इलिना आप अदालत के फैसले को किस तरह से देखती हैं ?
05 जनवरी 2011
हम जीते न जीतें पर हम लड़ेंगे
इलिना आप अदालत के फैसले को किस तरह से देखती हैं ?
04 जनवरी 2011
देश को विनायक सेन जैसे देशद्रोहियों की जरूरत है.
डॉ. बिनायक सेन को माओवादियों की मदद करने के आरोप में छत्तीसगढ़ की रायपुर निचली अदालत ने २४ दिसम्बर को अन्य दो अभियुक्तों पियुष गुहा और नारायण सान्याल के साथ आजीवन कैद की सजा सुनायी थी. जिसके बाद पूरे देश व दुनिया भर में इस सजा के खिलाफ प्रदर्शन हुए और लोगों ने उनके तत्काल रिहाई के मांग की है. जुलूस में सरकार के जन विरोधी नीतियों तथा माओवाद के नाम पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ नारे लगाये गये. इलाहाबाद की पत्रकार सीमा आज़ाद व छात्र नेता विश्वविजय व उत्तराखण्ड के प्रतिष्ठित पत्रकार प्रशांत राही की भी रिहाई की मांग ऊठाई गयी. देश में भ्रष्ट प्रशासकों के द्वारा बनाये गये अलोकतांत्रिक कानूनों के तहत राज्य व केन्द्र सरकारें आम जनता के नेताओं को जेलों में बंद कर रही हैं जबकि राडिया, राजा, अशोक चव्हान जैसे कलंकित नेता बेफिक्र घोम रहे हैं. लोगों ने कहा कि अगर देश की जनता के साथ लड़ना देशद्रोह है तो हम सब देश द्रोही हैं और हम देशद्रोही बनेगे. जुलूस में शामिल लोगों ने एक कागज अपने ऊपर चस्पा कर सरकार को यह संदेश दिया कि आम जनता के नेताओं को देशद्रोही कहना बंद करे और माओवाद के नाम पर चल रहे दमन चक्र को खत्म करे. जुलूस ने सलवा-जुडुम के खिलाफ नारे लगाये और इसे सरकार प्रायोजित बताते हुए कहा कि यह आदिवासियों का आदिवासियों से लड़ाया जाना है जिसमे अन्ततः आदिवासी मारे जायें और सरकार जंगलों पर कब्जा कर देश की सम्पत्ति पूजीपतियों के हवाले कर सके. लोगों ने आवाह्न किया कि प्रतिरोधी ताकतों को एक मंच पर आना चाहिये और युवाओं को अपने अन्धकारमय भविष्य के खिलाफ लड़ना चाहिये. प्रोफेसर मनोज कुमार ने कहा कि गांधी के ऊपर देश द्रोह लगाया गया था यह साठ साल पहले की बात है आज बिनायक सेन हमारे बीच गाँधी के प्रतीक के रूप में हैं और इस देश को बिनायक सेन जैसे देशद्रोहियों की ही जरूरत है. किसान नेता विजय जावंधिया ने कहा कि देश के किसान मर रहे हैं और इसका मूलभूत कारण देश की वितरण प्रणाली है और बिनायक सेन इसीलिये लड़ रहे थे कि आदिवासियों और वंचितों को भी संसाधन मुहैया हो, उन तक भी स्वास्थ्य सुनिधायें पहुंचे. नागपुर से आये कॉ. सरोज ने कहा कि वर्धा में माओवादी के नाम पर गिरफ्तार किये गये सुधीर ढेवले जो कि बिद्रोही पत्रिका के सम्पादक हैं की भी रिहाई होनी चाहिये. क्योंकि सरकार दलित चिंतकों और ऐसे लोगों को माओवादी के नाम पर गिरफ्तार कर रही है जो सही मायने में देश के सामाजिक कार्यकर्ता हैं उन्होंने युवाओं से आवाह्न किया कि वे आगे आयें और ऐसी दमनकारी नीतियों का खुलकर विरोध करें. बिनायक सेन की पत्नी इलिना सेन ने कहा कि छत्तीसगढ़ की सरकार ने बिनायक सेन के खिलाफ साजिस करना उसी समय शुरू कर दिया था जब बिनायक सेन ने देश के तमाम मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर सलवा-जुडुम की स्थिति को सामने लाया था. इसके बाद पुलिस उनके खिलाफ झूठे सबूत पेश करती रही पर न्यायपालिका से उम्मीद थी कि वह इसकी जाँच करेगी जाँच करने के बजाय न्यायपालिका ने छत्तीसगढ़ की पुलिस के चार्जशीट को ही समर्थन दे दिया. प्रोफेसर सूरज पालीवाल ने कहा कि बिनायक सेब्न का देशद्रोह यही है कि वे आमजन के पक्ष में बोल रहे थे और यह सरकार आमजन की नहीं है बल्कि यह पूजीपतियों की है समय आ गया है कि हम इसके खिलाफ लड़े इसकी परवाह किये बगैर कि कल हम भी गिरफ्तार किये जा सकते है. अनुज शुक्ला ने अपने वक्तव्य में कहा कि हम इस देश की संरचना में आखिर कहा जायें? जबकि सब भ्रष्ट हो चुकी हैं. और सरकार सभी तरह के प्रतिरोध को माओवादी करार दे रही है. अब देश की जनता देशद्रोही है और जिंदल, टाटा, मित्तल देश प्रेमी. अन्य वक्तव्यों के तहत यह सवाल उठा कि देश का बड़ा वर्ग माओवादी क्यों होता जा रहा है इस पर भी विचार किये जाने की जरूरत है क्या यह संरचना ही अलोकतांत्रिक हो चुकी है. सभा में विश्वविद्यालय के छात्रों की तरफ से जन गीत की भी सुंदर प्रस्तुति की गयी जिसमें देश की स्थितियों को दर्शाते हुए समाज के बदलाव की जरूरतों को इंगित किया गया.
