24 अगस्त 2009

कश्मीर में मीडिया

शेवंती निनन
अनुवाद: सत्यम कुमार सिंह
शांति अहिंसा विभाग महात्मा गाधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय
मीडिया और कश्मीर के बीच एक अलग तरह का रिश्ता है शायद देश में कोई ऐसा राज्य नही है जिसने कश्मीर जितना राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कवरेज प्राप्त किया हो और शायद ही दिल्ली को छोड़ कर जनसंख्या अनुपात में मीडिया की इतनी मौजूदगी हो। मगर फिर भी इस राज्य के विकास से संदर्भित सच्चाई को मालूम करना बिल्कुल ही मुश्किल बना हुआ है। क्योंकि यहाॅ सत्य के कई संस्करण हमेशा बने रहते हैं।
देश के अन्य हिस्सों में कश्मीर भले ही सामान्यतः की तरफ लौटता नजर आता हो, शायद ऐसा इसलिए भी क्योंकि वहाॅ अब लगातार चुनाव हो रहे है। लेकिन सैन्यीकरण अब भी बहुत ज्यादा है। वहाॅ जो लोग रहतें हैं वो लगातार बने इस तनाव को महसूस कर सकतें हैं। वहाॅ जाकर ही इसे भली भाॅती देखा जा सकता है। कोई भी छोटी सी घटना अशांति की चिंगारी के लिए काफी होती है। फिलहाल कश्मीरी जनता और मिलिटेंट पत्रकार भारतीय राज्य के सार्मथ के प्रति कम ही चिंतित हैं। कश्मीर पर रिपोर्टिंग करते वक़्त भारतीय पत्रकार इसको नज़र अंदाज कर देते हैं। उनकी रिर्पोटिंग में राष्ट्रवाद का रंग भर जाता है। जब कोई कश्मीरी संवाददाता किसी भारतीय अख़बार अथवा भारतीय पत्रिका के लिए स्टोरी फाइल करता है तो वो इस बात से बिल्कुल आश्वस्त नही रहता कि ख़़बर वैसी ही छपेगी जैसे उसने लिखी/लिखा था। वे जो इन रिर्पोटों को डेस्क या उच्च स्तर पर संपादित करते है, राष्ट्र विरोधी समझ कर कुछ अंशों को हटा देतें हैं। कश्मीरी पत्रकार विशेष सुविधाप्राप्त और अभिशप्त दोनों ही है। पश्चिमी दुनियाॅ के फेलोशिप और प्रतिभागी के रुप में इन युवा पत्रकारांे को खोजा जाता है। यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के किसी भी काॅनफ्लििक्ट् मीटिंग के आयोजन में आयोजक कश्मीर के प्रतिभागी को शामिल करने के लिए आतुर रहतें हैं। वही दूसरी तरफ जो कश्मीर में रहकर राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय व स्थानीय रिर्पोटिंग करतें है उन्हे बमुश्किल ही विरोधी विषयों पर लिखने की स्वतंत्रता रहती है। पत्रकारिता में प्रवेश करने के समय से ही उनका पेशे में काॅनफ्लििक्ट् कवरेज होता है। वो आपको बतायेंगें की ‘‘किसी अन्य विषयों पर रिर्पोटिंग कैसे होती है’’ ये हम भूल चूके हैं।
ये लेख बतायेगा की कश्मीर में मीडिया किस तरह से एक परिवेक्षक न होकर कर्ता की भूमिका अदा कर रहा है।
जम्मू और कश्मीर में जो एक बात समान है वो है एक समृद्धि मीडिया की उपस्थिति। अस्सी लाख की आबादी वाले इस राज्य में मीडिया की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। श्रीनगर में दैनिक अखबारों की संख्या 71 और जम्मू में लगभग 61 है। इनमें से ज्यादातर चार पृष्ठीय ब्लैक एण्ड व्हाइट चित्र वाले कहे जा सकतें है। और जम्मू में चार पृष्ठीय खेलकूद के रंगीन अखबार भी हैं। कम उद्योग वाले इस राज्य में मीडिया एक रहस्यमयी तौर पर बढता उद्योग है। यहाॅ मीडिया में कोई मंदी नही है। इस साल के प्रारम्भ मंे ही साप्ताहिक अखबार ‘‘कश्मीर लाइफ’’ को लांच किया गया, उर्दू दैनिक ‘‘रायजिंग कश्मीर’’ आने को है, और ऐसा ही कश्मीर टाइम्स के उर्दू संस्करण के साथ है। एक हिंदी और अंग्रजी का अखबार भी जम्मू में प्रकाशित होने जा रहा है।
