29 April 2012

वे जो कलेक्टर नहीं बन सके.

कलेक्टर मेनन के लिए दुवाएं की जा रही हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता उन्हें निःशर्त रिहा किए जाने की मांग कर रहे हैं. कलेक्टर के दोस्त उनसे जुड़ी पुरानी यादें सुना रहे हैं. मुख्यमंत्री ‘बेहद चिंतित’ हैं और गृहमंत्री लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं से ‘परेशान’. अखबारों के सम्पादक और पत्रकारों के शब्द उलझन भरे ज़ेहन से निकले हुए लगते हैं. प्रधानमंत्री के ६ साल पहले रटे-रटाए वाक्य को दुहराना वाजिब नहीं; पर यह देश की जो आंतरिक असुरक्षा है वह लगातार बढ़ती जा रही है और अब देश और सुरक्षा के मायने समझ से परे हो गए हैं.
आखिर एक कलेक्टर जो ‘सुराज’ लाना चाहता है, उसे बंधक बनाया जाना कितना उचित है के जवाब में; एक बूढ़ा कलेक्टर जिसने सरकार की नीतियों से तंग आकर वर्षों पहले कलेक्टरी से इस्तीफा दे दिया है, कहता है- ‘युद्ध में सही और गलत को नहीं आंका जा सकता’. तो क्या सुराज=युद्ध? किसी डिक्सनरी के पन्नों में ऐसे मायने नहीं जोड़े गए हैं. पिछले दो-तीन दशकों में छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसे कई शब्द हैं जिनके अर्थ खोजना व्यर्थ है; पर जिनका जिक्र करना यहां बेहद जरूरी. कि अखबारों में कलेक्टर की रिहाई के लिए उलझन भरे, दुखी और चिंतित लोगों के शब्द जो काले अक्षरों में छप रहे हैं, वह बेहद स्याह पक्ष है, ‘सभ्य’ और अभिजात्यों का पक्ष.
यह अखबारों और किताबों के पन्ने से अलग एक पन्ना हैं ‘पन्ना लाल’ जो छत्तीसगढ़ (छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था) में उस इलाके के पूर्व डी.आई.जी रह चुके हैं, जिन इलाकों में ये घटनाएं घटित हो रही हैं. १९९२ में जब ‘जन जागरण’ अभियान इन क्षेत्रों में चलाया गया. मकसद था नक्सलियों की सत्ता को खत्म ‘करना’. उसी वर्ष गृह राज्यमंत्री गौरीशंकर शेजवार ने कुछ दिनों बाद नक्सलियों के ‘खात्मे’ की घोषणा कर दी. अयोध्यानाथ पाठक और दिनेश जुगरान महानिरीक्षक के तौर पर नियुक्त किए गए थे. जन-जागरण के इस अभियान में ‘जन-प्रताड़ना’ के आंकड़े जुटाना मुश्किल है. पर करीगुंडम, एलमागुडा, पालोड़ी, पोटऊ पाली, दुगमरका, सल्लातोंग, टुडनमरका, साकलेयर गावों के लोगों की यादों में आंकड़े नहीं, वृतांत और कहानियां पड़ी हुई हैं. सोड़ी गंगा जो दूसरी कक्षा तक पढ़े हैं और एक गांव के अध्यापक हैं उनके पास जन-जागरण की प्रताड़ना के कई किस्से हैं. तो क्या जन-जागरण=प्रताड़ना? शायद शब्दकोष के मायने समाज की अर्थवत्ता से अलग है. यह अभियान कुछ वर्षों तक चलता रहा और पुलिस माओवादियों की वर्दी पहनकर घूमती रही...घूमती रही कि माओवादियों जितनी स्वीकार्यता पुलिस को भी मिल जाए. गांवों में नक्सली बनकर पुलिस जाती और गांव वालों के साथ जमीन पर बैठती, उनसे बातचीत करती. पर यह हकीकत के एक हिस्से का नाट्यरूपांतरण था. माओवादियों ने आदिवासियों के लिए तेंदू पत्ते के कीमत की लड़ाई, जंगल में हक की लड़ाई और १५,००० एकड़ जमीन के बंट्वारे तालाबों के निर्माण जैसे कई काम करवाए थे. तब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश था. यह समय था जब पुराने आरोप ध्वस्त हो रहे थे और नक्सली आंध्र के इलाकों से नहीं आते थे. बल्कि आदिवासी माओवादी हो रहे थे और माओवादी आदिवासी. जिसे मछली और पानी का संबंध कहा गया.
सलवा-जुडुम यानि ‘शांति अभियान’ ‘सुराज’ के ठीक पहले का अभियान है. पिछले सात वर्षों में चलाए गए इस ‘शांति-अभियान’ के सरकारी आंकड़े ६४४ गांवों के उजाड़े जाने के हैं. लगभग ३.५ लाख लोगों के विस्थापन के. घरों के जालाए जाने, लोगों के पीटे जाने, पेड़ों पर टांग के गोली मार देने और महिलाओं के बलात्कार के आंकड़े…..पिछले बरस माड़वी जोगी अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को बताते-बताते वापस घर में चली गई और हमने सैन्य बलों के उत्पात के बारे में सवाल पूछना ज्यादती समझा. माड़वी लेके नाम की एक महिला को उनके पिता और भाई माड़वी जोगा और माड़वी भीमा के सामने पुलिस ने नग्न किया और पुलिस स्टेशन से घर तक जाने को कहा….. बीबीसी हिन्दी में अभी खबर लगी है कि कलेक्टर को कुछ कपड़े और दवाईयां पहुंचाई जा चुकी हैं और उसके साथ कुछ खाने-पीने की चीजें भी.
आंकड़ों में १६ मार्च २०११ को ताड़मेटला में ७ साल के एक बच्चे को सैन्य बलों ने पीटा, यह दर्ज नहीं है, हवाई फायरिंग सुनकर गांव के कितने लोग भागे, यह भी दर्ज नहीं है. कुछ गैर सरकारी दस्तावेजों और पत्रिका की रिपोर्टों में २०७ घरों का जलाया जाना दर्ज है. आंकड़ो में घटित हुई इन घटनाओं ने हर आदमी को क्रोधित किया, आंकड़े में हर आदमी गुस्से में है, आंकड़े में उसकी उग्रता स्वाभाविक है और इस संगठित उग्रता में हर आदमी उग्रवादी है. देश और सरकार के दस्तावेजों में इंसानी स्वभावों के आंकड़े नहीं दर्ज किए जाते. तो क्या ‘शांति अभियान’=तबाही. डिक्शनरी देख सकते हैं. राज्य सरकार ‘शांति-अभियान’ चलाती है और देश की सर्वोच्च न्यायालय एक फैसले में उसे तत्काल बंद करने का आदेश देती है. राज्य शान्ति चाहता है? न्यायालय शांति नहीं चाहता? शांति और न्याय एक दूसरे के विरुद्ध कैसे हैं? ऐसे ढेरों सवाल.
कलेक्टर मेनन का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और माओवादी उनकी दवा को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं और उन्हें दवाईयां सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों द्वारा दूसरे दिन भी भेज दी गई हैं. आज कलेक्टर को अगवा किए ६ दिन बीत चुके है. ६ बरस पहले २००६ से सैन्य बलों द्वारा गायब की गई २ लड़कियों का अभी तक कोई पता नहीं चला है जिनका नाम मडकम हूँगी और वेको बजारे है. ‘शान्ति-अभियान’ की तबाही में ऐसे कई लोग गायब हुए जिनका पता नहीं चला, पिछले बरस देवा बता रहे थे कि करीगुंडम में नाले के पास दो लाशें मिली थी और कई ऐसी लाशें हैं जो किसी नाले के किनारे नहीं मिली.
आदिवासियों पर हुए अनगिनत जुल्म के विरुद्ध क्या माओवादियों के इस लोकतांत्रिक कार्यवाही की सराहना की जानी चाहिए? मसलन राजनैतिक कैदी के तौर पर कलेक्टर को सुविधाएं मुहैया कराना, अगवा की जिम्मेदारी लेना और बातचीत के जरिए ६ दिनों में हल करने का प्रयास करना. ६ वर्षों से और ६ वर्षों में सरकार द्वारा ….. क्या सैन्यबलों द्वारा गायब किए गए, हत्या किए गए या जाने क्या किए गए की निंदा नहीं करनी चहिए? कि वे जो गायब हुए हैं वे कलेक्टर नहीं थे आदिवासी थे बस.

सन्दर्भ
१- सरकारी दस्तावेजों में यकीन रखने वाले प्रधानमंत्री के इस बयान को नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री व डी.जी.पी. से हुई किसी बैठक के दस्तावेज में देखें या दूसरे दिन के अखबार पर भरोसा करें.

२- विस्तार के लिए सभी के संदर्भ पुराने अखबारों मे देखें, यदि अखबारों में यकीन रखते हो तो.
३- मेरे फेसबुक पर बी.डी. शर्मा के बयान देखें, जिसे बीबीसी हिन्दी के साइट से उठाया गया है. बीबीसी के बजाय फेसबुक पर यकीन करना सीखें या चीन के क्रान्तिकारी माओत्से तुंग के वाक्य “सब पर शक करो’ में यकीन करें.
४- सुराज के अन्य मायने समझने के लिए गांधी द्वारा लिखित पुस्तक हिन्द स्वराज भी देखें, मूल गुजराती में और अब दुनिया के तमाम भाषाओं में अनुदित. दो वर्ष पहले हिन्द स्वराज के सौ वर्ष पूरे हुए.
५- दुनिया के किसी भी भाषा में बनाई गयी अब तक की कोई भी डिक्सनरी देखें. एक डिक्सनरी कुछ लोग मिलकर बनाते हैं और उसपर लोग यकीन करते हैं….इकाई व्यक्ति के तौर पर मुझ पर यकीन कर सकते हैं.
६- माओवादी पार्टी के शीर्षस्थ नेता ‘गणपति’ का ओपेन पत्रिका में साक्षात्कार देखें.
७- बी.बीसी. हिन्दी डॉट काम.
८- गांव के सदस्य.

24 April 2012

झारखण्ड: संगीनों पर सुरक्षित गांव


चन्द्रिका
कुटकु बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष 'जगत सिंह' 
        नैतिकता की रक्षा के करने के लिए कुरुक्षेत्र में 18 अक्षोहणी सेना के विनाश लीला की भी हम निंदा नहीं करते बल्कि उन सबों से हम राष्ट्रहित की सीख लेते हैं- जी.एस.रथ (डी.जी.पी. झारखण्ड, प्रभात खबर, ३० मार्च २०१२, पृष्ठ-)
            भारतीय राज्य हमारे आंदोलन को हिंसा के नाम पर दुष्प्रचारित करता है क्योंकि वह हिंसा पर एकाधिकार चाहता है, जबकि राज्य के परमाणु बम से लेकर बृहद सैन्य बल अहिंसा के लिए नहीं हैं. – प्रशांत, माओवादी पार्टी के सदस्य.

