19 अप्रैल 2012

ओरिएन्ट क्राफ्ट: आधुनिक टेक्सटाइल उद्योग में ठेका मज़दूरी या बंधुआगिरी

चंद वर्षों पहले तक अखबार की सुर्खियों से मजदूर गायब रहता था। यह सिलसिला टूट रहा है। यह और बात है कि इस खबर को कैसे छापा जाता है और छापने का उद्देश्य क्या होता है। पर, मजदूर वर्ग की गतिविधियों को टाल सकना अखबार मालिकों के लिए मुश्किल हो गया है। मार्च, 2012 के महीने में गुड़गांव, हरियाणा में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिसमें पुलिस के पीसीआर वैन को जला दिया गया, लाठी बरसाने गई पुलिस घायल हुई और उसे तत्काल भागना पड़ा। थोड़े-से समय में हजारों मजदूर इकट्ठा हो गए और अपने गुस्से का खुला इजहार किया। अंजनी कुमार की रिपोर्ट।




 जब ये घटनाएं घट रही थीं उस समय संसद में बजट पेश किया जा रहा था और यह दावा किया जा रहा था कि देश में गरीबी घट रही है। इस बढ़ रही ‘संपन्नता’ को बचाने के लिए ही संसद में अब तक का सबसे बड़ा रक्षा बजट पेश किया गया और हथियार की खरीद में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया। मजदूरों का खून चूसने वाले शॉप फ्लोर को इतनी छूट देने का आश्वासन दिया गया कि विकास दर में भारत लगातार आगे बना रहे। कह सकते हैं कि मजदूर किसानों के खून चूसने की गति जितनी तेज होगी उतनी ही भारत के विकास की गति दर होगी। इसका यह भी तर्जुमा किया जाता कि विकास की मशीन जितनी तेजी से अधिक आदमी को अपने से बाहर फेंकती है वही देश की विकास दर है। यह फेंकना किसी भी रूप में हो सकता है। भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय, समुदायिक, ... और भी इसी तरह के पहचान वाले लोगों की सामुहिक हत्या से लेकर आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक तौर पर उन्हें बरबाद करके भी। मार्च के महीने में ही अमेरिका की पत्रिका ‘टाइम’ ने गुजरात के फासिस्ट मोदी को ‘बिजनेस लीडर’ के पद से नवाजा। अमेरिकी कॉरपोरेट जगत भारतीय शासक वर्ग के ‘मोदियों’ को ‘विकास’ के रास्ते पर और तेज गति से चलने का संकेत दे रहा था। ‘मोदी अर्थात बिजनेस’। इस नारे का क्या यह अर्थ साफ है, बिजनेस अर्थात हत्या। देश का विकास जिस रास्ते पर तेजी से बढ़ता जा रहा है वहां इसका यही अर्थ रह गया है। बिजनेस के लिए जमीन हथियाने के दौरान हत्या, बिजनेस में हत्या, मुनाफा कमाने और इस बढ़ाने में हत्या और इस मुनाफे पर विलास करने के लिए हत्या; मोदी का यह रोल मॉडल गुजरात से लेकर बस्तर व गुड़गांव तक फैला हुआ है।

बहरहाल, गुड़गांव में फैक्टरी हो या रियल स्टेट वहां मजदूरों की मौत का साम्राज्य फैला हुआ है। सीधी मौत और धीमी मौत भी। उदारीकरण, नीजीकरण के इस तीसरे दशक की शुरुआत में जो दृश्य उपस्थित हो रहा है वह निश्चय ही काफी कुछ बदला हुआ है। यहां टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले मजदूरों को जी सकने के न्यूनतम वेतन से इतना कम दिया जा रहा है जिसमें एक इन्सान का जीवित बने रहना भी एक ‘विशिष्टता’ है। मजदूरी में उसकी ‘कुल सामाजिक लागत’ की कोई गिनती ही नहीं है। उसके कुल उत्पादन में से उसे कितना हिस्सा दिया जाता है यह एक शोध का विषय है। ओरिएन्ट क्राफ्ट में ठेकेदार व मालिक के खिलाफ मजदूरों का फूट पड़ा गुस्सा इस बदलाव की हकीकत को काफी कुछ बयान करता है। 

घटना और उसकी पृष्ठभूमि

‘‘गुड़गांव एक बार फिर उबला’’- द इंडियन एक्सप्रेस, 20 मार्च 2012, के दिल्ली पेज की मुख्य खबर के साथ गाड़ियों के जलाने, लाठीचार्ज के लिए उतावली व घायल पुलिस और ओरिएन्ट क्राफ्ट फैक्टरी के टूटे हुए शीशे की कुल पांच फोटो लगाया गया था। आधे पेज से उपर के इस खबर में कांट्रेक्टर द्वारा की गई मजदूरों से की गई मारपीट पर मुख्य जोर दिया गया था। हिन्दुस्तान टाइम्स से लेकर सारे अखबारों के गुड़गांव संस्करण में यह खबर मुख्य पेज पर था। यह खबर तीन दिनों तक छपती रही। 23 मार्च 2012 को एक बार फिर मजदूरों ने पुलिस की गाड़ी को जला दिया गया और साइट ऑफिस पर हमला किया। यह घटना सेक्टर 58 में घटी। इसी समय मारुती सुजुकी मोटरसाइकल प्रा. लि. में भी मजदूर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। चंद अखबारों ने दबे दबे स्वर में मजदूरों पर हो रही ज्यादतियों के बारे में कुछ रिपोर्ट भी छापा। इस विस्फोटक स्थिति पर हरियाणा श्रम व रोजगार मंत्रालय ने तुरंत जांच कमेटी बनायी और चंद दिनों बाद इसने रिपोर्ट भी दे दी: ‘हालात बिगड़ने का कारण कांट्रेक्ट है। ओरिएन्ट क्राफ्ट को इनका लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए।’

