17 अगस्त 2007

ये आजा़दी झूठी है, देश की जनता भूखी है-

15 अगस्त की आजा़दी को को प्रेम कुमार मणि कुछ ऐसा बयान करते है..........
बार-बार मन मे ये सवाल उठता है कि 15 अगस्त 1947 को किस रूप में लें क्या वह भारतीय राष्तवाद के चरम उतकर्स का दिन था-क्योंकि एक गुलाम राष्त उस रोज विदेशी वर्चस्व से मुक्त हुआ था,या कि उसके चरम पतन का दिन -क्योंकि राज्य उस रोज विखंडित हो गया था|ाजादी की लड़ाई में चाहे जितनी अहिंसा बरती गयी, आजादी का आगमन हिंसा की भयावहता के साथ हुआ | अमानवियता की हदे पार करते भीषण सांप्रदायिक दंगे, लूट, बलात्कार, विस्वासघात और क्रूरता को भूल जाना इतिहास के साथ धोखाधड़ी होगी|ऐसे परिद्रिश्य के बीच स्वतंत्रता की व्याख्या हम किस रूप में करें, तय करना मुश्किल होता है|
लेकिन हमारे बुर्जुआ इतिहासकारों, शिक्षको और नेताओं ने बार-बार 15 अगस्त की महानता के इतनें पाठ पढ़ाये हैऔर आज इन सबसे हमारा मन इतना प्रदूषित है कि इतिहास के दूसरे पहलू को हम बिल्कुल भूल चुके है| ताज्जुब होता है कि सूक्ष्म इतिहास बोध के नेता नेहरू ने खून से लथ-पथ आधी रात को जब "नियति से भेट" वाला प्रसिद्ध भाषण दिया तब भी उन पर इस वातावरण का कोइ असर नहीं था|वे तो मानों कविता पाठ कर रहे थे "आधी रात को जब दुनियाँ सो रही होगी,भारत जाग उठेगा..... दुनियाँ सो नहीं रही थी|संसद भवन के बाहर दंगे फसाद हो रहे थे, अस्मतें लूटी जा रही थी और लाखों लोग अपना-अपना वतन छोड़ करा अपनें-अपनें देश की ओर भाग रहे थे|हालांकि तब भी एसे लोग थे जिन्होंने यह आजादी झूठी है का नारा दिया था| उनके हाँथ में अखबार नहीं थे और उनके नारों को सजोकर रखने वाले इतिहासकार भी नहीं थे,इसलिये उनके बारे में नयी पीढी़ को जानकारी भुत कम है| लेकिन सच्चाई है कि भारत के बड़े हिस्से में आजा़दी के प्रति उदासीनता का भाव था|'देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है"जैसे नारे पूरे भारत के गाँव कस्बों में लगाये गये थे|राष्टपिता कहे जाने वाले आजादी के सबसे बड़े सेनानी ने स्वयं को आजादी के उत्सव से अलग रखा था|वह उनके शोक का दिन था|आज साठ साल बाद पूरे घटनाक्रम पर विचार करना एक अजीब किस्म की अनूभूति देता है| आजादी के संघर्ष के इतिहास की जिस तरह भारत-व्याकुल भाव से व्याख्या की गयी है , वह हमे और अधिक उलझाव में डालता है|ुसके अंतर्विरोध को सामने रखना सीधे देश द्रोह माना जा सकता है|किसी देश समाज में इतिहास और नायकों के प्रति ऐसी गलद्श्रुतापूर्ण भक्ति देखने को नही मिलती|इसलिये यह कहा जा सकता है कि पिछले साठ वर्षों में हमारे समाज में मानसिक गुलामी ज्यादा बढी़ है जब आजादी की लड़ाई चल रही थी तब विभिन्न तबकों ने अपने- अपने ढंग से अपनी भावनावों का इझार किया था| गांधी निःसंदेह बड़े नेता थे और उनका प्रभाव भी था लेकिन उनकी कमजोरियां भी थी| उस समय ही अंबेडकर और जिन्ना ने उनसे जाहिर की आज का समय होता तो सायद दोनों देशद्रोह में जेल में ठूस दिये जाते आंबेडकर ने तो अंग्रेजों से विमुक्तता को ही आजादी मानकर संतुस्ट था-क्योंकि भारत का राज-पाट अब उसके जिम्मे था|भारत के शासक तबके