            यह मार्च की पतझड़ का मौसम है. पेड़ों की पत्तियां सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं. झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहां घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है  कि यहां राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं. यह गढ़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है. मेरे साथ दैनिक भास्कर के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जा चुका है. सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है.  हम मोटरसाईकल को बार-बार रोक, पीछे मुड़ कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं. सूखी पत्तियों पर घूमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं. यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की  आवाज है. साखू के फूल पूरे जंगल को  खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होता है. सतीश को इन इलाकों में जंगली जानवरों का उतना भय नहीं है जितना कि कोबरा बटालियन का, जो कई बार ग्रीन हंट अभियान के दौरान रात को जंगलों में रुक जाते हैं. यह अभियानमाओवादियों के सफाएके लिए इन इलाकों में पिछले दो वर्षों से चलाया जा रहा है. सतीश एक घटना का जिक्र करते हैं जिसमे सी.आर.पी.एफ. ने एक गूंगे बहरे चरवाहे की कुछ दिन पहले गोली मारकर हत्या कर दी है. २०-२५ कि.मी. भटकने के बाद हमे वह रास्ता मिल जाता है जिसके सहारे हम जंगल से बाहर निकल पाते हैं.
संजय के पिता जयराम प्रसाद- बरवाडीह.
      हम अपने यात्रा की शुरुआत कर रहे थे जबकि यहां के स्थानीय पत्रकारों ने मुलाकात की और वे इन इलाकों की कहानियां सुनाते रहे. मौत और हत्याओं की कहानियां, बरसों पहले के किस्से, झारखण्ड बनने के बाद से कल परसों तक के किस्से. कहना मुश्किल है कि झारखण्ड बना या बिगड़ गया. जबकि राज्य और ज्यादा असुरक्षित हुआ और स्कूलों-गांवों में सी.आर.पी.एफ. व कोबरा कमांडो लगा दिए गए. लोगों की सुरक्षा यह है कि इन इलाकों से अक्सर कोई गायब हो जाता है और हफ्ते-दस दिन बाद गांव वालों को अखबारों से पता चलता है कि उसकी लाश किसी नदी किनारे या किसी नाले में सड़ चुकी है या जिले पार किसी जेल में उसे कैद कर दिया गया है. सैन्य बल उसे ‘माओवादी’ बताते हैं जो एक मुठभेड़ में मारा गया और यदि वह कैद है तो जाने कितने ‘इल्जामों’ का दोषी. वह उन घटनाओं का भी दोषी है जो उसके सूरत या बम्बई में किसी फैक्ट्री में काम करते हुए घटित हुई. गांव के लोगों को तब थोड़ा सुकून होता है जब गायब शख्स जेल में पहुंच जाता है. यहां जेल में पहुंचना ही सुरक्षित होने का प्रमाण है. जबकि कुछ प्रमाण ऐसे भी हैं कि वर्षों पहले गायब लोग अभी तक जेल नहीं पहुंचे और न ही उनकी लाश मिली है. पिता, पत्नी और परिवार के अलावा ऐसे लोगों का इंतजार अब कोई गांव वाला नहीं करता. क्योंकि लोगों को पता हैं कि किसी भी इंतजार की एक उम्र होती है.
      लातेहार जिले में जिस जगह पर हम रुके हुए हैं वहां से बरवाडीह तकरीबन २० किमी. है. जयराम प्रसाद अपने छोटे बेटे के साथ तड़के ही हमसे मिलने पहुंचते हैं और बातचीत शुरु हो इससे पहले उनका गला रूंध जाता है. वे देर तक रोते रहते हैं. फिर वे बताते हैं कि २१ मार्च को पुलिस ने उनके बड़े बेटे संजय को थाने में बुलाया था और आज पांच दिन से वह लापता है. संजय बरवाडीह में मोबाइल की एक दुकान चलाता था. कोई अधिकारी कहता हैं कि बातचीत के बाद उन्होंने उसे उसी रात छोड़ दिया था, एस.पी. क्रांति कुमार कहते हैं कि उसे मंडल के आसपास जंगल से २३ की रात को पकड़ा गया है. जयराम कानून का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर एस.पी. की ही बात को सही मान लें तो २४ घंटे में उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए था पर पांच दिन बीत चुके हैं. यदि उसे छोड़ दिया गया तो ३५ साल की उम्र में क्या वह अपने घर का रास्ता भूल जाएगा. जयराम की आशंकाएं कुछ और हैं पर अभी तक किसी लावारिस लाश की खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी है. उस दोपहर हमे पता चला कि संजय को माओवादियों का सहयोग करने के आरोप में जेल भेज दिया गया है. पकड़े जाने के पूरे छः दिन बाद, इन इलाकों में ‘सहयोग’ सबसे बड़ा जुल्म है. यह ‘सहयोग’ किसी अपराध में सहयोग करना नहीं है बल्कि इंसानी व्यवहारों के तहत किया गया सहयोग है. कि वे गांव या पड़ोस के गांव से आए किसी आगंतुक को खाना खिलाते हैं, संभव है वह पड़ोस का ही कोई युवक हो, वे उसे पानी पिलाते हैं. अगले दिन पुलिस आती है और गांव वालों के इस व्यवहार को ‘अपराध’ घोषित कर देती है ‘माओवादियों को सहयोग करने का अपराध’. सामुदायिकता के इस सहज व्यवहार और सामाजिकता को राज्य ने प्रतिबंधित कर दिया है. तो क्या लोगों को ‘असामाजिक’ हो जाना चाहिए कि भूखे को खाना न खिलाएं, कि प्यासे को पानी न पिलाएं और एक राहगीर को रास्ता न बताएं. मानवाधिकार के प्रश्न बहुत पीछे छूट चुके हैं. शायद यह जैव अधिकार या जैव व्यवहार जैसी किसी अवधारणा के दायरे में आएगा. एक मोबाइल और सिम` का दुकानदार आखिर अपने सामनों को किसे बेचे जबकि पुलिस व सैन्य बल की निगाह में जाने कौन ग्राहक कल माओवादी घोषित कर दिया जाए.
एक ग्रामीड़ लादी गाँव से. 
      बरवाडीह के लादी गांव में परइया, कोरबा और उरांव जनजाति के तकरीबन ८० घर हैं. यह एक घाटी नुमा जगह है जो चारो तरफ पहाडों से घिरी हुई दिखती है. गांव की तरफ आती हुई लीक खत्म होती है और पहला घर जसिंता देवी का है जो पुलिस की गोली से अपने घर में ही मारी गई थी, इस घटना को एक लंबा अर्सा बीत चुका है. हमारे पहुंचते ही एक महिला आंगन में उस जगह जा कर खड़ी हो जाती है जहां जसिंता देवी गोली से निढाल हुई थी. वह महिला जसिंता देवी की सास हैं. क्रोधित हो उन्होंने हमे पहले कैमरा बंद करने को कहा. फिर बताया कि पुलिस उस दिन माओवादियों को खोजने आई थी और हमारे घर में आग लगाना चाह रही थी जिसका जसिंता ने विरोध किया और वह उनकी गोलियों से मारी गई. मिट्टी की दीवारों में गोलियों के निशान अभी भी बने हुए हैं. जसिंता को जिस समय गोली मारी गई उसकी ७ महीने की बेटी प्रियंका उसके पास ही थी जो अब थोड़ी बड़ी हो गई है. गांव वाले बताते हैं कि पुलिस ने अपनी इस हत्या का इल्ज़ाम माओवादियों पर लगाया. चुरकुन पहड़िया गुस्से में बोलते हैं कि गांव में एकता है और हमने पुलिस को दोबारा यहां आने से मना कर दिया है. जब दुबारा पुलिस आई तो हमने उसे खदेड़ भी दिया. अक्सर गांवों मे हमने पाया कि ह्त्या के बाद सैन्य बलों द्वारा दी गयी एक मोहलत होती है. वे कुछ महीने तक दुबारा गांव में लौटकर नहीं आते. एक हत्या पूरे गांव में वर्षों तक खौफ को जिंदा रखती है. खौफ इतना कि लोग काम करने के बाद मजदूरी लेने तक से डरते हैं. मनरेगा, सड़क निर्माण, इंदिरा आवास जैसी योजनाओं के लिए वे काम करते हैं और उनकी मजदूरी इन योजनाओं की तरह ही अधूरी पड़ी है.
गांधी इंटर कालेज में सैन्य बलों का 'बसेरा' 
      वहां लड़कियां फिर से स्कूल जाने लगी हैं और कुछ बच्चे स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे हैं. करमडीह के स्कूल से सैन्य बलों का कैम्प वापस जा चुका है. यह एक सामान्य स्थिति है जो ३१ जनवरी की शाम के दहशत के बाद लौटी है. दुकानदार ने अपने घर के आसपास खोदी गई मिट्टी को पाट दिया है. सैन्य बलों द्वारा यह खुदाई माओवादियों के छुपाए गए शस्त्र खोजने के लिए की गई थी. यहां से उन्हें भिंडी के पौधे की कुछ जड़ें मिली थी. ३१ जनवरी की शाम को सात बजे माओवादियों के एक दस्ते ने हवाई फायरिंग की. देर रात तक गोलियां चली, देर रात तक दहशत पली. लोग बंदूकों की एक आवाज के बाद दूसरी आवाज का इंतज़ार करते रहे और दूसरी के बाद तीसरी फिर सुबह जाने किस गिनती के बाद आई. सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था. रात की घटना के अवशेष में दीवारों पर सुराख के निशान बचे थे. अगले दिन सैन्य बल स्कूल छोड़कर चले गए, उसके एक दिन बाद बच्चे भी स्कूल चले गए. अध्यापकों से ज्यादा इन स्कूलों में बच्चे खाना बनानेवाले का इंतजार करते हैं और स्कूल की चहरदीवारी पर बैठे बच्चे वही कर रहे हैं.
कोयल नदी में 'ढोल परवला'
      अगले गांव नवरनागू जाने के लिए यहां से हमे पैदल चलना था, पहाड़ी के उस पार तक. यह कोयल नदी के किनारे का एक गांव है. २५० किमी. लम्बी इस नदी में कई छोटी नदियां मिलती हैं. अपनी पूरी यात्रा के दौरान हमने कोयल नदी को कई बार पार किया. गांव में एक महिला चटाई बीन रही है, यह किसी पेड़ की मजबूत पत्तियां हैं जिन्हें एक-दूसरे के ऊपर-नीचे गूथा जा रहा है. एक कमसिन उम्र की बच्ची झाड़ू बुहार रही है, गांव के अकेले अध्यापक पढ़ाने के लिए चले गए हैं. लूकस मिंज की हत्या को एक महीने बीत चुके हैं. गांव से ढोल परवला तकरीबन एक किमी. की दूरी पर था, जहां लूकस मिंज की लाश नदी की रेत पर ५ दिनों बाद पाई गई थी, जो पानी में सड़ चुकी थी. लूकस बोलने और सुनने में अक्षम थे और नदी किनारे वे गाय चराने जाया करते थे. उनकी हत्या की सही तारीख गांव के लोगों को नहीं पता पर यह शायद १ फरवरी की तारीख थी. इस घटना को नदी में एक मछली पकड़ने वाले ने देखा था, सैन्य बलों ने नदी के उस पार से दो गोलियां चलाई थी. एक महीने बीत चुके हैं सैन्य बलों ने इधर आना स्थगित किया हुआ है.
'सैन्य बल' बगैर वर्दी के शहर में घूमते हुए.  
      हम छत्तीसगढ़ की सीमाओं को छूते हुए बल्लीगढ़ और होमिया पहुंचे थे. राज्य ने भले ही प्रेदेशों की इन सीमाओं को निर्धारित किया हुआ है पर प्रकृति और लोगों ने उसे मान्यता नहीं दी है. इन गांवों के लिए छत्तीसगढ़ एक बाजार है, एक ओकड़ा (ओझा) का घर है, वहां से आकर एक बैगा रोज यहीं घूमा करता है, छत्तीसगढ़ का सबकुछ यहां ज्यादा से ज्यादा सुलभ है. यह गढ़वा जिले का एक बड़ा गांव है १२ किमी. में फैला हुआ. भुइयां, खरवार और गोड़ आदिवासियों की दस हजार जनसंख्या वाला गांव. एक गांव जिसमे दो नदियां बहती हैं. हम यहां के कुछ युवकों के साथ गांव के बीच बहती पोपरा नदी तक गए. हमने यहां ज्यादा वक्त गुजारा और गांव का लंबा इतिहास सुना. इस गांव का इतिहास एक स्थानीय सामंत रामनाथ पाण्डे उर्फ फुल्लू पाण्डे के प्रताड़ना का इतिहास है. जिसके इल्जामों के दस्तावेज संक्षेप में लिखना भी मुश्किल है. एकनाथ भुईयां ६७ साल पहले से कहानी को शुरु करते हैं जब फुल्लु पाण्डे का परिवार यहां आकर बसा था. गांव के लोगों ने एक ब्राम्हण को पूजा-पाठ के लिए बसा लिया था. गांव की सैकडो एकड़ जमीन अब उसके कब्जे में है. जमीनों पर यह कब्जेदारी भूदान और भू-सुधार के बाद की कथा है. अभी पिछले बरस ही गांव वालों की १५० एकड़ जमीन के कागजात बनवाकर स्थानीय सामंत फुल्लु पाण्डे ने जिंदल के हांथों बेंच दिया है. गांव वाले जमीन को अब भी जोत रहे हैं, उन्होंने अपने जमीन के कागजों पर शहर में जाकर लेमिनेशन करवा लिया है कि कागज मजबूत रहेगा तो जमीन बनी रहेगी. पर लगातार यह भय बना हुआ है कि जिंदल जाने कब आ जाए. हम बीच में एकनाथ से किसी घटना की तारीख पूछते हैं तो वे अपनी भाषा में कहते हैं कि हम नहीं जानते कि तारीख कितने किलो की होती है. वे बताते हैं कि हम धन से नहीं, मन से पढ़े लोग हैं.
      उनकी आवाज तब थोड़ी धीमी हो जाती है यह गांव की बहु-बेटियों से जुड़ा मसला है. लड़कियों की उम्र बढ़ती, गांव में नई बहुएं आती तो किसको बख्स देना है यह फुल्लू पाण्डे की इच्छा पर निर्भर करता. लेकिन सैकडों को उसने नहीं बख्सा, इन घटनाओं के आंकड़े क्रूरता और शर्मिंदगी के हैं जिन्हें कोई नहीं जुटाता. ऐसी घटनाओं का जिक्र करने के बाद मैने एकनाथ के चेहरे पर पछतावे का भाव देखा मानो अपने गांव के विरुद्ध उसने कोई अपराध कर दिया हो. एक लड़का जो पेड़ से सटा हुआ बैठा है उसकी उम्र तकरीबन २५ साल है और उसकी छः एकड़ जमीन चली गई है. वह कहता है कि अगर एम.सी.सी. के लोग साथ देंगे तो जिंदल यहां नहीं आएगा. फुल्लु पाण्डे अब गांव से दूर किसी कस्बे में रहने लगा है. अब तक गांव के सैकड़ों लोग इकट्ठा हो चुके हैं. हमारे कागजों पर सब अपना नाम दर्ज करा देना चाहते हैं. जाने उनकी क्या उम्मीदें हैं कि कागजों पर लिखे उनके नाम उनकी जोत की जमीन के दस्तावेज बन जाएंगे.   
      गढ़वा, पलामू और लातेहार के कई गांवों में हम घूमते रहे. कहानियां बदल जाती थी, पीड़ाएं कम या ज्यादा हो जाती थी, बस. दुकानदार, किसान, मजदूर और गांव के सरपंच जाने कितनों पर माओवादियों के सहयोग करने का आरोप है, उन्हें खाना खिलाने का आरोप, किसी विस्फोट में शामिल होने का आरोप. खाना खिलाने के आरोप में बरगड़, कुमीकोला के सरपंच रामदास मिंज और फिदा हुसैन २० जनवरी से जेल में हैं. उन पर आरोप यह भी है कि भंडरिया में माओवादियों द्वारा सैन्य बलों की जो गाड़ी उड़ाई गई, वे उस घटना में सहयोगी थे. जबकि गांव वालों का कहना है कि इस घटना के १२ घंटे पहले ही पुलिस उन्हें थाने में लेकर गई थी और घटना के दौरान वे थाने में ही थे. क्या राज्य के विरुद्ध माओवादियों के सहयोग में पूरा का पूरा इलाका खड़ा है? क्या और क्यों के प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं? झारखण्ड के एक सशस्त्र माओवादी दस्ते ने एक दोपहर हमसे मुलाकात की. यह कोयल नदी के किनारे की कोई जगह थी. अपनी लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कई ऐसे तथ्य बताए जो उनके संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे. उन्होंने टीपीसी, जेएलटी, जेपीसी, पीएलएफआई और जेजेएमपी जैसे संगठनो पर आरोप लगाए जो माओवाद के नाम पर उनके संघर्ष को बदनाम कर रहे हैं और जिनमे से कुछ को पुलिस द्वारा संरक्षण भी मिला हुआ है. वे चिंतित थे कि सैन्य बलों द्वारा गांव वालों पर जो कार्यवाही की जा रही है उससे आदिवासियों की आर्थिकी पर इस बार भारी असर पड़ने वाला है. यह महुआ और तेंदू पत्ते का मौसम है. सैन्य बलों की प्रताड़ना के भय से लोग इसे इकट्ठा करने के लिए अपने गांव से दूर नहीं जा पा रहे. कई उत्तरों के साथ हम लौट आए और ज़ेहन में नए प्रश्न उभरने गले. झारखण्ड मानवाधिकार संगठन के शशिभूषण पाठक ने डी.जी.पी. जी.एस. रथ से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वे राज्यसभा के चुनाव में व्यस्त थे उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया. अलबत्ता दूसरे दिन उनका एक लेख अखबार में छपा जिसमे वे महाभारत के युद्ध से राष्ट्रहित की सीख लेने की सलाह दे रहे थे. शायद वे इस मिथक के सहारे झारखण्ड की मिट्टी को युद्ध में लाल होने की हिमायत में खड़े हैं.   
      इस दौरान अखबार हमारी पहुंच से दूर थे, पर हम कई अप्रकाशित खबरों के करीब. बहेरटाड़ के सरपंच बीफा और गांव के अन्य ८ लोगों को हफ्ते भर पहले सीआरपीएफ ने पिटाई के बाद छोड़ दिया है. बीफा की दाहिनी आंख से दिखना कम हो गया है. गांव के बगल में सीआरपीएफ का एक स्थायी कैम्प बनाया जा रहा है. बगल ही मुर्गीडीह गांव है जहां बिरजू ओरांव की दसो उंगलियों को कटर से चीड़ दिया गया है, उंगली में पट्टी बांधकर वे काम पर चले गए हैं. अपनी-अपनी तकलीफों के साथ सब अपने-अपने गांव में जिंदा हैं.
      संतोष जिनके दोस्त राजेन्द्र प्रसाद की हत्या जतिन नरवाल एस.पी. के आवास में पीटाई से हुई थी, इसके एवज में राजेन्द्र की पत्नी मंजू को कोई नौकरी दे दी गई है. संतोष जो राजद के स्थानीय नेता हैं वे अपने दोस्त की हत्या के अपराधियों को सजा दिलाना चाहते हैं. उनको लगातार धमकियां मिल रही हैं. कुछ माओवादी घटनाओं के तहत इनका नाम अखबारों और पुलिस के दस्तावेजों में शामिल किया जा चुका है. सुल्तानी घाटी में नशे मे धुत सीआरपीएफ के ‘जवानों’ ने एक टेम्पो ड्राइवर दारा सिंह की कुछ दिन पहले हत्या कर दी है. चंद दिनों में अनगिनत घटनाएं हैं. वह जो अखबारों में प्रकाशित हुई और वे जिनका किसी अखबार में कोई जिक्र भी नहीं. गांव में अखबार कम पहुंचते हैं और अखबारों में गांव भी.
चेमू-सान्या में नीलाम्बर-पीताम्बर के वंशज. 
      यह २८ मार्च की तारीख थी जब रात के १० बजे हम चेमू-सान्या पहुंचे. यह १८५७ के क्रांतिकारी नीलांबर-पीतांबर का गांव है, यहां आने के लिए सड़क को २० किमी. पीछे छोड़ना पड़ता है. जिसके सहारे यहां तक हम पहुंचे हैं वह नदी-नाले-सड़क-खाई का एक मिश्रित रूप है. पूरे झारखण्ड में आज उनकी १५३वी शहादत मनाई जा रही है. झारखण्ड के नेता नामधारी सिंह इंदर चंदवा में नीलांबर-पीतांबर की प्रतिमा स्थापना के लिए आए हुए हैं. उन्होंने युवावों से नीलांबर-पीतांबर जैसा होने का आवाह्न किया है. आज के ही दिन नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय ने भी एक बड़ा आयोजन रखा है. माओवादियों के स्शस्त्र दस्ते ने धनकारा गांव में मशाल जुलूस निकाला है. हम गांव के एक सिरे पर हैं यहां काफी ठंड है, गांव के लोगों ने सूखी लकड़ियां जला रखी हैं और इसके आसपास कुछ लोग बैठे हैं. अलाव की रोशनी के सहारे इर्दगिर्द के २-३ घरों को देखा जा सकता है. बांस के फट्ठों का एक लंबा सा तखत है जहां गांव के लोग अक्सर इकट्ठा हुआ करते हैं. किसी भी आयोजन से गांव के लोग अनभिज्ञ हैं. शायद माओवादियों का एक दस्ता थोड़ी देर पहले यहां से गुजर चुका है. थोड़ी देर बाद कुछ बच्चे आते है, जो संघम के बाल कलाकार है और जलते अलाव की आंच में जीतन मरांडी के कुछ गीत सुनाते हैं. ये झारखण्ड के लूटे जाने के गीत हैं, इनमे लोगों के संघर्ष में बुलाने की पुकार है. यह गांव कुटकु-मंडल बाध परियोजना के तहत ३२ डूबने वाले गांवों में से एक है. १९१२ में पूरे सौ साल पहले किए गए सर्वे के आधार पर लोगों की जमीनों का जो मुवावजा तय किया गया था वह कुछ लोगों को मिल चुका है. इन सौ वर्षों में पीढ़ियां बदल चुकी हैं और उनके गांव छोड़ने के इरादे भी. १९७२ में बाध बनने की जो परियोजना चालू हुई थी वह ९७ से स्थगित है. बगैर किसी सूचना के बांध के इंजीनियर बैजनाथ मिश्रा ने बांध के अस्थाई फाटक को बंद कर दिया था और पूरा इलाका डूब गया था. जानवरों की संख्या नहीं गिनी जा सकी, तबाही के अन्य आंकलन नहीं लगाए जा सके पर २१ लोग पानी में डूब कर मर गए. बनवारी लाल अंतिम युवक के मौत की याद सुनाते हैं कि कैसे वह ७ दिनों तक बगैर कुछ खाए-पिए पेड़ पर लटका रहा और जब लोग तसले के सहारे तैरते हुए उसके पास पहुंचे तो अचानक वह पानी में गिर गया. डूबते गांवों से लोगों को बचाने इस दौरान कोई प्रसाशन न आया. माओवादीयों ने उसी बीच इंजीनीयर बैजनाथ पंडा को इस तबाही के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई और उसकी हत्या कर दी गई. इसके बाद परियोजना का कार्य स्थगित कर दिया गया. यह स्थगन अभी भी जारी है और ३२ गांवों का उजड़ना थम सा गया है. लोगों के पलायन की वजहें बदल गयी हैं. अब सैन्य बल आते हैं और माओवादियों के सहयोग के लिए युवकों को पीटते हैं, उनके घरों के ताले तोड़ दिए जाते हैं, वे उनके अनाज एक दूसरे में मिला देते हैं. मनगू, सतीस, जोखन सिंह, करम दयाल सब कहीं चले जाना चाहते हैं. ऐसी जगह जहां वे पुलिस प्रताड़ना से बच सकें. वे चले भी जाते हैं पर जब भी वे साल-दो साल बाद इलाहाबाद, बनारस से लौटकर आते हैं. कोई न कोई इल्जाम उनके इंतज़ार मे होता है. अपने गांव में लौटना किसी खतरे में लौटने जैसा है. युवाओं के नीलांबर-पीतांबर बनने का नामधारी सिंह इंदर द्वारा किया गया आवाह्न दूसरे दिन अखबारों में प्रमुखता से छपा है.
बहेरतांड
      हम वहां से लौट आए हैं, बस घटनाए वहा पर चल रही है…घटनाओं अपना रास्ता नहीं भूलती.. और न ही उन्हें किसी रास्ते की जरूरत होती है. जब यह रिपोर्ट लिखी जा रही है.....ऑपरेशन ऑक्टोपस वहां शुरु हो चुका है. नीलांबर-पीताम्बर के गांव चेमू-सान्या मे सैन्य बलों ने गोलिया चलाई हैं हत्या हुए लोगो की संख्या का पता नही चल रहा है .....यहा महिलाओ के साथ बलात्कार भी हुए है....इलाक़े मे जाने पर पत्रकारों को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। मनोज विश्वकर्मा के पास लातेहार मे नीलांबर पीताम्बर की जीवनी मिली थी जिसके आरोप मे 1 अप्रेल को उन्हे जेल भेज दिया गया है। बरवाडीह में एक मुठभेड़ में छः माओवादियों के मारे जाने की खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर छपी हैं. दूसरे दिन माओवादियों ने इस खबर के गलत होने की पुष्टी की है. जो कहीं छपने के बजाय, कहीं छिप गयी है.

