12 अप्रैल 2012

जो कहा जाना चाहिए -गुंटर ग्रास


एक ऐसे वक्‍त में जब साहित्‍य और राजनीति की दूरी बढ़ती जा रही हो, जब लेखक-कवि लगातार सुविधापसंद खोल में सिमटता जा रहा हो, एक कविता के बदले जर्मन कवि गुंटर ग्रास के इज़रायल प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध ऐतिहासिक परिघटना है। नोबेल विजेता गुंटर ग्रास ने 84 साल की उम्र में एक कविता लिख कर इज़रायल को दुनिया के अमन-चैन का दुश्‍मन करार दिया है। यह बात उतनी सपाट भी नहीं है। कविता में गुंटर ग्रास का नैतिक संघर्ष दिखता है, जो कि उपनिवेशवाद और जि़योनवाद के बीच के रिश्‍तों की स्‍वाभाविक पैदाइश है। वह पश्चिम को दोहरा बताते हैं, अपने देश जर्मनी को भी इज़रायल की गुपचुप मदद का जि़म्‍मेदार ठहराते हैं और यहूदी विरोध के फतवे का खतरा समझते हुए अब तक साधी हुई अपनी चुप्‍पी की वजहें भी बताते हैं। यहूदी विरोधी होने की कई परतें हैं, जिन्‍हें इस परिचय में एकबारगी नहीं खोला जा सकता। लेकिन गुंटर ग्रास जैसे एक पब्लिक इंटेलेक्‍चुअल की ओर से कहा गया यह सच एक ऐसे वक्‍त में आया है जब लगातार यह बात तमाम तरीकों से साफ हो रही है कि इज़रायल अगर हिटलर द्वारा यहूदियों के दमन के शिकार लोगों की पनाहगाह है, तो वह यूरोपीय उपनिवेशवाद का नया मुहावरा भी है, बल्कि उसी की पैदाइश है। इसकी कीमत पिछले साठ साल से वे फलस्‍तीनी अपने खून से चुका रहे हैं जो जुर्म उन्‍होंने नहीं, बल्कि यूरोपीय उपनिवेशवाद ने ढहाया था।
बहरहाल, पिछले दस दिन से ''वॉट मस्‍ट बी सेड'' नाम की इस कविता का अनुवाद मैं करना चाह रहा था। इत्‍तेफ़ाक़ से कल जयप्रकाश मानस जी ने इस कविता को अंग्रेज़ी में फेसबुक पर जब शेयर किया, तो मैंने उनसे कहा कि बेहतर होता वे हिंदी अनुवाद भी कर डालते। उन्‍होंने तकरीबन आदेशात्‍मक लहज़े में जवाब दिया, ''आप करिए अनुवाद अभिषेक''। मैंने उनके कमेंट को सामाजिक जि़म्‍मेदारी मानते हुए अनुवाद कर डाला। मुझे नहीं पता कविता का अनुवाद करने की कोई खास तकनीक होती है या नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि बात समझ में आनी चाहिए, फिर चाहे कविता अनुवाद के बाद गद्य ही क्‍यों न बन जाए। नीचे पूरी कविता का अनुवाद ''जो कहा जाना चाहिए'' प्रस्‍तुत है। - अनुवादक : अभिषेक श्रीवास्‍तव

