09 अगस्त 2009

फासीवाद हर बार हिटलर के नाम से नहीं आयेगा

समारोहों में सिरकत करने वाले प्रगतिशील लेखकों, क्या आप तक यह खब़र नहीं पहुंची? कि आदिवासियों की निर्मम हत्या करने वाली सरकार ने "चरणदास चोर "पर प्रतिबंध लगा दिया है. आपके समारोह में सरीक होने के परिणाम आने लगे हैं. क्या अब भी आप रमन सिंह के चरणों के दास बने रहेंगे और सरीक होने के पक्ष में तर्क देते रहेंगे?

सरकार
ने अपनी छवि के अनुकूल ही आचरण करते हुए १९७४ से खेले जा रहे हबीब तनवीर के अंतर्रष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नाटक 'चरण दास चोर' पर शनिवार ८ जुलाई से प्रतिबंध लगा दिया. मूलत: राजस्थानी लोककथा पर आधारित यह नाटक श्री विजयदान देथा ने लिखा था जिसका नाम था 'फ़ितरती चोर'. हबीब साहब ने इसे छ्त्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति, लोक नाट्य और संगीत परंपरा में ढालने के क्रम में मूल नाटक की पटकथा और अदायगी में काफ़ी परिवर्तन किये. 'चरनदास चोर' अनेक दृष्टियों से एक समकालीन क्लासिक है. एक अदना सा चोर गुरू को दिए चार वचन- कि सोने की थाली में वह खाना नहीं खाएगा, कि अपने सम्मान में हाथी पर बैठ कर जुलूस में नहीं निकलेगा, राजा नहीं बनेगा और किसी राजकुमारी से विवाह नहीं करेगा के अलावा गुरू द्वारा दिलाई गई एक और कसम कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, का पालन अंत तक करता है और इन्हीं वचनों को निभाने में उसकी जान चली जाती है. चरनदास को कानून और व्यवस्था को चकमा देने की सारी हिकमतें आती हैं. वह बड़े लोगों को चोरी का शिकार बनाता है. नाटक में चरनदास के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था, प्रभुवर्गों और समाज के शासकवर्गीय दोहरे मानदंडों का खेल खेल मे मज़े का भंडाफ़ोड़ किया गया है.
एक
चोर व्यवस्था के मुकाबले ज़्यादा इंसाफ़पसंद, ईमानदार और सच्चा निकलता है. ज़ाहिर है कि यह नाटक लोककथा पर आधारित है, छ्त्तीसगढ़ मे चल रहे संघर्षों पर नहीं. फ़िर सत्ता को इस नाटक से कैसा खतरा महसूस होने लगा? यह नाटक तो १९७४ में पहली बार खेला गया जब छत्तीसगढ़ राज्य के गठन तक की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती थीं. छ्त्तीसगढ़ के आज के तुमुल-संघर्षों की आहटें भी नहीं थीं. नाटक न जाने कितनी भाषाओं में अनुवाद कर खेला गया, देश और विदेश में खेला गया. १९७५ में श्याम बेनेगल ने इसपर फ़िल्म भी बनाई. दरअसल क्लासिक की खासियत यही है कि वह अपने ऊपरी कथ्य से कहीं ज़्यादा बड़ा अर्थ संप्रेषित करती है. अपने ऊपरी कथ्य, पात्र, देश-काल को लांघ कर बिलकुल भिन्न युग-परिवेश में प्रासंगिक हो उठती है. क्यों महाभारत के तमाम द्वंद्व अलग अलग युग-परिवेश में बारंबार प्रासंगिक हो उठते हैं? फ़िर 'चरनदास चोर' तो हबीब साहब के हाथों पूरी तरह छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में ही ढल गया. कहीं यह नाटक छ्त्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से से ही उस राजसत्ता के चरित्र को तो ध्वनित नहीं कर रहा, जो उस प्रदेश के सारे ही प्राकृतिक संसाधनों के कार्पोरेट लुटेरॊं के पक्ष में आदिवासी जनता के खिलाफ़ युद्ध छेड़े हुए है? कहीं यह नाटक दर्शकों और पाठकों के अवचेतन में दबे व्यवस्था विरोधी मूल्यों और आकांक्षाओं को वाणी तो नहीं दे रहा? कहीं यह नाटक अपनी क्लासिकीयता के चलते एक बिलकुल अप्रत्याशित तरीके से आज के छ्त्तीसगढ़ की सता और लोक के बीच जारी संग्राम की व्यंजना तो नहीं कर करने लगा? यह सारे ही सवाल इस प्रतिबंध के साथ उठने स्वाभाविक हैं.
वे
लोग भोले हैं जो छत्तीसगढ़ सरकार की इस दलील को मान बैठे हैं कि सतनामी गुरु बालदास की आपत्तियों के मद्देनज़र यह प्रतिबंध लगाया गया. बालदास जी की आपत्तियां अगर कुछ महत्व रखती हैं, तो उनपर 'नया थियेटर' के साथियों से बातचीत भी की जा सकती थी और आपत्तियों को दूर किया जा सकता था. संस्कृतिकर्मियों और सतनामी धर्मगुरुओं की पंचायत भी बैठ सकती थी, हल निकल सकता था. लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी. याद आता है कि किस तरह 'दलित अकादमी' नामक एक संस्था ने कुछ साल पहले प्रेमचंद की 'रंगभूमि' की प्रतियां जलाई थीं. बाद में बहुतेरे दलित लेखकों ने इसकी निंदा करते हुए इस बात का पर्दाफ़ाश किया कि यह सब संघ संप्रदाय द्वारा प्रायोजित था. धार्मिक और जातिगत अस्मिताओं का दमन और विद्वेष के लिए इस्तेमाल संघ-भाजपा की जानी पहचानी रणनीति है. खुद सरकार और बालदास के बयानों पर ध्यान दिया जाए तो सतनामी संप्रदाय ने इस नाटक पर २००४ से पहले कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं कराई थी, जबकि नाटक १९७४ से खेला जा रहा था और बहुधा इसके अभिनेता भी सतनामी संप्रदाय से आते