19 April 2012

ओरिएन्ट क्राफ्ट: आधुनिक टेक्सटाइल उद्योग में ठेका मज़दूरी या बंधुआगिरी

चंद वर्षों पहले तक अखबार की सुर्खियों से मजदूर गायब रहता था। यह सिलसिला टूट रहा है। यह और बात है कि इस खबर को कैसे छापा जाता है और छापने का उद्देश्य क्या होता है। पर, मजदूर वर्ग की गतिविधियों को टाल सकना अखबार मालिकों के लिए मुश्किल हो गया है। मार्च, 2012 के महीने में गुड़गांव, हरियाणा में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिसमें पुलिस के पीसीआर वैन को जला दिया गया, लाठी बरसाने गई पुलिस घायल हुई और उसे तत्काल भागना पड़ा। थोड़े-से समय में हजारों मजदूर इकट्ठा हो गए और अपने गुस्से का खुला इजहार किया। अंजनी कुमार की रिपोर्ट।




 जब ये घटनाएं घट रही थीं उस समय संसद में बजट पेश किया जा रहा था और यह दावा किया जा रहा था कि देश में गरीबी घट रही है। इस बढ़ रही ‘संपन्नता’ को बचाने के लिए ही संसद में अब तक का सबसे बड़ा रक्षा बजट पेश किया गया और हथियार की खरीद में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया। मजदूरों का खून चूसने वाले शॉप फ्लोर को इतनी छूट देने का आश्वासन दिया गया कि विकास दर में भारत लगातार आगे बना रहे। कह सकते हैं कि मजदूर किसानों के खून चूसने की गति जितनी तेज होगी उतनी ही भारत के विकास की गति दर होगी। इसका यह भी तर्जुमा किया जाता कि विकास की मशीन जितनी तेजी से अधिक आदमी को अपने से बाहर फेंकती है वही देश की विकास दर है। यह फेंकना किसी भी रूप में हो सकता है। भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय, समुदायिक, ... और भी इसी तरह के पहचान वाले लोगों की सामुहिक हत्या से लेकर आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक तौर पर उन्हें बरबाद करके भी। मार्च के महीने में ही अमेरिका की पत्रिका ‘टाइम’ ने गुजरात के फासिस्ट मोदी को ‘बिजनेस लीडर’ के पद से नवाजा। अमेरिकी कॉरपोरेट जगत भारतीय शासक वर्ग के ‘मोदियों’ को ‘विकास’ के रास्ते पर और तेज गति से चलने का संकेत दे रहा था। ‘मोदी अर्थात बिजनेस’। इस नारे का क्या यह अर्थ साफ है, बिजनेस अर्थात हत्या। देश का विकास जिस रास्ते पर तेजी से बढ़ता जा रहा है वहां इसका यही अर्थ रह गया है। बिजनेस के लिए जमीन हथियाने के दौरान हत्या, बिजनेस में हत्या, मुनाफा कमाने और इस बढ़ाने में हत्या और इस मुनाफे पर विलास करने के लिए हत्या; मोदी का यह रोल मॉडल गुजरात से लेकर बस्तर व गुड़गांव तक फैला हुआ है।

बहरहाल, गुड़गांव में फैक्टरी हो या रियल स्टेट वहां मजदूरों की मौत का साम्राज्य फैला हुआ है। सीधी मौत और धीमी मौत भी। उदारीकरण, नीजीकरण के इस तीसरे दशक की शुरुआत में जो दृश्य उपस्थित हो रहा है वह निश्चय ही काफी कुछ बदला हुआ है। यहां टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को जी सकने के न्यूनतम वेतन से इतना कम दिया जा रहा है जिसमें एक इन्सान का जीवित बने रहना भी एक ‘विशिष्टता’ है। मजदूरी में उसकी ‘कुल सामाजिक लागत’ की कोई गिनती ही नहीं है। उसके कुल उत्पादन में से उसे कितना हिस्सा दिया जाता है यह एक शोध का विषय है। ओरिएन्ट क्राफ्ट में ठेकेदार व मालिक के खिलाफ मजदूरों का फूट पड़ा गुस्सा इस बदलाव की हकीकत को काफी कुछ बयान करता है। 

घटना और उसकी पृष्ठभूमि

‘‘गुड़गांव एक बार फिर उबला’’- द इंडियन एक्सप्रेस, 20 मार्च 2012, के दिल्ली पेज की मुख्य खबर के साथ गाड़ियों के जलाने, लाठीचार्ज के लिए उतावली व घायल पुलिस और ओरिएन्ट क्राफ्ट फैक्टरी के टूटे हुए शीशे की कुल पांच फोटो लगाया गया था। आधे पेज से उपर के इस खबर में कांट्रेक्टर द्वारा की गई मजदूरों से की गई मारपीट पर मुख्य जोर दिया गया था। हिन्दुस्तान टाइम्स से लेकर सारे अखबारों के गुड़गांव संस्करण में यह खबर मुख्य पेज पर था। यह खबर तीन दिनों तक छपती रही। 23 मार्च 2012 को एक बार फिर मजदूरों ने पुलिस की गाड़ी को जला दिया गया और साइट ऑफिस पर हमला किया। यह घटना सेक्टर 58 में घटी। इसी समय मारुती सुजुकी मोटरसाइकल प्रा. लि. में भी मजदूर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। चंद अखबारों ने दबे दबे स्वर में मजदूरों पर हो रही ज्यादतियों के बारे में कुछ रिपोर्ट भी छापा। इस विस्फोटक स्थिति पर हरियाणा श्रम व रोजगार मंत्रालय ने तुरंत जांच कमेटी बनायी और चंद दिनों बाद इसने रिपोर्ट भी दे दी: ‘हालात बिगड़ने का कारण कांट्रेक्ट है। ओरिएन्ट क्राफ्ट को इनका लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए।’

हीरो होंडा चेक के पास सेक्टर 37 में हाइवे के दोनों तरफ ओरिएन्ट क्राफ्ट की कंपनियां हैं। घटना इस कंपनी के 9 व 13 में घटी। अखबार व हमारे छानबीन के दौरान जो बात सामने आई उसमें इस घटना की तात्कालिक पृष्ठिभूमि फैक्टरी में रविवार यानी 18 मार्च, 2012 को ठेकेदार द्वारा मजदूर को काम पर आने के लिए जोर देना है। इस दिन भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच था। और यह रविवार का दिन था जिस दिन अधिकारिक तौर पर छुट्टी रहती है। इस दिन कई सारे मजदूर काम पर नहीं आए। 19 मार्च को ठेकदार लवली सिंह अपने कमरे में न आने वाले मजदूरों को बुलाकर बुरा सुलूक कर रहा था। एक अनुमान के अनुसार ऐसे मजदूरों की संख्या सौ थी। ठेकेदार ने ऐसे ही न आने वाले मजदूरों में से नसीम और अनिल के साथ गाली गलौज करना शुरु कर दिया। इस कहा-सुनी के दौरान लवली सिंह ने एक बड़ी कैंची से नसीम के हाथ में मारा। वह बुरी तरह घायल हो गया। खून से लथपथ वह जैसे ही बाहर आया व अन्य मजदूर उसके आसपास इकट्ठे हुए, ठेकेदार, मालिक व सुपरवाइजर सक्रिय हो गए और इन मजदूरों को गेट से बाहर कर दिया। फैक्टरी के मजदूर तुरंत इकट्ठे हुए और गेट खोलकर बाहर आ गए।

मजदूरों ने फैक्टरी गेट के बाहर खड़ी मालिक ठेकेदारों की गाड़ियों को जलाना शुरू कर दिया। ठेकेदारों ने पुलिस बुला ली। पुलिस आमतौर पर जितनी तैयारी से पहुंचती है उतनी तैयारी से नहीं पहुंची। एक मजदूर संगठनकर्ता के अनुसार इसका कारण सिर्फ इतना था कि इन पुलिस वालों के लिए यहां काम करने वाले मजदूर ‘बिहारी’ थे। पुलिस व स्थानीय ठेकेदार आदि पंजाब व हरियाणा से बाहर के राज्यों से आने वाले सभी लोगों के लिए ‘बिहारी’ संबोधन ही प्रयोग करते हैं। जिस समय पुलिस ओरिएन्ट क्राफ्ट के 9 व 13 न. गेट पर पहुंची है मजदूर पूरे गुस्से में थे। उन्होंने पुलिस पर जमकर पथराव किया और पुलिस की जिप्सी को उलट कर फूंक दिया। कई पुलिस वाले घायल हुए।

कुल तीन घंटों तक मजदूरों ने वहां की सारी गतिवधि को अपने नियंत्रण में रखा। इस दौरान मजदूरों ने लवली सिंह पर मजदूरों ने हमला किया या नहीं, इस बात का खुलासा नहीं हो पाया। लेकिन फैक्टरी का प्रंबंधक समूह सक्रिय हो गया और उसने मजदूरों को अपने पक्ष कर लिया। सह. प्रबंधक ने ठेकेदार लवली सिंह के खिलाफ प्राथमिकी-एफआईआर दर्ज कराया। हालांकि उस पर दायर केस इतना कमजोर था कि उसे थाने से ही जमानत मिल गई। 7 मजदूरों पर अटेम्ट टू मर्डर-307 व दंगा फसाद करने का मुकदमा दर्ज हुआ। कुल 10 मजदूरों की गिरफ्तारी हुई। इसमें से पांच मजदूर एक ही मकान में रहने वाले हैं जिन्हें वहां से पकड़ा गया। ये सभी मोतिहारी जिले के हैं। इससे साफ पता चलता है कि गिरफ्तारी मनमाने तरीके से की गई।

