13 अप्रैल 2012

तुम बेचो, मैं ख़रीदूं उर्फ़ मीडिया मंडी की नीलामी गाथा


-दिलीप खान

सूवी इंफो मैनेजमेंट को जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा 225 करोड़ रुपए में ख़रीदने के साथ ही बीते तीन-चार महीने से नई दुनिया और जागरण के बीच चल रहा सौदेबाजी का दौर आखिरकार मार्च के अंत में थम गया। सूवी इंफो मैनेजमेंट के ही एक उत्पाद के तौर पर हिंदी दैनिक नई दुनिया मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और एनसीआर के पाठकों के बीच पहुंचता था। दोनों कंपनियों के बीच हुई इस डील के बाद नई दुनिया के अलावा संडे नई दुनिया और भोपाल से छपने वाला नव दुनिया सहित इसके वेबसाइट संस्करण का मालिक महेंद्र मोहन गुप्त वाला जागरण प्रकाशन लिमिटेड हो गया है। ख़रीदफ़रोख़्त की इस प्रक्रिया में विनय छजलानी और सुनीता छजलानी वाली कंपनी नई दुनिया को घाटे की स्थिति में ख़रीदने के एवज में मिले 75 करोड़ रुपए की कर राहत के चलते जागरण की जेब पर महज 150 करोड़ रुपए का ही भार पड़ा।
29 मार्च को नई दुनिया के दिल्ली संस्करण की आख़िरी प्रति छपी। बीते कुछ वर्षों से नई दुनिया के गिरते स्तर को उसी दिशा में आगे बढ़ाने के ज़िम्मेदार और नौकरीबदर हुए आलोक मेहता ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ 30 मार्च से नेशनल दुनिया नाम का नया अख़बार शुरू किया। आलोक मेहता की टीम ने वही हैं हम, वही है दुनिया के जरिए पाठकों और ख़ासकर हॉकरों के भरोसे को जीतने की कोशिश की और ये कोशिश आज-कल कुछेक टीवी चैनलों पर विज्ञापन की शक्ल में और ज़्यादा चमक रही है। दिल्ली के बड़े पाठक वर्ग के लिए ये कोई मायने नहीं रखता कि नई दुनिया के मुकाबले नेशनल दुनिया अपने कलेवर में उसी तरह का है कि नहीं? यहां की बड़ी आबादी न तो नई दुनिया पढ़ती थी और न नेशनल दुनिया ही पढ़ रही है। असल सवाल ये है कि क्या मीडिया बाज़ार में ख़रीद-बिक्री की ये प्रवृत्ति मीडिया उद्योग को मोनोपली (एकाधिकार) की तरफ़ मोड़ रही है? इस तरह के अधिग्रहण का असर किस रूप में पत्रकारिता पर पड़ रहा है या पड़ने जा रहा है? मीडिया बाज़ार में अधिग्रहण और निवेश के तौर पर कौन लोग पैसे लगा रहे हैं?
जागरण में जब अमेरिकी कंपनी ब्लैकस्टोन ने 12 फ़ीसदी शेयर यानी 225 करोड़ रुपए (ठीक उतना, जितने में नई दुनिया की डील हुई) निवेश किया तो जागरण के अध्यक्ष महेंद्र मोहन गुप्त ने उसी समय ये कह दिया था कि ब्लैकस्टोन के पैसे का इस्तेमाल वो कंपनी के विस्तार के लिए करेंगे। जागरण ने ऐसा किया भी। उसने 2010 में तारिक अंसारी से मिड डे समूह ख़रीद लिया। इसमें अंग्रेजी टेबुलायड मिड डे, गुजराती मिड डे, उर्दू अख़बार इंकलाब और मिड डे डॉट कॉम शामिल था। फिर कारोबारी वजहों से दिसंबर 2011 में मिड डे का दिल्ली और बंगलुरू संस्करण बंद कर दिया। इंकलाब को चार नई जगहों, लखनऊ, कानपुर, बरेली और दिल्ली में उतारा और पंजाबी जागरण की शुरुआत की। 

ख़बर है कि नई दुनिया के बाद जागरण अब टेलीग्राफ पर नज़रें टिकाए है।
मीडिया में ख़रीद-बिक्री का धंधा बेहद रोचक है। 2007 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के दबाव में ब्लैकस्टोन ने इनाडु समूह की फादर कंपनी उषोदया इंटरप्राइजेज में से अपने 26 फ़ीसदी शेयर खींच लिए। रेड्डी उस समय इनाडु के समानांतर साक्षी को उतारने की योजना पर ज़ोर-शोर से काम कर रहे थे और रामोजी राव की कंपनी इनाडु में निवेश के तरीके को लेकर उस समय कई सवाल उठा रहे थे, ताकि कारोबारी बढ़त हासिल हो सके। बहरहाल, ब्लैकस्टोन के जाने के बाद उषोदया की हालत बेहद खस्ता हो गई तो मुकेश अंबानी ने दक्षिण भारत के सबसे बड़े समूहों में से एक इनाडु में पैसा लगाने का बेहतर मौका देखा। लेकिन तेल, गैस, पेट्रोलियम समेत बाकी उद्योगों के पक्ष में जब अंबानी के मातहत मीडिया समूह लॉबिंग के लिए खड़े हों तो आलोचकों की तरफ़ से तीखे सवाल न उठे इसलिए अंबानी ने सीधे-सीधे इनाडु में पैसा नहीं लगाया।