मैं चुप क्‍यों रहा, क्‍यों छुपाता रहा इतने लंबे समय तक
वह खुला राज़
जिसे बरता गया बार-बार जंगी मैदानों में, और
जिसके अंत में जो बचे हम
तो हाशिये से ज्‍यादा कुछ भी नहीं थी हैसियत हमारी।
ज़ोर-ज़ोर से चीख कर
उन्‍होंने खड़ा कर दिया एक उत्‍सव सा कुछ
जिसमें दब गई ये बात, कि
यह पहले हमला करने का कथित अधिकार ही है
जो मिटा सकता है ईरानी जनता को-
क्‍योंकि उनकी सत्‍ता का दायरा फैला है
एक न्‍यूक्लियर बम बनने की आशंकाओं के बीच
वे मानते हैं कि ऐसा कुछ ज़रूर हो रहा है।
बावजूद इसके, क्‍यों रोके रहा खुद को मैं
उस दूसरे देश का नाम लेने से
जहां बरसों से, भले गुपचुप
न्‍यूक्लियर आकांक्षाओं की तन रही थी मुट्ठी अदृश्‍य
क्‍योंकि उस पर किसी का ज़ोर, कोई जांच कारगर नहीं?
इन बातों को छुपाया गया दुनिया भर में
जिसमें शामिल थी मेरी चुप्‍पी भी-
जब्र तले एक झूठ की मानिंद-
जिसे सज़ा मिलनी ही चाहिए
बल्कि सज़ा मुकर्रर थी, बशर्ते इस चुप्‍पी को हम तोड़ते।
यहूदी विरोध के फतवे से तो आप वाकि़फ़ होंगे।
अब, चूंकि मेरा देश
जो एक नहीं, कई बार रहा साक्षी खुद अपने अपराधों का-
(और इसमें इसका कोई जोड़ नहीं)
बदले में यदि विशुद्ध व्‍यावसायिक नज़रिये से ही
विनम्र होठों से इसे करार देकर प्रायश्चित्‍त
इज़रायल को न्‍यूक्लियर पनडुब्‍बी भेजने का करता हो एलान
जिसकी खूबी महज़ इतनी है
कि वह दाग सकती है तमाम विनाशक मिसाइलें वहां
जहां एक भी एटम बम का वजूद अब तक नहीं हुआ साबित
लेकिन डर, ऐसा ही मानने पर करता है मजबूर बासबूत
तो कह डालूंगा मैं वो बात
जो अब कही जानी चाहिए।
लेकिन अब तक मैं खामोश क्‍यों रहा?
इसलिए, क्‍योंकि मेरी पैदाइश की धरती
जिस पर जमे हैं कभी न मिटने वाले कुछ दाग
रोकती थी मुझे कहने से वो सच
इज़रायल नाम के उस राष्‍ट्र से, जिससे बिंधा था मैं
और अब भी चाहता ही हूं बिंधे रहना।
फिर आज क्‍या हो गया ऐसा
कि सूखती दवात और बुढ़ाती कलम से
मैं कह रहा हूं ये बात
कि न्‍यूक्लियर पावर इज़रायल से
इस नाज़ुक दुनिया के अमन-चैन को खतरा है?
क्‍योंकि यह कहा ही जाना चाहिए
कल, हो सकता है बहुत देर हो जाए;
और इसलिए भी, कि उसका बोझ लादे हम जर्मन
ना बन जाएं कहीं ऐसे किसी अपराध के भागी
जो न दिखता हो, न ही मुमकिन हो जिसका प्रायश्चित्‍त
पुराने परिचित बहानों और दलीलों से।
लिहाज़ा, तोड़ दी है अपनी चुप्‍पी मैंने
क्‍योंकि थक गया हूं मैं पश्चिम के दोगलेपन से;
इसके अलावा, एक उम्‍मीद तो है ही
कि मेरी आवाज़ तोड़ सकेगी चुप्‍पी की तमाम जंज़ीरों को
और आसन्‍न खतरा बरपाने वालों के लिए होगी एक अपील भी
कि वे हिंसा छोड़, ज़ोर दें इस बात पर
कि इज़रायल की न्‍यूक्लियर सामर्थ्‍य और ईरान के ठिकानों पर-
दोनों देशों की सरकारों को मान्‍य एक अंतरराष्‍ट्रीय एजेंसी
की रहे निगरानी
स्‍थायी और अबाधित।
एक यही तरीका है
कि सभी इज़रायली और फलस्‍तीनी
यहां तक कि, दुनिया के इस हिस्‍से में फैली सनक के बंदी
तमाम लोग
रह सकें साथ मिल-जुल कर
दुश्‍मनों के बीच
और ज़ाहिर है, हम भी
जिन्‍होंने अब खोल दी है अपनी ज़बान।

08 अप्रैल 2012

पूरी पृथ्वी एक रास्ता ही तो है.