हीरो होंडा चेक के पास सेक्टर 37 में हाइवे के दोनों तरफ ओरिएन्ट क्राफ्ट की कंपनियां हैं। घटना इस कंपनी के 9 व 13 में घटी। अखबार व हमारे छानबीन के दौरान जो बात सामने आई उसमें इस घटना की तात्कालिक पृष्ठिभूमि फैक्टरी में रविवार यानी 18 मार्च, 2012 को ठेकेदार द्वारा मजदूर को काम पर आने के लिए जोर देना है। इस दिन भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच था। और यह रविवार का दिन था जिस दिन अधिकारिक तौर पर छुट्टी रहती है। इस दिन कई सारे मजदूर काम पर नहीं आए। 19 मार्च को ठेकदार लवली सिंह अपने कमरे में न आने वाले मजदूरों को बुलाकर बुरा सुलूक कर रहा था। एक अनुमान के अनुसार ऐसे मजदूरों की संख्या सौ थी। ठेकेदार ने ऐसे ही न आने वाले मजदूरों में से नसीम और अनिल के साथ गाली गलौज करना शुरु कर दिया। इस कहा-सुनी के दौरान लवली सिंह ने एक बड़ी कैंची से नसीम के हाथ में मारा। वह बुरी तरह घायल हो गया। खून से लथपथ वह जैसे ही बाहर आया व अन्य मजदूर उसके आसपास इकट्ठे हुए, ठेकेदार, मालिक व सुपरवाइजर सक्रिय हो गए और इन मजदूरों को गेट से बाहर कर दिया। फैक्टरी के मजदूर तुरंत इकट्ठे हुए और गेट खोलकर बाहर आ गए।

मजदूरों ने फैक्टरी गेट के बाहर खड़ी मालिक ठेकेदारों की गाड़ियों को जलाना शुरू कर दिया। ठेकेदारों ने पुलिस बुला ली। पुलिस आमतौर पर जितनी तैयारी से पहुंचती है उतनी तैयारी से नहीं पहुंची। एक मजदूर संगठनकर्ता के अनुसार इसका कारण सिर्फ इतना था कि इन पुलिस वालों के लिए यहां काम करने वाले मजदूर ‘बिहारी’ थे। पुलिस व स्थानीय ठेकेदार आदि पंजाब व हरियाणा से बाहर के राज्यों से आने वाले सभी लोगों के लिए ‘बिहारी’ संबोधन ही प्रयोग करते हैं। जिस समय पुलिस ओरिएन्ट क्राफ्ट के 9 व 13 न. गेट पर पहुंची है मजदूर पूरे गुस्से में थे। उन्होंने पुलिस पर जमकर पथराव किया और पुलिस की जिप्सी को उलट कर फूंक दिया। कई पुलिस वाले घायल हुए।

कुल तीन घंटों तक मजदूरों ने वहां की सारी गतिवधि को अपने नियंत्रण में रखा। इस दौरान मजदूरों ने लवली सिंह पर मजदूरों ने हमला किया या नहीं, इस बात का खुलासा नहीं हो पाया। लेकिन फैक्टरी का प्रंबंधक समूह सक्रिय हो गया और उसने मजदूरों को अपने पक्ष कर लिया। सह. प्रबंधक ने ठेकेदार लवली सिंह के खिलाफ प्राथमिकी-एफआईआर दर्ज कराया। हालांकि उस पर दायर केस इतना कमजोर था कि उसे थाने से ही जमानत मिल गई। 7 मजदूरों पर अटेम्ट टू मर्डर-307 व दंगा फसाद करने का मुकदमा दर्ज हुआ। कुल 10 मजदूरों की गिरफ्तारी हुई। इसमें से पांच मजदूर एक ही मकान में रहने वाले हैं जिन्हें वहां से पकड़ा गया। ये सभी मोतिहारी जिले के हैं। इससे साफ पता चलता है कि गिरफ्तारी मनमाने तरीके से की गई।

घायल नसीम के परिवार, रिश्तेदार व क्षेत्र के जानने वाले लोग इकट्ठे हो गए। एक अनुमान के अनुसार यह संख्या 150 से उपर थी। प्रबंधकों ने नसीम को अस्पताल में भर्ती करा दिया था। और इकट्ठे हुए लोगों के साथ ‘समझौता’ हो गया। घटना की रात से ही नसीम ने अपना बयान कई बार बदला। कभी उसने सीढ़ी से गिरकर शीशे से चोट खाने की बात कही तो कभी झगड़े के दौरान गिर जाने से चोट लगने का बयान दिया। नसीम भी मोतिहारी जिले से आता है। वह कपड़े का काम करने वाली मुस्लिम समुदाय से आता है। इस समुदाय के काफी बड़ी संख्या में गुड़गांव व दिल्ली में काम करते हैं। ‘बात आगे न बढ़ाने’ और ‘सारे मामले को पटरी पर ला देने’ के आश्वासन के साथ प्रबंधक ने तीन दिनों के भीतर मजदूरों को काम पर वापस बुला लिया।

24 मार्च, 2012 को दोपहर में लगभग बीस लोगों की एक टीम दिल्ली से ओरिएन्ट क्राफ्ट के गेट पर इस उम्मीद में पहुंची कि मजदूरों से बातचीत कर यहां के हालात को जाना जाए और मजदूरों के साथ एक रिश्ता कायम किया जाय। उस दिन मजदूरों को लंच के लिए बाहर आने नहीं दिया गया और रात में लगभग 9 बजे उन्हें काम से छोड़ा गया। एक बार फिर चार दिनों बाद गेट से थोड़ी दूरी पर खड़े होकर चार सदस्यीय टीम ने मजदूरों से बातचीत की। मजदूरों ने बातचीत की लेकिन इस घटना से मजदूर कोई सबक निकाल सकने की स्थिति में नहीं थे। मजदूर इस घटना से इतना जान रहे थे कि ठेकेदार व प्रबंधक-मालिक पहले से कहीं अधिक ‘अच्छा व्यवहार’ करने लगे थे। 