थे. छत्तीसगढ़ सरकार ज़बरदस्त तरीके से दुरंगी चालें खेल रही है. एक ओर तो 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' के ज़रिए मुख्यमंत्री और संस्कृतिमंत्री के साथ तमाम जनवादी और प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों को बैठाया और दूसरी ओर महीना खत्म होते न होते 'चरनदास चोर' को प्रतिबंधित कर दिया. ज़ाहिर है कि बालदास जी की चिट्ठी ' प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान' से पहले की घटना है और प्रतिबंध का मन भी सरकार इस सम्मान समारोह से पहले ही बना चुकी थी. सम्मान समारोह का तात्कालिक उपयोग यह हुआ कि जिन हलकों से प्रतिबंध के विरोध की आवाज़ उठ सकती थी उन्हें इस आयोजन के ज़रिए 'डिफ़ेंसिव' पर डाल दिया गया. उन्हे सरकार ने इस स्थिति में ला छोड़ा है कि वे अगर इसका विरोध करें भी तो उस विरोध की कोई विश्वसनीयता लोगों की निगाह में न रह जाए.
हबीब
साहब के नाटकों पर संघ-भाजपा का हमला कोई नया नहीं है. अपने जीते जी उन्होंने इसका बहादुरी से सामना किया था. महावीर अग्रवाल को दिये एक साक्षात्कार में हबीब साहब ने कहा, " 'नया थियेटर' की दुसरी चुनौतियों में प्रमुख है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के खिलाफ़ कलात्मक संग्राम. आप जानते हैं फ़ासिज़्म का ही दूसरा नाम है 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'. नए छत्तीसगढ़ राज्य में २९ जून २००३ से २२ जुलाई २००३ तक 'पोंगवा पंडित' और 'जिन लहौर नई देख्या वो जन्मई नई' के २५ मंचन हुए........... नाटक का केवल विरोध ही नहीं हुआ, वरन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सोची समझी रणनीति के तहत हमले किए गए हैं. संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लाठी का प्रयोग संघ परिवार समय समय पर करता रहा है. .......हमले की शुरुआत १६ अगस्त २००३ को ग्वालियर में हुई. फ़िर १८ अगस्त को होशंगाबाद में, १९ अगस्त को सिवनी में, २० अगस्त को बालाघाट और २१ अगस्त को मंदला सहित अलग अलग शहरों में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और आर.एस.एस. के लोग उपद्रव करते रहे. २४ अगस्त २००३ को भोपाल के संस्कृतिकर्मियों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय के ठीक सामने 'पोंगवा पंडित' पर संवाद करने की कोशिश की. वहां हमारे पोस्टर्स, बैनर छीनकर आग के हवाले कर दिए गए. गाली गलौज के साथ ईंट पत्थर फेंकने का काम फ़ासीवादी ताकतों ने किया.... मैनें उन्हें बारंबार समझाने की कोशिश की कि 'पोंगवा पंडित' कोई नया नाटक नहीं है. नाटक बहुत पुराना है और पिछले ७०-७५ वर्षों से लगातार खेला जा रहा है. १९३० के आसपास छ्त्तीसगढ़ के दो ग्रामीण अभिनेताओं ने इसे सबसे पहले 'जमादारिन' के नाम से प्रस्तुत किया था." ( सापेक्ष-४७, पृष्ठ ३८-३९) क्या पता था हबीब साहब को कि उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद कोई अपनों में से ही गोरखपुर जाकर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के कसीदे पढ़ आएगा. 'छायानट' पत्रिका, अप्रैल,२००३ के अंक १०२ में मोनिका तनवीर ने महावीर अग्रवाल को दिए इंटरव्यू में कहा, "... १९७० में 'इंद्रलोक सभा' नाटक हमने तैयार किया तो जनसंघ के कुछ गुंडों ने हबीब पर हमला किया. और एक मुसलमान की पत्नी होने के कारण मुझे भी बहुत धमकाया गया." २६ सितम्बर, २००४ को 'दि हिंदू' को दिए एक इंटरव्यू में हबीब साहब ने एक और वाकया बयान किया है. कहा, " महज दो हफ़्ते पहले 'हरिभूमि' नामक रायपुर के एक दैनिक ने पूरे दो पन्ने 'बहादुर कलारिन' पर निकाले और मेरे खिलाफ़ तमाम तरह के आरोप लगाए. यह नाटक 'ईडिपल समस्या' पर आधारित एक लोक नाट्य है. हज़ारों छत्तीसगढ़ी नर=नारियों ने इसे दत्तचित्त होकर देखा, जबकि मुझे आशंका थी कि वे अगम्यागमन (इंसेस्ट) की थीम को ठीक समझेंगे कि नहीं. लेकिन भाजपा के दो सांसदों ने आपत्ति की कि मैनें यह थीम क्यों उठाई. ....मैनें कहा कि 'ईडिपल काम्पलेक्स हमारे लोक ग्यान का हिस्सा है'. .... वे बोले कि यदि ऎसा है भी, तो पूरी दुनिया में इसका ढिंढोरा पीटने की क्या ज़रुरत है? इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था."
दरअसल 'चरनदास चोर' पर प्रतिबंध को भाजपा सरकारों की 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादी' मुहिम का ही हिस्सा समझा जाना चाहिए, बहाना चाहे जो लिया गया हो. किसी भी लोकतंत्र में ऎसे फ़र्ज़ी आधारों पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने की इजाज़त नहीं दी जा सकती.
मैं व्यक्तिश: और अपने संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से सभी जनपक्षधर ताकतों से अपील करुंगा कि 'चरनदास चोर' पर प्रतिबंध पर चौतरफ़ा विरोध दर्ज़ कराएं। प्रणय कृष्ण

