24 जनवरी 2013

वैकल्पिक राजनीति की टूटती उम्मीदें


-अभिनव श्रीवास्तव
अगर कुछ हद तक सरलीकरण का जोखिम उठाकर यह मान लिया जाये कि प्रत्येक आंदोलन राज्य व्यवस्था के प्रति कायम किसी असंतोष की उपज होता है और इसी की अभिव्यक्ति होता है, तो बीते एक साल में राष्ट्र स्तर पर उभरे आन्दोलनों और जनअसंतोष की उपलब्धियों और उसके देश की राजनीति पर इसके चलते पड़े प्रभावों पर एक सार्थक बहस करने की गुंजाइश बराबर बनी हुई दिखायी पड़ती है। इन आन्दोलनों और विमर्शों के साथ जुड़ी हुयी सबसे खास बात यह थी कि देश की जनतांत्रिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उदासीन रहने वाले शहरी मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इनके इर्द-गिर्द गोलबंद हुआ और सार्वजनिक दायरों की बहसों में प्रतिभाग करता नजर आया। वाम धारा के राजनीतिक दलों और प्रगतिशील जमात के लिए इन आन्दोलनों का उभार उलझन और किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति पैदा करने वाला रहा। 

आम तौर पर जल, जंगल जमीन की लड़ाइयों और वंचित तबकों की आवाजों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिनिधित्व प्रदान करने का दावा करने वाले वाम दलों के बीच आरंभ में इन मुहिमों को राजनीतिक समर्थन देने के लिए हिचकिचाहट का भाव रहा, लेकिन इन आन्दोलनों की तीव्रता और धमक बढ़ने के साथ ही सभी दल इन आन्दोलनों के साथ खड़े नजर आये। मुख्य धारा में और इससे इतर कई छोटे-बड़े औपचारिक वाम संगठनों ने इन मौकों अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने को विकल्प के तौर पर चुना और लगातार इन आन्दोलनों से जुड़े अंतर्विरोधों की ओर ध्यान दिलाया और उनके प्रति आलोचनात्मक रुख अख्तियार किया। चूंकि मुख्य धारा के वामपंथी दलों ने मध्य वर्ग की भीतर अपनी राजनीति तलाशने की कोशिश की इसलिये इन दलों के भीतर खुद एक तरह की बेचैनी और उथल-पुथल का माहौल दिखा, लेकिन इन दलों का नेतृत्व अपनी दृष्टि और समझ के आधार पर आंदोलनों के साथ खड़े रहने के फैसले पर कायम रहा. 

इस दौरान इन मुहिमों के अंतर्विरोधों और इनके प्रति आलोचनात्मक रवैये को इन आन्दोलनों को कमजोर करने वाली कोशिशों के रूप में देखा गया। ऐसा आग्रह उन सभी वामपंथी दलों की राजनीति पर हावी दिखता है जो इन मुहिमों के साथ खड़ी थीं। लेकिन क्या किसी आंदोलन की दिशा और उसकी राजनीति पर किसी भी किस्म के आलोचना की गुंजाइश को खत्म कर देना ठीक है? ये स्थिति खतरनाक है  और इस तरह के आग्रह पर बातचीत करना इस वक्त की एक बड़ी जरुरत है। रायसीना हिल पर जुटा आंदोलन कई वजहों से सार्थक था क्योंकि इसने कई मायनों में राज्य द्वारा किये जा रहे दमन के प्रति चुपचाप और अवसरवादी नजरिये के बरक्स एक प्रतिसंस्कृति और प्रतिरोध का माहौल पैदा किया। कई विश्लेषकों ने इस बात को रेखांकित किया कि इस आन्दोलनों में गोलबंद होने वाले युवा वर्ग ने किसी नेतृत्व को नहीं तलाशा। इस आंदोलन में वास्तव में कई ऐसी संभावनाये तलाशी जा सकती थीं और उन संभावनाओं को सही दिशा देकर न सिर्फ सरकार को उसकी जवाबदेही की भूमिका के दायरे में अधिक जिम्मेदार बनाया जा सकता था बल्कि उसकी वैधता पर कई तरह के बुनियादी सवाल भी लगाए जा सकते थे। 

उदाहरण के तौर पर सामूहिक बलात्कार के इस घटना के बाद उपजे विमर्श में महिलाओं के यौनिकता के शोषण की चर्चा बहुत हुयी और यह होनी भी चाहिये, लेकिन इसके साथ-साथ श्रम के स्तर पर जारी महिलाओं के शोषण की बहस को भी आगे बढ़ाया जा सकता था। इस बात को उठाने का मकसद यहां किसी भी तरह से यौनिकता के जारी शोषण की बहस को धुंधला बनाना नहीं है लेकिन जब तक इस बहस में महिलाओं के श्रम के स्तर पर जारी शोषण को नहीं जोड़ा जायेगा, तब तक महिला शोषण के खिलाफ राष्ट्र स्तर पर बने विमर्श के उस माहौल को व्यापक रंग प्रदान नहीं किया जा सकेगा और न ही ऐसे मामलों का सन्दर्भ लेने की कोई गुंजाइश बचेगी जिसमें स्वयं राज्य व्यवस्था दोषी पायी गयी हो। ठीक इसी तरह जब गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दिल्ली में हुई घटना के बाद निजी बस चालकों पर निगरानी रखने और उनके संबंध में जानकारी रखने जैसी घोषणा की तो बसों के बढ़ते निजीकरण पर सवाल उठाकर सरकार द्वारा अबाध गति से आगे बढ़ायी जा रही निजीकरण की नीति पर भी सवाल उठाये जाने चाहिये थे। इस तरह की कई संभावनायें इस मुहिम में तलाशी जा सकती थीं। लेकिन इस स्तर पर इस आंदोलन से हासिल हुयीं उपलब्धियों का मूल्यांकन करें तो यह लगता है कि इस मौके पर भी इन आंदोलनों में अपने राजनीतिक विस्तार की संभावनाएं तलाश रहे वामपंथी दल अपनी भूमिका का सही तरह से निर्वाह करने से चूक गये हैं। 

इस भूमिका का सही तरह से निर्वाह नहीं कर पाने के चलते सरकार जहां एक तरफ अपने आपको आंतरिक वैधता के संकट से बचा पाने में सफल हो गयी है वहीं दूसरी तरफ कई किस्म की प्रतिक्रियावादी धाराओं और ताकतों को भी खुद को मजबूती से स्थापित और संगठित हो जाने का मौका मिल गया है। यहां यह रेखांकित करना जरूरी हो जाता है कि शुरुआत से ही इन प्रतिक्रियावादी मांगों के पक्ष में बनते चले गये माहौल और कानूनी दायरों में पूरे विमर्श को धकेल देने की कोशिशों ने सरकार को कई तरह के कानूनों में मन-मुताबिक़ फेरबदल करने का मौका उपलब्ध करा दिया है। पिछले दिनों बाल विकास मंत्री कृष्ण तीरथ ने सामूहिक बलात्कार में शामिल सत्रह वर्षीय किशोर को सामान्य अपराधी की तरह सजा दिलवाने के लिये किशोर न्याय बाल सुरक्षा अधिनियम 2000 में संशोधन करने की जो बात कही, वह ऐसी ही कोशिशों का नतीजा है। अगर सरकार इस अधिनियम में संशोधन करने में सफल हो जाती है तो यह देश में बाल अधिकारों के लिये लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गयी उपलब्धि को नुकसान पहुंचाने वाला होगा। 

यह आश्चर्य की बात है कि इन आंदोलनों से जुड़े वामपंथी दल अपनी राजनीतिक स्थिति और अपनी राजनीति की दिशा का संतुलित मूल्यांकन नहीं कर पाने के चलते यह नहीं देख पा रहे हैं कि इन कोशिशों में उनकी राजनीतिक स्थिति का फर्क धुंधला होता जा रहा है और कई मौकों पर वह कई किस्म की प्रतिक्रियावादी धाराओं के साथ गुथा हुआ नजर आता है। ऐसे में न तो वे मौजूदा जनतांत्रिक राजनीति के विकास क्रम को आगे ले जाने में सहयोगी नजर आते हैं और न ही वर्तमान व्यवस्था के बुनियादी संकटों पर कोई निर्णायक सवाल खड़े करते नजर आते हैं। सच तो यह है कि न सिर्फ इन आंदोलनों में और बल्कि मुख्य धारा से अलग चल रहे जल, जंगल जमीन के आंदोलनों और संघर्षों में भी वामपंथी राजनीतिक दलों ने जैसे अवस्थिति अपनायी है, वह उनकी ऐतिहासिक छवि से एकदम मेल नहीं खाती है। 

ऐसे में यह सवाल बहुत अहम हो जाता है कि मुख्य धारा से कटे हुए वर्गों और समूहों के संघर्षों को प्रतिनिधित्व देने का दावा करने वाले इन राजनीतिक दलों की जवाबदेही कैसे तय की जाये? दरअसल बीते वर्षों में मुख्य धारा के वामपंथी दलों की राजनीति पर देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर कोई प्रभावी हस्तक्षेप कर अवसर पैदा करने से ज्यादा अवसरों को पकड़ने और उनके फौरी परिणामों को ध्यान में रखकर अपनी स्थिति तय करने का नजरिया हावी होता चला गया है। यह बदलाव अपने आप में वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदों को तोड़ने वाला साबित हो रहा है।
(अभिनव से abhinavas30@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

16 जनवरी 2013

सामंती व्यवस्था का बिगड़ा संतुलन


 -अभिनव श्रीवास्तव 
राजधानी दिल्ली में तेईस वर्षीय छात्रा के सामूहिक बलात्कार के बाद कई किस्म की वैचारिक धाराओं के बीच महिला अधिकारों को लेकर गहन विचार विमर्श का दौर चलता रहा। इस दौरान प्रगतिशील धारायें अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति से महिला अधिकारों और उनके राष्ट्र स्तर पर जारी शोषण की बहस को आगे बढ़ाते रहीं। निश्चित तौर पर इन सबके बीच महिला अधिकारों को लेकर विचारों की कई धुरियां सक्रिय रहीं लेकिन कुछ बुनियादी बातों पर सभी की सहमति रही।

