हर बार आसमान में कुछ नया देखने को होता है:-

न रायपुर रायपुर है. न मैं, मैं हूँ. देश में कई रायपुर हैं और कई मैं. मै दूसरा बिनायक सेन है,तीसरा अजय टी.जी.,या कोई और आदमी जो रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए भूल जाता है आदमीयत की तमीज.घर से निकल कर वापस न लौटने का खौफ़ लिये देश की सुरक्षा से असुरक्षित, चलते-चलते अक्सर बदल देता है अपने रास्ते.कई बार सड़क के किनारे खडे़ पेड़ उसे देखते हैं हिकारत की नजर से और वह भर उठता है भय और संदेह से.पूरा शहर मै के लिये वर्जित प्रान्त है जहाँ उसका दमित जन के दमन के लिये दिये जा रहे तर्कों से असहमत होना, झूठे शांति अभियानों की खिलाफ़त करना उसे उग्रवादी बना देता है.सड़क पर आदमी की पहुँच से दूर मुख्यमंत्री का चेहरा उसे चिढा़ता है उसे देख मंत्री मुस्कराते हैं,मै होर्डिंग के नीचे से सिर झुकाकर निकल जाता है.चौराहे के दूसरे छोर पर पहुंच वह पीछे मुड़कर देखता है कि मुख्यमंत्री उसे देख रहा है. उसका चेहरा और चौडा़ हो गया है.बगल लगी होर्डिंग में एक आदिवासी महिला अपने कान से सटाकर मोबाइल से बात कर रही है.मोबाइल से बात करती महिला देश के विकास का बिम्ब है जो हर दूसरे चौराहे पर मौजूद है. सामने गांधी पंक्ति के इस आखिरी आदमी को देख खुश हैं या नाराज नहीं पता. उनकी आँखें नीचे झुकी हैं ठीक जमीन पर टिकी लाठी की नोक पर . इंदिरा का चेहरा खिला हुआ है , २००८ के आपातकाल को अनापातकाल समझती जनता को देख.एक पार्क में बैठकर मै लम्बी साँस खींचता आसमान की तरफ़ देखता हूँ और खारिज कर देता हूँ फ़र्नांदो पेसोवा को कि आसमान में एक बार देख चुकने के बाद देखने को कुछ भी नहीं बचता.एक आभासी दुनिया,शून्य में,आसमान में.जहाँ कुछ भी नहीं होता देखने पर हर बार कुछ नया होता है.एक नयी उम्मीद के साथ.

5 लोगों की टिप्पणियां:

2 July 2008 8:47 AM E-Guru Maya said...

लाख टके कि बात.
एक स्वप्न टूटे दूसरा गढो.

2 July 2008 12:00 PM अनुनाद सिंह said...

आपने मेरे ब्लाग पर श्री-लिपि का फाण्ट परिवर्तक की आवश्यकता के बारे में बताया था। आप श्री-लिपि का कौन सा संस्करण (२ या ३ या कोई और) का परिवर्तक चाह्ते हैं?

मुझे निम्नलिखित पते पर श्री-लिपि फाण्ट का कुछ टेक्ट भेज दीजिये । इसके साथ उसका यूनिकोड रूपान्तर भी भेजिये। इसके बिना परिवर्तक बनाना सम्भव नहीं होगा। टेक्स्ट कोई २०० शब्दों से अधिक का हो तो अधिक उपयोगी होगा।

मेरा इमेल पता है:

2 July 2008 12:02 PM अनुनाद सिंह said...

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मेरा इमेल पता है:

anunad@gmail.com

7 August 2008 9:09 PM अनिल रघुराज said...

अगर ये कविता नुमा गद्य आपने ही लिखा है तो वाकई बहुत दमदार है।

8 August 2008 12:14 PM Pramod Singh said...

अच्‍छे बिम्‍ब, साथी..