01 July 2012

जेल डायरी: अरूण फरेरा.


दूसरा भाग
हम बदनसीब थे कि जेल में अलग से आए, लेकिन संयोग से अगर कोई क़ैदी किसी वरिष्ठ जेल अफ़सरों के आने या जाने के समय दरवाज़े पर तलाशी का इंतज़ार कर रहा है तो वह औपनिवेशिक कालीन समारोह का गवाह बनने का विशेषाधिकारी होता है। वरिष्ठ जेलर और अधीक्षक से दरवाज़े से घुसने के लिए नीचे झुकने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतः इन साहबों को सिर ऊँचा ताने गुज़रने के लिए मुख्य दरवाज़ा झूलते हुए खुलेगा। जब वे दूर से ही दिख जाते हैं तो दरवाज़े पर तैनात सुरक्षाकर्मी चेतावनी का फ़रमान चीख़ेगा: “सावधान सभी!” सारे कर्मचारी सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएँगे और सभी छोटी, मामूली ज़िंदगियाँ निगाहों से दूर कोनों में दुबक जाएँगी या (नहीं छुपने पर) उनकी पीठों और पिछवाड़ों पर लात-घूसों की बौछारें शुरू हो जाएँगी।
अधिकतर नए अहमदों को फिर एक दरवाज़े से सटी बैरक में ले जाया जाता है, जहाँ उन्हें किसी निर्धारित बैरक में भेजे जाने से पहले एक या दो रातें गुज़ारनी होती है। इंतज़ार का यह दौर जेल कर्मचारियों, सज़ायाफ़्ता वार्डरों, भीतरी लुटेरों के गैंगों और अन्य हमलावरों को नवीनतम गिरफ़्त में आए व्यक्ति से, वे जो कुछ लूट-खसोट सकते हैं वह लूटने की अनुमति देता है। मध्य और ऊच्च वर्ग के प्रवेशक आसान निशाना होते हैं। उन्हें जेल-ज़िंदगी के ख़ौफ़ों की काली कहानियों से और धमकियों को-ज़ाहिर-न-करने के लिए पुचकारा जाता है। नौजवान लड़के मुफ़्त श्रम का और बतौर यौन खिलौना निशाना बनते हैं। संपर्क बनाए जाते हैं और नियमित बैरक में जाने पर बढ़िया सुविधाएँ सुनिश्चित करने के लिए सौदेबाज़ी की जाती है।
अगला चरण मुलाइजा या छानबीन-की-प्रक्रिया होती है। नए क़ैदियों को किसी सज़ायाफ़्ता वार्डर या जेलर द्वारा जेल अनुशासन के मूल्यों पर भाषण पिलाया जाता है। हर क़ैदी के पहचान-चिह्न को दर्ज़ किया जाता है और अधीक्षक के नेतृत्व वाले जेल-देवताओं के जत्थे के सामने पेश करने से पहले उनकी तौल, माप ली जाती है और एक डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक द्वारा उनका परीक्षण किया जाता है। हर क़ैदी को शरीर में लटकाए रखने के लिए एक तमग़ा दिया जाता है जिसमें उसका क़ैदी नंबर और उसके ख़िलाफ़ दर्ज़ मामलों की सूची होती है। अपराध का वर्गीकरण कैसे किया जाएगा, और जेल में उसके साथ, कुछ हद तक, कैसे सलूक किए जाएँगे, ये तमग़ा इस बारे में आधार निर्मित करते हैं। 
क़ानून की घोषणा, कि आरोपी व्यक्ति तब तक निर्दोष होता है जब तक कि वह दोषी साबित न हो, के बावजूद क़ैदख़ाने की दीवारों के पीछे इन सुविचारों का कोई अर्थ नहीं होता। जेल अधिकारियों के लिए पुलिस के आरोप ही, मुक़दमे का इंतज़ार कर रहे लोगों को, सज़ा देने का पर्याप्त सबूत होते हैं। कथित बलात्कारी और होमोसेक्सुअल्स, जेल कर्मचारियों के प्रोत्साहन पर अन्य क़ैदियों और अधिकारियों के हमलों का निशाना बनते हैं। हत्या के आरोप में बंद लोगों को सज़ायाफ़्ता के यूनीफ़ॉर्म पहनने को विवश किया जाता है और उन्हें एक विशेष ‘हत्या बैरक’ में डाल दिया जाता है। अपनी देशक्भक्ति प्रदर्शित करने के लिए, कई जेल अधीक्षक व्यक्तिगत तौर पर आतंकवाद के आरोपी लोगों की पिटाई करते हैं। 
