11 अगस्त 2009

श्री कृष्णमोहन का जन संस्कृति मंच से निष्कासन

जन संस्कृति मंच श्री कृष्णमोहन को तत्काल प्रभाव से संगठन से निष्कासित करता है. ग्यातव्य है कि ११-१२ जुलाई को सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव लिया गया था. प्रस्ताव में 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' की मार्फ़त 'सलवा जुडुम' जैसे जघन्य कार्य कराने वाली तथा डा. विनायकसेन जैसे मानवतावादी चिकित्सक को 'छत्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिटी ऎक्ट' जैसे काले कानून में फ़ंसाने, फ़र्ज़ी मूठभेड़ों तथा दूसरे मानवाधिकार के मसलों पर दुनिया भर में निंदित सरकार द्वारा वाम, जनवादी और प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों को साज़िशाना तरीके से एक खास समय में अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की निंदा की गई थी. इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किसी भी आयोजन या पुरस्कार से कोई ऎतराज़ नहीं है. लेकिन यह कार्यक्रम तो उनकी स्मृति का भी शासकीय अपहरण था. श्री कृष्णमोहन. जो अब तक जसम की राष्ट्रीय परिषद में थे, इस कार्यक्रम में शामिल थे. उनसे उक्त प्रस्ताव की रोशनी में लिखित तौर पर स्पष्टीकरण मांगा गया था जिसका जवाब भेजने की जगह उन्होंने एक ब्लाग पर उद्दंड भाषा में संगठन पर अनर्गल बातें कहीं. कार्यकारिणी के सभी सदस्यों से विचार विमर्श के उपरांत, अधिकांश की राय के अनुसार, प्रस्ताव की भावना के अनुरूप श्री कृष्णमोहन को जन संस्कृति मंच से निष्कासित किया जाता है।
http://dakhalkiduniya.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html
(जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ओर से के. के. पाण्डेय द्वारा जारी)

19 टिप्‍पणियां:

  1. यह पूरा मामला तमाम जनवादी ताकतों की आवाज दबाने या उन्‍हें बदनाम करने की साजिश है। इस मुद्दे पर बहुत पहले शंकर गुहा नियोगी वाले छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने एक करारा जवाब दिया था। यह आज संदीप के ब्‍लॉग पर ताजा पोस्‍ट से पता चला है। लिंक देखें
    http://shabdonkiduniya.blogspot.com/2009/08/blog-post.html

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  2. प्रगतिशीलों के साथ रहोगे, ऐसे ही निष्काषित होते रहोगे।

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  3. श्री कृष्णमोहन को जन संस्कृति मंच से निकाले जाने का कोई दुख नहीं होगा । गोली मारिये ऐसे जन संस्कृति मंच वालों को । वैसे भी वहाँ न कोई जन है, न कोई संस्कृति और मंच तो है ही नहीं ।

    तानाशाही जहाँ भी होगी, कृष्ण मोहन जैसे लोगों के साथ यही हश्र होता रहेगा । जनवाद वह नहीं है जहाँ एक व्यक्ति हाँके और लोग आँख बंद करके उसका अनुसरण करते रहें ।

    जनवाद होता, जन संस्कृति होती ऐसे लोगों के एजेंडे में तो वहाँ बस्तर में वर्षों से नरसंहार करनेवाले माओवादियों के खिलाफ़ आक्रोश होता । जन संस्कृति मंच वाले तो उल्टा मानवाधिकार के बहाने आदिवासियों के हत्यारों को बचाने में लगे हैं । यह कितनी मूर्खता है कि ऐसे लोगों को केवल विनायक, हिमांशु का दर्द दिखाई देता है, लाखों हजारों सीधे-गूँगे आदिवासियों का नहीं । भगवान बचाये इस देश को ऐसे जन संस्कृति मंच वालों से........

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  4. मूर्खो,

    मैं प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान का कार्यकारिणी सदस्य और लेखक होने के नाते इतना तो जानता ही हूँ कि यह कार्यक्रम किसी भी कोण से सरकारी नहीं था । न तो सरकार द्वारा प्रायोजित, न समर्थित और न ही आयोजित ।

    दूसरा तथ्य यह भी कि संस्था के चैयरमेन के पुलिस महानिदेशक हो जाने मात्र से संस्था को प्रतिक्रियावादी घोषित करने की साजिश भी पूर्णतः मूर्खता, जड़ता और सास्कृतिक गुंडागर्दी का नायाब नमूना है ।