07 अगस्त 2009

इतिहास के द्वन्द अभी सलामत हैं, नामवर जी ........

आलोक श्रीवास्तव के द्वारा नामवर सिंह को लिखा गया एक खुला ख़त, जिसे ब्लाग पर पहले ही आ जाना था. कुछ व्यस्तताओं के कारण नहीं आ सका. उम्मीद है कि यह ख़त आज की चुनौतियों पर रोना रोने के बज़ाय एक नयी दिशा देगा.
"जीवन में सपना नही रहा, क्योंकि सोवियत संघ नहीं रहा..... ” नामवर जी, यह पुरानी बात हो गई। ” समाजवाद कैंप नहीं रहा एक ही महाशक्ति का वर्चस्व हैं........ ”
ये और इस तरह की तमाम बातें अनैतिहासिक हैं और अप्रमाणिक मन से जन्मी हैं. क्या जब नाज़ी कैंपों में, बंगाल के अकाल में और साम्राज्यवादी विश्व युध्द में 5 करोड़ से ज्यादा लोग जिबह कर दिए गए थे, सपना खत्म हो गया था? जब मध्ययुगीन बर्बरों ने दुनिया को अपने अश्वों की टापों से रौंद दिया था -- तब दुनिया के संज्ञान और मानव-नियति से साक्षात के उपक्रम खत्म हो गए थे?
नामवर जी, वे सपने कमज़ोर थे, जो समाजवाद कैंप पर टिके थे, क्या इतिहास में बारंबार ऐसे दौर नही़ आए जब सिर्फ पराजय क्षितिज तक दिखाती हो, सिर्फ़ धूसर हो गए स्वप्न दूर तक नज़र आते हों? माना कि यह युग कड़ा बहुत है -- पर इतिहास के व्दंव्द सलामत हैं और उपजाऊ हैं. सपनों की ज़मीन अभी भी ज़रखेज है. वैयक्तिक निराशा को इस प्रकार प्रचारित तो न करें. हिंदी की दुरिया वैसे भी अनुचरों की दुनिया हैं.
आज अधिक बड़े सपनों की और ज्यादा गहरे कर्मों की दरकार हैं. आप अपनी उम्र और अपने सपने जी चुके. नई पीढ़ी को यह सिखाएं कि उधार के सपने मत देखना -- हमारी तरह. अपनी जागृति में अपने स्वप्न गढ़ो और उन्हें मशाल की तरह आनें वालों को सौंपो. इस विश्व और जीवन को जानने और बदलने का संज्ञान अभी भी मौजूद हैं, समाजवादी कैंपों के टूटने से सपने नही मरे हैं, बक्लि यह बात रेखांकित हुईग् है कि सपनों के लिए जीना भी पड़ता है. वे सडी-गली व्यवस्थाए खत्म हुई थीं, जिन्हें समाजवाद या माक्र्सवाद नहीं खत्म हुआ था. तथाकथित समाजवादी कैंपों के धराशाई होने से यह बात रेखांकित हुई थी कि क्रांति की भावना, विचार और तंत्र किन्हीं देशों में गुमराह हो चुके थे.
सोवियत संघ के विघटन से न इतिहास खत्म हुआ न वर्ग युध्द --बक्लि वह और पैना, और उजागर हुआ है. उसने अब ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी हैं कि पूंजीवादी वैश्विक तंत्र के खिलाफ़ मानव-भविष्य की वैकल्पिक विचारधारा, चेतना और कर्म को स्थापित करने के लिए ज्यादा यथार्थवादी और वैज्ञानिक ढंग से काम किया जाए. ” सोवियत संघ का विघटन पूंजीवादी षडयंत्र था, सी आई ए की साजिश थी.............. ” इन कुतर्कों से इतिहास बहुत आगे निकल आया है. इस बात की संपूर्ण वैचारिकी अब मौजूद है कि सोवियत संघ क्या बन गया था? सोवियत संघ और चीन की बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की राजनीति और इतिहास विश्व सर्वहारा से विश्वासघात का इतिहास है. उस इतिहास को कलपने वाले शायद इतिहास को ठीक से जानने की जरूरत नही समझते. और यह ज़रूरत न समझना उनकी कमज़हनी से नहीं निहित स्वार्थें से जुड़ी बात है. साम्राज्यवाद बेशक आज बहुत मजबूत स्थिति में है, पर उसको मजबूती दी किसने? चीन विश्व राजनीति में तमाम प्रतिक्रियावादी देशों को अपना दुमछल्ला बना कर विश्व-सर्वहारा के साथ गद्दारी करता रहा और सोवियत संघ भारत सहित अनेक देशों के प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग के साथ तीसरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षो को पीछे घसीटता रहा. जिस समाजवादी कैंप की बात आप कह रहे हैं, उसके ठीक स्वरूप् केा समझने की ज़रूरत है, न कि उसका रोना रोने की, 1960 से 1990 तक के तथाकथित समाजवादी कैंप की राजनीति और विश्व सर्वहारा संघर्ष पर उसके प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन ही भारत जैसे देशों में और उसमें हिंदी पट्टी औ हिंदी पट्टी के साहित्य को वास्तव में जन का साहित्य बनाने की राह पर ले जाएगा. अन्यथा जनवाद और इसी पतनशील व्यवस्था में जम कर मलाई खाते रहे, वह कई और पीढ़ियों तक जारी रह सकता है.
