जो सोचते हैं, वे वामपंथी होते हैं : अरुंधति राय
अरुंधती राय ने समय की हकीकत को पहचाना है बदलते समय मे सघर्ष और पीड़ा के बीच दबी कुचली जनता के सामने एक रास्ता बनाने का प्रयास उनकी बातों में झलकता है हम प्रभात खबर से साभार उनका यह साक्षात्कार प्रकाशित कर रहे है-
भारतीय समाज को आप किस नजरिये से देखती हैं?
किसी भी समाज के बारे में दो वाक्यों में नहीं बताया जा सकता है. एक लेखक समाज के बारे में बताने में पूरी जिंदगी गुजार देता है. लेकिन मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रीका में जिस प्रकार का रंगभेद होता था, ऐसा ही भारत में भी है. वहां आप काले-गोरे के भेद को खुलेआम देख सकते थे, लेकिन यहां पहचान करने में थोड़ी मुश्किल है. यह भी रंगभेद का ही एक प्रकार है.
आप कई बार समाज के सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़ी नजर आयीं. इसके पीछे क्या कारण रहा?
मेरे ख्याल में दो किस्म के लोग होते हैं. एक, जिनका शक्तिशाली लोगों के साथ नेचुरल एलाइनमेंट रहता है, दूसरे वे लोग हैं जिनके पास कुछ नहीं है. जनता के पास शक्ति तो काफी है, लेकिन देश में जो कुछ हो रहा है, उसे किस प्रकार से ठीक किया जाये, उसका सही तरीका समझ में नहीं आ रहा है. अगर कोई प्रधानमंत्री भी बन जाये, तो वह सबकुछ सुधार नहीं सकता. मुझे नहीं लगता है कि ऊपर से कोई सुधार हो सकता है, सुधार निचले स्तर से ही संभव है.
अभी देश की विकास दर 10 फीसदी के पास है, सरकारी आंकड़ों में 26 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, हर साल अरबपति लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, सेंसेक्स डेली रिकॉर्ड ऊंचाई छू रहा है, विदेशी पूंजी का प्रवाह बना हुआ है. इस पूरे ताने-बाने को आप किस रूप में देखती हैं?
ये जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है. यह सिर्फ उनको अच्छा लग रहा होगा, जो निजी कंपनियों के सीइओ होंगे, जिनका स्टॉक एक्सचेंज काफी बढ़ रहा है. इसको कैसे रोका जाये इस सवाल का जबाव ढूंढना होगा. मुझे लगता है कि गांधीवादी माहौल का जो रेसिस्टेंस है वो अब नहीं चलता. इसमें पूरी तरह एनजीओ आ गये हैं, लोगों को बांट देते या खरीद लेते हैं. इस माहौल को बदलने का हल क्या है? हल है भी या नहीं, ये भी हमें पता नहीं? मुझे लगता है कि अगर कोई रैडिकल रिवोल्यूशनरी सोल्यूशन नहीं होता है तो फिर कुछ वर्षों में पूरे देश में अपराध बढ़ जायेगा.
सरकार की नीतियां समाधान के बदले किस तरह जनता के हितों के विरुद्ध जा रही है?
आज आप कुछ भी करो सरकार, पुलिस और आर्मी कुचल देती है. पहले तो इसलामिक टेररिज्म का नाम लिया जाता था, लेकिन अब उन्हें लगता है कि इसलामिक टेररिज्म में सब नहीं आते इसमें सिर्फ मुसलमान ही आते हैं, तो बाकियों को कैसे बंद किया जाये. अब जो इस्लामिक टेररिज्म के श्रेणी में नहीं आते हैं उसे माओवादी टेररिस्ट बना दिया गया है. इस तरह राज्य के लिए आतंकवाद का जो पुल है वह बढ़ रहा है. अभी जो कुछ छत्तीसगढ़ में हो रहा है यही चीज कोलंबिया जैसे देश में हुआ था. वहां पर सरकार ने खुद एक पिपुल मिलिशिया खड़ी कर दी और विद्रोहियों के साथ उनका सिविल वार जैसी स्थिति बन गयी, जब सभी लोग छद्म युद्ध देख रहे थे, तो एक बड़ी कंपनी वहां जाकर खनिज की खुदाई की, यही छत्तीसगढ़ में हो रहा है. लोगों को नचाने में ये लोग काफी उस्ताद हैं. इन दिनों एक बात पर काफी चर्चा हो रही है कि सीइओ को 25 करोड़ की सैलरी मिलनी चाहिए या नहीं. इसमें कहा गया कि अगर उनका वेतन कम होगा तो रिफॉर्म की प्रक्रिया बंद हो जायेगी. अब आप बताइये इन दिनों किसी कंपनी के सीइओ के पद पर किस तबके लोग बैठते हैं.
पिछले डेढ़-दो दशक में हमारे देश में उपभोक्तावादी संस्कृति काफी हावी होती जा रही है.आपकी नजर में समाज पर इसका क्या असर हो रहा है?
कुछ दिनों पहले अखबार में एक बड़ा विज्ञापन शॉपिंग रिवोल्यूशन के संबंध में आया था. मुझे लगता है कि भारत में उदारीकरण की जो नीति आयी है इसने मध्य वर्ग को फैलाया है. इससे आज हमारे देश में अमीरी-गरीबी की खाईं बढ़ती जा रही है, अमीर और धनी होते जा रहे हैं, गरीब पिछड़ते जा रहे हैं. उदाहरण के लिए सौ लोगों को रोटी, कपड़ा, पानी और यातायात की सुविधा मिलती है लेकिन अधिकतर लोग इससे वंचित रह जाते हैं. लेकिन यदि आप कोई नयी आर्थिक नीति लाते हैं, जिसके तहत 25 लोगों को बहुत अमीर बनाते हैं और बाकी 75 लोगों से सभी कुछ छीन लेते हैं तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव समझा जा सकता है. अभी भारत का बाजार इस प्रकार से बनाया जा रहा है कि ज्यादातर लोगों से काफी कुछ छीन कर कुछ लोगों को दे दिया जाये. अब यह समझना होगा कि ये लोग उपभोक्ता की वस्तु कहां से ला रहे हैं. यदि आप भारत का नक्शा देखें, तो पता चलता है कि जहां पर जंगल है उसके नीचे खनिज- संपदा है. अब आपके पास चुनने का विकल्प है. जंगल को काट कर निकाल दें और इससे बहुत पैसा भी मिलेगा पर इससे 50 वर्षों में सारा देश सूख जायेगा. हमारे देश के प्रधानमंत्री हों या मोंटेक सिंह अहलूवालिया या पी चिंदबरम इनके पास कोई कारगर नीति नहीं है सिर्फ आंकड़े दिखाते हैं. इससे ज्यादा खतरनाक क्या हो सकता है कि बगैर किसी ऐतिहासिक साहित्यिक या सामाजिक नजरिये से देखने के बजाय आप आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं.
एक तरफ अमेरिकी नीति मानवता के इतनी खिलाफ लगती है, लेकिन दूसरी ओर हर कोई अमेरिका जाने का मौका छोड़ना नहीं चाहता है. ऐसा क्यों?
अमेरिका के लिए मुझे कोई चाह नहीं है, मैं सच कहूं तो मुझे घसीट कर भी ले जाओ तो मैं वापस चली आऊंगी. इतना मशीनी बन कर मैं रहने का सोच भी नहीं सकती हूं. लेकिन अगर आप किसी गांव के दलित हों, आप वहां पानी नहीं पी सकते, किसी के सामने नहीं जा सकते और फिर आपको अमेरिका जाने का मौका मिले तो क्यों नहीं जायेंगे? अमेरिका ज्यादातर नेताओं और अधिकारियों के बच्चे ही जाते हैं. लेकिन इतना सत्य है कि यह खतरनाक प्रवृत्ति है.
किस प्रकार से आप खतरनाक मानती हैं?
खतरनाक है, अगर आप 16 या 18 वर्ष के बच्चे को अमेरिका भेज दो तो उसका पूरा दिमाग या उनके सोचने का तरीका बदल जाता है. वो भी किसी जेल में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों में. वहां उनका पूरा ब्रेन वॉश हो जाता है. यह अमेरिकी नीति है कि नौजवानों को पहले अपने यहां प्रशिक्षण दो और फिर उन्हीं का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करो, जैसा कि 1973 में चिली में जो कू हुआ था आइएमए के खिलाफ. इससे पहले अमेरिका ने वहां के नौजवानों को शिकागो स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भर्ती किया, स्कॉलरशिप देकर इनके दिमाग में न्यू कंजरवेटिव फ्री मार्केट आइडियोलॉजी डाल दी गयी और फिर इन लोगों ने चिली का जिस तरह से दोहन किया वह सभी को पता है.
हमारे भारत में भी मुख्यत: इलीट वर्ग के बच्चे अमेरिका जाते हैं, जिनके बाप-दादा यहां मंत्री, ब्यूरोक्रेट या बड़े बिजनेसमैन हैं. इस तरह से यह पूरा चक्र घूमता है.
भारतीय लेखन का मौजूदा दौर आपको कैसा लगता है?
ये भारतीय लेखन क्या है? मैं इसे नहीं मानती हूं. क्या जो अंगरेजी में लिखते हैं वे अलग हैं? हिंदी या भोजपुरी में लिखनेवालों में ऐसा नहीं है. अंगरेज़ी के भारतीय लेखक, कहानी को घुमा-फिरा कर पाठक को संदेह में डाल देते हैं. भारतीय भाषाई लेखन का क्या भविष्य देखती हैं? भारतीय भाषाई लेखन का भविष्य, क्षेत्र पर निर्भर करता है लेकिन मुझे लगता है कि भाषाई लेखन का माहौल पूरी तरह से अलग हो रहा है. इलीट वर्ग समाज से पूरी तरह अलग हो गया है. निम्न तबका उनके पास पहुंच नहीं पाता, ऐसे में दोनों के बीच संवादहीनता का माहौल पैदा हो गया है. दोनों के पास कोई भाषा ही नहीं बची है और जब आपको लिखना होगा तो दोनों को समझने की आवश्यकता होगी. इस तरह की परिस्थिति में आप कैसे भाषाई लेखन का भविष्य देख सकते हैं.
ऐसा देखने में आता है कि इलीट वर्ग के बच्चे समज से पूरी तरह कट से गये हैं. इसके पीछे प्रमुख वजह क्या है?
आपने सही कहा कि आज के धनी वर्ग के बच्चे पूरी तरह से समाज से कटे हुए हैं. कुछ दिनों पहले इसी वर्ग में से आनेवाली एक लड़की ने कहा कि अरुंधति तुम्हारी किताब द अलजेब्रा ऑफ इनफिनिट जस्टिस मैंने अपने भाई को पढ़ने को दिया तो उसने काफी आश्चर्य से आदिवासियों के बारे में बोला भारत में इस प्रकार के प्राणी भी रहते हैं. ऐसा नहीं है कि ये बच्चे खराब हैं या दिल से बुरे हैं. लेकिन समाज से कट से गये हैं. इसके पीछे मुझे कारण लगता है कि इनदिनों इस प्रकार की दुनिया बन रही है जिसमें गाड़ी, अखबार, कॉलेज, अस्पताल, शिक्षा आदि सभी कुछ इस वर्ग के लिए अलग है. जबकि पहले ऐसी बात नहीं थी. आज जो समाज में खाई बनी हुई है, यह किसी भी तरह से लाभकारी नहीं हो सकता. इसी वजह से ये इलीट वर्ग आज सिर्फ छीननेवाले बन गये हैं, इनसे आप किसी भी तरह की उम्मीद नहीं कर सकते हैं.
