08 मार्च 2013

इस व्यवस्था को टूटना ही है: अरुंधति राय



हमारे इस दौर में अरुंधति राय एक ऐसी विरल लेखिका हैं जो सरकारी दमन, अन्याय और कॉरपोरेट घरानों की लूट के खिलाफ पूरी निडरता और मुखरता के साथ लगातार अपनी कलम चलाती रहती हैं। वह समाज के सबसे वंचित, शोषित और हाशिए पर खड़े लोगों के साथ पूरे दमखम के साथ खड़ी रहती हैं। प्रस्तुत है पूंजीवाद, मार्क्सवाद, भारतीय वामपंथ, भारतीय राजनीति और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर उनसे  नरेन सिंह राव की बातचीत। समयांतर के फरवरी, 2013 के विशेषांक में प्रकाशित. 


आज के दौर में आप बराबरी पर आधारित समाज के विचार को कैसे देखती हैं?

मेरे ख्याल में बहुत कम लोग इसके बारे में सोचते हैं। 1968-69 में जब पहला नक्सलवादी आंदोलन शुरू हुआ था या बराबरी पर आधारित समाज के बारे में जो पूरी सोच थी, लोग कहते थे कि भूमि खेतिहर को मिलनी चाहिए यानी जिनके पास जमीन है उनसे छीनकर जिनके पास नहीं है उनको दे दो। वह पूरी सोच अब बंद हो गई है। अब केवल यह है कि जिसके पास थोड़ा बहुत बचा है उसे मत छीन लीजिए। इससे क्या हुआ है कि अल्ट्रा लेफ्ट, जिसे नक्सलवादी या माओवादी कहते हैं, वे भी इससे पीछे हट गए हैं। वे लोग उन लोगों के लिए लड़ रहे हैं जिनसे राज्य ने उनकी जमीन छीन ली है। दरअसल, ये वे लोग हैं जिनके पास जमीन है। लेकिन जिनके पास कुछ भी नहीं है, जो शहरी गरीब हैं तथा दलित हैं और जो पूरी तरह से हाशिए पर खड़े मजदूर हैं, उनके बीच में अभी कौन-सा राजनीतिक आंदोलन चल रहा है? कोई भी नहीं चल रहा। जो रेडिकल मूवमेंट हैं वो ये वाले हैं जो गांववाले बोलते हैं - हमारी जमीन मत लो। जिनके पास जमीन नहीं है, जो अस्थायी मजदूर हैं या जो शहरी गरीब हैं, वे राजनीतिक विमर्श से बिल्कुल बाहर हैं। बराबरी पर आधारित समाज के मामले में हम सत्तर के दशक से बहुत पीछे जा चुके हैं, आगे नहीं। नवउदारवाद की पूरी भाषा, जिसे ट्रिकल डाउन कहते हैं (जो कुछ बचा खुचा है वह उनको ले लेने दो), उसको (भाषा) ही देख लीजिए। बराबरी पर आधारित समाज के विचार की जो भाषा है वह मुक्कमल है। अगर आप कम्युनिस्ट नहीं हैं और पूंजीवादी हैं, तो अभी जो हो रहा है वह पूंजीवादी लोग भी नहीं करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा के लिए एक-सा मैदान होता है, वह है ही नहीं अब। जो धंधे वाले (व्यापारी) लोग हैं उनको कॉरपोरेट ने किनारे लगा दिया है। छोटे व्यापारियों को मॉल्स ने किनारे कर दिया है। यह पूंजीवाद नहीं है। यह पता नहीं क्या है? यह कुछ और ही चीज (ऑर्गनिज्म) है।

लेखिका और एक्टिविस्ट के बतौर आप मार्क्सवाद को किस तरह देखती हैं?

पहली बात यह कि मैं अपने आप को लेखिका ही समझती हूं, न कि एक्टिविस्ट। ऐसा इसलिए कि इन दोनों से खास तरह की सीमाएं निर्धारित होती हैं। एक वक्त था जब लेखक हर बात पर अपनी राय रखते थे और समझते थे कि यही उनका फर्ज है। आजकल लिटरेरी फेस्टिवल में जाना उनका 'फर्ज' बन गया है। एक्टिविस्टों को लेकर वे समझते हैं कि उनका काम कुछ हटकर है, जिसमें गहराई नहीं है। काम का ऐसा बंटवारा मुझे पसंद नहीं है।

मैं मार्क्सवाद को एक विचारधारा के रूप में देखती हूं। एक अद्भुत विचारधारा जिसके मूल में समानता निहित है, न सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर बल्कि प्रशासकीय तौर पर भी। अगर भारतीय परिप्रेक्ष्य में जीवन की जटिलताओं को मार्क्सवाद के नजरिए से देखा जाए तो कई सारी समस्याएं देखने को मिलती हैं। लेकिन मार्क्सवादी नजरिए से जाति से नहीं निपटा गया है। आमतौर पर वे (कम्युनिस्ट) कहते हैं कि जाति ही वर्ग है, लेकिन वास्तव में जाति हमेशा वर्ग नहीं है।

जाति वर्ग हो सकती है, क्योंकि मेरी राय में कई सारे रेडिकल दलित बुद्धिजीवियों ने मार्क्सवाद का आलोचनात्मक चिंतन प्रस्तुत किया है, जो आंबेडकर की डांगे के साथ बहस के समय से ही शुरू हो चुका था। लेकिन मेरी राय में आज भी रेडिकल लेफ्ट ने इस मुद्दे को सुलझाने का रास्ता नहीं खोजा है। क्यों ऐसा है कि रेडिकल लेफ्ट, माओवाद और पूरा का पूरा नक्सलवादी आंदोलन (जिसके लिए मेरे मन में बहुत इज्जत है), सिर्फ जंगलों और आदिवासी इलाकों में ही सबसे मजबूत है, जहां लोगों के पास जमीनें हैं? उनकी रणनीति और कल्पनाशीलता शहरों तक क्यों नहीं पहुंच पाई है? इन सीमाओं के कारण दलित एक बार फिर से कट गए हैं। जब मैं दलितों की बात कर रही हूं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वहां सब कुछ साफ है। जो लोग अपने को दलित कह रहे हैं उनके अंदर भी बहुत भेदभाव है। तब इन मुद्दों से रू-ब-रू होने में, हमारी भाषा में- किस तरह का पैनापन होगा जिससे कि ये अस्मिताओं के संघर्ष में तब्दील होकर न रह जाए। हम कितने खुश थे जब वर्ल्ड सोशल फोरम में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया था। लेकिन हकीकत यह भी है कि करोड़ों लोग कुंभ मेले में भी जाते हैं। अगर सिर्फ जन सैलाब को देखा जाए तो इस हिसाब से यह सबसे बड़ा आंदोलन है! या फिर बाबरी मस्जिद विध्वंस को भी सबसे बड़ा आंदोलन कहा जा सकता है! बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आरएसएस, विहिप और शिवसेना जैसी दक्षिणपंथी ताकतों और आमजन के भीतर फासीवादी प्रवृत्ति पर हमने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। ये सिर्फ सरकार, आरएसएस और बीजेपी की बात नहीं है। हर रोज, हर जगह, हर गली-नुक्कड़ में, मीडिया में यही विमर्श चल रहा है। ऐसा क्यों है कि धर्म, जाति और अस्मिता के सवाल पर लोगों की चेतना को द्रुत गति से लामबंद किया जा सकता है (ऐसा गुर्जर आंदोलन में हमने देखा), लेकिन मुंबई में रहने वाले शहरी गरीब कभी लामबंद नहीं होते। वहां सब कुछ या तो बिहारी बनाम मराठी होता है या फिर यूपी बनाम ठाकरे। भारत एक ऐसा समाज या राष्ट्र है जो लगातार कॉरपोरेट पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिरोध के स्वर को धर्म, जाति, भाषा और अस्मिताओं के आधार पर आसानी से बांट दिया जा सकता है। जब तक हम साझा प्रतिरोध के विचार से रू-ब-रू नहीं होंगे, स्थिति ज्यों-की-त्यों बनी रहेगी। मैं यह नहीं कह रही कि सब लोगों को हाथ पकड़े रहना होगा, क्योंकि ढेर सारे आंदोलन एक साथ नहीं आ सकते। लेकिन कुछ मुद्दों पर उनमें समानता होगी। भारत में जो सबसे एकजुट ताकत है, उसके बारे में मेरा मानना है कि वो उच्च हिंदू जाति का मध्यवर्ग है। ये लोग किसी भी वामपंथ या वामपंथी, (जिसकी विचारधारा ही एकता पर आधारित है) से कहीं ज्यादा एकजुट हैं।

जो लोग हाशिए पर हैं उनका राजनीति से लगातार मोहभंग होता जा रहा है। इसके मद्देनजर भारतीय संदर्भ में मार्क्सवाद के भविष्य को लेकर आपकी क्या राय है?

देखिए, मैं इतनी आसानी से नहीं मान सकती कि उन लोगों का मोहभंग हो गया है। हम चाहते हैं कि उनका मोहभंग हो जाए! लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। अभी भी वे बहुत बड़ी संख्या में वोट देने आते हैं। हम लोग कहते रहते हैं कि ये सभी एक ही हैं, ये पार्टी या वो पार्टी। लेकिन लोगों में अभी भी एक उत्साह है, यह मानना ही पड़ेगा। किसलिए है, उनकी उम्मीदें क्या हैं? उनकी उम्मीदें शायद ये नहीं हैं कि जिंदगी बदल जाएगी या देश बदल जाएगा या पूंजीवाद खत्म हो जाएगा। उनका सपना है कि यहां नल लग जाएगा, हॉस्पिटल खुल जाएगा आदि। हालांकि चुनावी प्रक्रिया से तो मैं उम्मीद नहीं रखती हूं, लेकिन जनता गहरी उम्मीद रखती है। वे वोट डालने आते हैं, हमको मानना ही पड़ेगा। इतनी बड़ी राजनीतिक ताकत (पॉलिटिकल फोर्स) को यूं ही खारिज नहीं कर सकते। आजकल की बहसें देखिए - भ्रष्टाचार के खिलाफ या आम आदमी पार्टी को लेकर है। मैं उनसे पूछती रहती हूं कि जो जगनमोहन रेड्डी भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद है वह अगर कोई रैली करेगा तो उसको सुनने के लिए लोग गाड़ी से उतरकर पंद्रह किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं। लोग अच्छे लोगों के लिए वोट नहीं देते हैं। वे वोट क्यों दे रहे हैं, किसको दे रहे हैं- सभी भ्रष्टाचार के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। हम लोग वही सोचते हैं जो हम लोगों को सोचते हुए देखना चाहते हैं या जो हमें अच्छा लगता है! यह बहुत दूर की कल्पना है कि लोगों का मोहभंग हो गया है। बहुत अधिक भ्रष्टाचार के बावजूद लोग इस चुनावी प्रक्रिया में पूरी तरह शरीक होते हैं। लोग इसको अच्छी तरह से देख भी सकते हैं, फिर भी वे इसमें भागीदारी करते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि ये लोग बेवकूफ हैं। ऐसा बहुत सारे जटिल कारणों की वजह से है। मैं मानती हूं कि हमें निश्चित तौर पर अपने आपको बेवकूफ बनाना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि हम कुछ चीजें जानते हैं, इन चीजों की लोगों के वोट डालने में या नहीं डालने में कोई भूमिका नहीं है। जो मैं सोचती हूं वह यह है कि हमारे सामने कोई खूबसूरत-सा विकल्प खड़ा नहीं होने वाला है। चलो इसको वोट देते हैं, वह व्यवस्था को बदलेगा। ऐसा नहीं होने वाला है। व्यवस्था इतनी जमी हुई है- कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, मीडिया जैसे रिलायंस के पास 27 टेलीविजन चैनल हैं, किसी और के पास अखबार हैं। मुझे लगता है कि इससे क्या होगा? इससे यह होगा कि बहुत ज्यादा लंपटीकरण और अपराधीकरण बढ़ेगा। जैसे अभी जो छत्तीसगढ़ और झारखंड में चल रहा है। वहां राजनीति, विचारधाराओं, बहसों और संरचनाओं में एकरूपता दिखती है। लेकिन जैसे आप सबको शहर की ओर भगाएंगे, उनका आप अपराधीकरण करेंगे, जैसे इस बलात्कार की घटना के बाद मनमोहन सिंह ने साफ-साफ कहा कि हमें इन नए प्रवासियों से, जो शहरों में आते हैं, सावधान रहना पड़ेगा। पहले आप उन्हें शहरों की तरफ धकेलते हैं और फिर उनका अपराधीकरण करते हैं। इन स्थितियों में फिर आपके लोग ज्यादा पुलिस, सुरक्षा और ज्यादा कड़े कानून की बात करते हैं। एक बार अपराधीकरण होने के बाद फिर उनको अपराधियों की तरह व्यवहार करना ही पड़ता है। उनके पास कोई कानून और काम नहीं है। आप एक ऐसी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं जहां लोगों के व्यापक हिस्से का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। यह गलत है। अब ऐसे में वामपंथ क्या करने वाला है, क्योंकि जिसे हम अल्ट्रा लेफ्ट कहते हैं वो जंगलों में फंसा हुआ है, आदिवासी आर्मी के साथ। बुद्धिजीवी लोगों के लिए यह कहना बिल्कुल जायज और आसान है कि वे पेरिस कम्यून जैसा सपना देख रहे हैं। उनमें से बहुत सारे लोग तो जानते ही नहीं है कि जगदलपुर, भोपाल अस्तित्व में हैं। लेकिन नक्सली लड़ रहे हैं। उन्हें पता है कि वे किसके लिए लड़ रहे हैं। यह हो सकता है पार्टियां, आप और मैं विचाराधारत्मक रूप से उनसे सहमत न हों। लेकिन जंगल के बाहर वामपंथ क्या कर रहा है? जब मार्क्स  सर्वहारा के बारे में बात करते हैं, तो उनका सर्वहारा से मतलब मजदूर वर्ग है। ज्यादातर जगहों पर मजदूरों की संख्या को कम करने की पूरी कोशिश की जा रही है। वहां पर रोबोट्स और उच्च तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। अब श्रमिकों की तादाद वह नहीं बची है जो हुआ करती थी - क्लासिक सेंस में। तो, इस नए दौर में बहुत ही विशेषाधिकर प्राप्त श्रम शक्ति (वर्कफोर्स) है, उदाहरण के लिए मारुति में काम करने वाले श्रमिकों को ले सकते हैं। लेकिन, उनके साथ क्या हुआ - वहां वाम क्या कर रहा है? वाम के पास उनको कहने के लिए कुछ नहीं है। नक्सल क्षेत्रों के बाहर ऐसा कोई लेफ्ट नहीं है जो इन चीजों के साथ लड़ रहा है। मैं नहीं जानती कि आप उनका राजनीतिकरण कैसे करेंगे। बहुत बड़ी संख्या में शहरी गरीब हैं जिन्हें कोई विधिवत काम नहीं मिला है, जो श्रमिक (वर्कर्स) नहीं हैं। उन्हें सांप्रदायिक तत्त्वों के द्वारा कभी भी बरगलाया और भड़काया जा सकता है। उन्हें कभी भी एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि भारत फासीवाद की तरफ बढ़ रहा है? 