दुनिया इनते पराभव इतनी इसहायता की स्थिति में नही पहुंची है. साम्राज्यवाद आज अपनी सैन्य-शक्ति में, पूंजी के फैलाव में, अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व में बेशक अतीत के किन्हीं भी युगांे से बहुत मजबूत है, पर याद रखें कि एक जगह वह बेहद कमजोर हुआ है, और आने वाले दशकों में और भी कमजोर होगा-- वह है पूंजी के रह रह कर दोहराने वाले संकट की रिपेयरिंग में --- अब ये संकट ग्लोबल होंगें, ज्यादा मारक होंगें, और समाजों में उथल-पुथल ला देंगें. दो-तीन दशक बाद यह पूंजीवाद के वश का नहीं रह जाएगा िकवह किन्हीं कीन्स और किन्हीं अन्य अर्थशास्त्रियों के सिध्दांतों के बलबूत इन संकटों से निपठ सके. दूसरी बात यह होने जा रही है कि अब ये संकट ज्यादा आवत्र्तिता के साथ होंगें, आने वाली पूरी सदी में माक्र्स --- जहां तक आर्थिक विश्लेषण की बात है क्लासिक ढंग से और कह लें कि पैगंबरी ढंग से सच प्रमाणित होने जा रहे हैं. लेकिन साम्राज्यवाद इन संकटों के आगे घुटने टेक देगा, इस खुशफ़हमी में न रहें, इन संकटों के निदान निरंतर युध्दों और विश्व-प्रभुत्व में ढूंढ़े जाएंगें. सभ्यता का संकट ठीक यहीं पर है. वह संकट यह है कि माक्वर्स जहां इतिहास की हर करवट के साथ आर्थिक रूप् से एक भविष्यवक्ता की तरह डेढ़ सौ साल बाद भी सही सिध्द होते जाएंगे सिध्द होंगे, और हुए हैं, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि निदान की जो रूपरेखा थी, वह उनके अपने युग के लिए थी. माक्र्स के समय में पूंजीवाद में मानव-आबादी की चेतना और संस्कृति में इतनी फेरबदल नहीं की थी, पर आज इक्कीसवीं सदी में यह फेरबदल बहुत बड़े पैमाने पर हो चुकी है, श्रमिक वर्ग की पूरी संरचना में भी बड़े पैमाने की फेरबदल कर दी गई है. तो वास्तविक चुनौती इस युग के लिए जनता के पक्ष में प्रतिरोध के निर्णायक स्वरूपांे का निर्माण है. इस कार्य की पहली मंजिल संस्कृति और चेतना का प्रबोध नही है, उस संस्कृति और चेतना का जिसे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद ने पिछले दो-तीन दशकों में तो बहुत तेजी से भष्ट और स्वप्नहिन बनाया है, नामवर जी हम हिंदी के किसी साहित्यिक अखाड़े की भाषा में नहीं इतिहास को जानने की इसी जन-नैजिकता के तकाजे से आपको यह बताना चाहते हैं कि आपके इस तरह के विचार इस स्वप्नहीनता के पक्ष में जात हैं -- बजाय उसका प्रतिरोध बनने के, और आप पिछले डेढ़ दशक से निरंतर, ठीक यही काम कर रहे हैं-- अपने तमाम व्याख्यानों आदि के जरिए. सोवियत संघ के टूटने के बाद भी हिंदी जगत का यह जीवंत सत्य है कि दिल्ली से लेकर आरा-पटना तक और राजेंद्र यादव से लेकर नवजात कविगण तक लोग आपकी कितनी भी भत्र्सना निजी या साहित्यिक कारणें या हताशाओं के चलते करते हों , फिर भी आपके उवाच आज भी हिंदी की दुनिया में व्यापक रूप् से प्रसारित होते हैं और उनका असर भी पड़ता है।
ठीक यही वजी है कि आपको यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि सोवियत संघ के परजीवी समाजवाद और सपनों का ज़माना खत्म हुए युग बीत चुका हैं. उस तथाकथित समाजवाद और उस समाजवादी सपने की कमाई खाने वाली और उससे अपनी दुकानें चलाने वाली प्रतिभओं के कुचक्रों ने हिंदी में वास्तविक माक्र्सवादी चेतना और स्वप्न को उठाना ही नहीं लेेने दी. यह राज्य समर्थित प्रतिरोध का बोदा साहित्य और विचारधारा थी, जो हिंदी में मठाधीशों व्दारा प्रत्यारोपित की गई थी. सोवियत संघ के तथाकथित समाजवादी कैंप व्दारा समर्थित भारत के माक्र्सवादी राजनीतिक दलों और भारत की बुर्जुआ राजसत्ता से उनके गठबंधन ने हिंदी साहित्य को क्षरित किया है. विभाजित व्यक्तित्व और विभजित मूल्यों वाले समाजचेता रचनाकर्मियों ने हिंदी साहित्य का जो हाल किया वह किसी बड़ी प्रतिभा को जन्म नहीं दे पाया. माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र को अपनी चेतना का अंग बना पाने का संघर्ष इसीलिए मुक्तिबोध का अकेले का संघर्ष बन कर रह गया, न कि इसलिए कि मुक्तिबोध कोई बिरली प्रतिभा थे, जो अपने अवसान के साथ हिंदी साहित्य के माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र की समस्त संभावनाएं और उसका समस्त भावी आत्मसंघर्ष भी लेते गए. स्वतंत्रता के बाद का और उसके आगे 1960 के बाद का तो अधिकांश हिंदी साहित्य व्यवस्था से पोषित लेखकों-आलोचकों का साहित्य रहा, न कि संघर्ष का साहित्य. यह संघर्ष का स्थूल अर्थ न लें वरना हिंदी लेखकों के पास मध्यवर्गीय जीवन और उसके लिए नौकरी के जुगाड़ वाले गर्दिश के दिनों की एक से एक कहानियां चिनी हुई होंगी. यहां संघर्ष से आशय माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र के लिए किए गए आत्मसंघर्ष और उसके जरिए व्यक्तित्व के रूपांतरण के लिए किए गए संघर्ष से है।
नामवर जी जिस चीज का स्यापा कर रहे हैं, वह कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक ज़रूर थी, पर वह किन्हीं मूल्यों, संघर्षों और वैचारिकता को सत्ता का गुलाम बनाने वाली थी. क्या आज सन 2008 में इस बात के दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य प्रमाणें की आवश्यकता है कि समाजवादी कैंप ने हिंदी साहित्य को किस तरह बधिया और अवसरवादी बना दिया? ऐसे मिथ्या स्वप्नों के लिए बिसूरने वालों के लिए नागार्जुन की यह पंक्ति ही अलम है--- ” भूल जाओ पुराने सपने ”
आलोक श्रीवास्तव -मुंबईफोन- 09320016684