उन्होंने निवेश बैंकर नीमेश कंपनी के रास्ते ब्लैकस्टोन वाला 26 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। जेएम फाइनेंसियल चलाने वाले नीमेश कंपनी का रिलायंस और मुकेश अंबानी के साथ पुराना और नज़दीकी रिश्ता है। रिलायंस के बंटवारे के बाद जब पेट्रोलियम ट्रस्ट बनाया गया तो नीमेश कंपनी और विष्णुभाई बी. हरिभक्ति उसके ट्रस्टी थे। इस पेट्रोलियम ट्रस्ट में रिलायंस इंडस्ट्रीयल इन्वेस्टमेंट एंड होल्डिंग्स (आरआईआईएचएल) का 6.66 प्रतिशत शेयर है, जिसके मालिक मुकेश अंबानी है। तो नीमेश के जरिए मुकेश ने इनाडु में पैसा लगाया और इस साल की शुरुआत में देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक राघव बहल की नेटवर्क-18 समूह के घाटे की स्थिति को देखते हुए फिर मुकेश अंबानी की आरआईएल ने दांव खेला। राघव बहल और मुकेश अंबानी दोनों ने इस करार को लेकर ठीक उसी तरह की चुप्पी साध रखी थी जिस तरह महेंद्र मोहन गुप्त और विनय छजलानी ने जागरण-नई दुनिया डील को लेकर साधी। टाटा-टेटली और टाटा-जगुआर की तरह मीडिया खरीददारी में ढोल नहीं पीटा जाता और यही चुप्पी इसे तेल-साबुन और नमक के कारोबारी हितों से अलग करती है। यह चुप्पी दिखाती है कि मीडिया में निवेश करने के बाद चुप-चाप इसको अपने पक्ष में इस्तेमाल करके कहीं ज़्यादा बड़ा दांव खेला जा सकता है।
मुकेश अंबानी ने 1600 करोड़ के घाटे में चल रही टीवी-18, सीएनबीसी आवाज़, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन-7, कलर्स और एमटीवी को उबारने के लिए राघव बहल को रिलायंस का पैसा दिया और इस तरह नेटवर्क-18 की मिल्कियत में अंबानी की बड़ी हिस्सेदारी कायम हो गई। इससे पहले 2009 में पीटर मुखर्जी और उनकी पत्नी इंद्रानी की कंपनी आईएनएक्स मीडिया, जो न्यूज़ एक्स नाम से एक अंग्रेजी समाचार चैनल चलाती है, के घाटे की भरपाई भी मुकेश अंबानी ने की। संयोग को अगरदिलचस्प का पर्याय मान लिया जाए तो मीडिया कारोबार में इस शब्द का बार-बार इस्तेमाल होना चाहिए। जिस समय मुकेश अंबानी ने पीटर मुखर्जी को पैसा दिया उस वक़्त नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेड यानी सूवी इंफो मैनेजमेंट द्वारा न्यूज़ एक्स को ख़रीदने की चर्चा ज़ोरों पर थी। विनय छजलानी और जहांगीर पोचा ने इंडी मीडिया नाम का एक समूह बनाया था ताकि आईएनएक्स मीडिया को ख़रीदा जा सके। लेकिन, मुकेश ने पीटर का हाथ थाम लिया। इस तरह देखें तो बुरे वक्त में डूबते को मुकेश का सहारा टाइप से अंबानी कई चैनलों के बड़े शेयरधारक बन गए हैं। मोटे तौर पर इस समय देश के लगभग 25 से ज़्यादा टीवी चैनलों में मुकेश अंबानी के पैसे लगे हैं। एक तरह से इन 25 चैनलों के दर्शकों के बीच तो मुकेश अंबानी ने अपनी धवल छवि को लगातार सफ़ेद रखने का जुगाड़ कर ही लिया है! और बाकी चैनलों के लिए हथियार के तौर पर विज्ञापन भी तो है! जब राघव बहल के साथ मुकेश अंबानी की डील चल रही थी तो उस समय बहल की Firstpost.com पर अंबानी और प्रणब मुखर्जी के बीच की दुरभिसंधियों को लेकर लगातार लेख लिखे जा रहे थे। प्रणब मुखर्जी को मिनिस्टर ऑफ रिलायंस कहा जा रहा था, लेकिन जैसे ही मालिक मुकेश हुए सब थम गया।
मुकेश अंबानी के कुछ शेयर पर बात कर लेते हैं। राजीव शुक्ला और अनुराधा प्रसाद को 76 करोड़ की भुगतान कर हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड ने बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड का 12 फ़ीसदी, बीएजी न्यूज़लाइन नेटवर्क लिमिटेड का 15 फ़ीसदी, बीएजी ग्लैमर लिमिटेड का 15 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। न्यूज़ 24 चैनल इसी कंपनी का है। इस हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्राइवेट लिमिटेड के मालिक मुकेश अंबानी ही है। छोटी-छोटी कंपनियां खोलने के बाद मुकेश इनके जरिए मीडिया में सेंधमारी कर रहे हैं। हाई ग्रोथ डिस्ट्रीब्यूशन प्रा. लि. का दफ़्तर कोलकाता में है और वहां के