संवाददाताओं और संपादकों से एक-एक बातचीत आपको बतायेगी की कैसे एक ठीक-ठाक संपादक और रिर्पोटर (जो आसानी से नही मिलते) वाले अखबार भी केवल अपने पृष्ठीय क़ीमत और विज्ञापन से अकेले ही लाभ देने वाले है। विज्ञापन की आमद उद्योग के बजाय रिटेल आउटलेट से ज्यादा है और कुछ प्रमुख प्रकाशकों तक ही पहुॅचता है। राज्य सरकार का कुल सालाना विज्ञापन बजट 5 करोड़ का है, जो कुछ बढ भी सकता है परन्तु फिर भी ये 378 प्रकाशकों के इस व्यवसाय को बनाये रखने के लिए फिलहाल पर्याप्त नही है। डीएवीपी विज्ञापन जो केंद्र सरकार के द्वारा दिया जाता है सरकुलेशन के आधार पर राज्य के बहुत ही कम प्रकाशकों को मिलता है। तो फिर विशिष्ट कहानियों के साथ विज्ञापन और बैंक लोन से कश्मीर की मीडिया को रहस्यमयी आर्थिक मदद कौन करता है़? सत्ता के कई प्रतिष्ठान जिसमें राज्य सरकार और इंटीलीजेंस एजेंसियाॅ शामिल हैं सोचती है की जम्मू एण्ड कश्मीर बैंक और मिलिटेंट्स से अब जबकि आज क्षेत्रीय अखबारों को उतना फंड नही मिल पाता जितना उन्हे पहले मिल जाता था। जैसाकि आप संर्घष के पहले ही दिन से आप यह पायेंगंे कि यहाॅ संघर्ष मीडिया के लिए एक बहुत बडा प्रोत्साहन रहा है। 1990 के पहले तक यहाॅ उर्दू के केवल तीन प्रकाशक थे जिसमें कांग्रेस का ‘‘खि़दमत’’ भी शामिल है। द कश्मीर टाइम्स अंग्रेजी का एक मात्र अखबार जम्मू के बाहर से प्रकाशित होता था। आज अखबारों की संख्या अलग ही कहानी कहती है।
कुछ मायनों में पत्रकारों के लिए यह एक आरामदायक जगह है। सरकारी अर्पाटमेंट प्रेस काॅलोनी कई प्रकाशकों को कार्यालय के लिए जगह उपलब्ध कराती हैं। उद्यमशीलता के लिए बेहतर है। यहाॅ तक की एक एनडीटीवी का संवाददाता मंत्री का बॅगला हथियाया हुआ है। ये एक ऐसी जगह भी है जहाॅ श्रमजीवी पत्रकार मीडिया मालिक है। कम से कम दिल्ली प्रेस के 3 प्रतिनिधी खुद का प्रकाशन रखतें है। हालांकि इनका नाम सूचीबद्ध नही है। संर्घष के इस धधकते केंद्र के चलते यहाॅ से कई पत्रकार विश्वव्यापी वृहद यात्रा कर चुके होते हैं। ऐसा पहले नही था जब आपको कश्मीर में पत्रकार बनने के लिए जान जोखिम में डालनी पडती थी। पर आज उत्तर पूर्व काम के लिहाज से एक खतरनाक जगह है।
जम्मू कश्मीर पत्रकारिता की मुख्य रीढ़ केएनएस, सीएनएस, यूएनएस, एपीआई, पीबीआई तथा कुछ अन्य न्यूज एजेंसिंयाॅ हैं। ये सभी मिलकर जम्मू और श्रीनगर के सभी छोटे अखबारों को दर्जनों स्टोरी मुहैया कराती है। जो इन्हे बगैर किसी रिर्पोटिंग स्टाफ के कार्य करने में सक्षम बनाती है। इन एजेंसियों की स्टोरी को कश्मीर के सभी सत्ता के केंद्र पोषित करते हैं। अगले दिन इन्ही में से कुछ स्टोरी स्टाफ बाईलाइन बनती है। राज्य, मीडिया कवरेज को आसान बनाता है। आपको बहुत सारे रिर्पोटर से नही मिलना होता है। आपको केवल ख़बर लेना है या फिर न्यूज एजेंसी से कुछ सामाग्री लीक करनी है। इनका ग्राहक बनना न केवल सस्ता है बल्कि व्यवहार में कभी-कभी ये मुफ्त भी है। उर्दू दैनिक ‘‘निदा-ए-मसरीक’’ के संम्पादक का कहना है ‘‘मैं एक एजेंसी का पिछले चार साल से उपयोग कर रहा हॅू। मैने कोई भुगतान नही किया और अभी तक उन्होने मुझसे कुछ नही पूछा। मुछे कभी एक बिल तक नही आया।’’ जाहिर है जो उनकी स्टोरी का उपयोग करतें हैं न्यूज एजेंसी को उनके भुगतान की जरुरत नही होती, संभवतः वे उन स्टोरीदाताओं से भली प्रकार प्रतिपूर्ति पा लेतें हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर में सत्ता के बहुत सारे केंद्र है और यह भी कि सत्य के कई संस्करण। क्षेत्रीय अखबार किसी विशेष मिलीटेंट संगठन द्वारा बंद कर दिये जाने या फिर उनसे वित्त पोषण द्वारा पहचाने जाते हैं। या फिर इससे कि वह उसको प्रतिबिंबित करता हो जो भारतीय इंटीलीजेंस उनसे करवाना चाहती है। पिछले साल के अमरनाथ भूमि हस्तांरण विवाद के अखबार और केबल टीवी कवरेज से यह स्पष्ट हो जाता है कि जम्मू के अखबार कश्मीर के अख़बार से अलग सत्य को देखते है।