इन तमाम चर्चाओं पर बहस आगे बढ़ने के साथ कुछ बेहद सामंती और प्रतिक्रियावादी धाराओं ने भी सार्वजनिक मचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवायी। आशाराम बापू और संघ संचालक मोहन भागवत के हालिया बयान और टिप्पणियां इसका सीधा उदाहरण हैं। चूंकि ये बयान एक पूरी राजनीतिक धारा और वर्ग की नुमाइंदगी करते हैं, इसलिये इन पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है। अगर गौर से देखा जाये तो ऐतिहासिकता के विकास क्रम में दुनिया के जिन-जिन हिस्सों में महिला अधिकारों के लिए संघर्ष और आंदोलन तीखे और पैने हुये हैं, उन हिस्सों में फासीवादी ताकतों और प्रतिक्रियावादी धाराओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है। 

इन सभी प्रतिक्रियावादी धाराओं और फासीवादी ताकतों ने हर दौर में एक ऐसी समाज व्यवस्था की वकालत की है जिसमें महिलाओं की यौनिकता, उनके श्रम और सार्वजनिक और निजी दायरों में उसकी भागीदरी पर पुरुषवादी नियंत्रण लगाने की कोशिशें की गयी हैं। ऐसा करने के लिए इन ताकतों ने अपने-अपने समाज के वर्चस्ववादी धर्मों के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को इस्तेमाल किया है और इन मूल्यों की पुर्नस्थापना का आग्रह ही इनकी मांगों में नजर आता है। भारतीय संदर्भ में भी यह बात कुछेक भिन्नताओं और अंतर्विरोधों के साथ ठीक जान पड़ती है। 

भारतीय सभ्यता अपनी विशिष्ट सामाजिक स्थितियों के चलते भयंकर विविधताओं और परम्पराओं में कैद रही है, इसलिए यहां महिला अधिकारों के लिये संघर्ष और प्रगतिशील आंदोलनों ने अपेक्षाकृत देर से दस्तक दी। संभवतः यही वजह है कि भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में महिलाओं के प्रति एक खास तरह के सामंती और नैतिकतावादी नजरिये का आधार और उसका समर्थन मौजूद है और जब-जब इस स्थापित संरचना को किसी भी रूप में चुनौती मिलती है, सामंती और प्रतिक्रियावादी ताकतों के बीच खदबदाहट होने लगती है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि आशाराम बापू और मोहन भागवत के बयानों में सामूहिक बलात्कार की पीड़िता के प्रति जैसी सोच दिखी उसकी अपनी एक खास राजनीति और पृष्ठभूमि भी है। 

दरअसल भारत में महिलाओं के प्रति सामंती और खास तरह के नैतिकतावादी मूल्यों का प्रतिनिधित्व विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठनों ने नये-नये सांस्कृतिक और राजनीतिक केन्द्रों और संस्थानों की रचना करके किया है और इन्हीं केन्द्रों के जरिये इन मूल्यों का प्रचार-प्रसार भी हुआ है। ऐसे संस्थानों और केन्द्रों का अस्तित्व आजादी से पहले (राष्ट्रसेविका समिति, 1936) भी रहा है और आजादी के बाद भी। 

इस प्रक्रिया के बरक्स महिला अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने वाले प्रगतिशील आंदोलनों की धार इतनी पैनी नहीं रह पायी। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में जब प्रगतिशील महिला आंदोलनों ने गति पकड़ी तो इन कोशिशों का जवाब हिंदू प्रतिक्रियावादी ताकतों ने ऐसे महिला संगठनों का निर्माण करके दिया जिन्होंने कालांतर में राष्ट्र स्तर पर हिन्दू सांस्कृतिक और सामंती मूल्यों के आरोपण की जिम्मेदारी निभायी। 1980 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा बनाया गया महिला मोर्चा, 1985 में शिव सेना द्वारा बनाया गया महिला अगाधि और बाद में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा बनाया गयी दुर्गा वाहिनी ऐसे ही संगठन थे। इन संगठनों ने नब्बे के दशक में अल्पसंख्यकों के निजी दायरे के धार्मिक नियमों को निशाना बनाने के मकसद से प्रगतिशीलता का ढोंग रचते हुये यूनिफार्म सिविल कोड  जैसे प्रावधानों की मांग की। 

ये ढोंग इसलिये था क्योंकि इन संगठनों और इनके पैतृक संगठनों के विमर्श में उस वक्त और साल 1950  में भी हिन्दू महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाने वाले हिन्दू कस्टमरी ला के संशोधन जैसी कोई मांग मौजूद नहीं थी। कहने का मतलब यह है कि सामंती और हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों के प्रचार प्रसार के केन्द्र नए-नए रूपों में बनते और स्थापित होते चले गए और उन्होंने बेहद आक्रामक रूप से इन मूल्यों की पुनर्स्थापना की कोशिशें भी की। हालांकि सामंती हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों के प्रचारक के रूप में आशाराम बापू जैसे धार्मिक गुरुओं का राष्ट्र स्तर पर उभार एक नए किस्म की घटना साबित हुई है और इसने वैश्वीकरण और खुले बाजार के दौर में इतनी तेजी से अपने पांव फैलाए कि आने वाले सालों में इन धार्मिक गुरुओं और टिप्पणीकारों से सार्वजनिक दायरे का एक बड़ा हिस्सा पटा हुआ दिखाई पड़ा। 

खुले बाजार और नवउदारवादी व्यवस्था द्वारा दिए गए साधनों और तकनीकों का इस्तेमाल करके इन इन धार्मिक गुरुओं ने अपने प्रभाव क्षेत्र को बेहद विस्तृत और आक्रामक बना लिया। मनोरंजन जगत का मीडिया इनके हाथ-पांव बन गया और टेलीविजन चैनल इन सामंती सांस्कृतिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार के नए केंद्र बन गए। इन केन्द्रों से उन्होंने हिन्दू मान्यता के प्रतीकों को तेजी से फैलाते हुये राष्ट्र स्तर पर भगवाकरण की प्रक्रिया को मजबूत किया। यही वह दौर था जब सांस्कृतिक समरूपीकरण की प्रक्रिया अबाध गति से चली और मजबूत होती चली गयी। ठीक इसी वक्त वैश्वीकरण की प्रकिया समाजिक दायरों में भी नये तरह के बदलावों को जन्म दे रही थी। मझोले और बड़े शहरों में महिलायें श्रम बाजार का हिस्सा बनने के लिए आगे आयीं और उन्होंने अपने आप को नयी भूमिका में देखा। 

महिलाओं की इस बढ़ती भागीदारी के शुरुआत में बहुत उत्साह जनक नतीजे निकाले गए, लेकिन बाद में पता चला कि वैश्वीकरण और बाजार व्यवस्था ने भी आजादी के तमाम दावों के बावजूद महिलाओं के श्रम के शोषण और गैर बराबरी को ही प्रोत्साहित किया है। अब अगर इस सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर मोहन भागवत, आशाराम बापू के सामंती बयानों की वजहों को समझना शुरू करें तो यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण और खुली बाजार व्यवस्था के द्वंदवाद और उसके अंतर्विरोधों ने ही महिलाओं और उनके एक खास वर्ग को ऐसे अवसर प्रदान कर दिए हैं जहां से वे स्थापित सामंती धाराओं को पहले से अधिक पैनेपन और मजबूती से चुनौती दे सकती हैं। 
महिलाओं की अपनी यौनिकता और अपने अधिकारों की इन नयी दावेदारियों से धार्मिक गुरुओं और हिंदूवादी राजनीतिक संगठनों द्वारा आगे बढ़ायी जा रही सांस्कृतिक आरोपण की प्रक्रिया का आतंरिक संतुलन बिगड़ गया है। इन धार्मिक टिप्पणीकारों का आधुनिकता और प्रगतिशीलता बोध पहले ही चरमराया हुआ था और महिलाओं की सार्वजनिक दायरे में मजबूती से की जाने वाले दावेदारियों ने इनके बीच खीझ और झुंझलाहट की स्थिति पैदा कर दी है। उनके बयान इसी खीझ और झुंझलाहट की अभिव्यक्ति हैं। निश्चित तौर पर महिला आंदोलनों की ऐतिहासिकता के विकास क्रम में रायसीना हिल पर चली मुहिम के महत्व को अभी ठीक से समझना थोड़ा मुश्किल साबित हो रहा है। इस मुहिम के प्रति दो तरह का प्रगतिशील नजरिया हावी है।

कुछ प्रगतिशील राजनीतिक और महिला संगठन इसे पूरी तरह खारिज कर रहे हैं और सामूहिक बलात्कार के बाद पैदा हुये रोष के चलते गोलबंद हुयी भीड़ को कास्ट, क्लास और साम्प्रदायिकता की लाइन्स के इर्द-गिर्द समझने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ अपने राजनीतिक विस्तार की संभावना तलाशने की हड़बड़ी में इस मुहिम को महज सामाजिक विमर्श का मुद्दा बनाये रखने के पक्ष में है। ये दोनों ही नजरिये गलत हैं। 

अगर इस मुहिम के प्रति आलोचना की किसी गुंजाइश को खत्म किया गया तो इससे महिलाओं के राष्ट्र स्तर पर जारी शोषण की बहस को व्यापक रंग नहीं दिया जा सकेगा और न ही राज्य व्यवस्था की महिला शोषण के कुछ मामलों में संलिप्तता पर बुनियादी सवाल खड़े किए जा सकेंगे। आखिर राष्ट्र स्तर पर महिलाओं की यौनिकता के साथ-साथ उनके श्रम का शोषण भी जारी है। जो संगठन और वर्ग इस मुहिम को पूरी तरह खारिज कर रहे हैं, वे ये देख नहीं पा रहे कि इस मुहिम के केंद्र में महिला और महिला अधिकारों ही की बहस थी जो सही और संतुलित नेतृत्व के अभाव में कहीं-कहीं पर प्रतिक्रियावादी होती हुयी दिख रही थी। 

तमाम आलोचनाओं की गुंजाइश छोड़ते हुये भी इस मुहिम के महत्व को इस रूप में स्वीकार करना ही होगा कि इसने स्थापित सामंती व्यवस्था और मूल्यों को हिला देने वाली दावेदारियां पेश की हैं। 