05 अगस्त 2009

गोरखालैंड तो बन चुका है

कृपाशंकर चौबे
लंबे समय से चल रही अलग गोरखालैंड राज्य की लड़ाई एक संवैधानिक संकट के मोड़ पर पहुंच गई है। दरअसल व्यवहार में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने अलग गोरखालैंड राज्य हासिल कर लिया है।पूरे दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दुकानों के साइनबोर्ड में पश्चिम बंगाल का नाम मिटाकर गोरखालैंड कर दिया गया है तो गाड़ियों के नंबर प्लेट में भी डब्लू बी (वेस्ट बेंगाल) की जगह जीएल (गोरखालैंड) लिखवा दिया गया है। और तो और, जीजेएम ने पूरे पहाड़ में गोरखालैंड की अपनी सुरक्षा व्यवस्था लागू कर रखी है। पहाड़ में पश्चिम बंगाल पुलिस को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। जगह-जगह गोरखा जनमुक्ति के साढ़े दस हजार सशस्त्र जवान तैनात हैं। इन्हें जीएलपी यानी गोरखालैंड पर्सनल कहा जाता है। वैसे ये काम पुलिस का करते हैं इसलिए जीएलपी को पहाड़वासी पुलिस ही कहते हैं। जीएलपी के इन लाठीधारी जवानों ने सेना के पूर्व कर्नल रमेश दीक्षित से प्रशिक्षण हासिल किया है। जीजेएम ने अपना अलग प्रशिक्षण शिविर बना रखा है और उसके अध्यक्ष विमल गुरुंग ने कहा है कि जीएलपी जवानों की संख्या बढ़ाई जाएगी। गुरुंग ने जीएलपी के लिए प्रशिक्षण देकर कुल पचीस हजार जवानों को तैयार करने का ऐलान किया है। पहाड़ में जीएलपी के जवानों, पहाड़ की दुकानों और गाड़ियों को देखकर लगता है कि गोरखालैंड तो व्यवहार में बन ही गया है।
व्यवहार में गोरखालैंड हासिल हो जाने के बाद अब उसे संवैधानिक स्वीकृति दिलाने के लिए जीजेएम ने पहाड़ में बीते तेरह जुलाई से हड़ताल कर रखी है। इस हड़ताल को टलवाने के लिए केंद्र सरकार ने अगले महीने अगस्त में तितरफा बैठक बुलाई है। उस प्रस्तावित बैठक की घोषणा किए जाने के बावजूद जीजेएम ने हड़ताल जारी रखने का ऐलान किया है और संकेत दिया है कि इस बार उनकी हड़ताल डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय तक चल सकती है। दरअसल पहाड़ में अब गुरुंग की ही चलती है। वे ही आजकल दार्जिंलिंग के एकछत्र सम्राट हैं। पहाड़ पर दो दशकों से ज्यादा समय तक एक छत्र राज करनेवाले गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (जीएनएलएफ) के अध्यक्ष सुभाष घीसिंग भी गुरुंग की लोकप्रियता के आगे बौने पड़ गए हैं। उनका खुद का दार्जिलिंग में प्रवेश करना मुहाल हो गया है। उन्हें पहाड़ से निर्वासित होना पड़ा है। घीसिंग को पहाड़ के केंद्र से परिधि में फेंकने के बाद गुरुंग अब घीसिंग द्वारा सबसे लंबे समय तक की गई हड़ताल के रेकार्ड को भी इस बार तोड़ देना चाहते हैं। घीसिंग ने अपने आंदोलन के उत्कर्ष के जमाने में 45 दिनों तक लगातार हड़ताल की थी। गुरुंग उससे ज्यादा दिनों तक हड़ताल करने को आमादा हैं। गुरुंग की सलाह पर पहाड़वासियों ने जब दो महीने का राशन अपने यहां रख लिया, उसके बाद ही हड़ताल आरंभ की गई। इसके अलावा ऐहतियात के तौर पर जीजेएम ने खाद्यान्न के तीन गोदाम भरकर रखवा लिए हैं। पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न रखे जाने से भले हड़ताल के दौरान पहाड़वासियों को भोजन की असुविधा न हो पर जीजेएम का सारा आंदोलन एक गंभीर खतरे की तरफ इशारा करता है। हड़ताल के कारण जिस तरह पहाड़ को बाकी देश से काट दिया गया है, उसे किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जीएलपी के जवान जिस तरह पहाड़ में कानून-व्यवस्था को संभाले हुए हैं और विभिन्न सामाजार्थिक विकासमूलक योजनाओं के क्रियान्वयन, पर्यटकों की सहायता, यहां तक कि महाकाल मंदिर की सुरक्षा संभाल रहे हैं, उसके बाद स्वतंत्र गोरखालैंड राज्य को हासिल करने के लिए बाकी क्या बचा है? तब क्या बुद्धदेव सरकार ने व्यवहार में अलग गोरखालैंड की मांग को स्वीकार कर लिया है ?तथ्य यह है कि आज पूरे दार्जिलिंग में बुद्धदेव सरकार के प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। बुद्धदेव सरकार की प्रशासनिक मशीनरी पहाड़ में क्यों फेल हो गई? देश-विदेश से आए पर्यटकों-छात्र-छात्राओं की सुरक्षा बंगाल पुलिस के बजाय जीएलपी पर क्यों निर्भर है? पुलिस के आईजी तक पहाड़ में क्यों नहीं प्रवेश कर पा रहे हैं? तथ्य यह भी है कि जीजेएम के हड़ताली अलग राज्य की मांग के अलावा आईजी व दो अन्य आईपीएस अधिकारियों को हटाने की मांग भी कर रहे हैं। सुभाष घीसिंग ने जब अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था तो राज्य प्रशासन मुखर था और तब राज्य प्रशासन ने पहाड़ के जन-जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए थे। लेकिन आज क्या इस तरह के आंदोलनकारियों के आगे समर्पण कर देना ही बुद्धदेव सरकार की नीति है? कहना न होगा कि यह कापुरुष सरकार की निशानी है और उसकी अयोग्यता का प्रमाण भी।
दार्जिलिंग में तो बंगाल पुलिस कानून-व्यवस्था की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के लिए भी सक्रिय नहीं होती जबकि जहां जरूरत नहीं होती, वहां अति सक्रिय हो उठती है। पुलिस विभाग चूंकि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के पास है, इसलिए पुलिस की किसी भूमिका की जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। नंदीग्राम में बंगाल पुलिस ने नाहक अति सक्रिय होकर ही गोली चलाई थी और दोषी पुलिसवालों पर आज तक कोई कार्रवाई बुद्धदेव ने नहीं की। अदालत के आदेश के बावजूद आज तक नंदीग्राम गोलीकांड के हताहतों व क्षतिग्रस्त लोगों को मुआवजा नहीं दिया गया। नंदीग्राम से सटे खेजुरी में माकपा नेताओं के यहां से बरामद हथियारों के जखीरे के बारे में पुलिस मंत्री के नाते बुद्धदेव ने यह पता लगाने का जहमत नहीं उठाया कि उतने हथियार आए कहां से? जिनके यहां से हथियार बरामद हुए, इन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लालगढ़ में बंगाल पुलिस ने रात में तलाशी के नाम पर आदिवासी महिलाओं के साथ जो ज्यादती की, उसकी जिम्मेदारी मंत्री के नाते लेने से बुद्धदेव इंकार कर सकते हैं? कहना न होगा कि बुद्धदेव की इन्हीं प्रशासनिक विफलताओं के कारण आज दार्जिलिंग मुक्तांचल बना हुआ है। इसके बाद अब दुआर्स की बारी है। दार्जिलिंग की तर्ज पर उत्तर बंगाल में ग्रेटर कूचबिहार व अलग कामतापुर आंदोलन की मांग कब जोर पकड़ लेगी, नहीं कहा जा सकता। लोकमत से साभार

03 अगस्त 2009

यह सांस्कृतिक सलवा-जुडूम है

आशुतोष कुमार
अशोक वाजपेयी ने लिखा है ('कभी-कभार' 19 जुलाई, 2009, 'जनसत्ता') कि कुछ लेखकों ने 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह' का बहिष्कार इसलिए किया कि छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों का 'जनसंहार' कर रही है।