जरिए इसने बीएजी में पैसा लगाया ताकि लोग भ्रम में रहे कि कोलकाता का कोई सेठ बीएजी से खेल रहा है! इसी तरह इंडिया टीवी चलाने वाली कंपनी इंडिपेंडेंट न्यूज़ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड में 23 फ़ीसदी हिस्सा श्याम इक्विटीज़ प्राइवेट लिमिटेड का है। इस श्याम इक्विटीज में टैली सॉल्यूशंस ने निवेश किया और टैली सॉल्यूशंस को मुकेश अंबानी समूह और भरत गोयनका समूह नियंत्रित करते हैं। इस तरह सीधे आरआईएल के नाम से निवेश करने में मुकेश लगातार कतरा रहे हैं। या कहिए कि चालाकी बरत रहे हैं। जिस नई दुनिया के बिकने की चर्चा की जा रही है वो लगातार घाटे की स्थिति में चल रही थी। सूवी इंफो (नई दुनिया की फादर कंपनी) के 2006-07 की बैलेंसशीट यह दिखाती है उसे आर्थिक कमर्शियल्स प्राइवेट लिमिटेड की तरफ़ से 38 करोड़ का ऋण दिया गया। और आर्थिक कमर्शियल्स के मालिक मुकेश अंबानी हैं। इस तरह नई दुनिया की ताजा डील भी मुकेश अंबानी के हाथों के नीचे हुआ है।      
मीडिया उद्योग में निवेश पर सतही नज़र डालने से ही पता चल जाएगा कि या तो रियल एस्टेट, तेल, गाड़ी, बैंकिंग सहित अन्य धंधों के खिलाड़ी इसमें पैसा लगा रहे हैं या फिर मीडिया का कारोबार करने वाले व्यवसायी धीरे-धीरे अन्य धंधों में अपने पैर पसारने लग गए हैं। उदाहरण के लिए मीडिया के उत्साही खिलाड़ी सुभाष चंद्रा ने अपने एस्सेल ग्रुप (ज़ी समूह की फ़ादर कंपनी) को विस्तार देने के लिए आख़िरी मार्च को हैदराबाद स्थित इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी आईवीआरसीएल (IVRCL) का 10.2 फ़ीसदी शेयर ख़रीद लिया। इन्फ्रास्ट्रक्चर या बाकी किसी भी उद्योग के साथ मीडिया के जुड़ाव का क्या असर पड़ता है इसको उसी दिन सेंसेक्स के आंकड़ें बयां कर रहे थे। मीडिया का हाथ पड़ते ही बांबे स्टॉक एक्सचेंज में आईवीआरसीएल का प्रदर्शन निखरने लगा। जिस दिन सुभाष चंद्रा ने 10 फ़ीसदी शेयर ख़रीदा उस दिन सेंसेक्स में आईवीआरसीएल को 8 प्रतिशत का उछाल मिला। इस कंपनी में सबसे बड़ा शेयर 12.2 फ़ीसदी है इसका मतलब एस्सेल एक तरह से आईवीआरसीएल में दूसरा (पहले से महज़ दो फ़ीसदी के अंतर के साथ) सबसे बड़ा शेयर धारक हो गई है। सुभाष चंद्रा को आईवीआरसीएल में निवेश की सलाह देने वाली कंपनी का नाम जेएम फाइनेंसियल है, जोकि एक इनवेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी है। इसका ज़िक्र करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि मुकेश अंबानी ने जिस नीमेश कंपनी के मार्फ़त नेटवर्क-18 में पैसा लगाया था, वो नीमेश कंपनी इसी जेएम फाइनेंसियल के अध्यक्ष हैं। हालांकि सुभाष चंद्रा दूसरे धंधे में हाथ मारने के पुराने अनुभवी हैं। इस क्रम में कई बार उन्होंने गच्चा भी खाई है। उनका टी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट आईसीएल बुरी तरह पिट गया, हालांकि बीसीसीआई जैसी भीमकाय संस्था के बरकअक्स पिटना ही उसकी परिणति थी। लेकिन इस तरह के उपक्रम ये दिखाते हैं कि सुभाष चंद्रा की रुचि मीडिया से बाहर किस सीमा तक पसरी हुई है। आजकल एस्सेल समूह की शाखा कंपनी डिश टीवी अजमेर सहित राजस्थान के कई शहरों में शॉपिंग मॉल की श्रृंखला खोलने जा रही है। इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है।   
मीडिया के जरिए अन्य उद्योगों के पक्ष में होने वाली लॉबिंग की बेहतरीन मिसाल के तौर पर 2जी स्पेक्ट्रम का प्रकरण हम देख चुके हैं। लेकिन यदि बड़े पत्रकारों के दलाल वाली भूमिका को बातचीत के दायरे से निकालते हुए कारोबारी हित की बात की जाए तो मीडिया-उद्योग-राजनेता के गठजोड़ और ज़्यादा खुलकर सामने आएंगे। मीडिया और रिलायंस के बीच के ताल्लुकात को समझने वाले लोग एक और तथ्य जान लें। 2010 में रिलायंस ने इंफोटेल ब्रॉडबैंड को 4800 करोड़ रुपए में ख़रीदा और 2-जी स्पेक्ट्रम नीलामी में इंफोटेल एकमात्र कंपनी रही जिसे बी़डब्ल्यूए स्पेक्ट्रम हासिल हुआ। ओह! क्या संयोग है!  