मुलाइजा के पहले, प्रक्रिया के अनुसार नए प्रवेशकों को नहाना होता है। हालाँकि, साबुन और पानी की कमी इस नियम की महत्वपूर्ण प्रथा का उल्लंघन करती है। एवज़ में, अधिकतर नए अहमद नाई कमान के हाथों तुरत-फुरत-तैयार होने के लिए भागदौड़ करते हैं। नाई कमान क़ैदियों के एक समूह से ही बनती है। नए अहमदों का अगला विरामस्थल बड़ी गोल होता है। यह नागपुर जेल का वह क्षेत्र है जहाँ मुक़दमे का इंतज़ार कर रहे क़ैदी रहते हैं। प्रत्येक के लिए एक बैरक निर्धारित कर दी जाती है। सैद्धांतिक तौर पर, यही वह जगह है जिधर मुझे जाना था। लेकिन मेरे मामले में, सारी प्रक्रियाएँ भाड़ में झोंक दी गईं। पुलिस द्वारा उठाए जाने के बारह दिनों बाद, जल्दबाज़ी से मुझे अंडा बैरक में डाल दिया गया, क़ैदियों वाला लिबास दिया गया, और शाम 4 बजे खाने के लिए बेसन और रूखी-सूखी रोटियाँ देने के बाद मुंबई के लिए ट्रेन में बैठा दिया गया।
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फिर नार्को-टेस्ट से पहले (हिरासत में लिए गए व्यक्ति के) कई मेडिकल परीक्षण होते हैं। प्रत्यक्षतः तो यह परीक्षण यह पता लगाने के लिए होते हैं कि वे इन फ़ोरेंसिक प्रक्रियाओं से गुज़रने के लिए स्वस्थ हैं कि नहीं। हक़ीक़त में, ये परीक्षण क़ैदी के प्रतिरोधक स्तरों को तय करते हैं और अधिकारियों को ये हिसाब लगाने में मदद करते हैं कि आरोपी को पूरी तरह से नष्ट किए बग़ैर उसके शरीर में कितनी मात्रा में ड्रग, सोडियम पेंटोथाल, डाला जा सकता है। ये नार्को परीक्षण मुंबई के जेजे के ऑपरेशन थियेटर, सर्जरी सुविधा के बैकअप वाले एक सरकारी अस्पताल, में किए गए। यह इसलिए क्योंकि सोडियम पेंटोथाल हृदय-गति को—घातक तौर पर—धीमा कर सकता है।
ड्रग एक-एक बूँद, नियंत्रित गति से डाला जा रहा था ताकि मैं (एक लंबे) समय के लिए अर्ध-बेहोश रहा आऊँ। फ़ोरेंसिक मनोवैज्ञानिक ने सवाल पूछना शुरू किया और बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही थी। हालाँकि, पुलिस को प्रयोगशाला में घुसने की इजाज़त नहीं थी, लेकिन फ़ोरेंसिक विशेषज्ञ ख़ुद-ब-ख़ुद पुलिसिया क्षमता से, मेडिकल मूल्यों का अनादर करते हुए और मेरे स्वास्थ्य को पूरी तरह ठेंगा दिखाते हुए, ड्रग का इस्तेमाल कर रहे थे। पुलिस ने मनोवैज्ञानिक के लिए मुझसे पूछे जाने सवालों की सूची तैयार की थी: कि मैंने हथियार और विस्फोटक कहाँ रखे हैं, कि क्या मैं संदेहास्पद संगठनों या लोगों से जुड़ा हुआ था। उनमें से कुछ सवाल मुझे बाद में याद आए। यह जगने के बाद कुछ कुछ सपने को याद करने जैसा था। सारे विवरणों को एकदम सटीक तौर पर मैं नहीं याद कर पाया, लेकिन मोटी मोटी बातों को मैं नहीं भूला। 