आप अमेरिका, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाकर वहां के सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखती हैं. इस तरह से लिखने का साहस आप कैसे दिखा पायीं?
जब 11 सितंबरवाली घटना हुई तो मैंने इस घटना के विषय में काफी सोच-विचार किया. इसके बाद मैंने निर्णय लिया कि अगर मैं लेखिका हूं तो इसपर लिखूंगी. अगर नहीं लिख सकती तो जेल में जाकर बैठना मेरे लिया ज्यादा अच्छा होगा. यह निर्णय मैंने तुरंत लिया और लिख डाला. लेकिन भारत में काफी लल्लो-चप्पो करनेवाले लोग हैं, यहां बुश के खिलाफ लिखनेवाले बहुत कम लोग हैं, जबकि आपको अमेरिका में इनके खिलाफ बोलनेवाले काफी ज्यादा मिलेंगे. वियतनाम की लड़ाई के खिलाफ अमेरिका में जितना विरोध हुआ वह मिसाल है. सैनिकों ने अपने मेडल वापस कर दिये. क्या भारत में ऐसा संभव है? कश्मीर के मुद्दे पर सेना ने कभी कुछ नहीं बोला.
न्यायपालिका से आपके विरोध को लेकर काफी चर्चा हुई थी. क्या आपको लगता है कि देश में न्यायिक सक्रियता के दौर के बावजूद न्यायिक ढ़ांचा खासा जर्जर है?
मुझे लगता है कि प्रजातंत्र में सबसे खतरनाक संस्था ज्यूडिसियरी है, क्योंकि यह जिम्मेदारी से अपने को मुक्त किये हुए है. कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट ने सबको डरा दिया है. आप इसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं, प्रेस भी कुछ नहीं कर सकता. अगर आप जजमेंट को देखें तो आपको पता चलेगा कि कोर्ट कितनी गैरजिम्मेदाराना ढंग से निर्णय देती है. प्रजातंत्र में ज्यूडिसियरी का इतना शक्तिशाली होना सही नहीं है.
जल, जंगल और जमीन के मुद्दे पर आप काफी काम करती हैं. जिस तरह से जंगल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दिया जा रहा है और आदिवासियों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है. इसका भविष्य आप किस रूप में देखती हैं?
एक किताब है जिसका नाम कोलैप्स है. इसमें एक ईस्टर आइलैंड के बारे में लिखा गया है जो प्रशांत महासागर में है. यहां काफी बड़े-बड़े पेड़ों को वहां रहने वाले लोग अपने रिवाज कि लिए काटा करते थे, जबकि उन्हें मालूम था कि तेज समुद्री हवाओं से ये बड़े पेड़ उन्हें बचाते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने एक-एक करके पेड़ों को काट डाला और अंत में समुद्री तूफान से वह आइलैंड नष्ट हो गया, कमोबेश भारत में भी यही स्थिति बनती जा रही है. सरकार शॉर्ट टर्म फायदा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को माइनिंग करने की इजाजत दे रही है और ये कंपनियां अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं, जिसका कुप्रभाव हमें कुछ वर्षों के बाद दिखायी देगा. मानव और जानवर में यही अंतर है कि जानवर भविष्य नहीं देखते हैं और मानव भविष्य के बारे में सोचते हैं. लेकिन यहां समस्या यह है कि सरकार ज्यादा लंबा भविष्य न देखकर कम समय का भविष्य देख रही है. यह सही है कि आज इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियां माइनिंग के बदले काफी धन दे रही हैं, लेकिन आज से पचास वर्ष बाद क्या स्थिति होगी? एक वेदांत नाम की कंपनी उड़ीसा में बॉक्साइट निकाल रही है जबकि बदले में वह वहां विकास करने की बात करती है. लेकिन जहां बॉक्साइट का भंडार है उससे उड़ीसावासियों को पानी मिलता है. अब आप ही बताइये उसे खत्म करने के बाद पानी की कमी होगी या नहीं. इसलिए सरकार थोड़े समय के लाभ के लिए लंबे समय वाले नुकसानवाली नीति पर चल रही है.
हथियार और बम के बूते दुनिया में दादागिरी दिखाने वाले राष्ट्रों के खिलाफ कोई विश्वजनमत क्यों नहीं तैयार हो पा रहा है?
पूंजीवादी दौर में सभी अपने-अपने फायदे में लगे हुए हैं. किसी के खिलाफ जाने पर फायदा नहीं की सोच पूरे राष्ट्र में व्याप्त् है. लेकिन यह शॉर्ट टर्म विजन है. वास्तव में इसका फायदा कुछ शक्तिशाली राष्ट्र उठा रहे हैं. हाल में ही अमेरिका और भारत के बीच हुए न्यूक्लियर डील को आप किस रूप में देखती हैं? भारत और अमेरिका के बीच हुए न्यूक्लियर डील को देखकर मुझे यह लगता है कि हमारे नेताओं ने अदूरदर्शिता दिखायी है. उन्हें यह नहीं मालूम कि जिन्होंने भी अमेरिका के साथ डील किया, उनकी क्या हालत हो गयी. अमेरिका अब एक ऐसी नीति बनायेगी जिससे वह पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण में ले लेंगे. फिर कहेंगे एनरॉन का कॉट्रेक्ट साइन करो नहीं तो यह नहीं देंगे, वह नहीं देंगे. इस तरीके से अमेरिका भारत के ऊपर हावी हो जायेगा.
आतंकवाद आज पहले से ज्यादा खतरनाक मुद्दा बन गया है, इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया में जो भी पहल हो रही है, उसमें देशों की आपसी गुटबंदी ही ज्यादा दिखायी पड़ती है. आतंकवाद की चुनौती से निपटने का कारगर तरीका क्या हो सकता है?
आप इसे रोकने की जितनी ज्यादा कोशिश करेंगे यह उतना ही ज्यादा बढ़ेगा. इस्लामिक देशों का सारे तेल पर नियंत्रण कर रहे हैं. हर चीजों का निजीकरण किया जा रहा है. अगर आप किसी के संसाधन पर कब्जा करेंगे तो इसके खिलाफ विद्रोह तो फैलेगा ही. इससे निपटने के लिए सरकारों को अपने नीतियों को लेकर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है. भारत की ही स्थिति देखें तो छत्तीसगढ़ में 600 गांवों के लोगों को हटा कर एक पुलिस कैंप में डाल दिया जाता है. हजारों लोगों को घर से बेघर करने का असली मकसद क्या है? असली आतंकवादी वे ही हैं जो नंदीग्राम से लोगों को भगा रहे हैं, कलिंग नगर में गोली चला रहे हैं. जहां तक विश्वस्तर पर आतंकवाद की समस्या से निपटने के प्रयास की बात है, मुझे लगता है कि इसके लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हो रहा है. सभी अपने-अपने लाभ की प्रकृति को देखते हुए आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करते हैं.
आपके विचारों में वामपंथ का प्रभाव ज्यादा दिखता है, इसकी वजह क्या है?
मेरा वामपंथ, पार्टीवाला वामपंथ नहीं है. सोचने वाले जो भी लोग होंगे, निश्चित रूप से उनके विचारों में वामपंथ का प्रभाव दिखायी देगा, यह बात कहने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है. सरकार की नीतियों के बारे में सोचने पर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं पागलखाने चली जाऊंगी.
आप गांधी जी से किस तरह से प्रभावित हैं?
कुछ चीजों में गांधी जी से काफी प्रभावित हूं, लेकिन गांधी जी के जाति के संबंध में जो विचार थे उनसे मैं असहमत हूं. मुझे गांधी के आर्थिक विचार काफी प्रासंगिक लगते हैं लेकिन सरकार ने उनके विचार को खेल बना दिया है. यह गांधी के विचारों का मखौल उड़ाना है. राजनीतिज्ञ इस समय गांधी के नाम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए करते हैं. जहां फायदा होता है, वहां गांधी के नाम का दुरुपयोग करने से भी परहेज नहीं करते.
ऐसी चर्चा है कि इन दिनों मेधा जी से आपका कुछ वैचारिक मतभेद चल रहा है? इसके पीछे मूल वजह क्या है?
यह सरासर गलत बात है, मेरा मेधा जी से किसी प्रकार का अनबन नहीं है. वे एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जबकि मैं अपने आपको सोशल वर्कर नहीं मानती हूं क्योंकि मैं कष्ट उठा कर कोई काम नहीं कर सकती. मैं अपने आपको लेखिका मानती हूं. मैं किसी मुद्दे पर लिख सकती हूं. मुझमें नेतृत्व का गुण नहीं है. मैं नेता कभी नहीं बन सकती हूं.
आप अपने लेखन और रचनात्मक आंदोलन में हिस्सेदारी को लेकर आगामी सालों के लिए क्या प्रतिबद्धता मानती हैं?
मैं किसी को आगे रास्ता दिखाउंगी इसका मैं वचन नहीं दे सकती. मैं नियम बना कर कोई काम नहीं करती. वक्त के अनुसार निर्णय लेती हूं.
