने की कोशिश कर रहा है। अतः मारे गए मुखबिरों की संख्याएं भी बढ़ी हैं। जंगल महल में एक बेहतर व्यवस्था होने के कारण मारे गए मुख़बिरों की संख्या बहुत कम है। दंडकारण्य के विभिन्न हिस्सों में मुख़बिरों को जनता के क़ैद में गिरफ़्तार कर लिया जाता है।
जब तक इस क्षेत्र में संयुक्त बल नही घुसे थे, जासूसों को इतने बड़े पैमाने पर ख़त्म करने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। संयुक्त बलों की तैनाती के बाद स्थितियां बदल गईं हैं। जैसे आत्म-रक्षा की धारणा बदल गई है।
हम भी मृत्यु दंड के विरोधी हैं। हालांकि, युद्ध के समय न्यायिक सिद्धांतों की धारणा सामान्य स्थितियों की धारणा से अलग हो जाती है। युद्ध की स्थितियों में, चिंतन, चेतना, पहलक़दमी तथा अविष्कार की आज़ादी का दायरा बहुत सीमित हो जाता है।
सुजातोबाबू ने कहा है: “आप की घोषित तथा सशस्त्र उपस्थिति ने जनसाधारण समिति के नेतृत्त्व में हुए जनउभार की गति तथा आंदोलन के केंद्रीय ध्यान (फ़ोकस) को पृष्ठभूमि में धकेल दिया।”
सुजातो बाबू! जंगल महल में आपके खुले तौर पर जाने के हक़ को राज्य ने सिर्फ़ एक उद्‍देश्य से छीन लिया है। वह भ्रमित करने वाले सूचना अभियानों (डिसइनफ़ॉर्मेशन कैंपेन) में लिप्त रहने का उद्‍देश्य है। अन्यथा, आप इसे देखने में ज़रूर सक्षम होते कि जंगल महल के हरेक कूचे और कोने से प्रत्येक दिन हज़ारों लोग जुलूस, रैली, घेराव, प्रदर्शन में भागीदारी कर रहे हैं। संयुक्त बलों के भयंकर दमन के बावजूद, जनसाधारण समिति द्वारा प्रारंभ की गई व्यवस्था लोगों को प्रेरित कर रही है। छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के बाद भी जनता की रचनात्मकता क़ायम है। जनांदोलन कितना प्रतिरोधी हो गया है, आपने देखा होगा। जनांदोलन का निरंतर सशक्त होना, जनता की पहलक़दमियां, उनकी गहन चेतना, सच में संघर्ष की एक गाथा लिख रही हैं। अगर आप चाहते हैं, तो हम जंगल महल में आपके आगमन की सारी व्यवस्था करने तथा सुरक्षा प्रदान करने को तैयार हैं। आइये, ख़ुद अपनी आंखों से देखिए, उनकी जांच-पड़ताल कीजिए, अपना नज़रिया बदलिए। और मानवाधिकार आंदोलन की हदबंदी को तोड़कर आगे निकलिए।
माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए तथा इसके 100 नेताओं को ख़ामोश करने के लिए जब केंद्रीय संयोजन के गठन का निर्णय लिया जाता है और जब सीमा सुरक्षा बल के अवकाश प्राप्त महानिदेशक प्रकाश सिंह इस बारे में खुले तौर पर अपनी नाखुशी ज़ाहिर करते हैं, तो यह दिखाता है कि राज्य ने युद्ध छेड़ दिया है, और युद्ध कुछ ख़ास तरीक़ों से लड़ा जाएगा। राज्य द्वारा 100 क्रांतिकारी नेताओं को ख़ामोश (पुलिसिया कोश में किसी को ’ख़ामोश’ करने का क्या मतलब होता है, प्रकाश सिंह ने ख़ुद बताया है।) करने के निर्णय के प्रतिकार के लिए राज्य के बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ सैन्य कारवाई करने की ज़रूरत पड़ी।