लौटने के एक हफ़्ते बाद, मैं नक्सल हिंसा में शामिल होने के अन्य पाँच मामलों में फंसा दिया गया। पुलिस को अन्य बीस दिनों की हिरासत मिल गई। इसका मतलब था कि मैं गोंदिया जिले के पुलिस थाने में फिर पुलिस के हाथों सुपुर्द कर दिया गया। यह सुपुर्दगी और अधिक नींद हराम करने के लिए, और अधिक यातना देने तथा और अधिक पूछताछ के लिए थी। मैं ख़ुशक़िस्मत था कि अपेक्षाकृत कम में ही छूट गया। मेरे दो सह-आरोपियों के गुदा में पुलिस ने पेट्रोल डाल दिया, नतीजतन कई दिनों तक उनके गुदा से ख़ून बहता रहा। उन्होंने मेरे शरीर की नस नस मरोड़ी, चौड़ी पट्टी के बेल्ट, महाराष्ट्र पुलिस दुलार से जिसे “बाजीराव” कहती है, से कोड़े लगाए, और मेरे जबड़े तोड़ दिए। 
अब तक, मुंबई के नार्को-एनालिसिस परीक्षणों के नतीजे आ गए थे। पुलिस मामले के लिए वे कुछ वज़नदार चीज़ पाने में नाकाम हुए, अतः अधिकारियों ने बंगलौर की प्रयोगशाला से अन्य चरण के परीक्षण कराने के लिए अदालत से गुपचुप आदेश हासिल कर लिए। यहाँ के परीक्षण शातिर एस. मालिनी द्वारा किए गए, जिसे बाद में, जब यह पाया गया कि उसने काम पाने के लिए झूठे काग़ज़ात जमा किए थे, तो नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया। मालिनी को समूचे भारत में पुलिस बल ख़ूब आदर-भाव देता था। उसका दावा था कि उसने 2006 के मालेगांव धमाके, मक्का मस्जिद धमाके, और सिस्टर अभया के मामले की गुत्थी सुलझा दी है। बरसों बाद, यह प्रमाणित हुआ कि इन सभी मामलों की ग़लत जाँच की गई थी। नार्को के दौरान उसने मुझे चांटे मारे और गालियाँ दीं, मेरे कान में चिमटियाँ चुभोई, और मुझे और मेरे सह-आरोपी को बेहोश नहीं होने देने के लिए उसने बिजली के झटके तक दिए।
लेकिन यह भी कुछ ख़ास काम नहीं आया। अतः पुलिस ने मुझे दो और मामलों में फंसा दिया। उन्होंने मुझसे दो हफ़्ते और यातनादेह पूछताछ की। गिरफ़्तारी के बाद का मेरा पहला साल ऐसे पूरा हुआ। पुलिस मुझे नए मामलों में फंसाती रही, पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत हासिल करती रही, मुझ पर यातना के भयानक तरीक़े आज़माती रही। इक़बालिया बयान हासिल करने में नाकाम रही। और अन्य मामले में सिर्फ़ फंसाने के लिए मुझे जेल वापस भेज देती। जब इन मामलों में पुलिस ने अंततः आरोप-पत्र दाख़िल किए सिर्फ़ तभी मेरी एक नई दिनचर्या शुरू हुई। इनमें से एक ये थी कि इन मामलों की सुनवाई के इंतज़ार में मुझे हफ़्ते या कई बार रोज़ाना अदालत के चक्कर लगाना होता था। अब मेरे पास ये सुविधा थी कि मैं जेल की ज़िंदगी के रागों को क़रीब से सुन सकता था।
जेल की सुबह टंकी या हौज़ के लिए पागलपन भरी आपा-धापी लेकर आती थी। 60×3 फ़िट के हौज़ के किनारे नहाने वाले चार सौ लोग खड़े होते थे, मतलब कि ठीक ठाक समय में भी उन्हें जल्दी-जल्दी पानी भर उलीचना होता था। गर्मियों में, जब कुएँ का पानी ख़त्म हो जाता और यह लगभग सूख जाता तो यह आपा-धापी और तेज़ हो जाती थी। जेल-विद्या लोगों को यह बताती थी कि कौन पर्याप्त तेज़ नहीं है, और कि बाजू वाले के शरीर से चू रही बूंदों से (अपने शरीर का) साबुन धोना होता है। दांतों की सफ़ाई, नहाना, और जांघिया धोना, ये सब कुल 10 मिनट के भीतर करना होता था, वरना किसी की नियति हौज़ की तलछटी में हाथ ही फेरते रहने की हो सकती थी।