नई दुनिया जो अब जागरण की मिल्कियत हो गई।
      

अगर डीबी कॉर्प (दैनिक भास्कर) हिंदी और अंग्रेज़ी में अख़बार और पत्रिका निकालने के साथ-साथ भोपाल में शॉपिंग मॉल, महाराष्ट्र में सोयाबीन तेल और छत्तीसगढ़ में संभावित बिजली संयंत्र का धंधा कर रहा है तो इस प्रचलन को महज हिंदी भाषी मीडिया के उस एक समूह तक सिमटा नहीं माना जाना चाहिए। असल में इसी विस्तार को लक्ष्य किए बाकी मीडिया समूह भी बाज़ार में ज़ोर लगा रहे हैं। जागरण प्राइवेट लिमिटेड दैनिक जागरण के अलावा आई नेक्स्ट और सिटी प्लस नाम का अख़बार तो निकालती ही है, साथ में सहारनपुर में चीनी मिल भी चलाती है। इसी कंपनी का जगमिनी माइक्रो नेट (प्रा.) लिमिटेड नाम से नेटवियर फैक्ट्री है जिसमें मोजें (जुराब) बनते हैं। कानपुर और नोएडा में कई सारे स्कूलें हैं। इनमें कानपुर में पूर्वांचल विद्या निकेतन नाम का सीबीएससी से मान्यता प्राप्त स्कूल और नोएडा में जेपीएस नाम का स्कूल प्रमुख हैं। नोएडा में ही जागरण JIMMC नामक संस्थान से पत्रकार पैदा करता है। कंपनी का चैनल-7 जेटीवी नाम का 24 घंटे का सैटेलाइट चैनल भी है।
बीते कुछ सालों की मीडिया डील पर नज़र दौड़ाए तो आप पाएंगे कि यहां ख़रीदा वहां बेचा वाला धंधा शेयर बाज़ार की तरह ही मीडिया मंडी का भी चरित्र बनता जा रहा है। लेकिन अंतत: इस छोटे तालाब में बड़ी मछली का ही साम्राज्य कायम हो रहा है। यूटीवी ने विजय टीवी को यूनाइटेड ब्रेवेरिज से ख़रीदा और स्टार के हाथों बेच दिया। फिर हंगामा टीवी खरीदा और इसका शेयर वॉल्ट डिज़्नी के हाथों बेच दिया। असल में यूटीवी सॉफ्टवेयर कम्युनिकेशन लिमिटेड की छतरी में यूटीवी के नाम से चलने वाले सभी चैनलों को दुनिया की विशालयकाय मीडिया कंपनी में से एक वॉल्ट डिज़्नी कॉरपोरेशन के हाथ में ही जाना है क्योंकि वॉल्ट डिज़्नी बहुत जल्द ही यूटीवी के सभी बचे-खुचे शेयर को ख़रीदने जा रही है। हालांकि अधिकांश शेयर वॉल्ट डिज़्नी ने ख़रीद रखा है। हंगामा टीवी, बिंदास, यूटीवी एक्शन, यूटीवी मूवीज, यूटीवी वर्ल्ड मूवीज और यूटीवी स्टार्स सहित वितरण और विपणन की कंपनियों पर भी वॉल्ट डिज़्नी का ही अधिकार है। इसके अलावा ईएसपीएन स्टार स्पोर्ट्स में भी वॉल्ट डिज़्नी के कुछ शेयर हैं। बीते महीनों में स्टार ने विजय टीवी और एशियानेट को ख़रीद लिया और लगभग साथ-साथ ही ज़ी ने 24 घंटा और आकाश बंग्ला को ख़रीदा। ख़रीद-बिक्री के साथ-साथ इन कंपनियों का विदेशी कनेक्शन को जानना बेहद महत्वपूर्ण है। लगभग हर बड़ी कंपनी का कोई न कोई विदेशी गठजोड़ है, जिसके बारे में पाठक-दर्शक लगभग न के बराबर जानते हैं। मिसाल के लिए नेटवर्क-18 के कुछ ब्रांड अमेरिकी कंपनी वायाकॉम के साझा उपक्रम (ज्वाइंट वेंचर) है, तो टाइम्स समूह की पत्रिका फ़िल्मफेयर और फेमिना बीबीसी मैग्ज़िन की साझा उपक्रम है। स्टार के सारे चैनलों के मालिक रुपर्ट मर्डोक की कंपनी न्यूज़ कॉरपोरेशन है। इमेजिन टीवी, पोगो, एचबीओ, कार्टून नेटवर्क और वर्ल्ड मूवीज के मालिक अमेरिकी कंपनी टाइम वार्नर-टर्नर प्राइवेट लिमिटेड है। ऐसे दर्ज़नों उदाहरण हैं। आप जिसे अब तक देसी समझते रहे उसमें विदेशी मिलावट भी है, ये जानना बेहद ज़रूरी है।