मुझे लगता है कि यह सवाल आपने पांच साल पहले पूछा होता तो मैं कहती कि बढ़ रहा है। अब मैं यह नहीं कहूंगी कि यह बढ़ रहा है। उसके सामने यह पूरा कॉरपोरेट और मध्य वर्गीय अभिजात्य है। उनका नरेंद्र मोदी की तरफ जो यह रुझान (शिफ्ट) है, यह एक फासीवाद से दूसरे फासीवाद की तरफ जाना (शिफ्ट) है। वहां एक तरफ अनिल अंबानी और दूसरी तरफ मुकेश अंबानी बैठकर यह कहते हैं कि यह (मोदी) राजाओं का राजा है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह बदल गया है। जबकि, हकीकत यह है कि वह एक तरह के फासिस्ट से दूसरी तरह का फासिस्ट बन गया है। मुझे लगता है कि आजकल यह हो गया है कि बहुत बड़ी संख्या में मध्य वर्ग को पैदा किया गया है। उनके मन में, उनके सपनों में एक पुच्छलतारे का मार्ग (ट्रेजेक्टरी) बनाया गया है, जिससे वे उधर से इधर आएं और अब बिल्कुल ठहर गए हैं। जहां आगे कोई रास्ता नहीं है। और अब यह गुस्सा अलग-अलग तरह से फूटता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन मैं इससे बहुत आहत होती हूं।

हाल के दिनों में हुए आंदोलनों का क्या भविष्य है? जैसे अण्णा हजारे ... 

अण्णा हजारे तो दफ्तर बंद करके चले गए। जब ये लोग बिना कोई काम किए हुए टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में अपने मूवमेंट का निर्माण करते हैं तो उनका क्या भविष्य हो सकता है? जब टेलीविजन चैनल चाहेंगे तो उन्हें आगे बढ़ाएंगे! जब उन्हें कोई खतरा नजर आएगा तो इन आंदोलनों को बंद कर देंगे। उसमें क्या है? मसलन आम आदमी पार्टी को देखिए! जिसने एक बार रिलायंस का जिक्र किया और टांय-टांय फिस्स। जब मीडिया उनका (कॉरपोरेट) है तो आखिर आप वहां कैसे हो सकते हैं? मतलब थोड़ा तो आगे सोचना चाहिए ना! ऐसे तो होगा नहीं। यह जो बचपना है, यह कैसे चलेगा? मतलब, ये इतना हो-हल्ला मचा के रखते हैं कि अगर कोई इनके खिलाफ बोलेगा तो सिद्ध करेंगे कि वह या भ्रष्टाचार के समर्थन में है या फिर बलात्कार के समर्थन में है। क्या इनके पास जरा-सी भी समझ नहीं है राजनीतिक इतिहास की? इसमें कुछ लोग अच्छा काम करते हैं। वे कोशिश करते हैं इसको आगे अंजाम देने की। लेकिन मेरे ख्याल में जहां पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है वह हमें बहुत उत्तेजित करता है, लेकिन लोग उस नजरिए से चीजों को नहीं देख रहे। वे नहीं समझते कि हर विरोध प्रदर्शन यकीनन प्रगतिशील और क्रांतिकारी नहीं हो सकता। हर जन आंदोलन महान नहीं होता। जैसे मैं अक्सर कहती हूं कि इस देश में सबसे बड़ा आंदोलन बाबरी मस्जिद का विध्वंस है, जिसको वीएचपी और बजरंग दल ने चलाया। जैसे जब लड़की का बलात्कार हुआ था, उस हफ्ते दो-तीन दिन आगे-पीछे नरेंद्र मोदी चौथी बार चुनाव जीता। अब उन्हीं टीवी चैनलों में वही लोग, जो बलात्कार के खिलाफ इतना चिल्ला रहे थे, उस आदमी (मोदी) जिसके राज में महिलाओं के शरीर को चीरकर उनकी बच्चेदानी को निकाल दिया गया, जिनका बलात्कार करके जिंदा जला दिया गया, अब (टीवी चैनल) कह रहे हैं कि इन पुरानी बातों को भूल जाओ। आप अतीत में क्यों जा रहे हैं। यह किस तरह की राजनीति है मैं नहीं समझ पाती हूं। मुझे यह समझने में बहुत दिक्कत होती है। ये बहुत ही पेचीदा, बौद्धिक और भावुक पहेली है। क्योंकि, आप तब विरोध नहीं कर सकते, जब संस्थानिक तरीके से महिला का बलात्कार होता है। नारीवाद की राजनीति बहुत ही जटिल है। जब यथास्थितिवाद के लिए बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है - चाहे वह कश्मीर हो, चाहे मणिपुर हो, चाहे नगालैंड हो या ऊंची जाति का एक आदमी दलित महिला के साथ बलात्कार कर रहा हो या हरियाणा में ऑनर किलिंग हो। इन सभी मामलों में एक ही तरह की प्रतिक्रिया आती है। ... जो बच्चियां बड़ी हो रही हैं... जवान होती लड़कियों को सड़कों पर घूमते हुए देखना कितना खूबसूरत और मनमोहक होता है। और जो हुआ वह कितना भयानक है। हम कैसे कह सकते हैं लोग बलात्कार के मामले को लेकर परेशान थे, जबकि वे सिर्फ 'इस बलात्कार' के मामले को लेकर परेशान थे। यह ठीक है, लेकिन यह खास तरह की राजनीति है! यह बहुत ही कठिन पहेली है। लेकिन इसके बारे में सोचना बहुत जरूरी है और मैं सोचती हूं कि आप लोगों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि जो चीजें उन्हें परेशान नहीं करती हैं वह उन्हें झकझोर दे। लेकिन इस वजह से बहुत बड़ी राजनीति को आप वैसे ही नहीं छोड़ सकते हैं। आप यह समझना चाहते हैं कि वह क्या है?

क्या आप मानती हैं कि नव उदारवादी नीतियां भारतीय राज्य के मूल चरित्र को उजागर करती हैं? 

देखिए, भारतीय राज्य का नहीं, बल्कि समाज का। ये नवउदारवादी नीतियां सामंती और जाति आधारित समाज के बिल्कुल मनमाफिक है लेकिन यकीनी तौर पर यह किसी गांव में फंसे दलित के लिए ठीक चीज नहीं है। यह सभी असमानताओं को मजबूत करती है, क्योंकि यह निश्चित तौर पर ताकतवर को और ताकतवर बनाती है। यही तो कॉरपोरेट पूंजीवाद है। हो सकता है कि यह शास्त्रीय पूंजीवाद की तरह न हो, क्योंकि शास्त्रीय पूंजीवाद नियमों पर चलता हो और वहां 'चेक एंड बैलेंस' का सिस्टम होता हो। लेकिन हमारे यहां इसमें ऐसा कुछ नहीं होता। यकीकन इससे ताकतवर लगातार ताकतवर बनता जाता है। और यही लोग तो बनिया हैं। यह सबसे अहम बात है जिसके बारे में कभी कोई बात नहीं करता - भारतीय बनियों की राजनीति। इन्होंने पूरे देश में क्या कर दिया है? रिलायंस एक बनिया है। वे बनिया जाति के तौर पर दृश्य से पूरी तरह बाहर रहते हैं, लेकिन वे बहुत ही अहम भूमिका अदा करते हैं। यह इन्हें बहुत मजबूत बनाता है। यही कारण है कि रिटेल में एफडीआई के मामले में भाजपा सबसे ज्यादा गुस्से में आई क्योंकि 'उनके छोटे बनिये' दांव पर लग गए हैं क्योंकि वो जाति (बनिया) उनका (भाजपा) आधार है।

दूसरी तरफ आप ग्रामीणों, आदिवासियों और दलितों के साथ कुछ भी कर दीजिए किसी के उपर कोई फर्क नहीं पड़ता।

भारतीय वामपंथ का दायरा बहुत ही सीमित दिखाई देता है। आप इसका क्या कारण मानती हैं और इसके लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं?

मुझे लगता है कि इसमें जाति एक बहुत बड़ा कारण है। अगर आप सीपीएम को देखें तो उसमें ऊपर बैठे लोग सारे ब्राह्मण हैं। केरल में भी सारे नायर और ब्राह्मण हैं। उन्होंने कभी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मार्क्स वादी विचार का बेहतरीन इस्तेमाल कैसे करें, जहां पर लोगों के साथ व्यवस्थागत तरीके से भेदभाव किया जाता है। अक्सर जब आप ऊंची जाति से आते हैं तो समस्याओं को नहीं देख पाते हैं। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि आप खराब आदमी हैं। बस बात यह है कि आप इसे देख ही नहीं पाते। मैं एक बार कांचा इल्लैया से बात कर रही थी, जो एक समय में पीपुल्स वार ग्रुप से जुड़े थे। वह अकेले ऐसे आदमी थे जो अपने समुदाय में पढ़े-लिखे थे। उनके भाई ने बहुत कोशिश की कि वह उनको पढ़ा-लिखा देंखे। जबकि उनकी पार्टी चाहती थी कि वह भूमिगत हो जाएं। यह उस तरह से नहीं है कि किसी ब्राह्मण को भूमिगत हो जाने के लिए कह दें, क्योंकि उनके (ब्राह्मण) परिवार में बाकी लोग पढ़-लिख सकते हैं। इस मामले को आपको बिल्कुल ही अलग तरीके से समझना पड़ेगा।

मेरी समझ से दूसरा कारण यह है कि आप इस मुगालते में रहें कि चुनाव लड़कर राज कर सकते हैं। और फिर आप एक ही समय में राजा भी बने रहें और क्रांतिकारी भी बने रहें! यह कैसे हो सकता है। यह तो एक तरह का फरेब है!