ओरिएन्ट क्राफ्ट: लूट का आधुनिक ढांचा

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार ओरिएन्ट क्राफ्ट लिमिटेड गुड़गांव, 1978, में अस्तित्व में आया। विदेशी बाजार व कंपनियों के लिए काम करने वाली इस गार्मेंट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के कुल 21 संस्थान हैं जिनमें 25 हजार मजदूर काम करते हैं। यहां चालीस फैशन ब्रांड कंपनियों जिसमें मार्क जैकब, मार्क स्पैंसर, एन टेलर आदि लेबल वालों के लिए सिलाई का काम होता है। ‘मनीकंट्रोल.कॉम’ साइट के अनुसार 2004-2005 में इसका टर्नओवर 650 करोड़ रुपए का था। 2010 तक यह 850 करोड़ हो चुका था। यहां सिल्क, ऊनी, सूती, सिंथेटिक आदि कपड़ों पर काम होता है। यह निर्यात आधारित काम है। फोर्ब्स पत्रिका के साथ 30 अप्रैल, 2010 को बातचीत में कंपनी के निदेशक सुधीर ढींगरा के अनुसार प्रतिदिन 1,50,000 पीस का उत्पादन होता है। यहां 2000 तरह की डिजाइन पर काम होता है। डिजाइन, इंब्राइडरी, कट आदि के चलते मजदूर सामान्य मूल्य पर दोगुना यानी प्रति शर्ट 10 डॉलर का मूल्य जोड़ते हैं। उत्पादन बढ़ाने के लिए डिजाइन बनाने के लिए कंप्युटराइज्ड टकएकाड नाम की तकनीक का प्रयोग 2008 से शुरू किया गया। इससे कपड़ों के सिकुड़न और नाप को और अधिक सटीक करने के साथ साथ केवल नाप की फिडिंग से कपड़ों की कटाई में गति काफी तेज हो गई। स्टिचवर्ल्ड.कॉम के अनुसार उत्पादकता में 40 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। कंपनी के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक सुधीर ढींगरा इस कंपनी को दुनिया की सबसे बड़ी पांच कपड़ा उद्योग में से एक बना देने की कोशिश में हैं। इन्होंने लिवाइस कंपनी के स्पेन स्थित एक प्लांट को खरीदा है। आंध्र प्रदेश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में 300 करोड़ का प्लॉट खरीदा है जिसमें 50 यूनिट के लिए 2000 करोड़ रूपए का निवेश करने में लगे हुए हैं। इसी तरह गुड़गांव के मानेसर में 334 एकड़ का प्लॉट खरीदकर कंपनी का विस्तार किया और 2011 में उत्पादन शुरू कर दिया। 6 बिलियन डॉलर वाली विदेशी कंपनी ली एंड फंग ने हाल में ओरिएन्ट क्राफ्ट को आउटसोर्स करने का निर्णय लिया है। गुड़गांव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ओखला और मानेसर में 20 से 21 प्रोडक्शन यूनिटें काम कर रही हैं। यह सिर्फ टेक्सटाइल कंपनी ही नहीं है। यह अपने सेज के साथ रियल एस्टेट, होटल, अस्पताल, रेजीडेंसियल यूनिटें बनाने में भी निवेश कर रही है। राजस्थान के भीलवाड़ा में ग्रीनहाउसिंग योजना पर इस कंपनी में काम करना शुरू किया है।


ओरिएन्ट क्राफ्ट प्रा. लि. के लिंक्डइन प्रोफाइल के अनुसार कंपनी के तीन मालिक हैं। सुधीर ढींगरा इस कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक है। इसके नीचे प्रबंधक व चीफ एक्जीक्युटिव अफसर हैं। इसके बाद सुपरवाइजरों की श्रेणी है। ये दो तरह के हैं: एक तो कंपनी की ओर से नियुक्त। दूसरे ठेकेदारों की ओर से काम करने वाले। कंपनी अपना काम करने के लिए मजदूरों को दो तरह से नियुक्त करती है। पहले प्रकार में वह खुद सीधे तौर पर मजदूरों को भर्ती लेती है। इन मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों की संख्या का 5 से 7 प्रतिशत तक है। ये मजदूर जरूरी नहीं है कि नियमित हों। आमतौर पर इन मजदूरों को जिस लॉग बुक पर हस्ताक्षर करवाया जाता है वह दो से तीन सालों में बदल दिया जाता है। सेक्टर 37 के कंपनी संख्या 8 व 9-13 के कुछ ऐसे मजदूरों से बातचीत हुई जो वहां लगभग दस सालों से काम कर रहे हैं। लेकिन वे नियमित नहीं हैं। उनके काम को दो या तीन साल में रीन्यू-फिर से नियुक्ति के रूप में गिना जाता है। कह सकते हैं कि वहां वस्तुतः सीधी भर्ती में भी कोई नियमित मजदूर नहीं है। यदि हम मारुती सुजुकी जैसी ऑटोमोबाइल कंपनी के हालात को देखें तो वहां 5 साल काम करने के बाद मजदूरों को किसी न किसी बहाने काम से निकालने की तैयारी शुरू हो जाती है। मानेसर में मजदूरों के आंदोलन में यह भी एक मुद्दा था। ओरिएन्ट क्राफ्ट के 9-13 में लगभग 90 प्रतिशत मजदूर ठेकेदारों द्वारा नियुक्त किए गए हैं। इन ठेकेदारों के भी कई प्रकार हैं। प्रबंधक आमतौर मजदूर की उपलब्धता अधिकतम ठेकेदारों के द्वारा करते हैं। कुछ ठेकेदार ऐसे भी हो सकते हैं जिनके तहत 6 या 7 मजदूर हों तो दूसरी ओर 200 मजदूर हों। आज देश के लगभग सारे औद्योगिक क्षेत्र में पंजीकृत व गैरपंजीकृत ठेकेदारों की भारी संख्या है। गुड़गांव में ये हर गली में हैं और ये एक पूरी श्रृंखला चलाते हैं। ओरिएन्ट क्राफ्ट के इस कंपनी में मजदूरों से बातचीत करने पर ठेकेदारों के प्रकार ये थे: काम का ठेका लेकर फैक्टरी में अपने मजदूरों के साथ कमा करने वाला ठेकेदार, पीस रेट पर काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार, सफाई व तकनीकी काम करने वाला और इसका काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार, सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने वाला ठेकेदार।

