27 अप्रैल 2010

तुम्हारी चुप्पियाँ और उनकी हत्यायें

वहाँ की खबरें नहीं रही हैं बेसक ये खबरें हत्या और कत्ल के रूप में आयेंगी पर युद्ध की खबरों के चेहरे ऐसे ही होते हैं. उनके लिये और उन सबके लिये सूचना क्रांति असफल हो चुकी है, जो जंगलों की रक्षा महज खनिज संसाधनो की लूट के लिये नहीं करते, जिनके लिये आदिवासियों को अपनी जमीन पर जीने का उतना ही हक है जितना दिल्ली में प्रधानमंत्री को. उन्हें अपनी सुरक्षा का भी हक है जबकि बारूद और बंदूक आदिवासियों की खोज नहीं रहे.
उन तक संसद में महिला आरक्षण की चर्चायें वर्षों बाद तक नही पहुंच पायेंगी और पहुंचने के कोई अर्थ भी नहीं, उन्हें शायद दिल्ली का नाम ही इसलिये पता है कि वहीं कहीं के आदेश पर सेना उनकी महिलाओं के स्तन काटने के लिये भेजी जाती है और दो वर्ष के बच्चों की उंगलिया भी, कहीं ये उंगलियाँ बड़ी होकर तीर चलाने लायक हो जाय कि देश का भविष्य इन उंगलियों से असुरक्षित है. आस-पास जब हत्या या हत्या का भय इतना फैला हो जितना जंगल, तो जीने के लिये भूख मिटाने की भी जरूरत कितनी कम होती है. भय से उपजा क्रोध शरीर में सिथिलता नहीं आने देता. भूख से उनके मौत की ख़बर कितनी पीछे छूट गयी है, मलेरिया से हो रही मौतें और सूखे की तबाही दब सी गयी है. शिक्षा के बारे में बात करना कितना हास्यास्पद होगा जबकि स्कूल सेना के कैम्प बन चुके हैं.
२५ साल से एक पूरी आबादी ने इस तथाकथित सभ्य दुनिया से हत्या का दंश ही झेला है. जिस समाज को तुम पिछड़ा कहते हुए उसे मुख्य धारा में शामिल करना चाहते हो उसका पिछड़ापन क्या यही है कि वह अपनी संस्कृति को बचाना चाहता है, बाजार में नहीं ढालना चाहता, जबकि बाजार कोसों दूर रहते हुए उसे अपने दुकान पर ला रहा है. रायपुर की सड़कों पर बस्तर की नकली कलायें सजाइ जा रही हैं. एक महिला अपनी पीठ पर लकड़ी का गट्ठर और कांख में बच्चे को दबाये हुए जा रही है, तीर कमान लिये एक आदिवासी की निगाह कुछ ढूंढ़ रही है. जंगल से उनकी तमाम मुद्रायें तक उठा लाई गयी हैं. रायपुर की सड़कों पर क्या वे सच में इतनी सहज होंगी. यह सहजता उसी वक्त छीन ली गयी थी जब फूलोबाई को जलावन लकड़ी लाने के जुर्म में पीटा गया. जिस समाज के नकलीपन को लाकर राजधानी की सड़क पर खड़ा किया गया है, उसकी असली दुनिया को जलाकर कितना तबाह किया गया पिछले सालों में, कि खुद पता नहीं उन्हें जंगल में कितने ठिकाने बदलने पड़े. शान्ति अभियानों के झूठ शायद अब किसी से छुपे हुए नहीं रहे. वे गाँव, इतिहास लिखे जाने के इंतजार में हैं जिन्हें बार-बार जलाया गया, पहाड़ों में छुपाये गये जिनके अनाजों को इसलिये नष्ट किया गया कि लोगों को मजबूरन सरकारी कैम्पों पर निर्भर होना पड़े. अब जबकि वहाँ सेनायें कूच कर चुकी हैं और जंगलों को घेरा जा रहा है कितने चुप हैं अखबार सिवाय यह कहने के कि अंबानी दुनिया के पाँच सबसे धनी लोगों में शामिल हो गये हैं.
बस्तर के कोंडा, तुरपुरा और कनेरा गाँवों को छोड़कर जलधर, मनकू और पैतू अपनी कमसिन उम्र में ही रायपुर गये हैं, इनकी कुशलता इतनी ही है. बाकी ये इतने अकुशल हैं कि न्यूनतम मजदूरी का एक हिस्सा ही इन्हें मुनासिब हो पाता है. इन्हें न्यूनतम मजदूरी के बारे में कोई जानकारी नहीं यह उनके मजदूर बनने की शायद पहली पीढ़ी है जो इन बड़ी मशीनों के बीच अपने को सहज कर रही है. स्पंज आयरन की फैक्ट्रीयों से उड़ती धूल और जंगलों की हवाओं का फर्क इन्हें कितना सालता है, यह सोचने की मोहलत इन्हें नहीं ही मिल पाती होगी. बड़ी मशीनों के बीच इनके काम के घंटे भी बड़े हैं और बारह घंटे काम करने के बाद वक्त इतना ही बचता है कि उसे नींद साथ ही गुजारा जा सके. अपने रंग और गंध के साथ किसी भी बाहरी आदमी से इन्हें मिलने में संकोच है. सिलतरा की सैकड़ों फैक्ट्रीयों के अहाते के किसी कोने में इनकी झुग्गियाँ बना दी गयी हैं और ठेकेदारों के रहम--करम पर ये सब जीने को मजबूर हैं, बस्तर लौटने का खयाल इन्हें मजदूरी मिलने के साथ हर बार आता है और उनमे से कोई एक जाकर सबके हिस्से का थोड़ा-थोड़ा बस्तर ले आता है. इनके लिये अपना गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर जाना एक नयी शुरुआत है इससे पहले बस्तर ने इन्हें छोड़ा था इन्होंने बस्तर को, सूखे में जब छत्तीसगढ़ दूसरे राज्यों के ईंट भट्ठों पर होता, तब भी इस जिले के आदिवासियों कों जंगलों ने कहीं जाने से बचा लिया. यह आंकड़ा शायद कभी दर्ज नहीं किया जा सकेगा कि देश में बनाये गये कंक्रीट के मकानों में जो ईंट लगी है, देर तक जलने के बावजूद छत्तीसगढ़ी पसीने की महक उसमे बची हुई है.
तथाकथित सभ्य समाज ने अपनी पहचान के खिलाफ लड़ना छोड़ दिया और अब तो इनकी सभ्यता उस देश की सभ्यता में लगभग ढल चुकी है जो बर्बर युद्ध के जरिये दुनिया के तमाम देशों को लकतंत्र का पाठ पढ़ा रहा है. क्या आदिवासियों को सभ्य बनाने के लिये, उनके जमीन पर कब्जेदारी के लिये, देश की फौज द्वारा छेड़े गये गृहयुद्ध में कोई फर्क नजर आता है भले ही स्थानों का नाम इराक, अफगान या बस्तर हों.

19 अप्रैल 2010

सरकार अपना भरोसा खो चुकी है

जिंदगी की कीमतें रुपयों से नहीं चुकायी जा सकती। चाहे वह 40 लाख हो या उससे भी अधिक। आदिवासियों की जिंदगी की भी और सेना के जवानों की भी। न ही किसी की जिंदगी को कम करके आंका जा सकता है – पर यह होता रहा है। स्थान, व्यक्ति, वर्ग के लिहाज से घटनाओं की महत्ता कम या ज्यादा हो ही जाती है। यही विभेद है। ये वर्गीय विषमता की मानसिकता व वर्गीय संरचना की निष्पत्तियां हैं। जहां एक आदिवासी की जिंदगी, एक जवान की जिंदगी, एक नेता की जिंदगी और एक कॉर्पोरेट की जिंदगी, सबकी जिंदगियां अलग-अलग अहमियत रखती हैं चूंकि इनके काम स्तरीकृत हैं, उच्च और निम्न आधारों पर, कुछ-कुछ चतुर्वर्णीय व्यवस्था जैसा ही लगता है, हमारा लोकतंत्र भी।
ग्रीनहंट ऑपरेशन के दौरान दांतेवाड़ा में “शहीद” हुए 76 जवान और छह महीने में “मारे” गये 170 आदिवासी, जिनमें माओवादी भी शामिल हैं – इसके पीछे की वजह हमें तलाशनी होगी। जबकि इस घटना के बाद सरकार युद्ध की भाषा बोलने लगी है। क्योंकि किन्‍हीं भी आधारों पर यह देश के मानव संसाधन व आर्थिक संसाधन की क्षति का ही मामला बनता है और अपने ही लोगों के खिलाफ युद्ध, जो अघोषित रूप से जारी था, जिसे घोषित करने की मनोदशा में सरकार दिख रही है, अलोकतांत्रिक है।
जब भी यह कहा जाता है कि आदिवासी मारे जा रहे हैं, तो मानवाधिकार कार्यकर्ता व अन्य सामाजिक संगठनों के लोगों की आवाजें सरकार के खिलाफ निश्चित तौर पर बुलंद हो जाती है और आम जनमानस की भी यही धारणा बन चुकी है – पर माओवादियों का मारा जाना सहज है। मीडिया के लिए भी, मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए भी और उन लोगों के लिए भी, जो इन जंगलों से दूर हैं यानी हम सबके लिए। दरअसल इस पूरी प्रक्रिया में माओवादी अछूत की तरह हैं। बीते जमाने के वे अछूत जिन पर किसी तरह की प्रताड़ना, प्रताड़ना के दायरे से बाहर थी। जवानों का मारा जाना दुखद है। आदिवासियों का मारा जाना भी दुखद है। पर अगर आदिवासी ही माओवादी हों तो, जो कि है भी आदिवासियों का सशस्त्रीकरण व राजनीतिकरण ही उनका माओवादी होना है। पर माओवादियों पर जब भी बात होती है तो वह इस रूप में कि वे देश के भूभाग से कहीं बाहर की कोई प्रजाति हैं। जबकि ग्रीनहंट में मारे गये व पिछले कुछ वर्षों में चलाये गये तमाम अभियानों में जिन माओवादियों को निशाना बनाया गया है उनमें अधिकांश आदिवासी ही हैं। तो क्या अंततः आदिवासियों का ही कत्लेआम हो रहा है? यह एक कठिन सवाल है, जिसके उत्तर एक घटना को केंद्र में रख कर नहीं तलाशे जा सकते बल्कि पिछले 60 वर्षों के इतिहास का पन्ना हमें पलटना ही पड़ेगा। यदि इतना पीछे न भी जाएं तो 1990 के बाद जो आर्थिक सुधार हुए, उन सुधारों की खामियां हमे जरूर पहचाननी पड़ेगी। अब सवाल आदिवासियों के मारे जाने का नहीं, माओवादियों के मारे जाने का नहीं बल्कि आदिवासियों के माओवादी बनने की प्रक्रिया का है। क्योंकि माओवादियों का मारा जाना उन आदिवासियों का मारा जाना है जिन्होंने शस्त्र उठा लिये हैं, जिन्होंने अपने क्षेत्र में अपनी सरकारें बना ली हैं, भारत सरकार से अलग, जिन्हें उन लाखों आदिवासियों का समर्थन प्राप्त है जो जंगलों में रहते हैं और मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह गये हैं। यह अलग सरकार का चुनाव, अलग संरचना का निर्माण, ठीक वैसा ही है जैसा कि हम संसद को चुनते हैं, जैसा हमारे सांसदों को हमारा समर्थन प्राप्त है, दोनों की प्रणालियां कार्य करने के तरीके में फर्क हो सकता है पर शायद इसमे कोई फर्क नहीं दिखता कि सरकार वही चला रहा है, जिसका जनता समर्थन कर रही है। दंडकारण्य में भी और दिल्ली में भी। बावजूद इसके कि सरकार चलाने के तौर तरीके अलग-अलग हैं। मसलन पानी पीने के लिए वे तालाब खोदते हैं, कुंए खोदते हैं, तो हमारी सरकार एक और बोतलबंद पानी की कंपनी खोल देती है।
ऐसे में समस्या एक संप्रभु राष्ट्र में दो समानांतर सरकारों के होने का है, जो एक दूसरे को अमान्य घोषित कर रही हैं और शायद संघर्ष भी इसी बात का है। यह राज्य की वैधता की लड़ाई बन गयी है। वहां के आदिवासी भारत सरकार को वैध मानने से इनकार कर रहे हैं। भारत सरकार उनके द्वारा बनायी “जनताना सरकार” को। और खतरा इसी बात का है, जिसे सरकार सबसे बड़ा मान रही है कि यदि यही भ्रूण अलग-अलग हिस्सों में निर्मित होता गया, लोग सरकार से असंतुष्ट हो अपनी सरकारें बनाते गये, अपनी संरचना बनाते गये तो यह भारत राष्ट्र और संसदीय लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए खतरा होगा। संसदीय लोकतंत्र के लिए माओवादियों के शस्त्र उठाने से ज्यादा खतरा उस संरचना से है, जो वे निर्मित करते जा रहे हैं या जिसे उन्होंने मुक्त क्षेत्र में निर्मित कर रखा है।
1980 से लेकर अब तक भारत सरकार द्वारा अलग-अलग तरीके से कई प्रयास किये जा चुके हैं, विकास की योजनाएं चलाकर, सैन्य अभियान चलाकर, शांति अभियान “सलवा-जुडुम” के जरिये और अब ग्रीन हंट आपरेशन। ये अभियान एक तरफ तो विफल हुए हैं, दूसरी तरफ आदिवासी और भी सशस्त्रीकृत हुए हैं। भारतीय सेना जितने विकसित तकनीक के शस्त्रों का प्रयोग करती है, उनसे छीनकर ये भी अपने को समृद्ध बनाते गये हैं। आखिर इन अभियानों की विफलताओं के क्या कारण रहे हैं, क्या नये अभियान चलाने से पूर्व इन विफल अभियानों का ठीक-ठीक मूल्यांकन किया गया? शायद नहीं। यदि किया गया होता तो आदिवासियों का सशस्त्रीकरण और न बढ़ता जो सलवा जुड़ुम जैसे बर्बर अभियानों के बाद और भी बढ़ा। इन कार्यवाहियों ने आदिवासियों को और भी असुरक्षित बनाया व सुरक्षित होने के लिए और भी ज्यादा शस्त्रीकृत होने पर मजबूर किया। उन पर की गयी क्रूरताओं ने उनमें और भी ज्यादा असंतोष पैदा किये। अपने ऊपर हुए जुल्मों से वे और भी उग्र हुए। इसी उग्रता को सरकार ने उग्रवादी करार दिया। क्या उनका उग्र होना नाजायज था? अगर किसी आदिवासी परिवार ने किसी माओवादी को खाना खिला दिया, रास्‍ता बता दिया, तो इसके लिए उस परिवार के सदस्‍यों को पीटा जाना या उनके घर जला देना कहां तक जायज है?
यही वे कार्यपद्धतियां रही हैं, जिन्होंने आदिवासियों के मन में सरकार के प्रति असंतोष पैदा किये और माओवादियों से उनकी निकटता बनती गयी। क्योंकि माओवादी उनके जीवन की मूलभूत चीजों, रोजगार और तेंदू पत्ता की कीमतों, खेती की उनकी जमीनों व अन्य संसाधनों को मुहैया कराने व व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए एक संरचना, संघर्ष के साथ विकसित करते गये। उनके लिए एक अलग ढांचा विकसित किया जो सरकार के ढांचे से अलग जंगल की परिस्थितियों के अनुकूल था। न्यायिक व्यवस्था, सुरक्षा समिति, कृषक समिति आदि। इस ढांचे ने आदिवासियों में माओवादियों के प्रति विश्वास पैदा किया। माओवादी और आदिवासी पानी में मछली इसी तरह हुए, जिसे वे स्वीकार करते हैं। जिसमें सरकार विफल रही क्योंकि सरकार जिस तरह का विकास चाहती थी, उसके पैमाने अलग थे और आदिवासियों को उनकी परिस्थिति के मुताबिक अस्वीकार थे। टाटा और एस्सार के लिए लाखों आदिवासियों को अपने घर से विस्थापित होना अस्वीकार था और सरकार विकास के नाम पर यही कर रही थी। आदिवासी समाज का विकास निश्चित तौर पर इन कंपनियों की स्थापना से नहीं होना है, बल्कि यह उनके शोषण की एक और कुंजी ही बनेगी, उनकी जिंदगी में और भी खलल बढ़ेगा। वर्षों पूर्व की उनकी संस्कृति को यह नष्‍ट ही करेगी और इन सबके लिए आदिवासी समाज तैयार नहीं है।
आदिवासियों का विश्वास जीतने के बजाय उन पर क्रूर कार्यवाहियां की जा रही हैं। जिस दिन दंतेवाड़ा में 76 जवानों को मारा गया, उसके एक दिन पहले ही दंतेवाड़ा के तोंगपाल थाना के सिदुरवाड़ा गांव में 26 आदिवासी महिलाओं को जगदलपुर से आये कोबरा बटालियन के 200 जवानों ने पीटा, जिसमें महिलाओं के हाथ तक टूट गये। जबकि इन महिलाओं का दोष यह था कि जब कुछ ग्रामीणों को नक्सली समर्थक बताकर जवान ले जाने लगे तो इसका इन महिलाओं ने विरोध किया। क्या इन कार्यप्रणालियों से सरकार आदिवासियों में विश्वास पैदा कर सकती है। दमित बनाकर वह उन पर शासन जरूर कर सकती है पर यह गैरलोकतांत्रिक संरचना का ही हिस्सा होगा बल्कि यह आदिवासियों को सरकार के खिलाफ ही खड़ा करेगा। वहीं दूसरी तरफ माओवादियों ने आदिवासियों में इस विश्वास को इस हद तक अर्जित किया कि उन्होंने जिस मुक्त क्षेत्र का निर्माण किया, उसकी सुरक्षा के लिए आदिवासी शस्त्र लेकर अवैतनिक कार्य करने लगे। जैसे यह उनके अपने राज्य, उनकी अपनी जमीन व जमीन की रक्षा का मसला हो। निश्चित तौर पर यह एक सामुदायिक चेतना के तहत ही संभव था।
भारत सरकार रक्षा बजट पर सर्वाधिक खर्च करती है और आज भी यह स्थिति नहीं है कि वह अवैतनिक सेवा देश की जनता से ले सके। कारण कि जनता को यह महसूस होना ही चाहिए कि देश उसका उतना ही अपना है, जितना किसी नेता का। जितना प्रधानमंत्री का। जितना व्यवसायियों का। पर क्या उन्हें यह महसूस हो पाता है? क्या न्यायिक व्यवस्था में उन्हें बराबरी का न्याय मिल पता है? शायद नहीं। लिहाजा यह मामला सरकार की कार्यपद्धति के साथ उसकी संरचना से निर्मित हो रहा है। जहां सरकार एक बड़े वर्ग को बेहतर संरचना देने में असफल हुई है।
ग्रीनहंट जैसे ऑपरेशन या वायुसेना के प्रयोग से इस समस्या का समाधान संभव नहीं दिखता। सिवाय इसके कि बड़ी और बड़ी संख्या में आदिवासियों का कत्लेआम ही होगा, और प्रतिरोध के तौर पर सेना के जवानों के भी क्षत-विक्षत होने की संभावना बनती है। इस तरह की दमनपूर्ण कार्यवाहियों के बजाय सरकार को आदिवासियों की मूल समस्या को उनकी जमीनी हकीकत के मुताबिक चिन्हित करना होगा और वहां पर विकास की उन योजनाओं को चलाना होगा जो आदिवासियों के जीवन से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। मसलन वहां की स्वास्‍थ्‍य सेवाओं को बहाल करना होगा, स्कूल को सेना का कैंप बनाने के बजाय वहां शिक्षकों की नियुक्ति कर शिक्षा का बेहतर प्रबंध करना होगा ताकि वह विश्वास आदिवासियों में अर्जित किया जा सके जो कि माओवादियों ने अर्जित किया है। ♦ चंद्रिका