    जो छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के पक्षधर हैं या उनसे हमदर्दी रखते हैं वे मूलतः फासीस्ट हैं । और फासीस्टों की संस्था से हट जाना ही श्री कृष्ण मोहन के लिए उचित है । जसम की कुंठा के आगे नतमस्तक न होकर श्रीकृष्ण मोहन ने जिस लेखकीय विवेक और अधिकार का परिचय दिया है हम उसका तहेदिल से स्वागत करते हैं ।

    डॉ. राजेन्द्र सोनी
    संपादक, पहचान यात्रा
    कार्यकारिणी सदस्य
    प्रमोद वर्मा स्मृति मंच, रायपुर
    छत्तीसगढ़

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  5. मैं जसम के द्वारा कृष्ण मोहन को निकाले जाने का घोर विरोध करता हूँ. यह ठीक नहीं हुआ है. इस तरह जसम ने साबित कर दिया है कि वे लोग कितने घमंडी हैं. वे अनपढ़ लोग साहित्य संस्कृति और विचारों को स्तालिन की तर्ज़ पर नियंत्रित करना चाहते हैं. ये लेखकों को अपना चाकर बनाना चाहते हैं. ये न लेखक का कोई सम्मान करते हैं, न विचारों का. इनके लिए बस इनका कहा ही अंतिम है और वही प्रमाण है. किसी बहस की या विचार विमर्श की कोई ज़रुरत नहीं. ये मार्क्सवाद की अपनी अधूरी और अनपढ़ समझ का घमंड करते हैं और अपने सिवा सबको सूली चढाने को तैयार रहते हैं. मार्क्स की विनयशीलता इनको किसी दुसरे ग्रह की चीज़ लगेगी. मुझे बोरिस पास्तरनाक और उनके उपन्यास डॉ. जिवागो की याद आ गयी. ऐसा लेफ्ट की हिस्ट्री में बार बार हुआ है. इसीलिये बुध्धिजीवियों की लेफ्ट सत्ताओं से कभी नहीं पटी. ज्दानोव रूस में बाकायदा कविता कंट्रोलर के राजकीय पद पर थे. उन्होंने अन्ना अख्मातोवा जैसी प्रतिभाशाली कवियत्री का जीवन नष्ट कर दिया. तमाम उदाहरण हैं. कल को ये लोग सत्ता में आ गए तो साहित्य का क्या हाल करेंगे, सोच कर ही डर लगता हैं.

    नरेश निझावन

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  6. आलोक गुप्ता14 अगस्त 2009 को 6:36 pm

    कृष्ण मोहन को जसम से निष्कासित कर ही दिया गया. इसी की उम्मीद थी जसम से. जसम के अनपढ़ नेताओं का ख़याल है कि उन्हीं के इशारों पर यह दुनिया चलती है. इन्होने साबित कर दिया कि इतिहास से इन्होने कोई सबक नहीं लिया है. ये स्तालिन के वंशज हैं और किसी भी तरह की असहमति बर्दाश्त नहीं कर सकते. इनका बस चलता तो ये कृष्ण मोहन को साइबेरिया भिजवा देते. या किसी लेबर कैंप में भिजवा देते.

    आलोक गुप्ता

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  7. महावीर जैन16 अगस्त 2009 को 12:07 am

    कृष्ण मोहन जी आप गम न करें. जसम आप जैसे विद्वान साहित्य साधक की जगह नहीं थी. आपका वहां का सदस्य बनना ही गलत था. यह बस एक गलती का सुधार हुआ है.

    जसम में तमाम घूसखोर आ गए हैं. ये दिन में रिश्वत जम कर लेते हैं और रात को मंहगी शराब के प्यालों में क्रांति करते करते हैं.

    जसम के जाहिल और अनपढ़ नेता अपने सदस्यों की चिरकुट कविताओं की वाह वाही करते हैं. घटिया कविताओं पर ये लम्बे लम्बे लेख लिखते हैं.

    जसम के सर्वेसर्वा विश्वविद्यालयों में सुंदर महिलाओं के साथ सुखी जीवन जीते हैं और उनकी बीबियाँ गाँव में उपले पाथती हैं.

    क्या कीजियेगा ऐसे जसम का. जसम के जो अन्दर हैं उनका दम घुटने लगा है. आप लकी हैं जो आपका पिंड छूटा.

    महावीर जैन

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  8. हे नीच महावीर जैन,तुम्हारे मुंह में बवासीर हुआ है.अपनी औकात पर उतर ही आए.पुलिस की मुखबिरी करो, ज़्यादा अच्छा धंधा है. कहां इधर ब्लाग की दुनिया में निकल आए. साहित्य की दुनिया बहुत छोटी है. तुम्हारी कल्पना शक्ति प्रखर है. अपना हित भी ठीक पहचानत्ते हो, दलाली तुम्हारे लिए अच्छी रहेगी. साहित्य की दुनिया में तो हर छोटा बड़ा एक दूसरे को अच्छी तरह जानता है. संघ का प्रशिक्षण भी तुम्हारे काम आएगा ही.