इसके बाद काम करने वाला मजदूर आता है जिसकी पीठ पर पूरी फैक्टरी चलती है और मुनाफा कमाने में देश की अग्रणी कंपनियों में से एक बनने का दावा कर रही है। मजदूरों से आम तौर पर सुबह 8.30 से रात 9.30 तक काम कराया जाता है। कई बार यह रात के एक बजे तक चलता रहता है। पर आमतौर पर दो-तीन घंटे अधिक काम करा लेना एक आम बात है। इसका ओवरटाइम देने में काफी कोताही बरती जाती है। अतिरिक्त कुल काम का बमुश्किल 30 से 40 प्रतिशत हिस्से का ही भुगतान किया जाता है। यहां काम करने वाले मजदूरों के प्रकार निम्न हैं: मास्टर, चेकर, फिनिशर्स, इंब्राइडर वर्कर, टेलर्स, हेल्पर, तकनीकी चालक, सफाई कर्मी। इन सब पर लगातार नजर रखने वाला सुपरवाइजर होता है जो ठेकेदारों व प्रबंधकों के लिए काम करता है। मास्टर डिजाइन बनाने, पास करने आदि का काम करता है। इसे तकनीकी काम में महारत होनी चाहिए। कंपनी तकनीक का प्रयोग इसी के माध्यम से करती है। चेकर इस डिजाइन पर काम हो जाने के बाद पीस को नाप-जोख कर पास करता है। आमतौर पर यह बहुत-से काम को रिजेक्ट कर मजदूरों पर दबाव बनाए रखता है जिससे मजदूरों के प्रति पीस का भुगतान कम रहे। यह गलत सिलाई को रद्द कर देता है या उसे फिर से सिलने के लिए बाध्य करता है। टेलर्स सिलाई का काम करता है। इसी के बदौलत उत्पादन की गति तेज या कम होती है। ये आमतौर पर पीस रेट पर काम करते हैं जो 45 से 65 पैसे प्रति पीस पर काम करते हैं। इससे उन्हें 6000 से 8 या 9 हजार रूपए तक की प्रति महीने आय हो जाती है। हालांकि इसमें काम की उपलब्धता का भी योगदान होता है। काम का सबसे अधिक दबाव इन्हीं पर होता है। प्रतिपीस काम करने की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि अपने हिस्से का काम किया और चल दिया। यह स्वतंत्रता प्रतिपीस की है जिस पर उसे भुगतान होना है। काम के घंटे या छुट्टी के मसले पर उससे कोई छूट नहीं होती। उनसे जोर जबरदस्ती की जाती है। काम की गति कम होने पर उनसे मार-पीट, गाली-गलौज की जाती है। उनके भुगतान को रोक लिया जाता है कि अगले काम में जोता जा सके। मजदूर के प्रतिपीस आय में ठेकेदार 3 प्रतिशत का हिस्सा बंटाता है। इसके बाद हेल्पर आता है जो धागा, काटे गए कपड़ों को मशीनों की लाइन में सिलाई कर रहे मजदूरों को पहुंचाता है और सिले गए कपड़ों को मास्टर, चेकर तक ले जाता है। सबसे कम तनख्वाह इनकी होती है। मजदूरों से बातचीत के आधार पर यह अधिकतम 4500 रूपए था। सफाईकर्मी मूलतः ठेका पर काम करते हैं और इनकी आय हेल्पर के आस पास थी। मास्टर व चेकर की आय के बारे में मजदूर केवल अनुमान ही लगा रहे थे जो 12 से 13 हजार के आस पास था। इन मजदूरों की श्रृंखला में निश्चय ही आयरन करने वाले मजदूर होंगे। संभव है यह काम आउटसोर्स किया जा रहा हो। इनके बारे में पता नहीं चल सका। कुल मिलाकर मजदूरों की श्रेणी में आने वालों की प्रति माह आय 4500 से लेकर अधिकतम 15000 हजार रूपए तक है।

हमने जितने भी मजदूरों से बात की उनमें से सभी ने बताया कि उन्हें ईएसआई, पीएफ मिलता है। तनख्वाह का भुगतान ठेकेदार करता है। इसका पेस्लीप मिलता है। कानूनन भुगतान के लिए मालिक ही जिम्मेदार है। पर यह काम ठेकेदार अपनी सुविधा के अनुसार करता है। काम की खोज में आने वाले मजदूरों के पास न तो बैंक अकाउंट होता है और न ही कंपनी की ओर से जारी नौकरी का कार्ड। इसका पूरा फायदा ठेकेदार उठाता है। काम हासिल करने व छोड़ने के चलते -जिसका सिलसिला मजदूरों को झेलना ही पड़ता है - पीएफ में कटा हुए पैसा हासिल करना एक टेढ़ी खीर है जिसे आमतौर पर ठेकेदार अपने हिस्से में कर ही लेता है। इसी तरह शुरूआती महीनों की आय के नगद भुगतान में कटौती कर लेता है। सेक्टर 37 में ओरिएन्ट क्राफ्ट की कुल पांच कंपनियां हैं जिनमें लगभग दस हजार मजदूर हैं। इन मजदूरों की कमाई की लूट का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। और निश्चय ही इसमें और भी सरकारी, गैर सरकारी तत्व अपना खेल खेल रहे हैं।

