24 अप्रैल 2013

वर्चुअल दुनिया के लोग अपीयरेंस देने आते हैं!

चेतना भाटिया
किसी भी काम को पहली बार करने पर उससे बहुत-सी उत्सुकता, संभावनाएं, उम्मीदें और डर जुड़े होते हैं। इस लिहाज़ से पहली बार किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने का मेरा अनुभव बहुत अजीब रहा। अजीब सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे राजनीति और उससे जुड़े तत्वों के विमर्श से परहेज है बल्कि इसलिए भी कि मैंने जैसा सोचा था वहाँ उससे काफी कुछ अलग था । ‘क्रान्ति’ , ‘आज़ादी’ , ‘जनभावना’, ‘धरणा’ , ‘जनसैलाब’ और ऐसे ही कुछ अन्य शब्दों की प्रवृत्ति ध्यान आकर्षित करने वाली होती है और अगर बात युवाओं की करें, तो अन्ना और केजरीवाल से लेकर निर्भया केस तक समभवत: इसी शब्द ने लोगों को सड़कों पर खींचा था। मेरा अंदाज़ा है कि हमारी पीढ़ी के मन में ये शब्द ‘1857’ और ‘1947’ के आंदोलनों और कुर्बानियों की ऐसी छवियाँ याद दिलाते हैं जो उन्होने इससे जुड़ी किसी फिल्म या इतिहास की किताब या गूगल और विकिपीडिया पर देखी होंगी। हालांकि इस बात में कोई दोराय नहीं है कि देश –समाज के हर क्षेत्र में इस समय जो स्थिति है, उससे निबटने के लिए किसी क्रान्ति से कम में काम नहीं चलने वाला। लेकिन फिर भी ‘निर्भया’ और ‘गुड़िया’ के किस्से के बाद सड़कों और राजधानी समेत कई शहरों के महत्वपूर्ण चौराहों पर नारों और तख्तियों के साथ लोगों का उतरना इस ट्रेंड की पड़ताल की मांग करता है ।

टी॰वी॰ पर और अखबारों में 16 दिसंबर की घटना के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों की छवियाँ अभी भी दिमाग में जस की तस हैं। यहाँ ‘छवियाँ’ शब्द का प्रयोग किसी कारण से किया गया है। छवियाँ प्राकृतिक नहीं होती बल्कि दिमाग में गढ़ी जाती हैं – किसी बाहरी स्रोत से या खुद की धारणाओं से। इस तरह कुर्ता-जीन्स और हवाई चप्पल पहने झोला लटकाए – कभी लाल तो कभी भगवा रंग से जुड़े लोगों का पुलिस से भिड़ना और ज़मीन पर लेट–लेट कर नारेबाजी करना मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है। विभिन्न संगठनों के सदस्यों के बीच होने वाली हेजेमनी या राष्ट्रवाद की बातें इनके बीच जाकर समय बिताने की इच्छा जागृत करती हैं। कुछ इसी तरह की इच्छा ने मुझे 20 अप्रैल का पूरा दिन नौकरी से छुट्टी लेकर आईटीओ जाने के लिए तड़पने के बाद 21 अप्रैल को इंडिया गेट जाने को प्रेरित किया। जो ये मानते हैं की इन प्रदर्शनों से कुछ नहीं होने वाला , उन्हें यह बताना चाहती हूँ कि जब कोई सार्वजनिक सेवा नियुक्त अधिकारी जनता के प्रति अपना कर्तव्य भूलकर समाज में दुराचारियों और दुष्कर्मों को बढ़ावा देता है, तब घर बैठे भी कुछ नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनों और धरनों से कम से कम राज्य पर व्यवस्था सुधारने का कुछ दबाव तो बनाया ही जा सकता है, साथ ही आजू-बाजू जमा लोगों को कई बातें भाषण से समझाई जा सकती हैं।

ऐसा ही कुछ माहौल वहाँ भी था जब प्रदर्शनकारियों के आने से 40 मिनट पहले आरएएफ के कम से कम 30-35 जवानों समेत पुलिस के सिपाही एक कतार में हाथों में डंडे और आँसू गेस के गोले लिए खड़े थे। प्रदर्शन शुरू होने पर हमने उस संगठन से न जुड़े होने के कारण खुद को आखिरी पंक्ति में रखना ही बेहतर समझा। जैसे ही नारेबाजी के साथ तख्तियाँ हाथ में लिए प्रदर्शनकारी इंडिया गेट की ओर चलना शुरू हुए, कई राहगीर भी उस भीड़ में शामिल हो लिए । अनजाने लोगों के बीच भी कभी हम इतने बेखौफ होकर चल सकते हैं इससे पहले मुझे इसका कभी अंदाज़ा नहीं लगा था। लेकिन केमेरा वाले जितनी तेज़ी से साथ-साथ भाग रहे थे, उससे कई ज़्यादा तेज़ी से वो लोग भाग रहे थे जो कैमरा में ‘क्रान्ति लुक’ देना चाहते थे। हालांकि कई लोग ऐसे भी थे जो सचमुच इस घटना से आहत और गुस्से हुए थे , लेकिन लम्पट और अवसरवादियों की भी कोई कमी नहीं थी। शायद यही कारण था कि हम लोग खिसकते –खिसकते तीसरी पंक्ति में आ गए।