सुजातोबाबू ने कहा है कि हिंसक तरीक़ों से हासिल किए गए परिवर्तन कभी दीर्घकालिक नहीं होते। हम उनके इस वक्तव्य को ज़्यादा महत्त्व नहीं दे रहे हैं। हम नहीं मानते कि वे ख़ुद इसमें गंभीरता से यक़ीन करते हैं। इतिहास में अधिकतर युगीन बदलाव हिंसा के बग़ैर संपन्न नहीं हुए हैं। यह हिंसा के माध्यम से ही हुआ कि मध्य युग के सत्ताधारी रजवाड़ों का ख़ात्मा हुआ। एक उदाहरण का ज़िक़्र करते हुए मैं अपनी बात को समेटना चाहूंगा – यह अमरीकन दासता के ख़िलाफ़ ग़ुलाम ड्रेड स्कॉट का है जिसकी पराजय ने गृहयुद्ध को अपरिहार्य बना दिया। यह सत्ता तथा संपति की वासना (चाहना) है जिसने सभी युगों में हिंसा को अपरिहार्य बनाया है।

हिंसा तथा अ-हिंसा
अमित भट्टाचार्या
26 सितम्बर (2009) को द्वारा ’माओवादियों के नाम खुला ख़त’ शीर्षक से लिखे पत्र में लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र, लालगढ़ आंदोलन के कारण और परिणाम को पूरी तरह पचा गए हैं। लालगढ़ या जंगल महल में राज्य का दमन, माओवादियों के ’सशस्त्र संघर्ष’ का परिणाम नहीं है; बल्कि, इस राज्य दमन ने, वंचना और अपमान ने, सालों से चले आ रहे शोषण ने लोगों को ’जंगल पार्टी’ का समर्थन करने तथा प्रतिरोध और अपनी मांगों को मंगवाने के लिए ’सशस्त्र संघर्ष’ अपना कर माओवादी होने के लिए मज़बूर किया। लेखक के वक्तव्य से वास्तव में जो निकल कर आता है वह यह कि सशस्त्र संघर्ष या प्रति-आक्रमण के प्रारंभ ने राज्य दमन को बुलावा दिया, कभी सशस्त्र न होना ही अच्छा है।
आगे लेखक ने हिंसा तथा जन अदालतों के मुक़दमे के द्वारा मृत्यु दंड के अनुप्रयोग की पड़ताल की है। यहां उन्होंने कुछ मुद्‍दों पर रटन्त लगाई है।
उनके वक्तव्य से जो ध्वनित होता है, वह यह कि – और मेरा नज़रिया भी कई अन्य लोगों जैसा यही है – ’लोकतांत्रिक’ संघर्षों को शांतिपूर्ण होना चाहिए, और अगर, यह ’हिंसक’ मोड़ ले लेता है और ’सशस्त्र’ हो जाता है, तब यह अपने ’लोकतांत्रिक’ चरित्र को खो देगा और अलोकतांत्रिक हो जाएगा। सवाल है: क्या यह वास्तविकता कि सिर्फ़ शांतिपूर्ण संघर्ष ही ’लोकतांत्रिक’ हो सकता है? और अगर यह ’सशस्त्र’ और ’हिंसक’ है तो ’अलोकतांत्रिक’ हो जाएगा? इतिहास और व्यवहारिक अनुभव हमें क्या बताते हैं? सामान्यतः हरेक आदमी (सत्ताधारी गिरोहों तथा उनके आज्ञाकारी चाकरों के अपवादों को छोड़कर) शांति चाहता है, भोजन और कपड़े चाहता है और जीवन में गरिमा चाहता है; कोई भी हिंसा या ख़ून ख़राबा नहीं चाहता। यह दमनकारी राज्य होता है जो उन्हें सशस्त्र होने के लिए बाध्य करता है।