चन्द्रिका

यात्रा, स्थिरता और ठहराव के विरुद्ध एक कार्यवाही होती है. एक यात्री के लिए पूरी की पूरी पृथ्वी एक रास्ता है. वहां, जहां घरों को बनाया गया और जहां पुराने खण्डहर बिखरे पड़े हैं, जहां अभी-अभी लगाया गया है एक पेड़, जहां बसाई जा रही हैं बस्तियां, नदियां गुजर गई हैं जिसे चीरते हुए. वहीं पर,ठीक उसी जगह रोक दिया गया है एक रास्ता भी. ज्ञान और भिज्ञता से भरे दावे की इस सदी में कितने अनभिज्ञ हैं हम एक रास्ते की रुकावट से. हर निर्माण और हर बुनियाद में एक रुकावट निहित होती है और इस तरह पृथ्वी के सारे रास्ते इंतज़ार में खड़े हैं अनगिनत समयों से. वह सुदूर जहां कोई नहीं गया रास्ते वहां भी पड़े हैं. संभव है इतनी लंबी उनीदों में उनके पीठ पर जम गई हो घास की कोई टहनी और धीरे-धीरे फैला रही हो अपनी जड़ें पृथ्वी के गर्भ तक. कई बार ऐसा लगता है कि यह सब जो हमारा है, जिन खेतों से लौट रहा है किसान, शहर के जिस नुक्कड़ पर खुलती है रोज दुकान, नेम प्लेटों को चस्पा किए खड़ा है जो मकान वह सब हमने चुरा लिए हैं रास्तों से ही और हमारे सर पर लटक रही छत के नीचे से गुजर रहा है कोई रास्ता बगैर शोर किए. फिर आखिर उंगली रखकर कौन बताए कि यह है वो घर, तुम्हारा अपना घर और यह है वो रास्ता, बगैर छतों के गुजरता हुआ. बच्चे जो घरों में खेल रहे हैं अपने घर में वे कितने सावधान होंगे तब, जब उन्हें पता चलेगा कि वे रास्ते के बीचो-बीच ही खेल रहे हैं बेफिक्री से या सो गए हैं रास्ते पर ही. और तब जबकि एक औरत को पता चलेगा कि वह सेंक रही है रोटिंयां रास्ते के बीच ही, अखिर वह कहां जाएगी चौके-बेलन के साथ. पर औरतें कहीं नहीं जाती विपत्तियों को सहना सदियों में सीखा है उन्होंने. उन्हें तो खैर पता ही होता है जो फुटपाथों के किनारे हैं, वे किसी स्थायीत्व की उम्मीद कभी नहीं पालते.

कौन जाने यह पृथ्वी किसके लिए घूम रही है सदियों से, या सदियों के भी किसी पूर्वज समय से जिसे कोई नहीं देख पाया. सदियों से घूम रही पृथ्वी की यात्राओं के अनगिनत दुखों को कब लिखेगा कोई इतिहासकार. पृथ्वी की इस निरंतर यात्रा में जाने किसका विक्षोभ छुपा है और समोए हुए हैं विरह के ढेर सारे लमहे. उससे कहो कि सरल सीधे सपाट रास्ते पर कोई नहीं मिलता जबकि पगडण्डियों पर चलना बेहद दूभर हो चला है. हमे किसी भी यात्रा के लिए नए रास्ते की तलाश करनी चाहिए. संभव है वे सब जो उसके अपने थे चले गए हों किसी यात्रा पर या हो सकता है कि सब के सब इंतज़ार में कहीं ठहरे हुए हों और यात्राएं ही चली गई हों कहीं. किसी भी यात्रा में पहुंचने से ज्यादा छूटना है कि छूटती है हमारी स्थिरता और हमारा ठहराव और वहीं से फिर लौटने की उत्कंठा ही हमे भर रही होती है उमंगों से. एक यात्रा की सुखद अनुभूतियां लौट आना ही तो है. यदि कुछ देखने का भी सुख है तो अपने आसपास को इतने दिन न देख पाने का दुख भी शामिल होना चाहिए. सभ्यता के विस्तार से कुछ नया समेट कर हम ले आते हैं अपने समाजों में, हर यात्रा किसी और के देखे हुए को पुष्ट भर ही तो करती है. सुदूर की यात्राएं अपरिचितों के लिए एक अपरिचित का संदेश होती हैं. जिसमे एक नए आदमी से मिलना प्रकृति की कृति से मिलने जैसा होता है. कमसिन आग्रहों के साथ हम मिलते हैं किसी गैर से. वह जो सबसे खतरनाक है यात्राओं में हमारा दोस्त हो सकता है और संभव है कि पूरे जीवन भर स्मृति का एक सुखद कोना हमे दे देना पड़े उसके लिए.