घायल नसीम के परिवार, रिश्तेदार व क्षेत्र के जानने वाले लोग इकट्ठे हो गए। एक अनुमान के अनुसार यह संख्या 150 से उपर थी। प्रबंधकों ने नसीम को अस्पताल में भर्ती करा दिया था। और इकट्ठे हुए लोगों के साथ ‘समझौता’ हो गया। घटना की रात से ही नसीम ने अपना बयान कई बार बदला। कभी उसने सीढ़ी से गिरकर शीशे से चोट खाने की बात कही तो कभी झगड़े के दौरान गिर जाने से चोट लगने का बयान दिया। नसीम भी मोतिहारी जिले से आता है। वह कपड़े का काम करने वाली मुस्लिम समुदाय से आता है। इस समुदाय के काफी बड़ी संख्या में गुड़गांव व दिल्ली में काम करते हैं। ‘बात आगे न बढ़ाने’ और ‘सारे मामले को पटरी पर ला देने’ के आश्वासन के साथ प्रबंधक ने तीन दिनों के भीतर मजदूरों को काम पर वापस बुला लिया।

24 मार्च, 2012 को दोपहर में लगभग बीस लोगों की एक टीम दिल्ली से ओरिएन्ट क्राफ्ट के गेट पर इस उम्मीद में पहुंची कि मजदूरों से बातचीत कर यहां के हालात को जाना जाए और मजदूरों के साथ एक रिश्ता कायम किया जाय। उस दिन मजदूरों को लंच के लिए बाहर आने नहीं दिया गया और रात में लगभग 9 बजे उन्हें काम से छोड़ा गया। एक बार फिर चार दिनों बाद गेट से थोड़ी दूरी पर खड़े होकर चार सदस्यीय टीम ने मजदूरों से बातचीत की। मजदूरों ने बातचीत की लेकिन इस घटना से मजदूर कोई सबक निकाल सकने की स्थिति में नहीं थे। मजदूर इस घटना से इतना जान रहे थे कि ठेकेदार व प्रबंधक-मालिक पहले से कहीं अधिक ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगे थे। 

ओरिएन्ट क्राफ्ट: लूट का आधुनिक ढांचा

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार ओरिएन्ट क्राफ्ट लिमिटेड गुड़गांव, 1978, में अस्तित्व में आया। विदेशी बाजार व कंपनियों के लिए काम करने वाली इस गार्मेंट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के कुल 21 संस्थान हैं जिनमें 25 हजार मजदूर काम करते हैं। यहां चालीस फैशन ब्रांड कंपनियों जिसमें मार्क जैकब, मार्क स्पैंसर, एन टेलर आदि लेबल वालों के लिए सिलाई का काम होता है। ‘मनीकंट्रोल.कॉम’ साइट के अनुसार 2004-2005 में इसका टर्नओवर 650 करोड़ रुपए का था। 2010 तक यह 850 करोड़ हो चुका था। यहां सिल्क, ऊनी, सूती, सिंथेटिक आदि कपड़ों पर काम होता है। यह निर्यात आधारित काम है। फोर्ब्स पत्रिका के साथ 30 अप्रैल, 2010 को बातचीत में कंपनी के निदेशक सुधीर ढींगरा के अनुसार प्रतिदिन 1,50,000 पीस का उत्पादन होता है। यहां 2000 तरह की डिजाइन पर काम होता है। डिजाइन, इंब्राइडरी, कट आदि के चलते मजदूर सामान्य मूल्य पर दोगुना यानी प्रति शर्ट 10 डॉलर का मूल्य जोड़ते हैं। उत्पादन बढ़ाने के लिए डिजाइन बनाने के लिए कंप्युटराइज्ड टकएकाड नाम की तकनीक का प्रयोग 2008 से शुरू किया गया। इससे कपड़ों के सिकुड़न और नाप को और अधिक सटीक करने के साथ साथ केवल नाप की फिडिंग से कपड़ों की कटाई में गति काफी तेज हो गई। स्टिचवर्ल्ड.कॉम के अनुसार उत्पादकता में 40 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। कंपनी के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक सुधीर ढींगरा इस कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी पांच कपड़ा उद्योग में से एक बना देने की कोशिश में हैं। इन्होंने लिवाइस कंपनी के स्पेन स्थित एक प्लांट को खरीदा है। आंध्र प्रदेश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में 300 करोड़ का प्लॉट खरीदा है जिसमें 50 यूनिट के लिए 2000 करोड़ रूपए का निवेश करने में लगे हुए हैं। इसी तरह गुड़गांव के मानेसर में 334 एकड़ का प्लॉट खरीदकर कंपनी का विस्तार किया और 2011 में उत्पादन शुरू कर दिया। 6 बिलियन डॉलर वाली विदेशी कंपनी ली एंड फंग ने हाल में ओरिएन्ट क्राफ्ट को आउटसोर्स करने का निर्णय लिया है। गुड़गांव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ओखला और मानेसर में 20 से 21 प्रोडक्शन यूनिटें काम कर रही हैं। यह सिर्फ टेक्सटाइल कंपनी ही नहीं है। यह अपने सेज के साथ रियल एस्टेट, होटल, अस्पताल, रेजीडेंसियल यूनिटें बनाने में भी निवेश कर रही है। राजस्थान के भीलवाड़ा में ग्रीनहाउसिंग योजना पर इस कंपनी में काम करना शुरू किया है।


ओरिएन्ट क्राफ्ट प्रा. लि. के लिंक्डइन प्रोफाइल के अनुसार कंपनी के तीन मालिक हैं। सुधीर ढींगरा इस कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक है। इसके नीचे प्रबंधक व चीफ एक्जीक्युटिव अफसर हैं। इसके बाद सुपरवाइजरों की श्रेणी है। ये दो तरह के हैं: एक तो कंपनी की ओर से नियुक्त। दूसरे ठेकेदारों की ओर से काम करने वाले। कंपनी अपना काम करने के लिए मजदूरों को दो तरह से नियुक्त करती है। पहले प्रकार में वह खुद सीधे तौर पर मजदूरों को भर्ती लेती है। इन मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों की संख्या का 5 से 7 प्रतिशत तक है। ये मजदूर जरूरी नहीं है कि नियमित हों। आमतौर पर इन मजदूरों को जिस लॉग बुक पर हस्ताक्षर करवाया जाता है वह दो से तीन सालों में बदल दिया जाता है। सेक्टर 37 के कंपनी संख्या 8 व 9-13 के कुछ ऐसे मजदूरों से बातचीत हुई जो वहां लगभग दस सालों से काम कर रहे हैं। लेकिन वे नियमित नहीं हैं। उनके काम को दो या तीन साल में रीन्यू-फिर से नियुक्ति के रूप में गिना जाता है। कह सकते हैं कि वहां वस्तुतः सीधी भर्ती में भी कोई नियमित मजदूर नहीं है। यदि हम मारुती सुजुकी जैसी ऑटोमोबाइल कंपनी के हालात को देखें तो वहां 5 साल काम करने के बाद मजदूरों को किसी न किसी बहाने काम से निकालने की तैयारी शुरू हो जाती है। मानेसर में मजदूरों के आंदोलन में यह भी एक मुद्दा था। ओरिएन्ट क्राफ्ट के 9-13 में लगभग 90 प्रतिशत मजदूर ठेकेदारों द्वारा नियुक्त किए गए हैं। इन ठेकेदारों के भी कई प्रकार हैं। प्रबंधक आमतौर मजदूर की उपलब्धता अधिकतम ठेकेदारों के द्वारा करते हैं। कुछ ठेकेदार ऐसे भी हो सकते हैं जिनके तहत 6 या 7 मजदूर हों तो दूसरी ओर 200 मजदूर हों। आज देश के लगभग सारे औद्योगिक क्षेत्र में पंजीकृत व गैरपंजीकृत ठेकेदारों की भारी संख्या है। गुड़गांव में ये हर गली में हैं और ये एक पूरी श्रृंखला चलाते हैं। ओरिएन्ट क्राफ्ट के इस कंपनी में मजदूरों से बातचीत करने पर ठेकेदारों के प्रकार ये थे: काम का ठेका लेकर फैक्टरी में अपने मजदूरों के साथ कमा करने वाला ठेकेदार, पीस रेट पर काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार, सफाई व तकनीकी काम करने वाला और इसका काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार, सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार।

इसके बाद काम करने वाला मजदूर आता है जिसकी पीठ पर पूरी फैक्टरी चलती है और मुनाफा कमाने में देश की अग्रणी कंपनियों में से एक बनने का दावा कर रही है। मजदूरों से आम तौर पर सुबह 8.30 से रात 9.30 तक काम कराया जाता है। कई बार यह रात के एक बजे तक चलता रहता है। पर आमतौर पर दो-तीन घंटे अधिक काम करा लेना एक आम बात है। इसका ओवरटाइम देने में काफी कोताही बरती जाती है। अतिरिक्त कुल काम का बमुश्किल 30 से 40 प्रतिशत हिस्से का ही भुगतान किया जाता है। यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रकार निम्न हैं: मास्टर, चेकर, फिनिशर्स, इंब्राइडर वर्कर, टेलर्स, हेल्पर, तकनीकी चालक, सफाई कर्मी। इन सब पर लगातार नजर रखने वाला सुपरवाइजर होता है जो ठेकेदारों व प्रबंधकों के लिए काम करता है। मास्टर डिजाइन बनाने, पास करने आदि का काम करता है। इसे तकनीकी काम में महारत होनी चाहिए। कंपनी तकनीक का प्रयोग इसी के माध्यम से करती है। चेकर इस डिजाइन पर काम हो जाने के बाद पीस को नाप-जोख कर पास करता है। आमतौर पर यह बहुत-से काम को रिजेक्ट कर मजदूरों पर दबाव बनाए रखता है जिससे मजदूरों के प्रति पीस का भुगतान कम रहे। यह गलत सिलाई को रद्द कर देता है या उसे फिर से सिलने के लिए बाध्य करता है। टेलर्स सिलाई का काम करता है। इसी के बदौलत उत्पादन की गति तेज या कम होती है। ये आमतौर पर पीस रेट पर काम करते हैं जो 45 से 65 पैसे प्रति पीस पर काम करते हैं। इससे उन्हें 6000 से 8 या 9 हजार रूपए तक की प्रति महीने आय हो जाती है। हालांकि इसमें काम की उपलब्धता का भी योगदान होता है। काम का सबसे अधिक दबाव इन्हीं पर होता है। प्रतिपीस काम करने की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि अपने हिस्से का काम किया और चल दिया। यह स्वतंत्रता प्रतिपीस की है जिस पर उसे भुगतान होना है। काम के घंटे या छुट्टी के मसले पर उससे कोई छूट नहीं होती। उनसे जोर जबरदस्ती की जाती है। काम की गति कम होने पर उनसे मार-पीट, गाली-गलौज की जाती है। उनके भुगतान को रोक लिया जाता है कि अगले काम में जोता जा सके। मजदूर के प्रतिपीस आय में ठेकेदार 3 प्रतिशत का हिस्सा बंटाता है। इसके बाद हेल्पर आता है जो धागा, काटे गए कपड़ों को मशीनों की लाइन में सिलाई कर रहे मजदूरों को पहुंचाता है और सिले गए कपड़ों को मास्टर, चेकर तक ले जाता है। सबसे कम तनख्वाह इनकी होती है। मजदूरों से बातचीत के आधार पर यह अधिकतम 4500 रूपए था। सफाईकर्मी मूलतः ठेका पर काम करते हैं और इनकी आय हेल्पर के आस पास थी। मास्टर व चेकर की आय के बारे में मजदूर केवल अनुमान ही लगा रहे थे जो 12 से 13 हजार के आस पास था। इन मजदूरों की श्रृंखला में निश्चय ही आयरन करने वाले मजदूर होंगे। संभव है यह काम आउटसोर्स किया जा रहा हो। इनके बारे में पता नहीं चल सका। कुल मिलाकर मजदूरों की श्रेणी में आने वालों की प्रति माह आय 4500 से लेकर अधिकतम 15000 हजार रूपए तक है।

हमने जितने भी मजदूरों से बात की उनमें से सभी ने बताया कि उन्हें ईएसआई, पीएफ मिलता है। तनख्वाह का भुगतान ठेकेदार करता है। इसका पेस्लीप मिलता है। कानूनन भुगतान के लिए मालिक ही जिम्मेदार है। पर यह काम ठेकेदार अपनी सुविधा के अनुसार करता है। काम की खोज में आने वाले मजदूरों के पास न तो बैंक अकाउंट होता है और न ही कंपनी की ओर से जारी नौकरी का कार्ड। इसका पूरा फायदा ठेकेदार उठाता है। काम हासिल करने व छोड़ने के चलते -जिसका सिलसिला मजदूरों को झेलना ही पड़ता है - पीएफ में कटा हुए पैसा हासिल करना एक टेढ़ी खीर है जिसे आमतौर पर ठेकेदार अपने हिस्से में कर ही लेता है। इसी तरह शुरूआती महीनों की आय के नगद भुगतान में कटौती कर लेता है। सेक्टर 37 में ओरिएन्ट क्राफ्ट की कुल पांच कंपनियां हैं जिनमें लगभग दस हजार मजदूर हैं। इन मजदूरों की कमाई की लूट का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। और निश्चय ही इसमें और भी सरकारी, गैर सरकारी तत्व अपना खेल खेल रहे हैं।

कंपनी में काम करने वाले मजदूरों की उम्र 18 से 35 के बीच है। आंख पर दबाव बनाने वाले इस काम में इसके बाद काम करने वालों की संख्या घटती जाती है। कहने को यहां सप्ताह में एक छुट्टी होती है। यह छुट्टी काम के दबाव में काट दी जाती है। ठेकेदार उत्पादन पर जोर देने के लिए लगातार दबाव बनाए रखता है जिससे काम का घंटा बढ़ता जाता है। कोई भी ऐसा मजदूर नहीं मिला जिसने काम के घंटे को दस से कम बताया हो और इस अतिरिक्त काम का भुगतान उसने हासिल किया हो। देर रात तक काम करने के बाद ही मजदूरों के सम्मिलित दबाव से ठेकेदार ना-नुकर के साथ कुछ देने के लिए तैयार होता है। फैक्टरी के भीतर कैंटीन है जिसमें भुगतान कर चाय व भोजन लिया जा सकता है। यहां काम करने वाले मजदूर आस-पास के शेष रह गए गांवों में एबेस्टस या पत्थर की पटिया वाले मकान में रहते है। आज भी ऐसे गांव की गलियां कच्ची हैं और गलियों में बिजली के तार झूलते हैं। पानी की सप्लाई नहीं है। बोरवेल- जमीन का निकाला हुआ निहायत ही खारा पानी पीने के लिए उपलब्ध है। यू आकार में बने मकान में कमरों की संख्या जितनी बन सकती है उतना बनाया जाता है। आठ-दस कमरों पर एक लैट्रीन होती है। एक कमरे में तीन लोग रहते हैं। इसमें हवा जाने का रास्ता दरवाजा और दरवाजे के उपर एक छोटा सा मोखा होता है। दिन में भी यहां अंधेरा रहता है। इन कमरों में यदि मकान मालिक चौथा आदमी पकड़ लेता है तो मजदूरों पर जुर्माना लगा देता है। इन रहने वाले मजदूरों के सामने मकान मालिक की शर्त होती है कि उस ‘लॉज’ के कमरे में उसके द्वारा खोली गई परचून की दुकान से ही वे सारी खरीदारी करेंगे। एक कमरे का किराया 1500 से लेकर 2500 रूपए प्रति महीना तक है। हरियाणा इंडस्ट्रीयल डेवेलेपमेंट की एक अघोषित नीति है जिसके तहत स्थानीय लोगों को कंपनियां नौकरी पर नहीं रखती और गांव को पहले के अधिकारों के साथ बनाए हुए भी है। इसके चलते मजदूरों की भाषाई, क्षेत्र व सांस्कृतिक स्तर पर स्थानीय लोगों के साथ साफ विभाजन हो जाता है। यह विभाजन काफी खतरनाक हद तक लगातार काम करता रहता है। इन गांवों में रहते हुए मजदूर अलगाव के साथ सिर्फ ‘रहता’ है। ठेकदारी प्रथा के चलते खुद मजदूरों के बीच एक विभाजन की स्थिति रहती है। इससे जीवन काफी दुरुह हो जाता है। ठेकेदार ही नहीं मकान मालिक तक मजदूर के इस हालात का काफी फायदा उठाते हैं। ऐसे में मजदूर गांव-जंवार के रिश्ते, भाषाई व सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अपनी जमीन तलाशत रहता है। जरूरत होने पर इससे सहयोग भी लेता है। ओरिएन्ट क्राफ्ट में घटी घटना के दौरान हरियाणा पुलिस का रवैया उतना आक्रामक नहीं रहा जितना आमतौर पर होता है लेकिन इसके तीन दिन बाद सेक्टर 58 में घटी घटना में पुलिस, स्थानीय निवासियों ने ‘बिहारियों को सबक’ सिखाने के लिए सम्मिलित हमला किया। मजदूरों को अधमरा होने तक मारा, पैसा-मोबाइल छीन लिया और 250 लोगों को पकड़ा जिसमें से लगभग 50 पर केस दर्ज कर पुलिस ने अन्य को 4 से 5 हजार रूपए तक लेकर छोड़ दिया।