कंपनी में काम करने वाले मजदूरों की उम्र 18 से 35 के बीच है। आंख पर दबाव बनाने वाले इस काम में इसके बाद काम करने वालों की संख्या घटती जाती है। कहने को यहां सप्ताह में एक छुट्टी होती है। यह छुट्टी काम के दबाव में काट दी जाती है। ठेकेदार उत्पादन पर जोर देने के लिए लगातार दबाव बनाए रखता है जिससे काम का घंटा बढ़ता जाता है। कोई भी ऐसा मजदूर नहीं मिला जिसने काम के घंटे को दस से कम बताया हो और इस अतिरिक्त काम का भुगतान उसने हासिल किया हो। देर रात तक काम करने के बाद ही मजदूरों के सम्मिलित दबाव से ठेकेदार ना-नुकर के साथ कुछ देने के लिए तैयार होता है। फैक्टरी के भीतर कैंटीन है जिसमें भुगतान कर चाय व भोजन लिया जा सकता है। यहां काम करने वाले मजदूर आस-पास के शेष रह गए गांवों में एबेस्टस या पत्थर की पटिया वाले मकान में रहते है। आज भी ऐसे गांव की गलियां कच्ची हैं और गलियों में बिजली के तार झूलते हैं। पानी की सप्लाई नहीं है। बोरवेल- जमीन का निकाला हुआ निहायत ही खारा पानी पीने के लिए उपलब्ध है। यू आकार में बने मकान में कमरों की संख्या जितनी बन सकती है उतना बनाया जाता है। आठ-दस कमरों पर एक लैट्रीन होती है। एक कमरे में तीन लोग रहते हैं। इसमें हवा जाने का रास्ता दरवाजा और दरवाजे के उपर एक छोटा सा मोखा होता है। दिन में भी यहां अंधेरा रहता है। इन कमरों में यदि मकान मालिक चौथा आदमी पकड़ लेता है तो मजदूरों पर जुर्माना लगा देता है। इन रहने वाले मजदूरों के सामने मकान मालिक की शर्त होती है कि उस ‘लॉज’ के कमरे में उसके द्वारा खोली गई परचून की दुकान से ही वे सारी खरीदारी करेंगे। एक कमरे का किराया 1500 से लेकर 2500 रूपए प्रति महीना तक है। हरियाणा इंडस्ट्रीयल डेवेलेपमेंट की एक अघोषित नीति है जिसके तहत स्थानीय लोगों को कंपनियां नौकरी पर नहीं रखती और गांव को पहले के अधिकारों के साथ बनाए हुए भी है। इसके चलते मजदूरों की भाषाई, क्षेत्र व सांस्कृतिक स्तर पर स्थानीय लोगों के साथ साफ विभाजन हो जाता है। यह विभाजन काफी खतरनाक हद तक लगातार काम करता रहता है। इन गांवों में रहते हुए मजदूर अलगाव के साथ सिर्फ ‘रहता’ है। ठेकदारी प्रथा के चलते खुद मजदूरों के बीच एक विभाजन की स्थिति रहती है। इससे जीवन काफी दुरुह हो जाता है। ठेकेदार ही नहीं मकान मालिक तक मजदूर के इस हालात का काफी फायदा उठाते हैं। ऐसे में मजदूर गांव-जंवार के रिश्ते, भाषाई व सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अपनी जमीन तलाशत रहता है। जरूरत होने पर इससे सहयोग भी लेता है। ओरिएन्ट क्राफ्ट में घटी घटना के दौरान हरियाणा पुलिस का रवैया उतना आक्रामक नहीं रहा जितना आमतौर पर होता है लेकिन इसके तीन दिन बाद सेक्टर 58 में घटी घटना में पुलिस, स्थानीय निवासियों ने ‘बिहारियों को सबक’ सिखाने के लिए सम्मिलित हमला किया। मजदूरों को अधमरा होने तक मारा, पैसा-मोबाइल छीन लिया और 250 लोगों को पकड़ा जिसमें से लगभग 50 पर केस दर्ज कर पुलिस ने अन्य को 4 से 5 हजार रूपए तक लेकर छोड़ दिया।

रिहाइश व काम के इस हालात में मजदूर अपनी आय का किसी 60 प्रतिशत हिस्सा बचाता है। जिसे वह अपने गांव भेज देता है। गांव में ये पैसे घर बनाने, खेत के लिए बीज खाद, परिवार के सदस्य की शादी या दवा, परिवार चलाने आदि में खर्च हो जाता है। कोई भी ऐसा मजदूर नहीं मिला जो गुड़गांव या दिल्ली में रहने का ख्वाब देखता हो। सच्चाई यह है कि इन क्षेत्रों में 20 हजार रूपए तक की कमाई करने वाला व्यक्ति भी अपने पूरे परिवार के साथ बसने की सोच नहीं सकता। जाहिर है मजदूर यहां बस सकने की स्थिति में नहीं है। वह यहां के जिन रिहाइशों में रह रहा है वह उसे जिस स्तर के अलगाव में ले जाता है जिसके चलते न केवल काम की अस्थिरता साथ ही ठहराव की अस्थिरता भी बन जाती है। नोएडा, ओखला, गुड़गांव, फरीदाबाद, साहिबाबाद-गाजियाबाद के विशाल औद्योगिक फैलाव में रियल इस्टेट का कारोबार इतना बड़ा बन चुका है जिसमें मजदूरों को ठहरने के लिए भी जगह नहीं है। यह एक ऐसी औद्योगिक संरचना है जिसमें मजदूर करोड़ों की संख्या में- अनुमान के अनुसार 20 करोड़, लगातार आवाजाही कर रहा है। इस आवाजाही व मजदूर ‘होने’ पर भाषा, संस्कृति, धर्म और रिश्तेदारी का भार नीति निर्माताओं ने डाल रखा है। एक तरफ वे ‘मुक्त’ करने के लिए जनता के खिलाफ लगातार युद्ध लड़ रहे हैं तो दूसरी ओर ‘बस जाने के अधिकार’ से भी वंचित करने की नीति पर बड़े पैमाने पर अमल किया जा रहा है। शेष काम औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाली नीतियां कर ही दे रही हैं। जो बच जाता है उसे न्यायालय के आदेश पूरा कर दे रहे हैं। एक मजदूर से बातचीत के दौरान जब मैंने उसके सामने यह स्थिति रखी कि गांव में खेती-मजदूरी घाटे की है और यहां शहर में कंपनी में काम करने पर भी जितना मिलना चाहिए उससे भी काफी कम मिलता है। तो यहां काम करना भी घाटे का है, इन दोनों में से आप किसे चुनेंगे? उनका जवाब था: ‘‘शहर में जब तक काम है हाथ में पैसा है, भले ही कम मिलता है। पर यहां रहने में स्थिरता नहीं है। गांव में कुछ भी है वहां स्थिरता है। वहां कोशिश करने पर घर-दुआर-जमीन तो अपनी बनी रहती है।’’