पहाड़ियां उठाकर देखो कोई रास्ता गुजर रहा है किसी रास्ते से मिलने को या फिर चढ़ गया है चोटी के ऊपर ही और यह एक अंतहीन यात्रा है. समय के अन्तिम बिन्दु पर जब ठहर जाएगा सब कुछ महज़ एक रास्ता ही होगा जो चलता रहेगा बगैर किसी मील पत्थर की दूरी को देखे हुए. रास्ते वहीं पर हर बार खड़े हैं जहां तुम उन्हें छोड़कर चले आए हो. वे हर बार जाने की तैयारी में दिखते हैं पर जाने कौन है जो उन्हें रोके हुए है या वे देखना भूल गए हैं अपने कलाई में बंधी घडी. वे वहां पहले पहुंच चुके हैं जहां तुम जाओगे और वहां भी जहां नहीं जाना है किसी को. यात्राओं में सबकुछ छूट जाए पर एक अकेले आदमी के साथ चलता ही रहता है एक रास्ता. यात्राओं में हर बार तयशुदा ढंग से कुछ छूटता है और किसी से मिलने की आकांक्षा होती है पर जो छूट जाता है उसकी अनुपस्थिति कभी किसी यात्रा से नहीं छूटती. अनुपस्थितियां हर व्यक्ति के साथ मौजूद रहती है रास्तों की तरह. यात्राओं में हम रचते हैं सबसे बड़ा झूठ कहीं जाने का कि हम कहीं नहीं जाते. रहते हैं अपने ही देह के इर्द गिर्द चलते हैं, डोलते हैं. कि अपनों से दूर भागने के सुख को आखिर कोई क्या कहेगा. यात्राओं में अपनों से दूर जाना ही तो बस नया होता है यदि अपना जैसा कुछ है तो. जो हमे सुंदर दिखता है, रोमांचित करता है वह किसी और की दी हुई सुंदरता है जिसे हम कई बार इसलिए सुंदर मान लेते हैं कि उनके साथ हमारा ठहराव का वास्ता नहीं है. कोई भी सुंदरता किसी ठहराव में निहित नहीं होती, वह चलायमान होती है. ऐसे कितने रास्ते हैं जो छुपना चाह रहे हैं किसी खोह में और हर नई खोज, हर नई यात्रा उनकी इन्ही इच्छाओं को दमित कर रही है.

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30 मार्च 2012

सी. आर. पी. एफ.-- देश के ये जो देश भक्त जवान हैं.


आन्ध्र प्रदेश, दिल्ली, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, झारखण्ड के मानवाधिकार संगठनों के १७ सदस्य जांच दल ने २५ से २९ मार्च २०१२ के बीच तीन जिलों लातेहार, गढ़वा, और पलामू का दौरा किया. इस दौरे में मानवाधिकार हनन के कुछ नए मामलों के साथ-साथ कुछ पुराने मामलों में हुई कार्यवाही की भी जांच की गयी. पिछले दिनों झारखण्ड राज्य जल जंगल ज़मीन के अधिकारों के संघर्षों और ओपेराशन ग्रीन हंट के लिए चर्चा में रहा है. जहां जनता के संघर्ष चल रहे हैं वह उन्ही इलाकों में पुलिस पिकेट, सी आर पी एफ कैंप आदि के रूप में सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती की गयी है . यह इस बात का एक लक्षण मात्र है की किस प्रकार राज्य जन विरोधी विकास नीतियों के खिलाफ जनता के संघर्षों को कुचलने का प्रयास कर रहा है . जिन मामलों की छान बीन हमने की उससे सरकार की अमीर परस्त विकास नीति उजागर हो जाती है जिससे कई और मुद्दे भी सामने आ जाते हैं.

दल ने कुल दस मामलों की मौके पर छान बीन करने का प्रयास किया. इनमे से कुछ निम्नलिखित हैं:


१. संजय प्रसाद, बरवाडीह, लातेहार- हमारा जांच दल जैसे अपने दौरे पर लातेहार के एक स्थान से निकल पड़ा था, संजय प्रसाद के पिता और भाई उसकी आपबीती सुनाने हमारे पास चले आये. २१ मार्च २०१२ को किसी पूछताछ के सिलसिले में थाणे ले जाया गया था. चार दिनों तक उसे पुलिस हिरासत में ही रखा गया जब की परिजनों को बताया जा रहा था की उसे पहले ही दिन छोड़ दिया गया है. दो दिन बाद संजय को मंडल और चेमु संय कके बीच के जंगलों से गिरफता दिखाया गया. २६ मार्च को जब अखबारों में संजय की गुमशुदगी की रिपोर्ट छपी तो पुलिस ने कहा की उसे माओवादी और मंडल-चेमु संय के जंगल में बम्ब लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. विदित है की २०१२ में अब तक उस क्षेत्र में कही भी कोई बम्ब विस्फोट हुआ ही नहीं है.