ने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर अंग्रेज विरोधी भाव को इतना घनीभूत कर दिया कि हम सामंतवादी ब्रहमणवादी गुलामी को पूरी तरह नजरअंदाज कर गये|इससे समाज के शासक तबके का स्वार्थ सधा और गुलामी का एक बडा़ फलक विकसित हुआ|इसलिये भारत के आधुनिक इतिहास पर नये सिरे से विमर्स की जरूरत है| यहाँ तक की अंग्रेजो की भूमिका पर हमे नये सिरे से चिंतन करना चाहियेआजा़दी की सैद्धांतिकी पर ही सवाल खड़े किये थे| आजादी के संघर्ष और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में उन्होंने अंतर किया|तथा कथित स्वतंत्रता आंदोलन में सामिल लोग आजा़दी को सीमित अर्थों में ले रहे थे|अम्बेडकर ने उसे विस्तार में लेने का आग्रह किया भारत का बुर्जुआ तबका, जो जाति के हिसाब से हिन्दू मुसलमानों का सवर्ण असराफ तबका भी था, पलासी का युद्ध अंग्रेज क्यों जीत सके?पेशवा और मराठों का हारना क्यों जरूरी हुआ?1857 के विद्रोहों की सामाजिकता और सैद्धांतिकी क्या थी? कांग्रेस के पूना जलसे पर तिलक के नेत्रित्व में ब्रहमणवादियों का कब्जा कैसे हुआ?कांग्रेस के रेदिकल और माडरेट इकाइयों में कौन प्रगतिशील और कौन्रतिगामी था| गांधी आखिर तक वर्णाश्रम व्यवस्था के पक्षधर क्यों और कैसे बने रहे?जैसे सवालों पर नई पीढ़ी को विस्तार से जानने का हक बनता है | आजा़दी के इतिहास का चालू पाठ इतना एकतरफा और एकरस है कि उसके सहारे हम नई पीढ़ी की स्वतंत्र मानसिकता का विस्तार देने में अक्षम है|फ्रांस की राज्य क्रांति के रूप में स्वतंत्रता का जो संघर्ष हुआ था उसके पाश्र्व में रख कर हमें अपने स्वतंत्रता आंदोलन को खंगालना चाहिये|हमारे संघर्ष में रूसो और वाल्तेयर नहीं है|हमने तो रविंद्रनाथ ठाकुर की भी केवल इसलिये पूजा की कि उन्हे नावेल पुरस्कार मिल गया था| उनके गोरा से हमनें कुछ नहीं सीखा|क्या हमने इस बात पर विचार किया है कि आजा़दी का संघर्ष आज भी अनेक रूपों मे चल रहा है? दलित,पिछणे, मेहनतकस, आज भी आजा़दी की लड़ाइ लड़ रहे है| उनका संघर्ष बुद्ध, कबीर, फुले, मार्क्स, अंबेडकर, पेरियार, भगत सिंह, जैसे विचारकों के मार्ग दर्शन में हो रहा है|गांधी वादी जमात के लोग या तो तटस्थ है या तो इनके खिलाफ बंदूक औR गीता लेकर खडे़ है|फिर भी लडा़ई चल रही है|आप इस लड़ाई मे किस ओर है?
-प्रेम कुमार मणि जनविकल्प के संपादक है
-जन विकल्प से साभार

3 टिप्‍पणियां:

  1. हम इस लडाई में पिस रहे घुन की तरह है जो किसी भी तरफ का न होने के बावजूद पिसता जरूर है ।

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  2. नेहरू पवित्र गाय हैं जिन पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती. और उनके द्वारा आधी रात को किया गया कवितापाठ हम सबको भारी पड़ रहा है.

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  3. विचारोत्तेजक लेखन है। आजादी अलग अलग दृष्टिकोण से अलग अलग दिखाई देती है। आपके द्वारा उठाई गई समस्याएँ चिन्तन योग्य हैं, किन्तु समाधान में इतना ही कहा जा सकता है कि "समय बदल रहा है, कुछ और प्रतीक्षा करें।"

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