रिहाइश व काम के इस हालात में मजदूर अपनी आय का किसी 60 प्रतिशत हिस्सा बचाता है। जिसे वह अपने गांव भेज देता है। गांव में ये पैसे घर बनाने, खेत के लिए बीज खाद, परिवार के सदस्य की शादी या दवा, परिवार चलाने आदि में खर्च हो जाता है। कोई भी ऐसा मजदूर नहीं मिला जो गुड़गांव या दिल्ली में रहने का ख्वाब देखता हो। सच्चाई यह है कि इन क्षेत्रों में 20 हजार रूपए तक की कमाई करने वाला व्यक्ति भी अपने पूरे परिवार के साथ बसने की सोच नहीं सकता। जाहिर है मजदूर यहां बस सकने की स्थिति में नहीं है। वह यहां के जिन रिहाइशों में रह रहा है वह उसे जिस स्तर के अलगाव में ले जाता है जिसके चलते न केवल काम की अस्थिरता साथ ही ठहराव की अस्थिरता भी बन जाती है। नोएडा, ओखला, गुड़गांव, फरीदाबाद, साहिबाबाद-गाजियाबाद के विशाल औद्योगिक फैलाव में रियल इस्टेट का कारोबार इतना बड़ा बन चुका है जिसमें मजदूरों को ठहरने के लिए भी जगह नहीं है। यह एक ऐसी औद्योगिक संरचना है जिसमें मजदूर करोड़ों की संख्या में- अनुमान के अनुसार 20 करोड़, लगातार आवाजाही कर रहा है। इस आवाजाही व मजदूर ‘होने’ पर भाषा, संस्कृति, धर्म और रिश्तेदारी का भार नीति निर्माताओं ने डाल रखा है। एक तरफ वे ‘मुक्त’ करने के लिए जनता के खिलाफ लगातार युद्ध लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर ‘बस जाने के अधिकार’ से भी वंचित करने की नीति पर बड़े पैमाने पर अमल किया जा रहा है। शेष काम औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाली नीतियां कर ही दे रही हैं। जो बच जाता है उसे न्यायालय के आदेश पूरा कर दे रहे हैं। एक मजदूर से बातचीत के दौरान जब मैंने उसके सामने यह स्थिति रखी कि गांव में खेती-मजदूरी घाटे की है और यहां शहर में कंपनी में काम करने पर भी जितना मिलना चाहिए उससे भी काफी कम मिलता है। तो यहां काम करना भी घाटे का है, इन दोनों में से आप किसे चुनेंगे? उनका जवाब था: ‘‘शहर में जब तक काम है हाथ में पैसा है, भले ही कम मिलता है। पर यहां रहने में स्थिरता नहीं है। गांव में कुछ भी है वहां स्थिरता है। वहां कोशिश करने पर घर-दुआर-जमीन तो अपनी बनी रहती है।’’

ठेका मजदूरी प्रथा: जिसे खत्म होना था आज उसी का साम्राज्य है

1970 में कांट्रेक्ट लेबर रेग्यूलेशन एण्ड एबॉलिशन एक्ट यानी ठेका मजदूर नियमन व उन्मूलन अधिनियम, 1970 के तहत भारत सरकार ने इस ठेका प्रथा को खत्म करने के लिए कानूनी पहलकदमी ली। लेकिन मजदूर और औद्योगिक रिश्ते में यह प्रथा खत्म होने के बजाय बढ़ती ही गई। 1990 में उदारीकरण, नीजीकरण और वैश्वीकरण की औद्योगिक विकास की हवा का एक ही उद्देश्य था: मजदूरों का अधिकतम दोहन। एक के बाद एक श्रम आयोग बने जिसका एक ही उद्देश्य था इस एक्ट का उलघंन करने की पूरी छूट। जितनी ही बार श्रम कानूनों को लचीला बनाने की बात की गई उतनी बार मजदूरों को पूंजी का गुलाम बना देने की नीति को और अधिक उदार बना दिया गया। इस एक्ट के अनुसार ठेका मजदूरों का वहीं प्रयोग किया जा सकता है जिस काम की प्रकृति नियमित नहीं है और उसमें तीन या छह महीने से अधिक की अवधि तक का काम नहीं है। साथ ही ऐसे काम खतरनाक प्रकृति के नहीं हैं। ऐसी फैक्टरी जहां नियमित काम करने वालों की संख्या पर्याप्त हो और काम की प्रकृति नियमित हो वहां ठेका मजदूर प्रथा लागू नहीं होगा। इस एक्ट के तहत ठेकेदार उसे माना गया जो संस्थान के लिए उत्पादन या काम को करने के लिए सुविधा उपलब्ध कराता है और उस काम को पूरा करने के लिए मजदूरों के साथ उपस्थित होता है। ऐसे ठेकेदार का पंजीकरण होना चाहिए। मजदूरों को वेतन भुगतान की जिम्मेदारी फैक्टरी मालिक की है। साथ ही मजदूरों को कैंटीन, रेस्ट रूम व रहने की व्यवस्था, प्राथमिक चिकित्सा, पीएफ, इएसआई, पीने का पानी, शौचालय आदि की व्यवस्था करने के लिए ठेकेदार व मालिक उत्तरदायी है। मजदूरों को ठेकेदार द्वारा तय समय सीमा के भीतर मजदूरी का वितरण -जो निश्चय ही तय न्यूनतम सीमा से ऊपर होगा और फैक्टी द्वारा दिये जाने वाली मजदूरी से तय होगा - फैक्टरी मालिक द्वारा तय व्यक्ति के सामने ही होगा। जाहिर-सी बात है कि यह सब कुछ लागू नहीं होता है। और इसे न लागू करने के लिए सरकारी नीतियां पर्याप्त बढ़ावा देती हैं। इस एक्ट में कई सारे छेद हैं जिससे पूंजी के मालिकों के पक्ष में व्याख्या करना आसान हो जाता है। इस व्याख्या में एक्ट के सारे प्रावधान आसानी से बेकार साबित कर दिए जाते हैं।
ओरिएन्ट क्राफ्ट में सैकड़ों ऐसे मजदूर हैं जो पिछले दसियों साल से काम कर रहे हैं लेकिन नियमित नहीं हैं। इस कंपनी के बगल में जेजे वाल्या नाम की एक कंपनी है जो मजदूरों से छुटकारा पाने के लिए हर तीन साल पर नाम ही बदल देती है। ओरिएन्ट क्राफ्ट कंपनी में लॉग बुक्स दो तरह के रखे जाते हैं, जिसका फायदा मालिक व ठेकेदार दोनों ही उठाते हैं। यहां ठेकेदार ओरिएन्ट क्राफ्ट के लिए काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाले से अधिक की भूमिका निभाता है: अधिक काम करने के लिए दबाव डालना-मानसिक और कभी-कभी शारीरिक, ओवर टाइम का पैसा नहीं देना, पीएफ के पैसे में हिस्सेदारी लेने या पूरा ही खा जाना, वेतन में से एक हिस्सा खाना, देय सुविधाओं को न देना, पैसे रोककर या नौकरी से निकलवा देने या नौकरी देने के नाम पर मजदूरों को अपने तरीके से काम के लिए विवश करना आदि। इसी तरह मालिक मजदूरों के प्रति किसी तरह का उत्तरदायित्व नहीं निभाता है। फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर ठेकेदार का आदमी है। नियमित मजदूरों को न रखने के पीछे मालिक की मंशा मजदूरों के प्रति किसी भी तरह के उत्तरदायित्व से बचना होता है। वह काम का लक्ष्य ठेकेदारों के सामने रखता है और इसके लिए जरूरी तैयारी-वर्कशाप आदि, ठेकेदार पर छोड़ देता है। ठेकेदार को इस काम में कोई रूचि नहीं रहती। वह मजदूरों की लगातार भर्ती-निकाल से इस काम को पूरा करता है। इसके चलते घायल होने वाले मजदूरों के प्रति न तो ठेकेदार जिम्मेदारी लेता है और न ही मालिक। मारुती सुजुकी में ऐसे ट्रेनीज का भरपूर दोहन, घायल होने या बीमार होने पर काम से निकाल देने की घटना का इतिहास पिछले दिनों काफी चर्चा का विषय बना रहा। तिरुपुर, तमिलनाडु में टेक्स्टाइल उद्योग में स्थिति और भी भयावह है। वहां ठेकेदारों ने सुमंगली या ऐसी ही योजना के तहत अविवाहित लड़कियों को काम पर रखते समय उन्हें होस्टल में रहने के लिए विवश करते हैं। काम करने वाली लड़कियों को उनके हाथ में वेतन नहीं दिया जाता है। उन्हें अपने मां-पिता के अलावा किसी से बात करने की मनाही है। साल में दो बार उनके रिश्तेदार मिल सकते हैं। उन्हें ठेकेदारों गाड़ी काम के स्थल तक ले जाती हैं और 12 घंटे काम कराकर वापस उसी होस्टल में छोड़ आती हैं। यह योजना 15 से 19 की लड़कियों का दोहन कर उन्हें तीन से पांच साल में दहेज के लिए 30 से 50 हजार रूपए देती हैं। साल में एक बार पांच दिन के लिए छुट्टी मिलती है। जाहिर है इस भुगतान में न तो न्यूनतम वेतन का कानून काम करता है और न ही काम के हालात की शर्तें। ठेकेदार, सुपरवाइजर, सुरक्षा गार्डों द्वारा इन लड़कियों का शारीरिक मानसिक शोषण की घटनाएं आमतौर पर होती हैं। जिसके चलते वहां आत्महत्या की दर आसाधारण तौर से अधिक थी। दो साल पहले की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन यह दर दो से अधिक थी। इसी तरह पिछले साल लुधियाना में 5 लाख से अधिक ठेका मजदूरों को आठ घंटे काम और काम की न्यूनतम शर्तों को पूरा करने की लड़ाई लड़नी पड़ी। और इसमें आंशिक सफलता ही मिल सकी।

2009 मीनाक्षी राजीव द्वारा प्रस्तुत ‘भारत में ठेका मजदूर अधिनियम: तथ्य रिपोर्ट’ में दिखाया है कि मजदूरों को तयशुदा न्यूनतम वेतन से 30 प्रतिशत कम भुगतान किया जाता है। जबकि ओवर टाइम को ठेकेदार अपने हिस्से में डाल लेता है। 66 प्रतिशत मजदूर अपना पीएफ हासिल नहीं कर पाते (www.igdr.ac.in)। ग्लोबल लेबर जर्नल के तीसरे अंक 2012 में अलेजांद्रा मेज्जाद्री का भारत के गारमेंट उद्योग पर पेश किए पेपर के अनुसार 1989-90 से 1994-95 के बीच संगठित मजदूरों का प्रतिशत 27 व असंगठित 6.20 प्रतिशत था। जो 1994-95 से 1999-2000 के बीच क्रमशः 2.3 व 14.9 प्रतिशत हो गया। यह आंकड़ा सरकारी है। इस दौरान संगठित क्षेत्र में रोजगार 17.30 से घटकर 3.80 पर आ गया जबकि असंगठित क्षेत्र में यह 0.7 से बढ़कर 15.20 प्रतिशत हो गया। नोएडा में किए गए सर्वे के अनुसार 80 प्रतिशत मजदूर अनियमित थे। 2005 में मास्टर व कटर आठ से दस हजार तक पा रहे थे पर हेल्पर या अनस्किल्ड मजदूर लगभग 2000 पा रहे थे।

गुड़गांव में और ओरिएन्ट क्राफ्ट में मजदूरों की भर्ती करने वाले ठेकेदारों में अधिक संख्या स्थानीय है पंजाब राज्य के हैं। कुछ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं। थोड़ी संख्या बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश से है। मूलतः मजदूरों के इलाका, धर्म, भाषा, रिश्तेदार आदि से जुड़े ठेकेदारों की संख्या कम है। यह अंग्रेजों के समय अपनाई गई ठेका प्रथा -जाबर प्रथा से यह इस मायने में भिन्न है। मजदूर व ठेकेदार में इलाकाई, भाषा, संस्कृति आदि का काफी फर्क होता है और आम तौर पर ठेकेदार भर्ती केंद्र खोलकर मजदूरों को काम उपलब्ध कराता है। हालांकि आज इस प्रथा को जिस तरह से प्रयोग में लाया जा रहा है उससे जाबर प्रथा के पीछे के उद्देश्य उतनी ही आसानी से पूरा हो रहे हैं। निश्चय ही इस बदलाव का अध्ययन करना चाहिए। ओरिएन्ट क्राफ्ट में ठेकेदार ने जब नसीम पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया उस समय इस कंपनी के प्रबंधकों ने तुरंत नसीम व अन्य मजदूरों के साथ वार्ता शुरू कर दिया। देर रात तक नसीम के परिवार, रिश्तेदार व इलाके से लगभग 150 से ऊपर लोग इकट्ठा हो गए। मजदूरों के बीच काम कर रहे और इस कंपनी के मजदूरों के साथ जुड़े हुए सक्रिय कार्यकर्ता ने बताया कि मसला मालिक और इन लोगों के बीच तय हो गया और शायद(!) कुछ हर्जाने के साथ मामले को रफा-दफा कर लिया गया। इस फैक्टरी के अन्य मजदूर इस प्रक्रिया से बाहर रहे।