२. जसिंता देवी, लादी गाँव, लातेहार - २७ अप्रैल २०१० को इस गाँव में माओवादियों और सी आर पी एफ के बीच एक मुट्ठबेढ़ हुई. तत्काल बाद अपने तलाशी अभियान के दौरान से आर पी एफ ने जसिनता देवी के छिपे होने का आरोप लगाया. घर को आग लगाने की धमकी देकर उन्होंने घर के सभी जनों को बाहर आने का फरमान दिया. जसिनता देवी घर के पिछवाड़े में लेटे हुए अपने बूढ़े चरवाहे को बुलाकर लाने की इजाज़त मांगी. जैसे ही वह बूढ़े चरवाहे के साथ आँगन में पहुंची उस तीन बच्चो की माँ को वही ढेर कर दिया गया और चरवाहा भी ज़ख़्मी हो गया. घर के अन्दर और छत पर आज भी गोलियों के निशाँ देखे जा सकते हैं और पीड़ितों के साथ आज तक कोई न्याय भी होता दिखाई नहीं देता. पुलिस के हाथों मारे जाने के कारण उसे ५ लाख रूपए और एक नौकरी अंतरिम राहत के तौर पर दी जानी चाहिए थी. लेकिन अब तक उस परिवार को सिर्फ १ लाख रूपए ही मिले हैं. दोषी पुलिस अफसरों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है. यहाँ तक की पीड़ित की शिकायत पर कोई प्रथिमिकी भी दर्ज नहीं हो पायी है.

३. लुकास मिंज, नवर्नागो, लातेहार - लुकास मिंज नाम का नवर्नागो का निवासी जो न सुन सकता था और न ही बोल सकता था, १ फ़रवरी २०१२ को सी आर पी एफ की गोली का शिकार बना. गाँव के पास की कोयल नदी पर अपने गाय-भैंस चराने गया था जबकि इसी दौरान पुलिस अपने अभियान पर थी. पुलिस के सवालों का जवाब न दे पाने के कारण, वह मारा गया. पाच दिन बाद उसकी लाश बालू में दबी पायी गयी. परिवार को आज तक कोई मुहाफ्ज़ा नहीं मिला है और न ही किसी पुलिस कर्मी के खिलाफ कोई कायवाही हुई है.

४. बलिगढ़ और होमिया, गढ़वा- इन गावों में स्थानीय सामंती तत्वों की मिलीभगत से एसार और जिंदल जैसी बढ़ी कंपनियों के नाम सैंकड़ों एकड़ ज़मीन कर दी गयी है. पिछले एक साल के दौरान आदिवासी और दलित समेत कुछ स्थानीय किसानो की ज़मीन राम नारायण पाण्डेय उर्फ़ फुल्लू पाण्डेय एवं कुछ अन्य व्यक्तियों के द्वारा फर्जी कागजात बनवाकर इन कंपनियों के नाम कर दी गयी है. इसमें भूदान की वह ज़मीन भी शामिल है जिसे खरीदा बेचा नहीं जा सकता. इस फर्ज़िबाड़े के तेहत जिस ज़मीन की लगान गाँव के किसानो के नाम वर्षों से वसूली जा रही थी उसका मालिकाना फुल्लू पण्डे के नाम लिखवा लिया गया. इस प्रकास होमिय में ११५ एकड़ और बलिगढ़ में ३३८ एकड़ ज़मीन उन गरीब किसानो से हथिया ली गयी जिन्होंने लगभग पच्चीस साल तक अपने संघर्षों की बदौलत इसका अधिकार प्राप्त किया था. उक्त फुल्लू पाण्डे पर इस गाँव कई सारे बलात्कारों आदि को अंजाम दिए जाने का आरोप है परन्तु किसी एक मामले में भी उसको कोई सज़ा नहीं हुई है. कोर्पोराते कम्पनियों और पुलिस अर्धसैनिक बालों के आगमन के साथ बदले शक्ति संतुलन के कारण आज एक बार फिर इस क्षेत्र के १०,००० निवासियों पर जीवन, आजीविका और सुरक्षा का खतरा मंडरा रहा है.