पैख़ाने और नहाने के लिए सुबह की भीड़ से मोल-भाव करने में सिर्फ़ तेज़ी ही नहीं, अक़्ल की भी ज़रूरत पड़ती है। यह ख़ासतौर से उन बैरकों के लिए महत्वपूर्ण होता है जिनमें अंडरट्रायल्स की बड़ी संख्या हो, और जिन्हें अदालत में हाज़िर होने के लिए जल्दी तैयार होना होता है। दो घंटे से भी कम समय में, 6.45 पर बैरक के खुलने से लेकर और अदालत में 8.30 बजे तक हाज़िर होने तक, उन्हें न सिर्फ़ नहाना और पूरी तरह तैयार होना होता था बल्कि हाज़िरी के लिए पंक्ति में खड़ा होना पड़ता था, और तब 7 बजे चाय लेनी होती थी, 7.30 बजे नाश्ता करना होता था, और 8 से 8.30 के बीच दोपहर का खाना खाना होता था।  
नाश्ते लेने के महज आधे घंटे के भीतर दोपहर का खाना खाने के बेतुकेपन से तालमेल बिठाना मेरे शरीर के लिए कत्तई आसान न था। जल्दी खाना देना, जैसा कि अन्य जेलों में भी था, बिल्कुल क्रूर उपेक्षा का नतीजा था। अंडरट्रायल्स का सुबह 8.30 बजे से शाम 6.30 बजे तक का समय अक्सर अदालत के रास्ते में, अदालत में, और वापस जेल आने में बीतता है, लेकिन जेल के अफ़सरान उनके लिए बाद में दोपहर को खाने के लिए खाना पैक कराना उचित नहीं समझते हैं। उच्च न्यायालय के आदेश कि ऐसा किया जाना चाहिए की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। लेकिन जब से जेल की नियम-संहिता, जो कि जेल की सारी गतिविधियों को दिशा-निर्देश देता है, में यह ज़िक्र हुआ कि क़ैदियों को क्या खाने दिए जाने चाहिए तो अफ़सरान अंडरट्रायल्स को दोपहर का खाना सुबह 8 बजे बाँटकर अपनी ख़ानापूर्ति कर लेते हैं। लेकिन कम संसाधनों के पीछे भागने वाले कई सैकड़े लोगों में से जब आप एक होते हैं, तो सामान्यतः कुछ चीज़े आप तक आते आते चुक ही जाती हैं—या तो आप शौच कर पाएँगे या नहा पाएँगे, या तो नाश्ता कर पाएँगे या फिर दोपहर का खाना।
खाने का बँटवारा ऊर्जावाना तापा कमान द्वारा किया जाता है। यह क़ैदियों के कई समूहों में से एक कमान है जो जेल को कार्यरत रखने में एक अहम भूमिका निभाती है। तापा कमान सुबह 6.45 पर बैरक खुलने से लेकर, 5 बजे, अपने बाड़े में बंद किए जाने तक, खाने के बड़े-बड़े बर्तनों—तापाओं, जिससे कि उन्हें यह नाम दिया गया है, को लेकर इधर-उधर भागते हुए काफ़ी व्यस्त रहते हैं। अपने बचे हुए हिस्सों की मांग करते दो हज़ार पेट एक तनाव भरे लम्हे पैदा पर सकते हैं, और तापा श्रमिक काफ़ी जल्दी में होते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि नियमावली में निर्धारित प्रत्येक सामग्री समुचित मात्रा में हर बैरक तक पहुँचे और सुबह की गिनती में मौजूद हर क़ैदी को निश्चित निर्धारित मात्रा में मिले।
इस इकाई के भीतर, तापा कमांडर का पद काफ़ी फ़ायदे का सौदा हो सकता है। कमांडर सामान्यतः एक सज़ायाफ़्ता वार्डर, एक लंबे समय से कार्यरत क़ैदी होता है जिसे अन्य श्रमिक क़ैदियों पर निगरानी रखने का काम दिया गया होता है। इसके लिए उसे 35 रुपए रोज़ाना का भुगतान किया जाता है। लेकिन वह अपने नियंत्रण के संसाधनों को बेचकर बाजू से अच्छी ख़ासी रक़म वसूल कर सकता है। बँटवारे में हेर-फेर कर, चीज़ों को खुले बाज़ार में बेचकर वह एक अतिरिक्त