भारत में माओवादी आंदोलन की संभावनाओं और चुनौतियों को आप कैसे देखती हैं?

माओवादी आंदोलन के लिए वहां पर बहुत अवसर हैं जहां पर वे बहुत मजबूत हैं। लेकिन अब यहां पर बहुत बड़ा हमला होने वाला है। आर्मी, एयरफोर्स सभी पूरी तैयारी में लगे हैं। शायद यह हमला 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद होगा और ये माओवादी आंदोलन के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन दूसरी तरफ माओवादियों ने अभी सीआरपीएफ के जवान के साथ जो किया (मृत जवान के पेट में बम डाल दिया था) वह बहुत ही वाहियात काम है। हम लोग उनका इन कारणों की वजह से समर्थन नहीं करते। मुझे नहीं मालूम है कि इस तरह का काम कैसे होता है? मुझे लगता है कि या तो उनके कमांड सिस्टम (नेतृत्व) में प्रोब्लम आ गई है या उनके साथ लंपट (लुम्पैन) लोग शामिल हो गए हैं। मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं जानती, खास तौर से झारखंड के बारे में। लेकिन इस हमले में अगर उनका अनुशासन टूटता है तो उनके लिए बहुत ही मुश्किल आ जाएगी, क्योंकि एक समय ऐसा था जब उनके साथ बहुत ज्यादा बौद्धिक और नैतिक समर्थन था, जो अब भी है। अगर आप ऐसे काम करते रहेंगे तो आपका यह समर्थन बंद हो जाएगा। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जंगल से बाहर कैसे काम करेंगे। अगर जंगल से बाहर नहीं जा सकते तो हम सोचेंगे कि ये सिर्फ एक क्षेत्रीय प्रतिरोध है, चाहे जिसका भी हम समर्थन करें। बात यह है कि जंगल से बाहर इतनी बड़ी जो गरीबी पैदा की गई (मैनुफैक्चर्ड पॉवर्टी) है, उसको आप राजनीतिक कैसे बनाएंगे। क्योंकि लोगों के पास समय नहीं है, जगह नहीं है और ये जंगल से बाहर कैसे काम करेंगे, यह बहुत बड़ा प्रश्न है।

क्या यह हो सकता है कि वे हिंसा छोड़कर चुनावी राजनीति में आएं? 

हिंसा क्या होती है? अगर छत्तीसगढ़ के किसी गांव में एक हजार सीआरपीएफ के जवान आकर गांव को जलाते हैं, औरतों को मारते हैं और बलात्कार करते हैं, तो ऐसे हालात में आप क्या करेंगे? भूख हड़ताल पर तो नहीं बैठ सकते। मैं हमेशा से यही कहती आई हूं कि जिसे बुद्धिजीवी, अकादमिक लोग, पत्रकार और सिद्धांतकार आदि एक विचारधारात्मक तर्क कहते हैं,वह मुझे टैक्टिकल लगता है। यह सब कुछ लैंडस्केप (भौगोलिक स्थिति)पर निर्भर करता है। आप छत्तीसगढ़ में बिल्कुल वैसे नहीं लड़ सकते जैसे आप मुंबई या दिल्ली में लड़ते हैं और मुंबई-दिल्ली में बिल्कुल वैसे नहीं लड़ सकते जैसे आप छत्तीसगढ़ में लड़ते हैं। इसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आप सड़कों पर गांधीवादी बन सकते हैं और जंगलों में माओवादी बनकर काम सकते हैं। गांधीवादी होने के लिए तो आपके आसपास टेलीविजन कैमरा और रिपोर्टर होना जरूरी है, अगर ऐसा नहीं है तो ये सब बेकार है। प्रतिरोध की विविधता बहुत जरूरी है। यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि हर काम करना माओवादियों की ही जिम्मेदारी नहीं है। दूसरी तरह के लोग दूसरी चीजें कर सकते हैं। जैसे लोग मुझे कहते हैं कि वहां बांध बन रहा है, यहां ये हो रहा है... मैं उनसे कहती हूं कि यार तुम भी तो कुछ करो। मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं तुम्हारी लीडर हूं। मैं वह कर रही हूं जो मैं कर सकती हूं। और आप वह करें जो आप कर सकते हैं।

मैग्लोमेनिएकल एप्रोच नहीं होनी चाहिए कि हर काम एक ही पार्टी या एक ही इंसान या एक बड़ा लीडर करेगा। बाकी लोग कुछ क्यों नहीं करते? एक ही पर क्यों निर्भर रहना चाहते हैं? माओवादी लोग गलतियां कर रहे हैं, लेकिन बहुत बहादुरी से लड़ रहे हैं और हम लोग सिर्फ बैठकर कहते हैं कि ये लोग ऐसे हैं, वैसे हैं। अरे यार, आप भी तो कुछ करो। अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो।

हमारे लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, फिल्मकारों, रंग निर्देशकों के काम क्या भारतीय सच्चाई को अभिव्यक्त करते हैं? 

मैं पूछती हूं कि इंडियन रियलिटी (भारतीय यथार्थ) होती क्या है। मैं हमेशा से सोचती आई हूं कि बॉलीवुड के इतिहास में सबसे बड़ी थीम क्या है? सबसे बड़ी थीम तो प्यार है। लड़का लड़की से मिलता है और वे भाग जाते हैं... लेकिन हमारे समाज में तो यह बिल्कुल नहीं होता। सिर्फ दहेज, जाति, ये-वो और सिर्फ गणित ही गणित (कैल्कुलेशन) है। तो जो चीज समाज में है नहीं उसे हम फिल्म में जाकर देखते हैं। कहने की बात ये है कि हमारा पूरा समाज जाति के आसपास घूमने वाला छोटे दिमाग (स्मॉल माइंडिड) का जोड़तोड़ करने वाला है। हम बस लोगों को सिनेमाई पर्दे पर नाचते-गाते देखकर खुश हो जाते हैं। हमारे साहित्य का यथार्थ से कुछ लेना-देना नहीं है। इस मामले में यह बिल्कुल निरर्थक है। हालांकि, इसमें कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं। आजकल साहित्य और सिनेमा में जो हो रहा है उसे मैं 'क्लास पोर्नोग्राफी' कहूंगी। जिसमें लोग गरीबी की तरफ देखते हैं और कहते हैं कि ये लोग तो ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं, गाली देते हैं, गैंग वॉर करते हैं। मतलब, अपने आप को बाहर रखकर ये चीजों को ऐसे देखते हैं जैसे उनका इनसे कुछ लेना-देना नहीं हो। यह ऐसा ही है जैसे गरीबों का ग्लेडिएटर संघर्ष देखना और फिर यह कहना कि ये कितने हिंसक होते हैं ! यह एक तरह की एंथ्रोपोलॉजी (नृशास्त्र) है, जहां पर आप युद्ध को बाहर से एक तमाशे की तरह देखते हैं और मजा लेते हैं। फिर एक और तरह से चीजों को महत्त्वहीन (ट्रिवीयलाइज) बनाते हैं। ये इतना 'ट्रिवियल' होता है कि आपके कान पर जूं भी नहीं रेंगती।

विश्व स्तर पर पूंजीवाद ने कमजोर समुदायों को और भी हाशिए पर तरफ धकेल दिया है। इन हालात में किस तरह के राजनातिक विकल्प उभर सकते हैं?

देखिए, मुझे लगता है कि इसका कोई भी सभ्य विकल्प नहीं है। केवल यह बात नहीं है कि सत्ता के पास सिर्फ पुलिस, सेना और मीडिया ही है, बल्कि कोर्ट भी उन्हीं के हैं। अब इनके आपस में भी 'जन आंदोलन' होने लगे हैं। और उनका अपना एक शील्ड यूनीवर्स (सुरक्षित खोलवाला संसार) है। इस सबको किसी सभ्य तरीके से बिल्कुल भेदा नहीं जा सकता। कोई सभ्य तरीके से आकर बोले कि मैं बहुत अच्छा हूं मुझे वोट दे दो, तो ऐसा हो नहीं सकता। दरअसल उनका अपना एक तर्क है। यही तर्क खतरनाक हिंसा और निराशा पैदा कर देगा। और ये गुस्सा इतना ज्यादा होगा कि ये लोग बच नहीं पाएंगे। अपने इस विशेषाधिकार के खोल में ये ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं रह पाएंगे। अब अच्छा बनने में कोई समझदारी नहीं है। इस संदर्भ में मैं अब सभ्य नहीं हूं। मैं हैंडलूम साड़ी पहनकर यह नहीं कहूंगी कि मैं भी गरीब हूं! मैं बिल्कुल नहीं हूं। मैं भी इसी पक्षपाती व्यवस्था का हिस्सा हूं। मैं वह करती हूं जो मैं कर सकती हूं, लेकिन मैं यह नहीं मानती कि बदलाव एक बहुत ही खूबसूरत और शांत ढंग से आने वाला है। जो कुछ चल रहा है उसकी अनदेखी कर अब ये लोग अपने लिए ही एक खतरनाक स्थिति पैदा करने वाले हैं। मैं नहीं मानती कि हम इस बदलाव के बारे में कोई भविष्यवाणी कर सकते कि यह कैसे होने वाला है या कहां से आने वाला है। यह तय है कि यह बदलाव बहुत ही खतरनाक होगा। इस व्यवस्था को टूटना ही है, जिसने बहुत बड़े पैमाने पर अन्याय, फासीवाद, हिंसा, पूर्वाग्रहों और सेक्सिज्म (यौनवाद) को संरचनात्मक तौर पर पैदा किया है।

जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां संसदीय राजनीति में हैं उनके बारे में आप क्या सोचती हैं? खास तौर पर अगर सीपीआई (भाकपा), सीपीएम (माकपा) और सीपीआई-एमएल (भाकपा-माले)जैसी कम्युनिस्ट पार्टियों के संदर्भ में बात करें। 

देखिए, जब पार्टियां बहुत छोटी होती हैं, जैसे कि सीपीआई (एमएल) और सीपीआई, तो आपके पास इंटिग्रिटी होती है। आप अच्छी पॉजिशंस और हाई मॉरल ग्राउंड (उच्च नैतिक आधार) ले सकते हैं। क्योंकि आप इतने छोटे होते हैं कि इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर आप सीपीएम जैसी बड़ी पार्टी हैं तो स्थिति दूसरी होती है। अगर हम केरल और बंगाल के संदर्भ में सीपीएम की बात करें तो दोनों जगह इसके अलग-अलग इतिहास रहे हैं। बंगाल में सीपीएम बिल्कुल दक्षिणपंथ की तरह हो गई थी। वे हिंसा करने में, गलियों के नुक्कड़ों को कब्जाने में, सिगरेट वालों के खोमचे को कब्जाने में बिल्कुल दक्षिणपंथ जैसे थे। यह बहुत अच्छा हुआ कि जनता ने उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। हालांकि मैं निश्चिंत हूं कि ममता बनर्जी की सत्ता का दौर जल्दी खत्म हो जाएगा। दूसरी तरफ केरल में स्थिति अलग थी, क्योंकि वे सत्ता से हटते रहे हैं जो कि एक अच्छी चीज है। वे वहां पर कुछ अच्छी चीजें भी कर पाए। लेकिन इसका श्रेय पार्टी को बिल्कुल नहीं दिया जा सकता, बल्कि यह इसलिए था क्योंकि वहां पर सत्ता का संतुलन बना रहा। अगर आप देखें तो उनकी हिंसा अक्षम्य है। दूसरी तरफ जिस तरह मलियाली समाज आप्रवासी मजदूरों का शोषण कर रहा है वह बहुत शर्मनाक है। ऐसे में आप बताएं, सीपीएम अपने आप को कम्युनिस्ट पार्टी कैसे कह सकती है? जिस पार्टी ने ट्रेड यूनियनों को बर्बाद कर दिया और पश्चिम बंगाल में नव उदारवाद के साथ कदमताल मिलाते रहे। वे अक्सर यह तर्क देते हैं कि अगर हम सत्ता में नहीं रहेंगे तो सांप्रदायिक लोग सत्ता हथिया लेंगे। लेकिन आप मुझे यह बताएं कि क्या सीपीएम के लोग हिम्मत जुटाकर गुजरात गए? जहां खुलेआम इतनी मारकाट चल रही थी वे दुबक कर बैठे रहे। जब नंदीग्राम में लोगों को बेघर कर उजाड़ दिया गया तो वे महाराष्ट्र में आदिवासियों के साथ जाकर बैठ गए। मतलब जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं है कि इतनी छोटी बातों को भी न समझ पाए। यह वाकई बहुत दयनीय है कि वाम (लेफ्ट) ने खुद को इतना नीचे गिरा दिया है। यहां तक कि ये संसदीय राजनीति में भी खुद को नहीं बचा पाए और जिन मुद्दों पर वामपंथी स्टैंड लेने चाहिए थे, ये वो तक नहीं ले पाए। इस सबके लिए ये खुद ही जिम्मेदार हैं और इनके साथ यही होना चाहिए था। इतने सालों में ये लोग कभी पार्टी को ऊंची जातियों के वर्चस्व से मुक्त नहीं करा पाए। और आज भी आप देखें कि पोलित ब्यूरो में यही लोग भरे पड़े हैं।

अगर लेफ्ट ने जाति के मुद्दे को सुलझाया होता, ईमानदारी से काम किया होता, इनके पास दलित नेता और बुद्धिजीवी होते और अगर ये पूंजीवाद की जगह लेफ्ट की भाषा बोलते तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस देश में लेफ्ट आज कितना मजबूत होता? ये लोग अपनी जातीय पहचान को कभी नहीं छोड़ पाए। और इनकी निजी जिंदगी के बारे में ही तो मेरा उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स है।

वर्तमान हालात में कम्युनिस्ट पार्टियों का क्या भविष्य है? 