02 जुलाई 2007
29 मई 2007
बदलाव की धुरी नहीं रहा मध्यम वर्ग
पिछली कुछ शताब्दियों के दौरान भारत में सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तन लाने में मध्य वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका रही थी, लेकिन अब उसी मध्य वर्ग ने परिवर्तन के प्रबल विरोधी का चरित्र अख्तियार कर लिया है। वह प्रतिक्रियावादी हो गया है, वह आज ऐसे किसी भी बदलाव के पक्ष में तत्पर नहीं होता जो उसकी मौजूदा स्थिति के लिए असुविधाजनक हो। उसने परंपरागत कुलीन वर्ग को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता से बेदखल कर उस पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है और अब वह समाज का सबसे महत्वपूर्ण वर्ग बन गया है। सभी प्रकार के बौद्धिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में वही है। समाज, राष्ट्र और व्यवस्था-तंत्र की नियति उसी की इच्छाओं-अपेक्षाओं के आधार पर निर्धारित होती है।
भारत में जिस मध्य वर्ग का विकास हुआ है, उसका मौजूदा चरित्र विरोधाभासों और विडंबनाओं से युक्त है। वह एक तरफ यथास्थितिवाद का पक्षधर है और दूसरी तरफ वह पश्चिमोन्मुख भी है। भारतीय मध्य वर्ग ने यूरोपीय मध्य वर्ग की तरह प्रगतिशील उदारवादी सोच तो अपना ली, लेकिन आर्थिक क्रांति के अभाव में उसकी प्रगतिशीलता एकांगी और अधूरी ही बनी रही। यूरोप में औद्योगिक क्रांति और वैचारिक क्रांति—दोनों साथ-साथ हुई थी। आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का उदय भी उसके साथ ही हुआ। लेकिन भारत में यह सब एक साथ नहीं हो सका। उन्नीसवीं शताब्दी में वैचारिक-सांस्कृतिक आंदोलन तो यहाँ कई चले, लेकिन विदेशी शासन की वजह से आर्थिक और लोकतांत्रिक क्रांति की परिस्थितियाँ नहीं बन सकीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तो लागू हो गई, लेकिन आर्थिक क्रांति का सपना अधूरा ही रहा। हमारे समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था, जातिभेद, अशिक्षा और महिलाओं की उपेक्षित स्थिति प्रगतिशीलता और सामाजिक गतिशीलता की राह में बहुत बड़ी बाधा रही है।
आज के भारतीय मध्य वर्ग के चरित्र और आचार-व्यवहार को देखते हुए ऐसा लगता है कि 1835 ई. में लॉर्ड मैकाले ने रक्त और रंग की दृष्टि से भारतीय मगर रुचि, विचार, आचरण तथा बुद्धि की दृष्टि से अंग्रेज व्यक्तियों का जो वर्ग तैयार करने का उद्देश्य घोषित किया था, उस दिशा में वह काफी हद तक सफल रहा। इस मध्य वर्ग को मैकाले के मानसपुत्र की संज्ञा इसीलिए दी जाती है। विडंबना की बात यह है कि भारतीय मध्य वर्ग में पश्चिमपरस्ती की यह प्रवृत्ति स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से बढ़ी है और 1990 के दशक में भूमंडलीकरण का दौर शुरु होने के बाद वह अपने भारतीयपन को ही पूरी तरह से भूल जाने की कोशिश में जुट गया है।
जिस मध्य वर्ग ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में केन्द्रीय भूमिका निभाई थी और जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मानवतावादी नैतिक दृष्टिकोण और सत्य एवं अहिंसा के आदर्शों के अनुरूप व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों के लिए त्याग और परिवर्तनवादी संघर्ष का रास्ता अपनाया था, आज वह इतना अवसरवादी, स्वार्थी, भ्रष्टाचार में लिप्त और यथास्थितिवादी कैसे होता जा रहा है? उसके नैतिक मूल्य कहाँ और क्यों लुप्त हो गए? एक वजह तो इसकी यह है कि ब्रिटिश पराधीनता के दिनों में मध्य वर्ग को खुद अपनी पराधीनता और बदहाली विशेष रूप से खलती थी, क्योंकि वह आधुनिक शिक्षा, सभ्यता और विचारों के संपर्क में आ रहा था और उसके प्रभाव से वह शासक वर्ग की तुलना में अपनी हीन स्थिति के कारणों को समझने लगा था। वह यह भी देख रहा था कि भारतीय समाज के उच्च वर्ग यानी जमींदार, भूस्वामी और राजे-महाराजाओं के हित विदेशी शासक के हितों के साथ मेल खाते हैं और इसीलिए वे उसी का साथ दे रहे हैं। मध्य वर्ग इस स्थिति को बदलना चाहता था और खुद सत्ता हासिल करना चाहता था। इसलिए महान राष्ट्रवादी नेताओं के नेतृत्व में उसने राष्ट्रीय आंदोलन में तन-मन-धन से भाग लिया। लेकिन स्वतंत्रता हासिल होने के बाद स्थिति पहले जैसी नहीं रही। अब खुद मध्य वर्ग के नेता ही सत्ता पर आसीन थे। इन नेताओं ने उन आदर्शों और नैतिक मूल्यों से अपना पल्ला झाड़ लिया, जो हमने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हासिल किए थे। उनका लक्ष्य येन केन प्रकारेन सत्ता में बने रहना हो गया। वे उपेक्षित आम जनता की चिंताओं से अधिकाधिक दूर होते गए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय समाज में विभिन्न वर्गों के बीच जीवन-स्तर का भेद तेजी से बढ़ने लगा। उच्च वर्ग एवं उच्च-मध्य वर्ग के बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम वाले मँहगे पब्लिक स्कूल खुलने लगे, जबकि निम्न वर्ग एवं निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए बिना छत और न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित विद्यालय रह गए। राजनीतिक-आर्थिक सत्ता पर काबिज वर्ग ने उपनिवेशी शासकों की भाषा और रंग-ढंग को अपना लिया। इस वर्ग के लोगों ने महानगरों और राजधानियों में रहना शुरू कर दिया। इनकी बिजली और पानी संबंधी जरूरतों के लिए बड़े-बड़े बाँध और नहरें बनाई गईं, लेकिन सुदूरवर्ती ग्रामीण आबादी के हितों और जरूरतों की अनदेखी की जाती रही। राजनीति केवल खोखले नारों और वोट बैंक के गणित पर आधारित हो गई। उसका वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया से कोई सरोकार न रहा। सत्ताधारी वर्ग समाज में किसी भी मूलभूत परिवर्तन की कोशिश के सख्त खिलाफ हो गया। चाहे कोई भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में हो, सबका बुनियादी चरित्र एक जैसा हो गया।
राजनीतिज्ञों ने जाति और धर्म के अर्थहीन मुद्दों को राजनीति में घसीट कर जनता के हित के वास्तविक मुद्दों से उनका ध्यान हटा दिया। इस तरह उन्होंने साजिशपूर्ण तरीके से जनशक्ति को क्रांति के विपरीत दिशा में मोड़ दिया। उच्च वर्ग और उच्च-मध्यम वर्ग के हित अमरीका और यूरोप की नवसाम्राज्यवादी शक्तियों के साथ फिर से जुड़ गए। इन नवसाम्राज्यवादी शक्तियों और उनके सहयोगियों के लिए नैतिक मूल्यों और आदर्शों का कोई मायने नहीं है। भ्रष्टाचार और अप्रत्यक्ष आर्थिक शोषण के नए-नए तरीकों से ये ताकतें बड़ी तेजी से अधिकाधिक आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण करने में सफल होती जा रही हैं। इसी के साथ उनकी जीवन-शैली, रहन-सहन और कार्य-व्यवहार में भी बदलाव आता जा रहा है। उनकी देखादेखी नीचे के वर्गों में भी इसी स्तर की संपन्नता और चकाचौंध वाली जीवन-शैली अपनाने की ललक पैदा होने लगी है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि निम्न वर्ग के लोगों ने भी नैतिक मूल्यों की परवाह छोड़कर तेजी से पैसा बनाने की होड़ में सभी प्रकार के उचित-अनुचित साधनों को अपनाना शुरू कर दिया है। इसके चिंताजनक परिणाम भी हमारे सामने हैं।
आजादी के बाद से ही मध्य वर्ग को कभी सही मार्गदर्शन नहीं मिल सका। सरकार ने राष्ट्र निर्माण में शिक्षा के केन्द्रीय महत्व को नहीं समझा। देश के एक बड़े भूभाग में भूमि सुधार प्रक्रिया विफल रही। सामाजिक न्याय के नारों के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं ने भी सत्ता में लंबे समय तक रहने के बावजूद आम मध्य वर्ग की वास्तविक स्थिति को सुधारने का कोई प्रयत्न नहीं किया और वे उसे गुमराह करते रहे। यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियों ने भी संगठित क्षेत्र के एक छोटे-से मजदूर-किसान वर्गों को छोड़कर असंगठित क्षेत्र के अधिसंख्यक निम्न वर्ग एवं निम्न-मध्य वर्गीय जनता के हितों के लिए काम करने की जहमत कभी नहीं उठाई।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति तो हमेशा बुर्जुआ हितों को लेकर ही चलती रही है। अपने नेताओं के छद्म करिश्मे के बल पर आम जनता का भाग्य बदल देने का झांसा देने वाली ये पार्टियाँ कभी उनकी स्थिति में वास्तविक सुधार लाने की बात नहीं सोचतीं।
उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक सुधार आंदोलनों की मध्यवर्गीय प्रगतिशील विचारधारा के विकास में सकारात्मक भूमिका रही थी, लेकिन आज जिस तरीके से स्वघोषित गुरुओं और संतों की फौज आधुनिक प्रचार माध्यमों की सहायता से कर्म फल और पूर्वजन्म के सिद्धांतों में विश्वास करने का उपदेश देने में दिन-रात जुटी हुई है, उसने भी आम मध्य वर्ग को अपनी दशा सुधारने के लिए परिवर्तनकारी संघर्ष करने के मार्ग से विमुख करने का काम किया है।
जाहिर है कि भारतीय मध्य वर्ग ने सामाजिक परिवर्तन की धुरी बनने की अपनी क्षमता अब काफी हद तक खो दी है। आज उसकी शक्ति को संगठित करने और इसे नैतिक प्रेरणा से संचालित करने वाला कोई समर्थ नेतृत्व उसके पास नहीं है। राजनीतिज्ञों और नवसाम्राज्यवादी ताकतों के साझे षड्यंत्र का वह शिकार बनकर रह गया है। वह अपने सामूहिक वर्गगत हितों को छोड़कर व्यक्तिवादी प्रतिस्पर्धा और अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने की होड़ में शामिल हो गया है। मार्क्स ने मध्य वर्ग के इस त्रासदीपूर्ण हश्र की कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
स्रजन संवाद से साभार
भारत में जिस मध्य वर्ग का विकास हुआ है, उसका मौजूदा चरित्र विरोधाभासों और विडंबनाओं से युक्त है। वह एक तरफ यथास्थितिवाद का पक्षधर है और दूसरी तरफ वह पश्चिमोन्मुख भी है। भारतीय मध्य वर्ग ने यूरोपीय मध्य वर्ग की तरह प्रगतिशील उदारवादी सोच तो अपना ली, लेकिन आर्थिक क्रांति के अभाव में उसकी प्रगतिशीलता एकांगी और अधूरी ही बनी रही। यूरोप में औद्योगिक क्रांति और वैचारिक क्रांति—दोनों साथ-साथ हुई थी। आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का उदय भी उसके साथ ही हुआ। लेकिन भारत में यह सब एक साथ नहीं हो सका। उन्नीसवीं शताब्दी में वैचारिक-सांस्कृतिक आंदोलन तो यहाँ कई चले, लेकिन विदेशी शासन की वजह से आर्थिक और लोकतांत्रिक क्रांति की परिस्थितियाँ नहीं बन सकीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तो लागू हो गई, लेकिन आर्थिक क्रांति का सपना अधूरा ही रहा। हमारे समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था, जातिभेद, अशिक्षा और महिलाओं की उपेक्षित स्थिति प्रगतिशीलता और सामाजिक गतिशीलता की राह में बहुत बड़ी बाधा रही है।
आज के भारतीय मध्य वर्ग के चरित्र और आचार-व्यवहार को देखते हुए ऐसा लगता है कि 1835 ई. में लॉर्ड मैकाले ने रक्त और रंग की दृष्टि से भारतीय मगर रुचि, विचार, आचरण तथा बुद्धि की दृष्टि से अंग्रेज व्यक्तियों का जो वर्ग तैयार करने का उद्देश्य घोषित किया था, उस दिशा में वह काफी हद तक सफल रहा। इस मध्य वर्ग को मैकाले के मानसपुत्र की संज्ञा इसीलिए दी जाती है। विडंबना की बात यह है कि भारतीय मध्य वर्ग में पश्चिमपरस्ती की यह प्रवृत्ति स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से बढ़ी है और 1990 के दशक में भूमंडलीकरण का दौर शुरु होने के बाद वह अपने भारतीयपन को ही पूरी तरह से भूल जाने की कोशिश में जुट गया है।