भारत में जिस समय ठेका मजदूर प्रथा को नियमित व खत्म करने का अधिनियम लाया गया उस समय विश्व आर्थिक संकट से गुजर रहा था। अमेरिका और पूरा यूरोप महामंदी की मार से पीड़ित था। भारत पर इसका असर खूब था। यह वह समय था जब गांवों में मजदूर व गरीब किसानों ने बंधुआ मजदूरी-गुलामी की व्यवस्था के खिलाफ नक्सलबाड़ी का उद्घोष किया। इस समय तक निजी क्षेत्र काफी हद तक विकसित हो चुका था और पब्लिक सेक्टर की भूमिका काफी हद तक पूरी हो चुकी थी। छोटे-मोटे उद्यमों से प्राथमिक पूंजी जुटाने और शहरी समुदाय को एक छोटी में जीवन गुजारने की व्यवस्था की जरूरत उपरोक्त दोनों क्षेत्रों के लिए नहीं रह गई थी। इस एक्ट के छेद से विशाल पब्लिक सेक्टर व निजी क्षेत्र के हाथियों को लगातार आसानी से गुजर जाने दिया गया लेकिन छोटे उद्यमियों को छापेमारी कर तबाह करने का सिलसिला जारी रहा। ‘आपातकाल’ व इंदिरा के ‘राष्ट्रीयकृत समाजवाद’ ने 1980 तक एक ऐसा माहौल बना दिया था जिसमें फासीवादी ताकतें बड़े पैमाने पर छोटे उद्यमों को नष्ट-तबाह करती रहीं। 1977 में ही अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने कॉरपोरेट, साम्राज्यवादी देशों की सरकार व इनकी दलाल ट्रेड यूनियनों के बीच वार्ता से श्रम नीति में एक महत्वपूर्ण किया जिसके तहत दुनिया के स्तर पर कमोबेश ठेका मजदूरी प्रथा को खत्म करने के लिए प्रस्ताव लाया गया। वस्तुतः यह प्रस्ताव बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने लेबल पर काम करने वाले तीसरी दुनिया के देशों के लिए था। इन्होंने लेबल अपने पास रखा और श्रम को तीसरी दुनिया से आउटसोर्स किया। पूरा दक्षिण एशिया एसेम्बली लाइन बन गया जिसका अंत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लेबल और उनके रिटेल पर खत्म होता था। इस अकूत लूट के बल पर साम्राज्यवादी देश अपने यहां के श्रमिकों व मध्यवर्ग को कूपन काट कर पैसा बांट रहे थे और उन्हें संपन्नता में डुबा रहे थे। 1980 के दशक में विश्वबैंक व मुद्राकोष ने इन देशों को संरचनागत बदलाव के लिए बाध्य किया और इसका अगला चरण वैश्वीकरण, उदारीकरण, नीजीकरण के तहत पूरा किया गया। अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमेरिकी देशों में श्रम को नियंत्रित करने के लिए इस कानून को लाया गया जबकि इन देशों में इस व्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा के लिए तैयारी हो चुकी थी। निजी व पब्लिक क्षेत्र अपने हित को तेजी से पूरा करने के लिए देशों की सरकारों द्वारा इसे स्वीकार किया जा चुका था। यह अकारण नहीं है कि अमेरिका को फासिस्ट मोदी में बिजनेस मैन दिखाई दे रहा है, जिसके गुजरात में स्थित रिलायंस के कपड़ा उद्योग में मजदूरों की तनख्वाह में पिछले दस सालों में मात्र 1000 रूपए की वृद्धि हुई। यह 5500 से बढ़कर 6500 हुई है। 1980 तक इस तबाही ने इतना काम कर दिया था कि रिलांयस का टेक्सटाइल उद्योग खड़ा हो सके। और मुम्बई मुकेश अंबानी का हो सके। 1984-85 तक तबाह बुनकरों, कारीगरों आदि से नया टेक्सटाइल उद्योग खड़ा हुआ। 1990 के बाद तो सरकार जितनी ही लचीली हुई तबाहियों के मंजर पर उतने ही नए उद्योग खड़े होते गए। 1970 में भी कोयला खदानों में बच्चे काम करते थे। ठेका प्रथा इन कोयला खदानों से लेकर एयर इंडिया की उड़ानों तक में बना रहा। आज भी कर्नाटक से लेकर झारखंड व छत्तीसगढ़ में इस सिलसिले को देखा जा सकता हैं। आज असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की कुल मजदूरों की संख्या 90 प्रतिशत से उपर है। और जिन्हें संगठित क्षेत्र का मजदूर माना जा रहा है वह भी कितने संगठित हैं, इसका अध्ययन करने की जरूरत है। 

मजदूर संगठन की चुनौतियां

मजदूर आंदोलन पर काम कर रहे मेरे दो मित्र सेक्टर 58 की उस साइट पर जाना चाह रहे थे जहां से गिरकर एक मजदूर की मौत हो गई थी और इससे गुस्साये मजदूरों ने पुलिस की गाड़ी फूंक दी और साइट ऑफिस पर हमला कर तोड़-फोड़ किया। जाने के समय वे रास्ता भटक गए। वे रास्ते में आने वाले रियल एस्टेट की विभिन्न साइटों पर पूछते हुए जा रहे थे कि क्या यहां कोई मजदूर गिरकर मरा है? उन्होंने बताया कि हर एक निर्माणाधीन साइट पर ऐसी घटना हुई है। मानेसर से लेकर ग्रेटर नोएडा तक लगभग 150 किमी के ऐसे निर्माणाधीन स्थलों पर हो रही मौतों की आप यदि कल्पना करें तो एक भयावह दृश्य खड़ा हो जाएगा। लाखों मजदूरों ठेकेदारी प्रथा के तहत काम कर रहा है और यहां टेक्सटाइल उद्योग से कहीं अधिक गुलामी है।

ओरिएन्ट क्राफ्ट में काम कर रहे मजदूरों से बातचीत के दौरान एक मजदूर न चुनौती रखा: ‘आप मजदूरों को एक कर दीजिए। जिस दिन से वे एक हो जाएंगे उस दिन से फैक्टरी में ठेकेदारों की नहीं चलेगी।’ एक होने का सिलसिला कैसे शुरू हो, यह एक कठिन चुनौती है। मजदूरों के अपने-अपने ठेकेदार हैं और उससे उपजे अलग अलग हित। इसी तरह काम की विशिष्टता के आधार पर विभाजन है। सांस्कृतिक व क्षेत्रीय विभाजन है। एक फैक्टरी के भीतर ठेकेदारी प्रथा यानी नौकरी की अनिश्चितता के चलते मजदूर द्वारा पहलकदमी लेने की समस्या है। ठेकेदारों व मालिकों के गुंडों और स्थानीय स्तर के रोजमर्रा के दबाव अलग से नकारात्मक काम करते हैं। इस हालात में मजदूरों की एकजुटता का मसला फैक्टरी के बाहर व भीतर दोनों ही स्तर पर है। इससे भी बड़ा मसला सरकार व प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही नीतियां हैं। आवास, सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन व ठेका प्रथा से मुक्ति जैसा मसला फैक्टरी के भीतर व बाहर दोनों का ही है। मजदूर आंदोलन एक व्यापक पहलकदमी की मांग कर रहा है। जिसका एक तार गांव से जुड़ा हुआ है तो दूसरा शहर से। यह बहुत-से समुदायों के लिए जीवन-मरण के प्रश्न के तौर पर खड़ा है। चंद दिनों पहले मालेगांव पर आई एक रिपोर्ट के अनुसार वहां जी रहा मुस्लिम समुदाय जीवन और मौत के बीच खड़ा है। इसी तरह सूरत, बड़ोदरा जैसे शहर उड़ीसा के कई आदिवासी समुदायों के लिए चंद रोटी के जुगाड़ का माध्यम है। उनकी मूल रिहाइश को नई आर्थिक नीति ने खा लिया है। मजदूरों की बड़ी संख्या जाति, इलाका, समुदाय, धर्म, राष्ट्रीयता आदि के साथ जुड़ी हुई है और इस आधार पर वह विभाजित भी है। मजदूरों का यह बना हुआ सामुदायीकरण जिस व्यापक एकता की मांग कर रहा है और उसके लिए जिस व्यापक पहलकदमी की जरूरत है वह निश्चय प्रगतिशील और क्रांतिकारी ताकतों की व्यापक एकजुटता से ही संभव है। मजदूर संगठन इन चुनौतियों के मद्देनजर ही बन सकता हैं।
(हाशिया से साभार)

13 April 2012

तुम बेचो, मैं ख़रीदूं उर्फ़ मीडिया मंडी की नीलामी गाथा


-दिलीप खान

सूवी इंफो मैनेजमेंट को जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा 225 करोड़ रुपए में ख़रीदने के साथ ही बीते तीन-चार महीने से नई दुनिया और जागरण के बीच चल रहा सौदेबाजी का दौर आखिरकार मार्च के अंत में थम गया। सूवी इंफो मैनेजमेंट के ही एक उत्पाद के तौर पर हिंदी दैनिक नई दुनिया मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और एनसीआर के पाठकों के बीच पहुंचता था। दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील के बाद नई दुनिया के अलावा संडे नई दुनिया और भोपाल से छपने वाला नव दुनिया सहित इसके वेबसाइट संस्करण का मालिक महेंद्र मोहन गुप्त वाला जागरण प्रकाशन लिमिटेड हो गया है। ख़रीदफ़रोख़्त की इस प्रक्रिया में विनय छजलानी और सुनीता छजलानी वाली कंपनी नई दुनिया को घाटे की स्थिति में ख़रीदने के एवज में मिले 75 करोड़ रुपए की कर राहत के चलते जागरण की जेब पर महज 150 करोड़ रुपए का ही भार पड़ा।
29 मार्च को नई दुनिया के दिल्ली संस्करण की आख़िरी प्रति छपी। बीते कुछ वर्षों से नई दुनिया के गिरते स्तर को उसी दिशा में आगे बढ़ाने के ज़िम्मेदार और नौकरीबदर हुए आलोक मेहता ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ 30 मार्च से नेशनल दुनिया नाम का नया अख़बार शुरू किया। आलोक मेहता की टीम ने वही हैं हम, वही है दुनिया के जरिए पाठकों और ख़ासकर हॉकरों के भरोसे को जीतने की कोशिश की और ये कोशिश आज-कल कुछेक टीवी चैनलों पर विज्ञापन की शक्ल में और ज़्यादा चमक रही है। दिल्ली के बड़े पाठक वर्ग के लिए ये कोई मायने नहीं रखता कि नई दुनिया के मुकाबले नेशनल दुनिया अपने कलेवर में उसी तरह का है कि नहीं? यहां की बड़ी आबादी न तो नई दुनिया पढ़ती थी और न नेशनल दुनिया ही पढ़ रही है। असल सवाल ये है कि क्या मीडिया बाज़ार में ख़रीद-बिक्री की ये प्रवृत्ति मीडिया उद्योग को मोनोपली (एकाधिकार) की तरफ़ मोड़ रही है? इस तरह के अधिग्रहण का असर किस रूप में पत्रकारिता पर पड़ रहा है या पड़ने जा रहा है? मीडिया बाज़ार में अधिग्रहण और निवेश के तौर पर कौन लोग पैसे लगा रहे हैं?
जागरण में जब अमेरिकी कंपनी ब्लैकस्टोन ने 12 फ़ीसदी शेयर यानी 225 करोड़ रुपए (ठीक उतना, जितने में नई दुनिया की डील हुई) निवेश किया तो जागरण के अध्यक्ष महेंद्र मोहन गुप्त ने उसी समय ये कह दिया था कि ब्लैकस्टोन के पैसे का इस्तेमाल वो कंपनी के विस्तार के लिए करेंगे। जागरण ने ऐसा किया भी। उसने 2010 में तारिक अंसारी से मिड डे समूह ख़रीद लिया। इसमें अंग्रेजी टेबुलायड मिड डे, गुजराती मिड डे, उर्दू अख़बार इंकलाब और मिड डे डॉट कॉम शामिल था। फिर कारोबारी वजहों से दिसंबर 2011 में मिड डे का दिल्ली और बंगलुरू संस्करण बंद कर दिया। इंकलाब को चार नई जगहों, लखनऊ, कानपुर, बरेली और दिल्ली में उतारा और पंजाबी जागरण की शुरुआत की। 