यह एक झूठ है. सीधा-सादा सिद्ध झूठ।
बहिष्कार करनेवालों में एक थे पंकज चतुर्वेदी. विश्वरंजन के नाम उनका खुला पत्र 'अनुनाद' ब्लॉग पर समारोह के पहले ही प्रकाशित हो चुका था. सुना है, उसकी मुद्रित प्रतियाँ वहाँ बाँटी भी गयी थीं. उसमें कहा गया है कि समारोह के आयोजक विश्वरंजन ने मंगलेश डबराल द्वारा संपादित पत्रिका 'पब्लिक एजेंडा' के तभी प्रकाशित अंक में 'सलवा जुडूम' का खुलकर समर्थन किया है. 'सलवा-जुडूम' के आलोचकों को नक्सलियों का सहयोगी बताकर उनके खिलाफ़ हर तरह की लड़ाई लड़ने का संकल्प दोहराया है. विश्वरंजन छत्तीसगढ़ के डीजीपी और एक कवि भी हैं. 'सलवा-जुडूम' के क्रियान्वयन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका स्वाभाविक है. ख़ास बात यह है कि वे इसके सिद्धांतकार भी हैं. वे इसके पक्ष में पत्र-पत्रिकाओं में विस्तार से लिखते रहे हैं. लम्बे-लम्बे साक्षात्कार देते रहे हैं. 'दैनिक छत्तीसगढ़' में उनका एक साक्षात्कार सात खंडों में प्रकाशित हुआ था. वे महज़ पुलिस-अफ़सर नहीं, पुलिस-चिन्तक हैं.

क्या 'सलवा-जुडूम' की आलोचना करना नक्सली होना या उनकी हिमायत करना है ?

अप्रैल, 2008 में 'सलवा-जुडूम ' के सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ की सरकार से सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था: 'यह सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का सवाल है। आप किसी भी नागरिक को हथियार थमाकर यह नहीं कह सकते कि जाओ, हत्याएँ करो! आप 'भारतीय दंड संहिता' की धारा 302 के तहत अपराध के उत्प्रेरक ठहराये जायेंगे.' विश्वरंजन के मुताबिक़ 'सलवा-जुडूम' के आलोचक वे नक्सली हैं, जिन्होंने तमाम मानवाधिकार संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और जनतांत्रिक आन्दोलनों में घुसपैठ कर ली है. या नक्सली नहीं भी हैं, तो उन्हें 'लोजिस्टिक सपोर्ट' देनेवाले हैं. संगी-साथी हैं. जैसे बिनायक सेन. क्या सर्वोच्च न्यायालय में भी नक्सलियों ने घुसपैठ कर ली है? तो उसके खिलाफ़ विश्वरंजन कौन-सी लड़ाई छेड़नेवाले हैं? दिसम्बर, 2008 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने छत्तीसगढ़ सरकार ने क़बूल किया कि 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (एसपीओज़) ने आदिवासियों के घरों में आग लगाई है, लूटपाट भी की है. कुछ के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई भी हुई है.' लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक लोकतांत्रिक राज्य को 'सलवा-जुडूम 'जैसा अभियान चलाने का हक़ दिया जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय की राय है कि नहीं. हमारी-आपकी?

'तहलका' (अँग्रेज़ी) के ताज़ा अंक में उन आदिवासी युवतियों के विस्तृत बयान छपे हैं, जिनके साथ 'ख़ास पुलिस अफसरों'(एसपीओज़) ने आम पुलिस की मदद से नृशंस बलात्कार किये हैं. वे महिलाएँ 'सलवा-जुडूम' के कैम्पों में ही थीं, किसी 'नक्सली' गाँव में नहीं! छत्तीसगढ़ पुलिस तो उनकी मदद क्या करेगी, 'राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग' की जाँच टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि ये झूठे आरोप हैं. यहाँ दिलचस्प बात यह है कि उस 'जाँच टीम' के सभी सदस्य पुलिस अधिकारियों में-से चुने गये थे. 'सलवा-जुडूम' क्या है?
countercurrents.org पर "विश्वरंजन के नाम एक आम नागरिक का खुला ख़त" प्रकाशित है. लेखक हैं-----अनूप साहा. इस ख़त से 'सलवा-जुडूम' को समझना आसान हो जाता है.
'स्ट्रेटेजिक हैमलेटिंग' (इसकी हिन्दी सुझायें, अशोक जी!) का प्रयोग अमेरिकी सेना ने विएतनाम में किया था। इसकी तीन ख़ास बातें हैं. आबादियों की ऐसी घेराबंदी की जाये कि उन्हें जीवन-निर्वाह के सभी साधनों के लिए घेरा डालनेवाली फ़ौज पर निर्भर हो जाना पड़े. अगर यह मुमकिन न हो, तो उन्हें गाँवों से हटाकर विशेष कैम्पों में स्थानांतरित कर दिया जाये. इन कैम्पों की निगरानी करने और उनमें रहनेवालों को नियंत्रित करने के लिए उन्हीं में-से 'सहयोगी' तत्त्वों को चुनकर उन्हें हरबा-हथियार, रुपये-पैसे के साथ फ़ौजी ट्रेनिंग मुहैया करायी जाये. दुश्मनों के साथ लड़ाई में उन्हें अग्रिम दस्ते की तरह इस्तेमाल किया जाये. बदले में उन्हें मनमानी करने की छूट दी जाये. इसके दो अहम फ़ायदे हैं. एक, इन 'ख़ास पुलिस अधिकारियों'(एसपीओज़) से वह सब कुछ कराया जा सकता है, जिसे करने में संविधान के तहत काम करनेवाली पुलिस हिचकती है. दूसरे, इसे स्थानीय आबादियों की आपसी लड़ाई के रूप में दिखाया जा सकता है, जिससे सरकार का दमनकारी चेहरा दिखायी न पड़े. 'सलवा-जुडूम' के विषय में किये गये सभी स्वतन्त्र अध्ययनों में उसकी ये तमाम विशेषताएँ उजागर होती हैं. स्थानीय लोगों को आतंकित और अपमानित करने की सबसे आसान तरकीब है-----महिलाओं का अपमान और उत्पीड़न. सीएवीओडब्ल्यू (C.A.V.O.W. ) ने 'सलवा-जुडूम' से सम्बन्धित अपनी 2007 की एक रपट में इसका ब्योरा दिया है. 'फ़ोरम फॉर फैक्ट फाइंडिंग डॉक्युमेंटेशन एंड एडवोकेसी' ने अपने अध्ययन में पाया है कि केवल दंतेवाड़ा के दक्षिणी ज़िले में 'सलवा-जुडूम' ने बारह हज़ार नाबालिग़ बच्चों का इस्तेमाल किया है. 'एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स' की रपट भी इसकी पुष्टि करती है. 'विकीपीडिया' पर यह सारी जानकारी सुलभ है. 'सलवा-जुडूम' के चलते दहशत में जीनेवाले आदिवासियों की आबादी कम-से-कम डेढ़ लाख है.