जिस मध्य वर्ग ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में केन्द्रीय भूमिका निभाई थी और जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मानवतावादी नैतिक दृष्टिकोण और सत्य एवं अहिंसा के आदर्शों के अनुरूप व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों के लिए त्याग और परिवर्तनवादी संघर्ष का रास्ता अपनाया था, आज वह इतना अवसरवादी, स्वार्थी, भ्रष्टाचार में लिप्त और यथास्थितिवादी कैसे होता जा रहा है? उसके नैतिक मूल्य कहाँ और क्यों लुप्त हो गए? एक वजह तो इसकी यह है कि ब्रिटिश पराधीनता के दिनों में मध्य वर्ग को खुद अपनी पराधीनता और बदहाली विशेष रूप से खलती थी, क्योंकि वह आधुनिक शिक्षा, सभ्यता और विचारों के संपर्क में आ रहा था और उसके प्रभाव से वह शासक वर्ग की तुलना में अपनी हीन स्थिति के कारणों को समझने लगा था। वह यह भी देख रहा था कि भारतीय समाज के उच्च वर्ग यानी जमींदार, भूस्वामी और राजे-महाराजाओं के हित विदेशी शासक के हितों के साथ मेल खाते हैं और इसीलिए वे उसी का साथ दे रहे हैं। मध्य वर्ग इस स्थिति को बदलना चाहता था और खुद सत्ता हासिल करना चाहता था। इसलिए महान राष्ट्रवादी नेताओं के नेतृत्व में उसने राष्ट्रीय आंदोलन में तन-मन-धन से भाग लिया। लेकिन स्वतंत्रता हासिल होने के बाद स्थिति पहले जैसी नहीं रही। अब खुद मध्य वर्ग के नेता ही सत्ता पर आसीन थे। इन नेताओं ने उन आदर्शों और नैतिक मूल्यों से अपना पल्ला झाड़ लिया, जो हमने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान हासिल किए थे। उनका लक्ष्य येन केन प्रकारेन सत्ता में बने रहना हो गया। वे उपेक्षित आम जनता की चिंताओं से अधिकाधिक दूर होते गए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय समाज में विभिन्न वर्गों के बीच जीवन-स्तर का भेद तेजी से बढ़ने लगा। उच्च वर्ग एवं उच्च-मध्य वर्ग के बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम वाले मँहगे पब्लिक स्कूल खुलने लगे, जबकि निम्न वर्ग एवं निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए बिना छत और न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित विद्यालय रह गए। राजनीतिक-आर्थिक सत्ता पर काबिज वर्ग ने उपनिवेशी शासकों की भाषा और रंग-ढंग को अपना लिया। इस वर्ग के लोगों ने महानगरों और राजधानियों में रहना शुरू कर दिया। इनकी बिजली और पानी संबंधी जरूरतों के लिए बड़े-बड़े बाँध और नहरें बनाई गईं, लेकिन सुदूरवर्ती ग्रामीण आबादी के हितों और जरूरतों की अनदेखी की जाती रही। राजनीति केवल खोखले नारों और वोट बैंक के गणित पर आधारित हो गई। उसका वास्तविक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया से कोई सरोकार न रहा। सत्ताधारी वर्ग समाज में किसी भी मूलभूत परिवर्तन की कोशिश के सख्त खिलाफ हो गया। चाहे कोई भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में हो, सबका बुनियादी चरित्र एक जैसा हो गया।
राजनीतिज्ञों ने जाति और धर्म के अर्थहीन मुद्दों को राजनीति में घसीट कर जनता के हित के वास्तविक मुद्दों से उनका ध्यान हटा दिया। इस तरह उन्होंने साजिशपूर्ण तरीके से जनशक्ति को क्रांति के विपरीत दिशा में मोड़ दिया। उच्च वर्ग और उच्च-मध्यम वर्ग के हित अमरीका और यूरोप की नवसाम्राज्यवादी शक्तियों के साथ फिर से जुड़ गए। इन नवसाम्राज्यवादी शक्तियों और उनके सहयोगियों के लिए नैतिक मूल्यों और आदर्शों का कोई मायने नहीं है। भ्रष्टाचार और अप्रत्यक्ष आर्थिक शोषण के नए-नए तरीकों से ये ताकतें बड़ी तेजी से अधिकाधिक आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण करने में सफल होती जा रही हैं। इसी के साथ उनकी जीवन-शैली, रहन-सहन और कार्य-व्यवहार में भी बदलाव आता जा रहा है। उनकी देखादेखी नीचे के वर्गों में भी इसी स्तर की संपन्नता और चकाचौंध वाली जीवन-शैली अपनाने की ललक पैदा होने लगी है। इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि निम्न वर्ग के लोगों ने भी नैतिक मूल्यों की परवाह छोड़कर तेजी से पैसा बनाने की होड़ में सभी प्रकार के उचित-अनुचित साधनों को अपनाना शुरू कर दिया है। इसके चिंताजनक परिणाम भी हमारे सामने हैं।
आजादी के बाद से ही मध्य वर्ग को कभी सही मार्गदर्शन नहीं मिल सका। सरकार ने राष्ट्र निर्माण में शिक्षा के केन्द्रीय महत्व को नहीं समझा। देश के एक बड़े भूभाग में भूमि सुधार प्रक्रिया विफल रही। सामाजिक न्याय के नारों के बल पर राजनीति करने वाले नेताओं ने भी सत्ता में लंबे समय तक रहने के बावजूद आम मध्य वर्ग की वास्तविक स्थिति को सुधारने का कोई प्रयत्न नहीं किया और वे उसे गुमराह करते रहे। यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियों ने भी संगठित क्षेत्र के एक छोटे-से मजदूर-किसान वर्गों को छोड़कर असंगठित क्षेत्र के अधिसंख्यक निम्न वर्ग एवं निम्न-मध्य वर्गीय जनता के हितों के लिए काम करने की जहमत कभी नहीं उठाई।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति तो हमेशा बुर्जुआ हितों को लेकर ही चलती रही है। अपने नेताओं के छद्म करिश्मे के बल पर आम जनता का भाग्य बदल देने का झांसा देने वाली ये पार्टियाँ कभी उनकी स्थिति में वास्तविक सुधार लाने की बात नहीं सोचतीं।
उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक सुधार आंदोलनों की मध्यवर्गीय प्रगतिशील विचारधारा के विकास में सकारात्मक भूमिका रही थी, लेकिन आज जिस तरीके से स्वघोषित गुरुओं और संतों की फौज आधुनिक प्रचार माध्यमों की सहायता से कर्म फल और पूर्वजन्म के सिद्धांतों में विश्वास करने का उपदेश देने में दिन-रात जुटी हुई है, उसने भी आम मध्य वर्ग को अपनी दशा सुधारने के लिए परिवर्तनकारी संघर्ष करने के मार्ग से विमुख करने का काम किया है।
जाहिर है कि भारतीय मध्य वर्ग ने सामाजिक परिवर्तन की धुरी बनने की अपनी क्षमता अब काफी हद तक खो दी है। आज उसकी शक्ति को संगठित करने और इसे नैतिक प्रेरणा से संचालित करने वाला कोई समर्थ नेतृत्व उसके पास नहीं है। राजनीतिज्ञों और नवसाम्राज्यवादी ताकतों के साझे षड्यंत्र का वह शिकार बनकर रह गया है। वह अपने सामूहिक वर्गगत हितों को छोड़कर व्यक्तिवादी प्रतिस्पर्धा और अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने की होड़ में शामिल हो गया है। मार्क्स ने मध्य वर्ग के इस त्रासदीपूर्ण हश्र की कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
स्रजन संवाद से साभार
23 मई 2007
क्या पंचायती व्यवस्था में परिवर्तन संभव है
यह बात अक्सर उठती है कि जो लोग इस व्यवस्था की खिलाफत करते है वे क्यों करते है ?सरकार से बात क्यों नहीं करते ?गोल्डी.एम.जार्ज एक दलित चिंतक हैं उन्होंने प्रयास किया है इस प्रश्न को समझने का
'' भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। '' लगभग डेढ़ सौ साल पहले कार्लमार्क्स ने 'दुनिया के मजदूर एक हो' का नारा दिया। यह नारा न केवल उस काल में प्रासंगिक था, बल्कि आज भी उसकी प्रासंगिकता में कोई घटौती नहीं आई है। फ्रांस की क्रांति के बाद पूरे यूरोप में औद्योगिक क्रांति के माध्यम से फैल रही पूंजीवाद के खिलाफ यह नारा परिवर्तन की एक लहर को लाने में सशक्त था। दुनिया की सबसे बड़ी विसंगति आज यह है, कि दुनिया के मजदूर जितने बटे-बिखरे, अनेक, असंगठित हैं इसका कोई और मिसाल नहीं है। दूसरी ओर तमाम उद्योगपति व पूंजीपति एक-दूसरे के साथ मिलकर अपने संगठन और ताकत को बढ़ाए जा रहे हैं। चाहे हसिया से लेकर हथियार तक बेचने वाली कंपनी हो या फिर सब्जी से लेकर सीमेंट तक बेचने वाली कंपनी हो, यह सब आपसी तकरार व मतभेद को दूर कर एक मंच में बैठने लगे हैं। लगभग कार्लमार्क्स के ही तर्ज पर बाबा साहब अंबेडकर ने भी भारत में पीड़ित मूलवासियों को एक साथ लाने का प्रयास किया था, उन्होंने अछूत, शुद्र एवं आदिवासियों को एक साथ लाकर मिलजुलकर सामूहिकता के साथ रहने की परिकल्पना की थी। आधुनिक भारत के इतिहास में नि:संदेह ही यह समाजिक परितर्वन की पहली पहल थी। एक रूप से देखा जाए तो दुनिया के पीड़ितों एवं गुलामों को वैचारिक एवं सैध्दांतिक आधार अंबेडकर ने दिया। जिस प्रकार से दुनिया में मजदूरों का हश्र हुआ है। उसी प्रकार आज भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े लोग अनेक दल, धर्म व अपनी-अपनी जातियों में बंटी हुई है। वास्तव में यदि परिश्रम के साथ प्रयास किया जाए तो भारत में भी परिवर्तन संभव है। यदि अमरीका जैसे देश में काले और गोरे के बीच के भेद को सशक्त आंदोलन एवं सामुदायिक मंचों का प्रयोग कर तीस-चालीस सालों के अंदर कमजोर किया जा सकता है तो निश्चित ही बदलाव का कोई न कोई स्वरूप भारत में भी असंभव नहीं था।
आखिर भारत में परिवर्तन क्याें नहीं आया? क्या परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी केवल एक विभाग या वर्ग का ही है? परिवर्तन के मापदंड क्या होंगे? उसका माध्यम क्या होगा अथवा हो सकता है? इन तमाम सवालों का जवाब खोजना अतिआवश्यक है। अन्यथा समाज में बुनियादी परितर्वन संभव नहीं है। जब तक समाज में सभी लोगों का बराबरी की हिस्सेदारी व भागीदारी नहीं होगी, तब तक स्थितियां वैसी की वैसी ही रह जाएंगी। भारतीय समाज मूलत: ग्रामीण इलाकों में बसी हुई है इसलिए कोई भी परिवर्तन का जड़ भी यहीं से मजबूत हो सकती है। भारत के गांव के बारे में डॉ. अंबेडकर की यह मान्यता थी, कि यह सवर्ण और अवर्ण के तकरार का गुफा है। इसका मतलब यह हुआ कि चातुवर्ण के आधार पर जाति व्यवस्था का पोषक एवं संरक्षक भारत के गांव ही है, जिसमें कोई शक नहीं है। यह स्थिति पूरे देश में एक ही प्रकार से व्याप्त है। 1920 के दशक में केरल के पुलिया समाज में परिवर्तन की लहर फूंकने वाले कर्मठ दलित योध्दा ऐय्यंकाली ने उस समय गांव की व्यवस्था को तोड़ा था, जब रास्ते से दलितों का चलना भी वर्जित था। ऐय्यंकाली का नाम केरल के बाहर कितने लोग जानते हैं, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन केरल के पुलया, परया, कुरवा इत्यादि समुदायों के बीच उनके सम्मान और प्रतिष्ठा की स्थापना करने वाले महात्मा के रूप में आज भी मानते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है, कि ऐय्यंकाली का पूरा आंदोलन अपने-अपने गांवों में सम्मान, इात व जीविकोपार्जन खोजने के तर्ज पर था। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत की भूमि में परिवर्तन की परिभाषा गांव से आरंभ हो। इसी प्रकार से यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भी गुरु घासीदास जी के द्वारा गैरबरारी एवं छुआछूत के खिलाफ एक नए ढंग से परिवर्तन का प्रयास हुआ था। यह प्रयास अत्यंत सफल भी रहा। घासीदास के परिवर्तन की प्रक्रिया को यदि समझा जाए तो वे भी गांव स्तर से ही इसका आरंभ किए थे। यह परितर्वन इतना तेज और तीव्रता के साथ हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत भी घबराने लगी थी और यही वजह था कि वे सतनामी को एक 'क्रिमिनल ट्राइब' के रूप में घोषित किए थे। इस पूरे विश्लेषण से दो बातें साफ होती हैं। पहला यह कि भारत में परिवर्तन अनिवार्य है, दूसरा यह कि भारत में कोई भी बुनियादी परिवर्तन गांव से ही संभव है। अब यदि गांव से ही परितर्वन आनी है तो उसका माध्यम क्या हो सकता है? \n\u003cbr\>इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? भारत में परिवर्तन क्याें नहीं आया? क्या परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी केवल एक विभाग या वर्ग का ही है? परिवर्तन के मापदंड क्या होंगे? उसका माध्यम क्या होगा अथवा हो सकता है? इन तमाम सवालों का जवाब खोजना अतिआवश्यक है। अन्यथा समाज में बुनियादी परितर्वन संभव नहीं है। जब तक समाज में सभी लोगों का बराबरी की हिस्सेदारी व भागीदारी नहीं होगी, तब तक स्थितियां वैसी की वैसी ही रह जाएंगी। भारतीय समाज मूलत: ग्रामीण इलाकों में बसी हुई है इसलिए कोई भी परिवर्तन का जड़ भी यहीं से मजबूत हो सकती है। भारत के गांव के बारे में डॉ. अंबेडकर की यह मान्यता थी, कि यह सवर्ण और अवर्ण के तकरार का गुफा है। इसका मतलब यह हुआ कि चातुवर्ण के आधार पर जाति व्यवस्था का पोषक एवं संरक्षक भारत के गांव ही है, जिसमें कोई शक नहीं है। यह स्थिति पूरे देश में एक ही प्रकार से व्याप्त है। 