14 जनवरी 2013

मैं अपनी जिंदगी के लिए लड़ी और जीत हासिल की

-सोहेला अब्दुलाली
तीन साल पहले मेरा गैंगरेप हुआ था, उस वक्त मैं 17 साल की थी. मेरा नाम और मेरी तसवीर इस आलेख के साथ प्रकाशित हुए हैं. 1983 में मानुशी पत्रिका में. मैं बंबई में पैदा हुई और आजकल यूएसए में पढ़ाई कर रही हूं. मैं बलात्कार पर शोधपत्र लिख रही हूं और दो हफ्ते पहले शोध करने घर आयी हूं. हालांकि तीन साल पहले भी जब मेरे साथ यह हुआ था, मैं रेप, रेप के अभियुक्तों और पीड़ितों को लेकर लोगों में फैली गलत धारणाओं के बारे में समझती थी. मुझे उस ग्रंथि का भी पता था जो पीड़ित के मन के साथ जुड़ जाती हैं. लोग बार-बार यह संकेत देते हैं कि अमूल्य कौमार्य को खोने से कहीं बेहतर मौत है. मैंने इसे मानने से इनकार कर दिया. मेरा जीवन मेरे लिए सबसे कीमती है.
मैंने महसूस किया है कि कई महिलाएं इस ग्रंथि के कारण चुप्पी साध लेती हैं, मगर अपने मौन के कारण उन्हें अपार वेदना का सामना करना पड़ता है. पुरुष पीड़ितों को कई वजहों से दोषी ठोहराते हैं और हैरत की बात तो यह है कि कई दफा महिलाएं भी पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं, संभवतः आंतरिक पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण, संभवतः खुद को ऐसी भीषण संभावनाओं से बचाये रखने के लिए.
यह घटना जुलाई की एक गर्म शाम की घटी. उस साल महिलाओं का समूह रेप के खिलाफ कानून में संशोधन की मांग कर रहा था. मैं अपने दोस्त राशिद के साथ थी. हम लोग घूमने निकले थे और बंबई की उपनगरी चेंबूर स्थित अपने घर से करीब डेढ़ मील दूर एक पहाड़ी के पीछे पहुंच गये थे और वहां बैठे थे. हम पर चार लोगों ने हमला किया, वे लोग दरांती से लैस थे. उन्होंने हमारे साथ मारपीट की, पहाड़ी पर चढ़ने के लिए मजबूर किया और वहां हमें दो घंटे तक बिठाये रखा. हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया, और जैसे ही अंधेरा गहराया, हमें अलग कर दिया गया और अठ्ठाहस करते हुए उन्होंने राशिद को बंधक बनाकर मेरे साथ रेप किया. हममें से कोई प्रतिरोध करता तो दूसरे को वे चोट पहुंचाते. यह एक प्रभावी तरीका था.
वे तय नहीं कर पा रहे थे कि वे हमारी हत्या करें या नहीं. हमें अपने दम भर वह सब कुछ किया जिससे हम जिंदा बच जायें. मेरा जिंदा बचना था और वह हर चीज से अधिक महत्वपूर्ण था. मैं पहले उन लोगों का शारीरिक रूप से प्रतिरोध किया और जब मुझे गिरा दिया गया तो मैं शब्दों से प्रतिरोध करने लगी. गुस्से और चीखने-चिल्लाने का कोई असर नहीं हो रहा था, इसलिए मैंने बड़बड़ाना शुरू कर दिया, मैं उन्हें प्रेम, करुणा और मानवता के लिए प्रेरित करने लगी, क्योंकि जिस तरह मैं इंसान थी, वे भी तो इंसान ही थे. इसके बाद उनका रवैया नर्म पड़ने लगा, खास तौर पर उनका जो उस वक्त मेरे साथ बलात्कार नहीं कर रहे थे. मैंने उनमें से एक से कहा कि अगर मुझे और राशिद को जिंदा छोड़ दिया गया तो मैं अगले दिन उनसे मिलने आउंगी. हालांकि इन शब्दों के बदले मुझे कहीं अधिक भुगतना पड़ा, मगर दो जिंदगियां दांव पर थीं. यही एकमात्र तरीका था कि मैं वहां से लौट पाती और अगली दफा खुद को रेप से बचा पाती.
जिसे बरसों की पीड़ा कहा जा सकता है उसे झेलने के बाद(मुझे लगता है मेरा 10 बार बलात्कार किया गया और कुछ देर बाद मैं यह समझना भूल गयी कि क्या हो रहा है), हमें जाने दिया गया. जाते वक्त उन लोगों ने हमें एक नैतिक उपदेश के साथ विदा किया कि मेरा एक लड़के के साथ इस तरह घूमना अनैतिक था. इस बात ने उन्हें सबसे अधिक नाराज किया था. उन्होंने ऐसा मेरे हित में ही किया था, वे मुझे एक पाठ पढ़ाना चाहते थे. यह बड़ी कट्टर किस्म की नैतिकता थी. उन्होंने हमें पहाड़ के नीचे छोड़ दिया और हम लड़खड़ाते हुए अंधेरी सड़क पर चलते रहते, एक-दूसरे पर टगते हुए और धीरे-धीरे चलते हुए. वे कुछ देर तक हमारा पीछा करते रहे, दरांती हिलाते हुए, और वह संभवतः सबसे बुरा पहलू था कि भागना इतना आसान था मगर मौत हमारे उपर ठहल रही थी. अंततः हम घर पहुंचे, टूटे हुए, क्षत-विक्षत, चूर-चूर. यह बच कर आने का एक अतुलनीय अनुभव था, अपने जीवन के लिए मोलभाव करना, हर शब्द तोलकर बोलना क्योंकि हम उन्हें नाराज करने की कीमत जानते थे, दरांती का वार कभी भी हमारे जीवन को समाप्त कर सकती थी. हमारी हड्डियों और हमारी आंखों में राहत दौड़ रही थी और हम ऐतिहासिक विलाप के साथ ढेर हो गये.
मैंने बलात्कारियों से वादा किया था कि मैं इस बात को किसी और से नहीं बताउंगी, मगर घर पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपने पिता से कहा कि वे पुलिस को बुलाएं. वे इस बात को सुनकर चिंतित हो गये. मैं परेशान थी कि किसी और को उस अनुभव से नहीं गुजरना पड़े जिससे मुझे गुजरना पड़ा था. पुलिस असंवेदनशील थी, घृणित भी और वह किसी तरह मुझे दोषी साबित करने पर तुली थी. जब मैंने कहा कि मेरे साथ क्या हुआ, तो मैंने सीधे-सीधे कह डाला और इस बात को उन्होंने मुद्दा बना लिया कि अपने साथ हुए इस हादसे को बताने में मैं शर्मा नहीं रही थी. जब उन्होंने कहा कि इस बात का प्रचार हो जायेगा तो मैंने कहा, कोई बात नहीं. मैं इमानदारी से कभी यह सोच नहीं सकी थी कि मुझे या राशिद को दोषी माना जायेगा. जब उन्होंने कहा कि मुझे मेरी सुरक्षा किशोर रिमांड होम भेजा जायेगा. मुझे बलात्कारियों और दलालों के बीच रहना होगा ताकि मुझ पर हमला करने वालों को न्याय के सामने लाया जा सके.
बहुत जल्द मैंने समझ लिया कि इस कानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के लिए न्याय मुमकिन नहीं है. जब उन्होंने पूछा कि हम पहाड़ी के पीछे क्या कर रहे थे तो मैं क्रुद्ध हो गयी. जब उन्होंने राशिद से पूछा कि वह क्यों निष्क्रिय हो गया, तो मैं चीख पड़ी. क्या वे यह नहीं समझते थे कि राशिद का प्रतिरोध मेरे लिए और पीड़ा का कारण बन सकता था. वे ऐसे सवाल क्यों पूछते थे कि मैंने कैसे कपड़े पहने थे, राशिद के शरीर पर कोई चोट का निशान क्यों नहीं है (पेट पर लगातार हमले के कारण उसे इंटरनल ब्लीडिंग हो रही थी), मैं दुख और निराशा में डूबने लगी, और मेरे पिता ने उन्हें घर से बाहर भगा दिया यह कहते हुए कि वे उनके बारे में क्या सोचते हैं. यह वह सहायता थी जो मुझे पुलिस से मिली. पुलिस ने बयान दर्ज किया कि हम टहलने गये थे और लौटते वक्त देर हो गयी.
उस बात के तीन साल हो गये हैं, मगर ऐसा एक दिन भी नहीं बीता जब मुझे इस बात ने परेशान नहीं किया कि उस दिन मेरे साथ क्या हुआ. असुरक्षा, भय, गुस्सा, निस्सहायपन- मैं उन सब से लड़ती रही. कई दफा, जब मैं सड़क पर चलती थी और अपने पीछे कोई पदचाप सुनायी पड़ती तो मैं पसीने-पसीने होकर पीछे देखती और एक चीख मेरे होठों पर आकर ठहर जाती. मैं दोस्ताना स्पर्श से परेशान हो जाया करती, मैं कस कर बंधे स्कार्फ को बर्दास्त नहीं कर पाती, ऐसा लगता कि मेरे गले को हाथों ने दबा रखा है. मैं पुरुषों की आंखों में एक खास भाव से परेशान हो जाती- और ऐसे भाव अक्सर नजर आ जाते.
इसके बावजूद कई दफा मैं सोचती कि मैं अब मजूबत इंसान हूं. मैं अपने जीवन की सराहना पहले से अधिक करती. हर दिन एक उपहार था. मैंने अपने जीवन के लिए संघर्ष किया था और मैं जीती थी. कोई भी नकारात्मक भाव मुझे यह सोचने से रोकती कि यह सकारात्मक है.
मैं पुरुषों से घृणा नहीं करती. ऐसा करना सबसे आसान था, और कई पुरुष ऐसे विभिन्न किस्म के दबाव के शिकार थे. मैं जिससे नफरत करती वह पितृसत्ता थी और उस झूठ की विभिन्न परतों से जो कहती कि पुरुष महिलाओं से बेहतर होते हैं, पुरुषों के पास अधिकार हैं जो महिलाओं के पास नहीं, पुरुष हमारे अधिकार संपन्न विजेता हैं. मेरी नारीवादी मित्र सोचतीं कि मैं महिलाओं के मसले पर इसलिए चिंतित हूं क्योंकि मेरा रेप हुआ है. मगर ऐसा नहीं है. रेप उन तमाम प्रतिक्रियाओं में से एक है जिसकी वजह से मैं नारीवादी हूं. रेप को किसी खाने में क्यों डाला जाये? ऐसा क्यों सोचा जाये कि रेप ही अकेला अवांछित संभोग है? क्या हर रोज गलियों में गुजरते वक्त हमारा रेप नहीं होता? क्या हमारा रेप तब नहीं होता जब हमें यौन वस्तु के तौर पर देखा जाता है, हमारे अधिकारों से इनकार कर दिया जाता है, कई तरीकों से दबाया जाता है? महिलाओं के दमन को किसी एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता है. उदाहरण के लिए, वर्ग विश्लेषम आवश्यक है, मगर क्यों बहुत सारे बलात्कार अपने ही वर्ग में किये जाते हैं.
जब तक महिलाएं विभिन्न तरीकों से दमित की जाती हैं. सभी महिलाएं लगातार बलात्कार के खतरे में हैं. हमें रेप को पेचीदा बनाने से रोकना पड़ेगा. हमें समझना पड़ेगा कि यह हमारे चारो तरफ अस्तित्व में है, और इसके विभिन्न स्वरूप हैं. हमें इसे गुप्त तौर पर दफन करना बंद कर देना होगा और इसे अपराध के एक रूप के तौर पर देखना होगा- इसे हिंसात्मक अपराध मानना होगा और बलात्कारी को अपराधी के तौर पर देखना होगा. मैं उत्साहपूर्वक जीवन जी रही हूं. बलात्कार का शिकार होना बहुत खौफनाक है, मगर जिंदा रहना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. मगर जब एक औरत को इसे महसूस करने से रोका जाता है, इसे तो हमारे तंत्र की गड़बड़ी माना जाना चाहिये. जब कोई बेवकूफ बनकर जिंदगी के एवज में खुद पर हमले को झेल लेती है तो किसी को ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि वह स्वेच्छा से मार खाना चाहती थी. बलात्कार के मामले में एक औरत से पूछा जाता है कि उसने ऐसा क्यों होने दिया, उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, कहीं उसने इसका मजा तो नहीं लिया.
रेप किसी खास समूह की औरतों के साथ नहीं होता और न ही रेपिस्ट एक खास तरह के पुरुष होते हैं. रेपिस्ट एक क्रूर पागल भी हो सकता है और पड़ोस में रहने वाला लड़का भी या एक दोस्ताना अंकल भी. हमें अब रेप को किसी अन्य महिला की समस्या के तौर पर देखना बंद करना होगा. इसे हमें सार्वभौमिक तरीके से देखना होगा और एक बेहतर समझ की तरफ बढ़ना होगा. जब तक रिश्तों का आधार शक्तियां होंगी, जब तक महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के तौर पर देखा जाता रहेगा, हम लगातार अपनी इज्जत गंवाने के खतरे में रहेंगे. मैं बचकर निकली हूं. मैं रेप किये जाने के लिए नहीं कहती और न ही मैंने इसका मजा लिया. यह एक सबसे बुरा किस्म का टार्चर है. मगर यह महिलाओं की गलती नहीं है.
आज सोहेला लिखती हैं, पढ़ती हैं और घूमती हैं. उसके दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. द मैडवुमन ऑफ जोगर एंड इयर ऑफ टाइगर, बच्चों की तीन किताबें, और कई छोटी कहानियां, लेख, खबरें, ब्लाग, कॉलम, मैनुअल आदि वे लिख चुकी हैं. उनके लिखित सामग्रियों को उनकी साइट www.sohailaink.com पर देखा जा सकता है.
मूलतः अंग्रेजी में लिखे गये इस आलेख का पुष्यमित्र ने हिंदी में अनुवाद किया है.

