14 नवंबर 2010

लवासा का सच


-दिलीप ख़ान

मुंबई और पुणे जैसे चमक-दमक वाले दो बड़े शहरों के बीच छोटी पहाड़ियों और जंगलों से घिरा एक बड़ा भूभाग है, जो प्राकृतिक और जैव विविधता के लिए मशहूर पश्चिमी घाट का हिस्सा है. इस क्षेत्रफल के बीच टुकड़ों में कई छोटे-छोटे गांव बसे हैं. इन्हें किसी शहरीकरण की नियोजित नीति के तहत नहीं बसाया गया हैं. मुंबई और पुणे के मानिंद इन गांवों का भी अपना एक लंबा इतिहास है. लेकिन, इनमें से कई गांव अब वहां के नक्शे से ग़ायब हो गए हैं. कई अपने अस्तित्व बचाने के लिए भीषण जद्दोजहद कर रहे हैं. ऐसे ही 25 गांवों को हटाकर इस इलाके में एक ’हिल सिटी’ लवासा बन रहा है. यदि सब कुछ ’ठीक’ रहा तो साल के अंत में इस परियोजना का पहला चरण बनकर तैयार हो जाएगा, जिसमें एक हज़ार बड़े अट्टालिकाओं और 500 अपार्टमेंट के साथ इसकी संपूर्ण रूप-रेखा की पहली झलकी प्रस्तुत की जाएगी. चार चरणों में इसे विकसित करने वाले मॉडल के अनुसार 2021 में यह अंतिम रूप से बनकर तैयार हो जाएगा. इस तरह इस परियोजना की परास दूरदर्शिता के मामले में विज़न 2020 से भी अधिक आगे तक जाती है!


लवासा परियोजना कोई देसी दिमाग की उपज नहीं हैं. हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी की इस परियोजना की मूल रूप-रेखा अमेरिका में खींची गई थी और इस परियोजना की सहूलियत और सफ़लता को परखने के लिए अमेरिका की ही एक सर्वे एजेंसी ए. सी. निल्सन को उत्तरदायित्व सौंपा गया. ध्यान देने वाली बात यह है कि ए सी निल्सन, वास्तव में एक मार्केटिंग रिसर्च फर्म है जो विभिन्न व्यवसायों और बाजार के मौजूदा व्यवहार की जानकारी देने के लिए प्रसिद्ध है. 100 वर्ग किमी में फैले इस पूरे इलाके को इस सर्वे फर्म ने संबंधित परियोजना शुरू करने के लिए उपयुक्त करार दिया. महाराष्ट्र सरकार ने आनन- फानन में इसके लिए बिल पास कर दिया, गोया किसी निज़ी व्यावसायिक कंपनी की मार्केटिंग के लिए लोगों को विस्थापित करने को सरकार बेचैन हो. बाद में इस बेचैनी का कारण अधिक स्पष्ट हुआ जब इसमें शामिल लोगों की जुगलबंदियां साफ़ दिखने लगी. राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी की भागीदारी वाली सरकार निविदा के नियम-क़ायदों के कारण होने वाली देरी को कम करने के लिए इस व्यवस्था को ही लांघ गई. इस कंपनी के पंजीकरण के दो साल बाद सुप्रिया सुले को इसमें बारह फ़ीसदी शेयर का मालिकाना हक़ हासिल हुआ. इसमें सुप्रिया के पति की हिस्सेदारी अलग है. आरोप यह भी लग रहे हैं कि इसी एवज में कंपनी के पंजीकरण को मंजूरी दी गई थी. इस विवादास्पद बिल के मंजूरी के बाद राजनीतिक हलके में हल्के शोर के अलावा अब तक कोई ठोस दबाव भरा कदम नहीं उठाया गया है. ऐसे में स्थानीय जनता के पास क्या विकल्प बचता है?