प्राइवेट ट्रीटीज वगैरह पर इस आलेख में चर्चा नहीं की जाएगी वरना मीडिया और ग़ैर-मीडिया कंपनियों के सामंजस्य की चर्चा करने के क्रम में इन कंपनियों के नाम से ही लेख पट जाएगा। हिंदुस्तान टाइम्स समूह के साथ बिड़ला के रिश्ते और बिजनेस स्टैंडर्ड में कोटक-महिंद्रा के शेयर के बारे में ज़्यादातर लोग वाकिफ़ हैं। हां, संतुलन कायम करने के लिए मुकेश के साथ-साथ अनिल अंबानी पर चर्चा करनी ज़रूरी है! अविभाजित रिलायंस के भीतर मीडिया में निवेश करने का प्रचलन अनिल अंबानी की जिद्द से ही शुरू हुआ, जब इंडियन एक्सप्रेस से नाराज होकर अनिल अंबानी ने एक स्वतंत्र बिजनेस दैनिक निकालने का फैसला किया और इसी क्रम में 1989 में रिलायंस ने (बिजनेस एंड पॉलिटिकल) आब्जर्बर को ख़रीद लिया। उसी समय टाइम्स समूह ने विजयपत सिंघानिया से इंडियन पोस्ट खरीदा था, जिसे बाद में बंद कर दिया गया।
अनिल अंबानी ने तब से मीडिया और दूरसंचार में बेतरह रुचि दिखाई है। लगभग दर्ज़न भर अंग्रेजी मनोरंजन चैनल चलाने वाली अमेरिकी कंपनी सीबीएस के साथ अनिल का समझौता है। बिग सिनर्जी नाम से अनिल धीरू भाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) एक प्रोडक्शन हाउस चलाता है। ब्लूमबर्ग यूटीवी में 18 फ़ीसदी और टीवी टुडे में 13 फ़ीसदी शेयर धारक होने के अलावा नेटवर्क-18 (इसमें दोनों अंबानी के पैसे हैं) सहित कई टीवी चैनलों में अनिल अंबानी के पैसे लगे हैं। बिग एफएम के 45 स्टेशन, फिल्म प्रोडक्शन और विपणन की बड़ी कंपनी, बिग सिनेमा, बिग डीटीएच, बिगअड्डा डॉट कॉम सहित केबल उद्योग में भी अनिल का बड़ा हस्तक्षेप है।        
मीडिया सुनते ही जिनके जेहन में अब भी उद्योग के बदले पत्रकारिता शब्द कौंधता है, उनके लिए बता दूं कि एचटी मीडिया ने मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिंदुस्तान टाइम्स को उतारने के लिए शेयर बाज़ार में खुद को पंजीकृत करवाया ताकि पैसा पीटा जा सके। दक्कन क्रॉनिकल ने शेयर बाज़ार का रास्ता नापा ताकि पैसा बनाकर हिंदू के गढ़ चेन्नई और दक्कन हेराल्ड के दबदबे वाले बंगलौर में खुद को मज़बूती से उतार सके। इसी तरह दैनिक जागरण ने शेयर बाज़ार से कमाए हुए पैसों से चैनल-7 जेटीवी नामक सैटेलाइट चैनल लांन्च किया।  कानपुर जैसे शहर से निकलने वाले जागरण का विस्तार हैरतअंगेज़ है। इसके मालिक महेंद्र मोहन गुप्त के कई परिचय हैं। आप उन्हें जागरण प्रकाशन (प्रा.) लिमिटेड के अध्यक्ष और मैनेजिंग डायरेक्टर के अलावा चाहें तो राज्यसभा सदस्य कह सकते हैं या फिर सुविधानुसार शाकुंभरी सुगर एंड एलाइड इंडस्ट्री लिमिटेड का अध्यक्ष भी बुला सकते हैं। जागरण लिमिटेड के निदेशक के साथ-साथ जागरण माइक्रो मोटर्स लिमिटेड के निदेशक के तौर पर भी लोग उन्हें जानते हैं। श्री पूरनचंद्र स्मारक ट्रस्ट और कंचन चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक सचिव और कोषाध्यक्ष का ओहदा भी उनके नाम हैं और इंडियन न्यूज़ पेपर सोसाइटी तथा इंडियन लैग्वेज़ न्यूज़ पेपर एसोसिएशन की कार्यकारी समिति के वो सदस्य हैं। लेकिन अगर आप उन्हें ज़्यादा इज़्ज़त बख्शना चाहते हैं तो कुछ और सूचना को अपने जेहन का हिस्सा बना लीजिए। मिसाल के लिए आप उन्हें इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी, इंडियन लैंग्वेज़ न्यूज़पेपर एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष के तौर पर भी संबोधित कर सकते हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया तथा ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन का सदस्य भी बता सकते हैं। छुटभैंये संस्थाओं, क्लबों और संगठनों में उनकी ओहदेदारी की चर्चा करने पर ज़्यादा ज़ोर देने की ज़रूरत नहीं हैं।  