12 अप्रैल 2010

दंतेवाड़ा से भोथरी होती संवेदना

दंतेवाड़ा में ऑपरेशन ग्रीन हंट को अंजाम देने निकले सीआरपीएफ के 75जवानों का माओवादी हमले में मारा जाना माओवादियों पर भारी पड़ने वाला है. गृहमंत्री पी चिदंबरम अब सवाल करने पर यह बता रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के उस हिस्से में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं करने के बारे में पुनर्विचार करेंगे.

इससे घटना से दो दिन पहले लालगढ़ में जब पी चिदंबरम माओवादियों को कायर बता रहे थे ठीक उसी दिन माओवादियों ने उड़ीसा में सुरक्षा बल के दस जवानों को मार डाला. अब इस बड़े हमले को कई लोग चिदंबरम के कहे का जवाब मान रहे हैं. लेकिन ऐसा मान लेना मुश्किल लगता है कि माओवादियों ने सीआरपीएफ के एक बटालियन को इसलिए उड़ाया क्योंकि उन्हें गृहमंत्री का जवाब देना था. सवाल-जवाब की स्थिति तब बनती है जब एक प्लेटफार्म पर बैठकर बात की जाए. लालगढ़ के इस घोषणा से गृहमंत्रालय राजनीतिक लाभ की स्थिति में आना चाहती थी कि उसने अपनी तरफ से बातचीत की छूट दे रखी है और माओवादी कायर की तरह दुबके हुए है और यह भी कि कायरता के मारे दुबकना किसी डर का परिणाम नहीं है बल्कि वे लोकतांत्रिक स्पेस का उपयोग करना ही नहीं चाहते. पिछले कुछ दिनों में गृहमंत्रालय की तरफ़ से बातचीत करने की घोषणा को तमाम जगहों से दोहराया गया है. ख़बर यहां तक आई थी कि माओवादी महाश्वेता देवी और अरुंधति राय की मध्यस्थता में बातचीत करने को तैयार है. फिर ये उपक्रम पार्श्व में चले गए और कहीं पुलिस ने माओवादियों को गोली मारी तो कहीं माओवादियों ने पुलिस कैंप को जलाया और रेल की पटरी उड़ाई. ऐसे में गृहमंत्री ने लालगढ़ से पुनः बातचीत का प्रस्ताव रखा. माओवादियों ने बातचीत के लिए सरकार से यह अपील की थी कि पहले उन इलाकों से सशस्त्र बल हटाएं जाए जहां माओवादी सक्रिय है ताकि वे आश्वस्त हो सके कि यह वाकई एक ईमानदार पहल है. इस घोषणा के बाद दो-तीन दिनों के लिए युद्धविराम की स्थिति बनी थी लेकिन अर्धसैनिक बलों और पुलिस को उन इलाकों से नहीं हटाया गया जिसकी मांग की जा रही थी. इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवान माओवादी उन्मूलन के लिए ही गए थे. गृहमंत्री एक तरफ बातचीत की पहल करते है और दूसरी तरफ अर्धसैनिक बल की टुकड़ियों को जंगल में भेजते है कि जिनसे बातचीत करनी है उनकी संख्या को न्यून कर दिया जाए. सीआरपीएफ पर हुए हमले के बाद गृहमंत्री कह रहे हैं कि बातचीत अब बेमानी है. माओवादियों की यह स्पष्ट मांग है कि बातचीत तब तक नहीं की जा सकती जब तक पुलिस की तरफ से हमला (या हमले का प्रयास) बंद नहीं किया जाता. सरकार ने माओवादियों के इस मांग को नहीं माना. ऑपरेशन ग्रीन हंट पर सरकार पहले चुप्पी साधे रही लेकिन जब धीरे-धीरे मामला स्पष्ट होने लगा तो कई जगहों पर ऐसे संभावित ऑपरेशन को आंतरिक सुरक्षा के लिए ज़रूरी बताते हुए कुछ सरकारी नुमाइंदों ने इसके पक्ष में सहमति जताई.

दंतेवाड़ा में अगर सीआरपीएफ के जवानों को माओवादी नहीं मारते तो बहुत संभव है कि ख़बर इसके उलट होती और देश भर में ’आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े ख़तरे’ को निपटाने को लेकर जश्न मनाई जाती. हालांकि इस घटना के बाद माओवादियों के इस दुस्साहस को भारतीय अर्धसैनिक बल चुनौती के बतौर ले रही है और अगले कुछ दिनों में दंतेवाड़ा, जगदलपुर और बस्तर के इलाके में भीषण जनसंहार देखने को मिल सकता है. सेना की तरफ़ से त्वरित कार्रवाई की बात की जा रही है. पी चिदंबरम यह आश्वासन दे रहे हैं कि दो-तीन सालों के भीतर नक्सलियों का सफाया कर दिया जाएगा. ’जंगल वारफेयर स्कूल’ में पहले से इसकी कड़ी ट्रेनिंग चल रही है जिसमें यह बताया जाता है कि कैसे गुरिल्ला तरीके से गुरिल्लों को परास्त करना है? लिट्टे का अनुभव दक्षिण एशियाई देशों के सैनिकों में उन्माद भर रहा है. यह अलग बात है कि सेनाओं के बहुत सारे जवानों को यह मालूम नहीं होगा कि श्रीलंका में लिट्टे को ’ख़त्म’ करने के क्रम में बीस लाख से अधिक तमिलों को सुनियोजित तरीके से मार डाला गया.

जंगलों का सही ज्ञान नहीं होना और सुरक्षा (सतर्कता) में हुई चूक को कई बार सरकार की तरफ से चिंता का कारण बताया गया. इसको ख़त्म करने के लिए ’ट्राइबल बटालियन’ बना ली गई है. गुरिल्ले को गुरिल्ले की तरह मारो. आदिवासियों को आदिवासियों से लड़ाओ. सल्वा जुडूम का कार्यक्रम जब फ्लॉप होने लगा और दुनिया भर में इसकी तीखी आलोचना हुई तो सरकार ने इसको ’सब्सटीट्यूट’ कर ’ट्राइबल बटालियन’ बना डाला. यह उसी तरह है जैसे ’नगा बटालियन’, ’गोरखा बटालियन’, ’सिख रेजीमंट’, ’राजपुताना राइफल्स’. इस प्रयास में यह बात अंतर्निहित है कि जब इन बटालियनों की आलोचना नहीं हो रही है तो इसके बीच एक और बटालियन घुस जाने से उसकी आलोचना क्योंकर होगी? तो क्या इन तमाम उपक्रमों के बाद छत्तीसगढ़ के मानचित्र के दक्षिणी हिस्से से आदिवासियों की पूरी क़ौम ख़त्म हो जाएगी? हिटलर के समय जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को मार डाला गया था. यूरोप और अमेरिका मे धनी यहूदियों द्वारा अपनी धार्मिक अस्मिता का देश बनाने के क्रम में पश्चिमी एशिया के फिलीस्तीन में लाखों मुसलमान ख़त्म हो गए. उनकी कई पीढ़ियां कैंप में ही पलकर जवान हुईं और उन्होंने स्वाभाविक तौर पर विद्रोह का रास्ता चुना. छत्तीसगढ़ में भी आदिवासियों की एक पीढ़ी कैंप में पल रही है. यह सरकारी कैंप लोगों के असंतोष को किस सीमा तक बांध के रखती है यह भविष्य की राजनीतिक परिदृश्य तय करेगी.

हालिया घटना के बाद माओवाद को लोगों के बीच क़ानून व्यवस्था की समस्या के बतौर समझाने में अब सरकार ज़्यादा आसानी महसूस करेगी. लोगों में ऐसे तत्त्वों को लेकर नकार और घृणा का भाव और अधिक तीखा होगा. सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद का नारा देने वाली शक्तियां इस पूरी जंग में सत्ता पक्ष के साथ है. मीडिया ऐसी ख़बरों को सनसनीख़ेज तरीके से परोस कर माओवादियों को देश के आंतरिक भाग में ’बाहरी हमलावर’ बता रहा है. ऐसे में लोगों का इस बात में निश्चित तौर पर यक़ीन गहरा होगा कि इस समस्या पर क़ाबू पाया जा सकता है जैसे अफ़गानिस्तान में तालीबान पर पाया गया या फिर इराक में अब तक छिट-पुट तरीके से ’इस्लामी आतंकवाद’ पर पाया जा रहा है. लालगढ़ का हेलीकॉप्टर अब दंडकारण्य का रुख अधिक जनाधार और अधिक आक्रामकता के साथ कर सकेगा.

इस पूरी जंग मे लोग जिस तरह मारे जा रहें है और मारे जाने के बाद प्रत्येक दूसरे पक्ष में जिस तरह का उन्माद पसर रहा है वह बेहद ख़तरनाक हैं. इसमें तर्क-बुद्धि कम और एक-दूसरे को दुश्मन समझ लेने की प्रवृत्ति अधिक हावी हो रही है. ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करने वाले लोग अधिक टुकड़ों में बंट रहे हैं. जो टुकड़ा इन घटनाओं से अपने को अधिक जुड़ा हुआ महसूस करता है वही इसके बारे में सोच रहा है वरना अधिकतर प्रतिक्रियाएं तात्कालिक शैली की है जो मुख्य तौर पर समाचार चैनल के प्रभाव के कारण व्यक्य हो रही हैं. हमारे सामने जिस अंदाज़ में ख़बरें पहुंच रहीं है और ख़त्म हो रहीं है उसने पूरी मानसिकता को ही बदल दिया है. बगदाद में ईरानी दूतावास के पास बम विस्फोट में तीस लोगों का मारा जाना या फिर रूस की मेट्रो बम विस्फोट और दागिस्तान में बम विस्फोट में सौ से अधिक लोगों का मारा जाना हमारी जमी हुई संवेदना को कुरेद नहीं पाता. ऐसा लगता है कि इराक में तो कई वर्षों से लोग मारे जा रहे हैं. मेट्रो मे बम फटना भी कोई नया नहीं हैं. माओवादियों और पुलिसों की आपस में ठनी है और इसमें कभी एक तो कभी दूसरा पक्ष एक-दूसरे को मारते ही रहते है. चार लोगों का मारा जाना और चार सौ लोगों का मारा जाना लोगों पर अलग-अलग असर नहीं डालती. लाश और घटनास्थल की विभीषिका पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और सामने महज संख्या भर रह जाती है. संख्य़ा के साथ कोई संवेदना को कैसे महसूस कर सकता है? युद्ध, बम विस्फोट और मुठभेड़ों ने हमारी चेतना में नियमित चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्थान पा लिया है. इसमें कुछ भी अलग नहीं है. इसने हमारी संवेदनशीलता को भोथरा बना दिया है. सामाजिक प्रभुत्व वाले वर्ग के लिए यह सबसे आनंद और निश्चिंतता का क्षण होता है जब लोग ऐसी घटनाओं में प्रतिक्रिया करना बंद कर दे या फिर वैसी ही प्रतिक्रिया दें जैसा वे चाहते हैं. धीरे-धीरे यह आदत सवाल करने की प्रवृत्ति को बंद कर देगी.

लेखक म.गां.अं.हिं.वि. में मीडिया के जनपक्षधर छात्र हैं पिछले कुछ दिनों से लगातार लेखन व विश्लेषण कर रहे हैं इनसे dilipk.media@gmail.com या मो.- 9561513701 पर सम्पर्क किया जा सकता है

07 अप्रैल 2010

जब देश की सरकार बर्बर हो जाय.

छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में माओवादीयों द्वारा किया गया हमला अब तक का सबसे बड़ा हमला है, कुछ महीने ही बीते हैं राजनांद गांव के उस हमले को जिसे सबसे बड़ा हमला माना गया था, उसके पहले गड़चिरौली में हुआ हमला सबसे बड़ा हमला था और उससे पहले बिहार का जहानाबाद जेल ब्रेक..........शायद हम इस तरह से १९६७ के उस अप्रैल माह तक पहुंच सकते हैं, अब शायद हम स्थान के लिहाज से सिलीगुड़ी के नक्सलवाड़ी गाँव तक पहुंच सकते हैं और शायद तेलंगाना से उसकी भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं या फिर वहाँ से जब आदिवासी बंदूकों और बारूदों से अनभिज्ञ रहे होंगे, जब संसद में भगत सिंह द्वारा बम फेंका गया था, शायद भारत में यह वामपंथ का पहला हमला था, जो हताहत करने के लिहाज से नहीं बल्कि किसान-मजदूर के खिलाफ बन रहे कानून का विरोध था जो अब आसानी से हर साल बनाये जाते हैं. सबसे बड़ा और सबसे पहला...... इसका चुनाव हम आप पर छोड़ते हैं, पर सवाल सबसे बड़े हमले या सबसे छोटे हमले का नहीं है, यह भाषा बोलते हुए हम सिर्फ व्यवसायिक मीडिया की बात अपनी जुबान में डाल लेते हैं इसके अलावा और कुछ नहीं, जब ये घटनायें घट चुकती हैं और सनसनी की आवाजें हमारे कानों में दस्तक देती है तो हम स्तब्ध रह जाते हैं “साक्ड” हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की तरह, हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की तरह जो हर बार कम-अज-कम मुंह से संवेदना और अफसोस जरूर जाहिर करते हैं. खेद प्रकट करना, श्रद्धांजलि देना, यह हमारे सरकार की रस्म अदायगी है, मौत के बाद की रस्म अदायगी और इस रस्म अदायगी में शामिल होते हैं हम सब लोग.
दिल्ली व अन्य शहरों में बैठकर हमारी भूमिका दूसरे दिन सब कुछ भूल जाने वाले दर्शक से ज्यादा और कुछ नहीं होती कि हम भूल चुके हैं कल की घटनाओं को और आज शोएब और सानिया की शादी को लेकर चिंतित हैं, कल ये चिंतायें किन्ही और चीजों में सुमार होंगी और इतने बड़े देश में परसों तक कोई और घटना तो घटित ही हो जायेगी, न भी हो तो समाचार चैनल घटित करवा ही देते हैं और ईश्वर व प्रेत अन्त्ततः हमारे देश के समाचार-चैनलों की रीढ़ हैं ही. कि इन पर प्रतिबंध इसलिये लग जाना चाहिये कि ये चैनल घटना घटित होने के बाद मारे गये लोगों की संख्या गलत बताते हैं और बाबाओं को बैठाकर एक वर्ष पहले लोगों का भविष्य अलबत्ता नापते रहते हैं.
बहरहाल, यह युद्ध है “ग्रीन हंट आपरेशन” पिछले ६ महीनों से जारी युद्ध किसी और देश में नहीं हमारे ही देश के उन जंगलों में जहाँ के आदिवासी माओवादी बन गये हैं, लालगढ़, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा के पहाड़ो और जंगलों में, चलाया जा रहा एक अघोषित युद्ध. शुक्र है कि आप महफूज हैं, इतने महफूज की इनकी खबरें भी आप तक नहीं पहुंचती, शुक्र है कि आप इन जंगलों में नहीं पैदा हुए कि इस युद्ध का अभिषाप आपको भी झेलना पड़ता कि जब इन ६ महीनों में मारे गये सैकड़ो लोगों के चेहरे आपके सपनों में आते और उनके घायल होने की खबरें बिना अखबारों के पहुंचती. खबर मिलती की अभिषेक मुखर्जी, जो लड़का जादवपुर विश्वविद्यालय से आया था, जिसे १३ भाषाओं और बोलियों की जानकारी थी, जिसने आई.ए.एस. का इन्टरव्यू देकर देश का प्रतिष्ठित आधिकारी बनने का रास्ता छोड़ दिया था, उसे ग्रीनहंट आपरेशन में पुलिस ने मार दिया कि पिछले कई दिनों से उसके अध्यापक पिता अपने बच्चे का फोटो लेकर थाने में घूम रहे हैं कि वे पूछ रहे हैं अगर वह मारा गया हो तो उसकी लाश सौंप दी जाय, इस लोकतंत्र में एक पिता को उसके बेटे की लाश पाने का अधिकार होना ही चाहिये, एक माओवादी के पिता को भी. आखिर वह माओवादी बना ही क्यों? हमारे समय का यह अहम सवाल है शायद इसे उस तरह नहीं भूलना चाहिये जैसे चुनाव के बाद नेताओं के जेहन से लोग भुला दिये जाते हैं, जैसे सुबह भुला दी जाती हैं रात सोने के पहले देखी गयी खबरें.
शांति अभियानों के नाम पर सलवा-जुडुम का सच निश्चित तौर पर आप तक पहुंच चुका होगा, ६ लाख लोगों का बार-बार विस्थापन, उनके घरों का जलाया जाना, उनकी स्त्रीयों के स्तन का काटा जाना और वे पाँच साल के बच्चे जिनकी उंगलियाँ इसलिये काट ली गयी कि ये तीर-कमान पकड़ने लायक हो जायेंगी, फिर तो यह देशद्रोह होगा. यह हमारे सरकार की क्रूरता थी, हमारे उस लोकतांत्रिक सरकार कि जिसने समता, समानता, बन्धुत्व को एक मोटी किताब में दर्ज कर ६० साल पहले रख दिया और जिसकी मूल प्रस्तावना को शायद दीमक चाट चुके हैं. आदिवासियों ने इसे अपनी सरकार मानना बंद कर दिया और अपने लोगों की एक सरकार बना ली “जनताना सरकार”. “एक देश में दो सरकारें” यह देश की सम्प्रभुता को खण्डित करना था लिहाजा देशद्रोह भी, पर भला ऐसे देश से कोई देशप्रेम क्यों करेगा, जो जीवन जीने के मूलभूत अधिकार तक छीनता हो, यकीनन आप भी नहीं और गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री भी नहीं, बशर्ते वे गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री न होकर उन जंगलों के आदिवासी होते जिनके घरों को १२ बार जलाया गया, जिनके बेटों का कत्ल उनके सामने इसलिये कर दिया गया कि उन्होंने माओवादियों को रास्ता बताया.
कुछ वर्ष पूर्व तक यह कायास लगाये जाते रहे कि माओवादियों के पास १०००-१५०० या उससे कुछ अधिक सशस्त्र कार्यकर्ता होंगे पर सलवा-जुडुम की क्रूर हरकतों से इनमे कई गुना इजाफा हुआ क्योंकि मुख्यमंत्री रमन सिंह का बयान था जो सलवा-जुडुम के कैम्प में नहीं हैं वे माओवादी हैं. अब जंगल के आदिवासियों को जीने के लिये माओवादी होना जरूरी था और वे सब जो कैम्पों में नहीं आये माओवादी बन गये, शायद सब नहीं भी बने हों पर मुख्यमंत्री ने यही माना और उनपर कहर जारी रहा. धीरे-धीरे कैम्प भी खाली होते गये और कैम्पों से भागकर भी आदिवासी जंगलों में और अंदर चले गये. यह सरकारी संरक्षण से भागकर आदिवासियों का माओवादी बनना था. पर यह सब हुआ क्यों? क्यों उन्हें कैम्पों में लाया जाता रहा? क्यों उन्हें विस्थापित होने के लिये मजबूर किया जाता रहा? क्योंकि टाटा, एस्सार और जिंदल को उन जमीनों पर कब्जा करना था, छत्तीसगढ़ की सरकार ने उनसे समझौते किये थे. सिर्फ जमीन देने के नहीं, आदिवासियों को विस्थापित करने के भी, इन समझौतों में लाखों आदिवासियों की जिंदगी के जुल्म और बेघरी लिखी गयी थी, स्याही से नहीं सरकारी बंदूकों से, बारूद और बंदूक की पहचान आदिवासियों को यहीं से हुई, ये तीर-कमान के परिवर्धित रूप थे, अपनी सुरक्षा के लिये और अपनी सरकार के लिये. जैसा कि हर बार होता है जीत या हार सरकारों की होती है, सिपाही सिर्फ मरने के लिये होते हैं, बस तंत्र का फर्क है.
ग्रीनहंट ऑपरेशन में मारे गये सैकड़ो आदिवासियों और माओवादियों, हमले में मारे गये सैकड़ों जवानों जो इनके विस्थापन के लिये लगाये गये थे किसके लिये मर रहे थे. क्या इसे इस रूप में देखना गलत होगा कि इन दोनों की मौत के जिम्मेदार टाटा, एस्सार, जिंदल के साथ सरकार है. क्या सरकार के लिये देश का मतलब टाटा, एस्सार, जिंदल हैं? क्या इन तीनों के लिये लाखों आदिवासियों को उनकी जंगलों से विस्थापित किया जाना चाहिये? और उस विस्थापन के लिये युद्ध छेड़ देना चाहिये जिसमे सैकड़ो आदिवासी और जवान मारे जायें. यदि अपनी जमीनों से विस्थापन के खिलाफ लड़ना देशद्रोह है तो देश की जनगणना में इन्हीं तीनों को देशप्रेमी के तौर पर शामिल कर लिया जाना चाहिये और देश का नाम पुराना पड़ चुका है इसे बदल देना चाहिये, टाटा, एस्सार और जिंदल, इनमे से कुछ भी रख देना चाहिये, इस देश का नाम. चन्द्रिका

31 मार्च 2010

कहानी: जो अखबारों में दर्ज नहीं हुई

संजय और संगीता लौट गये हैं पर यह कैसे कहा जाय कि वे घर लौट गये हैं. उनके पिता विक्रम सिंह सूर्यवंशी ने जब ज़हर खाकर आत्महत्या की थी तो दोनों की उम्र इतनी कम थी कि पिता को पिता कहने का ठीक-ठीक एहसास भी नहीं रहा होगा, महज ३ साल और ५ साल. आज पाँच वर्षों बाद वे १० और आठ साल के हो गये होंगे और हरियाणा रोहतक के किसी गाँव में अपने नानी के घर अपनी मां धनेश्वरी के साथ रह रहे होंगे या फिर नहीं भी रह रहे होंगे. धनेश्वरी भी अभी तक कितनी बची होगी, बची भी होगी कि नहीं कुछ पता नहीं. शायद हरियाणा की खाब पंचायतों में उसे बैठना पड़ा हो और खाब पंचायतों की ढेरों गुमनाम कहानियों में धनेश्वरी की भी एक कहानी लिखी गयी हो. क्या हुआ होगा इसका बस कायास लगाया जा सकता है, मटियारी गाँव के लोग और विक्रम के घर वाले इस सबसे अनभिज्ञ हैं. घर से एक बार जाने के बाद उनकी ख़बर कौन लेता और क्यों.
विक्रम सिंह विलास पुर के मटियारी गाँव के छोटे किसान थे और अपनी कमसिन उम्र में मजदूरी के लिये हरियाणा चले गये, कि वे किसानी करते होते अगर, उससे घर के खर्चे चल जाते पर घर के खर्चे किसानी से नहीं बल्कि किसानी के खर्चे मजदूरी से चलते थे. फिर मजदूरी भी मिलनी कम हुई तो हरियाणा जाना पड़ा वहाँ की कहानियों के बारे में घर वालों को नहीं पता कि विक्रम क्या करते थे पर समय-समय पर कुछ पैसे भेज देते थे और घर का खर्च चलता रहता था. कुछ वर्षों बाद विक्रम जब वापस लौटे तो धनेश्वरी भी उनके साथ मटियारी आ गयी. धनेश्वरी हरियाणा के रोहतक जिले की थी और काम के दौरान दोनों की मुलाकात हुई होगी दोनों ने साथ रहने का फैसला किया होगा. इसी बीच उनके दो बच्चे संजय और संगीता भी हुए. मटियारी गाँव भी उसी भारतीय समाज का हिस्सा था जिसे सामंतवाद और पूजी आपसी गठजोड़ से चला रहे थे, फिर अपनी मर्जी से विक्रम का शादी करना तो अन्याय ही हुआ. गाँव के मुखिया और जमीदार इसके खिलाफ हुए और साथ में रहने के इस फैसले को अपराध साबित कर डाला. साथ में रहने के इस फैसले के खिलाफ मुखिया के कहने से पूरा गाँव ही हो गया था. वैसे इनके मानने न मानने से क्या होता जब धनेश्वरी और विक्रम ने फैसला कर लिया था, पर यह तर्क उस सामंती समाज के परे था और यह कहने के लिये एक मोटी जुबान चाहिये थी, जो विक्रम जैसे गरीब किसानों के पास तो नहीं ही थी. गाँव की पंचायत बुलायी गयी पंचायत ने पचास हजार का जुर्माना और गाँव को खाना खिलाने की शर्त रखी, तब गाँव के मुखिया अवधेस अग्रवाल ने उदारता भी दिखायी और चावल, दाल जैसी कुछ चीजों की मदद देने की भी बात कही, पर मटियारी गाँव के सात सौ घरों के पाँच हजार लोगों को भोजन कराना एक छोटे किसान के लिये मुश्किल बात थी. विक्रम की माँ गंगाबाई बताती हैं कि अगर इतना पैसा होता तो विक्रम के पिता के पेट दर्द की बीमारी ठीक हो जाती. उनका इलाज हो जाता और वे आत्महत्या न करते. विक्रम से पहले ही वे इसी आभाव और कष्टप्रद जिंदगी के चलते आत्महत्या कर लिये जब हमने भारतीय अपराध ब्यूरो का आंकड़ा देखा तो उसमे उनका नाम नहीं था. गंगाबाई ने कहा पुलिस को सूचित करते तो और भी समस्या होती रोज-बरोज पुलिस आती और न जाने क्या-क्या सवाल पूछती और पैसे भी अलग से ले सकती थी. लिहाजा इस मामले को गाँव तक ही सीमित रखा गया. अब जो होना था तो हो ही चुका था, पुलिस को बताने से वो वापस तो लौट नहीं आते, अलबत्ता कुछ परेशानियां जरूर खड़ी हो जाती. उनकी मौत के वर्षों बाद ब्लाक से दस हजार रूपये मिले थे, पर आप ही बताओ आज के जमाने में दस हजार रूपये से क्या होता है.
गाँव वालो को भोज नहीं कराया जा सका कुछ लोगों ने वहिस्कार सा कर दिया. घर के खर्चे कम तो हो नहीं रहे थे और किसानी से अब कुछ भी नहीं मिल रहा था, दूसरों का भी जोतो तो अपनी मेहनत तक वापस नहीं आती. विक्रम ने अस्सी रूपये प्रति दिन के हिसाब से बगल के एन.टी.पी.सी. में नौकरी करना शुरू कर दिया. ठेके का काम था दिन भर खटना पड़ता था फिर भी समय से पैसा नहीं मिलता था. इन स्थितियों में विक्रम चिड़चिड़ा सा हो गया था. अभावग्रस्तता घरों में कलह को जन्म देती है, अक्सर पत्नी के साथ भी उसकी झड़प हो जाती. कई दिनों तक वह कोई बेहतर काम भी ढूंढ़ता रहा, पर जब गाँव में पढ़े लिखे लड़के बेरोजगार घूम रहे थे तो आठवीं पास को कौन पूछता है. गंगाबाई को अब ठीक-ठीक याद भी नहीं कि सावन के महीने की वो कौन सी तारीख है जब विक्रम घर से निकला.दिन बीत गया, नहीं आया तो दूसरे दिन यह खबर ही आ गयी कि थाने के बगल में नहर के किनारे उसने ज़हर खा कर आत्महत्या कर ली है. सरकार ने कोई मदद नहीं की. सरकार गरीबों की मदद कहाँ करती है? गंगा बाई जब यह कह रही थी तो उनके कहने के आशय में और एक बड़े अर्थशास्त्री के यह कहने के आशय में कि "सत्ता का अपना चरित्र होता है जिसके हित में वह काम करती है" मुझे कोई फर्क नहीं दिखा बल्कि सूत्र वाक्य सा लगा, पर यह गाँव की एक अनपढ़ महिला की बात थी जिसे कभी किसी किताब तो दूर, अखबार की हेड लाइन, में जिक्र भी नहीं होना था.
अब उनकी एक छोटी सी दुकान है, जिसमे उतना ही सामान है जितना एक झोले में भरा जा सकता है. घर की टूटी खपरैल की छाया इतनी है. आसमान पूरा का पूरा नहीं दिखता पर बारिस में इसमे रहने की स्थिति भी नहीं बची है, इसी में अपने परिवार के ६ सदस्यों के साथ जिंदगी कट रही है, भगवान अब तो हमे भी बुला लेता तो अच्छा था....... कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं और देर तक उन्हें आंचल से पोंछती रहती हैं.
धनेस, दिनेस, रामू जो विक्रम के बचपन के दोस्त हैं, हमे विक्रम व गाँव की कई ऐसी कहानिया सुनाते हैं. वे बताते हैं कि अब गाँव में बहुत कम खेत सबके पास बचा है. सब धीरे-धीरे परिवार टूटने के साथ बट गये और कोई खेती करना भी नहीं चाहता, उससे बेहतर है कि कोई और काम पकड़ लो. छः महीने एक आदमी पूरी मेहनत के साथ खेती करे तो पाँच सौ रूपये का भी फायदा नहीं आ पाता. हम जब चलने लगे तो इन्होंने कहा कि आप इनके घर के बारे में कुछ करिये. सरकार से कुछ मदद ही दिलवा दीजिये. पर मैं चुप रहने के अलावा और क्या कर सकता था जबकि सरकार इन आत्महत्याओं पर चुप है.
छत्तीसगढ़ में किसानों के आत्महत्या की अलग-अलग कहानियां लिखी जाय तो ऐसी कितनी कहानियाँ हैं. आत्महत्या के बाद ऐसे कितने घर हैं जो उजड़ गये खुरदुर के वेदराम मराबी के घर की स्थिति यही थी घर नाम से एक छप्पर था जो पूरी तरह से टूट चुका था. जिसमे उनके पाँच कुपोसित बच्चे पडे थे और पत्नी रामकली बीमारी से बेहोसी की हालत में पड़ी हुई थी जिन्हे देखने वाला कोई भी नहीं था. बच्चे इतने छोटे थे कि उन्हें अपने पिता के मौत के बारे में कुछ भी पता नहीं. छत्तीसगढ़ के छोटे किसानों के लिये यह और भी मुश्किल है कि जब वहाँ के लोगों को चावल दो रूपये किलो मिल ही जाता है, तो उनके थोड़े से धान की कोई कीमत ही नहीं आंकी जाती. यानि एक तरफ सरकार गरीब, आदिवासियों को सस्ता चावल भले ही वह घटिया गुणवत्ता का हो इतने सस्ते में मुहैया करा रही है कि उन छोटे किसानों के धान की जो कीमत नजदीकी बाजार में लगनी थी, वह बहुत ही कम हो जाती है. जबकि वहीं बड़े किसान आज भी दूर मंडी में लेजाकर सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य पर कुछ लाभ तो कमा ही लेते हैं, पर यहाँ किसान के बड़े या छोटे होने के सवाल के साथ एक सवाल यह भी जुड़ा हुआ है कि आज कोई भी किसान स्वेक्षा से किसानी करने को तैयार नहीं है. किसानी एक ऐसा व्यवसाय हो चुका है....... यह महज छत्तीसगढ़ की ही स्थिति नहीं है बल्कि पूरे देश की स्थिति यही है. जबकि इतने किसान प्रति वर्ष आत्महत्या कर रहे हैं हम अंदाजा नहीं लगा सकते कि कितने आत्महत्या की दहलीज पर खड़े होंगे.