01 जनवरी 2011
कश्मीर की स्थिरता
28 दिसंबर 2010
लोकतंत्र को उम्रकैद :- प्रणय कृष्ण
यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे--बंब संब की छोड़ो, भाशण दिया कि पकड़े जाओगे !निकला है कानून नया, चुटकी बजते बँध जाओगे,न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे,कांग्रेस का हुक्म; जरूरत क्या वारंट तलाशी की ! “
ऊपर की पंक्तियों में ब़स कांग्रेस के साथ भाजपा और जोड़ लीजिए.आश्चर्य है कि साक्ष्य होने पर भी कश्मीर में शोंपिया बलात्कार और हत्याकांड के दोषी, निर्दोष नौजवानॉं को आतंकवादी बताकर मार देने के दोषी सैनिक अधिकारी खुले घूम रहे हैं और अदालत उनका कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वे ए.एफ.एस. पी.ए. नामक कानून से संरक्षित हैं, जबकि साक्ष्य न होने पर भी डा. बिनायक को उम्र कैद मिलती है. - मित्रों मैं यही चाहता हूं कि जहां जिस किस्म से हो , जितनी दूर तक हो हम डा. बिनायक सेन जैसे मानवरत्न के लिए आवाज़ उठाएं ताकि इस देश में लोग उस दूसरी गुलामी से सचेत हों जिसके खिलाफ नई आज़ादी के एक योद्धा हैं डा. बिनायक सेन.
25 दिसंबर 2010
ये युद्ध है और हम इसमें शामिल हैं

13 दिसंबर 2010
लवासा नेतृत्व हीनता में बंद पड़ी लड़ाई
चन्द्रिका10 दिसंबर 2010
गोपनीयता बरतने का अमेरिकी करतब
05 दिसंबर 2010
संसदीय राजनीति एक नाटकघर है

दिलीप खान
टू जी घोटाले को लेकर चल रहे संसदीय गतिरोध पर प्रणब मुखर्जी ने यह टिप्पणी की कि भाजपा को भ्रष्टाचार पर बोलने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तहलका कांड का उदाहरण देते हुए कहा कि उसमें भाजपा अध्यक्ष सीधे-सीधे कैमरे के सामने रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे. मुखर्जी के बोलने का कुल लब्बोलुआब यह है कि एक ऐसी पार्टी जो खुद कभी रिश्वत लेने के आरोप में राष्ट्रीय सुर्खियां बटोर चुकी है वह कैसे उसी मुद्दे पर दूसरी पार्टी को घेर सकती है? अगर इस बात को केंद्रीय भाव मानकर देश की संसद चले तो शायद किसी भी पार्टी के पास भ्रष्टाचार पर बोलने का अधिकार न हो और संसद में घोटाले का कोई मामला ही ना बने! कर्नाटक में भूमि आबंटन में हुई अनियमितता के प्रश्न पर विपक्षी जनता दल (से.) ने जब येदियुरप्पा सरकार को घेरा तो मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने लगा. राज्य में भाजपा के भीतर का भी एक धड़ा मौजूदा मुख्यमंत्री की ख़िलाफ़त करके नेतृत्व परिवर्तन पर ज़ोर दे रहा था. इन विरोधों के बीच जब उनके के इस्तीफ़े/बर्खास्तगी की मांग जोरों से चल रही थी, येदियुरप्पा ने आत्मविश्वास से लबरेज होकर कहा कि वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे. येदियुरप्पा के आत्मविश्वास का स्रोत प्रणब मुखर्जी के सुझाए रास्ते से ही जाकर मिल जाता है.