बेनेट एंड कोलमैन यानी टाइम्स समूह, एचटी मीडिया लिमिटेड, एस्सेल समूह (ज़ी वाले), सन टीवी नेटवर्क, इंडिया टुडे ग्रुप जैसी विशालकाय मीडिया समूहों के सामने जागरण प्रकाशन लिमिटेड बेहद छोटा दिखता है, लेकिन खुले बाज़ार का जो प्रचलन है उसमें या तो जागरण को भी लगातार अपना विस्तार करते रहना होगा या फिर भविष्य में इसे भी कोई बड़ा घराना ख़रीद लेगा। जागरण अपने विस्तार को फिलहाल भास्कर के बरअक्स देख रहा है और दोनों के बीच गहरी प्रतिस्पर्धा चल रही है। इसलिए जिस दिन जागरण ने नई दुनिया ख़रीदा उसके दो दिन के भीतर यानी 31 मार्च को भास्कर ने सोलापुर में दिव्य मराठी का पांचवा संस्करण लॉन्च किया। क्षेत्रीय भाषा में बड़ी कंपनियां लगातार घुसपैठ कर रही है। भास्कर ने दिव्य मराठी के पहले संस्करण की शुरुआत मई 2011 में औरंगाबाद से की थी लेकिन एक साल के भीतर ही उसने पांचवा संस्करण बाज़ार में उतार दिया। औरंगाबाद और सोलापुर के अलावा यह नासिक, जलगांव और अहमदनगर से भी छपता है। भास्कर का यह कुल मिलाकर 65वां संस्करण है। 
2011 की चौथी छमाही के इंडियन रीडरशिप सर्वे के मुताबिक दैनिक जागरण देश के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बार के तौर पर बरकरार है और दैनिक भास्कर इससे थोड़ा पीछे दूसरे नंबर पर है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भास्कर शीर्ष पर है। यहां जागरण उससे मात खा रहा था इसलिए महेंद्र मोहन गुप्त वाले जागरण को एक तरह की छटपटाहट थी कि वो खुद को भास्कर के मुकाबले खड़ा कर सके। लेकिन परेशानी ये थी कि योगेंद्र मोहन गुप्त वाला जागरण पहले से वहां छप रहा था। इस वजह से जागरण अपने ब्रांड नेम से वहां कारोबार शुरू नहीं कर सकता था, इसलिए नई दुनिया के रूप में एक पका-पकाया ब्रांड मिलते ही जागरण ने उसे ख़रीद लिया। मध्य प्रदेश में नई दुनिया तीसरा सबसे बड़ा अख़बार है- भास्कर और (राजस्थान) पत्रिका के बाद। कुछ साल पहले यह दूसरा सबसे बड़ा अख़बार था, लेकिन वहां से पिछड़ा तो अब जागरण ने लपक लिया।
इंदौर स्थित नई दुनिया को 1947 में नरेंद्र तिवारी, बाबू लाभचंद छजलानी और बसंतीलाल सेतिया ने मिलकर शुरू किया था और जब विनय छजलानी कंपनी के सीईओ बने तो आक्रामक रवैया अपनाते हुए सेतिया घराने के शेयर को ख़रीद लिया। विनय छजलानी ने 2008 में कंपनी को विस्तार देते हुए भोपाल से नव दुनिया की शुरुआत की। उस समय नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 2016 तक नई दुनिया की प्रसार संख्या को 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाया था, लेकिन आगे बढ़ने के बजाए तब से नई दुनिया में लगातार गिरावट ही देखी गई। और आखिरकार विनय छजलानी को कहना पड़ा कि नई दुनिया को बेचना एक मुश्किल फ़ैसला था, लेकिन घाटे की स्थिति को देखते हुए उनके सामने और कोई चारा नहीं था। छजलानी के मुताबिक़ (अख़बार को) बेचकर ही बाप-दादा के ब्रांड को सुरक्षित रखा जा सकता था और छजलानी ने जागरण के हवाले कर ब्रांड को बचा लिया। नई दुनिया नाम से ही यह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में निकलता रहेगा। सिर्फ मालिक बदल गए, पाठकों और कुछेक कर्मचारियों को कानों-कान ख़बर तक नहीं हुई! गोमंतक टाइम्स, सकाल और सकाल टाइम्स को ख़रीदने से बनी सकाल मीडिया ग्रुप नामक कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर, अभिजीत पवार इस तरह की डील को बेहद स्वाभाविक मानते हैं