एक कश्मीरी पत्रकार जो दिल्ली के अखबारों के लिए काम करता है कहता है ‘‘पैसा दोनों तरफ से आता है। अखबारों को भी पैसा दिया जाता है पहले तो बढाने चढाने के लिए अगर छेडछाड है तो उसे बलात्कार कहने के लिए आपको पैसा मिलता था.......अब स्थिति बदल चुकी है। मीडिया न केवल प्रोपोगंडा का टूल है बल्कि प्रति विद्रोह का भी साधन है। और प्रोपोगंडा करने वालों और विद्रोह करने वालों दोनो के अपने संस्करण हैं।
इस गर्मी में शोपियाॅं में एक कथित कत्ल और बलात्कार इस बात का क्लासिक उदाहरण है कि सच्चाई को अलग तरीके से कह कर उसका स्वरुप गढा जाता है। 29 मई को दो महिला अपने पारिवारिक सेब बागान से आते समय गायब हुयी और अगली सुबह वो मृत पायी गयी। बलात्कार और क़त्ल करने वाला एक संदिग्ध भी था। एक एफ आई आर काफी कुछ कहता, रिश्तेदारों ने माॅग की लेकिन उसे रजिसटर्ड नही किया गया था। जब पोस्टमार्टम से एटाप्सी हुयी तो परिणाम विरोधाभासी थे और अशंाति के कारण को सच साबित कर रहे थे। जमीनी सत्य के विभिन्न संस्करणों से कैसे रिपोर्ट तैयार किये जातें है यह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तीन अखबार और एक टीवी चैनल की केस स्टडी बताती है। एनडीटीवी एटाप्सी रिपोर्ट को तरजीह दे रही थी तो वही इंडियन एक्सप्रेस और मेल टुडे राज्य द्वारा बयां घटना को प्रश्न करने की तरफ झुके हुए थे। यह एक कथित बलात्कार था जबकि पुलिस की शुरुआती कोशिश इस बात पर जोर देने की थी की वो डूब कर मर गयी होगीं। द हिंदू ने इसी सिद्धांत पर भरोसा किया जबकि क्षेत्रीय अखबारों का कहना था कि डूब के मरने के लिए नदी काफी छिछली थी।
जबकि क्षेत्रीय नेता लगातार विरोध करते रहे और घटना दबने का नाम नही ले रही थी। तब एक जाॅच पडताल की टीम और एक न्यायिक आयोग ने महिलाओं के मरने की दशा की छानबीन की। इसने पुलिस के द्वारा सबूत के साथ छेड़छाड वाली एक अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। और यह पुलिस के अपराध में शामिल होने के संदेह का कारण था।
कश्मीर के पत्रकार आपको बिल्कुल अनौपचारिकता में यह बतायेंगे की शेष भारत के टिप्पणीकारों और रिर्पोटरों के राष्ट्रवादिता से लगातार विचलित किए जाते रहे है। कश्मीर में मीडिया की स्थिति पर बात करते हुए श्रीनगर की एक बैठक में उर्दू अखबार के एक सम्पादक का कहना था ‘‘मनोवैज्ञानिक रुप से हम सभी मिलीटेंट हैं।’’ और तब जब वो स्पष्टतः कहें कि हम कश्मीरी पहले हैं। भारत के टेलीवीज़न में छोटे सुरक्षा विशेषज्ञों और भूतपूर्व राजनयिकों को अलगाव वादी राजनेताओं के विरुद्ध देखते समय साफ जाहिर होता है कि वो स्वयं को राष्ट्रीय हित के पक्ष में रख रहें है। संर्घषरत राज्य मणिपुर में इम्फाल से प्रोफेसर लोकेंद्र इस प्रवृत्ति को बेहतर तरीके से समायोजित करते हैं। मेरे साथ एक साक्षात्कार में उन्होने कहा था ‘‘मुख्य धारा की मीडिया सोचती है कि वो राष्ट्र है। वो ये नही सोचती की राष्ट्र को कौन बनाता है।’’

2 टिप्‍पणियां:

  1. शायद यही लेख कथादेश के ताजे अंक में पढ़ा है....पर यहाँ देखकर ख़ुशी हुई

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  2. कश्मीर में सत्य के कई संस्करण होते हैं यह बात उन लोगों के लिए ठीक है जो कश्मीर को केवल मीडिया के माध्यम से जानते हैं. लेकिन कश्मीर में कदम रखते ही कुछ सत्य तो इतने साफ़ होते हैं कि वह हवाओं में तैर रहे होते हैं उन्हें देखने के लिए किसी जीनियस की जरुरत नहीं होती. कश्मीर के लोगों के लिए सत्य बहुत साफ़ ही नहीं है बल्कि वे उनके अस्तित्व को पूरी तरह आच्छादित किये होते हैं. वे सत्य वहां काटों की तरह गडे हैं.

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