1920 के दशक में केरल के पुलिया समाज में परिवर्तन की लहर फूंकने वाले कर्मठ दलित योध्दा ऐय्यंकाली ने उस समय गांव की व्यवस्था को तोड़ा था, जब रास्ते से दलितों का चलना भी वर्जित था। ऐय्यंकाली का नाम केरल के बाहर कितने लोग जानते हैं, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन केरल के पुलया, परया, कुरवा इत्यादि समुदायों के बीच उनके सम्मान और प्रतिष्ठा की स्थापना करने वाले महात्मा के रूप में आज भी मानते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है, कि ऐय्यंकाली का पूरा आंदोलन अपने-अपने गांवों में सम्मान, इात व जीविकोपार्जन खोजने के तर्ज पर था। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत की भूमि में परिवर्तन की परिभाषा गांव से आरंभ हो। इसी प्रकार से यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भी गुरु घासीदास जी के द्वारा गैरबरारी एवं छुआछूत के खिलाफ एक नए ढंग से परिवर्तन का प्रयास हुआ था। यह प्रयास अत्यंत सफल भी रहा। घासीदास के परिवर्तन की प्रक्रिया को यदि समझा जाए तो वे भी गांव स्तर से ही इसका आरंभ किए थे। यह परितर्वन इतना तेज और तीव्रता के साथ हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत भी घबराने लगी थी और यही वजह था कि वे सतनामी को एक 'क्रिमिनल ट्राइब' के रूप में घोषित किए थे। इस पूरे विश्लेषण से दो बातें साफ होती हैं। पहला यह कि भारत में परिवर्तन अनिवार्य है, दूसरा यह कि भारत में कोई भी बुनियादी परिवर्तन गांव से ही संभव है। अब यदि गांव से ही परितर्वन आनी है तो उसका माध्यम क्या हो सकता है? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए?
पंचायत राज गांव के सभी वर्गों को एक साथ बैठने का मौका प्रदान करता है और यही एक माध्यम है जहां पर आपसी मतभेद को संवाद के द्वारा कम कर सकते हैं। पंचायत में आपसी भाईचारा को भी बढ़ाने का मंच भी उपलब्ध है। भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। इसके लिए थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है किंतु यह धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। सामाजिक क्रांति में पंचायतीराज में जो आरक्षण की व्यवस्था कायम है, वह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि परितर्वन का मतलब कमजोर के लिए स्थान बनाना ही है।
पंचायत राज गांव के सभी वर्गों को एक साथ बैठने का मौका प्रदान करता है और यही एक माध्यम है जहां पर आपसी मतभेद को संवाद के द्वारा कम कर सकते हैं। पंचायत में आपसी भाईचारा को भी बढ़ाने का मंच भी उपलब्ध है। भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। इसके लिए थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है किंतु यह धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। सामाजिक क्रांति में पंचायतीराज में जो आरक्षण की व्यवस्था कायम है, वह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि परितर्वन का मतलब कमजोर के लिए स्थान बनाना ही है।
देशबंधु से साभार-
'' भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। '' लगभग डेढ़ सौ साल पहले कार्लमार्क्स ने 'दुनिया के मजदूर एक हो' का नारा दिया। यह नारा न केवल उस काल में प्रासंगिक था, बल्कि आज भी उसकी प्रासंगिकता में कोई घटौती नहीं आई है। फ्रांस की क्रांति के बाद पूरे यूरोप में औद्योगिक क्रांति के माध्यम से फैल रही पूंजीवाद के खिलाफ यह नारा परिवर्तन की एक लहर को लाने में सशक्त था। दुनिया की सबसे बड़ी विसंगति आज यह है, कि दुनिया के मजदूर जितने बटे-बिखरे, अनेक, असंगठित हैं इसका कोई और मिसाल नहीं है। दूसरी ओर तमाम उद्योगपति व पूंजीपति एक-दूसरे के साथ मिलकर अपने संगठन और ताकत को बढ़ाए जा रहे हैं। चाहे हसिया से लेकर हथियार तक बेचने वाली कंपनी हो या फिर सब्जी से लेकर सीमेंट तक बेचने वाली कंपनी हो, यह सब आपसी तकरार व मतभेद को दूर कर एक मंच में बैठने लगे हैं। लगभग कार्लमार्क्स के ही तर्ज पर बाबा साहब अंबेडकर ने भी भारत में पीड़ित मूलवासियों को एक साथ लाने का प्रयास किया था, उन्होंने अछूत, शुद्र एवं आदिवासियों को एक साथ लाकर मिलजुलकर सामूहिकता के साथ रहने की परिकल्पना की थी। आधुनिक भारत के इतिहास में नि:संदेह ही यह समाजिक परितर्वन की पहली पहल थी। एक रूप से देखा जाए तो दुनिया के पीड़ितों एवं गुलामों को वैचारिक एवं सैध्दांतिक आधार अंबेडकर ने दिया। जिस प्रकार से दुनिया में मजदूरों का हश्र हुआ है। उसी प्रकार आज भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े लोग अनेक दल, धर्म व अपनी-अपनी जातियों में बंटी हुई है। वास्तव में यदि परिश्रम के साथ प्रयास किया जाए तो भारत में भी परिवर्तन संभव है। यदि अमरीका जैसे देश में काले और गोरे के बीच के भेद को सशक्त आंदोलन एवं सामुदायिक मंचों का प्रयोग कर तीस-चालीस सालों के अंदर कमजोर किया जा सकता है तो निश्चित ही बदलाव का कोई न कोई स्वरूप भारत में भी असंभव नहीं था।
आखिर भारत में परिवर्तन क्याें नहीं आया? क्या परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी केवल एक विभाग या वर्ग का ही है? परिवर्तन के मापदंड क्या होंगे? उसका माध्यम क्या होगा अथवा हो सकता है? इन तमाम सवालों का जवाब खोजना अतिआवश्यक है। अन्यथा समाज में बुनियादी परितर्वन संभव नहीं है। जब तक समाज में सभी लोगों का बराबरी की हिस्सेदारी व भागीदारी नहीं होगी, तब तक स्थितियां वैसी की वैसी ही रह जाएंगी। भारतीय समाज मूलत: ग्रामीण इलाकों में बसी हुई है इसलिए कोई भी परिवर्तन का जड़ भी यहीं से मजबूत हो सकती है। भारत के गांव के बारे में डॉ. अंबेडकर की यह मान्यता थी, कि यह सवर्ण और अवर्ण के तकरार का गुफा है। इसका मतलब यह हुआ कि चातुवर्ण के आधार पर जाति व्यवस्था का पोषक एवं संरक्षक भारत के गांव ही है, जिसमें कोई शक नहीं है। यह स्थिति पूरे देश में एक ही प्रकार से व्याप्त है। 1920 के दशक में केरल के पुलिया समाज में परिवर्तन की लहर फूंकने वाले कर्मठ दलित योध्दा ऐय्यंकाली ने उस समय गांव की व्यवस्था को तोड़ा था, जब रास्ते से दलितों का चलना भी वर्जित था। ऐय्यंकाली का नाम केरल के बाहर कितने लोग जानते हैं, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन केरल के पुलया, परया, कुरवा इत्यादि समुदायों के बीच उनके सम्मान और प्रतिष्ठा की स्थापना करने वाले महात्मा के रूप में आज भी मानते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है, कि ऐय्यंकाली का पूरा आंदोलन अपने-अपने गांवों में सम्मान, इात व जीविकोपार्जन खोजने के तर्ज पर था। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत की भूमि में परिवर्तन की परिभाषा गांव से आरंभ हो। इसी प्रकार से यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भी गुरु घासीदास जी के द्वारा गैरबरारी एवं छुआछूत के खिलाफ एक नए ढंग से परिवर्तन का प्रयास हुआ था। यह प्रयास अत्यंत सफल भी रहा। घासीदास के परिवर्तन की प्रक्रिया को यदि समझा जाए तो वे भी गांव स्तर से ही इसका आरंभ किए थे। यह परितर्वन इतना तेज और तीव्रता के साथ हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत भी घबराने लगी थी और यही वजह था कि वे सतनामी को एक 'क्रिमिनल ट्राइब' के रूप में घोषित किए थे। इस पूरे विश्लेषण से दो बातें साफ होती हैं। पहला यह कि भारत में परिवर्तन अनिवार्य है, दूसरा यह कि भारत में कोई भी बुनियादी परिवर्तन गांव से ही संभव है। अब यदि गांव से ही परितर्वन आनी है तो उसका माध्यम क्या हो सकता है? \n\u003cbr\>इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? भारत में परिवर्तन क्याें नहीं आया? क्या परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी केवल एक विभाग या वर्ग का ही है? परिवर्तन के मापदंड क्या होंगे? उसका माध्यम क्या होगा अथवा हो सकता है? इन तमाम सवालों का जवाब खोजना अतिआवश्यक है। अन्यथा समाज में बुनियादी परितर्वन संभव नहीं है। जब तक समाज में सभी लोगों का बराबरी की हिस्सेदारी व भागीदारी नहीं होगी, तब तक स्थितियां वैसी की वैसी ही रह जाएंगी। भारतीय समाज मूलत: ग्रामीण इलाकों में बसी हुई है इसलिए कोई भी परिवर्तन का जड़ भी यहीं से मजबूत हो सकती है। भारत के गांव के बारे में डॉ. अंबेडकर की यह मान्यता थी, कि यह सवर्ण और अवर्ण के तकरार का गुफा है। इसका मतलब यह हुआ कि चातुवर्ण के आधार पर जाति व्यवस्था का पोषक एवं संरक्षक भारत के गांव ही है, जिसमें कोई शक नहीं है। यह स्थिति पूरे देश में एक ही प्रकार से व्याप्त है। 1920 के दशक में केरल के पुलिया समाज में परिवर्तन की लहर फूंकने वाले कर्मठ दलित योध्दा ऐय्यंकाली ने उस समय गांव की व्यवस्था को तोड़ा था, जब रास्ते से दलितों का चलना भी वर्जित था। ऐय्यंकाली का नाम केरल के बाहर कितने लोग जानते हैं, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन केरल के पुलया, परया, कुरवा इत्यादि समुदायों के बीच उनके सम्मान और प्रतिष्ठा की स्थापना करने वाले महात्मा के रूप में आज भी मानते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है, कि ऐय्यंकाली का पूरा आंदोलन अपने-अपने गांवों में सम्मान, इात व जीविकोपार्जन खोजने के तर्ज पर था। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत की भूमि में परिवर्तन की परिभाषा गांव से आरंभ हो। इसी प्रकार से यदि देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में भी गुरु घासीदास जी के द्वारा गैरबरारी एवं छुआछूत के खिलाफ एक नए ढंग से परिवर्तन का प्रयास हुआ था। यह प्रयास अत्यंत सफल भी रहा। घासीदास के परिवर्तन की प्रक्रिया को यदि समझा जाए तो वे भी गांव स्तर से ही इसका आरंभ किए थे। यह परितर्वन इतना तेज और तीव्रता के साथ हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत भी घबराने लगी थी और यही वजह था कि वे सतनामी को एक 'क्रिमिनल ट्राइब' के रूप में घोषित किए थे। इस पूरे विश्लेषण से दो बातें साफ होती हैं। पहला यह कि भारत में परिवर्तन अनिवार्य है, दूसरा यह कि भारत में कोई भी बुनियादी परिवर्तन गांव से ही संभव है। अब यदि गांव से ही परितर्वन आनी है तो उसका माध्यम क्या हो सकता है? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए? इसमें कोई दो मत नहीं होनी चाहिए कि पंचायती राज ग्रामीण स्तर पर बदलाव लाने में एक प्रबल माध्यम के रूप में है। अब सवाल यह उठता है कि पंचायती राज के माध्यम से किस तरह से छुआछूत, भेदभाव, जातिगत हिंसा जैसे सवालों को उठाया जाए?