और कहते हैं, सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का जमाना है, मीडिया उद्योग में वही टिकेगा जो इसके योग्य है। टिकने का मतलब उद्योग से किस तरह की प्रतिस्पर्धा से है? अगर एक छोटी कंपनी चार रुपए की लागत पर 10 पेज का अख़बार निकाल रहा है और उस इलाके में शेयर बाज़ार में दख़ल रखने वाली कोई कंपनी आकर दो रुपए में 30 पेज का अख़बार देना शुरू कर दे और दो महीने के सब्सक्रिप्शन पर बाल्टी-मग और पांच किलो चीनी मुफ़्त में दें तो बाज़ार में छोटा अख़बार कैसे टिक पाएगा? भारी पूंजी के बग़ैर नया अख़बार शुरू करना इस समय बाज़ार में पिसने जैसा है। 2008 में जब तेलुगू भाषा में साक्षी की शुरुआत हुई तो उससे पहले पेज डिजाइनिंग के लिए अमेरिकी कंपनी को हायर किया गया और 23 शहरों में प्रिंटिंग प्रेस लगाने के बाद घर-घर जाकर अख़बारों की स्कीम, मिलने वाले उपहार और पाठकों की रूचि को जानते-समझते हुए इसे एक साथ भारी स्तर पर लांन्च किया गया। सत्ताधारी पार्टी का ये अख़बार था, भारी पूंजी लगी थी, राज्य के मुख्यमंत्री का बेटा इस अख़बार का मालिक था। दो साल तक घाटा हुआ। लेकिन राज्य सरकार ने विज्ञापन में खूब सहयोग किया। इनाडु के बरअक्स जगन रेड्डी को इसे खड़ा करना था। आंध्र प्रदेश में 19 जगहों से ये एक साथ छपना शुरू हुआ था। बाकी चार महानगरों से। अख़बार चल निकला। इस समय साक्षी का सर्कुलेशन 52 लाख से भी ज़्यादा है। चूंकि रेड्डी को भारी राजनीतिक व वित्तीय लाभ सामने दिख रहा था इसलिए ऐसी हिम्मत के साथ वे साक्षी लेकर उतर गए। वरना बाज़ार से इस तरह कौन टकराता है!
फैलता मीडिया उद्योग


तो, नई दुनिया बिक गया। हिंदी अख़बारों में संपादक के नाम पत्र लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला अख़बार, पहली बार देश में ऑफसेट रोटरी मशीन पर छपने वाला अख़बार और इंटरनेट संस्करण शुरू करने वाले पहले अख़बार का मालिक बदल गया। यह लेख नई दुनिया के बिकने पर किया गया कोई स्यापा नहीं है। नई दुनिया के नामचीन संपादक राजेंद्र माथुर या राहुल बारपुते की परंपरा का मैं इसे अंत नहीं मान रहा हूं, मेरे खयाल से ये अंत काफ़ी पहले हो चुका है। मैं ये भी नहीं मानता कि जागरण के मालिक होने से अख़बार का रवैया कॉरपोरेट वाला हो जाएगा, नई दुनिया अपने कलेवर में पूरी तरह कारोबारी ही था। नई दुनिया का कंटेट बेहद खूबसूरत था, मैं ऐसा भी नहीं मानता। मुझे इस बात की चिंता है कि शीर्ष 10 हिंदी अख़बार में शामिल एक अख़बार को शीर्ष अख़बार खा गया। इस तरह अब एक ही अख़बार एक बात को नए 5 लाख लोगों तक पहुंचाएगा। मैंने हिसाब लगाया कि जागरण की प्रसार संख्या अमेरिका के टॉप 16 अख़बारों के बराबर है और अगर जागरण और भास्कर को जोड़ दें तो ये संख्या टॉप 50 के पार पहुंच जाती है। जबकि देश के 20 से भी ज़्यादा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जागरण नहीं छपता। सिर्फ़ हिंदी पट्टी के बदौलत जागरण पसर रहा है।