एक बेरिकेड के सामने सड़क पर बैठने के बाद भाषणों का दौर शुरू हुआ । लेकिन जब आसपास नज़र दौड़ाई तो देखा कि शामिल होने वालों की संख्या 20-25 से बढ़कर लगभग 50 -60 हो गयी थी। उसमें कुछ वर्चुअल दुनिया में सक्रिय ऐसे बुद्धिजीवी भी थे जो एक कोने में खड़े होकर बीड़ी सुलगाते हुए थोड़ी देर का गेस्ट अपीयरेंस देने आए थे। कुछ ऐसे थे जो जन्म-जन्मांतर से टी वी बाइटों के लिए तड़प रहे थे और कुछ ठेले वाले , गुब्बारे वाले और मेहँदी वाले अपनी आम्दनी की आस लगाए घेरा बनाकर खड़े थे। लेकिन प्रदर्शन की इस पोलिटिकल- इकोनोमी में सबसे अधिक संख्या में राहगीर दिख रहे थे जिनकी आँखों में और चेहरों पर वही शातिर पुरुषवादी और शिकार तलाशते भाव थे जिनकी आलोचना की जा रही थी। एक तरह से उनका वहाँ होना अच्छी बात इसलिए हो सकती थी की उन्ही को समझाने के लिए ये सब कहा जा रहा था। लेकिन ऐसी सोच के लोगों का भीड़ में पता न लगा पाने के खतरे की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता था।

मीडिया का केमरे में छवियाँ कैद करने का पागलपन उनकी संस्थाओं की व्यावसायिक मजबूरी से समझा जा सकता है । इसीलिए 30 लोगों को 300 दिखाने के लिए उन्हें बेरिकेड पर चढ़ –चढ़ के लौंग शॉट लेने की ज़रूरत पड़ रही थी। लेकिन नेताओं के बयानों के ज़िक्र के दौरान राष्ट्रिय महिला आयोग की अध्यक्षा ममता शर्मा का किस्सा छोड़ देना और विरोध के गीत गाने वालों का बाद में पीछे खड़े होकर हंसने का भाव मेरी समझ से परे था। साथ ही कई सवालों ने दिमाग को घेर लिया था मसलन मीडिया वालों के वहाँ से जाने के बाद आधे से अधिक लोग उठकर क्यूँ चले गए? क्या जिस मुद्दे के लिए आवाज़ उठाने आए थे, वह समस्या सुलझ चुकी थी? इससे ज़्यादा बुरा हाल भगवा संगठनों के धरणे में था जहां संगठन में शामिल कुछ तत्व लड़कियों की चोटियाँ खींच रहे थे।

बेशक जनता महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध या भ्रष्टाचार से तंग आ गई है और छात्र संगठनों ने लोगों को महत्वपूर्ण मुद्दों पर आवाज़ उठाने का मंच दिया है लेकिन जागरूकता लाने और दबाव बनाने की इस कोशिश में इस तरह के असंवेदनशील , अवसरवादी और सरोकारहीन तत्व लोगों को इन सभाओं से दूर करने का ही काम करते हैं। हालांकि बलात्कार और इसके जैसी कई प्रकार की हिंसाओं से महिलाओं को बचाने के लिए घर से ही इलाज शुरू करना होगा, लेकिन पिछले दो सालों में लोगों में गैर-जिम्मेदार राज्य और व्यवस्था से लड़ने के लिए पैदा हुआ जोश कम ना हो , इसके लिए धारणा आयोजित करने वाले संगठनों का इन सभाओं से असामाजिक तत्वों को बाहर रखना ज़रूरी है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद ईमानदार नजरिया...। इसके लिए केवल संवेदनशील होने नहीं, बल्कि हिम्मत के साथ सच को देख सकने की ताकत भी होनी चाहिए। वहां मैं भी था, और मुझे भी लगभग यही सब लगा...
    शुक्रिया...

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  2. बढ़िया आलेख है मैम ! यही हकीक़त है जिससे मूंह नहीं मोड़ा जा सकता ! समाज की मानसिक स्थिति सड़ गई है ! सिर्फ सड़क से ही नहीं, घर-घर से भी बदलाव की गूँज उठनी चाहिए !

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