01 अगस्त 2007

गुप्तांगों की पूजा का देश-




मानव के विकास के साथ ही विज्ञान के विकास की प्रक्रिया ' शुरू हुई और देवी देवताओं की संकल्पना भी, मानव ने अपनी सोच व समझ के अनुसार इन देवी.देवताओं को मूर्ति या प्रतीक के रूप में निर्मित किया। जिन चीजों को वह नहीं समझ पता था , जिन तक पहुंचना मुश्किल था व जिनकी प्रक्रिया और कारणों का उसे ज्ञान नहीं था मानव ने उसे किसी ' शक्ति या 'शक्ति के द्वारा संचालित माना , उसे देवी.देवता की उपाधी दी गयी। इस तरह से मानव के लिये लाभ प्रदच वायु , पानी , सूर्य , पृथ्वी , आकाश, सब देव के रूप में हो गये और मानव ने उनके प्रतीकों को बनाया ताकि उन्हे एक दूसरे से अलग किया जा सके। भारत में देवी.देवताओं की वैज्ञानिक ऐतिहासिकता का यह साक्ष्य है।
कबीलें की संकल्पना के अनुरूप कबीलाई समाज ने इन ढ़ेर सारे दवी.देवताओं को कबीलानुमा संरचित किया और कबीले के मुखिया की तरह इंद्र को उनका राजा घोषित किया , यह विकास का एक क्रम था जिसे आज की वैज्ञानिक परिभाषा के खांचे में फिट नही किया जा सकता, लेकिन विज्ञान के विकास का एक हिस्सा माना जा सकता है , जो मानव समाज के सोचने.समझने की प्रक्रिया को दर्शाता है। इन्ही संकल्पनाओं में गुप्तागों के द्वारा बच्चें की उत्पति भी मानव के लिये एक आश्चर्यजनक घटना थी , जो इसकी समझ के परे थी , और उसने स्त्री.पुरूष सहवासिक स्थित की पूजा करना 'शुरू कर दी और गुप्तांगों की सहवासिक स्थिति का प्रतीक या मूर्ति बनायी जो आज भी कहीं बर्फ , कहीं पत्थर , तो कहीं मक्खन का बनाकर शिव लिंग के रूप में पूजा जाता है और हजारों.करोड़ों रूपये का लाभ एक विशेष वर्ग को होता है। इस रूढ़ीवादी मानसिकता का एक नमूना अमरनाथ की पहाडि़यों में बर्फ से पनपने वाले उस त्रिकोंड़ आकृति जिसे बाबा अमरनाथ का शिवलिंग कहते है, में देखा जा सकता है , हाल में यह खबरों में छाया रहा, कारण इस अकृति का निर्मित न होना था , इसके पीछे का सच यह था कि उस क्षेत्र में भूकम्प आने से (जिसमें पाकिस्तान के कई लोग मारे गये थे) उन दरारेा का व सुराख का बंद होना था जहां से बर्फ गिरती थी और इस आकृति का निर्माण होता है। अत: लाभधारी वर्ग ने इसे हस्त निर्मित किया , अब प्रश्न यह उठता है कि आस्था पर टिके देश के बड़ तीर्थ स्थलों में से सबसे बड़े देव के निवास स्थान के पास , जो पूरी दुनियां चला रहा है भूकम्प आया ही क्यों? पाक ,कश्मीर की इतनी जनता मरी तो महामहिम शिव ने बचाया क्यो नहीं? माना पाक की जनता मुसलमान थी और शिव हिन्दू के देव , तो बाबा को हिन्दुओं की आस्था का तो ख्याल रखना था। असलाहाधारी देव थे भूकम्प की उथल.पुथल के बाद अपने त्रिशूल से एक सुराख बना देते ताकि उनका बर्फीला लिंग स्वस्थ बना रहता और हिन्दुओं की आस्था बच जाता पर ऐसा कुछ नही हुआ। शिवसेवकों ने कलियुग का प्रकोप व अत्याचारियों के बढ़ने की बात कही पर ऐतिहासिक साक्ष्य गवाह है और आंकड़े कि आज के समय से ज्यादा शिव भक्त दुनियां में कभी नहीं थे फिर दुनियां को चलाने वाले इस देव मे क्या इतनी कूबत नही कि वह अत्याचारियों पर लगाम लगा सके , उन्हे अपना भक्त बना सके ? तो क्या वह इन अत्याचारियों से हारा हुआ एक पराजित 'शक्ति है? यदि है तो।
आज जब मानव विकास के करोड़ों वर्षों में हमने यह जान लिया है कि सूर्य ,चन्द्रमा ,पानी , हवा ,क्या है? हमने यह जान लिया है कि पृथ्वी शेषनाग के फनों पर नही मजदूरों के हाथों पर टिकी है , इसके बावजूद इस मनसिकता से ग्रसित रहना नागवार लगता है। दुनिया की जनसंख्या का छठा भाग होने पर भी खोज, अविष्कार ,निर्माण में सबसे पिछड़े देश को अपने धर्म,देवों, के देश से नावाजे जाने की उपाधि पर गर्व है जबकि पिछड़ेपन के पीछे धर्म व तथाकथित 84 करोड़ देवी.देवताओं का बड़ा हाथ रहा है। यही नही बल्कि शोषणकारी 'व्यक्तियों को बढ़ावा देने , समाज में विभेद उत्पन्न करने , सम्प्रदायिक ' व्यक्तियों की प्रयोगशाला के रूप में भी इनका बखूबी प्रयोग किया गया है। शोषकों ने कारणवश यह तर्क उत्पन्न किया कि ईश्वर सब दुछ देख रहा है , गलत करने वालों को सजा देगा , शोषित जनता ईश्वर के देखने पर टिकी है और उसके ऊपर लगातार अत्याचार होते जा रहे है पर आज तक ईश्वर न्याय नही कर पाया। तो क्या ईश्वर को चश्में की जरूरत है या हमें पुर्नविचार की ?

1 टिप्पणी:

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