तो, वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स की सम्मिलित प्रसार संख्या से छह गुना से भी ज़्यादा छपने वाला जागरण दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अख़बारों में शुमार हो रहा है, इस पर राष्ट्रवादियों को गर्व करना चाहिए। सामान्य ज्ञान के प्रश्न के तौर पर भी इसे याद किया जाना चाहिए कि जागरण आठ राज्यों और दिल्ली में 37 जगहों से छपता है और एक करोड़ 64 लाख पाठकों तक पहुंचता है। कारोबार में यही संख्या महत्वपूर्ण है। इसी संख्या के बल पर कंपनी कुलांचे मारती है और नंबर वन होने का दावा ठोकती है। जिस दिन ये संख्या साथ छोड़ देगी उस दिन पत्रकारिता वाले लोग स्यापा करने बैठ जाएंगे कि उनके विचारों का गला घोंटा जा रहा है, कि उनके छपने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म कम हो गया, कि उनकी नौकरी मंझधार में डूब गई। मैं जानता हूं कि भास्कर, जागरण या फिर नई दुनिया, ये सारे उदारीकृत अर्थव्यवस्था के खुले पक्षधर हैं लेकिन इसके बावजूद मैं चाहता हूं कि हरेक का मालिक अलग-अलग हो ताकि कारोबारी प्रतिस्पर्धा में ही सही, थोड़ा-बहुत ही सही, एक-दूसरे के हितों की पोल-खोलते रहे। जिस दिन चार-पांच मालिक पूरे मीडिया उद्योग को हांकेंग, उस दिन मर्जर, एक्वीजीशन, टेक-ओवर जैसे शब्द मीडिया बाज़ार में कम भले ही हो जाएं, लेकिन इसके साथ ही बंद हो जाएंगे उन चार-पांचों पर उठने वाले सवाल। जो सवाल उठेंगे वो एक खास दायरे में ही रह जाएंगे।
हालांकि तब तक सारे लोगों को इस खुशफ़हमी में रहने का पूरा हक़ है कि देश में विविधता के नाम पर लगभग 650 टीवी चैनल हैं, अलग-अलग भाषाओं में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं की संख्या 2000 से भी ज़्यादा है और 30 से भी ज़्यादा एफएम रेडियो ऑपरेटर देशभर में 245 रेडियो स्टेशन चला रहे हैं। साथ में यह भी जोड़ा जा सकता है कि हमारे यहां हर साल 1000 से ज़्यादा फ़िल्में रिलीज होती है। लेकिन हल्की चीर-फाड़ से ही ये खूबसूरत संख्याएं बदरंग हो जाती हैं। हिंदी के जो शीर्ष 10 अख़बार हैं उनके मुकाबले हिंदी के बाकी सारे छोटे-बड़े अख़बारों को खड़ा कर दिया जाए तो उन दसों के एक चौथाई तक पहुंचना भी बाकियों के लिए आजीवन अभ्यास का मामला दिखता है। ये जो फासले का गणित है, वो ठीक मीडिया द्वारा आरोपित वर्चस्व के बराबर है। हिंदी में शीर्ष स्थान पर काबिज दैनिक जागरण दसवें नंबर पर रहने वाले (राजस्थान) पत्रिका के मुकाबले 12 गुना से भी ज़्यादा प्रसार संख्या रखता है और अंग्रेजी में पहले स्थान पर रहने वाला द टाइम्स ऑफ इंडिया दसवें नंबर पर रहने वाले द न्यू इंडियन एक्सप्रेस (दी इंडियन एक्सप्रेस नहीं, रीडरशिप के लिहाज से दी इंडियन एक्सप्रेस अंग्रेज़ी के टॉप 10 अख़बारों की सूची से बाहर है!) से 15 गुना ज़्यादा विशालकाय है। कोई गलाकाट प्रतिस्पर्धा नहीं है। जो बड़ा है वो लगातार फैल रहा है। जब कोई कहता है कि देश में 2000 से ज़्यादा प्रकाशन हैं तो मनोवैज्ञानिक तौर पर इसका ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि पहुंच के मामले में सब बराबर है। खुले बाज़ार में जिस दिन ख़रीदने-बेचने वाला तैयार हो जाएगा उस दिन ऊपर का दो अख़बार नीचे के सात-आठ सौ को खड़े-खड़े ख़रीद लेगा। 1990 के दशक में एम जे अकबर ने एशियन एज निकाला और हालत पस्त होते ही दक्कन क्रॉनिकल के हाथों बेच दिया। आज आलोक मेहता ने कुछ सेठों और पत्रकारिता संस्थान चलाने वाले एक समूह की मदद से नेशनल दुनिया निकाला है, कल को बेच देंगे। बेहतर क़ीमत भी मिल जाएगी। पत्रकारिता की नौकरी से बेहतर है अख़बार निकालना। अख़बार अगर थोड़ा भी जम गया तो ठीक-ठाक क़ीमत मिल जाती है। साल-दो साल घाटा सहिए और अगर उसके बाद भी अख़बार पैसा नहीं दे रहा तो नीलामी बाज़ार में आ जाइए। यहां कुछ लोग हमेशा आपके इंतज़ार में खड़े मिलेंगे।

5 टिप्‍पणियां:

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