ख़बर है कि नई दुनिया के बाद जागरण अब टेलीग्राफ पर नज़रें टिकाए है।
मीडिया में ख़रीद-बिक्री का धंधा बेहद रोचक है। 2007 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के दबाव में ब्लैकस्टोन ने इनाडु समूह की फादर कंपनी उषोदया इंटरप्राइजेज में से अपने 26 फ़ीसदी शेयर खींच लिए। रेड्डी उस समय इनाडु के समानांतर साक्षी को उतारने की योजना पर ज़ोर-शोर से काम कर रहे थे और रामोजी राव की कंपनी इनाडु में निवेश के तरीके को लेकर उस समय कई सवाल उठा रहे थे, ताकि कारोबारी बढ़त हासिल हो सके। बहरहाल, ब्लैकस्टोन के जाने के बाद उषोदया की हालत बेहद खस्ता हो गई तो मुकेश अंबानी ने दक्षिण भारत के सबसे बड़े समूहों में से एक इनाडु में पैसा लगाने का बेहतर मौका देखा। लेकिन तेल, गैस, पेट्रोलियम समेत बाकी उद्योगों के पक्ष में जब अंबानी के मातहत मीडिया समूह लॉबिंग के लिए खड़े हों तो आलोचकों की तरफ़ से तीखे सवाल न उठे इसलिए अंबानी ने सीधे-सीधे इनाडु में पैसा नहीं लगाया।
उन्होंने निवेश बैंकर नीमेश कंपनी के रास्ते ब्लैकस्टोन वाला 26 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। जेएम फाइनेंसियल चलाने वाले नीमेश कंपनी का रिलायंस और मुकेश अंबानी के साथ पुराना और नज़दीकी रिश्ता है। रिलायंस के बंटवारे के बाद जब पेट्रोलियम ट्रस्ट बनाया गया तो नीमेश कंपनी और विष्णुभाई बी. हरिभक्ति उसके ट्रस्टी थे। इस पेट्रोलियम ट्रस्ट में रिलायंस इंडस्ट्रीयल इन्वेस्टमेंट एंड होल्डिंग्स (आरआईआईएचएल) का 6.66 प्रतिशत शेयर है, जिसके मालिक मुकेश अंबानी है। तो नीमेश के जरिए मुकेश ने इनाडु में पैसा लगाया और इस साल की शुरुआत में देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक राघव बहल की नेटवर्क-18 समूह के घाटे की स्थिति को देखते हुए फिर मुकेश अंबानी की आरआईएल ने दांव खेला। राघव बहल और मुकेश अंबानी दोनों ने इस करार को लेकर ठीक उसी तरह की चुप्पी साध रखी थी जिस तरह महेंद्र मोहन गुप्त और विनय छजलानी ने जागरण-नई दुनिया डील को लेकर साधी। टाटा-टेटली और टाटा-जगुआर की तरह मीडिया खरीददारी में ढोल नहीं पीटा जाता और यही चुप्पी इसे तेल-साबुन और नमक के कारोबारी हितों से अलग करती है। यह चुप्पी दिखाती है कि मीडिया में निवेश करने के बाद चुप-चाप इसको अपने पक्ष में इस्तेमाल करके कहीं ज़्यादा बड़ा दांव खेला जा सकता है।
मुकेश अंबानी ने 1600 करोड़ के घाटे में चल रही टीवी-18, सीएनबीसी आवाज़, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन-7, कलर्स और एमटीवी को उबारने के लिए राघव बहल को रिलायंस का पैसा दिया और इस तरह नेटवर्क-18 की मिल्कियत में अंबानी की बड़ी हिस्सेदारी कायम हो गई। इससे पहले 2009 में पीटर मुखर्जी और उनकी पत्नी इंद्रानी की कंपनी आईएनएक्स मीडिया, जो न्यूज़ एक्स नाम से एक अंग्रेजी समाचार चैनल चलाती है, के घाटे की भरपाई भी मुकेश अंबानी ने की। संयोग को अगरदिलचस्प का पर्याय मान लिया जाए तो मीडिया कारोबार में इस शब्द का बार-बार इस्तेमाल होना चाहिए। जिस समय मुकेश अंबानी ने पीटर मुखर्जी को पैसा दिया उस वक़्त नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेड यानी सूवी इंफो मैनेजमेंट द्वारा न्यूज़ एक्स को ख़रीदने की चर्चा ज़ोरों पर थी। विनय छजलानी और जहांगीर पोचा ने इंडी मीडिया नाम का एक समूह बनाया था ताकि आईएनएक्स मीडिया को ख़रीदा जा सके। लेकिन, मुकेश ने पीटर का हाथ थाम लिया। इस तरह देखें तो बुरे वक्त में डूबते को मुकेश का सहारा टाइप से अंबानी कई चैनलों के बड़े शेयरधारक बन गए हैं। मोटे तौर पर इस समय देश के लगभग 25 से ज़्यादा टीवी चैनलों में मुकेश अंबानी के पैसे लगे हैं। एक तरह से इन 25 चैनलों के दर्शकों के बीच तो मुकेश अंबानी ने अपनी धवल छवि को लगातार सफ़ेद रखने का जुगाड़ कर ही लिया है! और बाकी चैनलों के लिए हथियार के तौर पर विज्ञापन भी तो है! जब राघव बहल के साथ मुकेश अंबानी की डील चल रही थी तो उस समय बहल की Firstpost.com पर अंबानी और प्रणब मुखर्जी के बीच की दुरभिसंधियों को लेकर लगातार लेख लिखे जा रहे थे। प्रणब मुखर्जी को मिनिस्टर ऑफ रिलायंस कहा जा रहा था, लेकिन जैसे ही मालिक मुकेश हुए सब थम गया।
मुकेश अंबानी के कुछ शेयर पर बात कर लेते हैं। राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद को 76 करोड़ की भुगतान कर हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड ने बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड का 12 फ़ीसदी, बीएजी न्यूज़लाइन नेटवर्क लिमिटेड का 15 फ़ीसदी, बीएजी ग्लैमर लिमिटेड का 15 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। न्यूज़ 24 चैनल इसी कंपनी का है। इस हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड के मालिक मुकेश अंबानी ही है। छोटी-छोटी कंपनियां खोलने के बाद मुकेश इनके जरिए मीडिया में सेंधमारी कर रहे हैं। हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्रा. लि. का दफ़्तर कोलकाता में है और वहां के जरिए इसने बीएजी में पैसा लगाया ताकि लोग भ्रम में रहे कि कोलकाता का कोई सेठ बीएजी से खेल रहा है! इसी तरह इंडिया टीवी चलाने वाली कंपनी इंडिपेंडेंट न्यूज़ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड में 23 फ़ीसदी हिस्सा श्याम इक्विटीज़ प्राइवेट लिमिटेड का है। इस श्याम इक्विटीज में टैली सॉल्यूशंस ने निवेश किया और टैली सॉल्यूशंस को मुकेश अंबानी समूह और भरत गोयनका समूह नियंत्रित करते हैं। इस तरह सीधे आरआईएल के नाम से निवेश करने में मुकेश लगातार कतरा रहे हैं। या कहिए कि चालाकी बरत रहे हैं। जिस नई दुनिया के बिकने की चर्चा की जा रही है वो लगातार घाटे की स्थिति में चल रही थी। सूवी इंफो (नई दुनिया की फादर कंपनी) के 2006-07 की बैलेंसशीट यह दिखाती है उसे आर्थिक कमर्शियल्स प्राइवेट लिमिटेड की तरफ़ से 38 करोड़ का ऋण दिया गया। और आर्थिक कमर्शियल्स के मालिक मुकेश अंबानी हैं। इस तरह नई दुनिया की ताजा डील भी मुकेश अंबानी के हाथों के नीचे हुआ है।      
मीडिया उद्योग में निवेश पर सतही नज़र डालने से ही पता चल जाएगा कि या तो रियल एस्टेट, तेल, गाड़ी, बैंकिंग सहित अन्य धंधों के खिलाड़ी इसमें पैसा लगा रहे हैं या फिर मीडिया का कारोबार करने वाले व्यवसायी धीरे-धीरे अन्य धंधों में अपने पैर पसारने लग गए हैं। उदाहरण के लिए मीडिया के उत्साही खिलाड़ी सुभाष चंद्रा ने अपने एस्सेल ग्रुप (ज़ी समूह की फ़ादर कंपनी) को विस्तार देने के लिए आख़िरी मार्च को हैदराबाद स्थित इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी आईवीआरसीएल (IVRCL) का 10.2 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। इन्फ्रास्ट्रक्चर या बाकी किसी भी उद्योग के साथ मीडिया के जुड़ाव का क्या असर पड़ता है इसको उसी दिन सेंसेक्स के आंकड़ें बयां कर रहे थे। मीडिया का हाथ पड़ते ही बांबे स्टॉक एक्सचेंज में आईवीआरसीएल का प्रदर्शन निखरने लगा। जिस दिन सुभाष चंद्रा ने 10 फ़ीसदी शेयर ख़रीदा उस दिन सेंसेक्स में आईवीआरसीएल को 8 प्रतिशत का उछाल मिला। इस कंपनी में सबसे बड़ा शेयर 12.2 फ़ीसदी है इसका मतलब एस्सेल एक तरह से आईवीआरसीएल में दूसरा (पहले से महज़ दो फ़ीसदी के अंतर के साथ) सबसे बड़ा शेयर धारक हो गई है। सुभाष चंद्रा को आईवीआरसीएल में निवेश की सलाह देने वाली कंपनी का नाम जेएम फाइनेंसियल है, जोकि एक इनवेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी है। इसका ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि मुकेश अंबानी ने जिस नीमेश कंपनी के मार्फ़त नेटवर्क-18 में पैसा लगाया था, वो नीमेश कंपनी इसी जेएम फाइनेंसियल के अध्यक्ष हैं। हालांकि सुभाष चंद्रा दूसरे धंधे में हाथ मारने के पुराने अनुभवी हैं। इस क्रम में कई बार उन्होंने गच्चा भी खाई है। उनका टी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट आईसीएल बुरी तरह पिट गया, हालांकि बीसीसीआई जैसी भीमकाय संस्था के बरकअक्स पिटना ही उसकी परिणति थी। लेकिन इस तरह के उपक्रम ये दिखाते हैं कि सुभाष चंद्रा की रुचि मीडिया से बाहर किस सीमा तक पसरी हुई है। आजकल एस्सेल समूह की शाखा कंपनी डिश टीवी अजमेर सहित राजस्थान के कई शहरों में शॉपिंग मॉल की श्रृंखला खोलने जा रही है। इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है।   
मीडिया के जरिए अन्य उद्योगों के पक्ष में होने वाली लॉबिंग की बेहतरीन मिसाल के तौर पर 2जी स्पेक्ट्रम का प्रकरण हम देख चुके हैं। लेकिन यदि बड़े पत्रकारों के दलाल वाली भूमिका को बातचीत के दायरे से निकालते हुए कारोबारी हित की बात की जाए तो मीडिया-उद्योग-राजनेता के गठजोड़ और ज़्यादा खुलकर सामने आएंगे। मीडिया और रिलायंस के बीच के ताल्लुकात को समझने वाले लोग एक और तथ्य जान लें। 2010 में रिलायंस ने इंफोटेल ब्रॉडबैंड को 4800 करोड़ रुपए में ख़रीदा और 2-जी स्पेक्ट्रम नीलामी में इंफोटेल एकमात्र कंपनी रही जिसे बी़डब्ल्यूए स्पेक्ट्रम हासिल हुआ। ओह! क्या संयोग है!  
नई दुनिया जो अब जागरण की मिल्कियत हो गई।
      