ठेका मजदूरी प्रथा: जिसे खत्म होना था आज उसी का साम्राज्य है

1970 में कांट्रेक्ट लेबर रेग्यूलेशन एण्ड एबॉलिशन एक्ट यानी ठेका मजदूर नियमन व उन्मूलन अधिनियम, 1970 के तहत भारत सरकार ने इस ठेका प्रथा को खत्म करने के लिए कानूनी पहलकदमी ली। लेकिन मजदूर और औद्योगिक रिश्ते में यह प्रथा खत्म होने के बजाय बढ़ती ही गई। 1990 में उदारीकरण, नीजीकरण और वैश्वीकरण की औद्योगिक विकास की हवा का एक ही उद्देश्य था: मजदूरों का अधिकतम दोहन। एक के बाद एक श्रम आयोग बने जिसका एक ही उद्देश्य था इस एक्ट का उलघंन करने की पूरी छूट। जितनी ही बार श्रम कानूनों को लचीला बनाने की बात की गई उतनी बार मजदूरों को पूंजी का गुलाम बना देने की नीति को और अधिक उदार बना दिया गया। इस एक्ट के अनुसार ठेका मजदूरों का वहीं प्रयोग किया जा सकता है जिस काम की प्रकृति नियमित नहीं है और उसमें तीन या छह महीने से अधिक की अवधि तक का काम नहीं है। साथ ही ऐसे काम खतरनाक प्रकृति के नहीं हैं। ऐसी फैक्टरी जहां नियमित काम करने वालों की संख्या पर्याप्त हो और काम की प्रकृति नियमित हो वहां ठेका मजदूर प्रथा लागू नहीं होगा। इस एक्ट के तहत ठेकेदार उसे माना गया जो संस्थान के लिए उत्पादन या काम को करने के लिए सुविधा उपलब्ध कराता है और उस काम को पूरा करने के लिए मजदूरों के साथ उपस्थित होता है। ऐसे ठेकेदार का पंजीकरण होना चाहिए। मजदूरों को वेतन भुगतान की जिम्मेदारी फैक्टरी मालिक की है। साथ ही मजदूरों को कैंटीन, रेस्ट रूम व रहने की व्यवस्था, प्राथमिक चिकित्सा, पीएफ, इएसआई, पीने का पानी, शौचालय आदि की व्यवस्था करने के लिए ठेकेदार व मालिक उत्तरदायी है। मजदूरों को ठेकेदार द्वारा तय समय सीमा के भीतर मजदूरी का वितरण -जो निश्चय ही तय न्यूनतम सीमा से ऊपर होगा और फैक्टी द्वारा दिये जाने वाली मजदूरी से तय होगा - फैक्टरी मालिक द्वारा तय व्यक्ति के सामने ही होगा। जाहिर-सी बात है कि यह सब कुछ लागू नहीं होता है। और इसे न लागू करने के लिए सरकारी नीतियां पर्याप्त बढ़ावा देती हैं। इस एक्ट में कई सारे छेद हैं जिससे पूंजी के मालिकों के पक्ष में व्याख्या करना आसान हो जाता है। इस व्याख्या में एक्ट के सारे प्रावधान आसानी से बेकार साबित कर दिए जाते हैं।
ओरिएन्ट क्राफ्ट में सैकड़ों ऐसे मजदूर हैं जो पिछले दसियों साल से काम कर रहे हैं लेकिन नियमित नहीं हैं। इस कंपनी के बगल में जेजे वाल्या नाम की एक कंपनी है जो मजदूरों से छुटकारा पाने के लिए हर तीन साल पर नाम ही बदल देती है। ओरिएन्ट क्राफ्ट कंपनी में लॉग बुक्स दो तरह के रखे जाते हैं, जिसका फायदा मालिक व ठेकेदार दोनों ही उठाते हैं। यहां ठेकेदार ओरिएन्ट क्राफ्ट के लिए काम करने वाले मजदूरों को उपलब्ध कराने वाले से अधिक की भूमिका निभाता है: अधिक काम करने के लिए दबाव डालना-मानसिक और कभी-कभी शारीरिक, ओवर टाइम का पैसा नहीं देना, पीएफ के पैसे में हिस्सेदारी लेने या पूरा ही खा जाना, वेतन में से एक हिस्सा खाना, देय सुविधाओं को न देना, पैसे रोककर या नौकरी से निकलवा देने या नौकरी देने के नाम पर मजदूरों को अपने तरीके से काम के लिए विवश करना आदि। इसी तरह मालिक मजदूरों के प्रति किसी तरह का उत्तरदायित्व नहीं निभाता है। फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर ठेकेदार का आदमी है। नियमित मजदूरों को न रखने के पीछे मालिक की मंशा मजदूरों के प्रति किसी भी तरह के उत्तरदायित्व से बचना होता है। वह काम का लक्ष्य ठेकेदारों के सामने रखता है और इसके लिए जरूरी तैयारी-वर्कशाप आदि, ठेकेदार पर छोड़ देता है। ठेकेदार को इस काम में कोई रूचि नहीं रहती। वह मजदूरों की लगातार भर्ती-निकाल से इस काम को पूरा करता है। इसके चलते घायल होने वाले मजदूरों के प्रति न तो ठेकेदार जिम्मेदारी लेता है और न ही मालिक। मारुती सुजुकी में ऐसे ट्रेनीज का भरपूर दोहन, घायल होने या बीमार होने पर काम से निकाल देने की घटना का इतिहास पिछले दिनों काफी चर्चा का विषय बना रहा। तिरुपुर, तमिलनाडु में टेक्स्टाइल उद्योग में स्थिति और भी भयावह है। वहां ठेकेदारों ने सुमंगली या ऐसी ही योजना के तहत अविवाहित लड़कियों को काम पर रखते समय उन्हें होस्टल में रहने के लिए विवश करते हैं। काम करने वाली लड़कियों को उनके हाथ में वेतन नहीं दिया जाता है। उन्हें अपने मां-पिता के अलावा किसी से बात करने की मनाही है। साल में दो बार उनके रिश्तेदार मिल सकते हैं। उन्हें ठेकेदारों गाड़ी काम के स्थल तक ले जाती हैं और 12 घंटे काम कराकर वापस उसी होस्टल में छोड़ आती हैं। यह योजना 15 से 19 की लड़कियों का दोहन कर उन्हें तीन से पांच साल में दहेज के लिए 30 से 50 हजार रूपए देती हैं। साल में एक बार पांच दिन के लिए छुट्टी मिलती है। जाहिर है इस भुगतान में न तो न्यूनतम वेतन का कानून काम करता है और न ही काम के हालात की शर्तें। ठेकेदार, सुपरवाइजर, सुरक्षा गार्डों द्वारा इन लड़कियों का शारीरिक मानसिक शोषण की घटनाएं आमतौर पर होती हैं। जिसके चलते वहां आत्महत्या की दर आसाधारण तौर से अधिक थी। दो साल पहले की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन यह दर दो से अधिक थी। इसी तरह पिछले साल लुधियाना में 5 लाख से अधिक ठेका मजदूरों को आठ घंटे काम और काम की न्यूनतम शर्तों को पूरा करने की लड़ाई लड़नी पड़ी। और इसमें आंशिक सफलता ही मिल सकी।