५. रामदास मिंज और फ़िदा हुसैन, गढ़वा- २१ जनवरी २०१२ को ग्राम पंचायत के मुखिया रामदास मिंज और उसी गाँव के फ़िदा हुसैन को तीन अन्य लोगों के साथ माओवादियों को भोजन खिलाने के आरोप में थाणे ले जाया गया. उसी दिन ग्राम पंचायत की एक ज़मीन पर निर्माणाधीन उप-स्वास्थय केंद्र के विरोध में एक शान्ति पूर्ण धरना भी चल रहा था. गाँव के लोग इसी ज़मीन पर आस पास के कई गावों पर लोगो के साथ मिलकर अपने वन उपज बेचा करते थे. जन उपरोक्त पांच व्यक्तियों की पूछताछ थाणे में हो रही थी, उसी दौरान उसी इलाके में माओवादियों ने एक बारूदी सुरंग का विस्फोट कराया. पुलिसवालों ने इसका दोष हिरासत में लिए गए ५ व्यक्तियों पर मढ़ा और आरोप लगाया की गांववालों का शान्तिपूर्वक धरना माओवाद्यों के बम्ब विस्फोट के लिए एक आढ़ था इन्हें जानवरों की तरह पीता गया और कुछ दिन बाद पांच में से तीन को छोड़कर रामदास और फ़िदा को संगीन आरोपों में जेल भेज दिया गया. यह घटना इस बात का ज्वलंत उदहारण है की किस प्रकार माओवादियों के खिलाफ लड़ने की आड़ में गाँव के गरीबों के जायज़ संघर्षों को दबाया जाता है.


६. कुटकू-मंडल बाँध परियोजना, ग्राम सान्या, गढ़वा- सान्या गाँव झारखण्ड के वीर नायक नीलाम्बर और पीताम्बर का पुश्तैनी गाँव है. उसी नीलाम्बर-पीताम्बर की जोड़ी का जिन्होंजे ने भूमि अधिकारों के लिए अंग्रेजों से लोहा लेकर अपनी जान कुर्बान की थी. आज यह गाँव कुटकु मंडल बाँध परियोजना के डूब क्षेत्र के बत्तीस गाँव और अन्य प्रभावित १३ गाँव में से एक है. मुहवाज़े के मानदंड कईं दशकों पहले हुए सुर्वे के आधार पर निर्धारित किये गए थे. बीते दशकों के दौरान उस क्षेत्र में बसे परिवारों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है जिनमे से बहुत ही कम परिवारों को मुवाव्ज़े के पात्र माना गया है. यहाँ के लोगों का पुनर्वास मर्दा में किया जा रहा है जहां की ज़मीन खेती के लिए कतई उपयुक्त नहीं है. यह क्षेत्र दरअसल सी आर पी एफ और पुलिस के दमन अभियानों के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाको में से एक है.


७. राजेंद्र यादव, थाना छत्तरपुर, पलामू- इन्हें ३० दिसंबर २००९ को पौ फटने से पहले ही थाना ले जाया गया. थाणे लेजाकर लगातार तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के निवास पर पीट पीट कर मार डाला गया. राजेंद्र को क्यों शिकार बनाया गया, यह तो अभी भी स्पष्ट रूप से कहना संभव नहीं है. मगर यह बात की दो साल से चल रही उच्च स्तारिये पुलिस जांच के निष्कर्ष अभी तक सामने नहीं आये हैं, अपने आप में बहुत कुछ कह जाती हैं. इस दरमियान राजेंद्र की विधवा को कठिन संघर्ष के बाद सरकारी नौकरी मिल गयी है मगर सरकार दोषी पुलिस अफसरों को सजा देना तो दूर, दोष स्वीकारने को भी तैयार नहीं है. हर साल जब राजेंद्र की बरसी मनाई जाती है तो उसके परिजनों और मित्रो को तरह तरह से धमकाया जाता है और कार्यक्रम में अवरोध उत्पन्न किये जाते हैं.

८. बेह्रातांड, निकट सरयू पहाड़, लातेहार- ६ फ़रवरी २०१२ को ग्राम प्रधान बीफा पर्हैय्या समेत गाँव के ९ व्यक्तियों को सी आर पी ऍफ़ द्वारा उठाकर अपने कैंप में यातनाएं दी गयी. प्रधान बीफा की दाहिनी आँख पर गंभीर चोट लग गई और इन लोगों को केवल इसलिए पीटा गया की अर्धसैनिक बालों को यह शक हो गया था की उन्होंने माओवादियों को खाना खिलाया होगा. इस तरह के हमलों का खतरा तब तक मदरता रहेगा जब तक माओवादियों के खिलाफ ऐसे अभियान चलते रहेंगे.