पंचायत राज गांव के सभी वर्गों को एक साथ बैठने का मौका प्रदान करता है और यही एक माध्यम है जहां पर आपसी मतभेद को संवाद के द्वारा कम कर सकते हैं। पंचायत में आपसी भाईचारा को भी बढ़ाने का मंच भी उपलब्ध है। भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। इसके लिए थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है किंतु यह धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। सामाजिक क्रांति में पंचायतीराज में जो आरक्षण की व्यवस्था कायम है, वह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि परितर्वन का मतलब कमजोर के लिए स्थान बनाना ही है।
पंचायत राज गांव के सभी वर्गों को एक साथ बैठने का मौका प्रदान करता है और यही एक माध्यम है जहां पर आपसी मतभेद को संवाद के द्वारा कम कर सकते हैं। पंचायत में आपसी भाईचारा को भी बढ़ाने का मंच भी उपलब्ध है। भाईचारा एक सैध्दांतिक पहलू नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक सत्य है। ऐसे अनेक उदाहरण छत्तीसगढ़ में है, जहां लोग पंचायत में संयुक्त रूप से बैठकर संवाद के द्वारा आपसी भाईचारे को कामय रखा है। इसका मतलब यह नहीं है कि परिवर्तन संपन्न हो गया लेकिन यह उस प्रक्रिया का हिस्सा जरूर है। इसके लिए थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है किंतु यह धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा। सामाजिक क्रांति में पंचायतीराज में जो आरक्षण की व्यवस्था कायम है, वह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि परितर्वन का मतलब कमजोर के लिए स्थान बनाना ही है।
देशबंधु से साभार-
आखिर यह दुनियां किसकी है:-
दुनियांभर की सरकारों के प्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की रिपोर्ट को प्रकाशित कर दिया है. इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे नया कहा जा सके. न ऐसा कुछ है जिसकी आशंका पहले न जताई गई हो. जो बात नई है वह यह कि अब तक जो आशंकाएँ जताई जा रही थीं वो धरातल पर दिखने लगी हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दिनों में पानी का संकट होगा, फसलें चौपट हो जाएँगी और तरह-तरह की बीमारियाँ फैलेंगी. अगर पारा इसी तरह चढ़ता रहा और औसत तापमान डेढ़ से ढाई प्रतिशत बढ़ गया तो 20 से 30 प्रतिशत वनस्पतियाँ और जानवरों की प्रजातियाँ ख़त्म हो जाएँगी. पानी की किल्लत झेलने वाले देश अफ़्रीका के होंगे. बारिश के पानी से होने वाली फसल 50 फीसदी कम हो जाएगी. वह भी अफ़्रीकी देशों में. फसल की पैदावार कम होगी मध्य और दक्षिण एशिया में. ज़ाहिर है बीमारियाँ भी इन्हीं देशों में फैलेंगी. जब सब आँकड़े बता रहे हों कि भुगतेंगे वो जो वास्तव में जलवायु परिवर्तन के दोषी कभी नहीं थे. तो रिपोर्ट में इसे स्वीकार भी करना पड़ा. इस रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग के बहाने से एक पुराने सवाल को फिर से कुरेद दिया है कि आख़िर यह दुनिया किसकी है और किसके लिए है? इसे कौन नहीं जानता कि पिछली दो सदियों में प्रदूषण के लिए मूल रुप से कौन ज़िम्मेदार रहा है? जो उद्योग पर उद्योग लगाते चले गए और विकसित देश बन गए उनका नाम इस रिपोर्ट में पीड़ितों की सूची में नहीं है. नाम उनका है जो ग़रीब हैं और अगर गरीबी से थोड़ा उबरे हैं तो अभी भी विकसित नहीं हुए हैं. विकासशील हैं. वो पहली और दूसरी दुनिया में नहीं गिने जाते वो तीसरी दुनिया के देश कहलाते हैं. निश्चित रुप से यह रिपोर्ट और ऐसी कई रिपोर्टें तीसरी दुनिया के देशों के लोगों को तकलीफ़ पहुँचाती है. लेकिन क्या यह तकलीफ़ उन्हें संवेदनशील भी बनाती है? शायद नहीं. जैसी वैश्विक समाज में ग़रीब देशों की स्थिति है वैसी ही तीसरी दुनिया के देशों में ग़रीब लोगों की है.
क्या यह सच नहीं है कि सीवरों और नालियों का रास्ता रोकने वाला कचरा कोई और जमा करता है लेकिन उससे आई बाढ़ झुग्गियों और निचली बस्तियों में रहने वाले लोग झेलते हैं? सड़कों पर धुँआ कारें उगलती हैं और दमे से लेकर टीबी तक के शिकार वो लोग होते हैं जो या तो बसों में सफ़र करते हैं या फिर जिन्हें बस का सफ़र भी नसीब नहीं. दिल्ली में यमुना प्रदूषित हो गई तो किसे फ़र्क पड़ रहा है. कार वाले यमुना के पुल तक पहुँचते-पहुँचते शीशे चढ़ा लेते हैं ताकि सड़ाँध से बच सकें लेकिन उनका क्या जिनके लिए यमुना का पानी ही निस्तारी का एक मात्र साधन था? चाहे दिल्ली हो या मुंबई या लखनऊ या पटना. अमीर या धनी समाज को लगता है कि अगर उसे सहना नहीं पड़ रहा है तो वह चिंता भी क्यों करे? और अगर चिंता करता भी है तो अपनी ग़लती सुधारने की जहमत कभी नहीं उठाता. न उनकी किसी को चिंता है और न वे ख़बर बनते-बनाते हैं. भारत जैसे देश में भी क्रिकेट की शीर्ष संस्था की बैठक तो पहली ख़बर होती है लेकिन दुनिया भर के ग़रीबों की पीड़ा 'डाउन-मार्केट' ख़बर होने के नाते भीतर के पन्नों में औपचारिक ख़बर बनी रह जाती है. \n\u003cbr\>तो फिर अफ़्रीकी देश भुगतें, दक्षिण एशियाई देश सहें तो इससे पश्चिमी देशों को क्योंकर तकलीफ़ होने लगी? उन्हें न्यूऑर्लियान्स में आई भयानक बाढ़ और फ़्राँस की भयानक गर्मी और यूरोप का तूफ़ान अभी भी अपवाद की तरह लगता है. ग़रीब, चाहे लोग हों, समाज हो या फिर देश, उसका प्रारब्ध ही सहना है. यह कौन सी दुनिया है और किसकी दुनिया है और यह दुनिया ऐसी है क्यों?
क्या यह सच नहीं है कि सीवरों और नालियों का रास्ता रोकने वाला कचरा कोई और जमा करता है लेकिन उससे आई बाढ़ झुग्गियों और निचली बस्तियों में रहने वाले लोग झेलते हैं? सड़कों पर धुँआ कारें उगलती हैं और दमे से लेकर टीबी तक के शिकार वो लोग होते हैं जो या तो बसों में सफ़र करते हैं या फिर जिन्हें बस का सफ़र भी नसीब नहीं. दिल्ली में यमुना प्रदूषित हो गई तो किसे फ़र्क पड़ रहा है. कार वाले यमुना के पुल तक पहुँचते-पहुँचते शीशे चढ़ा लेते हैं ताकि सड़ाँध से बच सकें लेकिन उनका क्या जिनके लिए यमुना का पानी ही निस्तारी का एक मात्र साधन था? चाहे दिल्ली हो या मुंबई या लखनऊ या पटना. अमीर या धनी समाज को लगता है कि अगर उसे सहना नहीं पड़ रहा है तो वह चिंता भी क्यों करे? और अगर चिंता करता भी है तो अपनी ग़लती सुधारने की जहमत कभी नहीं उठाता. न उनकी किसी को चिंता है और न वे ख़बर बनते-बनाते हैं. भारत जैसे देश में भी क्रिकेट की शीर्ष संस्था की बैठक तो पहली ख़बर होती है लेकिन दुनिया भर के ग़रीबों की पीड़ा 'डाउन-मार्केट' ख़बर होने के नाते भीतर के पन्नों में औपचारिक ख़बर बनी रह जाती है. तो फिर अफ़्रीकी देश भुगतें, दक्षिण एशियाई देश सहें तो इससे पश्चिमी देशों को क्योंकर तकलीफ़ होने लगी? उन्हें न्यूऑर्लियान्स में आई भयानक बाढ़ और फ़्राँस की भयानक गर्मी और यूरोप का तूफ़ान अभी भी अपवाद की तरह लगता है. ग़रीब, चाहे लोग हों, समाज हो या फिर देश, उसका प्रारब्ध ही सहना है
यह कौन सी दुनिया है और किसकी दुनिया है और यह दुनिया ऐसी है क्यों?