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  9. कृष्ण मोहन को जसम से निष्कासित कर दिया गया. यह दुखद है लेकिन कृष्ण मोहन का कुसूर भी मामूली नहीं है. जसम के नोटिस का ज़वाब उन्होंने ऐसी अभद्र और अशालीन भाषा में एक ब्लॉग पर दिया. कोई भी संगठन ऐसी अनुशासनहीनता स्वीकार नहीं कर सकता. हमें कृष्ण मोहन से सहानुभूति है क्योंकि मुक्तिबोध पर उनकी किताब वाकई बहुत अच्छी है. वे एक योग्य आलोचक हैं. लेकिन इतने बुध्धिमान होते हुए भी उन्होंने ऐसी अभद्र और अस्वीकार्य हरकत क्यों की, समझ पाना मुश्किल है. उन्हें चाहिए कि वे आत्मालोचन करें और अपनी भूल सार्वजनिक रूप से स्वीकार करें.

    भगवान दास

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  10. पीयूष सक्सेना17 अगस्त 2009 को 7:54 pm

    कृष्ण मोहन का पतन बहुत दुखद है.

    पीयूष सक्सेना

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  11. महावीर जैन18 अगस्त 2009 को 8:53 am

    मिस्टर रमेन्द्र, आप तो सीधे गाली गलौज पर उतर आये. इस तरह तो यही प्रमाणित हुआ कि आप अलोकतांत्रिक, असहिष्णु और हिंसक हैं. लगता है कभी सभ्य समाज में नहीं उठे बैठे अन्यथा ऐसी भाषा का इस्तेमाल न करते और असहमति का सम्मान करते.


    महावीर जैन

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  12. महावीर जैन18 अगस्त 2009 को 8:53 am

    मिस्टर रमेन्द्र, आप तो सीधे गाली गलौज पर उतर आये. इस तरह तो यही प्रमाणित हुआ कि आप अलोकतांत्रिक, असहिष्णु और हिंसक हैं. लगता है कभी सभ्य समाज में नहीं उठे बैठे अन्यथा ऐसी भाषा का इस्तेमाल न करते और असहमति का सम्मान करते.


    महावीर जैन

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  13. वेद प्रकाश19 अगस्त 2009 को 8:47 am

    जसम से कृष्ण मोहन को बाहर करना बिलकुल सही कदम है. उनके गैरजिम्मेदाराना, अशिष्ट और अराजक कृत्य को माफ़ कर पाना नामुमकिन है. वे अपने निजी जीवन में जातिवादी हैं. हिन्दी की पूरी प्रगतिशील परंपरा को गाली देते हैं. ऐसा शख्स किस प्रकार जसम का सदस्य बना, इसकी जांच होनी चाहिए. अब प्रगतिशील होना या वाम पक्ष के साथ नज़र आना लाभ का सौदा नहीं है इसलिए तमाम लोगों ने बेशर्म तरीके से पाला बदल लिया है. वाम को गाली देते हुए बाज़ार में खड़े हो गए हैं. कहते अब भी अपने को वाम हैं, सही वाम. मुंह फाड़ कर जो मुंह में आये बकते रहते हैं. सबको घमंडी तरीके से गाली देते रहते हैं, लेकिन कभी सपने में भी आत्मालोचन नहीं करते. मुक्तिबोध वगैरह का नाम केवल अपना करियर बनाने के लिए लेते हैं.

    ऐसा शख्स बाहर किया गया, ठीक है. लेकिन जसम सोचे कि मेंबर बनाने से पहले क्या वे सावधानी से जांच करते हैं ? क्या कोई भी ऐरा गैरा नथ्थू खैरा सदस्य बन सकता है. अब भी बहुत सारे ऐसे हैं जो जसम में केवल अपनी एक जनपक्षधर इमेज बनाने के लिए हैं. वे समझते हैं कि जसम में शामिल होकर अब तमाम कुकर्म करने के लिए फ्री हैं. कोई प्रॉब्लम आयेगी लड़ने के लिए जसम साथ है ही.

    वेद प्रकाश

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  14. अनुपम हजेला20 अगस्त 2009 को 8:35 am

    अब समय बदल गया है. कौन कब और कहाँ पाला बदल ले कुछ नहीं कह सकते. अब प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, जैनेन्द्र, अज्ञेय, रेनू आदि का समय थोड़ी है. इनके विचार कुछ भी थे, वो सचमुच उनके विचार थे. अपनी आस्थाओं के लिए वे मर सकते थे. अब का ज़माना हित लाभ के आधार पर विचार बदलने का है.