देखिए, मैं सीपीआई-एमएल, आइसा से कभी-कभी सहमत होती हूं। ये लोग शहरी गरीबों के बीच काम करते हैं। बिहार में ये जाति के सवाल के हल करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ये सफल नहीं हो रहे हैं क्योंकि जैसा कि मैंने कहा कि इनकी ताकत बहुत ही सीमित है और ये हाशिए पर हैं। लेकिन बहुत सारी चीजें जो ये कहते हैं, उनका मैं सम्मान करती हूं। मैं बिल्कुल नहीं समझ पाती कि ये कैसे इतने हाशिये पर (मार्जिनलाइज्ड) रह गए और खुद को अप्रासंगिक बनाकर छोड़ दिया। मुझे माओवादियों और लिबरेशन के बीच विचारधारात्मक युद्धों को देखकर बहुत दुख होता है। इन लोगों ने टैक्टिक्स को विचारधारा के साथ जोड़कर भ्रम पैदा कर रखा है। सीपीआई (एमएल) के लोग जंगल के बाहर रहकर काम करते हैं और यह जरूरी नहीं कि वे हथियारों के साथ ही काम करें। लेकिन सीपीआई (एमएल) की राजनीति छत्तीसगढ़ में काम नहीं कर सकती। फिर आप देखिए कि अपने हाथों से इन्होंने खुद को हाशिए पर धकेल दिया है। ये छत्तीसगढ़ में माओवादियों के साथ गठजोड़ कर सकते थे। लेकिन ये राज्य से नफरत करने के बजाय एक दूसरे से ज्यादा नफरत करते हैं और अपना समय गंवाते हैं। जो कि कम्युनिस्टों की एक बड़ी खासियत है!

और सीपीएम किस तरफ बढ़ रही है...

सीपीएम बाकी संसदीय पार्टियों की तरह ही है। जिसे देखकर यह बिल्कुल नहीं लगता कि ये किसी भी तरीके से कम्युनिस्ट पार्टी है।

(नरेन सिंह राव मीडिया अध्यापन से जुड़े हैं और सिनेमा तथा साहित्य में दखल रखते हैं।)

21 फ़रवरी 2013

क्या आपके बमरोधी बेसमेंट में अटैच बाथरूम है? : अरुंधति राय


अफजल गुरु की फांसी के निहितार्थों और भारत की युद्धोन्मादी सांप्रदायिक राजनीति पर अरुंधति राय. मूल अंग्रेजी: आउटलुक. अनुवाद: रेयाज उल हक.