मूल्य संचित कर लेता है। जो भाई उसे पैसे देते हैं उन्हें अच्छा और ज़्यादा खाना मिलता है। लेकिन जेल-अधिकारियों और जेल की रसोई के लिए राशन आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों के बीच होने वाले समझौतों के आगे तापा कमांडर के विशेषाधिकार फीके पड़ जाते हैं। जेल के कई कर्मचारी जेल आपूर्तियों से चीज़ें अपने परिवार का पेट भरने के लिए अपने घर ले जाने में सक्षम होते हैं। ऐसी चोरियों का नतीजा क़ैदियों को परोसे जाने वाले भोजन में कटौती होती है। जेल-संहिता में निर्देशित वज़न शर्तों को पूरा करने के सब्ज़ियों के सबसे सड़े-गले भाग तक क़ैदियों की थाली में जगह पाते हैं—इसमें यहाँ तक कि वह रस्सी भी शामिल होती है, जिससे आपूर्ति करने वाले लोग सब्ज़ियाँ बाँधते हैं।
परिणामतः, हमने अक्सर स्थितियों को बेहतर बनाने की कोशिशें की। इसका एक तरीक़ा खाने को जेल-कैंटीन से ख़रीदे हुए मिर्च-लहसुन के पॉवडर और अचार-मसालों से दुबारा पकाने का था। इसे हांडी की प्रक्रिया कहते थे। अल्युमिनियम की थाली को खाना बनाने के बर्तन की तरह इस्तेमाल किया जाता। ईंटों के सहारे या अल्युनिमियम के अन्य बर्तन से चूल्हा बनाया जाता। ईंधन के लिए अख़बारों और सूखी रोटी के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता, लेकिन कई बार प्लास्टिक के टुकड़े, टहनियाँ, पुराने कपड़े, जेल से चुराए गए बिस्तर और यहाँ तक कि क़ानूनी काग़ज़ातों की कॉपियाँ भी आग के हवाले कर दी जातीं।
‘हांडी’ शब्द का इस्तेमाल क़ैदियों के उस समूह के लिए भी किया जाता था जो साथ-साथ अपना भोजन करते थे। वे कैंटीन से ख़रीदी गई चीज़ों को आपस में बाँट लेते थे और अन्य बातों से बेफ़िक़्र रहते थे। बैरक में, हांडी समूह के सभी सदस्य एक ही जगह पर सोते थे। हालाँकि, कोठरी में मेरे जैसे आदमी के लिए हांडी समूह [में शामिल होना] संभव नहीं था—हमें अपनी कोठरी में अकेले बंद कर दिया जाता था, अतः हम रात का खाना साथ में नहीं खा सकते थे। फिर भी, हमने ऐसा तरीक़ा ईजाद किया कि एक कोठरी में बनाया गया खाना दूसरी कोठरियों तक पहुँचाया जा सके। एक रणनीति के ज़रिए इसका प्रबंधन किया गया, जिसे गाड़ी कहा जाता था। कपड़े के टुकड़ों पर खाना रखा जाता था और ज़मीन के सहारे कपड़े को खिसकाते हुए, सूती से बने स्लेज़ के जैसे, एक कोठरी से दूसरी कोठरी में खींचा लिया था।  
मांसाहार भोजन पर महाराष्ट्र सरकार की लगभग संपूर्ण पाबंदी भी क़ैदियों के गुणों और दक्षता को चुनौती देती है। गिलहरियों, पक्षियों, छुछूंदरों को फांसने, उनका शिकार करने और इसी क़िस्म के अन्य छोटे खेल एक गंभीर पेशा होते हैं। यहाँ तक कि टिड्डे और जेल में कभी कभार झुंड के झुंड आने वाले अन्य कीड़े भी इकट्ठे किए जाते और उन्हें धूप में भूनकर खाया जाता या चटनी बनाई जाती थी। कई बार पक्षियों को फांसने के लिए कपड़े की जालियाँ काम आती थीं। लोग गुलेल भी बनाते थे। वे निकास नालियों और अन्य निकासों में लगाए गए जालों से कई बार छुछूंदर को फांस लेते। लेकिन गिलहरी और चूहे, दोनों के लिए सबसे लोकप्रिय तरीक़ा हाथ-और-छड़ी से शिकार का होता था। अगर किसी एक ने देखा, तो सभी को चिल्लाते हुए आवाज़ दी जाती और शिकारी शिकार को किनारे लगा देते।