    आपका प्रिय लेखक आपको धोखा देकर शत्रुओं के साथ कभी भी मिल सकता है.

    यही कृष्ण मोहन ने किया.

    यही उदय प्रकाश ने किया.

    मुश्किल यह है कि कल को यदि वाम सत्ता में आ जाये तो ये लोग फिर पाला बदल लेंगे. ये लोग इतने शातिर हैं कि पोलित ब्यूरो में बैठे नज़र आयेंगे और लेखकों को उपदेश झाडेंगे.

    अनुपम हजेला

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  15. बिश्वम्भरनाथ पाण्डेय3 सितंबर 2009 को 10:00 pm

    कृष्ण मोहन को जसम से बाहर का रास्ता दिखा कर बिलकुल ठीक किया गया. बदतमीजी बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है, वह भी खुलेआम अपने साथियों से दगा करके मानवता के दुश्मनों के साथ खडा हो जाने वाले व्यक्ति की. लेकिन वरिष्ठ आलोचक मि. परमानंद श्रीवास्तव पर चुप्पी क्यों. उदय प्रकाश की भी काफी भर्त्सना हो चुकी है. कृष्ण मोहन की भी काफी भर्त्सना हो चुकी है. इसलिए कि ये लोग उतने पावरफुल नहीं ? परमानन्द श्रीवास्तव भी गोरखपुर के उस बदनाम फंक्शन में थे. सुना है उनने योगी के चरण स्पर्श भी किये थे. कोई यह भी कह रहा था कि उनने उनकी चरण रज लेकर अपने माथे पर लगाई थी. इसकी भर्त्सना में एक शब्द भी क्यों नहीं कहा गया. जबकि यह शख्स अपने को मार्क्सवादी, जनवादी, प्रगतिशील जाने क्या क्या कहता है.

    उत्तर स्पष्ट है. आप सब दोहरे मापदंडों के हो. परमानन्द श्रीवास्तव युवा कहानीकारों की समीक्षाएं लिखते है. वो उन्हें प्रमाणपत्र बांटते हैं. वो लेखकों के कैरियर बनाते और बिगाड़ते हैं. उनसे बिगाड़ करने में आप सब डरते हो.

    जबकि आप जानते हो, परमानन्द श्रीवास्तव या कोई भी लेखक नहीं बनाता बिगाड़ता. परमानन्द श्रीवास्तव जैसों के पास एक छद्म सत्ता है. वह वास्तविक लेखक का तो सामना ही नहीं कर सकती. उनकी बचकानी समीक्षाएं छुटभैयों और खूबसूरत लेखिकाओं को ही प्रसन्न कर सकती हैं.

    परमानन्द श्रीवास्तव को भी सारे मंचों से बाहर किया जाना चाहिए. इन लोगों ने पब्लिक को बहुत मूर्ख बना लिया. अब इनका खेल ख़त्म होना चाहिए. परमानन्द श्रीवास्तव एक व्यक्ति नहीं एक प्रवृत्ति है, वो भी एक घ्रिनास्पद प्रवाती जिसके पर्दाफाश होने का वक़्त बहुत पहले आ चुका था.

    बिश्वम्भरनाथ पाण्डेय

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  16. Although Shri Parmanand Srivasta was present in the Gorakhpur function, it is a blatant lie that he touched feet of Yogi Adityanath or took his "charan-raj". I was present in that function and I am witness that Shri Srivastava did nothing like this. He remained almost silent during entire function and his facial expressions were unhappy. He was there very reluctantly and his entore body languange was telling that he was in great pain, undergoing an inner turmoil.


    Madan Dixit

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  17. अब परमानन्द श्रीवास्तव पर एक खामखाँ की बहस शुरू हो गयी लगती है. हिंदी में आप लोगों के पास बहुत फालतू टाइम है. जब किसी भाषा में सृजन रुक जाता है तब पैदा हुए वैक्यूम को भरने के लिए ऐसी फालतू बहसें जन्म लेती हैं. हिंदी में १.१.२००९ से अब तक आयी एक भी इम्पोर्टेंट कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक या आलोचना बताइए.

    प्लीज़ अब यह सब बहुत हो चुका. हम लोग बोर हो चुके हैं. दिमाग का दही बन गया.

    सत्ती

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  18. . श्याम शर्मा8 सितंबर 2009 को 8:08 pm

    कृष्ण मोहन जी कौन हैं ? कृपया कोई सज्जन उनके और उनकी पुस्तकों और साहित्यिक कामों के बारे में कुछ जानकारी नेट पर दे दें तो धन्यवादी होंगें.

    श्याम शर्मा

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  19. shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame.shame

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