2001 के संसद हमले के मुख्य आरोपी मोहम्मद अफजल गुरु की खुफिया और अचानक दी गई फांसी के क्या नतीजे क्या होने जा रहे हैं? क्या कोई जानता है? सेंट्रल जेल जेल नं. 3, तिहाड़, नई दिल्ली के सुपरिंटेंडेंट द्वारा ‘मिसेज तबस्सुम, पत्नी श्री अफजल गुरु’ को भेजे गए मेमो में, जिसमें संवेदनहीन नौकरशाहाना तरीके से हरेक नाम को अपमानजनक तरीके से लिखा गया है, लिखा है:
‘श्री मो. अफजल गुरु, पुत्र- हबीबिल्लाह की माफी की याचिका को भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दिया गया है. इसलिए मो. अफजल, पुत्र-हबीबिल्लाह को 09/02/2013 को सुबह आठ बजे सेंट्रल जेल नं. 3 में फांसी देना तय किया गया है.
आपको सूचना देने और आगे की जरूरी कार्रवाई के लिए भेजा गया.’
मेमो भेजने का वक्त जानबूझ कर ऐसा रखा गया कि वह तबस्सुम को फांसी के बाद ही मिले, और इस तरह उन्हें उनके आखिरी कानूनी मौके – यानी क्षमा याचिका के खारिज किए जाने को चुनौती देने के अधिकार -  से महरूम कर दिया गया. अफजल और  उनके परिवार, दोनों को अलग-अलग ये अधिकार हासिल था. दोनों को ही इस अधिकार का उपयोग करने से रोक दिया गया. यहां तक कि कानून में अनिवार्य होने के बावजूद तबस्सुम को भेजे गए मेमों में राष्ट्रपति द्वारा क्षमा याचिका खारिज किए जाने की कोई वजह नहीं बताई गई. अगर कोई वजह नहीं बताई गई है, तो आप किस आधार पर अपील करेंगे? भारत में फांसी की सजा प्राप्त सभी कैदियों को यह आखिरी मौका दिया जाता रहा है.
चूंकि फांसी दिए जाने से पहले तबस्सुम को अपने पति से मिलने की इजाजत नहीं दी गई, चूंकि उनके बेटे को अपने पिता से सलाह के आखिरी दो बोल सुनने की इजाजात नहीं दी गई, चूंकि उन्हें दफनाने के लिए अफजल का शरीर नहीं दिया गया, और चूंकि कोई जनाजा नहीं हुआ, तो जेल मैनुअल के मुताबिक ‘आगे की जरूरी कार्रवाई’ क्या है? गुस्सा? अपार, अपूरणीय दुख? बिना किसी सवाल के, जो हुआ उसे कबूल कर लिया जाना? संपूर्ण अखंडता?
फांसी के बाद एक अपार जश्न मनाया गया. संसद हमले में मारे गए लोगों की गमजदा बीवियां टीवी पर दिखाई गईं, अपनी उत्तेजित मूंछों के साथ ऑल इंडिया एंटी-टेररिस्ट फ्रंट के अध्यक्ष एम.एस. बिट्टा थे उनकी छोटी सी उदास कंपनी के सीईओ की भूमिका अदा कर रहे थे. क्या कोई उन्हें बताएगा कि जिस इंसान ने उनके पतियों को मारा वो भी उसी वक्त, उसी जगह पर मारा गया था? और जिन लोगों ने हमले की योजना बनाई उनको कभी सजा नहीं होगी, क्योंकि हम अब तक नहीं जानते कि वे कौन हैं.
इस बीच कश्मीर पर एक बार फिर कर्फ्यू लागू है. एक बार फिर इसके लोगों को बाड़े में जानवरों की तरह बंद कर दिया गया है. एक बार फिर उन्होंने कर्फ्यू को मानने से इन्कार कर दिया है. तीन दिनों में तीन लोग मारे जा चुके थे और पंद्रह गंभीर रूप से जख्मी थे. अखबार बंद करा दिए गए हैं, लेकिन जो भी इंटरनेट पर छानबीन करना जानता है, वो पाएगा कि नौजवान कश्मीरियों का गुस्सा उतना अवज्ञाकारी और साफ जाहिर नहीं है, जितना यह 2008, 2009 और 2010 की गर्मियों के जन उभार के दौरान था – यहां तक कि उन मौकों पर 180 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस बार गुस्सा सर्द और तीखा है. निर्मम. क्या ऐसी कोई वजह है कि इसे ऐसा नहीं होना चाहिए था?
20 वर्षों से भी अधिक समय से, कश्मीरी एक फौजी कब्जे को भुगत रहे हैं. जिन दसियों हजार लोगों ने अपनी जानें गवाईं, वे जेलों में, यातना शिविरों में और असली और फर्जी ‘मुठभेड़ों’ में मारे गए. अफजल गुरु की फांसी को जो बात इन सबसे अलग बनाती है, वो यह है कि इस फांसी ने उन नौजवानों को, जिन्हें कभी भी लोकतंत्र का सीधा अनुभव नहीं रहा है, सबसे आगे की कुर्सियों पर बैठ कर भारतीय लोकतंत्र को पूरी महिमा के साथ काम करते हुए देखने का मौका मुहैया कराया है. उन्होंने पहियों को घूमते हुए देखा है, उन्होंने एक इंसान को, एक कश्मीरी को फांसी देने के लिए इसके सारे पुराने संस्थानों, सरकार, पुलिस, अदालतों, राजनीतिक दलों और हां, मीडिया को एकजुट होते हुए देखा है, जिसके बारे में उऩका मानना है कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं हासिल हुई थी. और उनके यह मानने की खासी वजहें हैं.
निचली अदालत में सुनवाई के सबसे अहम हिस्से में अफजल का पक्ष पेश करने वाला लगभग कोई नहीं था. अदालत द्वारा नियुक्त वकील कभी उनसे जेल में नहीं मिला, और असल में उसने अपने खुद के मुवक्किल के खिलाफ इल्जाम लगाने वाले सबूत पेश किए. (सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार किया और फिर फैसला किया कि यह ठीक है.) संक्षेप में, किसी भी तरह से तर्कसंगत संदेहों के परे जाकर उनका अपराध साबित नहीं हुआ. उन्होंने देखा कि सरकार ने उन्हें फांसी की सजा का इंतजार कर रहे लोगों में से चुन कर, बेवक्त फांसी दे दी. यह नया सर्द, तीखा गुस्सा किस दिशा में जाएगा और कौन सी शक्ल अख्तियार करेगा? क्या यह उन्हें वह मुक्ति (आजादी) दिलाएगा, जिसकी उन्हें इतनी चाहत है और जिसके लिए उन्होंने एक पूरी पीढ़ी कुरबान कर दी है. या इसका अंजाम तबाही से भरी हुई हिंसा का एक और सिलसिले में, कुचल दिए जाने और फौजी बूटों द्वारा थोपी गई ‘सामान्य हालात’ वाली जिंदगी में होगा?
हममें से जो भी इलाके में रहते हैं, वे जानते हैं 2014 एक ऐतिहासिक साल होने जा रहा है. पाकिस्तान, भारत और जम्मू और कश्मीर में चुनाव होंगे. हम जानते हैं कि जब अमेरिका अफगानिस्तान से अपने फौजियों को निकाल लेगा तो पहले से ही गंभीर रूप से अस्थिर पाकिस्तान की अव्यवस्था कश्मीर तक फैल जाएगी, जैसा कि पहले हो चुका है. जिस तरह से अफजल को फांसी दी गई है, उससे भारत सरकार ने इस अस्थिरता की प्रक्रिया को बढ़ाने का फैसला किया है, असल में उसने इसकी दावत दी है. (जैसा कि इसने पहले भी, 1987 में कश्मीर चुनावों में धांधली करके किया था.) घाटी में लगातार तीन सालों तक चले जनांदोलन के 2010 में खत्म होने के बाद सरकार ने ‘सामान्य हालात’ का अपना वर्जन लागू करने की काफी कोशिश की है (खुशहाल सैलानी, वोट डाल रहे कश्मीरी). सवाल है कि क्यों यह अपनी ही कोशिशों को पलटना चाहती है? जिस तरह अफजल गुरु को फांसी दी गई, उसके कानूनी, नैतिक और उसके अमानवीय पहलुओं को परे कर दें और इसे एक महज राजनीतिक, कार्यनीतिक रूप में देखें तो यह एक खतरनाक और गैरजिम्मेदार काम है. लेकिन यह किया गया है. साफ साफ और जान बूझ कर. क्यों?
मैंने ‘गैरजिम्मेदार’ शब्द सोच-समझ कर ही इस्तेमाल किया है. पिछले कुछ समय में जो हुआ है, उस पर नजर डालते हैं. 
2001 में, संसद पर हमलों के हफ्ते भर के भीतर (अफजल गुरु की गिरफ्तारी के कुछ दिनों के बाद) सरकार ने पाकिस्तान से अपने राजदूत को बुला लिया और अपनी पांच लाख फौज सरहद पर भेज दी. ऐसा किस आधार पर किया गया? जनता को सिर्फ यही बताया गया कि दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की हिरासत में अफजल गुरु ने पाकिस्तान स्थित एक चरमपंथी समूह जैश-ए-मुहम्मद का सदस्य होना कबूल किया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे को कानून की नजर में अमान्य करार दिया. लेकिन कानून की नजर में जो अमान्य है वो क्या जंग में मान्य हो जाता है?
मामले के अपने अंतिम फैसले में, ‘सामूहिक अंतरात्मा की संतुष्टि’ वाले अब मशहूर हो गए बयान और किसी सबूत के न होने के अलावा, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि इसका ‘कोई सबूत नहीं था कि मोहम्मद अफजल गुरु का संबंध किसी आतंकवादी समूह या संगठन से है.’ तो फिर कौन सी बाद उस फौजी चढ़ाई, फौजियों के जान के उस नुकसान, जनता के पैसे को पानी के तरह बहाए जाने और परमाणु युद्ध के वास्तविक जोखिम को जायज ठहराती है? (विदेशी दूतावासों द्वारा यात्रा सुझाव जारी किया जाना और अपने कर्मचारियों को वापस बुलाया जाना याद है?) संसद हमले और अफजल गुरु की गिरफ्तारी के पहले क्या कोई खुफिया सूचना आई थी, जिसके बारे में हमें नहीं बताया गया? अगर ऐसा था, तो हमले को होने कैसे दिया गया? और अगर खुफिया सूचना सटीक थी, और इतनी सटीक थी कि उससे ऐसी खतरनाक फौजी तैनाती को जायज ठहराया जा सकता था, तो क्या भारत, पाकिस्तान और कश्मीर की जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वह क्या थी? अफजल गुरु का अपराध साबित करने के लिए वह सबूत अदालत में क्यों नहीं पेश किया गया?
संसद पर हमले के मामले की सारी अंतहीन बहसों में से इस मुद्दे पर, जो कि सबसे अहम मुद्दा है, वामपंथी, दक्षिणपंथी, हिंदुत्वपंथी, धर्मनिरपेक्षतावादी, राष्ट्रवादी, देशद्रोही, सनकी, आलोचक - सभी हल्कों में मुर्दा खामोशी है. क्यों?
हो सकता है कि हमले के पीछे जैश-ए-मुहम्मद का दिमाग हो. भारतीय मीडिया के जाने-माने ‘आतंकवाद’ विशेषज्ञ प्रवीण स्वामी ने, जिनके भारतीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों में ऐसे सूत्र हैं कि जलन होती है, हाल ही में एक पूर्व आईएसआई प्रमुख ले. जन. जावेद अशरफ काजी के 2003 के एक बयान का और एक पाकिस्तानी विद्वान मुहम्मद आमिर राणा की 2004 की एक किताब का हवाला दिया है, जिसमें संसद हमले में जैश-ए-मुहम्मद को जिम्मेदार ठहराया गया है. (एक ऐसे संगठन के मुखिया के बयान की सच्चाई पर यकीन करना दिल को छू गया, जिसका काम भारत को अस्थिर करना है.) लेकिन तब भी यह नहीं बताता कि 2001 में जब फौजी तैनाती हो रही थी, तो कौन से सबूत पास में थे.
चलिए बहस की खातिर मान लेते हैं कि जैश-ए-मुहम्मद ने हमला कराया था. हो सकता है कि आईएसआई भी इसमें शामिल हो. हमें यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान सरकार कश्मीर में छुपी हुई गतिविधियां करने से पाक-साफ है. (जैसे कि भारत सरकार बलूचिस्तान और पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में करता है. याद करें कि भारतीय सेना ने 1970 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी को और 1980 के दशक में लिट्टे सहित छह विभिन्न श्रीलंकाई तमिल चरमपंथी समूहों को प्रशिक्षण दिया था.)
यह एक गंदा नजारा है. पाकिस्तान से जंग से क्या हासिल होने वाला था और अभी इससे क्या हासिल होगा? (जानों के भारी नुकसान के अलावा. और हथियारों के कुछ डीलरों के बैंक खातों के फूलते जाने के अलावा.) भारतीय युद्धोन्मादी लगातार यह सुझाव देते हैं कि ‘समस्या को जड़ से खत्म करने’ का अकेला तरीका ‘सख्ती से पीछा करते हुए’ पाकिस्तान में स्थित ‘आतंकवादी शिविरों’ को ‘खत्म करना’ है. सचमुच? यह देखना दिलचस्प होगा कि हमारे टीवी के पर्दों पर दिखने वाले कितने आक्रामक रणनीतिक विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों के हित रक्षा और हथियार उद्योग में हैं. उन्हें तो युद्ध की जरूरत तक नही है. उन्हें एक युद्ध-जैसी स्थिति की जरूरत है, जिसमें फौजी खर्च का ग्राफ ऊपर चढ़ता रहे. सख्ती से पीछा करने का खयाल बेवकूफी भरा है और जितना लगता है उससे कहीं अधिक दयनीय है. वे किन पर बम गिराएंगे? कुछ व्यक्तियों पर? उनके बैरकों और भोजन की आपूर्ति पर? या उनकी विचारधारा पर? देखिए कि अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा ‘सख्ती से पीछा किया जाना’ किस अंजाम को पहुंचा है. और देखिए कि कैसे पांच लाख फौजियों का ‘सुरक्षा जाल’ कश्मीर की निहत्थी, नागरिक आबादी को काबू में नहीं कर पाया है. और भारत सरहद पार करके एक ऐसे देश पर बम गिराने जा रहा है जिसके पास परमाणु बम है और जो अव्यवस्था में धंसता जा रहा है. भारत में युद्ध चाहनेवाले पेशेवरों को पाकिस्तान के बिखराव को देख कर काफी तसल्ली मिलती है. जिसे भी इतिहास और भूगोल की थोड़ी बहुत, कामचलाऊ भी जानकारी होगी, वो जान सकता है कि पाकिस्तान का टूटना  (उन्मादी, नकारवादी, धार्मिक हिमायतियों के गैंगलैंड के रूप में बिखर जाना) किसी के लिए भी खुशी मनाने की वजह नहीं है.
अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी मौजूदगी और आतंक के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी मातहत के रूप में पाकिस्तान की भूमिका ने इस इलाके को सबसे ज्यादा खबरों में बने रहने वाला क्षेत्र बना दिया है. वहां जो खतरनाक चीजें हो रही हैं, कम से कम बाकी की दुनिया उनके बारे में जानती है. लेकिन उस खतरनाक तूफान के बारे में बहुत कम जाना-समझा जाता है और उससे भी कम पढ़ा जाता है, जो दुनिया की पसंदीदा नई महाशक्ति की दुनिया में तेजी अख्तियार कर रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर रूप से मुश्किलों में है. आर्थिक उदारीकरण ने नए-नए बने मध्य वर्ग में जो आक्रामक, लालची महत्वाकांक्षा पैदा की है वो तेजी से उतनी ही आक्रामक हताशा में बदल रही है. जिस हवाई जहाज में वे बैठे थे, वो उड़ान भरने के फौरन बाद बंद हो गया है. खुशी का दौरा आतंक में बदल रहा है.
आम चुनाव 2014 में होने वाले हैं. एक्जिट पोल के बिना भी मैं आपको बता सकती हूं कि नतीजे क्या रहेंगे. हालांकि हो सकता है कि यह खुली आंखों से न दिखे, हमारे पास एक बार फिर कांग्रेस-भाजपा गठबंधन होगा. (दोनों में से हरेक दल के दामन पर अल्पसंख्यक समुदायों के हजारों लोगों के जनसंहारों के दाग हैं.) सीपीआई (एम) बाहर से समर्थन देगी, हालांकि उससे यह मांगा नहीं जाएगा. ओह, और यह एक मजबूत राज्य होगा. (फांसी के मोर्चे पर, फंदे तैयार हैं. क्या अगली बारी पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के लिए फांसी का इंतजार कर रहे बलवंत सिंह रजोआना की होगी? उनकी फांसी पंजाब में खालिस्तानी भावनाओं को भड़का देगी और अकाली दल को फायदा पहुंचाएगी. यह कांग्रेसी राजनीति का वही पुराना तरीका है.)
लेकिन पुराने तरीके की वह राजनीति कुछ मुश्किलों में है. पिछले कुछ उथल-पुथल भरे महीनों में, केवल मुख्य राजनीतिक दलों की छवि को ही नहीं, बल्कि खुद राजनीति को, राजनीति के विचार को जैसा कि हम इसे जानते हैं, धक्का लगा है. फिर और फिर से, चाहे वो भ्रष्टाचार हो, कीमतों का बढ़ना हो या बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा हो, नया मध्य वर्ग बैरिकेडों पर है. उन पर पानी की बौछारें छोड़ी जा सकती हैं या लाठी चलाई जा सकती है, लेकिन गोली चला कर उनको हजारों की संख्या में मारा नहीं जा सकता, जिस तरह गरीबों को मारा जा सकता है, जिस तरह दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों, कश्मीरियों, नागाओं और मणिपुरियों को मारा जा सकता है - और मारा जाता रहा है. पुराने राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर पूरी तबाही नहीं लानी है, तो इस आक्रामकता को आगे बढ़ कर खत्म करना है, इसकी दिशा बदलनी है. वे जानते हैं कि राजनीति पहले जो हुआ करती थी, उसे वापस वही बनाने के लिए उनका मिल कर काम करना जरूरी है. तब एक सांप्रदायिक आग से बेहतर रास्ता क्या हो सकता है? (वरना और किस तरीके से एक धर्मनिरपेक्ष एक धर्मनिरपेक्ष बना रह सकता है और एक सांप्रदायिक एक सांप्रदायिक?) मुमकिन है कि एक छोटा सा युद्ध भी हो, ताकि हम फिर से नूराकुश्ती का खेल खेल सकें.
तब उस आजमाए हुए और भरोसेमंद पुराने राजनीतिक फुटबाल कश्मीर को उछालने से बेहतर समाधान और क्या हो सकता है? अफजल गुरु की फांसी, इसकी बेशर्मी और इसका वक्त, दोनों जानबूझ कर चुने गए हैं. इसने कश्मीर की सड़कों पर राजनीति और गुस्से को ला दिया है.
भारत इनको हमेशा की तरह क्रूर ताकत और जहरबुझी, मैकियावेलियाई चालबाजियों के साथ इसे काबू में कर लेने की उम्मीद करता है, जिन्हें लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने के लिए बनाया गया है. कश्मीर में युद्ध को दुनिया के सामने एक सबको समेटने वाले, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और उग्र इस्लामवादियों के बीच लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है. तब हमें इस तथ्य का क्या करना चाहिए कि कश्मीर के तथाकथित ग्रांड मुफ्ती (जो एक पूरा कठपुतली पद है) मुफ्ती बशीरुद्दीन असल में एक सरकार द्वारा नियुक्त मुफ्ती हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा नफरत से भरे हुए भाषण दिए और एक के बाद एक फतवे जारी किए और जो मौजूदा कश्मीर को एक डरावना, अखंड वहाबी समाज बनाने का इरादा रखते हैं? फेसबुक के बच्चे गिरफ्तार किए जा सकते हैं, लेकिन वे कभी नहीं. हम इस तथ्य का क्या करें कि जब सऊदी अरब (अमेरिका का मजबूत दोस्त) कश्मीरी मदरसों में पैसे झोंकता है तो भारत सरकार दूसरी तरफ देख रही होती है? सीआईए ने अफगानिस्तान में उन सारे वर्षों में जो किया, यह उससे अलग कैसे है? उन करतूतों ने ही ओसामा बिन लादेन, अल कायदा और तालिबान को जन्म दिया. उन करतूतों ने ही अफगानिस्तान और पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया. अब यह किस तरह के बुरे सपनों को जगाएगा?
समस्या यह है कि हो सकता है कि अब पुराने राजनीतिक फुटबॉल को काबू में करना पूरी तरह आसान नहीं रहे. और यह रेडियोएक्टिव भी है. हो सकता है कि यह महज एक इत्तेफाक न हो कि कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने ‘सामने आते परदृश्य’ से पैदा होने वाले खतरों के खिलाफ अपनी रक्षा की खातिर छोटी दूरी का जमीन से जमीन पर वार कर सकने वाले परमाणु मिसाइल का परीक्षण किया है. दो हफ्तों पहले, कश्मीर पुलिस ने परमाणु युद्ध में ‘बचाव की तरकीबें’ प्रकाशित की हैं. इसमें शौचालय-युक्त बमरोधी बेसमेंट बनाने के साथ साथ, जो इतना बड़ा हो कि पूरा परिवार इसके भीतर दो हफ्तों तक रह सके, कहा गया है: ‘एक परमाणु हमले के दौरान, गाड़ीचालकों को जल्दी ही पलट जाने वाली अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने से बचने के लिए उनसे निकल कर धमाके की तरफ छलांग लगानी चाहिए.’ और ‘उन्हें शुरुआती मतिभ्रम के लिए तैयार रहना चाहिए, जब धमाके की तरंगें गिरेंगी और अनेक महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताओं को हटा देंगी.’
मुमकिन है कि महत्वपूर्ण और जानी-पहचानी विशिष्टताएं पहले से ही गिर चुकी हों. शायद हम सबको अपनी जल्दी ही पलट जाने वाली गाड़ियों से कूद जाना चाहिए.