2009 मीनाक्षी राजीव द्वारा प्रस्तुत ‘भारत में ठेका मजदूर अधिनियम: तथ्य रिपोर्ट’ में दिखाया है कि मजदूरों को तयशुदा न्यूनतम वेतन से 30 प्रतिशत कम भुगतान किया जाता है। जबकि ओवर टाइम को ठेकेदार अपने हिस्से में डाल लेता है। 66 प्रतिशत मजदूर अपना पीएफ हासिल नहीं कर पाते (www.igdr.ac.in)। ग्लोबल लेबर जर्नल के तीसरे अंक 2012 में अलेजांद्रा मेज्जाद्री का भारत के गारमेंट उद्योग पर पेश किए पेपर के अनुसार 1989-90 से 1994-95 के बीच संगठित मजदूरों का प्रतिशत 27 व असंगठित 6.20 प्रतिशत था। जो 1994-95 से 1999-2000 के बीच क्रमशः 2.3 व 14.9 प्रतिशत हो गया। यह आंकड़ा सरकारी है। इस दौरान संगठित क्षेत्र में रोजगार 17.30 से घटकर 3.80 पर आ गया जबकि असंगठित क्षेत्र में यह 0.7 से बढ़कर 15.20 प्रतिशत हो गया। नोएडा में किए गए सर्वे के अनुसार 80 प्रतिशत मजदूर अनियमित थे। 2005 में मास्टर व कटर आठ से दस हजार तक पा रहे थे पर हेल्पर या अनस्किल्ड मजदूर लगभग 2000 पा रहे थे।

गुड़गांव में और ओरिएन्ट क्राफ्ट में मजदूरों की भर्ती करने वाले ठेकेदारों में अधिक संख्या स्थानीय है पंजाब राज्य के हैं। कुछ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं। थोड़ी संख्या बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश से है। मूलतः मजदूरों के इलाका, धर्म, भाषा, रिश्तेदार आदि से जुड़े ठेकेदारों की संख्या कम है। यह अंग्रेजों के समय अपनाई गई ठेका प्रथा -जाबर प्रथा से यह इस मायने में भिन्न है। मजदूर व ठेकेदार में इलाकाई, भाषा, संस्कृति आदि का काफी फर्क होता है और आम तौर पर ठेकेदार भर्ती केंद्र खोलकर मजदूरों को काम उपलब्ध कराता है। हालांकि आज इस प्रथा को जिस तरह से प्रयोग में लाया जा रहा है उससे जाबर प्रथा के पीछे के उद्देश्य उतनी ही आसानी से पूरा हो रहे हैं। निश्चय ही इस बदलाव का अध्ययन करना चाहिए। ओरिएन्ट क्राफ्ट में ठेकेदार ने जब नसीम पर हमला कर उसे बुरी तरह घायल कर दिया उस समय इस कंपनी के प्रबंधकों ने तुरंत नसीम व अन्य मजदूरों के साथ वार्ता शुरू कर दिया। देर रात तक नसीम के परिवार, रिश्तेदार व इलाके से लगभग 150 से ऊपर लोग इकट्ठा हो गए। मजदूरों के बीच काम कर रहे और इस कंपनी के मजदूरों के साथ जुड़े हुए सक्रिय कार्यकर्ता ने बताया कि मसला मालिक और इन लोगों के बीच तय हो गया और शायद(!) कुछ हर्जाने के साथ मामले को रफा-दफा कर लिया गया। इस फैक्टरी के अन्य मजदूर इस प्रक्रिया से बाहर रहे।


भारत में जिस समय ठेका मजदूर प्रथा को नियमित व खत्म करने का अधिनियम लाया गया उस समय विश्व आर्थिक संकट से गुजर रहा था। अमेरिका और पूरा यूरोप महामंदी की मार से पीड़ित था। भारत पर इसका असर खूब था। यह वह समय था जब गांवों में मजदूर व गरीब किसानों ने बंधुआ मजदूरी-गुलामी की व्यवस्था के खिलाफ नक्सलबाड़ी का उद्घोष किया। इस समय तक निजी क्षेत्र काफी हद तक विकसित हो चुका था और पब्लिक सेक्टर की भूमिका काफी हद तक पूरी हो चुकी थी। छोटे-मोटे उद्यमों से प्राथमिक पूंजी जुटाने और शहरी समुदाय को एक छोटी में जीवन गुजारने की व्यवस्था की जरूरत उपरोक्त दोनों क्षेत्रों के लिए नहीं रह गई थी। इस एक्ट के छेद से विशाल पब्लिक सेक्टर व निजी क्षेत्र के हाथियों को लगातार आसानी से गुजर जाने दिया गया लेकिन छोटे उद्यमियों को छापेमारी कर तबाह करने का सिलसिला जारी रहा। ‘आपातकाल’ व इंदिरा के ‘राष्ट्रीयकृत समाजवाद’ ने 1980 तक एक ऐसा माहौल बना दिया था जिसमें फासीवादी ताकतें बड़े पैमाने पर छोटे उद्यमों को नष्ट-तबाह करती रहीं। 1977 में ही अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने कॉरपोरेट, साम्राज्यवादी देशों की सरकार व इनकी दलाल ट्रेड यूनियनों के बीच वार्ता से श्रम नीति में एक महत्वपूर्ण किया जिसके तहत दुनिया के स्तर पर कमोबेश ठेका मजदूरी प्रथा को खत्म करने के लिए प्रस्ताव लाया गया। वस्तुतः यह प्रस्ताव बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने लेबल पर काम करने वाले तीसरी दुनिया के देशों के लिए था। इन्होंने लेबल अपने पास रखा और श्रम को तीसरी दुनिया से आउटसोर्स किया। पूरा दक्षिण एशिया एसेम्बली लाइन बन गया जिसका अंत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लेबल और उनके रिटेल पर खत्म होता था। इस अकूत लूट के बल पर साम्राज्यवादी देश अपने यहां के श्रमिकों व मध्यवर्ग को कूपन काट कर पैसा बांट रहे थे और उन्हें संपन्नता में डुबा रहे थे। 1980 के दशक में विश्वबैंक व मुद्राकोष ने इन देशों को संरचनागत बदलाव के लिए बाध्य किया और इसका अगला चरण वैश्वीकरण, उदारीकरण, नीजीकरण के तहत पूरा किया गया। अफ्रीका, एशिया और लातिनी अमेरिकी देशों में श्रम को नियंत्रित करने के लिए इस कानून को लाया गया जबकि इन देशों में इस व्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा के लिए तैयारी हो चुकी थी। निजी व पब्लिक क्षेत्र अपने हित को तेजी से पूरा करने के लिए देशों की सरकारों द्वारा इसे स्वीकार किया जा चुका था। यह अकारण नहीं है कि अमेरिका को फासिस्ट मोदी में बिजनेस मैन दिखाई दे रहा है, जिसके गुजरात में स्थित रिलायंस के कपड़ा उद्योग में मजदूरों की तनख्वाह में पिछले दस सालों में मात्र 1000 रूपए की वृद्धि हुई। यह 5500 से बढ़कर 6500 हुई है। 1980 तक इस तबाही ने इतना काम कर दिया था कि रिलांयस का टेक्सटाइल उद्योग खड़ा हो सके। और मुम्बई मुकेश अंबानी का हो सके। 1984-85 तक तबाह बुनकरों, कारीगरों आदि से नया टेक्सटाइल उद्योग खड़ा हुआ। 1990 के बाद तो सरकार जितनी ही लचीली हुई तबाहियों के मंजर पर उतने ही नए उद्योग खड़े होते गए। 1970 में भी कोयला खदानों में बच्चे काम करते थे। ठेका प्रथा इन कोयला खदानों से लेकर एयर इंडिया की उड़ानों तक में बना रहा। आज भी कर्नाटक से लेकर झारखंड व छत्तीसगढ़ में इस सिलसिले को देखा जा सकता हैं। आज असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की कुल मजदूरों की संख्या 90 प्रतिशत से उपर है। और जिन्हें संगठित क्षेत्र का मजदूर माना जा रहा है वह भी कितने संगठित हैं, इसका अध्ययन करने की जरूरत है। 