जिगनी में दो एकड़ ज़मीन येदियुरप्पा के बेटे राघवेंद्र् और विजयेंद्र के नाम आबंटित की गई थी. विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शनों के बीच येदियुरप्पा ने कहा कि ये ज़मीन उसी तर्ज पर मेरे बेटों को आबंटित की गई है जैसे पूर्व काँग्रेस अध्यक्ष आर वी देशपांडे के बेटे प्रसाद देशपांडे, पूर्व जनता दल मुख्यमंत्री जे एच पटेल के बेटे महिमा पटेल और पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारास्वामी के भाई बालकृष्णा गौड़ा को आबंटित की गई थी. उनके कहने का भी मुख्य भाव यही था कि उन नेताओं से संबंद्ध पार्टी भूमि आबंटन के मुद्दे पर कैसे किसी को इतने अधिकार भाव से घेर सकती है? संसदीय राजनीति में एक ही सप्ताह में दो धुर विरोधी पार्टियां अपने बचाव में एक ही तर्क का सहारा लेती है और इस तर्क पर टिप्पणी करने के बजाए प्रत्येक दूसरी पार्टी यह उम्मीद बांधे खड़ी नज़र आती है कि वे भी किसी मौजूं समय पर इस अचूक तर्क का सहारा लेंगी. और इस तरह रस्सा-कस्सी का यह दिलचस्प खेल लंबा चलेगा.
येदियुरप्पा ने यह भी घोषणा की कि वे पिछले सोलह सालों में आबंटित ज़मीन की जांच करवाएंगे. इन अवधियों में ज़्यादातर उन्हीं दलों की सरकार सत्ता में रही है जो इस समय विपक्ष में बैठे हैं. विपक्षियों पर खेला गया यह ऐसा दांव था कि अचानक से पूरा परिदृश्य बदल गया. येदियुरप्पा मामले के अध्याय की लंबाई घट कर खात्मे के कगार पर पहुंचती दिखने लगी. कर्नाटक पिछले कई महीनों के उथल-पुथल के बीच थोड़ा स्थिर लगने लगा है.
घोटालों और भ्रष्टाचारों को लेकर संसदीय राजनीतिक दलों के तमाम विरोध प्रदर्शन की कवायद संसद और जंतर-मंतर सरीखे स्थाई विरोध अड्डे तक ही सीमित है. नजारा बेहद दिलचस्प था जब एक ही दिन दो अलग-अलग जगहों पर दो अलग-अलग पार्टियां एक ही विषय को लेकर धरने पर बैठी थी. नारा भी एक ही था कि वे पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं. इन राजनीतिक दलों में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वे इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाए. इनका विरोध दिल्ली और विधानसभाओं तक ही सीमित है. अभी-अभी बिहार विधानसभा चुनाव में पटखनी खाने के बाद प्रेस काँफ़्रेंस में रामविलास पासवान कह रहे थे कि नीतिश सरकार पर कैग की रिपोर्ट से स्पष्ट हुई अनियमितताओं को वे जनता के बीच मुद्दा नहीं बना पाए. वे कह रहे थे कि बिहार में विकास का हौव्वा खड़ा किया गया, जिसके सहारे नीतिश ने सियासी कुर्सी हासिल की. कैग की रिपोर्ट से जाहिर हुई अनियमितता हज़ारों करोड़ रुपए की थी. लेकिन प्रश्न यही है कि विपक्षी दल इसे मुद्दा क्यों नहीं बना पाए? मुख्य विपक्षी दल राजद के नाम चारा घोटाले का एक बड़ा-सा बिल्ला चस्पां है. वे जानते हैं कि घोटाले का विरोध करने पर प्रति-प्रश्न के तौर पर उसके सामने उसी का गोटा फेंका जाएगा और उसके वजन से वे उबर नहीं पाएंगे.
हमारे सामने भ्रष्टाचार की एक अंतहीन परंपरा विकसित की जा रही है. राष्ट्रमंडल, आदर्श सोसाइटी, कर्नाटक, बिहार, टू जी स्पेक्ट्रम के मुद्दे कुछ महीनों में ही एक- दूसरे को ओवरलैप करते दिखते हैं. सबसे तात्कालिक कौन है यह स्पष्ट करना मुशिक्ल हो गया है. साथ ही, यह तय करना भी मुश्किल हो गया है कि आरोपी कौन है और आरोपित कौन? समय-स्थान के साथ आरोप का पद बदलता रहता है. संसद की चहारदीवारियों के भीतर भ्रष्टाचार की अनुगूंज में प्रत्येक राजनीतिक दलों के नेता लंबे-लंबे लबादा ओढ़ कर आते हैं और घोटाले के इस महानाटक में अपनी भूमिका को बेहद सफाई से निभाने का हर संभव प्रयत्न करते हैं. जनता इस नाटक का मज़बूर प्रतिबद्ध दर्शक है.
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है)
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