(अनुवादकीय नोट: नीचे से पांचवें पैराग्राफ की आखिरी पंक्ति में जहां ‘नूराकुश्ती’ का इस्तेमाल किया गया है, वहां अरुंधति ने Hawks & Doves का इस्तेमाल किया है. ये एक अंग्रेजी कॉमिक्स के अपराध से लड़ने वाले सुपरहीरो हैं. हालांकि इन दोनों का चरित्र अलग-अलग है, हॉक गरममिजाज और सख्त है तो डोव नरममिजाज है, लेकिन अपराध से दोनों मिल कर लड़ते हैं. यहां इनको क्रमश: भाजपा और कांग्रेस के साथ जोड़ कर दिखाया गया है. हिंदी में ऐसे पात्रों का अभी ध्यान नहीं आने की वजह से इसे 'नूराकुश्ती' में समेटने की कोशिश की गई है, फिर भी इसे इस टिप्पणी के साथ ही पढ़ा जाए.)

13 फ़रवरी 2013

उसने 'सत्‍यमेव जयते' कहा, और उसका परिवार बच गया!

अफज़ल गुरु को हुई फांसी के बाद अब तक उठी तमाम बहसों में उसके द्वारा अपने वकील सुशील कुमार को लिखी गई चिट्ठी का जि़क्र बार-बार आया है। यह चिट्ठी अब एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है, क्‍योंकि इसमें एक आत्‍मसमर्पित आतंकवादी समूची राज्‍य व्‍यवस्‍था पर कुछ सवाल खड़े करता है, उसके काम करने के तरीकों को उजागर करता है और आखिरकार यह स्‍वीकार करता है कि उसकी नियति दरअसल अपने परिवार को बचाने की उसकी सदिच्‍छा का परिणाम थी। यह चिट्ठी अक्‍टूबर 2006 में दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सार्वजनिक की गई थी जिसके आधार पर मैंने साप्‍ताहिक पत्रिका 'सहारा समय' के आखिरी अंक (8 अक्‍टूबर 2006) में एक स्‍टोरी भी की थी। अफज़ल के मामले पर खर्च किए गए लाखों शब्‍दों पर यह इकलौती चिट्ठी भारी पड़ती है। विडंबना यह है कि अक्‍टूबर 2006 से लेकर अब फांसी दिए जाने के बीच सात साल के दौरान हालांकि यह चिट्ठी मीडिया में तकरीबन दबी ही रही, आज भले इसकी चर्चा हो रही हो लेकिन उसका शायद कोई मोल नहीं है। साथ में उस वक्‍त की कुछ तस्‍वीरें भी हैं। (अभिषेक श्रीवास्‍तव)

[जनपथ से इंट्रो सहित साभार]
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माननीय श्री सुशील कुमार,
नमस्कार

मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं और अहसानमंद महसूस करता हूं कि आपने मेरे मुकदमे को अपने हाथ में लेकर मेरा बचाव करने का फैसला लिया। इस मुकदमे की शुरुआत से ही मेरी उपेक्षा की गई है और कभी भी मुझे मीडिया या न्यायालय के समक्ष सचाई उजागर करने का मौका नहीं दिया गया। तीन अर्जियों के बावजूद अदालत ने मुझे वकील मुहैया नहीं करवाया। उच्च न्यायालय में एक मानवाधिकार अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि अफज़ल की इच्छा फांसी से लटकने की बजाय नशीला इंजेक्शन लेने की है। यह बात सरासर गलत है। मैंने अपने वकील को कभी ऐसा कुछ नहीं बताया था। चूंकि वह वकील मेरे या मेरे परिवार का चुनाव नहीं था, बल्कि मेरी असहायता और एक उपयुक्त वकील तक पहुंच न हो पाने का नतीजा था। उच्च सुरक्षा वाली जेल में कैद किए जाने और उस मानवाधिकार अधिवक्ता से कोई संवाद न होने की स्थिति में मैं उसे बदल नहीं सका या उच्च न्यायालय के सामने अपनी मृत्यु इच्छा संबंधी आपत्तियों को दर्ज नहीं करा सका चूंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही यह बात मुझे पता चली।

संसद पर हमले वाले मामले में मुझे कश्मीर की स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया था। यहां दिल्ली में निर्धारित न्यायालय ने विशेष पुलिस के उस बयान के आधार पर मुझे फांसी की सजा सुनाई जो एसटीएफ के साथ मिलकर काम करती है और जिस पर मीडिया का खासा प्रभाव था जिसके समक्ष मुझे विशेष पुलिस एसीपी राजबीर सिंह के दबाव और खौफ के चलते अपराध कबूल करवाया गया। इस खौफ और दबाव की पुष्टि न्यायालय के समक्ष 'आज तक' के साक्षात्कर्ता शम्स ताहिर ने भी की।

जब मुझे श्रीनगर बस स्टैंड से गिरफ्तार किया गया तो मुझे एसटीएफ के मुख्यालय ले जाया गया। यहां से एसटीएफ और विशेष पुलिस मुझे दिल्ली ले आई। श्रीनगर के पारमपोरा पुलिस स्टेशन पर मुझसे मेरी सभी चीजें छीन ली गईं, मेरी पिटाई की गई और मुझे धमकी दी गई कि यदि मैंने किसी के भी सामने सचाई बयान की तो मेरी पत्नी और परिवार के लिए नतीजे बुरे होंगे। यहां तक कि मेरे छोटे भाई हिलाल अहमद गुरु को भी बगैर किसी वारंट इत्यादि के गिरफ्तार कर लिया गया और 2-3 महीनों तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यह बात सबसे पहले मुझे राजबीर सिंह ने बताई थी। विशेष पुलिस ने मुझसे कहा कि यदि मैं उनके मुताबिक बयान देता हूं तो मेरे परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह झूठा आश्वासन भी दिया कि वे मेरे मुकदमे को कमजोर कर देंगे जिससे कुछ दिनों बाद मैं रिहा हो जाऊंगा।

अफ़ज़ल का बेटा
मेरी प्राथमिकता मेरे परिवार को सुरक्षित रखने की थी क्योंकि पिछले सात साल से मैं देख रहा हूं कि किस तरह एसटीएफ के लोग कश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं, उन्होंने युवाओं को गायब किया है और उसके बाद पुलिस हिरासत में उन्हें मार डाला है। इन तमाम प्रताड़नाओं और हिरासत में मौतों का मैं एक जीता-जागता प्रत्यक्षदर्शी हूं और खुद एसटीएफ के खौफ और प्रताड़ना का शिकार हूं। चूंकि, मैं पहले जेकेएलएफ का आतंकवादी था और मैंने आत्मसमर्पण कर दिया था, मुझे विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों जैसे सेना, बीएसएफ और एसटीएफ ने मिलकर उत्पीड़ित, प्रताड़ित और खौफज़दा किया है। लेकिन, चूंकि एसटीएफ असंगठित बल है और राज्य सरकार द्वारा संरक्षित लुटेरों का एक गुट है, वे कश्मीर के किसी भी घर और किसी भी परिवार में किसी भी वक्त घुस जाते हैं। अगर एसटीएफ ने किसी को भी उठा लिया और उसके परिवार को इसकी जानकारी मिल जाती है, तो फिर परिजन सिर्फ लाश की ही उम्मीद रखते हैं और उसका इंतजार करते हैं। लेकिन अमूमन वे यह कभी नहीं जान पाते कि अपहृत व्यक्ति का ठिकाना क्या है। छह हजार जवान लड़के इस तरीके से गायब हो चुके हैं।

इन्हीं परिस्थितियों और भयपूर्ण वातावरण में मेरे जैसे लोग एसटीएफ के हाथों कोई भी गंदा खेल खेलने को तैयार हो जाते हैं जिससे कम से कम जान बची रहे। जो लोग पैसे खिलाने की क्षमता रखते हैं, उन्हें मेरी तरह बुरे काम करने को मजबूर नहीं किया जाता चूंकि मैं पैसे देने में अक्षम रहा था। यहां तक कि पारमपोरा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी अकबर ने तो मुझसे 5 हजार रुपए फिरौती की मांग की थी। यह बात संसद पर हमले से बहुत पहले की है। उसने मुझे धमकी दी थी कि फिरौती की रकम न मिलने पर वह मुझे नकली दवाएं और चिकित्सीय उपकरण बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लेगा। मैं 2000 में सोपोर में इनका व्यापार करता था। वह भी यहां निर्धारित न्यायालय के समक्ष पेश हुआ था और उसने मेरे खिलाफ बयान दिया था। संसद पर हमले से बहुत पहले से वह मुझे जानता था। अदालत के कक्ष में उसने मुझे कश्मीरी में बताया कि मेरा परिवार सही सलामत है। दरअसल, यह एक छुपी हुई धमकी थी जिसे अदालत समझ नहीं पाई थी, नहीं तो मैंने जरूर अदालत के समक्ष उससे सवाल पूछा होता जब उसने अपना बयान दर्ज कराते वक्त यह बात मुझे बताई थी। पूरे मुकदमे के दौरान मैं मूक और असहाय दर्शक बना रहा जबकि सभी गवाह, पुलिस और यहां तक कि जज भी मिलकर मेरे खिलाफ एक हो गए थे। मैं अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित और असमंजस में रहा। अब मैंने अपने परिवार को बचा लिया है, भले ही यह झूठ बोलने के लिए मुझे मौत दी जा रही है तो क्या!

1997-98 में मैंने दवाइयों और चिकित्सीय उपकरणों का एक व्यापार कमीशन के आधार पर चालू किया, चूंकि एक आत्मसमर्पित आतंकवादी होने के नाते मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। आत्मसमर्पित आतंकवादियों को नौकरियां नहीं मिलतीं। उन्हें या तो एसटीएफ के साथ विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के तौर पर काम करना होता है या सुरक्षा बलों और पुलिस के संरक्षण में लुटेरों की मंडली में शामिल होना होता है। रोज ही ये विशेष पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के हाथों मारे जाते थे। ऐसी स्थिति में मैंने अपना कमीशन आधारित व्यापार शुरू किया जिससे महीने में 4-5 हजार की कमाई हो जाती थी। चूंकि, एसपीओ अक्सर उन आत्मसमर्पित आतंकवादियों को प्रताड़ित करते हैं जो एसटीएफ के साथ काम नहीं करते, लिहाजा 1998 से 2000 के बीच मुझे अमूमन 300 से 500 रुपए स्थानीय एसपीओ को देने पड़ते जिससे मैं अपना काम-धंधा जारी रख सकता था। नहीं तो ये एसपीओ मुझे सुरक्षा एजेंसियों के सामने ले जाते। एक एसपीओ ने तो मुझे एक दिन बताया भी था कि उसे अपने अधिकारियों को पैसे देने पड़ते हैं। मैंने मेहनत से काम किया और मेरा व्यापार चमक गया। एक दिन सुबह 10 बजे मैं दो महीने पहले ही अपने नए खरीदे स्कूटर से जा रहा था। मुझे एसटीएफ के लोगों ने घेर लिया और एक बुलेटप्रूफ जिप्सी में पलहल्लन शिविर ले गए। वहां डीएसपी विनय गुप्ता ने मुझे प्रताड़ित किया, बिजली के झटके दिए, ठंडे पानी में डाला, पेट्रोल और मिर्च का इस्तेमाल भी किया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे पास हथियार हैं। शाम को उनके एक इंस्पेक्टर फारुक ने मुझे कहा कि यदि मैं उन्हें 10 लाख रुपए दे देता हूं तो मुझे छोड़ दिया जाएगा अन्यथा वे मुझे जान से मार देंगे। इसके बाद वे मुझे हमहामा एसटीएफ शिविर में ले गए जहां डीएसपी दरविंदर सिंह ने भी मुझे प्रताड़ित किया। उन्हीं के एक इंस्पेक्टर शैंटी सिंह ने नंगा करके मुझे तीन घंटों तक मुझे बिजली के झटके दिए और उसी दौरान जबर्दस्ती पानी भी पिलाया।