23 दिसंबर 2012

दैनिक भास्कर को फ़ांसी चाहिए!


सामूहिक बलात्कार कांड के विरोध-प्रदर्शन पर मीडिया का मध्यकालीन तेवर

-दिलीप ख़ान

दक्षिणी दिल्ली में मेडिकल छात्रा से चलती बस में सामूहिक बलात्कार का मामला अमानवीय, हिंसक, बर्बर और मर्दवादी समाज से लगातार रिसते मवाद की तरह है। किसी भी समाज में इस तरह की घटना का विरोध होना चाहिए, इस लिहाज से देखे तो बीते हफ़्ते भर से देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहा प्रतिरोध जायज़ है। लेकिन, प्रतिरोध की दिशा, मांग और राजनीति पर भी बहस ज़रूरी है। देश के अधिकांश शहरों में नौजवानों के स्वाभाविक जुटान की परिणति के तौर पर ये प्रदर्शन हो रहे हैं। यह देश का वो युवावर्ग है जो टीवी, अख़बारों और सोशल मीडिया से जुड़ा है। इनके हाथों में मोबाइल है और ये देश-दुनिया की ख़बरों पर मीडिया के मार्फ़त नज़र भी रखता है। तहरीर चौक से ये वाकिफ़ हैं और अन्ना आंदोलन के बाद से सड़कों पर उतरने की आदत भी इन्हें लग चुकी हैं। लेकिन क्या ऐसी हर घटना पर देशभर के युवा सड़क पर उतरने की सोच रखते हैं? जब से सामूहिक बलात्कार की घटना घटी है तब से देश को छोड़ दीजिए दिल्ली के आस-पास के राज्यों में ही बलात्कार के दो और मामले सामने आए। 

दूसरा सवाल- क्या किसी घटना की अमानवीयता की मात्रा यह तय करती है कि इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो? ‘स्वत:स्फूर्त आंदोलन’ कहां से शुरू होता है? मीडिया किस आधार पर किसी घटना को कवर करता है? लोगों की संख्या तो इसका आधार कतई नहीं है और न ही घटना की गंभीरता और न ही विषय। अलग-अलग उदाहरण इन तीनों आधारों को ख़ारिज करते हैं। इसके साथ-साथ दो-तीन सवाल और हैं। मीडिया पहले घटना को बड़ा बनाता है या फिर लोग आकर पहले जुटते हैं? पिछले कुछ ‘बड़े आंदोलनों’ के साथ मीडिया का ट्रीटमेंट कैसा रहा?

क्या आपको किसी नारे में फांसी लिखा दिख रहा है?
साबित हुआ कि आप मीडिया वाले नहीं हैं।
बीते कुछ वर्षों का अनुभव यह बताता है कि संगठनात्मक ढांचे के बग़ैर कोई आंदोलन स्वत:स्फूर्त तरीके से बिना मीडिया कवरेज के नहीं चल सकता। मेरी इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि आंदोलन का मीडिया में कवरेज नहीं होना चाहिए, बल्कि मेरा तो सुझाव है हर मीडिया घराने में एक स्थाई ‘आंदोलन बीट’ होना चाहिए जो देश भर में चल रहे अलग-अलग प्रतिरोधों को अपने पन्नों और स्क्रीनों पर जगह दे। आपत्ति ये है कि ज़्यादातर टीवी समाचार चैनल और हिंदी के ज़्यादातर अख़बार पूरे मामले को सनसनी बनाकर पेश कर रहे हैं और अपनी बात लोगों के मुंह में चालाकी से ठूंस रहे हैं और अगर इसमें उनके हाथ असफ़लता लगती है तो अपनी बात को जनता की बात बताकर पेश करने में वो लग जाते हैं। एक टीवी पत्रकार लोगों के बीच जाता है और सवाल उछालता है- आप तालिबानी अंदाज़ में सज़ा चाहते हैं कि नहीं? ज़ोर देकर वो बार-बार यही सवाल पूछता है। टीवी स्क्रीन पर जो एंकर कमेंटरी कर रहा होता (रही होती) हैं वो पूरे दिन लगातार ‘वारदात’,’क्राइम रिपोर्टर’ देखने का एहसास ताजा करावता (करवाती) है। अपनी समूची सहनशीलता को समेटकर ये सब झेलने के बावज़ूद अगर आपके आगे रोज़-रोज़ कोई अख़बार प्रोपेगैंडा बंद नहीं करे तो आप क्या कर सकते हैं? हद से हद अख़बार पढ़ना बंद कर सकते हैं। कीजिए, उनकी बला से। 

दैनिक भास्कर समय-समय पर महाअभियान चलाता रहता है। अब देश-दुनिया में अभियान से बात नहीं बनती। लिहाजा ‘महा’ शब्द का चलन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ गया है। पत्रिकाओं का विशेषांक धीरे-धीरे ‘महाविशेषांक’ में तब्दील हो गया। तो, इस मामले में भी दैनिक भास्कर ने महाअभियान चलाया। इसका स्लग रखा है- ‘देश को इस ग़ुस्से का अंजाम चाहिए’। भास्कर के पन्नों पर लगातार ग़ुस्सा तैर रहा है। उसकी रिपोर्टिंग में, भाषा में, चित्रों में, लेखों में। हर जगह। उसको नहीं बल्कि ‘देश को अंजाम चाहिए’। (टाइम्स ग्रुप की इतनी नकल ठीक नहीं है भास्कर, पहले ‘महा’ शब्द में और फिर ‘देश के लिए अंजाम’ मांगने में। थोड़ा अपना भी भेजा लगाओ) बीते कुछ दिनों का भास्कर पढ़ेंगे तो दिलचस्प नतीजे तक आप पहुंचेंगे। रविवार के पहले पन्ने (जैकेट पेज) की पहली स्टोरी से बात शुरू करते हैं। भास्कर ने उपशीर्षक दिया है: सबकी बस एक ही मांग- आरोपियों को फांसी दे सरकार। नीचे ख़बर में लिखा है- यह प्रदर्शन पूरी तरह अप्रत्याशित और स्वत:स्फूर्त था। कई मायनों में अभूतपूर्व भी। जत्थों में सुबह 7 बजे से इंडिया गेट पर एकत्र हो रहे इन नौजवानों का न कोई नेता था, न ही वे अपनी मांगों को लेकर एकमत और स्पष्ट थे। 