परियोजना के सामने कई समस्याएं हैं और उनसे निपटने के लिए राज्य सरकार हरेक मंजूरी देने को तैयार दिखती है. मसलन, लवासा को जिस वारसगांव बांध के पानी के भरोसे विकसित किया जा रहा है, उसके पानी से पुणे के लोग अपनी दिनचर्या का निर्वाह करते हैं और पिछले कुछ वर्षों से पुणे खुद पानी की कमी का संकट झेल रहा है, फिर भी वारसगांव बांध के पानी को लवासा की ओर मोड़ने की अनुमति दे दी गई. लेकिन 11.5 टीएमसी क्षमता वाले इस पूरे वारसगांव के पानी से भी लवासा की ज़रूरत पूरी नहीं होने वाली थी, तो कृष्णा घाटी में बिना किसी ठोस पर्यावरणीय जांच के जल संग्रहण और नए बांध बनाने पर भी सरकार ने सहमति दे दी. यह सहमति जिस समय दी गई उस समय अजीत पवार महाराष्ट्र कृष्णा घाटी विकास निगम के अध्यक्ष थे. अजीत पवार रिश्ते में शरद पवार के भतीजे हैं और सुप्रिया सुले बेटी. इस तरह आपस में वे दोनों चचेरे भाई- बहन हैं. भाई-बहन की घरेलू सांठ-गांठ राजनीतिक फ़ैसले में परिवर्तित हो गई. महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में हालिया नेतृत्व परिवर्तन के बाद अजीत पवार अब प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हो गए हैं. दिलचस्प यह है कि यह नेतृत्व परिवर्तन जिस तात्कालिक मुद्दे को संज्ञान में लेकर किया गया वह आदर्श सोसाइटी का मसला है, जिसमें कई पर्यावरणीय तथा वित्तीय अनियमितताओं के मामले उजागर हुए हैं. आदर्श सोसाइटी सैनिकों के लिए रिहाइशी मकानों की परियोजना है. लवासा भी बड़े अट्टालिकाओं और रिहाइशी मकानों की परियोजना है.



लवासा परियोजना को सफ़ल बनाने के लिए स्थानीय लोगों पर लगातार विस्थापन आरोपित किया गया है. उस पूरी पट्टी में लोग क्रमिक रूप से विस्थापित हो रहे हैं. 1974 में वारसगांव बांध बनाने के लिए जिस ज़मीन का अधिग्रहण किया गया था उसका एक हिस्सा अभी तक पड़ती पड़ा हुआ था, जिसे लवासा पर खरचा जा रहा है. देश में बांध परियोजनाओं के नाम पर अधिग्रहीत की गई ज़मीन की एक लंबी सूची है जिसे किसी दूसरे निज़ी कंपनियों को सौंप दिया गया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुताबिक नर्मदा घाटी में अधिग्रहीत की गई ज़मीन का लगभग 40 फ़ीसदी पड़ती पड़ा है और उसके कुछ टुकड़ों को किराए पर निज़ी कंपनियों को सौंप दिया गया है. ’कल्याणकारी राज्य’ में स्थानीय जनता की रत्ती भर परवाह किए बग़ैर सरकार ने जिस तरह निज़ी कंपनियों को ज़मीन सौंपा है वह लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ रहा है. लोगों को जबरन खाली करा कर ज़मीन अधिग्रहीत करने का एक नतीजा यह है कि पिछले 60 वर्षों में सिर्फ़ बांध के नाम पर 15 करोड़ से अधिक लोगों को देश के नक्शे के भीतर इधर-उधर खदेड़ा गया है.



इन विस्थापनों और अनियमितताओं को अपने भविष्यगत योजानाओं तले ढंकते हुए, योजनाकारों ने लवासा को लेकर बेहद सुनहरी तस्वीर खींच रखा है. यह सही मायनों में ग्लोबल होगी. यहां पर्यटक आएंगे तो डॉलर-यूरो की चरमराहट पहाड़ों में गूजेगी. यहां यूरोप के फुटबॉल क्लबों से लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों से संबद्ध प्रबंधन विश्वविद्यालयों के शाखाएं खोली जाएगी. यह सच है. सच यह भी है कि यहां के रसोईघर से लेकर संडास तक को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा रहा है. ठीक कॉमनवेल्थ के खेल गांव की तरह. सच यह भी है कि यह वाकई स्वतंत्र भारत का पहला नियोजित हिल शहर है वैसे ही जैसे नागपुर का मिहान पहला कारगो और हवाई अड्डे का हब है. नागपुर की तरह यहाँ भी 25 गांवों को उजाड़ा गया और यह भी उतना ही बड़ा सच है.



(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया शोधार्थी है.)



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1 टिप्पणी:

  1. लवासा हम भी देखकर आए हैं। कहा जाता है कि LAVASA के नाम के हिसाब से छ: पार्टनर हैं और उनमें शरद पँवार प्रमुख हैं। इस बारे में भी प्रकाश डाले की ये छ: साझेदार कौन-कौन हैं?

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