छत्तीसगढ़ के जंगल और ज़मीन क़ीमती हैं। वहाँ अपार खनिज संपदा है. उन पर बलशाली कम्पनियों की नज़र है. छत्तीसगढ़ सरकार ने सन 2000 से अब तक तिरेपन समझदारी पत्रों (एमओयू ) पर दस्तख़त किये हैं. 23,774 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. बिड़ला ग्रुप, टाटा ग्रुप, गुजरात अम्बुजा सीमेंट, एसीस, लाफार्ज, एस्सार, बाल्को, वेदान्त-----अनगिनत कंपनियाँ हैं, जिन्हें वहाँ लाखों एकड़ मुक्त ज़मीन चाहिए. आदिवासी इन्हीं ज़मीनों को बचाने के लिए लड़ते हैं. उनके खिलाफ़ सरकारी मशीनरी साम-दाम-दंड-भेद की पूरी ताक़त से टूट पड़ती है. अब वे क्या करें कि ऐसे में उनके साथ खड़े होने के लिए केवल नक्सली पहुँचते हैं. राज्य की विराट हिंसा के सामने आत्म-रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़े, इसे गाँधीजी तक ने अनुचित नहीं ठहराया है. लेकिन उत्तेजक, अराजक और आक्रामक हिंसात्मक कार्रवाइयां जन-आन्दोलनों को व्यापक जनता से अलगाव में डालती हैं. न सुधारी जा सकने लायक़ ग़लतियों, विकृतियों और बन्धुघाती हिंसा की संभावना बढ़ जाती है. इससे संघर्ष की असली ज़मीन छूट जाती है. दमन और उत्पीड़न आसान हो जाता है. आम आबादी की दो पाटों के बीच पिस जाने की-सी हालत हो जाती है. नक्सलियों की ओर से की गयी अराजक हिंसा निन्दनीय है. लेकिन राज्य द्वारा की जा रही हिंसा अलग है. लोकतंत्र में राज्य की मशीनरी आम आदमी के खून-पसीने से चलती है. 'सलवा-जुडूम' के बलात्कारी 'ख़ास पुलिस अफ़सरों' (सपीओज़) को पालने-पोसने में जो धन ख़र्च हो रहा है, उसमें मेरे-आपके खून-पसीने की कमाई शामिल है. इसमें हमारी-आपकी सीधी ज़िम्मेदारी बनती है. ऐसा नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा के साथ नहीं है .

सरकार भी नक्सलियों का नहीं, आदिवासियों का जनसंहार कर रही है। अशोक जी के अवचेतन में भी कहीं यही बात रही होगी, इसीलिए वे नक्सलियों का 'जनसंहार ' लिख गये। नहीं तो सभी जानते हैं कि इतनी जनसंख्या उनकी नहीं है कि 'जनसंहार' जैसे शब्द का प्रयोग संगत जान पड़े। इस प्रसंग में मूल प्रश्न यह है कि क्या विश्वरंजन जैसे 'सलवा-जुडूम' के सिद्धांतकार केवल शौक़-शौक़ में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन कर रहे हैं? 'दैनिक छत्तीसगढ़ 'में छपे उनके एक लम्बे लेख में बड़ी मशक्कत से जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी है कि नक्सली एक रणनीति के तहत छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के बीच घुसपैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नक्सलियों की इस रणनीति से निपटना विश्वरंजन को सबसे बड़ी चुनौती जान पड़ती है. सुना है कि वे फ़िराक़ के नाती हैं. ख़ुद कवि हैं. निराला को पढ़ा ही होगा. "आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर. " घुसपैठ का दृढ़ घुसपैठ से दो उत्तर! अब जब हिन्दी के बड़े कवि-लेखक उनके समारोहों में उनकी जय-जयकार करेंगे, सम्मानित होंगे, विरोधियों को नक्सली बताकर लांछित करने में उनके सुर-में-सुर मिलायेंगे, तो उन्हें अपनी रणनीति की कामयाबी पर गर्व क्यों न होगा!

यह 'सांस्कृतिक सलवा-जुडूम' है. 'स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग'. विरोधियों को अलग-थलग करो. उनकी सप्लाई-लाइन काट दो. सहयोगियों की घेराबंदी सम्मानों और सुविधाओं से करो. जनता से अलगाव में डालो. गोरखपुर के योगी को भी सम्मानित करने के लिए उदय प्रकाश ही क्यों मिले? उन्हें हिन्दी के तरुण विजयों की याद क्यों न आयी? यह भूल-चूक-लेनी-देनी है ? या "सांस्कृतिक स्ट्रैटेजिक हैमलेटिंग"?

('जनसत्ता', दिल्ली, 2 अगस्त, 2009 से साभार)