९. बिरजू उरांव, मुर्गीदी ग्राम, लातेहार- इस गाँव के युवक बिरजू उरांव को सी आर पी ऍफ़ ने चत्वा करम नामक बाज़ार में धर दबोचा जब वह रात में किसी पारिवारिक समारोह से गत फ़रवरी माह में लौट रहा था. सुरक्षा बालों ने उसको न केवल बुरी तरह पीटा बल्कि तार काटने वाले औज़ार से उसकी सभी अँगुलियों के छोर को बेदर्दी के साथ काट दिया. बाद में मामला उठने पर स्थानीय पत्रकारों की मौजुद्गो में उसे मुहफ्ज़े के तौर पर एक बोरा चावल दिया गया. लेकिन जब इस घटना की खबर दूर तक फैली तब पुलिस ने मामे को दबाने के लिए प्रेस वार्ता आयोजित कर बिरजू से जबरन ये बयान दिलवाया की उस समय वह शराब पिया हुआ था इसलिए यह स्पष्ट रूप से नहीं बता पा रहा है की हमलावर सी आर पी एफ के ही थे.

कुल मिलाकर जांच दल अपनी जांच से पुलिस और सी आर पी एफ की ओर से हुए असंख्य अनावश्यक हत्याओं के मामले पाए. जहां भी ऐसी घटनाएं घटी थी वहाँ पीड़ितों और प्रभावित परिवारों को न्याय मिलने के मामले में भी कोई प्रगति नहीं हुई थी. इससे स्पष्ट होता है की इस पुरे क्षेत्र में पोलिस की मनमानी किस कदर कायम है और आम लोगों की निगाह में तरह तरह के सुरक्षा बालों के असंख्य करमचारी का दर्ज़ा कुछ समाज विरोधी तत्वों से अलग नहीं है.

हमारे इस ग्रामीण सर्वेक्षण के दौरान हमारी भाकपा(माओवादी) के एक सशत्र दल के साथ एक अनियोजित मुलाकात हुई. झारखण्ड की इस दुर्दशा के बारे में उनका दृष्टिकोण क्या है यह humein जाने का मौका मिला. इसका विस्तृत ब्यौरा हम अपनी सम्पूर्ण रिपोर्ट में सांझा करेंगे. लेकिन यहाँ हम केवल इसी मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं की किस प्रकार टी पी सी, जे पी सी, पी एल एफ आई, जे जे एम् पी, जे एल टी, जैसे सर्कार द्वारा प्रायोजित लड़ाकू दलों को पुलिस से आश्रय मिलता है जबकि आम तौर पर इन्हें नाक्सल्वादी समूहों के रूप में जाना जाता है. और यह भी गलत धारणा बनती है की यहाँ नक्सलवादी समूहों के बीच आपसी झडपे होती हैं. यह दरसल सलवा जुडूम झार्कंदी संस्करण मालुम होता है जो की यहाँ की ठोस परिस्थितियों में यहाँ के पुलिस ने इजाद किया है. भाकपा(माओवादी) के अनुसार इन गिरोहों को उनका सफाया करने के उद्देश्य से तो तैनात किया गया है ही लेकिन साथ ही यह इसलिए भी किया जा रहा है की पुलिस द्वारा प्रायोजित इनकी असामाजिक गतिविधियों की ज़िम्मेदारी नक्सलवादियों के मत्थे डाली जा सके. यहाँ यह बात भी गौरतलब है की सरकार १९०८ के सी एल ए कानून और हाल के यु ए पी ए क़ानून के सहारे नक्सलवादियों और माओवादियों के साथ साधारण अपराधी जैसा बर्ताव कर पाती है जब की माओवादियों की रणनीति और कार्यनीति जो भी हो, वे किसी राजनैतिक आन्दोलन की सरपरस्ती करते दिखाई देते हैं.

हमें इस बात की ख़ुशी है की भाकपा माओवादी ने हमसे मिलने और बातचीत करने की अपनी तैय्यारी बतायी किन्तु इस बात का खेद है की पुलिस के आला अफसरान ने पूछे जाने पर इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई.

हमारी जांच के दौरान कई सारे मुद्दों की वास्तविकता उजागर हुई. समयकित एक्शन प्लान (आई ए पी) जिस तरह से लागू किया जा रहा है वहाँ से लेकर कुद्कू बाँध परियोजना तक की असलियत सामने आई जिसमे की सैंकड़ों गांववालों की ज़मीन डूबने के कगार पर है. सान्या गाँव में समस्या यह भी है की बाँध परियोजना तो वस्तुतः ठप्प पड़ी है जबकि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के सन्दर्भ में परियोजना अभी जारी है. नतीजतन वहाँ के बत्तीस प्रभावित गावों में आंगनवाडी, स्कूल, प्राथिमिक वास्थ्य केंद्र आदि कार्यक्रमों का कोई नामो निशाँ नहीं है. दूसरी समस्या वहाँ यह है की वहाँ की उर्वर ज़मीन जहां पहले साल में दो फसलें देती थी आज पानी के स्वाभाविक प्रभाव और भूगर्भीय जल की कमी के कारण एक फसल भी बड़ी मुश्किल से दे पा रही है.