यानी रिपोर्टिंग ये कह रही थी कि आंदोलन कर रही जनता के बीच सज़ा को लेकर आम-सहमति नहीं है, लेकिन शीर्षक में भास्कर ये तय कर ले रहा है कि सब के सब फांसी मांग रहे हैं। भास्कर अपनी राय को जनता की राय बताकर लगातार पेश कर रहा है। पहले पन्ने पर अख़बार के राष्ट्रीय संपादक कल्पेश याज्ञनिक ने विशेष संपादकीय लिखा है। ‘धोखा’ शीर्षक वाले इस एक पैराग्राफ के संपादकीय में सरकार द्वारा फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं करने के विरोध में जो तड़प है उसके बल पर ऐसा लगता है कि कल्पेश याज्ञनिक को ‘अंतरराष्ट्रीय फांसी दिलाओ संगठन’ का कम से कम सचिव ज़रूर बना दिया जाना चाहिए। जैकेट के बाद अख़बार के पहले पन्ने पर भास्कर ने गृहमंत्री के बयान के हवाले से जो ख़बर छापी है उसका शीर्षक है- कड़े कानून की बात कही पर फांसी का ज़िक्र नही। इसी अख़बार में पेज नंबर 9 पर के हरियाणा-पंजाब पेज पर एक फोटो छपी है। हिंदू सिख जागृति सेना से जुड़ी महिलाओं की ये फोटो है जो सामूहिक बलात्कार मामले के विरोध में सड़क पर प्रदर्शन कर रही है। अख़बार ने फोटो का कैप्शन लगाया है- महिलाओं ने आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी देने की मांग की। फोटो में कोई प्लेकार्ड नही, कोई पोस्टर नहीं है और न ही कोई बैनर है जिसमें इस तरह की एक भी मांग हो, लेकिन अख़बार ने फांसी देने की अपील जारी कर दी। इन महिलाओं के हाथ में सैंडल ज़रूर है और जहां तक मेरी समझदारी है सैंडल दिखाने का मतलब फ़ांसी नहीं होती। सैंडल का मतलब सैंडल होता है लेकिन भास्कर के संपादक को ये पता नहीं। 

इससे पहले अख़बार ने 109 सांसदों और 9 मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था जिसमें फांसी की वकालत की गई थी। अब अख़बार ने आह्वान किया है कि वो अपने पाठकों से सांसदों को चिट्ठी लिखवाएगा जो फांसी के समर्थन में होंगी। भास्कर के साथ-साथ और भी कई हिंदी अख़बार इस पूरी मुहिम को हवा दिए हुए हैं। पंजाब केसरी, नवभारत टाइम्स के साथ-साथ दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ा जाने वाला अख़बार दैनिक जागरण भी ख़बर की पूरी एंगल को इसी तरफ़ मोड़ रहे हैं। जागरण ने पहले ख़बर चलाई – रेप के सभी आरोपियों को मिलेगी फांसी। ये ख़बर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग पर आधारित थी। अख़बार सहित टीवी समाचार चैनलों ने लगातार इस बात को उछाला। जब मामला जनता के बीच पूरी तरह पक गया तो टीवी जनित उन्माद में सड़क पर उतरे लोग भी इस मांग को ज़ोर-शोर से उठाने लगे। अब मीडिया के लिए ये जनता का वक्तव्य बन गया लिहाजा अब शीर्षक सीधे-सीधे नारों की शक्ल में उभरने लगा- रेप के आरोपियों को फांसी दो। 

सवाल ये है कि ऐसे मामलों को कवर कर रहा मीडिया अगर अपना नज़रिया भी ख़बरों में लादता है तो उसकी दिशा क्या होनी चाहिए? मीडिया हाउस में या फिर समाज के इर्द गिर्द यदि ‘लिंग काट लेने’, ‘चौराहे पर फ़ांसी देने’, ‘सामूहिक रूप से पीट-पीट कर मार डालने’ की बात उठती है तो उनको आधार बनाकर क्या मीडिया को उसे लगातार उछालते रहना चाहिए? तिस पर मिर्च-मसाला का पूरा कारखाना तो मीडिया के लिए बना ही है! आख़िरकार सज़ा के जिस पुराने रूप को इन अख़बारों और टीवी चैनलों के संपादक देश में स्वीकार्य बनाना चाहते हैं वे उसे अपनी राय न बताकर जनता की आवाज़ क्यों करार दे रहे है? इससे अलग एक सवाल है कि मीडिया को घटना-घटना ऐसे औचक ख़याल क्यों आता रहता है और घटना पुरानी हो जाने के बाद वह उसे ठंडे बस्ते में लादकर क्यों फेंक आता है? कुछ हफ़्ते पहले अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने दिल्ली में छेड़छाड़ और यौन शोषण के मुद्दे पर श्रृंखला में स्टोरी चलाई। इसमें पत्रकारों के निजी अनुभव तक शामिल थे
। 
बाक़ी अख़बार या चैनल मुद्दे को ट्रेस करके क्यों नहीं अपने पन्नों या एयर टाइम में जगह देते हैं? क्या बलात्कार का मामला महज इस एक घटना तक सीमित है या फिर समाज में हमेशा सुसुप्त अवस्था में यह मौजूद रहता है? मीडिया इन बातों की पड़ताल क्यों नहीं करता और बलात्कार के बाद महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर बहस कराने के लिए टीवी चैनल अपने पैनल में अर्चना पूरण सिंह जैसे मेहमानों को क्यों बुलाता है जिनके पूरे करियर का अहाता ही स्त्रीविरोधी हल्के, फूहड़ चुटकुलों पर हंसने तक सीमित है। 

लाइव दिखाने और ग़ुस्से को इनकैश करने के लिए टीवी चैनल जिस तड़प के साथ अपने रिपोर्टर को सड़क पर तैनात करता है उसमें कई बार रिपोर्टर यह तक भूल जाता है कि वह ऑन एयर है। ‘आजतक’ के संवाददाता ने इंडिया गेट पर लाइव रहते हुए आह्वान किया- ‘मारे, मारो’। उसी चैनल पर एक लड़की ने अपने ग़ुस्से को जताया- ‘सरकार कुछ करती क्यों नहीं बहन**’। यानी एक महिला की ज़ुबान से गाली के रूप में भी महिलाविरोधी शब्द ही निकलते हैं। मीडिया इसे भी सारी महिलाओं की राय क्यों नहीं करार दे देता? 

02 दिसंबर 2012

विभूति नारायण राय लाल सलाम, यानी हिंदी के तीन युग हैं

प्रसंग: हिंदी का दूसरा समय-2013 का वर्धा में आयोजन

-दिलीप खान
हिंदी साहित्य के इतिहास में पता नहीं हिंदी के समय को किन आधारों पर बांटा गया है, लेकिन इसके कालखंड बंटवारे के ताजा मुहिम में आपको आधार भी पता चलेगा, शक्ति की नुमाइश भी और वजह भी। विवाद-विरोध-आलोचना-हिच-हिच-खिच-खिच की गुंजाइश अगर तलाशेंगे तो समझ लीजिए इस गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षी बनने का एक महत्वपूर्ण अवसर आप खो देंगे! भविष्य की पीढ़ियां आपको सिर्फ़ इसी बिनाह पर गरिया सकती है कि अपने दौर में हिंदी के समय के साथ आप नहीं थे और अगर आप अपने वर्तमान में हस्तक्षेप नहीं करते थे तो जाहिर तौर पर समाज निर्माण की प्रक्रिया से कहीं दूर बैठे बांसुरी बजा रहे थे और इसलिए भविष्य तक पहुंचने वाली सड़क साफ़-सुथरी नहीं रह सकी!

हिंदी के राजमार्ग के किनारे बसे वर्धा नामक मुल्क में हिंदी यात्रियों के ठहरने के भरपूर इंतजाम हैं। हिंदी के नाम पर देश का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय पांच टापुओं पर यहीं बना हुआ है। हिंदी शक्ति के विकेंद्रीकरण में दिल्ली से जो पावर-शिफ़्ट हुआ, उसका एक टुकड़ा वर्धा की झोली में भी गिरा है। लिहाजा समय-समय पर यहां मजमा लगता है जिनमें हिंदी को लेकर चिंतित लोग दूर-दराज़ से आकर शरीक होते हैं और हिंदी का पूरा कलेवर बदल डालते हैं। तो ये मुख़्तसर-सा परिचय था वर्धा का। लेकिन हम बात कर रहे थे हिंदी के कालखंड को परिभाषित करने की, तो सीधी बात ये है कि हिंदी का समूचा इतिहास दो भागों में बंटा हुआ है। इतिहास के पहले खंड को ‘हिंदी समय पूर्व’ नाम से जाना जाता है और दूसरे खंड को ‘हिंदी समय से हिंदी के दूसरे समय तक’ के नाम से। तीसरा, एक भविष्य का भी काल है जिसे ‘हिंदी के दूसरे समय से आगे का समय’ कहा जाएगा। इतना जानने के बाद अब इस सवाल का जवाब दीजिए कि कालजयी नहीं बल्कि काल के रचयिता महापुरुष कौन है? पूरे चार नंबर के इस प्रश्न का जवाब है उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय।

अक्टूबर 2008 में कुलपति बनकर वर्धा पहुंचने के बाद 2009 के शुरुआती दिनों में उन्होंने हिंदी पट्टी को आमंत्रण कार्ड बांटा और उस उजड़े से परिसर में छात्रों से ज़्यादा हिंदी के मेहमान वहां पहुंचे थे। ‘हिंदी समय’ का आग़ाज़ हो चुका था। विभूति नारायण राय ने अपने वर्धा आगमन का जो ढोल पीटा उसमें काफ़ी धमक थी और काफ़ी आवाज़। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पुराने कुलपति श्रीमान अशोक वाजपेयी से लेकर कुलाधिपति श्रीमान नामवर सिंह से लेकर जाने कितने हिंदी के कसरती शरीर वहां नमूदार हुए थे। हफ़्ते भर काफ़ी गहमा-गहमी का माहौल रहा, विद्यार्थी भी खुश थे कि कुछ आयोजन-सा हुआ और कुछ ‘बड़े लोगों’ से पता-परिचय भी। फिर शादी के टैंट की तरह वहां के टैंट भी उखड़ गए और अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का परिसर अपनी रूटीन पर लौट गया। तब से लेकर अब तक हिंदी, हिंदी से जुड़े लोगों, हिंदी के सवालों और विभूति नारायण राय के ऊपर काफ़ी पानी बह चुका है।

लगभग चार साल गुजर गए और राय साहब को अब महसूस हो गया कि उस कार्यक्रम की पुनरावृत्ति होनी चाहिए। तो साहिबान, 2013 पेश करता है आपके सामने ‘हिंदी का दूसरा समय’। चलिए मान लेते हैं कि हिंदी की सेहत के लिए ऐसे आयोजन बेहद ज़रूरी है, ये भी मान लेते हैं कि रचनाकारों का आपस में समय-समय पर संवाद करने के लिए माकूल जगह मुहैया कराई जानी चाहिए और खींच-तान कर ये भी मान लेते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को लाभ मिलता है। बावज़ूद इसके मामले की हल्की तफ़्तीश तो ज़रूर की जानी चाहिए। मैं निजी तौर पर जानता हूं कि राय साहब को अदबी ज़ुबान बेहद रास आती है इसलिए दरख़्वास्त है राय साहब कि मुझे ऐसा करने की इजाज़त बख़्सी जाए!