एक मोटी तगड़ी छुछूंदर— जो स्वाद में सुअर के मांस जैसे लगती है—मांस खाने वाले एक समूह के लिए अच्छी-ख़ासी दावत होती थी। जल्दी ही इसके बाल साफ़ किए जाते, काटा जाता और जेल कर्मचारियों और उनके मुख़बिरों की आँखों से दूर किसी कोने में पकाया जाता था। शौचालय के पीछे की जगह सुरक्षित मानी जाती थी। शौचालय साफ़ करने वाले डंडा कमान की देखरेख में यह सब किया जाता था, जो कि सर्वाहारी और शिकार को दौड़ाने और पकड़ने, दोनों में एक उत्साही भागीदार होते थे। ये दल जब भोज के लिए घेरे में बैठता, तो बातचीत अच्छे वक़्त की ओर मुड़ जाती थी। कोई जंगली सुअर की बात करता तो कोई ख़रगोश को याद करता। तब ऊँची दीवारें और लोहे की सलाखें पीछे छूटती हुई नज़र आती थीं। चीज़ें इतनी बुरी नहीं थीं, जितना कि वे दिखती थीं।   
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हर बैरक का अपना एक भाई होता था, कमज़ोर लोग जिसके क़रीब होने का दावा करते या या चाहत रखते थे। जो लोग सफल हो जाते वे, एक जोड़ी बिस्तर या सफ़ाई के सामान मिल जाने के रूप में, कुछ परेशानियों से निजात पाने की उम्मीद करते थे। यद्यपि, जेल की नियमावली कहती है कि दिए गए बिस्तर में एक दरी, एक चादर, सर्दियों में सूत-ऊन के दो कंबल और खोली के साथ एक तकिया शामिल रहना चाहिए। लेकिन नए अहमद अगर मैला-कुचैला एक कंबल भी पा जाते हैं तो ख़ुद को भाग्यशाली मानते हैं। 
जेल में, गहरी नींद सोने वालों को भी कभी कभी अपनी रात दूसरों के लिए समर्पित करनी पड़ती है। जब हर क़ैदी अपने निजी सपनों में खोए रहते हैं, बाजू में सो रहे लोगों के कमरे से सिसकियाँ, शोक और विलाप के स्वर लगातार आते हैं। जगे हुए लोग अक्सर रोने वाले को ख़ामोश करने के लिए चाटा जड़ देंगे। लेकिन सभी दुखी आत्माएँ इतनी आसानी से नहीं कुचली जा सकतीं। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो ठहाकों से रात की सहम भरी चुप्पी को चीर देते हैं, ऐसे लोगों को ख़ामोश करने से पहले उन पर ज़्यादा शक्तिशाली हमले (उपचार) किए जाते हैं। चीख़ने-चिल्लाने वाला व्यक्ति, जिसे वास्तव में मनोवैज्ञानिक मदद की ज़रूरत होती है, मामूली सी सहानुभूति भी नहीं पाता। जब सारी बैरकों के लोग उठ जाते हैं तो कुछ बदमाश क़िस्म के लोग उसे पीटने और उसपर लात-घूसे बरसाने के लिए रात में तैनात सुरक्षाकर्मी के साथ हो लेते हैं। कई लोग मानते हैं कि उस आदमी को अपने आग़ोश में लेने वाले शैतान को उसके शरीर से भगाने का यही एकमात्र ज़रिया होता है। थोड़ी देर बाद, वह ख़ामोश हो जाता और पहले से ज़्यादा सन्नाटा उतर आता। जैसे [चुप कराया गया] क़ैदी अपने ख़ुद के शैतान से छिपने के लिए ख़ामोशी में दफ़न हो जाता है, नींद (वैसे ही) दुर्ग्राह्य हो जाती है। जब क्षण और मिनट कांटे की तरह गड़ रहे होते हैं, समय बताने के लिए कोई घड़ी नहीं है। ऐसे में, एक घंटा और ज़ब्त होता है, कभी नहीं लौटने के लिए। 


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