02 अगस्त 2009

हरियाणा: दलित उत्पीड़न का क्रूर चेहरा॥

सदी के चेहरे पर क्रूर प्रताड़ना का लेप इतना गहरा है और उसके रंग इतने ज्यादा कि प्रिज़्म के रंगों में उन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. क्रूरता और अपमान ने कभी अपने चेहरे को एक आकार में नहीं ढाला. वह जब भी बुना गया उसके रूप बदले हुए दिखे. शब्दों के प्रतिरोध के मायने इतने कम होते गये कि बडे निहितार्थों वाले शब्दों को दीमक की जुबान चाट गयी. एक पूरा का पूरा तंत्र समानता, समता का ढोंग करता रहा और उत्पीड़न पूर्ववत जारी रहे. समानता और समता को तंत्र के मूल में रखकर एक मोटी पोथी तैयार हुई जो आज थोथी दिख रही है.
पूरे देश में दलित उत्पीड़न की अनगिनत घटनायें घटती हैं पर कितनी कम घटनायें हैं जिनकी ख़्बर हम तक पहुंच पाती है. पिछले कुछ वर्षों में हरियाना राज्य में दलितों पर हुए अत्याचारों को देखें तो पता चलता है कि मानवाधिकारों का कितने बेखौफ तरीके से मज़ाक उडाया गया है. राज्य में २० प्रतिशत जनसंख्या दलितों की है. पूरी राज्य मशीनरी पर अधिकांशतः सवर्णों का कब्जा है.यह कब्जेदारी महज़ नौकरियों और पदों तक ही सीमित नहीं रहते बल्कि देखा जाय तो एक सांस्कृतिक संरचना का व्यक्ति जब सत्ता के किसी मशीनरी में में आता है तो वह अपने पारंपरिक रीतियों के साथ संस्थान में जीता है.
धर्म निरपेक्षता का ढोंग भले ही किया जाय पर देश की कोई ऎसी सरकारी ऑफिस नहीं है जो हिन्दू प्रतीकों, मूर्तियों कलेंडरों व देवी देवताओं से मुक्त हो. क्या देश की कानून व्यवस्था व संविधान की देख रेख करने वाली न्यायालयों की निगाह कभी इस बात पर गयी कि एक सार्वजनिक संस्थान में, धार्मिक कर्मकान्डों को बद किया जाना चाहिये व प्रतीकों को हटाया जाना चाहिये. इस रूप में पूरी मशीनरी यहाँ तक कि न्यायालय भी हिन्दूवादी मानसिकता से ग्रसित होकर काम कर रहे हैं. हिन्दू मानसिकता अपने मूल से जातीय वर्चस्व व विभेदीकरण के आधार पर काम करती रही है. हरियाणा राज्य में घट रही घटनायें इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कि सत्ता मशीनरी व वर्चस्वशाली वर्ग किस तरह से एक होकर दलितों पर अत्याचार कर रहे हैं.
पिछले कुछ वर्षों में देखा जाय तो जमीदारों ने दलितों का खेतों में प्रवेश बंद कर दिया. झूठे मामले के तहत उन्हें जेलों में डाला जा रहा है. पानीपत के जुलना गाँव में गुर्जरों व जाटों द्वारा दलितों की पिटायी की गयी, कजरकरा गाँव में दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे कितने मामले हैं जो घट रहे हैं. आखिर यह प्रवृत्ति दिनों-दिन बढ़ना वहाँ की सत्ता के मदद के बगैर कैसे संभव है. जबकि इस पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है.
झज्जर में २००२ में जब पाँच दलितों को पीट-पीट कर पुलिस चौकी के सामने ही जला दिया गया तो क्या यह वहाँ की पुलिस की मदद के बगैर संभव था. सरकारी संस्थाओं के ढांचे में जब किसी सवर्ण को लाया जाता है तो उसकी मानसिकता में बदलाव के लिये सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास नहीं किया जाता. वे अपने सवर्णवादी समाज के ढांचे से आते हैं और ऊंच-नीच की भावना के साथ तंत्र में कार्य करते हैं. दलितों को जब जलाया गया तो राज्य एजेंसियों ने उसे यह कहते हुए सही ठहराया कि दलितों ने बहुसंख्यक की भावना को ठेस पहुंचाया है. जबकि मामला यह था कि दलितों ने मरी हुई गाय की खाल निकाली थी.
१० फरवरी २००३ को कैथल जिले में उच्च जाति के लोगों ने २७५ दलित परिवारों को गाँव से पीट-पीटकर इसलिये बाहर खदेड़ दिया क्योंकि ये दलित ११ फरवरी को गुरू रविदास की जयंती मनाना चाह रहे थे. सवर्ण इस जयंती मनाये जाने के खिलाफ थे. कुछ दिनों बाद जब वे लौटकर आये तो फिर से सवर्णों द्वारा जुलूस निकाल तांडव किया गया और दलितों को दुबारा गाँव छोड़ना पडा. कई महीने तक उन्हें बेघर होकर कैंपों में दिन गुजारने पडे. इसके बावजूद आरोपियों को गिरफ्तारी के बाद जल्द ही छोड़ दिया गया. इतने बडे जुल्म का यदि यही अंजाम हो तो जाहिराना तौर पर सवर्णों के हौसले बुलंद ही होंगे.
राज्य में दलित बडे पैमाने पर बंधुआ मजदूर बनने के लिये आज भी मजबूर हैं जबकि बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. पर राज्य में यह सब बेमानी हो चुका है. कुछ वर्ष पहले ही एक बाल्मीक मजदूर को हुकुम सिंह नामक जमीदार ने ट्रैक्टर से कुचलकर इसलिये मार डाला क्योंकि वह बंधुआ मजदूरी की खिलाफत कर रहा था.
अब इस दमन चक्र को नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है जिसे कानूनी तौर पर जायज ठहराया जा सके. बीते दिनों २५ दलितों को माओवादी बताकर गिरफ्तार किया गया जिनमें तीन महिलायें भी शामिल हैं. इन्हें जेल में डाल दिया गया. आरोपी के रूप में करनाल जेल में बंद मुकेश कुमार नामक व्यक्ति के साथ जेल में जो बर्ताव किया गया वह अमानवीय है. मुकेश को जब जज अश्वनी मेहता के कोर्ट में लाया गया तो वह फफक पडा उसने अपने वकील के हवाले से एक पत्र लिखा जिसमे उसने बताया है कि दलित होने के कारण जेल प्रशासन के दो व्यक्तियों “ जोगिंदर सिंह, व “डांगी, द्वारा २२ जुलाई को पीटा गया, उससे शौचालय धुलवाये गये वदलित सूचक गालियाँ दी गयी. जब उसने इसका प्रतिरिध किया तो उसका सिर मुड़वा दिया गया और मूंछें काट दी गयी. प्रशासन द्वारा उसे इनकाउंटर में मारने की धमकी भी दी गयी. पर अभी तक न तो राष्ट्रीय मानवाधिकार और न ही दलित रक्षा करने वाली किसी संस्था ने इसकी खबर लेने का प्रयास किया.
राज्य में एक तरफ सामाजिक ढांचे से बहिस्कृत व प्रताडित किये जाने के बाद जब सत्ता तंत्र भी इस भेद-भाव को प्रश्रय देने लगे तो आखिर उनके सामने रास्ता क्या बचता है. इसकी क्या वज़ह है कि देश में आदिवासी और दलित ही माओवाद के नाम पर पकडे जा रहे हैं. प्रतिरोध की ताकत आज आदिवासियों और दलितों के बीच ही बची है क्योंकि वे झारखंड में आदिवासियों के नेतृत्व का शासन, उत्तर प्रदेश में मायावती का शासन भी देख चुके हैं. अब वे इस असमान ढांचे को तोड़, नया ढांचा बनाने के पक्ष में हैं.