इससे पहले कि मंच से आप ये बात दोहराएं मैं ख़ुद ही कह देता हूं कि 2009 वाले उस उजड़े परिसर में अब भवन बन गए हैं। मैं इन इमारतों में पड़े दरारों और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा उत्तर प्रदेश (आपका गृह राज्य) के कुछ लोगों को ग़लत तरीके से लाभ पहुंचाने के आरोपों को झुठलाते हुए सीधे कहता हूं कि आपने शानदार काम किया है। पूरे विश्वविद्यालय को नीचे से उठाकर टीले पर पहुंचा दिया, नीचे वाले हिस्से में शिक्षकों का घर बना दिया, भाड़े के हॉस्टल को ख़त्म कर पहले लड़कियों के और फिर ‘उत्तरी परिसर’ में लड़कों के न सिर्फ़ हॉस्टल बनाए बल्कि पुलिसिया पृष्ठभूमि से आए सरकारी आदमी होने के बावज़ूद जिस हद तक संभव था आपने प्रगतिशीलों, क्रांतिकारियों के नाम पर इन इमारतों के नाम रखे। दलित छात्र-छात्राओं की भूख हड़ताल चलती रही, हर साल प्रवेश परीक्षा में आंतरिक आरक्षण और संवैधानिक आरक्षण के गणित में आप गड़बड़ी करते रहे लेकिन हॉस्टल का नाम जब रखना हुआ तो आपने बिरसा-मुंडा छात्रावास और सावित्रीबाई फुले छात्रावास रखा!

प्रगतिशीलता इसी का तो नाम है! हिंदी लेखिका को छिनाल कहे जाने को कितने महीनों तक कोई याद रखेगा, आरक्षण में भेद-भाव को, विद्यार्थियों पर लाठी भांजने को कितने समय तक कोई याद रखेगा, मनमर्जी से किसी को निकालने और किसी को वर्धा में बनाए रखने को कितने समय तक कोई याद रखेगा, अगर लंबे समय तक याद रखा जाएगा तो सिर्फ़ आपके द्वारा रखे गए इन हॉस्टल के नामों को। गोरख पांडेय छात्रावास, राहुल सांकृत्यायन पुस्तकालय, फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास, कबीर हिल्स, गांधी हिल्स वगैरह। अब तो भगत सिंह हॉस्टल भी बन रहा है न? आपके ऊपर किताब लिखने वाले लोग रीडर बने फिर साल भर में प्रोफ़ेसर बन गए। आपके सामने चुप रहने वाले लोग परिसर से बाहर नौकरी की तलाश में नहीं भटकते, मुझे मालूम है। रिसर्च एसिस्टेंट, एसोसिएट, हिंदी समय डॉट कॉम, अनुवाद प्रोजेक्ट, फलाना प्रोजेक्ट, ढिमकाना प्रोजेक्ट, लेक्चरार आदि, आदि बहुत पद है वहां। पद के मुताबिक़ लोग ही कम हैं। आपको साधने का मतलब है दुनिया कुछ भी कहे लेकिन जिसने आपको साधा है वो इन्सान वहां निश्चिंत रह सकता है। दुनिया की परवाह आप भी कहां करते हैं। इसलिए तो किसी भी आलोचना को तवज्जो नहीं दी और आलोचकों को वर्धा बुला-बुलाकर उनके मुंह में सही शब्द ठूंस दिए। कहिए कि औकात बता दी!

अगर आप हुनरमंद और क़ाबिल नहीं होते तो इतने पुरस्कार और सम्मान फिर आपको क्यों मिलते? इतने सेमिनारों में आपको क्यों बुलाया जाता? दिल्ली की हंस वाली गोष्ठी में कश्मीर पर और वर्धा में उत्तर-पूर्व पर राजधर्म को निभाने वाली नैसर्गिक बात कहने के बावज़ूद पीयूसीएल आपको बलिया में क्यों ऐसे ही विषय पर बुलाता? राजकिशोर वर्धा को आपका हरम बताने के बाद वहां नौकरी क्यों करने जाते? ‘नक्सलबाड़ी कवि’ आलोकधन्वा वहां से पटना जाने के बाद ही आपकी आलोचना क्यों करते? छिनाल प्रकरण के बाद जेंडर समानता के लिए पौधा लगाने का विरोध वहां क्यों नहीं हुआ? मुंहफट विद्यार्थियों को ठिकाना लगाने के बाद वहां आप कितनी शांति से प्रशासन चला रहे हैं? हैं न?  बहुत सारे गुण हैं आपमें लेकिन भूमिहारों की योग्यता को पहचानने की आपकी क्षमता की मिसाल दी जानी चाहिए। भूमिहार भी तो इसी देश के लोग हैं जाहिर है कि उनकी बेहतरी एक तरह से देश की ही बेहतरी है। इस मामले में जो आपका विरोध करेगा, मैं उनका विरोध करूंगा। मैं आपके साथ हूं।

छिनाल प्रकरण को लोग अब भूल गए लेकिन भ्रष्टाचार तो आज-कल देश का बड़ा मुद्दा है और सीएजी (कैग) देश में न्यूज़ तय करने वाली संस्था। फिर भी आप पर कैग की रिपोर्ट आने के बाद बहुत से लोगों को इसके मुतल्लिक कुछ भी मालूम नहीं, तो इससे साबित होता है कि आप एक कुशल प्रबंधक भी हैं। आपका भविष्य उज्जवल है। मुझे बेहद दुख है कि आप सितंबर-अक्टूबर 2013 में वर्धा से अलग हो जाएंगे। सचमुच बेहद दुख है। लेकिन ज़्यादा दुख तब होता जब लगता कि आप साहित्य का मजमा लगाए बिना ही जा रहे हैं। आप 2013 के शुरुआत में ‘हिंदी का दूसरा समय’ कर रहे हैं, मैं खुश हूं। मैं देखना चाहता हूं कि आपके बहिष्कार की बात करने वाले कितने लोग अपनी बात पर टिके रहते हैं। दो साल में दुनिया काफ़ी बदली है। कई लोग समय बीतने के साथ बातों को भूल जाते हैं या फिर भूलने की जिद करने लगते हैं या फिर भूलने का फ़ायदा उठाना चाहते हैं। आपका क्या है, हिंदी का एक समय आने के नाम और एक समय जाने के नाम। वित्त वर्ष ख़त्म होने से पहले-पहले संस्थान के पैसे भी ख़र्च करने हैं, लिहाजा 2013 की गरमा-गरम शुरुआत कीजिए। अकेले आप कितनों की कलई उतार देते हैं, आप जैसे दो-चार लोगों का हिंदी में बने रहना बेहद ज़रूरी है। लोग आपको फ़र्जी कॉमरेड बोलते हैं, मैं दुनिया की नहीं मानता। इसलिए जाते-जाते आपको लाल सलाम!

27 नवंबर 2012

हिंदी को बंद गली का आख़िरी मकान मत बनाइए.




दूसरा भाग
हिन्दी समाज और 'सृजनात्मकता' की पड़ताल करता दिलीप खान का यह आलेख दो भागों में यहां प्रकाशित किया जा रहा है, प्रस्तुत है दूसरा भाग इसका पहला भाग यहां क्लिक कर पढ़ें.

सरकार इतनी संस्थाओं और आयोजनों पर धन झोंकती है, लेकिन हिंदी को सचमुच टिकाऊ और दीर्घजीवी बनाने की कवायद इनमें कहीं नज़र नहीं आती। देश के अधिकांश राज्यों में हिंदी साहित्य का स्कूली पाठ्यक्रम अब भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। इनमें समकालीन लेखकों की लगभग अनुपस्थिति कई सवाल खड़े करती है। पहला सवाल तो ये है कि क्या इन लेखकों ने वो स्तर हासिल नहीं किया कि पुराने लेखकों की बजाए इनको तवज्जो दी जाए? दूसरा सवाल ये है कि क्या हिंदी पाठ्यक्रम को अद्यतन करने वाले लोग कूपमंडूक और लकीर के फकीर वाली परंपरा से ताल्लुक रखते हैं कि कुछ भी नया करने में उनका हाथ कांपने लगता है? तीसरा सवाल ये है कि क्या जान-बूझकर समकालीन समय-समाज को प्रतिबिंबित करने वाली रचनाओं को पाठ्यक्रम से काटकर रखा जाता है और पुराना पड़ जाने पर उसे हमारे सामने पेश किया जाता है? अगर इनमें से किसी भी सवाल का जवाब ‘हां’ है तो वो अकेले परेशान करने के लिए काफ़ी है।  