अगर डीबी कॉर्प (दैनिक भास्कर) हिंदी और अंग्रेज़ी में अख़बार और पत्रिका निकालने के साथ-साथ भोपाल में शॉपिंग मॉल, महाराष्ट्र में सोयाबीन तेल और छत्तीसगढ़ में संभावित बिजली संयंत्र का धंधा कर रहा है तो इस प्रचलन को महज हिंदी भाषी मीडिया के उस एक समूह तक सिमटा नहीं माना जाना चाहिए। असल में इसी विस्तार को लक्ष्य किए बाकी मीडिया समूह भी बाज़ार में ज़ोर लगा रहे हैं। जागरण प्राइवेट लिमिटेड दैनिक जागरण के अलावा आई नेक्स्ट और सिटी प्लस नाम का अख़बार तो निकालती ही है, साथ में सहारनपुर में चीनी मिल भी चलाती है। इसी कंपनी का जगमिनी माइक्रो नेट (प्रा.) लिमिटेड नाम से नेटवियर फैक्ट्री है जिसमें मोजें (जुराब) बनते हैं। कानपुर और नोएडा में कई सारे स्कूलें हैं। इनमें कानपुर में पूर्वांचल विद्या निकेतन नाम का सीबीएससी से मान्यता प्राप्त स्कूल और नोएडा में जेपीएस नाम का स्कूल प्रमुख हैं। नोएडा में ही जागरण JIMMC नामक संस्थान से पत्रकार पैदा करता है। कंपनी का चैनल-7 जेटीवी नाम का 24 घंटे का सैटेलाइट चैनल भी है।
बीते कुछ सालों की मीडिया डील पर नज़र दौड़ाए तो आप पाएंगे कि यहां ख़रीदा वहां बेचा वाला धंधा शेयर बाज़ार की तरह ही मीडिया मंडी का भी चरित्र बनता जा रहा है। लेकिन अंतत: इस छोटे तालाब में बड़ी मछली का ही साम्राज्य कायम हो रहा है। यूटीवी ने विजय टीवी को यूनाइटेड ब्रेवेरिज से ख़रीदा और स्टार के हाथों बेच दिया। फिर हंगामा टीवी खरीदा और इसका शेयर वॉल्ट डिज़्नी के हाथों बेच दिया। असल में यूटीवी सॉफ्टवेयर कम्युनिकेशन लिमिटेड की छतरी में यूटीवी के नाम से चलने वाले सभी चैनलों को दुनिया की विशालयकाय मीडिया कंपनी में से एक वॉल्ट डिज़्नी कॉरपोरेशन के हाथ में ही जाना है क्योंकि वॉल्ट डिज़्नी बहुत जल्द ही यूटीवी के सभी बचे-खुचे शेयर को ख़रीदने जा रही है। हालांकि अधिकांश शेयर वॉल्ट डिज़्नी ने ख़रीद रखा है। हंगामा टीवी, बिंदास, यूटीवी एक्शन, यूटीवी मूवीज, यूटीवी वर्ल्ड मूवीज और यूटीवी स्टार्स सहित वितरण और विपणन की कंपनियों पर भी वॉल्ट डिज़्नी का ही अधिकार है। इसके अलावा ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स में भी वॉल्ट डिज़्नी के कुछ शेयर हैं। बीते महीनों में स्टार ने विजय टीवी और एशियानेट को ख़रीद लिया और लगभग साथ-साथ ही ज़ी ने 24 घंटा और आकाश बंग्ला को ख़रीदा। ख़रीद-बिक्री के साथ-साथ इन कंपनियों का विदेशी कनेक्शन को जानना बेहद महत्वपूर्ण है। लगभग हर बड़ी कंपनी का कोई न कोई विदेशी गठजोड़ है, जिसके बारे में पाठक-दर्शक लगभग न के बराबर जानते हैं। मिसाल के लिए नेटवर्क-18 के कुछ ब्रांड अमेरिकी कंपनी वायाकॉम के साझा उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) है, तो टाइम्स समूह की पत्रिका फ़िल्मफेयर और फेमिना बीबीसी मैग्ज़िन की साझा उपक्रम है। स्टार के सारे चैनलों के मालिक रुपर्ट मर्डोक की कंपनी न्यूज़ कॉरपोरेशन है। इमेजिन टीवी, पोगो, एचबीओ, कार्टून नेटवर्क और वर्ल्ड मूवीज के मालिक अमेरिकी कंपनी टाइम वार्नर-टर्नर प्राइवेट लिमिटेड है। ऐसे दर्ज़नों उदाहरण हैं। आप जिसे अब तक देसी समझते रहे उसमें विदेशी मिलावट भी है, ये जानना बेहद ज़रूरी है।
प्राइवेट ट्रीटीज वगैरह पर इस आलेख में चर्चा नहीं की जाएगी वरना मीडिया और ग़ैर-मीडिया कंपनियों के सामंजस्य की चर्चा करने के क्रम में इन कंपनियों के नाम से ही लेख पट जाएगा। हिंदुस्तान टाइम्स समूह के साथ बिड़ला के रिश्ते और बिजनेस स्टैंडर्ड में कोटक-महिंद्रा के शेयर के बारे में ज़्यादातर लोग वाकिफ़ हैं। हां, संतुलन कायम करने के लिए मुकेश के साथ-साथ अनिल अंबानी पर चर्चा करनी ज़रूरी है! अविभाजित रिलायंस के भीतर मीडिया में निवेश करने का प्रचलन अनिल अंबानी की जिद्द से ही शुरू हुआ, जब इंडियन एक्सप्रेस से नाराज होकर अनिल अंबानी ने एक स्वतंत्र बिजनेस दैनिक निकालने का फैसला किया और इसी क्रम में 1989 में रिलायंस ने (बिजनेस एंड पॉलिटिकल) आब्जर्बर को ख़रीद लिया। उसी समय टाइम्स समूह ने विजयपत सिंघानिया से इंडियन पोस्ट खरीदा था, जिसे बाद में बंद कर दिया गया।
अनिल अंबानी ने तब से मीडिया और दूरसंचार में बेतरह रुचि दिखाई है। लगभग दर्ज़न भर अंग्रेजी मनोरंजन चैनल चलाने वाली अमेरिकी कंपनी सीबीएस के साथ अनिल का समझौता है। बिग सिनर्जी नाम से अनिल धीरू भाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) एक प्रोडक्शन हाउस चलाता है। ब्लूमबर्ग यूटीवी में 18 फ़ीसदी और टीवी टुडे में 13 फ़ीसदी शेयर धारक होने के अलावा नेटवर्क-18 (इसमें दोनों अंबानी के पैसे हैं) सहित कई टीवी चैनलों में अनिल अंबानी के पैसे लगे हैं। बिग एफएम के 45 स्टेशन, फिल्म प्रोडक्शन और विपणन की बड़ी कंपनी, बिग सिनेमा, बिग डीटीएच, बिगअड्डा डॉट कॉम सहित केबल उद्योग में भी अनिल का बड़ा हस्तक्षेप है।        
मीडिया सुनते ही जिनके जेहन में अब भी उद्योग के बदले पत्रकारिता शब्द कौंधता है, उनके लिए बता दूं कि एचटी मीडिया ने मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिंदुस्तान टाइम्स को उतारने के लिए शेयर बाज़ार में खुद को पंजीकृत करवाया ताकि पैसा पीटा जा सके। दक्कन क्रॉनिकल ने शेयर बाज़ार का रास्ता नापा ताकि पैसा बनाकर हिंदू के गढ़ चेन्नई और दक्कन हेराल्ड के दबदबे वाले बंगलौर में खुद को मज़बूती से उतार सके। इसी तरह दैनिक जागरण ने शेयर बाज़ार से कमाए हुए पैसों से चैनल-7 जेटीवी नामक सैटेलाइट चैनल लांन्च किया।  कानपुर जैसे शहर से निकलने वाले जागरण का विस्तार हैरतअंगेज़ है। इसके मालिक महेंद्र मोहन गुप्त के कई परिचय हैं। आप उन्हें जागरण प्रकाशन (प्रा.) लिमिटेड के अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर के अलावा चाहें तो राज्यसभा सदस्य कह सकते हैं या फिर सुविधानुसार शाकुंभरी सुगर एंड एलाइड इंडस्ट्री लिमिटेड का अध्यक्ष भी बुला सकते हैं। जागरण लिमिटेड के निदेशक के साथ-साथ जागरण माइक्रो मोटर्स लिमिटेड के निदेशक के तौर पर भी लोग उन्हें जानते हैं। श्री पूरनचंद्र स्मारक ट्रस्ट और कंचन चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक सचिव और कोषाध्यक्ष का ओहदा भी उनके नाम हैं और इंडियन न्यूज़ पेपर सोसाइटी तथा इंडियन लैग्वेज़ न्यूज़ पेपर एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के वो सदस्य हैं। लेकिन अगर आप उन्हें ज़्यादा इज़्ज़त बख्शना चाहते हैं तो कुछ और सूचना को अपने जेहन का हिस्सा बना लीजिए। मिसाल के लिए आप उन्हें इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी, इंडियन लैंग्वेज़ न्यूज़पेपर एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष के तौर पर भी संबोधित कर सकते हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया तथा ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन का सदस्य भी बता सकते हैं। छुटभैंये संस्थाओं, क्लबों और संगठनों में उनकी ओहदेदारी की चर्चा करने पर ज़्यादा ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं हैं।  
बेनेट एंड कोलमैन यानी टाइम्स समूह, एचटी मीडिया लिमिटेड, एस्सेल समूह (ज़ी वाले), सन टीवी नेटवर्क, इंडिया टुडे ग्रुप जैसी विशालकाय मीडिया समूहों के सामने जागरण प्रकाशन लिमिटेड बेहद छोटा दिखता है, लेकिन खुले बाज़ार का जो प्रचलन है उसमें या तो जागरण को भी लगातार अपना विस्तार करते रहना होगा या फिर भविष्य में इसे भी कोई बड़ा घराना ख़रीद लेगा। जागरण अपने विस्तार को फिलहाल भास्कर के बरअक्स देख रहा है और दोनों के बीच गहरी प्रतिस्पर्धा चल रही है। इसलिए जिस दिन जागरण ने नई दुनिया ख़रीदा उसके दो दिन के भीतर यानी 31 मार्च को भास्कर ने सोलापुर में दिव्य मराठी का पांचवा संस्करण लॉन्च किया। क्षेत्रीय भाषा में बड़ी कंपनियां लगातार घुसपैठ कर रही है। भास्कर ने दिव्य मराठी के पहले संस्करण की शुरुआत मई 2011 में औरंगाबाद से की थी लेकिन एक साल के भीतर ही उसने पांचवा संस्करण बाज़ार में उतार दिया। औरंगाबाद और सोलापुर के अलावा यह नासिक, जलगांव और अहमदनगर से भी छपता है। भास्कर का यह कुल मिलाकर 65वां संस्करण है। 
2011 की चौथी छमाही के इंडियन रीडरशिप सर्वे के मुताबिक दैनिक जागरण देश के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बार के तौर पर बरकरार है और दैनिक भास्कर इससे थोड़ा पीछे दूसरे नंबर पर है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भास्कर शीर्ष पर है। यहां जागरण उससे मात खा रहा था इसलिए महेंद्र मोहन गुप्त वाले जागरण को एक तरह की छटपटाहट थी कि वो खुद को भास्कर के मुकाबले खड़ा कर सके। लेकिन परेशानी ये थी कि योगेंद्र मोहन गुप्त वाला जागरण पहले से वहां छप रहा था। इस वजह से जागरण अपने ब्रांड नेम से वहां कारोबार शुरू नहीं कर सकता था, इसलिए नई दुनिया के रूप में एक पका-पकाया ब्रांड मिलते ही जागरण ने उसे ख़रीद लिया। मध्य प्रदेश में नई दुनिया तीसरा सबसे बड़ा अख़बार है- भास्कर और (राजस्थान) पत्रिका के बाद। कुछ साल पहले यह दूसरा सबसे बड़ा अख़बार था, लेकिन वहां से पिछड़ा तो अब जागरण ने लपक लिया।
इंदौर स्थित नई दुनिया को 1947 में नरेंद्र तिवारी, बाबू लाभचंद छजलानी और बसंतीलाल सेतिया ने मिलकर शुरू किया था और जब विनय छजलानी कंपनी के सीईओ बने तो आक्रामक रवैया अपनाते हुए सेतिया घराने के शेयर को ख़रीद लिया। विनय छजलानी ने 2008 में कंपनी को विस्तार देते हुए भोपाल से नव दुनिया की शुरुआत की। उस समय नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 2016 तक नई दुनिया की प्रसार संख्या को 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाया था, लेकिन आगे बढ़ने के बजाए तब से नई दुनिया में लगातार गिरावट ही देखी गई। और आखिरकार विनय छजलानी को कहना पड़ा कि नई दुनिया को बेचना एक मुश्किल फ़ैसला था, लेकिन घाटे की स्थिति को देखते हुए उनके सामने और कोई चारा नहीं था। छजलानी के मुताबिक़ (अख़बार को) बेचकर ही बाप-दादा के ब्रांड को सुरक्षित रखा जा सकता था और छजलानी ने जागरण के हवाले कर ब्रांड को बचा लिया। नई दुनिया नाम से ही यह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में निकलता रहेगा। सिर्फ मालिक बदल गए, पाठकों और कुछेक कर्मचारियों को कानों-कान ख़बर तक नहीं हुई! गोमंतक टाइम्स, सकाल और सकाल टाइम्स को ख़रीदने से बनी सकाल मीडिया ग्रुप नामक कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर, अभिजीत पवार इस तरह की डील को बेहद स्वाभाविक मानते हैं और कहते हैं, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का जमाना है, मीडिया उद्योग में वही टिकेगा जो इसके योग्य है। टिकने का मतलब उद्योग से किस तरह की प्रतिस्पर्धा से है? अगर एक छोटी कंपनी चार रुपए की लागत पर 10 पेज का अख़बार निकाल रहा है और उस इलाके में शेयर बाज़ार में दख़ल रखने वाली कोई कंपनी आकर दो रुपए में 30 पेज का अख़बार देना शुरू कर दे और दो महीने के सब्सक्रिप्शन पर बाल्टी-मग और पांच किलो चीनी मुफ़्त में दें तो बाज़ार में छोटा अख़बार कैसे टिक पाएगा? भारी पूंजी के बग़ैर नया अख़बार शुरू करना इस समय बाज़ार में पिसने जैसा है। 2008 में जब तेलुगू भाषा में साक्षी की शुरुआत हुई तो उससे पहले पेज डिजाइनिंग के लिए अमेरिकी कंपनी को हायर किया गया और 23 शहरों में प्रिंटिंग प्रेस लगाने के बाद घर-घर जाकर अख़बारों की स्कीम, मिलने वाले उपहार और पाठकों की रूचि को जानते-समझते हुए इसे एक साथ भारी स्तर पर लांन्च किया गया। सत्ताधारी पार्टी का ये अख़बार था, भारी पूंजी लगी थी, राज्य के मुख्यमंत्री का बेटा इस अख़बार का मालिक था। दो साल तक घाटा हुआ। लेकिन राज्य सरकार ने विज्ञापन में खूब सहयोग किया। इनाडु के बरअक्स जगन रेड्डी को इसे खड़ा करना था। आंध्र प्रदेश में 19 जगहों से ये एक साथ छपना शुरू हुआ था। बाकी चार महानगरों से। अख़बार चल निकला। इस समय साक्षी का सर्कुलेशन 52 लाख से भी ज़्यादा है। चूंकि रेड्डी को भारी राजनीतिक व वित्तीय लाभ सामने दिख रहा था इसलिए ऐसी हिम्मत के साथ वे साक्षी लेकर उतर गए। वरना बाज़ार से इस तरह कौन टकराता है!
फैलता मीडिया उद्योग


तो, नई दुनिया बिक गया। हिंदी अख़बारों में संपादक के नाम पत्र लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला अख़बार, पहली बार देश में ऑफसेट रोटरी मशीन पर छपने वाला अख़बार और इंटरनेट संस्करण शुरू करने वाले पहले अख़बार का मालिक बदल गया। यह लेख नई दुनिया के बिकने पर किया गया कोई स्यापा नहीं है। नई दुनिया के नामचीन संपादक राजेंद्र माथुर या राहुल बारपुते की परंपरा का मैं इसे अंत नहीं मान रहा हूं, मेरे खयाल से ये अंत काफ़ी पहले हो चुका है। मैं ये भी नहीं मानता कि जागरण के मालिक होने से अख़बार का रवैया कॉरपोरेट वाला हो जाएगा, नई दुनिया अपने कलेवर में पूरी तरह कारोबारी ही था। नई दुनिया का कंटेट बेहद खूबसूरत था, मैं ऐसा भी नहीं मानता। मुझे इस बात की चिंता है कि शीर्ष 10 हिंदी अख़बार में शामिल एक अख़बार को शीर्ष अख़बार खा गया। इस तरह अब एक ही अख़बार एक बात को नए 5 लाख लोगों तक पहुंचाएगा। मैंने हिसाब लगाया कि जागरण की प्रसार संख्या अमेरिका के टॉप 16 अख़बारों के बराबर है और अगर जागरण और भास्कर को जोड़ दें तो ये संख्या टॉप 50 के पार पहुंच जाती है। जबकि देश के 20 से भी ज़्यादा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जागरण नहीं छपता। सिर्फ़ हिंदी पट्टी के बदौलत जागरण पसर रहा है।
तो, वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स की सम्मिलित प्रसार संख्या से छह गुना से भी ज़्यादा छपने वाला जागरण दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बारों में शुमार हो रहा है, इस पर राष्ट्रवादियों को गर्व करना चाहिए। सामान्य ज्ञान के प्रश्न के तौर पर भी इसे याद किया जाना चाहिए कि जागरण आठ राज्यों और दिल्ली में 37 जगहों से छपता है और एक करोड़ 64 लाख पाठकों तक पहुंचता है। कारोबार में यही संख्या महत्वपूर्ण है। इसी संख्या के बल पर कंपनी कुलांचे मारती है और नंबर वन होने का दावा ठोकती है। जिस दिन ये संख्या साथ छोड़ देगी उस दिन पत्रकारिता वाले लोग स्यापा करने बैठ जाएंगे कि उनके विचारों का गला घोंटा जा रहा है, कि उनके छपने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म कम हो गया, कि उनकी नौकरी मंझधार में डूब गई। मैं जानता हूं कि भास्कर, जागरण या फिर नई दुनिया, ये सारे उदारीकृत अर्थव्यवस्था के खुले पक्षधर हैं लेकिन इसके बावजूद मैं चाहता हूं कि हरेक का मालिक अलग-अलग हो ताकि कारोबारी प्रतिस्पर्धा में ही सही, थोड़ा-बहुत ही सही, एक-दूसरे के हितों की पोल-खोलते रहे। जिस दिन चार-पांच मालिक पूरे मीडिया उद्योग को हांकेंग, उस दिन मर्जर, एक्वीजीशन, टेक-ओवर जैसे शब्द मीडिया बाज़ार में कम भले ही हो जाएं, लेकिन इसके साथ ही बंद हो जाएंगे उन चार-पांचों पर उठने वाले सवाल। जो सवाल उठेंगे वो एक खास दायरे में ही रह जाएंगे।
हालांकि तब तक सारे लोगों को इस खुशफ़हमी में रहने का पूरा हक़ है कि देश में विविधता के नाम पर लगभग 650 टीवी चैनल हैं, अलग-अलग भाषाओं में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं की संख्या 2000 से भी ज़्यादा है और 30 से भी ज़्यादा एफएम रेडियो ऑपरेटर देशभर में 245 रेडियो स्टेशन चला रहे हैं। साथ में यह भी जोड़ा जा सकता है कि हमारे यहां हर साल 1000 से ज़्यादा फ़िल्में रिलीज होती है। लेकिन हल्की चीर-फाड़ से ही ये खूबसूरत संख्याएं बदरंग हो जाती हैं। हिंदी के जो शीर्ष 10 अख़बार हैं उनके मुकाबले हिंदी के बाकी सारे छोटे-बड़े अख़बारों को खड़ा कर दिया जाए तो उन दसों के एक चौथाई तक पहुंचना भी बाकियों के लिए आजीवन अभ्यास का मामला दिखता है। ये जो फासले का गणित है, वो ठीक मीडिया द्वारा आरोपित वर्चस्व के बराबर है। हिंदी में शीर्ष स्थान पर काबिज दैनिक जागरण दसवें नंबर पर रहने वाले (राजस्थान) पत्रिका के मुकाबले 12 गुना से भी ज़्यादा प्रसार संख्या रखता है और अंग्रेजी में पहले स्थान पर रहने वाला द टाइम्स ऑफ इंडिया दसवें नंबर पर रहने वाले द न्यू इंडियन एक्सप्रेस (दी इंडियन एक्सप्रेस नहीं, रीडरशिप के लिहाज से दी इंडियन एक्सप्रेस अंग्रेज़ी के टॉप 10 अख़बारों की सूची से बाहर है!) से 15 गुना ज़्यादा विशालकाय है। कोई गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं है। जो बड़ा है वो लगातार फैल रहा है। जब कोई कहता है कि देश में 2000 से ज़्यादा प्रकाशन हैं तो मनोवैज्ञानिक तौर पर इसका ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि पहुंच के मामले में सब बराबर है। खुले बाज़ार में जिस दिन ख़रीदने-बेचने वाला तैयार हो जाएगा उस दिन ऊपर का दो अख़बार नीचे के सात-आठ सौ को खड़े-खड़े ख़रीद लेगा। 1990 के दशक में एम जे अकबर ने एशियन एज निकाला और हालत पस्त होते ही दक्कन क्रॉनिकल के हाथों बेच दिया। आज आलोक मेहता ने कुछ सेठों और पत्रकारिता संस्थान चलाने वाले एक समूह की मदद से नेशनल दुनिया निकाला है, कल को बेच देंगे। बेहतर क़ीमत भी मिल जाएगी। पत्रकारिता की नौकरी से बेहतर है अख़बार निकालना। अख़बार अगर थोड़ा भी जम गया तो ठीक-ठाक क़ीमत मिल जाती है। साल-दो साल घाटा सहिए और अगर उसके बाद भी अख़बार पैसा नहीं दे रहा तो नीलामी बाज़ार में आ जाइए। यहां कुछ लोग हमेशा आपके इंतज़ार में खड़े मिलेंगे।