पंकज परासर से साभार
क्या यह सच नहीं है कि सीवरों और नालियों का रास्ता रोकने वाला कचरा कोई और जमा करता है लेकिन उससे आई बाढ़ झुग्गियों और निचली बस्तियों में रहने वाले लोग झेलते हैं? सड़कों पर धुँआ कारें उगलती हैं और दमे से लेकर टीबी तक के शिकार वो लोग होते हैं जो या तो बसों में सफ़र करते हैं या फिर जिन्हें बस का सफ़र भी नसीब नहीं. दिल्ली में यमुना प्रदूषित हो गई तो किसे फ़र्क पड़ रहा है. कार वाले यमुना के पुल तक पहुँचते-पहुँचते शीशे चढ़ा लेते हैं ताकि सड़ाँध से बच सकें लेकिन उनका क्या जिनके लिए यमुना का पानी ही निस्तारी का एक मात्र साधन था? चाहे दिल्ली हो या मुंबई या लखनऊ या पटना. अमीर या धनी समाज को लगता है कि अगर उसे सहना नहीं पड़ रहा है तो वह चिंता भी क्यों करे? और अगर चिंता करता भी है तो अपनी ग़लती सुधारने की जहमत कभी नहीं उठाता. न उनकी किसी को चिंता है और न वे ख़बर बनते-बनाते हैं. भारत जैसे देश में भी क्रिकेट की शीर्ष संस्था की बैठक तो पहली ख़बर होती है लेकिन दुनिया भर के ग़रीबों की पीड़ा 'डाउन-मार्केट' ख़बर होने के नाते भीतर के पन्नों में औपचारिक ख़बर बनी रह जाती है. \n\u003cbr\>तो फिर अफ़्रीकी देश भुगतें, दक्षिण एशियाई देश सहें तो इससे पश्चिमी देशों को क्योंकर तकलीफ़ होने लगी? उन्हें न्यूऑर्लियान्स में आई भयानक बाढ़ और फ़्राँस की भयानक गर्मी और यूरोप का तूफ़ान अभी भी अपवाद की तरह लगता है. ग़रीब, चाहे लोग हों, समाज हो या फिर देश, उसका प्रारब्ध ही सहना है. यह कौन सी दुनिया है और किसकी दुनिया है और यह दुनिया ऐसी है क्यों?
क्या यह सच नहीं है कि सीवरों और नालियों का रास्ता रोकने वाला कचरा कोई और जमा करता है लेकिन उससे आई बाढ़ झुग्गियों और निचली बस्तियों में रहने वाले लोग झेलते हैं? सड़कों पर धुँआ कारें उगलती हैं और दमे से लेकर टीबी तक के शिकार वो लोग होते हैं जो या तो बसों में सफ़र करते हैं या फिर जिन्हें बस का सफ़र भी नसीब नहीं. दिल्ली में यमुना प्रदूषित हो गई तो किसे फ़र्क पड़ रहा है. कार वाले यमुना के पुल तक पहुँचते-पहुँचते शीशे चढ़ा लेते हैं ताकि सड़ाँध से बच सकें लेकिन उनका क्या जिनके लिए यमुना का पानी ही निस्तारी का एक मात्र साधन था? चाहे दिल्ली हो या मुंबई या लखनऊ या पटना. अमीर या धनी समाज को लगता है कि अगर उसे सहना नहीं पड़ रहा है तो वह चिंता भी क्यों करे? और अगर चिंता करता भी है तो अपनी ग़लती सुधारने की जहमत कभी नहीं उठाता. न उनकी किसी को चिंता है और न वे ख़बर बनते-बनाते हैं. भारत जैसे देश में भी क्रिकेट की शीर्ष संस्था की बैठक तो पहली ख़बर होती है लेकिन दुनिया भर के ग़रीबों की पीड़ा 'डाउन-मार्केट' ख़बर होने के नाते भीतर के पन्नों में औपचारिक ख़बर बनी रह जाती है. तो फिर अफ़्रीकी देश भुगतें, दक्षिण एशियाई देश सहें तो इससे पश्चिमी देशों को क्योंकर तकलीफ़ होने लगी? उन्हें न्यूऑर्लियान्स में आई भयानक बाढ़ और फ़्राँस की भयानक गर्मी और यूरोप का तूफ़ान अभी भी अपवाद की तरह लगता है. ग़रीब, चाहे लोग हों, समाज हो या फिर देश, उसका प्रारब्ध ही सहना है
यह कौन सी दुनिया है और किसकी दुनिया है और यह दुनिया ऐसी है क्यों?
पंकज परासर से साभार
भारतीय लोकतंत्र-
भारत का लोकतंत्र किन सीमाओं और खतरों का शिकार है? क्या जनमत निर्मित कर इस लोकतंत्र को कामयाब बनाया जा सकता है?
, भारत के बारे में सबसे बड़ा भ्रम है कि यहां लोकतंत्र है और इस भ्रम को साम्राज्यवादी चिंतन के प्रभाव में रहनेवाली मीडिया भी दिन-रात प्रचारित करती है. यहां विरोध को भी बड़ी आसानी से पचा लिया जाता है. जिस तरह ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्च्न को मीडिया भुनाती है उसी तरह अरुंधति राय को भी स्टूडियो में बुला कर उसे अपने विचारों को रखने का मौका दिया जाता है, क्योंकि दुनिया को दिखाना है कि देखिए हम कितने लोक तांत्रिक हैं. हम एक क्रू ड नहीं बल्कि सॉफिस्टिके टेड समय से गुजर रहे हैं, जहां हर विरोध को खूबसूरती से पहले दिखाया जाता है और फिर उसे दुत्कार दिया जाता है. उन्हें बिग स्टोरीज चाहिए अपने बिजनेस के लिए और बदकिस्मती से लोगों के रोजाना के संघर्षों में उन्हें कुछ भी नया और सनसनीखेज नजर ही नहीं आता. गरीबों के नाम पर जतायी जानेवाली हमदर्दी (पॉलिटिक्स ऑफ पिटी) भी बड़ी खतरनाक होती है और एनजीओ व मिशनरीज इस हमदर्दी जताने की घटिया राजनीति का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं. उनके द्वारा कई बार एम्पावरमेंट शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े खतरनाक हैं. एम्पावरमेंट के जरिये कमजोर वर्गों को रिप्रजेंट करने का दावा किया जाता है और पैसा कमाया जाता है, जबकि हमें सही अर्थों में लोगों को पावरफुल बनाने की ओर ध्यान देना चाहिए. प्राइवेट सेक्टर लोगों को खुश रखने के लिए पीपुल्स कार तो बना रहा है, लेकिन लोगों को पीने का पानी और खाना कहां से मिलेगा, इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है.
बिजनेस व आर्थिक नीतियों से जुड़े सभी फैसले पूरी तरह राजनीतिक होते हैं, लेकिन उन्हें राजनीति से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है. ऐसे फैसलों के प्रतिरोध के लिए कौन से साधन अपनाये जा सकते हैं? अब कहीं उम्मीद है तो सताये और शोषित लोगों से ही है, जो अपनी भारी संख्या बल का लाभ विरोध करने के लिए उठा सकते हैं. इस संख्या बल का फ़ायदा उठा कर लोग गलत चीजों को खुद आगे बढ़ कर रोक सकते हैं. इसके अलावा पीपुल्स मीडिया विकसित करने के बारे में भी हमें सोचना चाहिए. पीपुल्स वॉयस के नाम पर सारे ही अखबार-चैनल अपना धंधा चमकाने की कोशिश करते हैं और बहुत बड़ा फ्रॉड करते हैं. इससे लड़ते हुए हमें कम्युनिटी रेडियो, सिनेमा और पत्रिकाओं का विकास करना चाहिए. मुख्यधारा की मीडिया के पीछे भागने की आदत छोड़नी होगी. नर्मदा बचाओ आंदोलन को मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज मिला, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. दूसरी ओर झारखंड में कोयलकारो में आदिवासियों ने सुवर्णरेखा पर बन रहे बांधों का निर्माण रोक दिया, जबकि वहां मीडिया का ध्यान भी नहीं गया था. इसी तरह ओड़िशा में गंधमर्दन में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बाल्को को वहां से भागना पड़ा और नंदीग्राम में सालेम को प्रचंड विरोध के आगे पसीने छूट गये. मीडिया के हालात को देखते हुए मैं खुद भी टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा लेने नहीं जाती हूं, क्योंकि वहां लगता है कि मैं भी सर्कस की जानवरों में से एक हो गयी हूं. वहां मुझे एक शोपीस की तरह सजा कर खड़ा कर दिया जायेगा और जो मैं वास्तव में कहना चाहती हूं, वह कहने के लिए समय नहीं दिया जायेगा. हमें सिनेमा तकनीक की ओर इसलिए भी ध्यान देना होगा, क्योंकि मुख्यधारा का सिनेमा अब इंटरनेशनल एलीट के कब्जे में है. हाल में आयी गुरु फि ल्म को देखिए, जिसमें खुल कर साम्राज्यवाद का पक्ष लिया गया है. धीरू भाई अंबानी की जिंदगी से प्रेरित इस फि ल्म में शक्तिशाली बिजनेसमैनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे बंधुआ मजदूर हों और राज्य के सताये हुए हों. जबकि हकीकत में यह फ़िल्म लोकल कैपिटलिज्म के पक्ष में बनायी गयी है और ऐसे उद्योगपतियों को हीरो बनाया गया है जो किसी भी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते हैं. यानी फिल्मकार भी अब साम्राज्यवाद के सबसे बड़े कारिंदे के रूप में उभर रहे हैं और उन्हें देश के हितों की चिंता नहीं रह गयी है. फिल्मों के अलावा अब सिनेमा हॉल भी ऐसे बनाये जा रहे हैं, जहां सिर्फ अमीरों के लिए ही फिल्में चलतीं और दिखायी जाती हैं. बड़े-बड़े सिनेमा हॉलों को तोड़ कर मल्टीप्लेक्स हॉल बनाये जा रहे हैं, जहां दो-ढाई सौ रुपये से कम का टिकट नहीं होता है. यानी सिनेमा हॉलों और फिल्म निर्माताओं ने अपने दर्शक वर्ग का चुनाव क र लिया है. जो लोग इतना पैसा देकर फिल्में देखेंगे, वे कभी आम जनों की जिंदगी पर बनी फ़िल्में पसंद नहीं करेंगे. वे उन्हीं फ़िल्मों को पसंद करेंगे जो उनकी शानो शौकत और ग्लैमर में डूबी ज़िंदगी को नाटकीय अंदाज में पेश करेंगी. न्यूज चैनल भी आम सच्चाइयों से कटते जा रहे हैं, भले ही वे दिनोंदिन कितने ही बड़े होते जा रहे हों. इसीलिए मैं कहती हूं जनांदोलनों को मीडिया को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए, हमारी सारी ऊर्जा वहीं खप जाती है. हमें अब मीडिया को दिखाने के लिए कोई आंदोलन नहीं करना है, बल्कि किसी मुद्दे के प्रति गंभीरता से प्रेरित होकर आंदोलन करना चाहिए. वैसे भी, मीडिया की आदत ही किसी मुद्दे को चबा कर उसे थूक देने की है. निठारी केस में जिस गैरराजनीतिक तरीके से सारी रिपोर्टिंग हुई वह भी मीडिया के निकम्मेपन को दरसाता है. हमें अपने संघर्ष के लिए अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य व उनके अनुवादों की मदद लेनी चाहिए. साहित्य और संस्कृति की किसी भी समाज में दोहरी जिम्मेदारी होती है. एक ओर वे राष्ट्र के आंतरिक स्वरूप को ज्यादा लोकतांत्रिक और समानतापरक बनाने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरी ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं. इन जिम्मेदारियों से रचनाकारों के विचलन की वजह क्या है? साहित्य-संस्कृति के बारे में आपकी मान्यताएं सहीं हैं, लेकिन विचारधारा पर निष्ठा कायम रख पाना काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जो लेखक , खासतौर पर भारत के अंगरेजी लेखक यूरोप में रह रहे हैं, वे साम्राज्यवाद के खिलाफ क्या लिखेंगे? उन्हें अभी छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में रहना पड़ जाये, जहां रोज जीवन-मौत का संघर्ष होता है, तो फिर से विचारधारा और साहित्य के रिश्ते समझ में आने लगेंगे. ऐसे लेखकों की जब अंतरराष्ट्रीय मीट आयोजित होती है, तो वे अपने इंडोनेशिया, कोरिया और हांगकांग के अनुभवों के बारे में बात करते हैं, लेकिन भारत के गांवों में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें कम ही रहती है. हम क्रांतिकारी साहित्य की बात तो करते हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सभी क्रांतियों ने अंत में पूंजीवाद को ही बढ़ावा नहीं दिया है? यानी सभी क्रांतियों का अंत एडवांस्ड कैपिटलिज्म में ही हुआ है, लेकिन यह सभी सही होते हुए भी लेखक के लिए क्रांतियों का आकर्षण हमेशा बना रहेगा. उसे किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ लिखना और बोलना होगा, क्योंकि उसकी चुप्पी का अर्थ होगा फासीवाद को समर्थन देना, उसके खेमे का हिस्सा बन जाना. लेकिन कई बार लेखक ही समाज में लेखक के क्रांतिकारी रोल को चुनौती देता है. मुझ पर न जाने कितनी बार यह कह कर हमले हुए हैं कि मैं बांध, परमाणु बम और सांप्रदायिक दंगों जैसे विषयों पर क्यों लिखती हूं. यहां तक कहा गया कि मैं अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश क र रही हूं और अपनी लेखन प्रतिभा व ऊर्जा का दुरुपयोग कर रही हूं. इन सारे हमलों के बाद मैंने अपने आलोचकों से कहा था कि तुम लोग लेखन के विषयों की एक लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं बस उन्हीं पर लिखती रहूंगी. ऐसी आलोचना करनेवाले सिर्फ दक्षिणपंथी लेखक ही नहीं, लिबरल छविवाले लेखक भी थे और तब मुझे महसूस होता था कि क भी-क भी उदारपंथी लेखक कि सी फासिस्ट लेखक से ज्यादा धूर्त और कट्टर होते हैं. वे सीधे किसी का दमन करने का पक्ष नहीं लेते, लेकिन लेखन के कई विषयों के खिलाफ एक लिटरेरी सेंसरशिप के लिए माहौल निर्मित करने का काम क रते हैं.