मजदूर संगठन की चुनौतियां

मजदूर आंदोलन पर काम कर रहे मेरे दो मित्र सेक्टर 58 की उस साइट पर जाना चाह रहे थे जहां से गिरकर एक मजदूर की मौत हो गई थी और इससे गुस्साये मजदूरों ने पुलिस की गाड़ी फूंक दी और साइट ऑफिस पर हमला कर तोड़-फोड़ किया। जाने के समय वे रास्ता भटक गए। वे रास्ते में आने वाले रियल एस्टेट की विभिन्न साइटों पर पूछते हुए जा रहे थे कि क्या यहां कोई मजदूर गिरकर मरा है? उन्होंने बताया कि हर एक निर्माणाधीन साइट पर ऐसी घटना हुई है। मानेसर से लेकर ग्रेटर नोएडा तक लगभग 150 किमी के ऐसे निर्माणाधीन स्थलों पर हो रही मौतों की आप यदि कल्पना करें तो एक भयावह दृश्य खड़ा हो जाएगा। लाखों मजदूरों ठेकेदारी प्रथा के तहत काम कर रहा है और यहां टेक्सटाइल उद्योग से कहीं अधिक गुलामी है।

ओरिएन्ट क्राफ्ट में काम कर रहे मजदूरों से बातचीत के दौरान एक मजदूर न चुनौती रखा: ‘आप मजदूरों को एक कर दीजिए। जिस दिन से वे एक हो जाएंगे उस दिन से फैक्टरी में ठेकेदारों की नहीं चलेगी।’ एक होने का सिलसिला कैसे शुरू हो, यह एक कठिन चुनौती है। मजदूरों के अपने-अपने ठेकेदार हैं और उससे उपजे अलग अलग हित। इसी तरह काम की विशिष्टता के आधार पर विभाजन है। सांस्कृतिक व क्षेत्रीय विभाजन है। एक फैक्टरी के भीतर ठेकेदारी प्रथा यानी नौकरी की अनिश्चितता के चलते मजदूर द्वारा पहलकदमी लेने की समस्या है। ठेकेदारों व मालिकों के गुंडों और स्थानीय स्तर के रोजमर्रा के दबाव अलग से नकारात्मक काम करते हैं। इस हालात में मजदूरों की एकजुटता का मसला फैक्टरी के बाहर व भीतर दोनों ही स्तर पर है। इससे भी बड़ा मसला सरकार व प्रशासन द्वारा अपनाई जा रही नीतियां हैं। आवास, सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम वेतन व ठेका प्रथा से मुक्ति जैसा मसला फैक्टरी के भीतर व बाहर दोनों का ही है। मजदूर आंदोलन एक व्यापक पहलकदमी की मांग कर रहा है। जिसका एक तार गांव से जुड़ा हुआ है तो दूसरा शहर से। यह बहुत-से समुदायों के लिए जीवन-मरण के प्रश्न के तौर पर खड़ा है। चंद दिनों पहले मालेगांव पर आई एक रिपोर्ट के अनुसार वहां जी रहा मुस्लिम समुदाय जीवन और मौत के बीच खड़ा है। इसी तरह सूरत, बड़ोदरा जैसे शहर उड़ीसा के कई आदिवासी समुदायों के लिए चंद रोटी के जुगाड़ का माध्यम है। उनकी मूल रिहाइश को नई आर्थिक नीति ने खा लिया है। मजदूरों की बड़ी संख्या जाति, इलाका, समुदाय, धर्म, राष्ट्रीयता आदि के साथ जुड़ी हुई है और इस आधार पर वह विभाजित भी है। मजदूरों का यह बना हुआ सामुदायीकरण जिस व्यापक एकता की मांग कर रहा है और उसके लिए जिस व्यापक पहलकदमी की जरूरत है वह निश्चय प्रगतिशील और क्रांतिकारी ताकतों की व्यापक एकजुटता से ही संभव है। मजदूर संगठन इन चुनौतियों के मद्देनजर ही बन सकता हैं।
(हाशिया से साभार)

3 टिप्‍पणियां:

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