25 मार्च 2010

क्या जो घर्म निरपेक्ष होगा वो लोकतांत्रिक भी होगा?


अनिल चमडिया

जब दिल्ली स्थित आल इंडिया इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ( एम्स) मंडल-दो विरोधी आंदोलन का केन्द्र बना हुआ था उस समय उसके निदेशक डा. के वेणुगोपाल थे। एम्स के आरक्षण विरोधी आंदोलन का केन्द्र बनाने में हृदय रोग विशेषज्ञ डा. वेणुगोपाल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि किसी की जिस भूमिका को लेकर कोई कुछ कहना चाहता हो तो उस भूमिका पर बात करने के बजाय उस व्यक्ति या संस्था की किसी दूसरी भूमिका को सामने रख दिया जाता है। डा. वेणुगोपाल देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर के हृदय (अपनी ओर से- मनुष्य के ) विशेषज्ञ है।लेकिन उनकी आरक्षण विरोधी भूमिका को सुनने को कई लोग तैयार नहीं थे। कहा जाने लगता कि ये देश की एक निधि हैं। जबकि उनकी डाक्टरी की अलोचना नहीं की जा रही थी बल्कि बतौर एम्स निदेशक उनकी जातिवादी मानसिकता और आरक्षण विरोधी भूमिका को लेकर बातचीत करने की कोशिश की जा रही थी।

ऐसा नहीं है कि जो लोग ऐसा करते है वे समझते नहीं हैं। जिन्हें आरक्षण विरोध से चिंता नहीं थी वे डा. वेणुगोपाल की बेहतरीन डाक्टरी का रास्ता दिखाने में लगे थे। सबसे अच्छा तरीका होता है कि जिस विशेषण पर हमला हो उसकी शक्ल बदल दी जाए ताकि अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित रखा जा सके। मुख्य बात अपने हितों की सुरक्षा ही होती है। जैसे अटल बिहारी बाजपेयी ईमानदार है भारतीय राजनीति का ये सबसे ज्यादा प्रचारित विशेषण हैं। क्या कोई साम्प्रदायिक पैसे कौड़ी के मामले में ईमानदार नहीं हो सकता या इसके उलट कहा जाए कि क्या कोई ईमानदार साम्प्रदायिक नहीं हो सकता है?

हिटलर तानाशाह था ये तो हम सब जानते है लेकिन हो सकता है कि वह स्वीस बैंक में पैसे जमा करने की योजना को अनैतिक मानता हो। इसी तरह क्या कोई धर्म निरपेक्ष पैसे कौड़ी के मामले में बेईमान नहीं हो सकता है और क्या कोई बेईमान धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है? क्या कोई धर्मनिरपेक्षता का विशेषण धारण करने वाला जातिवादी नहीं हो सकता है? अपने समाज में बुनियादी तौर पर वैचारिक घटना के रूप में जो कुछ घटित हो रहा है उसे बतौर घटना सतह पर आने से ही रोक दिया गया है। इसकी वजह से वैचारिक स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है।दरअसल ये स्थितियों के भ्रामक बनाने की सबसे कारगर कवायद होती है।

अपने समाज में एक विशेषण से कई विशेषणों को कमवा देने की संस्कृति विकसित की गई है। किसी भी स्थिति, इसमें संगठन, व्यक्ति आदि सभी आते हैं, का मूल्यांकन करने और उसे ठीक ठीक सूत्रबद्ध करने की पद्धति में ही गड़बड़ी पैदा कर दी जाए तो जाहिर है कि स्थिति को दुरूस्त करने या बदलने की कोई कवायद सफल नहीं हो सकती है। इस काम को हमारे शासक वर्ग ने बड़ी साफगोई से पूरा किया है। लोगों में एक आदत या कहें कि एक संस्कृति विकसित कर दी है कि वे किसी को दिए जाने वाले एक विशेषण में कई कई विशेषण जोड़ लें।