लालगढ़ आंदोलन की मुख्य विशेषता राज्य द्वारा छेड़े गए हिंसक आक्रमण को देखते हुए इसका सशस्त्र (तीर धनुष तथा परंपरागत हथियारों से) होना है। वहां राज्य ने जनता के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ रखा है और जनता अपनी तरफ़ से सारा सामर्थ्य लगाकर प्रतिरोध कर रही है। कुछ सीपीएम कार्यकर्ता तथा हरमद वाहिनी के लोग मारे गए हैं। माओवादियों ने ऐलान किया किया है कि उनमें से सभी पुलिस ’मुखबिर’ थे, कि उन्हें पहले चेताया गया था, लेकिन उन्होंने अनसुना किया, तो उन्हें जन अदालत में मृत्यु दंड दिया गया। वे पुलिस ’मुखबिर’ थे या नहीं, यह इस लेखक को नहीं पता है। फिर भी, यह बहुत साफ़ है कि पिछले 32 वर्षों में सत्ताधारी सीपीएम तथा पुलिस प्रशासन के बीच का अंतर हवा में झूल गया है। दो साल पहले, जब नारी मुक्ति संघ की महिला सदस्यों ने बाघा जतिन रेल्वे स्टेशन में पोस्टर चिपकाया, तो उन्हें सीटू/सीपीएम कार्यकर्ताओं द्वारा पकड़ लिया गया, पार्टी ऑफ़िस ले जाकर उन्हें पुलिस को सौंप दिया गया। उसी दौरान, कुछ सीपीएम कार्यकर्ताओं तथा उसकी महिला शाखा की सदस्यों ने मातंगिनी महिला समिति की जादवपुर, कोलकाता के इलाक़े में रहने वाली कुछ सदस्यों को पुलिस को सौंपने की कोशिश की थी। ऐसी कोशिशें प्रमाणित करती हैं कि सीपीएम के कार्यकर्ता पुलिस मुखबिर की भूमिका निभाते हैं।
लेखक मृत्यु दंड के ख़िलाफ़ हैं। मैं मानता हूं, सिर्फ़ वही क्यों, कई सारे लोग सामान्यतः मृत्यु दंड के ख़िलाफ़ हैं। उनका सवाल है: जबकि 224 देशों ने मृत्यु दंड की सज़ा का उन्मूलन कर दिया है, माओवादी क्यों इसे अभी भी दंड के एक तरीक़े के रूप में बरकरार रखे हुए हैं? यहां लेखक ने एक बड़ी भूल की है। यह सवाल देश तथा उसकी स्थापित सरकार के लिए उपयुक्त है; लेकिन यह उनके लिए विचारणीय कैसे है जिनके पास न तो कोई देश है और न ही एक स्थापित सरकार है? यह लेखक सुजातो के साथ एक बिंदु पर पूरी तरह सहमत है: किसी तरह की आगे की कारवाई के पहले पर्याप्त जाच पड़ताल ज़रूरी है; निर्दोष लोगों की जान का किसी भी तरह का कोई नुक़सान पूरी तरह अवांछनीय है।
लेखक की राय में, ’हिंसक साधनों के सहारे बना समाज अल्पकालिक होता है।’ उनसे मेरा सवाल है: सभी तरह के मूलभूत सामाजिक रूपांतरण कहां हुए हैं और वे दीर्घकालीन कहां हुए है? रूस तथा चीन जैसे समाज में, जहां हिंसक साधनों के सहारे परिवर्तन साकार हुए थे, वहां अभी कई तरह के बदलाव आए हैं। फिर, इन समाजों के अल्पकालिक होने के लिए क्या हिंसक साधनों के अनुप्रयोग ज़िम्मेदार हैं? या नए समाज में गहराई से व्याप्त अंतर्विरोधों की वजह से ऐसा घटित हुआ? इतिहास हमें सिखाता है कि समाज का मूलभूत रूपांतरण कभी भी युद्ध और सशस्त्र उभार के बिना आकार नहीं लेता।
लेखक ने हिंसा के सामाजिक प्रभाव का सवाल उठाया है। वे यहां कुछ शहरी बौद्धिकों के बारे में ही क्यों बात कर रहे है? जंगल महल के लोगों पर, उन आदिवासी विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है जो प्रतिदिन राज्य हिंसा का शिकार हो रहे हैं? क्या वे लोगों के प्रतिरोध आंदोलन के बारे में, उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के, जो नंदीग्राम के लोगों जैसे ही सारी रात जाग जाग कर गुज़ारते हैं, और हरमद तथा संयुक्त बलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ खड़े रहते हैं, के बारे में बात नहीं करेंगे?