खिलते हुए हिंदी पट्टी के मध्यवर्ग को ऐसे विषयों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है। साहित्य से यदि कोई अतिरिक्त लगाव नहीं रखे तो उन्हें कुछ भी नहीं पता कि क्या लिखा जा रहा है, कौन लिख रहा है और कैसा लिख रहा है? पूरा का पूरा मध्यवर्ग पूंजी जुटाने में मस्त है। क्या इसी संस्कृति ने मध्यवर्ग को साहित्य से काट दिया है या फिर साहित्य सचमुच उनकी ज़रूरत पूरी नहीं कर पाता? यही मध्यवर्ग गाल पर तिरंगा छापकर जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे के साथ बैठकर नारे लगाता है लेकिन इसी मध्यवर्ग को साहित्य से कोई दिलचस्पी नहीं रहती तो वजह क्या है? दो उत्तर हो सकते हैं एक तो ये कि इस वर्ग ने साहित्य को बदलाव के टूल के तौर पर नकार दिया है या फिर हिंदी का साहित्य मध्यवर्ग की महत्वाकांक्षाओं पर सचमुच चोट करता है और इसी वजह से यह वर्ग इससे कन्नी काटता है। लेकिन एक तीसरा उत्तर भी हो सकता है जो इनसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है। शायद पूरे समाज में पढ़ने को करियर के साथ इस तरह जोड़ दिया गया है कि करियर के अहाते से बाहर की कोई भी चीज़ पढ़ना फ़िजूलख़र्ची लगता है। कंप्यूटर इंजीनियर को यांत्रिक इंजीनियंरिंग नहीं मालूम तो इतिहास और साहित्य के लिए उसे कहां से फुरसत! शिक्षा का पूरा ढांचा ही पठन-पाठन को एक पीपे के भीतर महदूद करने वाला है। हिंदी कोई क्यों पढ़ेगा? हिंदी माध्यम में पढ़ने की सलाह क्यों देनी चाहिए जब सारी की सारी नौकरियों में अंग्रेज़ी को अनिवार्य बनाने की कोशिश जारी हो? एक तरफ़ शिक्षा की योजना बनाते समय सरकारी हुक़्मरान अंग्रेज़ी के प्रति आग्रह रखते हैं, ज़्यादातर सरकारी संस्थानों के प्रश्नपत्र इस घोषणा के साथ विद्यार्थियों के सामने पेश होते हैं कि “वाक्यों में किसी भी तरह की त्रुटि के बाद अंग्रेज़ी को ही आधार माना जाएगा” और दूसरी तरफ़ सरकार हिंदी के विकास को लेकर सितंबर-सितंबर चमकदार आयोजन करती है। सिर्फ़ रेलवे स्टेशनों पर ‘हिंदी हमारी राजभाषा है’ लिखने से हिंदी की महत्ता को सरकार स्थापित नहीं कर सकती (किसी-किसी प्लेटफॉर्म पर तो “राष्ट्रभाषा’ भी लिखा मिल जाएगा।)। इसके लिए सचमुच गंभीर प्रयास करने की ज़रूरत है।
उच्च शिक्षा के माध्यम के तौर पर जब तक हिंदी को प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी तब तक इसका दोयम दर्ज़ा बरकरार रहेगा। ‘दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र’ और ‘दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश’ भारत यह हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाता कि वो अपनी राजभाषा को व्यवहार और चिंतन की भाषा में तब्दील करे। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को यदि सातवीं आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता मिल जाती है तो हमें किस आधार पर गर्व करना चाहिए? बाहर में हिंदी-हिंदी चिल्लाने से मज़बूती कभी नहीं आने वाली। जिस समाज और जिस मिट्टी की यह भाषा है पहले वहां इसे इस्तेमाल करने वाले लोगों को भरोसा दिलाना होगा कि वो इस माध्यम में बेफ़िक्र होकर लिख-बोल सकते हैं। हिंदी बोलने-लिखने के उनके आत्मविश्वास की इज़्ज़त करनी होगी कि उनकी बदौलत ही सरकार संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की दावेदारी पेश कर पा रही है। फ़र्ज़ कीजिए कल को हिंदी को वहां मान्यता मिल गई और देश के भीतर उसे हिकारत से ‘ओह माई गॉड हिंदी’ कहकर देखा जाए तो सरकार के इस भाषाई प्रेम को लेकर कैसी तस्वीर उभरेगी?  
लोग पढ़ना चाहते हैं और पढ़ भी रहे हैं, लेकिन उनकी दिक़्क़त ये रहती है कि अलग-अलग विधाओं की विषय-सामग्री उनको हिंदी में नहीं मिल पाती। आख़िरकार हिंदी को लेकर चिंतित हुक़्मरान एक आसान काम क्यों नहीं कर पाते कि दूसरी भाषाओं की बेहतर किताबों का वो हिंदी में अनुवाद करवा दे। कितने रुपए इस मद में ख़र्च करने होंगे? हिंदी आयोजनों और हिंदी के नाम पर नए-नए संस्थान खोलने में जितनी धनराशि फूंकी जाती है उसके मुकाबले कहीं कम बजट में इसे पूरा किया जा सकेगा। भाषा के टिकाऊपन के लिए उसे प्रचलन, बोल-चाल, पठन-पाठन, विमर्श और सबसे अहम कि उसे रोज़गार की भाषा के तौर पर स्थापित करना होगा। आश्वस्त पेट के मार्फ़त की गई चिंता ज़्यादा ठोस होगी।         
जिस राजभाषा को अपनाने के बाद पेट पालने का सवाल सबसे पहले सामने आ जाए तो उसमें फैलाव कैसे आएगा? भाषा के फ़ैलाव के लिए जिन्हें ज़िम्मेदारी दी गई है वो नौकरी कर घर-गृहस्थी चलाने में व्यस्त हैं। इनमें से कई लोगों के भीतर भाषा की बेहतरी की कोई चिंता नहीं है और जो लोग सचमुच चिंतित है उनके हाथ में ज़िम्मेदारी और अधिकार नहीं हैं। हिंदी साहित्यिक दुनिया में ऐसे कितने लेखक हैं जो सिर्फ़ लिखकर जीवन-यापन कर पा रहे हैं? किसी का रबर का धंधा है तो कोई प्रबंधक है, कोई मिठाई की दुकान चलाता है तो कोई कपड़े का व्यापार करता है। फिर भी हठधर्मी होकर अगर कोई यह  तय कर ले कि वो कोई नौकरी नहीं करेगा और पठन-पाठन से अलग कोई धंधा भी नहीं, तो अगले कदम पर लघु-पत्रिका उसके स्वागत में खड़ी रहती है। दो-एक विज्ञापन के सहारे पत्रिका निकलनी शुरू होती है। लिखने वाले लोगों को कोई भुगतान नहीं होता। संबंधों के आधार पर लेख आ जाते हैं और महीने के अंत तक खींच-तान कर पत्रिका भी। कभी अगर लेखक ने रचना भेजने में देरी कर दी तो पत्रिका तत्काल प्रभाव से मासिक से अनियतकालीन में तब्दील कर दी जाती है। सैंकड़ों-हज़ारों की तादाद में निकलने वाली ऐसी पत्रिकाओं में इक्के-दुक्के ही ऐसी होती हैं जिनको देखकर लगता है कि इनके पीछे संपादक की कोई योजना है। ज़्यादातर प्रतियां मुफ़्त में बंटने के बाद बिक्री भले ही दस फ़ीसदी ही हो, लेकिन पत्रिका के कवर पर छपी क़ीमत को कम नहीं किया जा सकता! पता नहीं किस स्तरीयता के बोझ में दबकर संपादक यह आत्मघाती फ़ैसला लेते हैं?
हिंदी पट्टी के जिन इलाकों में संभावना तलाशती ये पत्रिकाएं पहुंचती हैं, वहां पहले से कुकुरमुत्तों की तरह ‘चार महीनों में फ़टाफ़ट अंग्रेज़ी’ सिखाने वाली कोचिंग खुल चुकी होती है। चौराहे-चौराहे ‘ब्रिलिएंट इंग्लिश’, ‘ब्रिटिश इंग्लिश’ और ‘इंग्लिश वर्ल्ड’ जैसे आकर्षक नामों की तख़्तियां टांग दी जाती है। रैपिडेक्स की खुराक तले बच्चे बड़े होते हैं। उनका ख्वाब ही है कि वो एक बार, बस एक बार अंग्रेज़ी बोलना सीख जाए तो दुनिया को कदमों में झुका लेंगे। अंग्रेज़ी ज्ञान तक पहुंचने का साधन न बनकर खुद ही ज्ञान बन जाती है। भाषा से ज्ञान तक के सफ़र में वह पूरे समाज में एक ख़ास अधकचरी भाषिक संस्कृति का निर्माण करती है और वहां के लोग शहरी इलीट की बोलचाल के साथ तादात्म्य बैठाते हुए गर्व महसूसने में जुट जाते है। अंग्रेज़ी के साथ इलीटनेस का जो बोध जगता है उसी को हासिल करने के पीछे लोग अपनी ऊर्जा झोंकने लगते हैं और जाहिर है वो न इलीट बन पाते हैं और न ही अपनी मिट्टी में जमे रह पाते हैं। वो नकलची जैसा बनकर रह जाते हैं और इन नकलचियों के बीच सर्वाधिक प्रिय ‘आत्मविश्वास कैसे बढ़ाए’, ‘धनी बनने के सौ टिप्स’, और ‘आकर्षक व्यक्तित्व के राज’ मार्का चमचमाती जिल्द वाली किताबें होती हैं। सब कुछ मशीनी बन कर रह गया है। व्यक्तित्व, पैसा, आत्मविश्वास, शोहरत, इज़्ज़त, वगैरह सबकुछ। एक किताब के भरोसे अमीर बनने का ख्वाब देखने वाली आबादी किस तरह खुद को स्थिर रखकर साहित्य के साथ समय दे पाएगी? दो मिनट का नास्ता और तीन मिनट की पढ़ाई के बीच बाज़ार द्वारा पेश किया गया पूरा व्यक्तित्व ही ओढ़ लेना चाहते हैं लोग। असलियत यही है कि इस पूरे समाज को यही रेडिमेड चीज़ें आकर्षित करती हैं। हर भाषा में ऐसा हो रहा है। हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी, सबमें। समाज में काफ़ी बदलाव आया है। बीते बीस साल की बेस्ट सेलर किताबों की सूची देख लीजिए उनमें ज़्यादातर ऐसी ही किताबें शामिल हैं।