अफज़ल गुरु की पत्नी
आखिरकार मैं उन्हें दस लाख रुपए देने को तैयार हो गया जिसके लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के गहने बेचने पड़े। इसके बावजूद केवल 80 हजार का ही इंतजाम हो पाया। इसके बाद वे मेरा स्कूटर ले गए जो मैंने 2-3 महीने पहले ही 24 हजार रुपए में खरीदा था। एक लाख रुपए पाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा लेकिन अब मैं पूरी तरह टूट चुका था। उसी हमहामा एसटीएफ शिविर में तारिक नाम का एक और शिकार था उसने मुझे सलाह दी थी कि मैं हमेशा एसटीएफ का सहयोग करूं, नहीं तो वे मुझे प्रताड़ित करेंगे और सामान्य जिंदगी नहीं जीने देंगे। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक मोड़ था। मैंने वैसे ही जीने का फैसला कर लिया जैसे मुझे तारिक ने बताया था। 1990 से 1996 तक मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की थी और विभिन्न कोचिंग सेन्टरों और घरों पर जाकर ट्यूशन पढ़ाता था। यह जानकारी बड़गाम के एसएसपी अशफ़ाक हुसैन के साले अल्ताफ़ हुसैन को थी, चूंकि इसी ने मेरे परिवार और हमहामा के डीएसपी दरविंदर सिंह के बीच दलाल की भूमिका निभाई थी। अल्ताफ़ ने मुझे कहा कि मैं उसके दो बच्चों को पढ़ाऊं चूंकि आतंकवादियों के खौफ़ की वजह से वे ट्यूशन पढ़ने नहीं जा पाते। इनमें एक दसवीं में था, दूसरा बारहवीं में। इस तरह अल्ताफ से मेरी नजदीकियां बढ़ीं। एक दिन अल्ताफ मुझे डीएसपी दरविंदर सिंह के पास ले गया और बताया कि मुझे उनके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा।

काम यह था कि एक आदमी को दिल्ली ले जाना था और उसे वहां एक किराए का घर दिलवाना था, चूंकि मैं दिल्ली को बेहतर तरीके से जानता था। मैं उस व्यक्ति को नहीं जानता था, लेकिन मुझे संदेह था कि वह कश्मीरी नहीं है क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोलता था। लेकिन मैं असहाय था और मुझे दरविंदर का काम करना ही था। मैं उसे दिल्ली ले गया। एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है। मैं उसे करोलबाग लेकर गया। उसने कार खरीदी। दिल्ली में वह तमाम लोगों से मिलता था और हम दोनों को दरविंदर सिंह के फोन कॉल आते रहते थे। एक दिन मोहम्मद ने मुझे बताया कि अगर मैं कश्मीर जाना चाहूं तो जा सकता हूं। उसने मुझे पैंतीस हजार रुपए भी दिए और कहा कि यह मेरे लिए एक उपहार है।

छह या आठ दिन पहले मैंने इंदिरा विहार में अपने परिवार के लिए एक किराए का कमरा ले लिया था। चूंकि मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब दिल्ली में ही रहूंगा क्योंकि मैं अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं था। मैंने किराए के मकान की चाबियां अपनी मकान मालकिन को थमा दीं और उसे बताया कि मैं ईद के बाद 14 दिसंबर को लौटूंगा क्योंकि संसद पर हमले के बाद वहां काफी तनाव था। मैंने श्रीनगर में तारिक से संपर्क किया। शाम को उसने मुझसे पूछा कि मैं कब वापस आया। मैंने बताया कि मुझे आए हुए सिर्फ एक घंटा हुआ है। अगली सुबह जब मैं सोपोर जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था, श्रीनगर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और पारमपोरा पुलिस थाने ले गई। तारिक वहां एसटीएफ के साथ मौजूद था। उन्होंने मेरी जेब से 35000 रुपए निकाल लिए, मेरी पिटाई की और सीधे मुझे एसटीएफ मुख्यालय ले गए। वहां से मुझे दिल्ली लाया गया। मेरी आंखों को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। यहां मैंने खुद को विशेष पुलिस के उत्पीड़न कक्ष में पाया।

...और उसने अपना परिवार बचा लिया : अफज़ल के परिजन और अधिवक्ता एनडी पंचोली (सबसे दाएं)
 विशेष सेल की हिरासत में मैंने उन्हें मोहम्मद इत्यादि के बारे में सब कुछ बताया लेकिन उन्होंने मुझे बताया कि मैं, शौकत, उसकी पत्नी नवजोत (अफशां) और गिलानी ही संसद पर हमले के पीछे हैं। उन्होंने मेरे परिवार को लेकर मुझे धमकाया और उनमें से एक इंस्पेक्टर ने बताया कि मेरा छोटा भाई हिलाल अहमद गुरु भी एसटीएफ की हिरासत में हैं और यदि मैंने उनका सहयोग नहीं किया तो वे मेरे दूसरे परिजनों को भी उठवा लेंगे। इसके बाद उन्होंने मेरे ऊपर दबाव डाला कि मैं शौकत, उसकी पत्नी और गिलानी को दोषी ठहराऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें बताया कि यह असंभव है। फिर उन्होंने मुझे कहा कि मुझे गिलानी के निर्दोष होने के बारे में चुप रहना है। कुछ दिनों बाद मुझे मीडिया के सामने पेश किया गया। वहां एनडीटीवी, आज तक, जी न्यूज, सहारा टीवी आदि थे। एसीपी राजबीर सिंह भी वहां थे। जब एक साक्षात्कर्ता ने मुझे बताया कि संसद पर हमले में गिलानी की क्या भूमिका है, तो मैंने भी ऐसे ही कह दिया कि गिलानी निर्दोष हैं, ठीक इसी वक्त एसीपी राजबीर सिंह अपनी घूमती हुई कुर्सी से उठे, मेरे ऊपर चिल्लाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे पहले ही हिदायत दी गई थी कि मीडिया के सामने गिलानी के बारे में कुछ नहीं बोलना है। राजबीर के व्यवहार ने मेरी असहायता को प्रदर्शित कर दिया और कम से कम मीडिया के लोग यह जान गए कि अफजल जो भी बयान दे रहा है वह दबाव और खौफ में दे रहा है। इसके बाद राजबीर सिंह ने टीवी के लोगों से अनुरोध किया कि गिलानी वाला सवाल दिखाया न जाए।

शाम के वक्त राजबीर सिंह ने मुझसे पूछा कि क्या मैं परिवार से बात करना चाहता हूं। मैंने हां में जवाब दिया। फिर मैंने अपनी पत्नी से बात की। फोन करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि यदि मैं अपनी पत्नी और परिवार को जिंदा देखना चाहता हूं तो हर कदम पर उनका सहयोग करूं। वे मुझे दिल्ली में तमाम जगहों पर ले गए। वहां उन्होंने मुझे वे जगह दिखाईं जहां से मोहम्मद ने तमाम चीजें खरीदी थीं। वे मुझे कश्मीर ले गए और हम वहां से बगैर कुछ किए वापस आ गए। उन्होंने मुझसे कम से कम 200-300 कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए।

मुझे निर्धारित कोर्ट में अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं दिया गया। जज ने मुझे बताया कि मुकदमे के अंत में मुझे बोलने का पूरा मौका दिया जाएगा, लेकिन आखिरकार न तो उन्होंने मेरे बयानों को दर्ज किया और न ही अदालत ने दर्ज किए गए बयान मुझे मुहैया कराए। यदि ध्यान से रिकॉर्ड किए गए फोन नंबरों को देखा जाता तो अदालत यह जान जाती कि वे एसटीएफ के फोन नंबर थे।

अब मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मेरी असहाय स्थिति और उस सचाई को समझ सकेगा जिससे मैं गुजरा हूं। एसटीएफ ने अपने और कुछ अन्य अज्ञात लोगों द्वारा निर्मित और निर्देशित इस आपराधिक गतिविधि में मुझे बलि का बकरा बना दिया। इस पूरे खेल में विशेष पुलिस निश्चित तौर पर एक हिस्सा है चूंकि हर वक्त उन्होंने मेरे ऊपर चुप रहने का दबाव डाला। मुझे भरोसा है कि मेरी इस चुप्पी को सुना जाएगा और मुझे न्याय मिलेगा।

मैं एक बार फिर आपको दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरा बचाव किया।

सत्यमेव जयते।

मोहम्मद अफज़ल
पुत्र हबीबुल्ला गुरु
वार्ड न. 6 (उच्च सुरक्षा वार्ड)
जेल न. 1, तिहाड़
नई दिल्ली-110064


12 फ़रवरी 2013

‘हिन्दू फांसी’

 अनिल चमड़िया

13 दिसंबर 2001 को संसद भवन परिसर में हमले के आरोप में अफजल गुरू को फांसी की सजा को न्यायिक मापदंड और शर्तो की कसौटी पर देखें तो वह घटनाओं के सिलसिलेवार अध्ययन के बाद ‘राजनीतिक’ फैसला दिखता है. अफजल पहले पुलिस के लिए भी काम करता था. वह संसद भवन के परिसर में घुसे पांच हथियारबंदों के साथ नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने जब निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा को बहाल रखा तो सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं. उसे समाज की मनस्थिति को संतुष्ट करने के लिए फांसी की सजा को बहाल रखने पर जोर दिया. फांसी देने तक का घटनाक्रम भी ऐसा ही है. जैसे सबकुछ अचानक हुआ. उनके परिवार के सदस्यों तक को उसकी जानकारी नहीं दी गई. सरकार ने कहा कि कश्मीर घाटी के सोपोर में रहने वाले परिवार को स्पीड पोस्ट के जरिये ये सूचना भेजी गई थी कि फांसी की सजा को माफ किए जाने की उनकी अपील रद्द कर दी गई है. अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने के बाद उसके शव को वही दफना दिया गया. पिछले बीसेक वर्षों में पूरी दुनिया में ताकतवर और ताकतवर बनने की चाह पैदा करने वाले शासकों में आक्रमकता इस रूप में बढ़ी है कि मारो भी और दफना दो. यह आक्रमकता अपने फैसले में न्यूनतम मानव अधिकार की भी जगह को स्वीकार नहीं करती है. पूरी दुनिया में फांसी की सजा को खत्म करने के आंदोलन चल रहे हैं. इसका एक कारण तो यह है कि सत्ता का काम नागरिकों की सुरक्षा और उनके जीवन की बेहतरी के लिए होती है. दूसरा कारण यह भी है कि फांसी की सजा को पाने वाले समाज के कमजोर वर्गों के सदस्य ही होते हैं. भारत में तो इक्की दुक्की घटनाओं को छोड़ दें तो फांसी की सजा समाज की कमजोर वर्गों के सदस्यों को ही अब तक दी गई है और दूसरी तरफ फांसी की सजा से माफी पाने वाले लोग समाज के प्रभावशाली लोगों में रहे हैं. क्या अफजल गुरू को फांसी से माफी के सारे कानून सम्मत रास्ते बंद हो चुके थे? ऐसा नहीं है. दरअसल अफजल को फांसी देने का फैसला राजनीतिक स्तर पर लिया जा चुका था, लिहाजा माफी के लिए समय और सूचना से ही महरूम कर दिया गया.