बिजनेस व आर्थिक नीतियों से जुड़े सभी फैसले पूरी तरह राजनीतिक होते हैं, लेकिन उन्हें राजनीति से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है. ऐसे फैसलों के प्रतिरोध के लिए कौन से साधन अपनाये जा सकते हैं? अब कहीं उम्मीद है तो सताये और शोषित लोगों से ही है, जो अपनी भारी संख्या बल का लाभ विरोध करने के लिए उठा सकते हैं. इस संख्या बल का फ़ायदा उठा कर लोग गलत चीजों को खुद आगे बढ़ कर रोक सकते हैं. इसके अलावा पीपुल्स मीडिया विकसित करने के बारे में भी हमें सोचना चाहिए. पीपुल्स वॉयस के नाम पर सारे ही अखबार-चैनल अपना धंधा चमकाने की कोशिश करते हैं और बहुत बड़ा फ्रॉड करते हैं. इससे लड़ते हुए हमें कम्युनिटी रेडियो, सिनेमा और पत्रिकाओं का विकास करना चाहिए. मुख्यधारा की मीडिया के पीछे भागने की आदत छोड़नी होगी. नर्मदा बचाओ आंदोलन को मीडिया में सबसे ज्यादा कवरेज मिला, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. दूसरी ओर झारखंड में कोयलकारो में आदिवासियों ने सुवर्णरेखा पर बन रहे बांधों का निर्माण रोक दिया, जबकि वहां मीडिया का ध्यान भी नहीं गया था. इसी तरह ओड़िशा में गंधमर्दन में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बाल्को को वहां से भागना पड़ा और नंदीग्राम में सालेम को प्रचंड विरोध के आगे पसीने छूट गये. मीडिया के हालात को देखते हुए मैं खुद भी टीवी चैनलों की बहस में हिस्सा लेने नहीं जाती हूं, क्योंकि वहां लगता है कि मैं भी सर्कस की जानवरों में से एक हो गयी हूं. वहां मुझे एक शोपीस की तरह सजा कर खड़ा कर दिया जायेगा और जो मैं वास्तव में कहना चाहती हूं, वह कहने के लिए समय नहीं दिया जायेगा. हमें सिनेमा तकनीक की ओर इसलिए भी ध्यान देना होगा, क्योंकि मुख्यधारा का सिनेमा अब इंटरनेशनल एलीट के कब्जे में है. हाल में आयी गुरु फि ल्म को देखिए, जिसमें खुल कर साम्राज्यवाद का पक्ष लिया गया है. धीरू भाई अंबानी की जिंदगी से प्रेरित इस फि ल्म में शक्तिशाली बिजनेसमैनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे बंधुआ मजदूर हों और राज्य के सताये हुए हों. जबकि हकीकत में यह फ़िल्म लोकल कैपिटलिज्म के पक्ष में बनायी गयी है और ऐसे उद्योगपतियों को हीरो बनाया गया है जो किसी भी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते हैं. यानी फिल्मकार भी अब साम्राज्यवाद के सबसे बड़े कारिंदे के रूप में उभर रहे हैं और उन्हें देश के हितों की चिंता नहीं रह गयी है. फिल्मों के अलावा अब सिनेमा हॉल भी ऐसे बनाये जा रहे हैं, जहां सिर्फ अमीरों के लिए ही फिल्में चलतीं और दिखायी जाती हैं. बड़े-बड़े सिनेमा हॉलों को तोड़ कर मल्टीप्लेक्स हॉल बनाये जा रहे हैं, जहां दो-ढाई सौ रुपये से कम का टिकट नहीं होता है. यानी सिनेमा हॉलों और फिल्म निर्माताओं ने अपने दर्शक वर्ग का चुनाव क र लिया है. जो लोग इतना पैसा देकर फिल्में देखेंगे, वे कभी आम जनों की जिंदगी पर बनी फ़िल्में पसंद नहीं करेंगे. वे उन्हीं फ़िल्मों को पसंद करेंगे जो उनकी शानो शौकत और ग्लैमर में डूबी ज़िंदगी को नाटकीय अंदाज में पेश करेंगी. न्यूज चैनल भी आम सच्चाइयों से कटते जा रहे हैं, भले ही वे दिनोंदिन कितने ही बड़े होते जा रहे हों. इसीलिए मैं कहती हूं जनांदोलनों को मीडिया को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए, हमारी सारी ऊर्जा वहीं खप जाती है. हमें अब मीडिया को दिखाने के लिए कोई आंदोलन नहीं करना है, बल्कि किसी मुद्दे के प्रति गंभीरता से प्रेरित होकर आंदोलन करना चाहिए. वैसे भी, मीडिया की आदत ही किसी मुद्दे को चबा कर उसे थूक देने की है. निठारी केस में जिस गैरराजनीतिक तरीके से सारी रिपोर्टिंग हुई वह भी मीडिया के निकम्मेपन को दरसाता है. हमें अपने संघर्ष के लिए अन्य भाषाओं में लिखे साहित्य व उनके अनुवादों की मदद लेनी चाहिए. साहित्य और संस्कृति की किसी भी समाज में दोहरी जिम्मेदारी होती है. एक ओर वे राष्ट्र के आंतरिक स्वरूप को ज्यादा लोकतांत्रिक और समानतापरक बनाने के लिए संघर्ष करते हैं, दूसरी ओर साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने का काम करते हैं. इन जिम्मेदारियों से रचनाकारों के विचलन की वजह क्या है? साहित्य-संस्कृति के बारे में आपकी मान्यताएं सहीं हैं, लेकिन विचारधारा पर निष्ठा कायम रख पाना काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जो लेखक , खासतौर पर भारत के अंगरेजी लेखक यूरोप में रह रहे हैं, वे साम्राज्यवाद के खिलाफ क्या लिखेंगे? उन्हें अभी छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले में रहना पड़ जाये, जहां रोज जीवन-मौत का संघर्ष होता है, तो फिर से विचारधारा और साहित्य के रिश्ते समझ में आने लगेंगे. ऐसे लेखकों की जब अंतरराष्ट्रीय मीट आयोजित होती है, तो वे अपने इंडोनेशिया, कोरिया और हांगकांग के अनुभवों के बारे में बात करते हैं, लेकिन भारत के गांवों में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें कम ही रहती है. हम क्रांतिकारी साहित्य की बात तो करते हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं है कि सभी क्रांतियों ने अंत में पूंजीवाद को ही बढ़ावा नहीं दिया है? यानी सभी क्रांतियों का अंत एडवांस्ड कैपिटलिज्म में ही हुआ है, लेकिन यह सभी सही होते हुए भी लेखक के लिए क्रांतियों का आकर्षण हमेशा बना रहेगा. उसे किसी भी तरह के फासीवाद के खिलाफ लिखना और बोलना होगा, क्योंकि उसकी चुप्पी का अर्थ होगा फासीवाद को समर्थन देना, उसके खेमे का हिस्सा बन जाना. लेकिन कई बार लेखक ही समाज में लेखक के क्रांतिकारी रोल को चुनौती देता है. मुझ पर न जाने कितनी बार यह कह कर हमले हुए हैं कि मैं बांध, परमाणु बम और सांप्रदायिक दंगों जैसे विषयों पर क्यों लिखती हूं. यहां तक कहा गया कि मैं अपने सेलेब्रिटी स्टेटस का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश क र रही हूं और अपनी लेखन प्रतिभा व ऊर्जा का दुरुपयोग कर रही हूं. इन सारे हमलों के बाद मैंने अपने आलोचकों से कहा था कि तुम लोग लेखन के विषयों की एक लिस्ट बना कर मुझे दे दो, मैं बस उन्हीं पर लिखती रहूंगी. ऐसी आलोचना करनेवाले सिर्फ दक्षिणपंथी लेखक ही नहीं, लिबरल छविवाले लेखक भी थे और तब मुझे महसूस होता था कि क भी-क भी उदारपंथी लेखक कि सी फासिस्ट लेखक से ज्यादा धूर्त और कट्टर होते हैं. वे सीधे किसी का दमन करने का पक्ष नहीं लेते, लेकिन लेखन के कई विषयों के खिलाफ एक लिटरेरी सेंसरशिप के लिए माहौल निर्मित करने का काम क रते हैं.
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