जैसे किसी पुलिस अधिकारी ने अपने प्रशासनिक दायित्वों के तहत किसी बलवे वाज या साम्प्रदायिक व्यक्ति को गिरफ्तार किया तो उसे मान लिया जाए कि वह धर्म निरपेक्ष है? वह घर्म निरपेक्ष होगा तो लोकतांत्रिक भी होगा। वह ईमानदार भी होगा। इसका एक खतरा ये होता है कि वह इन सबकी आड़ में अपने पुलिसिया चरित्र को छिपा लेता है जिसकी वास्तव में दमनकारी मशीनरी के रूप पहचान बनी हुई हैं। वह धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कितनी और किस किस्म की बेईमानी करता है और किस हद तक वह लोकतंत्र के खिलाफ कार्रवाईयों को अंजाम देता है ये दर्ज ही नहीं हो पाती है। आखिर हम किसी भी विशेषण का स्वतंत्र अस्तित्व बने रहने देने में क्यों घबराते हैं ? क्या हमें किसी को भी देवता बना देने की आदत लगी हुई है ? और जब तक किसी के साथ कई कई विशेषण नहीं लगा दिए जाते हैं तब तक वह देवता कैसे बन सकता है?

एक गंभीर वैचारिक- सांस्कृतिक संकट है। यदि भक्तों की भाषा में बात की जाए तो उसने ढेर सारे नकली देवता खड़े कर दिए हैं। लेकिन बात केवल विशेषणों तक ही नहीं है। जब हमने इसे एक संस्कृति के रूप में यहां व्यक्त किया है तो वह वास्तव में एक संस्कृति के रूप में ही है और वह वास्तविक अर्थों या अपनी भाषा में कहें तो असलियत को छिपाने की पद्दति के रूप में दिखाई देती है। जैसे हमारे समाज में डिग्रीधारी लोगों को पढ़ा लिखा माना जाता है। इसमें समझदारी का भाव भी शामिल होता है और आधुनिक होने का भी भाव होता है। लेकिन ऐसा पढ़ा लिखा व्यक्ति जातिवादी भी होता है। दहेजखोर भी होता है। पुरूष-वेश्या भी होता है। अलोकतांत्रिक भी होता है। बेईमान भी होता है।

क्या साम्प्रदायिक होना आधुनिकता है? क्या पुरूष वेश्या होना आधुनिकता है? सामंतवाद के दौर के औरतखोर का ही तो ये रूप है? डाक्टर, इंजीनियर मध्ययुग के आसपास खड़े दिखाई देते हैं। हुआ ये है कि आधुनिक तकनीक के प्रशिक्षणर्थियों को हमने शिक्षाविद् और विद्वान मान लिया है। आधुनिकता का संबंध टाई, कोर्ट, जिंस और अंग्रेजी बोलने से नहीं है। आधुनिकता का सीधा संबंध विचारों से है। विचारों की कसौटी पर ही आधुनिकता परिभाषित होती है। लेकिन अपने आसपास ठहर कर देखे कि कैसे आधुनिकता का दर्जा पाने वाला हिस्सा बर्बर विचारों के साथ खड़ा है। जिन्हें देखकर सीधे मध्ययुग के इतिहास के पन्ने लड़खड़ाते दिखने लगते हैं। वास्तव में शिक्षा के दर्शन को ही विस्थापित कर दिया गया है। लेकिन हमें जरा सी सोचने की फूर्सत होती तो हम सोचते कि जब मनुष्य को संसाधन में तब्दील कर दिया गया है तो वह शिक्षा का कैसे हकदार बने रह सकता है?

आमतौर पर प्रशिक्षण को ही शिक्षा मान लिया गया है। प्रशिक्षण क्या होता है इससे जुड़े किस्से सुनाता हूं। एक बार संसद भवन में एम एस गिल का इंटरव्यू करना था। संसद में जाने का लेखक के पास स्थायी पत्र था। लेकिन जेब में टेप रिकोर्डर लेकर जाना था। प्रशिक्षण प्राप्त सुरक्षाकर्मी ने कहा कि टेप के साथ नहीं जा सकते है। उसे जिरह करना चाहता था। उसे बताया कि टेप में क्या है? उसने कहा कि टेप अलाउ नहीं है। मैंने कहा कि टेप तो जेब में भी है। मोबाईल में टेप, कैमरे सब होते है। मोबाईल को ले जाने की मनाही तो नहीं है। लेकिन वह उस टेप के बारे में रट लगाता रहा कि यह अलाउ नहीं है। प्रशिक्षण तर्क नहीं सिखाता है। वह अनुसरण करना सिखाता है। प्रशिक्षण एक मानसिक परिधि तय कर देता है।