30 मार्च 2010

पंजाब में किसान नेताओं पर दमनचक्र

प्रधानमंत्री जब इस चुनाव के दौरान पंजाब में चुनावी सभायें कर रहे थे तो लग रहा था कि फिर से पंजाब में हरित क्रांति की तैयारी में हैं और चुनावी व्यस्तता से जैसे ही वे मुक्त होंगे यह क्रांति पल्लवित होती दिखने लगेगी. आज़ादी के बाद किसी सरकार ने किसानों के लिये इतने मुक्त हांथों से कभी कोई बजट नहीं बनाया, पहली बार इतने किसानों के कर्ज माफ किये गये व किसानों के लिये केन्द्र सरकार ने अन्य योजनायें भी बनायी, सरकारी प्रचारतंत्र यह दावा करते रहे. फिर भी किसानों की आत्महत्यायें जारी हैं विदर्भ, छत्तीसगढ़ से लेकर पंजाब तक. किसी किसान की आत्महत्या सरकार के लिये कोई परेशानी नहीं पैदा करती पर जब किसान विरोध पर उतर आयें, जब वे अपनी मांगों को लेकर रैलियाँ, धरने प्रदर्शन करने लगते हैं तो इससे सरकार का विचलन बढ़ जाता है फिर वह वैसा ही करती है जैसा कि पंजाब के किसान नेता दर्शनपाल के साथ किया गया या फिर उसके एक दिन पहले बी.के.यू. एकता पंजाब के अध्यक्ष बलकार सिंह व पंजाब के अन्य किसान नेताओं के साथ. दर्शनपाल पी.डी.एफ.आई. के संयोजक हैं पिछले दिनों पंजाब के किसानों द्वारा सिंचाई हेतु विद्युत आपूर्ति व उनकी दरों में हुई बृद्धि को लेकर एक बड़ी रैली हुई. जिसमे २० से अधिक किसान संगठन शामिल हुए थे, पंजाब में किसान संगठनों द्वारा एक लम्बे अर्से बाद इतने बड़े तादात में किसान इकट्ठा हुए थे. इस रैली से पंजाब सरकार भयभीत हो गयी और २३ मार्च को पटियाला से २५ किलोमीटर दूर समना से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जब वे एक किसान सभा में शामिल होने के लिये गये हुए थे. पर सरकार के भय का कारण महज़ रैली नहीं थी बल्कि किसानों की संगठित हो रही वह ताकत थी जिसने पिछले बरस प्रतिरोध के जरिये सरकार को इस बात के लिये मजबूर कर दिया था कि उसे सिंचाई के लिये बिजली उपलब्ध करायी जाय और सरकार को कार्यालयों में चलने वाली वातानुकूलित मशीनों को बंद करने का आदेश देना पड़ा था.
पंजाब में किसानों की स्थितियाँ पिछले वर्षों की तुलना में और भी बदहाल हुई हैं पर राज्य सरकार उन स्थितियों को बेहतर करने और किसानों को राहत देने के बजाय उचित मांगों को उठाने वाले किसान संगठन के नेताओं को गिरफ्तार कर रही है. पंजाब के कृषि विश्वविद्यालय ने वहाँ के किसानों की स्थितियों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें पंजाब के किसानों पर कर्ज के बढ़ रहे बोझ को दिखाया गया है २००६ में किसानों पर जो कर्ज था वह २४०० करोड़ था आज की स्थिति में वह और भी बढ़ गया है. केन्द्र सरकार अपनी कर्ज माफी को लेकर भले ही किसानों के प्रति प्रतिबद्धता को जताये पर पंजाब की स्थितियाँ इससे थोड़ा भिन्न हैं पंजाब के ज्यादातर किसान साहूकारों की कर्ज से डूबे हुए हैं और यह साहूकारी का कर्ज उन्हें बिजली की बढ़ती दर व कृषि संसाधनों के मूल्य में हुई बृद्धि के कारण भी लेना पड़ा है. किसानों का बड़ा तबका है जो गेहूं की फसल उगाता है पर पिछले वर्षों में उसके मूल्य में महज १.५ प्रतिशत की बृद्धि हुई है जबकि लागत ८ फीसदी बढ़ गयी है. इन स्थितियों में किसानों का मुनाफा और भी कम हो गया जिस पर कर्जदार किसानों को साहूकारों की प्रताड़ना के कारण मजबूरन आत्म हत्या का रास्ता चुनना पड़ रहा है. दरअसल किसान आत्महत्याओं का दौर किसान आंदोलनों की असफलता का ही परिणाम रहा है जहाँ एक किसान संघर्ष करने के बजाय अपनी जिंदगी को खत्म करने का विकल्प चुन लेता है. विदर्भ किसान आत्महत्याओं को लेकर खासा चर्चित रहा है पर उन वर्षों में यदि गौर किया जाय जब वहाँ किसान आंदोलन बेहतर स्थिति में थे तो किसान आत्महत्याओं की दर काफी कम रही है. आंदोलन की स्थिति में किसान एक संगठित ताकत के रूप में अपने को महसूस करता है लिहाजा मरने के बजाय उसके सामने लड़ने का विकल्प होता है और इन लड़ाईयों से जो उपलब्धियाँ हासिल होती हैं वे उसे मानसिक रूप से और मजबूत बनाती हैं. पूरे देश में खाद्यानों की महगाई जिस अनुपात में बढ़ी है किसानों को फसलों के लिये मिलने वाला मूल्य कहीं कम रहा है, नयी तकनीक और बीजों के कारण किसानी की प्रक्रिया ही बदल गयी है हर वर्ष नये बीज और मंहगे हो रहे फर्टिलाइजर्स का भुगतान करना छोटे किसानों के लिये बेहद मुश्किल है. ये वजह रही है कि किसानों के जीवन दशा में गिरावट आयी है.
किसानी पर निर्भर ६५ प्रतिशत आबादी की स्थिति आज इस रूप में हो गयी है कि वह मजबूरन किसानी के पेशे को अपना रहा है. किसानी एक स्वेच्छा से चुनाव करने का पेशा न होकर मजबूर होकर अपनाया गया उद्यम बन गया है. यह सब किसानों के प्रति सरकार की उपेक्षाओं के कारण ही हुआ है. इन स्थितियों में खेतिहर मजदूर व गरीब किसानों के हितों और उद्देश्यों को उठाने के लिये जो ताकतें आगे आ रही हैं या उन्हें संगठित करने का प्रयास कर रही हैं उन पर सरकार दमनकारी रवैया अख्तियार किये हुए है. जबकि देश में किसान आंदोलन न के बराबर हो गये हैं यदि हो भी रहे है तो तात्कालिक मुद्दों को उठाते हुए बगैर किसी ठोस सांगठनिक ढांचे के ऐसे में पंजाब में अभी भी अन्य राज्यों की अपेक्षा किसान संगठनों के मजबूत आधार बने हुए हैं. पंजाब सरकार के द्वारा किसान नेताओं पर की जा रही कार्यवाहियाँ दरअसल इन्हीं ढांचों को तोड़ने का एक प्रयास है. यह सब ऐसे समय में किया जा रहा है जब देश की कई किसान संगठन मिलकर किसानों पर सरकार द्वारा हो रही उपेक्षा व बदहाल स्थियों को लेकर ३० मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़े प्रतिरोध का आयोजन करने की तैयारी में हैं. चन्द्रिका

