02 मार्च 2010

सुनो यह विलाप -आलोक श्रीवास्तव




अवध की एक शाम पुकारती है


लोगो सुनोलहू में डूबी,


वह शाम फैलती जाती है चारो ओर




बिछा दो तुम जाजम


रौशनियां


तुम्हारी कोई होली, कोई दीवाली, कोई ईद
उस मातम को छिपा नहीं पाएगी
जो इस मुल्क के बाशिंदों पर डेढ़ सौ साल से तारी



पूरा अवध खून में डूबा आज भी पुकारता है
ढही मेहराबों और ऊंचे बुर्जों के पीछे से एक कराह उठती है


गोमती का सूखा पानी
किसी ग़ज़ल में आज भी रोता है



इस लुटे पिटे शहर की वीरानी
क्या रोती है तुम्हारी रात में?
तुम अपने ही शहर के आंसू नहीं देख पाते!


जनरल नील का कत्लेआम
इलाहाबाद की दरख्त घिरी राहों से चलता
देखो दंडकारण्य तक जा पहुंचा है



पद्मा से सोन तक
मेरी प्रिया का वह लहराता आंचल था मेरे ख्वाब में झलकता
खून के धब्बे गाढ़े होते जाते हैं आज उस पर
और हत्यारों को तोपों की सलामी जारी है
तिरंगे की साक्षी में



सुनो अवध का विलाप
फैलता जा रहा है समूचे मुल्क में
मौत की, मातम की
गुलामी की रात तुम्हारे सिरहाने खड़ी है...

2 टिप्‍पणियां:

  1. दर्दनाक!! भाई ये आलोक कौन से हैं..अपुन तो कई आलोक से परिचित हैं..और भी लोग ऐसे होंगे..उनका परिचय भी दे दें.

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  2. alok sreevastav samvad prakashan se hai inaki kavita sangrah hai vera un sapno ki katha kaho yah bahut hi prasiddh kavita sangrah hai jo samvad prakashan se hi aayi hai.

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