एक पुलिस अधिकारी को विश्वविद्यालय में शैक्षणिक-प्रशासनिक कार्य देखने की जिम्मेदारी मिली। उसके खुफिया ने बताया कि एक कमरे में हीटर जलता है। हीटर छात्र के कमरे में नहीं एक टीचर के कमरे में जल रहा था। छात्रावासों के लिए तो हीटर जलाने की मनाही थी। लेकिन उसके प्रशिक्षण में यही बात समाई हुई थी कि हीटर जलाना मना है। लेकिन हीटर जलने की घटना को भी एक ही रूप में देख पा रहा था। हीटर का मतलब उसके लिए पुराने किस्म का पचहत्तर सौ रूपये वाला गोल मोटल हीटर था। लेकिन मजेदार बात कि वहां सभी कमरे में हीटर जल रहे थे और उसे हीटर कहीं नहीं दिख रहा था। क्योंकि दूसरे कमरे में जलने वाले हीटर नये नये रूप धारण किए हुए थे। जिस हीटर में चाय बनती है उसे वह हीटर नहीं मानता था। क्योंकि एक तो उसके रूप के बदलने के साथ उसका नाम भी बदल गया था। दरअसल यही मानसिकता और उसका विकास बौद्धिकता के पर्याय के रूप में स्थापित हो गई है जो कि एक नये किस्म की सैनिकशाही मानसिकता का आधार बनी हुई है।

समाज के बौद्धिक विकास को अवरूद्ध करने का यह सबसे कारगर तरीका है कि नदी की वास्तविक धारा के बीच में एक नई ऐसी धारा निकल दी जाए कि वास्तविक धारा के रूकने का भान ही नहीं हो। भाषा वहीं हो लेकिन उसके अंतर्वस्तु वर्चस्ववादी संस्कृति के अनुरूप बदल जाए। हम इस बात पर गौर करें कि ये काम दो तरह से हुआ है। एक तो भाषा पुरानी लेकिन उसके अतंर्वस्तु को अपने अनुरूप शासकों ने ढाल लिया है।

दूसरा काम ये हुआ कि शब्दों के अर्थ सीमित कर दिए गए है। सांस्कृतिक विकास की यात्रा इस रूप में सुनिश्चत होती है कि एक शब्द के भीतर के कई कई अर्थों के लिए नये नये शब्द विकसित हो। एक शब्द के विभिन्न अर्थ निकल सकते हो। शब्दों से निकलनी वाली ध्वनियां उसके इस्तेमाल किए जाने वाली जगह के अनुरूप उसके अर्थ को व्यक्त कर दें।पर्यायवाची शब्दों का भंडार इसी तरह विकसित हुआ है। लेकिन अब उलट स्थिति हो गई है। एक शब्द के एक ही अर्थ का प्रशिक्षण दिया जाता है। पर्यायवाची की पौध की जड़ में ही नमक डाल दिया गया है। हम एक विशेषण के कई कई पर्यायवाची तैयार कर लेते हैं। शासकों ने इस संस्कृति को इस कदर विकसित कर दिया है कि हम अपने विशेषण भूल गए है। जागरूक है। चेतना संपन्न है। आदि आदि। शासक अपने प्रशिक्षण से हमें कैसे तैयार कर रहा है? हम भूमंडलीकरण के प्रशिक्षणार्थी नागरिक बन रहे हैं

1 टिप्पणी:

  1. दोनों एक ही बात नहीं है....आपने सही कहा है....
    .....................
    यह पोस्ट केवल सफल ब्लॉगर ही पढ़ें...नए ब्लॉगर को यह धरोहर बाद में काम आएगा...
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_25.html
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

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