29 मार्च 2010

सीमा अरुंधती नहीं हैं

आवेश तिवारी
सीमा आजाद की गिरफ्तारी के 24 घंटे भी नहीं हुए थे, जब उनके एक बेहद करीबी दोस्त ने, जो एक नामचीन कवि भी हैं, उनसे कोई नाता होने से इनकार कर दिया था। सीमा की एक और मित्र, जिसे खुद की गिरफ्तारी का भी अंदेशा बना हुआ था, पुलिसवालों से मिलकर अपनी साफगोई बयान कर रही थी। सीमा की गिरफ्तारी के बाद जिन लोगों ने संसद भवन के बाहर धरना दिया था, उनमें से एक ने मुझसे फोन पर बच-बचा कर लिखने को कहा और बोला कि इस तरह से उसके पक्ष में लिखोगे तो पुलिस तुम्हे नहीं छोड़ेगी। उन्होंने ये भी कहा कि “यार मैं नहीं जानती थी, पूरे एक ट्रक नक्सली सामग्री बरामद हुई है। मुझसे एसटीएफ का एसपी कह रहा था, सीमा हार्डकोर नक्सली है और हमें ये सच मानना ही होगा। मैंने तो अरुंधती और सब लोगों को ये सच बता दिया है।” एक साहसिक पत्रकार की मनमाने ढंग से की गयी गिरफ्तारी पर उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपना अधोवस्त्र खोल कर बैठे अखबारों के पास कहने को कुछ भी नहीं था। मोहल्ला थोड़ा बहुत कराहने के बाद चुप हो गया था। साथियों, शुभचिंतकों के चेहरे बदलने लगे थे। उधर नैनी जेल की सीलन भरी कोठरी में बंद सीमा महिला कैदियों को अपना मनपसंद गीत सुना रही थी…
तीन गज की ओढ़नी, ओढनी के कोने चार,चार दिशाओं का संसार,ओढ़नी के कोने चार हर दो कोने बीच दीवार,दीवार बना हैं घूंघट, घूंघट अंदर है घुटन,घुटन भरी है जिंदगी,ओढ़नी है जिंदगी, जिंदगी है ओढ़नी
अन्याय और शोषण के विरुद्ध शुरू किये गये अपने एकल युद्ध में अकेले खड़ी थी सीमा। आज ये पोस्ट लिखने से पहले जब मैंने सीमा के एक पत्रकार मित्र से बात की, तो उन्होंने पहले तो कुछ भी बात करने से मना कर दिया लेकिन बहुत जद्दोजहद करने पर उन्होंने कहा, “वो सिर्फ दोस्त थी। सबसे करीबी दोस्त नहीं। हमें लोकतंत्र में सत्ता की ताकत का अंदाजा है। सीमा को शायद नहीं था या फिर वो उसे अनदेखा कर रही थी।” वो कहते हैं, “सीमा का हम चाह कर भी सहयोग नहीं कर सकते, क्‍योंकि हमारे पास इतनी ताकत और इतना बड़ा समूह नहीं कि सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके।” शायद सीमा ने इस नपुंसकता को पहचानने में देर कर दी और भीड़ के पीछे खड़ा होने का मुगालता पाले सलाखों में जकड़ दी गयी।
अरुंधती राय जैसी प्रगतिशीलता का वो अत्याधुनिक चेहरा नहीं थीं, जिसके पीछे पूरी भीड़ हो। वो मृणाल पांडेय या शोभा डे भी नहीं थी कि उनके खांसने की भी खबर प्रकाशित होती। वो सीमा थी। कभी गोरखपुर के इंसेफेलाइटिस प्रभावित इलाकों में अकेले घूमते हुए – इलाहाबाद के यमुना पार के इलाकों में मजदूरों को माफियाओं के जुल्मोसितम के खिलाफ आवाज उठाने को संगठित करती हुई सीमा का कसूर ये था कि उसके लिए खबरें सिर्फ अखबार के पन्नों पर छपी इबारत नहीं थी, जिसे पढ़ने के बाद आम आदमी अपने बच्चों का पखाना पोंछता है, उसके लिए खबरों का मतलब था कि जिनके लिए लिखो, उन्हें अपनी खबर से कुछ दो। उसका कसूर ये भी था कि वो इलाहाबाद के उन पत्रकारों की जमात का हिस्सा नहीं थी, जिनके लिए थाने की चाय अमृत का प्याला होती है और सिविल लाइन चौराहे पर देर रात तक चलने वाली गप्‍पबाजियां अखबारनवीस होने का प्रमाणपत्र।
सीमा की गिरफ्तारी के पहले और बाद में मीडिया मैनेजमेंट के लिए पुलिस ने क्या क्या किया और किस किस पत्रकार ने क्या क्या पाया, ये अपने आप में बड़ी रोमांचक कहानी है। इलाहाबाद के डीआईजी के घर में सीमा की गिरफ्तारी से महज कुछ घंटे पहले बैठकर चाय पीने और एसटीएफ के एसपी नवीन अरोरा को सीमा के खिलाफ हल्ला बोलने का आश्वासन देने वालों के चेहरे उतने ही काले हैं, जितनी कि उनकी कलम की रोशनाई। सीमा की गिरफ्तारी और उसके बाद मीडिया के एक वर्ग द्वारा पुलिस की भाषा में की गयी क्राइम रिपोर्टिंग ने ये साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अपनी सफलताओं का तानाबाना दल्ले पत्रकारों और टायलेट पेपर सरीखे अखबारों के मालिकानों की मिलीभगत से तैयार कर रही है। होड़ इस बात की लगी है कि कौन सा समूह और कौन सा पत्रकार सरकार और सरकार के नुमाइंदों के सबसे नजदीक है। ये शत प्रतिशत सच है कि पुलिस द्वारा न सिर्फ माओवादियों के नाम पर की जा रही गिरफ्तारियां, बल्कि नक्सल प्रभावित इलाकों में आदिवासी जनों का उत्पीड़न भी मीडिया की सहमति से हो रहा है। ये बात दिल्ली, मुंबई में बैठे पत्रकार भले न मानें मगर ये सच है कि उत्तर प्रदेश में अखबार वाले बलात्कार से लेकर हत्याओं तक की खबरें दारू की बोतलों की कीमत पर गटक कर जा रहे हैं। ये तो गनीमत है कि पत्रकारों की हत्या नहीं हो रही है। अगर कल को पुलिस नक्सली बताकर किसी पत्रकार को गोली मार दे तो उसमें भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
अभी पिछले पखवारे जब कमलेश चौधरी की फर्जी मुठभेड़ में हत्या और उसके बाद सीमा की फर्जी तरीकों से की जाने वाली गिरफ्तारी से संबंधित खबर डेली न्यूज एक्टिविस्‍ट में छपी। अगले ही दिन प्रदेश के एक बेहद चर्चित और जनसत्ता में नियमित तौर पर लिखने वाले एक पत्रकार ने लखनऊ में एसटीएफ मुख्यालय से मुझे फोन करके कहा कि आवेश भाई आप नहीं जानते, मैंने आज माओवादियों का वो रजिस्टर देखा जिसमें सीमा के दस्तखत थे। वो और उसका पति तो बकायदा माओवादियों की साजिशों के सूत्रधार की भूमिका में थे। आप एक बार आकर यहां अधिकारियों से मिल लीजिए। आपकी सीमा को लेकर धारणा बदल जाएगी। मेरी धारणा बदली या नहीं बदली, उस दिन जो पत्रकार एसटीएफ मुख्यालय में मौजूद थे, उन लोगों ने बारी बारी से सीमा के खिलाफ खबरें निकालने का सिलसिला शुरू कर दिया और उन पत्रकार महोदय को जिन्होंने मुझे फोन पर सच्चाई का ज्ञान कराया था, नक्सल प्रभावित इलाकों में पंफलेट और पोस्टर छपवाने एवं उत्तर प्रदेश पुलिस के नक्सली उन्मूलन को लेकर की जा रही कवायद को लेकर एक बुकलेट छपवाने का ठेका मिल गया। वो ये काम पहले भी करते आये हैं और इस काम में वे इलाहाबाद के एक प्रिंटिंग प्रेस की मदद से लाखों की कमाई पहले भी करते आये हैं। अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि सीमा कब तक जेल में रहेगी। इसका भी कोई अंदाजा नहीं कि कब कौन और कैसे माओवाद के नाम पर सलाखों के पीछे धकेल दिया जाएगा। लेकिन ये तय है कि हर एक बार जब कोई कलम से क्रांति की बात करने वाला सत्ता की खुराक बनेगा, जूठन खाने को चील कौवों की तरह मीडिया के ये शिखंडी भी मौके पर मौजूद रहेंगे।
आवेश‍ तिवारी। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख।

दंडकारण्य से लौटकर: अरुंधति राय


दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।

दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं।

इंद्रावती नदी के किनारे का इलाका माओवादियों द्वारा नियंत्रित है। पुलिस इस इलाके को ‘पाकिस्तान’ कहती है। यहां गांव खाली हैं, लेकिन जंगल लोगों से अटे पड़े हैं। जिन बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए था, वे जंगलों में भागे फिर रहे हैं। जंगल के खूबसूरत गांवों में कंक्रीट की बनी स्कूली इमारतें या तो उड़ा दी गयी हैं और उनका मलबा बचा हुआ है, या फिर इनमें पुलिस वाले भरे हुए हैं। इस जंगल में जो युद्ध करवट ले रहा है, भारत सरकार को उस पर गर्व भी है और कुछ संकोच भी। ऑपरेशन ग्रीनहंट भारत के गृहमंत्री (और इस युद्ध के सीईओ) पी चिदंबरम के लिए अगर गर्वोक्ति है, तो एक इनकार भी। वह कहते हैं कि ऐसा कोई युद्ध नहीं चल रहा, यह सिर्फ मीडिया द्वारा गढ़ा गया है। और इसके बावजूद ढेर सारा पैसा इस युद्ध में झोंका जा रहा है, दसियों हजार सैन्य टुकड़ियों को तैनात कर दिया गया है। भले ही, युद्ध भूमि मध्य भारत के जंगल हैं तो क्या हुआ, इसके गंभीर नतीजे हम सभी के लिए होंगे।

एक उदार चेतन मस्तिष्क के लिए यह मान लेना आसान है कि यह युद्ध भारत सरकार और उन माओवादियों के बीच है जो चुनावों को ढोंग और संसद को सुअरबाड़ा कहते हैं; जिन्होंने भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकने की अपनी मंशा खुलेआम जाहिर कर दी है। उनके लिए यह भुला देना आसान है और सुविधाजनक भी कि मध्य भारत के आदिवासियों के प्रतिरोध का इतिहास माओ से भी सदियों पुराना है (यही सचाई भी है, क्योंकि यदि उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया होता, तो वे बचे ही नहीं होते)। हो, उरांव, कोल, संथाल, मुंडा, गोंड आदिवासियों ने एक नहीं, कई बार विद्रोह किया है, कभी अंग्रेजों के खिलाफ तो कभी जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ। इनकी बगावत को बर्बर तरीकों से कुचल दिया गया, हजारों आदिवासियों को मार दिया गया, इसके बावजूद इन लोगों को जीता नहीं जा सका। यहां तक कि आजादी के बाद पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए पहले जन उभार – जिसे हम माओवादी कह सकते हैं – के केंद्र में भी आदिवासी ही थे (जहां से नक्सलवादी नाम का शब्द पैदा हुआ, आजकल जिसे माओवादी के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है)। तब से लेकर अब तक नक्सली राजनीति अभिन्न रूप से आदिवासी उभार के साथ जुड़ी हुई है, जो हमें जितना नक्सलवादियों के बारे में बताती है, उतना ही वह आदिवासियों से भी सरोकार रखती है।

बगावत की यह विरासत अपने पीछे ऐसे असंतुष्ट और रुष्ट लोगों को छोड़ गयी है जिन्हें जान-बूझ कर भारत सरकार ने हाशिये पर धकेल दिया है और अलग-थलग छोड़े हुए है। भारतीय लोकतंत्र का नैतिक दस्तावेज यानी भारत का संविधान संसद द्वारा 1950 में अपनाया गया था। आदिवासियों के लिए यह एक त्रासदी का दिन था। संविधान ने औपनिवेशिक नीति को सही ठहराते हुए आदिवासी इलाकों का जिम्मा भारतीय राजसत्ता के हाथ में दे दिया। रातों-रात समूची आदिवासी आबादी अपनी ही जमीन पर गैर-कानूनी प्रवासियों में तब्दील हो गयी। इस संविधान ने वनोत्पादों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को ही अस्वीकार कर दिया और इस तरह उनकी समूची जीवन पद्धति को आपराधिक करार दिया। वोट देने के अधिकार के बदले संविधान ने आजीविका और आत्मसम्मान के उनके अधिकार को ही छीन लिया।

सरकार ने पहले तो उनसे सब कुछ छीन लिया और उन्हें गरीबी के कुएं में धकेल दिया। इसके बाद वह उनकी गरीबी को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने में लग गयी। हर बार जब उसे बड़ी आबादी को विस्थापित करने की जरूरत पड़ती – बांधों, सिंचाई परियोजनाओं, खनन आदि के लिए – तो सरकार अचानक ‘आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने’ या उन्हें ‘आधुनिक विकास का फल देने’ की बात करने लग जाती। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की ‘प्रगति’ के शरणार्थी यानी आंतरिक रूप से विस्थापित करोड़ों लोगों (बड़े बांधों से अकेले तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित) में अधिसंख्य आदिवासी लोग ही हैं। जाहिर है जब यह सरकार आदिवासियों के कल्याण की बात शुरू करे, तो वह चिंता करने का वक्त होता है।

इस कड़ी में सबसे हालिया चिंता के स्वर गृहमंत्री पी चिदंबरम की ओर से आये हैं। उन्होंने कहा है कि वह नहीं चाहते कि आदिवासी ‘संग्रहालयी संस्कृति’ का हिस्सा रहें। जब वह एक कॉरपोरेट वकील के अपने करियर में तमाम प्रमुख खनन कंपनियों के हितों को आवाज दे रहे थे, तब तो आदिवासियों का कल्याण उनकी प्राथमिकताओं में ऐसे नहीं आता था। इसलिए जरूरी है कि उनकी इस नयी उत्तेजना के आधार को टटोला जाए।

पिछले तकरीबन पांच साल के दौरान छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। इन्हें हरे नोटों में बदलने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को इन इलाकों से खत्म कर दिया जाए।

यह युद्ध, इसी के लिए है।

मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह ऊंघते हुए बोली, ‘मैं सोच रही थी, कि इस देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है।’

रायपुर से दंतेवाड़ा तक का सफर करीब दस घंटे का है। इसमें उन इलाकों से होकर गुजरना पड़ता है, जिन्हें ‘माओवादी संक्रमित’ कहा जाता है। ऐसे शब्द बेवजह नहीं बनाये गये। संक्रमण/संक्रमित जैसे शब्द बीमारी या कीटों के लिए इस्तेमाल में आते हैं। और बीमारियों को दूर किया ही जाना चाहिए। कीटों को खत्म करना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही माओवादियों को साफ किया ही जाना होगा। बड़े चुपके से और अदृश्य तरीकों से नरसंहार की यह भाषा हमारी शब्दावली का हिस्सा बन चुकी है।

राजमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा बलों ने दोनों ओर जंगलों की एक संकरी पट्टी को घेरा हुआ है। इसके पार ‘दादा लोगों’ का राज है यानी भाइयों का, कॉमरेडों का राज।

रायपुर के बाहरी इलाके में एक विशाल बिलबोर्ड पर वेदांता के कैंसर अस्पताल का विज्ञापन लगा है (वही कंपनी, जिसमें कभी हमारे गृहमंत्री नौकरी करते थे)। उड़ीसा में, जहां वेदांता बॉक्साइट का खनन कर रही है, वह एक विश्वविद्यालय भी बना रही है। ऐसे ही चुपके से और अदृश्य तरीकों से खनन निगम हमारी कल्पनाओं में प्रवेश कर जाते हैं ऐसी उदार ताकतों के रूप में, जो वास्तव में हमारा ख्याल रखते हों। कर्नाटक की हालिया लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक एक निजी कंपनी द्वारा खोदे गये एक टन लौह अयस्क के लिए सरकार को 27 रुपये की रॉयल्टी मिलती है और खनन कंपनी 5000 रुपये बनाती है। बॉक्साइट और अल्युमीनियम के क्षेत्र में तो हालत और भी बुरी है। ये अरबों डॉलर की दिनदहाड़े लूट की दास्तानें हैं। इतना तो चुनावों, सरकारों, जजों, अखबारों, टीवी चैनलों, एनजीओ और अनुदान एजेंसियों को खरीद लेने के लिए काफी है। ऐसे में यहां-वहां एकाध कैंसर अस्पताल बनवा देने में क्या जाता है?

मुझे याद नहीं कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दस्तखत किये गये समझौतों की लंबी फेहरिस्त में वेदांता का नाम है या नहीं। लेकिन इतना तो शक होता ही है कि अगर यहां एक कैंसर अस्पताल है, तो पास में ही कहीं बॉक्साइट का कोई पहाड़ भी होगा।

हम कांकेर से गुजरते हैं, जो अपने जंगल युद्धकौशल और प्रति उग्रवाद प्रशिक्षण कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसे ब्रिगेडियर बीके पंवार चलाते हैं, जो इस युद्ध के एक और प्यादे के रूप में भ्रष्ट पुलिसवालों को जंगल कमांडो में तब्दील करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल का उद्देश पत्थरों पर रंगा हुआ है, ‘एक गुरिल्ला से लड़ने के लिए गुरिल्ला बनो।’

काफी देर हो चुकी थी। जगदलपुर सो चुका था, बस कुछेक होर्डिंगें जगमगा रही थीं जिनमें राहुल गांधी लोगों से यूथ कांग्रेस में आने का आह्वान करते दिख रहे थे। हाल के कुछ महीनों में वह दो बार बस्तर जा चुके हैं, लेकिन युद्ध के बारे में शायद उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा है। जनता के इस राजकुमार के लिए इस मसले पर कुछ भी कहना उसे मुश्किल में डाल सकता है। शायद उनके मीडिया प्रबंधकों ने ही उन्हें ऐसा करने से रोका होगा। राहुल गांधी का प्रचार अभियान इतनी सतर्कता से चलाया जा रहा है कि बलात्कार, हत्याओं, गांवों को जलाने और हजारों लोगों को उनके घरों से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार सरकार प्रायोजित सेना सलवा जुड़ुम के कर्ताधर्ता कांग्रेसी विधायक महेंद्र कर्मा का नाम बीच में कहीं नहीं आ पाता।

मां दंतेश्वरी के मंदिर पर मैं समय से पहले ही पहुंच चुकी थी। मुझे नहीं पता था कि मुझे यहां क्या कहना है। उसने बताया कि उसका नाम मंगतू है। जल्द ही मैं जान गयी कि जिस दंडकारण्य में मैं प्रवेश करने जा रही थी, वह ऐसे लोगों से अटा पड़ा था, जिनके कई नाम थे और जिनकी पहचान अस्पष्ट थी। यह विचार मेरे लिए राहत से कम नहीं था कि कुछ देर के लिए दूसरा बन जाना और अपनी पहचान से अलग होना कितना खूबसूरत होता होगा।

मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक बस स्टैंड था। हम वहां पैदल पहुंचे। वहां पहले से ही काफी भीड़ थी। काफी तेजी से यहां चीजें बदलीं। बाइक पर दो व्यक्ति थे। कोई संवाद नहीं – बस आंखों में ही नमस्ते बंदगी हुई, हमने बाइक पर अपना वजन संभाला और चल दिये। मुझे कोई आइडिया नहीं था कि हम कहां जा रहे थे। रास्ते में पुलिस अधीक्षक का आवास पड़ा। मैं पिछली बार के अपने दौरे में इधर आयी थी, सो मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्पष्टवादी व्यक्ति था। उसने कहा था, ‘देखिए मैडम, साफ-साफ कहूं तो यह समस्या पुलिस या सेना से हल नहीं होने वाली। इन आदिवासियों की दिक्कत यह है कि वे लालच नाम की चीज नहीं समझते। जब तक वे लालच को नहीं समझेंगे और खुद लालची नहीं बनेंगे, हमारे लिए कोई भी उम्मीद करना बेकार है। मैंने अपने अधिकारी से कहा है कि सुरक्षा बलों को हटा कर उसकी जगह हर घर में एक टीवी लगवा दीजिए। सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।’