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ समस्या यह है कि वे कभी राज्य के आस्तित्त्व को चुनौती नहीं देते; इसके प्रतिकूल, वे इसकी वैधानिकता को स्वीकार करते हैं और मांग करते हैं कि राज्य अपनी ’घोषित प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करे।’ उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतन से प्रभावित, वे सिर्फ़ पेड़ देखते हैं, लेकिन जंगल को देखने में असफल होते हैं; उनके लिए, लालगढ़ आंदोलन सिर्फ़ राज्य दमन और ’सशस्त्र विरोधी समूहों’ द्वारा किए जा रहे प्रति-आक्रमण के बीच एक तनाव है। लेकिन, साथ ही साथ लालगढ़ आंदोलन देश में विदेशी पूंजी तथा घरेलू दलाल पूंजी द्वारा जारी प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट के ख़िलाफ़, जन-समर्थक विकास (जन पहलक़दमी तथा स्वैच्छिक श्रम के द्वारा स्वास्थ्य केंद्रों, सड़क, बांध तथा जल संरक्षण के स्रोतों के निर्माण, निचले लोगों तक भूमि के बंटवारे के क्रियान्वयन आदि के कार्यक्रमों द्वारा) को हासिल करने के लिए एक संघर्ष है।
16 सितंबर 2009 को कोलकाता से निकलने वाले दैनिक ’द स्टेटसमैन’ ने ’निश्चित तौर पर हममें से कोई माओवादी नहीं’ शीर्षक से एक गोष्ठी का आयोजन किया। प्रोफ़ेसर जी. हरगोपाल ने वहां अपने व्याख्यान में कहा: “एक ग्रामीण की पत्नी को जब ज़मींदार उठा ले जाता है, अपने घर ले जाकर उस पर यौन अत्याचार करता है और वह ग्रामीण जब अपने दो बच्चों के साथ अपनी पत्नी को वापस करने की प्रार्थना करने ज़मींदार के घर जाता है तो वह उसे भाग जाने का आदेश देता है, तो उस ग्रामीण को क्या करना चाहिए? अहिंसा और शांति का जाप करना चाहिए? या उसे उनका विरोध करने और दुखों के सागर का अंत करने के लिए हथियार उठा लेना चाहिए? ऐसे ही एक मामले में, आंध्र प्रदेश का एक नौजवान सीधे जंगल जाता है, 25000 हज़ार लोगों के समूह को संगठित करता है, ज़मींदार को मार देता है और अंत में उसे माओवादी बना दिया जाता है।“ (The Statesman 17-09-09)
इतिहास हमें सिखाता है कि हिंसा, हत्या – यह सभी अतीत में मौजूद रहे हैं और वर्तमान में भी निरंतर मौजूद हैं। व्यक्तिगत तौर पर हम सभी शांति चाहते हैं; कोई भी हिंसा और हत्या नहीं चाहता। बावजूद इसके, ये हमारी इच्छाओं से स्वतंत्र होते हुए, लगातार जारी रहेंगी, और इतिहास की दिशा को प्रभावित करेंगी और रास्ते में अपना नकारात्मक तथा सकारात्मक असर पीछे छोड़ती जाएंगी।

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