 अफजल गुरू को फांसी तब दी गई जब कश्मीर के मकबूल भट्ट को 1984 में दी गई फांसी की बरसी अगले दिन थी. मकबूल भट्ट को फांसी की सजा के बाद कश्मीर घाटी में इस कदर की बेचैनी विकसित हुई कि आज तक वह वहां से नहीं उबर पाई. कश्मीर घाटी का संसदीय राजनीति की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है. यानी वहां के मतदाताओं का रूख, केन्द्र की सरकार के बनने-बिगड़ने में कोई महत्व नहीं रखता है. संसदीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण वह है जो सत्ता के बनने बिगड़ने में अपनी दखल रखता है. लेकिन कश्मीर घाटी देश के मतदाताओं के बीच ससंदीय राजनीति के लिए खुराक रहा है. वह साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी साम्प्रदायिकता का व्यवहारिक स्तर पर सबसे ज्यादा काम आता रहा है. पिछले साठ वर्षों में कश्मीर घाटी और वहां की बहुसंख्यक आबादी पर आधारित राजनीति का खासतौर से उत्तर भारत की संसदीय राजनीति में लगातार विस्तार हुआ है. अब तो कश्मीर घाटी और वहां की बहुसंख्यक आबादी की कीमत पर हर पार्टी संसदीय राजनीति में कश्मीर से बाहर के मतदाताओं को जीतने के लिए होड़ में खड़ी है. 

सभी छोटे राज्यों के प्रति लगभग ऐसा ही दृष्टिकोण है. इसे समझने के लिए केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम का अफजल को फांसी के दो दिन पहले इस बयान को भी देखा जा सकता है. उन्होंने बताया कि सुरक्षा बलों को दिए गए विशेषाधिकार के कानून को इसीलिए वापस नहीं लिया जा सकता है क्योंकि सेना उसके विरोध है. संसद के लिए चुनाव का चरित्र अब कुंभ जैसा हो गया है. 1989 में कांग्रेस की कमान जब राजीव गांधी के हाथों में थी तब उन्होंने हिन्दू संदेश के साथ अयोध्या से अपना चुनाव प्रचार जारी किया था. अब राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस आ गई है तब यह प्रचार कश्मीर से शुरू हो रहा है लेकिन वह भी हिन्दू संदेश के साथ और आक्रमकता की एक सत्ता शैली की साथ. पिछड़ों के लिए सरकारी नौकरियों में मंडल आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार आरक्षण के फैसले के बाद हिन्दूत्व की राजनीति में एक विभाजक रेखा के खीचे जाने का आकलन किया गया था लेकिन हिन्दूत्ववादी राजनीति ने पिछड़ों को उसमें समाहित करने का कार्यक्रम बनाकर संसदीय चुनाव की धूरी पर खुद खड़ा कर लिया है. गुजरात में विधानसभा की जीत के बाद हिन्दूत्ववादी राजनीति का नेतृत्व करने वाले संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके चुनावी संगठन भारतीय जनता पार्टी ने हिन्दूत्ववाद को संसद के चुनाव में एक बार फिर उतारने का मन बना लिया है. कांग्रेस में शुरू से ही हिन्दूत्ववादी राजनीति की तरफ झुकाव रखने वाला एक ताकतवर पक्ष रहा है. संघ और उसकी पार्टी भाजपा के मजबूत होने के साथ कांग्रेस के भीतर वह पक्ष भी लगातार और ताकतवर हुआ है. गुजरात में हारे जाने के बाद और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के अगले प्रधानमंत्री बनने की योजना के साथ ही कांग्रेस में राहुल गांधी के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह हिन्दूत्ववाद की प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं रह जाए. वैसे भी गैर भाजपा की पार्टियां शायद यह समझ रखती हैं कि मुस्लिम मतदाताओं के सामने उन्हें चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता है. हिन्दूओं के धार्मिक आयोजन कुंभ में भाजपा द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए समर्थन की मांग से कांग्रेस में बेचैनी और बढ़ी है. देखा जाए तो कांग्रेस ने हर स्तर पर भाजपा से खुद को कमजोर नही दिखने का पूरा प्रयास किया है. भ्रष्टाचार, महंगाई, घोटाले के मामलों में उसने खुद के कटघरे के साथ अपने बगल में भाजपा के लिए भी कटघरा बनाया तो आर्थिक नीतियों को लागू करने के स्तर पर कांग्रेस ने भाजपा को कमजोर साबित किया है.

हिन्दूत्ववाद एक ऐसा मसला है, जिसे कांग्रेस किसी दूसरी भाषा में संबोधित कर सकती है. उसे धर्म निरपेक्ष भी दिखने का प्रयास करना है. खुद को घर्मनिरपेक्षवादी कहने वाले विचार राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के जरिये साम्प्रदायिकता की राजनीति की जरूरत को साधते हैं. अफजल की फांसी को लेकर भाजपा अपने कार्यकर्ताओं में गति पैदा करती रही है. कांग्रेस का यह अनुमान है कि अफजल को फांसी देकर कश्मीर के बाहर फैले हिन्दू मतदाताओं को संबोधित किया जा सकता है. वास्तव में अफजल को हिन्दू फांसी हुई है. संसदीय चुनाव के लिए सेना और साम्प्रदायिकता के आगे राजनीतिक सत्ता के समर्पण ने देश को एक गहरे संकट में खड़ा कर दिया है. इस स्थिति में कानून और उसकी व्यवस्था नागरिकों के लिए नहीं रह जाती है. विरोध के सारे अवसर खत्म हो जाते हैं, जैसा कि अफजल गुरू की फांसी की सजा के बाद विरोध करने वालों के साथ सरकारी मशीनरी और साम्प्रदायिक संगठनों की संयुक्त कार्रवाई देखी गई हैं. बचपन में हम फिल्मों में देखा करते थे कि न्यायाधीश फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद अपने कलम की नीब को तोड़ देता था. अब सड़कों पर फांसी दिए जाने के बाद लोगों की शक्ल में राजनीति और विचारों को मिठाईयां बांटते और पटाखे छोड़ते हिन्दूत्ववादी खुशियां देखते हैं. 

लेखक देश के जाने-माने पत्रकार और शोध पत्रिका ‘जन मीडिया’ के संपादक हैं .साभार-रविवार.कॉम.

11 फ़रवरी 2013

नज़रबंदी का लेखा-जोखा

-इफ़्तिख़ार गिलानी
(अफ़जल गुरु को फ़ांसी दिए जाने के कुछेक घंटे बाद नामालूम वजहों से दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने अंग्रेज़ी दैनिक डीएनए के सहायक संपादक इफ़्तिख़ार गिलानी को मोहल्ले के भीतर नज़रबंद कर दिया। यही नहीं, उनके बच्चों को उनसे अलग दूसरे घर में बंद कर रखा गया। कुल पांच घटों के बाद गिलानी को छोड़ा गया। इफ़्तिख़ार ने ये पोस्ट मूलत: अंग्रेज़ी में लिखी है। हिंदी अनुवाद: दिलीप खान)

सुबह 10.30 बजे ऑफिस जाने के लिए मैं कार में बैग रख ही रहा था कि मैंने देखा दो लोग मेरे पास आए हैं। वे मुझसे गिलानी साहब के घर के बारे में जानना चाहते थे। मैंने ये सोचते हुए कि ये लोग किसी कूरियर एजेंसी से आए होंगे, पूछा कि आप लोग किस गिलानी साहब का पता पूछ रहे हैं? उन्होंने जवाब दिया कि इसी मोहल्ले में रहने वाले कश्मीरी नेता का पता। मैंने कहा कि वे दूसरे ब्लॉक में रहते हैं और ये कहते हुए उन्हें दिशा समझाने लगा। उनमें से एक ने मुझसे आग्रह किया कि मैं उनके साथ वहां तक चलूं। मैंने वैसा ही किया। रास्ते में उन्होंने मुझे बताया कि वो दिल्ली स्पेशल सेल से ताल्लुक रखते हैं। 
इफ़्तिखार गिलानी को पहले भी 2002 में ऑफिसियल सीक्रेट
एक्ट के तहत फ़र्जी तौर पर गिरफ़्तार किया गया था
जब हम खिरकी एक्सटेंशन के जेडी 18ई ब्लॉक पहुंचे तो मैंने देखा कि गली में सादे कपड़ों में कुछ लोग पहले से जमा हैं। मैंने पहले तल्ले की तरफ़ उंगली से इशारा किया और कहा कि जिस गिलानी साहब को वो खोज रहे हैं वो वहां रहते हैं। जैसे ही ये कहकर मैं चलने को हुआ, उन लोगों ने मुझे पकड़ लिया और कहा कि उन्हें बात करने के लिए बस कुछेक मिनट और चाहिए। इसके बाद तकरीबन घसीटते हुए मुझे पहले तल्ले पर ले जाया गया। उन लोगों ने मेरा पर्स, पहचान पत्र, चाबी वगैरह जब्त कर लिया। लेकिन, तब तक मेरा फोन उन लोगों के हत्थे नहीं चढ़ा था। फ्लैट पर पहुंचते ही मैंने देखा कि वहां पहले से और भी लोग मौजूद हैं। जैसे ही वो आपस में बातचीत करने में मशगूल हुए मैं बाथरूम चला गया और वहां से अपने दफ़्तर और कुछ दोस्तों को एसएमएस भेजने में कामयाब हुआ। जैसे ही मैं बाहर निकला, उन लोगों की निगाह फोन पर पड़ी और फिर उन लोगों ने उसे अपने कब्जे में कर लिया।  
15 मिनट बाद मैंने देखा कि सादे कपड़े पहने दो मर्द पुलिसवालों के साथ मेरी पत्नी भी वहां पहुंच रही हैं। घर पर मेरे बच्चे तन्हा थे। मैंने उनसे बार-बार जानना चाहा कि मुझे नज़रबंद करने का वो कारण बताएं। ऐसा पूछने पर हर बार वो काफी उखड़ जाते और मुझे गंभीर परिणाम की चेतावनी देते हुए धमकाने लगते। मैं ये भी जानना चाहता था कि अगर नज़रबंद ही करना था तो मुझे मेरे अपने घर की बजाय सैयद अली शाह गिलानी के घर पर क्यों किया गया, और मेरे बच्चों को हमसे दूर क्यों रखा गया? 
प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कंडेय काट्जू को पहले इफ़्तिख़ार
गिलानी ने चिट्ठी लिखी और बाद में काट्जू ने गृह सचिव को
चिट्ठी लिखकर पुलिस वालों को निलंबित करने की अपील की है।
[लगभग] पांच घंटे बाद बाहर मैंने कई आवाज़ें सुनीं। एक अधिकारीनुमा व्यक्ति भीतर आया और ज़ोर से कहा कि मैं आज़ाद हूं और अपने घर जा सकता हूं। बाजू की गली में मैंने हिंदुस्तान टाइम्स के औरंगजेब नक़शबद्नी (Aurangzeb Naqashbadni) और ब्यूरो प्रमुख सैकत दत्ता सहित दफ़्तर के कई लोगों को देखा। वे लोग गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस में अपने हर मुमकिन संपर्क का इस्तेमाल कर चुके थे। जब मैं घर पहुंचा तो देखा कि मेरे ड्राइंग और लिविंग रूम में 7-8 लोग मौजूद है। उन लोगों ने हमारे बच्चों को बेडरूम में बंद कर रखा था। 
हम लोगों के वहां पहुंचने के बाद एक-एक कर वो बाहर निकलने लगे। अगर मैं सिर्फ ये कहूं मेरे बच्चे दहशत में थे तो ये मामले के असर को कम करना होगा। उन्होंने (बच्चों ने) हमें बताया कि किस तरह हमारी ग़ैरमौजूदगी में वे लोग दरवाज़े को धड़ाम से मारते हुए उन्हें बेडरूम में कैद कर दिया। 
सार्वजनिक तौर पर मैं बार-बार कह चुका हूं कि अपने ससुर सैयद अली गिलानी की राजनीति से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। पिछले दो दशक से ज़्यादा समय से मैं दिल्ली में पत्रकारिता करते हुए जी रहा हूं। सुरक्षा एजेंसियों और ख़ासकर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के रवैये से मैं बुरी तरह खिन्न और व्याकुल हूं। मैं काफ़ी डरा हुआ महसूस कर रहा हूं। अपने बच्चों को शांति और करुणा के माहौल में पालने की मैं पूरी कोशिश करता हूं। मैं नहीं जानता कि एक शांतिप्रिय और क़ानून को मानने वाले व्यक्ति के तौर पर खुद को साबित करने के लिए मुझे क्या करना होगा। जैसा कि फ्रेडरिक डगलस ने कहा है कि एक राष्ट्र का जीवन तभी तक सुरक्षित है जब तक वह ईमानदार, सच्चा और भद्र हो। मैं इसमें जोड़ना चाहूंगा कि इससे बयानबाजी पर उतारू (आक्रामक) वर्ग को तात्कालिक लाभ तो मिलता दिखेगा लेकिन लंबे समय में दमन, उत्पीड़न और (नागरिकों के) अधिकारों को रौंदने से कोई राष्ट्र कमज़ोर और असुरक्षित ही होगा।