कुछ ही देर में हम चौड़े पाट वाली एक नदी के रेतीले किनारों पर पहुंच गये। यह बरसाती नदी थी। इसलिए अभी वह बची नहीं थी। चारों ओर रेत के बीच एक पतली सी धारा थी जिसमें टखने भर पानी था और उसे पार करना काफी आसान था। उस पार था ‘पाकिस्तान’। उस एसपी ने मुझसे कहा था, ‘मैडम, हमारे सिपाही उधर लोगों को जान से मार देते हैं।’ मुझे याद है कि हम जैसे ही उस पार जाने लगे, एक पुलिसवाले की राइफल का निशाना हमारी ओर ही था। इतने खुले में उन्हें पहचान पाना मुश्किल नहीं था। मंगतू को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी उसी के पीछे हो ली।

उस पार हमारा इंतजार कर रहा था चंदू, जिसकी हलकी हरी शर्ट पर लिखा था हॉर्लिक्स! ‘आंतरिक सुरक्षा का यह खतरा’ कुछ उम्रदराज था। उसकी मुस्कराहट काफी प्यारी थी। उसके पास एक साइकिल थी, एक जेरी कैन जिसमें उबला पानी और मेरे लिए कई पैकेट ग्लूकोज के बिस्कुट, जो पार्टी ने भिजवाये थे। हमने अपनी सांस थाम कर चलना शुरू किया। उसकी साइकिल हमारा ध्यान बंटा रही थी। हालांकि रास्ता ऐसा था जिस पर साइकिल चलाना संभव नहीं था। पहाड़ों और पथरीले रास्तों पर चढ़ते-उतरते हम चलते गये। जब साइकिल चलाना मुश्किल हो जाता, तो चंदू उसे अपने सिर पर ऐसे उठा लेता जैसे कि उसका कोई वजन ही न हो। सूरज ढलते ही उनके कंधों पर लटके बैग बांग देने लगे। उनमें मुर्गे भरे थे जिन्हें बेचने वे बाजार ले गये थे, लेकिन बेच नहीं पाये थे।

अब कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी थीं। मैं कह नहीं सकती कि वे कितनी दूर थे। अब रास्ता मैदानी हो रहा था। मैंने नजरें चुरा कर आकाश की ओर देखा। खुला आकाश मुझे मदहोश करता है। मुझे उम्मीद थी कि हमारी मंजिल जल्द ही आने वाली है। चंदू ने कहा, हां। जल्दी यानी एक घंटे से भी ज्यादा। अब मुझे ढेर सारे पेड़ों की कतारें नजर आने लगी थीं। हम पहुंच चुके थे।

गांव काफी बड़ा था और मकान एक-दूसरे से काफी दूर बने थे। हम जिस घर में गये, वह काफी खूबसूरत था। आग जल रही थी, जिसके चारों ओर लोग बैठे थे। बाहर अंधेरे में उससे भी ज्यादा लोग थे। पता नहीं, कितने। उन्होंने अभिवादन किया, कॉमरेड लाल सलाम। मैंने भी जवाब दिया, लाल सलाम। मैं थक कर चूर हो चुकी थी। उस घर की महिला ने मुझे भीतर बुलाया। उसने मुझे खाने को रेड राइस के साथ हरी फलियों में पकी हुई चिकेन करी दी। जबर्दस्त खाना। उसकी बच्ची मेरे पास में ही सोयी हुई थी और उसके चांदी के कड़े धधकती हुई आग में चमक रहे थे।

हम सवेरे पांच बजे उठ गये। छह बजे तक हम निकल पड़े। एकाध घंटे के बाद एक और नदी हमने पार की। रास्ते में कुछ खूबसूरत गांव पड़े। हर गांव पर इमली के पेड़ों की छाया थी। इतने विशाल और विनम्र जैसे कि उन गांवों पर झुका हुआ कोई ईश्वर हो। यह थी बस्तर की मीठी इमली। ग्यारह बजते-बजते सूरज चढ़ चुका था। अब चलना सज़ा हो रहा था। दोपहर के खाने के लिए हम एक गांव में रुकते हैं। करीब दो बजे हम फिर से चल पड़ते हैं। इस गांव में हम दीदी से मिलने जा रहे हैं। दीदी यानी बहन कॉमरेड, जो हमें बताएंगी कि आगे क्या करना है। चंदू को नहीं पता कि आगे का सफर कैसा होगा। यहां सूचनाओं के भी स्तर होते हैं। हर व्यक्ति को हर चीज जानना जरूरी नहीं होता। जब हम वहां पहुंचते हैं, तो दीदी नहीं मिलती। उसकी कोई खबर नहीं है। पहली बार मैं देखती हूं कि चंदू के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। मैं और भी चिंतित हो जाती हूं। मैं नहीं जानती कि लोग यहां एक-दूसरे से कैसे संपर्क करते हैं, अगर कुछ गड़बड़ हुई तो फिर क्या?

हम एक पुराने स्कूल के बाहर डेरा डालते हैं। यह गांव से कुछ दूर है। आखिर गांवों के सारे सरकारी स्कूल कंक्रीट के क्यों होते हैं, जिनमें खिड़कियां स्टील शटर की तरह और दरवाजे भी स्टील के होते हैं, स्लाइड करने वाले? इन्हें भी गांव के घरों जैसा मिट्टी और फूस से क्यों नहीं बनाया जाता? ताकि इनका इस्तेमाल बैरक और बंकर की तरह भी हो सके। चंदू बताता है, ‘अबूझमाड़ के गांवों में स्कूल ऐसे ही होते हैं…’। एक लकड़ी से वह जमीन पर स्कूल के भवन का नक्शा खींचता है – एक दूसरे से जुड़ी तीन अष्टकोणीय आकृतियां – बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते की तरह। वह बताता है, ‘ताकि वे यहां से हर दिशा में गोली चला सकें।’ अपनी बात को समझाने के लिए वह बिल्कुल क्रिकेट के ग्राफिक की तरह तीर बनाता है। इन स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं। चंदू बताता है कि वे सभी भाग गये। मैंने पूछा, ‘कहीं तुम लोगों ने तो उन्हें नहीं खदेड़ दिया?’ ‘न, हम सिर्फ पुलिस को खदेड़ते हैं।’ वह पूछता है, ‘जब शिक्षकों को घर बैठे ही तनख्वाह मिल जाती है, तो वे यहां आने की जहमत क्यों उठाएंगे?’ बात तो सही है!

वह बताता है कि यह हमारा ‘नया इलाका’ है। पार्टी हाल ही में यहां आयी है।

तब तक करीब 20 युवा लड़के और लड़कियां आ जाते हैं। सभी किशोरवय के या 20 से 30 के बीच में हैं। चंदू बताता है कि यह गांव की मिलिशिया है। माओवादी सैन्य क्रम की सबसे निचली कतार। मैंने पहले कभी ऐसी कोई सेना नहीं देखी। ये साड़ी और लुंगी में हैं, कुछ हरे रंग के कपड़े पहने हैं। सभी के पास भरमार है यानी मजल लोडिंग राइफल। कुछ के पास चाकू, कुल्हाड़ी, तीर-कमान भी है। एक के पास जिंदा मोर्टार भी है, जिसे तीन फुट की जीआई पाइप से बनाया गया है। इसमें बारूद भरी है। यह चलने पर बहुत तेज आवाज करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। वे बताते हैं कि इसके बावजूद पुलिस इससे डरती है। ऐसा लगता नहीं कि इन लोगों के दिमाग में युद्ध के बारे में ख्यालात चलते होंगे, शायद इसलिए कि यह इलाका सलवा जुड़ुम के दायरे से बाहर है। इन्होंने दिन भर का काम पूरा कर लिया है। वे कुछ घरों के चारों ओर बाड़ लगा रहे थे ताकि खेतों में बकरियों को घुसने से रोका जा सके। इनमें काफी उत्सुकता और उत्साह है। लड़कियां यहां लड़कों के साथ काफी सहज और आत्मविश्वास में दिखती हैं और इन चीजों को पकड़ने में मैं बहुत तेज हूं। मुझे यह देखकर अच्छा लगता है। चंदू बताता है कि इनका काम गश्त लगाना है और चार-पांच गांवों की सुरक्षा करना है, खेतों की रक्षा करना है, उनके घरों की मरम्मत करना और कुओं को साफ करना है – यानी जो भी जरूरत पड़े उसे पूरा करना है।

दीदी अब तक नहीं आयी। अब क्या किया जाए? कुछ नहीं। इंतजार कीजिए और तब तक सब्जियां काटने और छीलने में मदद कीजिए।

रात के खाने के बाद सभी कतार में चल देते हैं। हम सब कुछ साथ लेकर बढ़ते हैं – चावल, सब्जियां, हांडी और बरतन। हम स्कूल परिसर को छोड़ चुके हैं। आधे घंटे से भी कम समय में हम एक सुरक्षित छांव में पहुंच जाते हैं। यहां हमें सोना है। निस्तब्ध शांति है। मिनट भर के भीतर हर कोई अपनी झिल्ली (नीली प्लास्टिक की चादर, जिसके बगैर क्रांति संभव नहीं) बिछा चुका है। चंदू और मंगतू एक में ही काम चला लेते हैं और मुझे एक अलग झिल्ली दी जाती है। मेरे लिए सबसे अच्छी जगह वे खोज निकालते हैं सोने के लिए, एक पत्थर के किनारे। चंदू ने दीदी को संदेश भेज दिया है। यदि उसे वह मिल गया, तो सवेरे वह यहां आ जाएगी। बशर्ते संदेश उस तक पहुंचे।

अब तक मैं जितने कमरों में सोयी हूं, यह सबसे खूबसूरत कमरा है। हजार स्टार वाले होटल में मेरा निजी सुइट। और मैं घिरी हूं इन अद्भुत, खूबसूरत बच्चों से, जिनके हाथों में हथियार हैं। ये सभी निश्चित तौर पर माओवादी ही हैं। तो क्या ये मरने जा रहे हैं? क्या जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल इन्हीं को मारने के लिए बनाया गया है? ये सारे हेलीकॉप्टर गनशिप, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर क्या इन्हीं के लिए हैं?

सब सो चुके हैं, सिवाय इन संतरियों के, जो डेढ़ घंटे की पाली में सोते हैं। मेरी नजर तारों पर जाती है। जब मैं बच्ची थी, तो मीनाचल नदी के किनारे सूरज ढलते ही शुरू होने वाली झींगुरों की आवाज को मैं तारों की पुकार समझती थी, जैसे वे टिमटिमाने की तैयारी कर रहे हों। मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि आखिर इस जगह से मुझे कितना प्यार हो गया है। दुनिया में इससे प्यारी और कोई जगह शायद नहीं होगी, जहां मैं होना चाहूंगी। आज रात मुझे क्या होना चाहिए? तारों की चादर के नीचे, कामरेड राहेल? खैर, दीदी कल आ जाएंगी।

वे दोपहर से पहले आ पहुंचे। कुछ दूरी पर मैं उन्हें देख पा रही हूं। करीब 15 थे, सभी हरी वर्दी में, हमारी ओर दौड़ कर आते हुए। जिस तरह से वे दौड़ रहे थे, मैं उन्हें देख कर समझ सकती थी कि वे मजबूत लोग हैं। जनमुक्ति गुरिल्ला सेना के लोग। वही, जिनके लिए थर्मल इमेजिंग और लेजर निर्देशित रायफलें हैं, जिनके लिए जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल बनाया गया है।

कैंप तक पहुंचने में कुछ घंटे और लगेंगे। पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका है। यहां संतरियों और गश्ती सैनिकों के कई स्तर हैं। शायद दो कतारों में करीब सौ कामरेड होंगे। सभी के पास हथियार हैं। और चेहरों पर मुस्कान। वे गाना शुरू करते हैं, ‘लाल लाल सलाम, लाल लाल सलाम, आने वाले साथियों को लाल लाल सलाम।’ वे काफी मीठा गाते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी नदी या महकते हुए जंगल पर यह कोई लोकगीत हो। गीत के साथ अभिवादन, हाथ मिलाना और बंधी मुट्ठियां। सभी एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए कहते हैं – लाल सलाम, लाल सलाम।

कैंप के नाम पर यहां 15 वर्ग फुट में बिछी हुई नीली झिल्ली के अलावा कुछ नहीं दिखता। छत भी झिल्ली की ही है। रात में मेरा कमरा यही होगा। शायद इतने दिनों तक पैदल चलने के बदले यह मेरा पुरस्कार था, या फिर आगे जो पड़ने वाला है, उसके बदले मुझे बहलाया जा रहा था। हो सकता है दोनों ही बातें रही हों। खैर, शायद इस सफर में यह आखिरी रात थी जब मेरे सिर पर छत थी। रात के खाने पर मुझे मिलती हैं कॉमरेड नर्मदा – क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन की प्रमुख (इनके सिर पर ईनाम है)। पीएलजीए की कॉमरेड सरोजा जो अपनी एसएलआर जितनी ही लंबी हैं। कॉमरेड मासे (गोंडी भाषा में इसका अर्थ होता है काली लड़की), जिनके सिर पर भी ईनाम घोषित है। तकनीक पारंगत कॉमरेड रूपी। कॉमरेड राजू, जो उस डिवीजन के प्रमुख हैं, जिसमें हम लोग चल रहे थे। और कॉमरेड वेणु (या कॉमरेड मुरली, सोनू, सुशील – आप उन्हें जो कहना चाहें), जो सबसे वरिष्ठ हैं। हो सकता है केंद्रीय कमेटी में हों, पोलित ब्यूरो में भी हो सकते हैं। मुझे बताया नहीं जाता। मैं पूछती भी नहीं। हमारे बीच में गोंडी, हलबी, तेलुगु, पंजाबी और मलयालम में बात हो रही है। सिर्फ मासे अंग्रेजी बोलती है। (इसीलिए हम तय करते हैं कि हम हिंदी में ही बात करेंगे)। कॉमरेड मासे लंबी है, शांत है और ऐसा लगता है कि संवाद में शामिल होने में उसे काफी दिक्कत हो रही हो। लेकिन जिस तरह से उसने मुझे गले लगाया, मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि वह आदमी को पहचानना जानती है। जंगल में किताबें न मिलना उसे बहुत अखरता है। जब उसे मुझ पर पूरा भरोसा हो जाएगा, शायद तब वह मुझे अपनी पूरी कहानी बताएगी।

जैसा कि इस जंगल में अक्‍सर होता है, बुरी खबर अचानक आयी। एक दौड़ते हुए व्यक्ति के साथ। जिसके पास बिस्कुट थे और छोटे-छोटे मुड़े हुए कागज के टुकड़ों पर कुछ लिखा हुआ था। ये टुकड़े एक बैग में ऐसे भरे थे जैसे चिप्स हों। हर जगह की खबर। ओंगनार गांव में पुलिस ने पांच लोगों को मार दिया है। इनमें चार मिलिशिया के हैं और एक आम ग्रामीण। संथु पोट्टाई (25), फूलो वाड्डे (22), कांडे पोट्टाई (22), रामोली वाड्डे (20), दलसाई कोराम (22)। हो सकता है ये सभी वे बच्चे हों जो पिछली रात तारों से नहायी हमारी डॉर्मिटरी का हिस्सा थे। फिर अच्छी खबर आती है कुछ लोगों के झुंड के साथ, जिसमें एक मोटा युवक भी है। वह भी उन्हीं के कपड़ों में है, लेकिन वे नये हैं। सभी उसके कपड़ों की बड़ाई करते हैं कि वे कितने फिट हो रहे हैं। वह शर्माता भी है और खुश भी होता है। वह एक डॉक्टर है जो अभी-अभी जंगल में कॉमरेडों के साथ रह कर काम करने आया है। पिछली बार दंडकारण्य में जब कोई डॉक्टर आया था, तो इस बात को बरसों बीत गये।