सामाजिक बनावट से पठन-पाठन की प्रकृति अलग नहीं है। मुल्क के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के साथ ये चीज़ें जुड़ी होती हैं। जिस तरह की विश्व व्यवस्था होगी, जैसा समाज होगा वो अपने साथ पढ़ने के आस्वाद को भी बदलेगा। अगर क्रिकेट को पुचकारा जाएगा तो क्रिकेट पर बिकने वाली पत्रिकाओं का प्रसार भी बढ़ेगा और इन पत्रिकाओं का प्रसार बढ़ेगा तो जाहिर तौर पर क्रिकेट को और ज़्यादा पुचकार मिलेगी। अलग-अलग माध्यमों की उपस्थिति ने इस प्रवृत्ति को मज़बूत किया है। टीवी और रेडियो पर इतनी सघनता से क्रिकेट अगर बजाए जाएंगे तो दर्शकों के मन में कृत्रिम कौतुहलता पनपेगी ही। फिर इसी कौतुहलता को भरने के नाम पर पत्रिकाओं और अख़बारों के पन्ने रंगे जाएंगे। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मीडिया के सारे उपांग मिलकर किसी विषय को सर्वाधिक रुचिकर विषय के तौर पर स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।
सामाजिक रुचियों के संदर्भ में यह पड़ताल का ज़रूरी मुद्दा है कि क्या माध्यम के प्रति लोगों का रुझान बदला है? क्या इन माध्यमों के आगमन के बाद लंबा पढ़ने की आदत कम ही है? क्या किताब को टेलीविज़न, इंटरनेट और संचार के अन्य नए माध्यमों ने अपदस्त कर दिया है? क्या नई संचार तकनीक ने सबकुछ संक्षिप्त, छोटा और चुस्त करने की बात लोगों के जेहन में बैठा दी या फिर रुचिकर और लोकप्रिय रचनाओं की कमी हो चली है? पुस्तक मेलों में सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों की सूची में हाल में लिखी किताबें जगह नहीं बना पाती जबकि साहित्य के प्रति उदासीनता के लाख चर्चों के बावज़ूद प्रेमचंद की कहानियां, उपन्यास और बच्चन की मधुशाला अब भी खूब बिकती है। युवा वर्ग में जो किताबें लोकप्रिय हैं उनमें गुनाहों का देवता और मुझे चांद चाहिए प्रमुख हैं। क्या नई शैली लोगों को पसंद नहीं आ रही है या फिर साहित्य का प्रचार लोगों तक नहीं हो रहा? अख़बारों और पत्रिकाओं की संख्या पर नज़र दौड़ाए तो इनमें बेतहाशा वृद्धि हुई है, इनमें से लगभग उतनी पत्रिकाओं और उतने अख़बारों में तो उतनी किताबों के बारे में सूचना ज़रूर छपती हैं जितनी पहले छपती थी लेकिन बड़ी प्रसार संख्या वाले अख़बारों से यह लगातार ग़ायब हो गए। हालांकि एक बड़ा और प्रमुख कारण यह भी है कि पहले हिंदी अख़बारों-पत्रिकाओं के जितने बड़े संपादक थे, उनमें से ज़्यादातर पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में भी सक्रिय थे और साहित्य का मोल जानते थे। आज की तारीख़ में कई संपादकों की साहित्यिक समझदारी तो उतनी भर है जितनी से उन्हें पता चल जाए कि कौन सी किताब विवादों के घेरे में हैं और किसको कौन सा पुरस्कार मिला। यानी ख़बर में यदि साहित्य है तो थोड़ी-सी नज़र मार ली! पन्नों से ख़बर ग़ायब हुई तो जेहन से साहित्य भी!
विशेषज्ञता के जमाने में अब ऐसा लग रहा है कि एक साथ कोई व्यक्ति एक ही परिचय रख सकता है। मतलब अगर कोई साहित्यकार है तो वह पत्रकार नहीं हो सकता और अगर वह दोनों है तो विशेषज्ञता पर लोग थोड़ा शक करने लगेंगे। लेखन के इस विभाजन ने लेखन-शैली को भी विभाजित कर दिया है। पत्रकारों की ज़रूरत है कि वो समाज के बीच रोज़-रोज़ जाए ताकि अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए ख़बरों की खुराक संबंधित अख़बार (या पत्रिका/टीवी चैनल) को मुहैया करा सके। लेखकों को यह ज़रूरत नहीं रह गई है। वो अपनी खुराक घर बैठे ही हासिल कर ले रहा है। बंद दरवाज़ें के उस पार लिखने में मशगूल लेखक को जनता क्यों तवज्जो देगी? आम जनता और लेखकों के बीच लगातार चौड़ी होती जा रही यह दूरी लोगों के बीच साहित्य के प्रति जग रही अरुचि के प्रमुख कारणों में से एक है। लोगों के भीतर एक विश्वास यह भी बना है कि लेखक समाज से एक हद तक कटा हुआ प्राणी होता है। इस दूरी के एहसास ने बड़ी संख्या में आम लोगों को साहित्य से दूर किया है। एक तो सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था बदलने से लोगों की रुचि में आ रहे परिवर्तन की वजह से ‘करियर के लिए अनुपयोगी चीज़ों पर समय जाया’ नहीं करने का प्रचलन वैसे भी तेज हो रहा है तिस पर लेखकों द्वारा खुद को समेटे रखना और ज़्यादा अरुचि फ़ैला रहा है। जर्मन के बर्टोल्ट ब्रेख़्त से लेकर हिंदी के राहुल सांकृत्यायन तक को याद करने से जो पहली तस्वीर उभरती है वो यही कि इन लोगों ने लगातार समाज के साथ संवाद कायम रखा। मौजूदा दौर के हिंदी लेखक (ख़ासकर साहित्यकार) इस मामले में निराश करते हैं। जो संस्था जनता से दूरी बना लेगी, जनता कैसे उसे स्वीकार करेगी?
हिंदी के पाठक वर्ग में सामाजिक तौर पर ज़्यादा सामूहिकता देखी जा सकती है। अंग्रेज़ी में जीने-सोचने वाले समाज की तरह अभी वो ईकाई में नहीं बंटा है। हमारे यहां अंग्रेज़ी समाज की भाषा के तौर पर अभी भी स्थापित नहीं है। लोग टुकड़ों में अंग्रेज़ी बोलते हैं। मसलन एक समाज में यदि दर्ज़न भर लोग अंग्रेज़ी बोल रहे हैं तो उनके रहने-सहने की व्यवस्था एक साथ नहीं है। यानी भाषाई आधार पर वो एक समाज का निर्माण नहीं कर पा रहे। अंग्रेज़ी का पूरा समाज ऐसी ईकाई के तौर पर ही बना हुआ है। इसलिए घर बैठे लेखन करने वाले अंग्रेज़ी लेखकों की किताबें हिंदी लेखकों की तुलना में ज़्यादा मशहूर और ज़्यादा लोकप्रिय हो जाती हैं। यह उनकी सामाजिक बनावट के अनुकूल है। हिंदी में ऐसी परिपाटी दूर तक नहीं चल पाती। समाज में जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि लेखक रोज़-रोज़ सड़क नापते रहे, बल्कि यह ज़रूर है कि वो अपने लेखन में मौजूदा सामाजिक ज़रूरतों और मनोभाव को सही रूप में जाहिर करे। इसी भाव को समझने के लिए सड़क नापने की ज़रूरत है।
जब तक हिंदी अनिवार्य है तब तक तो अगली कक्षा में जाने के लिए सबको पढ़ना है, लेकिन उच्च शिक्षा में हिंदी लोग क्यों पढ़ते हैं इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। पढ़ने के दौरान उद्देश्य क्या होता है? विश्वविद्यालय से पीएच.डी करते समय तकरीबन सारे शोधार्थी इस कोशिश में रहते हैं कि उसी चौहद्दी में वो जीवन गुजार दे, और यब लेक्चरर वाली एक अदद सीट मिलने पर निर्भर करता है। अपनी रचनात्मक ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा इसी मामले को फिट करने में हिंदी के शोधार्थी लगाते रहते हैं। अकादमिक दुनिया में सफ़लता पाने की जो ‘पाई लागूं’ संस्कृति है उसमें खुद को पहले से ढालने की जुगत में भिड़ जाते हैं। फिर जिस रस्ते नौकरी को प्राप्त होते हैं उसी रास्ते को आदर्श मानते हुए अपने विद्यार्थियों को पाठ पढ़ाते हैं। आख़िर कैसे एक आज़ाद हवा में सांस लेने वाली संस्कृति पनपेगी? 
लेकिन उम्मीद भी है। हिंदी में लिखने वाले लोगों की तादाद इतनी बड़ी है यह बात इंटरनेट बता रहा है और वो भी तब जब बेहद सीमित लोगों की इस तक पहुंच है। ब्लॉगों ने हिंदी को फ़ैलाया है और दुनिया भर में फ़ैलाया है। इंटरनेट के इस्तेमाल पर लगभग सहमति बन चुकी है। इसलिए धीरे-धीरे हिंदी के बूढ़े-बुजुर्ग भी आज-कल इंटरनेट पर हाथ आजमाने लगे हैं या फिर पोते-पोतियों के मार्फत इसकी ख़बर रखने लगे हैं। अख़बार अपने प्रिंट संस्करण के साथ-साथ इंटरनेट पर भी अपडेट कर रहा है, टीवी चैनल भी इंटरनेट पर मौजूद है। अंग्रेज़ी मौजूद है, हिंदी मौजूद है। हिंदी के लिए यह सुखद है कि यहां इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन, हिंदी संस्थानों में इंटरनेट को लेकर कैसी मानसिकता है इसका एक अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा द्वारा संचालित हिंदी समय डॉट कॉम पर जब ‘डेली विजिटर’ की संख्या मात्र 200 पर पहुंची तो वहां इसके संचालक ने मिठाई बांटी। सितंबर 2012 में यह वेबसाइट महज 200 लोगों को रोज आकर्षित कर पाने में कामयाब हुई। लाखों रुपए हर महीने इस पर झोंके जा रहे हैं जबकि निजी तौर पर एक व्यक्ति-दो व्यक्तियों द्वारा संचालित कई ब्लॉगों-वेबसाइटों पर रोज़ाना 500 से ज्यादा लोग आवाजाही करते हैं। यह उदाहरण ये दर्शाता है कि संस्थागत रूप से हिंदी सड़ी हुई है। आप इसे उल्टा कर कहिए कि हिंदी को विकसित करने के नाम पर बनी सारी संस्थाएं सड़ी हुई हैं।
(दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका अहा! जिंगदी में देवाशीष प्रसून के इनपुट के साथ प्रकाशित)