मुझे कॉमरेड कमला से मिलवाया जाता है। मुझे हिदायत दी जाती है कि मैं उसे बिना साथ लिये अपनी झिल्ली से पांच फीट दूर भी न जाऊं। क्योंकि अंधेरे में कोई भी रास्ता भूल कर गुम हो सकता है। (मैं उसे जगाती ही नहीं, बिल्कुल लट्ठ की तरह पड़ी रहती हूं)। सुबह कमला मुझे पॉलीथिन का बना एक पीला पैकेट देती है, जिसका एक कोना फटा हुआ था। यह अबिस गोल्ड रिफाइंड सोया तेल का पैकेट था, जो अब शौच में मेरे मग के रूप में काम आने वाला था। क्रांति की राह में कुछ भी बरबाद नहीं जाता।

(अब भी कॉमरेड कमला के बारे में मैं लगातार, रोजाना सोचती रहती हूं। वह सतरह बरस की है। उसके पीछे एक देसी पिस्तौल लटकी रहती है। और उसकी मुस्कान तो गजब है। फिर भी अगर पुलिस से कभी सामना हो गया, तो वे उसे मार डालेंगे। वे पहले शायद उसकी इज्जत लूटेंगे। उससे कोई सवाल नहीं किया जाएगा। क्योंकि वह ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा’ है।)

दंडकारण्य को अंग्रेज गोंडवाना कहते थे, यानी गोंडो की धरती। आज इस जंगल से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाएं जुड़ती हैं। समस्याग्रस्त लोगों को अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बांटना तो पुरानी तरकीब है। लेकिन ये माओवादी और गोंड राजकीय सीमाओं जैसी चीजों पर बहुत ध्यान नहीं देते। उनके दिमाग में तो अलग नक्शा चल रहा होता है। और जंगल के जीवों की तरह उनके रास्ते भी अलग होते हैं। इनके लिए सड़कें चलने के लिए नहीं बनीं। वे तो सिर्फ पार करने के लिए हैं, और धीरे-धीरे ऐसा चलन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि वहां सेना तैनात होती है। कोया ओर दोरला जनजातियों में बंटे गोंड यहां बहुसंख्य हैं, हालांकि दूसरे आदिवासी समुदायों की भी यहां रिहाइश है। गैर-आदिवासी बसावट सिर्फ जंगलों के किनारे सड़कों और बाजारों के पास है।

पीडब्ल्यूजी के लोग दंडकारण्य में आने वाले पहले प्रचारक नहीं थे। प्रसिद्ध गांधीवादी बाबा आम्टे ने 1975 में वरोरा में कुष्ठ आश्रम और अस्पताल खोला था। अबूझमाड़ के सुदूर गांवों में रामकृष्ण मिशन ने ग्रामीण स्कूल खोलने शुरू किये थे। उत्तरी बस्तर में बाबा बिहारी दास ने ‘आदिवासियों को वापस हिंदू बनाने’ के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया था, जिसके तहत आदिवासी संस्कृति को नष्ट कर उनमें हिंदू धर्म की सबसे बड़ी नेमत जाति को उनके भीतर प्रवेश कराया जाना था। शुरू में जिन्होंने धर्म बदला – गांवों के मुखिया और बड़े जमींदार – सलवा जुड़ुम के संस्थापक महेंद्र कर्मा जैसे लोग, उन्हें द्विज ब्राह्मण की उपाधि दी गयी। (जाहिर तौर पर यह एक घपला ही था, क्योंकि कोई भी ब्राह्मण नहीं बन सकता। ऐसा ही होता तो हम अब तक ब्राह्मणों के देश बन चुके होते)। लेकिन इस नकली हिंदूवाद को आदिवासियों के लिए पर्याप्त माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हर नकली चीज – बिस्कुट, साबुन, माचिस और तेल – जो गांवों के बाजारों में मिलती है। हिंदुत्व के इस अभियान ने भूमि रिकॉर्ड में गांवों के नामों को बदल दिया। अब इन गांवों के दो नाम हैं, एक जनता का दिया नाम और दूसरा सरकारी नाम। मसलन, इन्नार गांव को चिन्नारी बना दिया गया। मतदाता सूची में आदिवासियों के नाम बदल कर हिंदू नाम बना दिये गये। (मासा कर्मा बन गये महेंद्र कर्मा)। जिन्होंने हिंदू बनना स्वीकार नहीं किया, उन्हें ‘कटवा’ कह दिया गया (यानी अछूत), जो बाद में माओवादियों के स्वाभाविक समर्थक बन गये।

पीडब्ल्यूजी ने अपना काम सबसे पहले दक्षिणी बस्तर और गढ़चिरौली में शुरू किया। कॉमरेड वेणु उन शुरुआती महीनों के बारे में विस्तार से बताते हैं : कि गांव वाले कैसे उनसे भय खाते थे और अपने घरों में इन्हें घुसने नहीं देते। कोई उन्हें खाना-पानी नहीं देता। पुलिस ने अफवाह फैला दी थी कि वे चोर हैं। डर कर महिलाओं ने अपने जेवर लकड़ी के चूल्हे की राख में छुपा दिये। बड़े पैमाने पर इनका दमन किया गया। नवंबर 1980 में पुलिस ने गढ़चिरौली में एक गांव की सभा पर गोलीबारी की, जिसमें तकरीबन समूचा स्क्वाड ही मारा गया। यह दंडकारण्य की पहली ‘फर्जी मुठभेड़’ थी। यह बहुत बड़ा झटका था जिसके चलते कॉमरेड गोदावरी के उस पार अदीलाबाद लौट गये। लेकिन 1981 में वे फिर लौटे। उन्होंने इस बार आदिवासियों को तेंदू पत्ता के दाम बढ़ाने के मुद्दे पर संगठित करना शुरू किया। उस वक्त व्यापारी 50 पत्तों के एक बंडल का तीन पैसा देते थे। इस किस्म की राजनीति से बिल्कुल अनजान लोगों को इस मुद्दे पर संगठित कर के हड़ताल आयोजित करवाना अपने आप में एक बड़ा काम था। आखिरकार हड़ताल कामयाब हुई और मजदूरी को बढ़ा कर छह पैसे बंडल कर दिया गया। लेकिन पार्टी की असली कामयाबी एकता की ताकत का प्रदर्शन था कि कैसे राजनीतिक सौदेबाजी करने का यह एक नया तरीका हो सकता है। आज तमाम हड़तालों और प्रदर्शनों के सिलसिले के बाद एक बंडल की मजदूरी एक रुपया मिलती है। (मौजूदा दरों पर इसकी संभावना कम ही लगती है, लेकिन तेंदू पत्तों का कारोबार सैंकड़ों करोड़ रुपये का होता है)। हर सीजन में सरकार ठेके देती है और ठेकेदारों को एक निश्चित मात्रा में तेंदू पत्ता इकट्ठा करने की मंजूरी देती है – जो 1500 से 5000 मानक बोरे के बीच हो सकती है। हर मानक बोरे में करीब 1000 बंडल होते हैं (यह पता करने का कोई तरीका नहीं कि ठेकेदार इससे ज्यादा बंडल न निकालते हों)। बाजार में आते ही तेंदू पत्ता किलो में बिकने लगता है। बंडल को मानक बोरों और फिर किलो में बदलने वाले गणित पर पूरी तरह ठेकेदारों का नियंत्रण होता है और उनके पास इसमें हेर-फेर करने की पर्याप्त गुंजाइश रहती है। मामूली आकलन के हिसाब से भी एक ठेकेदार के पास हर मानक बोरे पर 1100 रुपये बचते हैं, वो भी पार्टी को हर बोरे पर 120 रुपये का कमीशन देने के बाद। इस हिसाब से एक छोटा ठेकेदार (1500 बोरे) एक सीजन में करीब 16 लाख रुपये बना लेता है और बड़ा ठेकेदार (5000 बोरे) कम से कम 55 लाख रुपये। वास्तविक राशि इसकी कई गुना हो सकती है। इस पूरे कारोबार में ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक’ लोगों को सिर्फ इतना मिल पाता है कि वे अगले सीजन तक जिंदा रह सकें।

अचानक इस बातचीत में सबकी हंसी से खलल पड़ता है। पीएलजीए का एक कॉमरेड निलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह रह-रह कर खुद को मार भी रहा था। वह पास आया तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चींटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चींटियां उसके पूरे शरीर पर रेंग गयी थीं और हाथ व गले में काट रही थीं। निलेश खुद भी हंस रहा था। कॉमरेड वेणु ने पूछा, ‘क्या आपने कभी चींटियों की चटनी खायी है?’ मैं लाल चीटियों से खूब वाकिफ हूं, केरल में बीते अपने बचपन से ही। उन्होंने मुझे काटा भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें चखा नहीं।

निलेश बीजापुर से है, जो सलवा जुड़ुम का केंद्र है। उसका छोटा भाई सलवा जुड़ुम में चला गया। उसे एसपीओ बना दिया गया है। वह अपनी मां के साथ बसागुड़ा कैंप में रहता है। उसके पिता ने साथ जाने से मना कर दिया। वह गांव में ही रुक गये। बाद में जब मुझे निलेश से बात करने का मौका मिला, तो मैंने पूछा कि उसका भाई सलवा जुड़ुम के साथ क्यों चला गया।

‘वह बहुत छोटा था। उसे लोगों को लूटने और घरों को जलाने का जब मौका मिला तो उसे बहुत मजा आने लगा। वह सनक गया। अब वह फंस चुका है। वह कभी गांव वापस नहीं आ सकता। उसे माफ नहीं किया जाएगा। और यह बात वह जानता है।’

हम इतिहास के अपने सबक पर लौट आये। कॉमरेड वेणु ने बताया कि पार्टी का अगला बड़ा संघर्ष बल्लारपुर पेपर मिल्स के खिलाफ था। सरकार ने थापर कंपनी को काफी रियायती दरों पर 1.5 लाख टन बांस निकालने का ठेका 45 साल के लिए दे दिया था (बॉक्साइट की तुलना में यह छोटा धंधा है, फिर भी इस इलाके में पर्याप्त है)। आदिवासियों को एक बंडल के लिए 10 पैसे मिल रहे थे – एक बंडल में बांस के 20 तने होते हैं (थापर इससे कितना मुनाफा कमा रहा था, यह बताने के लोभ में मैं नहीं पड़ना चाहती)। लंबे समय तक चले आंदोलन, हड़ताल, फिर पेपर मिल के अधिकारियों के साथ सबके सामने खुली बातचीत के बाद दाम को बढ़ा कर तीस पैसे कर दिया गया। आदिवासियों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने वादे तो किये थे, लेकिन पूरे करने के कोई संकेत नहीं दिये। इसके बाद लोग पीडब्ल्यूजी के पास उसमें शामिल होने के लिए आने लगे।

सात स्क्वाड की टीम ने काफी लंबा रास्ता अब तय कर लिया था। इसका प्रभाव अब 60,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र, हजारों गांवों और लाखों लोगों के बीच था।

लेकिन वन विभाग का खात्मा पुलिस के आने का सबब बन गया था। अब खून-खराबे का सिलसिला चल निकला। पुलिस की फर्जी मुठभेड़, पीडब्ल्यूजी का घेराव। जमीन के पुनर्वितरण के बाद दूसरी जिम्मेदारियां भी आ गयीं : सिंचाई, खेती की पैदावार और आबादी बढ़ने की समस्या, जिसके चलते जंगल भूमि साफ होती जा रही थी। इसके बाद ‘जन कार्रवाई’ और ‘सैन्य कार्रवाई’ को अलग करने का फैसला लिया गया।

लोहंडीगुड़ा, जहां महज पांच घंटे में गाड़ी चला कर दंतेवाड़ा से पहुंचा जा सकता है, कभी भी नक्सली इलाका नहीं था। लेकिन आज है। कॉमरेड जूरी उसी इलाके में काम करती है। मैं चींटियों की चटनी खा रही थी, तब वह मेरे बगल में ही बैठी थी। वह बताती है कि उन्होंने वहां तब जाने का फैसला किया, जब गांवों की दीवारों पर लोग रंगने लगे, नक्सली आओ, हमें बचाओ। कुछ ही महीने पहले ग्राम पंचायत अध्यक्ष विमल मेश्राम को सरे बाजार गोली मार दी गयी थी। जूरी कहती है, ‘वह टाटा का आदमी था। वह लोगों पर जमीन देकर मुआवजा लेने का जबरन दबाव बना रहा था। ठीक ही हुआ कि वह खत्म हो गया। हमारा भी एक कॉमरेड हालांकि चला गया। उन्होंने उसे गोली मार दी। आप और चपोली लेंगी?’ वह सिर्फ 20 बरस की है। ‘हम टाटा को वहां नहीं आने देंगे। लोग नहीं चाहते कि वे आएं।’ जूरी पीएलजीए की नहीं है। वह पार्टी की सांस्कृतिक इकाई चेतना नाट्य मंच में है। वह गाती है। गीत भी लिखती है। अबूझमाड़ की रहने वाली है। (उसने कॉमरेड माधव से ब्याह किया है। माधव जब मंच की टुकड़ी के साथ गाते हुए उसके गांव आये थे, तो उसे उनसे प्रेम हो गया था)।

मुझे लगा कि अब कुछ कहना चाहिए। हिंसा की व्यर्थता के बारे में, या फिर जान से मार देने के संक्षिप्त फैसलों पर। लेकिन मैं उन्हें क्या करने को कहती? कि वे अदालत में जाएं? या दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना करें? रैली निकालें? या फिर आमरण अनशन पर बैठ जाएं? अजीब हास्यास्पद बात होती। नयी आर्थिक नीति के प्रचारकों से – जिनके लिए यह कहना काफी आसान होता है कि ‘देयर इज नो आल्टरनेटिव’ – पूछा जाना चाहिए कि वे एक वैकल्पिक प्रतिरोध नीति भी सुझाएं। बिल्कुल इन लोगों के हिसाब से, जो इस जंगल के हिसाब से फिट बैठती हो। अभी, इसी वक्त। आखिर ये लोग किस पार्टी को वोट दें? इस देश की किस लोकतांत्रिक संस्था के पास ये गुहार लगाएं? आखिर ऐसा कौन सा दरवाजा बचा है, जो नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बड़े बांधों के खिलाफ अपने बरसों से चल रहे संघर्ष के दौरान न खटखटाया हो?

अब अंधेरा हो चुका था। कैंप में काफी चहल-पहल थी, लेकिन मैं कुछ नहीं देख पा रही थी। बस कुछ प्रकाश बिंदु हरकत करते से दिख रहे थे। कह पाना मुश्किल है कि वे तारे थे, पतंगे या फिर माओवादी। अचानक नन्हा मंगतू प्रकट होता है। मुझे पता चलता है कि वह यंग कम्युनिस्ट्स मोबाइल स्कूल की पहली पीढ़ी का सदस्य है, जिन्हें साम्यवाद के बुनियादी सिद्धांतों को पढ़ना, लिखना और समझना सिखाया जा रहा है (जिसको लेकर हमारा कॉरपोरेट मीडिया भौंकता रहता है, ‘युवा मस्तिष्कों का सैद्धांतीकरण’। जो टीवी विज्ञापन बच्चों के कुछ सोचने-समझने के काबिल होने से पहले ही उनका ब्रेनवॉश कर देते हैं, उसे सैद्धांतीकरण के रूप में नहीं देखा जाता)। किशोर कम्युनिस्टों को न तो बंदूक रखने दी जाती है और न ही वर्दी पहननी होती है। लेकिन वे पीएलजीए के दस्तों के साथ अपनी आंखों में तारों की चमक लिये बिल्कुल किसी रॉक बैंड की तरह चलते रहते हैं।

हमारे चलने से पहले कॉमरेड वेणु पास आते हैं, ‘तो ठीक है कॉमरेड, मैं इजाजत चाहूंगा।’ मुझे एकबारगी झटका लगता है। एक गर्म टोपी और चप्पलों में वह एक छोटे से कीड़े की भांति लग रहे थे, अपने तीन महिला और तीन पुरुष गार्डों से घिरे हुए। सभी हथियारों से लैस थे। उन्होंने कहा, ‘कॉमरेड हम आपके बहुत आभारी हैं कि आप इतनी दूर से यहां तक आयीं।’ एक बार फिर हम हाथ मिलाते हैं और भिंची मुट्ठियां लहराती हैं, ‘कॉमरेड, लाल सलाम।’ वह जंगलों में कहीं गुम हो जाते हैं। उनके पास इन जंगलों की चाबी है। एक पल में ऐसा लगता है कि जैसे वे यहां कभी थे ही नहीं। मैं कुछ देर के लिए असहाय सी हो गयी थी, लेकिन मेरे पास सुनने के लिए उनकी घंटों की रिकॉर्डिंग है। और जैसे-जैसे ये दिन हफ्तों में बदलते जाएंगे, मैं ऐसे तमाम लोगों से मिलूंगी जो उस खांचे में रंग और शब्द भरेंगे जो उन्होंने मेरे लिए बनाया है। अब हम उल्टी दिशा में चलने लगे। कॉमरेड राजू, जिनके शरीर से एक मील दूर से ही आयोडेक्स महक रहा था, मुस्कुरा कर कहते हैं, ‘मेरे घुटने तो गये। अब तो मैं मुट्ठी भर पेनकिलर लेकर ही चल पाऊंगा।’

कॉमरेड राजू बिल्कुल सही हिंदी बोलते हैं और मनोरंजक किस्से एकदम मारक तरीके से सुनाते हैं। वे रायपुर में 18 साल तक वकालत कर चुके हैं। वह और उनकी पत्नी दोनों ही पार्टी में थे और पार्टी के शहरी नेटवर्क का हिस्सा थे। 2007 के अंत में रायपुर नेटवर्क का एक अहम व्यक्ति गिरफ्तार हो गया, उसे प्रताड़ित किया गया और अंत में मुखबिर बना दिया गया। उसे पुलिस ने एक बंद वाहन में बैठाकर रायपुर का चक्कर लगवाया और पुराने साथियों की निशानदेही करने को कहा। कॉमरेड मालती इन्हीं में से एक थीं। 22 जनवरी 2008 को उन्हें कई अन्य के साथ गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने सलवा जुडुम में किये गये अत्याचार के वीडियो वाली सीडी कई सांसदों को भेजी थी। उनका मामला कभी-कभार ही सुनवाई के लिए आता है क्योंकि पुलिस जानती है कि मुकदमा कमजोर है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत पुलिस के पास उन्हें बगैर जमानत के बरसों तक अंदर रखने की छूट मिली हुई है। कॉमरेड राजू कहते हैं, ‘अब सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस की तमाम टुकड़ियां तैनात कर दी हैं ताकि बेचारे सांसदों की उन्हें भेजी गयी चिट्ठियों से सुरक्षा की जा सके।’ वह नहीं पकड़ा गया क्योंकि उस वक्त वह एक बैठक में दंडकारण्य आया हुआ था। तब से वह यहीं है। उसके दो छोटे बच्चे जो घर पर अकेले रह गये थे, पुलिस ने उनसे बहुत पूछताछ की। आखिरकार, ये बच्चे एक अंकल के साथ रहने चले गये और समूची गृहस्थी ही उठ गयी। कॉमरेड राजू को कुछ ही हफ्तों पहले पहली बार अपने बच्चों की खबर मिली। आखिर, उनके पास अपनी हंसी को बचाये रखने की ताकत और क्षमता कहां से आती है? जितना इन्होंने झेला है, उसके बाद भी ये क्यों लगातार आगे बढ़ पा रहे हैं? जाहिर है, पार्टी के लिए उनका प्यार, आस्था और एक उम्मीद इसके पीछे है। मेरा बार-बार तमाम निजी तरीकों से और कहीं ज्यादा गहराई में इस तथ्य से साक्षात्कार होता है।

अब हम सब एक साथ चल रहे हैं जहां मैं हूं और साथ हैं एक सौ ‘विवेकहीन रूप से हिंसक’ खून के प्यासे अतिवादी। कैंप छोड़ने से पहले मैंने एक नजर चारों ओर देखा था। एक भी निशान नहीं था इस बात का कि यहां करीब सौ लोगों ने डेरा डाला था, सिवाय राख के जहां आग जलायी गयी थी। मुझे इस सेना पर सहज भरोसा नहीं होता। जहां तक उपभोग का सवाल है, यह किसी भी गांधीवादी से ज्यादा गांधीवादी हैं और जलवायु परिवर्तन पर उपदेश देने वालों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन के मामले में सबसे आदर्श। लेकिन, फिलहाल तो विनाशकारी कामों में भी यह गांधीवादी रणनीति ही अपनाती है। मसलन, किसी पुलिस वाहन को जलाने से पहले उसके एक-एक हिस्से को तोड़ कर अलग कर लिया जाता है। स्टीयरिंग को सीधा करके भरमार बना ली जाती है, रेक्सीन को फाड़ कर हथियार रखने वाला पाउच और बैटरी को सोलर चार्जिंग में इस्तेमाल किया जाता है (अब हाईकमान से निर्देश आये हैं कि कब्जाये गये वाहनों को जलाया न जाए बल्कि दफना दिया जाए, ताकि जब जरूरत पड़े उन्हें दुरुस्त किया जा सके)।

अब हम घुप्प अंधेरे और मुर्दा शांति में चले जा रहे हैं। अकेली मैं हूं जो टॉर्च का इस्तेमाल कर रही हूं, वह भी नीचे की ओर ताकि हद से हद उसकी रोशनी में मुझे कॉमरेड कमला के पैर दिखते रह सकें और मैं जान सकूं कि मुझे कहां कदम रखना है। वह मुझसे 10 गुना ज्यादा वजन उठा रही है। अपना बैकपैक, राइफल, सिर पर रसद का एक भारी बैग, खाना पकाने वाला एक बर्तन और दोनों कंधों पर सब्जियों से भरे हुए झोले। उसके सिर पर रखा बैग जबरदस्त तरीके से संतुलित है और वह उन्हें बगैर हाथ लगाये ढलानों और फिसलनदार पथरीले रास्तों पर उतर सकती है। यह एक चमत्कार है। हम काफी लंबा चल चुके हैं। मैं इतिहास के अपने सबक की आभारी हूं क्योंकि उन तमाम चीजों के अलावा जो उससे मुझे मिलीं, कम से कम पूरे एक दिन मेरे पैरों को पूरा आराम मिला। जंगल में रात में पैदल चलना शायद सबसे खूबसूरत चीज है।

और अब मैं हर रात यही करने जा रही हूं।

नया दिन। नयी जगह। महुआ के विशाल पेड़ों तले उसिर गांव के बाहरी इलाके में हमने कैंप किया है। महुआ में अभी-अभी फूल आने शुरू हुए हैं और जंगल की छाती पर उसके मटमैले हरे ये फूल गहनों की तरह चू रहे हैं। हवा में इसकी मादकता घुली हुई है, जो सिर पर चढ़ रही है। हम भाटपाल स्कूल के बच्चों का इंतजार कर रहे हैं। ओंगनार की मुठभेड़ के बाद इसे बंद कर दिया गया था और अब यह पुलिस कैंप बन चुका है। बच्चों को घर भेज दिया गया। यही हाल नेलवाड़, मूंजमेट्टा, एडका, वेदोमकोट और धनोरा का है।

भाटपाल स्कूल के बच्चे नहीं आते।

मोस्ट वांटेड कॉमरेड नीति और कॉमरेड विनोद हमें एक लंबी सैर पर ले जाते हैं, जहां वे हमें स्थानीय जनताना सरकार द्वारा बनाये गये जल संग्रहण के ढांचे और सिंचाई तालाब दिखाते हैं। कॉमरेड नीति तमाम कृषि समस्याओं के बारे में बताती हैं। यहां सिर्फ दो फीसदी जमीन सिंचित है। दस साल पहले तक तो अबूझमाड़ में जुताई के बारे में सुना तक नहीं गया था। दूसरी ओर, गढ़चिरौली में संकर बीज और रासायनिक कीटनाशक तक घुस आये हैं।

कॉमरेड विनोद कहते हैं, ‘हमें अपने कृषि विभाग में तत्काल मदद की जरूरत है। हमें ऐसे लोग चाहिए जो बीज, जैविक खाद आदि के बारे में जानते हों। जरा सी मदद से हम बहुत कुछ कर ले जाएंगे।’

जनताना सरकार के इस इलाके के प्रमुख किसान हैं, कॉमरेड रामू। वह काफी गर्व से अपने खेत दिखाते हैं, जहां चावल, बैंगन, गोंगुरा, प्याज, कोलराबी उगाये गये हैं। इसके बाद उतने ही गर्व से वह हमें बहुत विशाल, लेकिन पूरी तरह सूखा हुआ एक सिंचाई तालाब दिखाते हैं। ये क्या है? ‘इसमें बरसात में भी पानी नहीं होता। दरअसल, यह गलत जगह खोदा गया है।’ यह कहते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, ‘यह हमारा नहीं है, इसे लूटी सरकार ने खोदा है।’ यहां दो समानांतर सरकारें हैं। जनताना सरकार और लूटी सरकार यानी लुटेरों की सरकार। मुझे कॉमरेड वेणु याद आते हैं : वे हमें सिर्फ इसलिए नहीं कुचलना चाहते कि उन्हें खनिज चाहिए, बल्कि इसलिए कि हम दुनिया को एक वैकल्पिक मॉडल दे रहे हैं।

हालांकि अब तक यह कायदे से विकल्प नहीं बन सका है – बंदूक के साथ ग्राम स्वराज का विचार। यहां जबरदस्त भुखमरी है, ढेरों बीमारियां हैं। इसके बावजूद इसने विकल्प की संभावनाएं तो पैदा की ही हैं। पूरी दुनिया के लिए नहीं, न अलास्का के लिए, न ही नयी दिल्ली के लिए और शायद समूचे छत्तीसगढ़ के लिए भी नहीं – सिर्फ अपने लिए। दंडकारण्य के लिए। और यह दुनिया का सबसे गूढ़ और गोपनीय रहस्य है। इसने अपने विनाश के एक विकल्प की नींव रखी है। इसने इतिहास को झुठलाया है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद इसने अपने वजूद का एक खाका तैयार कर ही लिया। और आज इसे जरूरत है सहयोग की। इस जगह को डॉक्टर चाहिए, शिक्षक चाहिए, किसान चाहिए।

यहां युद्ध नहीं चाहिए।

लेकिन अगर इसे इन सबकी जगह सिर्फ युद्ध मिलता है, तो यह पलट कर मारेगा।

अगले कुछ दिनों के दौरान मेरी मुलाकात केएएमएस के नेताओं से होती है। जनताना सरकार के कई पदाधिकारी, दंडकारण्य आदिवासी किसान-मजदूर संगठन के सदस्यों समेत मैं मारे गये लोगों के परिवारों से भी मिलती हूं। और उन आम लोगों से भी, जो इतने भीषण समय में जीवन को संभालने की जद्दोजहद में लगे हैं।

इस शांत से दिखने वाले जंगल में जीवन का पूरी तरह सैन्यकरण हो चुका है। लोगों को कॉर्डन एंड सर्च, फायरिंग, एडवांस, रिट्रीट, एक्शन जैसे शब्द आते हैं। अपनी फसले काटने के लिए उन्हें पीएलजीए की जरूरत पड़ती है ताकि उसका संतरी गश्त दे सके। बाजार तक जाना तो एक फौजी कार्रवाई जैसा है। सारे बाजार मुखबिरों से भरे हुए हैं जिन्हें पुलिस ने पैसा देकर खरीद लिया है। मुझे बताया जाता है कि नारायणपुर में तो एक ‘मुखबिर मोहल्ला’ ही है, जहां कम से कम 4000 मुखबिर रहते हैं। आदमी तो खैर अब बाजार जा ही नहीं पाते। महिलाएं जाती हैं, लेकिन उन पर कड़ी नजर रहती है। वे जरा सा भी ज्यादा खरीदारी कर लें, तो पुलिस तुरंत आरोप लगाती है कि वे नक्सलियों के लिए खरीद रही हैं। दवा की दुकानों को साफ निर्देश है कि लोगों को बेहद कम मात्रा में दवाइयां दी जाएं। जन वितरण प्रणाली के तहत राशन की चीनी, चावल और मिट्टी का तेल पुलिस स्टेशनों के आसपास या उनके भीतर भंडारित किया जाता है, जिससे उसे खरीदना लोगों के लिए तकरीबन असंभव होता है।

आखिरी रात हम एक खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ के नीचे रुके। सवेरे हमें इसे पार कर सड़क पर निकलना था, जहां से एक मोटरसाइकिल मुझे ले जाएगी। पहली बार जब मैं इस जंगल में घुसी थी, तब से लेकर अब तक यह जंगल बदल चुका है। अब चिरौंजी, कपास और आम में बौर आने लगे हैं।

कुडुर गांव के लोगों ने हमारे लिए कैंप में ताजा पकड़ी हुई मछली से भरा एक बड़ा सा मटका भिजवाया है। और साथ में मेरे लिए उन 71 किस्म के फलों, सब्जियों, दालों और कीड़ों के नामों और उनके बाजार दाम की एक सूची भी, जो उन्हें जंगल में मिलते हैं या जिन्हें वे उगाते हैं। यह सिर्फ एक सूची है, लेकिन यह एक दुनिया का नक्शा भी है।

हम जंगल पोस्ट तक पहुंचते हैं। फिर से दो बिस्कुट! कॉमरेड नर्मदा की ओर से एक कविता और एक पिचका हुआ फूल मुझे भेंट किया जाता है! और एक प्यारा-सा खत मासे की ओर से (कौन है वह? क्या मैं कभी जान पाऊंगी?)।

कॉमरेड सुखदेव पूछते हैं कि क्या वह मेरे आइपॉड में से एक गीत अपने कंप्‍यूटर में डाल सकते हैं। हम सुनते हैं, फैज अहमद फैज का लिखा शेर, इकबाल बानो की आवाज में, जो उन्होंने जिया-उल-हक की जुल्मतों के चरम दौर में लाहौर के एक मशहूर कंसर्ट में गाया था -

जब अहल-ए-सफ़ा-मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाये जाएंगे सब ताज उछाले जाएंगे सब तख्त गिराये जाएंगे हम देखेंगे।

पाकिस्तान में इस गीत को सुनने वाले पचास हजार श्रोताओं के मुंह से इसके बाद बस एक ही आवाज निकली थी : इंकलाब जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!

इतने सालों बाद यही नारा इस जंगल में गूंज रहा है। अजीब बात है। रिश्ते भी कैसे-कैसे बन जाते हैं।

(यह लेख आउटलुक अंग्रेजी में छपे अरुंधति रॉय के लेख वॉकिंग विद द कॉमरेड्स का संपादित और अनूदित अंश है। इसका अनुवाद युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है।)

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