जांच दल ने यह पाया की छोटानागपुर और संथाल परगाना के रयत अधिनियमों (सी एन टी और एस. पी. टी. ) और विलकिंसन नियम के अनुसार जनता को जो अधिकार मिलने चाहिए उन्हें भी सरकार नहीं दे रही है. और अब राज्य सर्कार केंद्र की शह पर सी.एन.टी. क़ानून का संशोधन करने जा रही है जिससे लम्बर संघर्षों के बाद आदिवासियों को हासिल हुए भूमि अधिकार भी छीने जायेंगे. वन अधिकार अधिनियम भी यहाँ लागू होता नहीं दिखाई दिया. यह बात बाँध परियोजना के कारण डूब क्षेत्र में लागू होती है तो बलिगढ़ और होमिय जैसे उन गावों में लागू होती है जहां गुप चुप तरीके से ज़मीन जिंदल और एसार को बेचीं जा रही है. आज तक इस कानून के तेहत गाओ स्टार पर कमेटियों को गठित करने का काम शुरू भी नहीं हुआ है. ग्राम समाज के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों की अनदेखी की जा रही है.

उपरोक्त जांच से यह भी पता चलता है की इस तरह लोगों पर फर्जी मुकद्दमे थोप कर ज़मीन के अधिकार से वंचित किये जाने के विरोध में जन संघर्षों को दबाने का प्रयास किया जाता है. लोगों को माओवादी या माओवादी समर्थक होने का आरोप लगाया जाना भी इसी क्रम में पोलिस का एक हथकंडा ही है. ओपेराशन ग्रीन हंट की आड़ में, जिसके तेहत पुलिस के किसी भी अपराध के लिए कोई दंड दिए जाने का सवाल नहीं उठता, एक अनियंत्रित, कानून से परे शक्ति बनी हुई है.

यह कहना ज़रूरी है की हमने जितने मामलों की जांच की है वे केवल चाँद उदहारण मात्र ही हैं. असलियत इससे कहीं ज्यादा गंभीर और व्यापक है. क्योंकि हम जहां भी जाते थे वहाँ हमारे पास ऐसे अनगिनत मामले आ जाते थे जिनकी जांच करना इस टीम के समय और संसाधनों की सीमा के कारण संभव नहीं था. इसीलिए यहाँ जो छिटपुट मामलों का ब्यौरा दिया गया है, वो वास्तव में झारखण्ड के स्टार पर व्याप्त एक आम परिघटना का परिचायक ही है. पुराने मामलों में हुई कार्यवाही की जांच हमने की वह पता चलता है की न्याय हासिल करना यहाँ के लोगों के लिए कितना बड़ा मुश्किल और असंभव सा काम हो गया है .

सी आर पी एफ जैसे बालों की छत्रछाया में फलने फूलने वाले बड़े बड़े ज़मींदार, व्यापारी, ठेकेदार और बड़ी बड़ी कंपनियां पूरी तरह क़ानून के परे हो गयी हैं . हमे इस बात की गहरी चिंता है की इन समस्याओं के साथ साथ लोग सरकार की किस्म किस्म की नयी नीतियों के कारण ही अपने अधिलारों से यहाँ के लोग वंचित किये जा रहे हैं जैसे की सी एन टी एक्ट को संशोधित करने के लिए केंद्र और राज्य की ओर से की जा रही हाल की कार्यवाही.

जनता को यहाँ न केवल दशकों से उपेक्षित रखा गया है बल्कि आने वाले दिनों में उनके सामने अस्तित्व का संकट गहराता जा रहा है.

सी आर पी एफ के पिकेट, बेस कैंप आदि जिस गति से स्थापित होते जा रहे हैं और स्चूलों और कॉलेजों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है उससे इन जिलों का नज़ारा किसी रणभूमि के सामान ही हो चूका है. जनता यहाँ पल पल इस भय में जीती रहती है की कब इस भयंकर पुलिस तैनाती की गाज उस पर गिरेगी. महुआ, तेंदू पत्ता और अन्य वन उपज का संग्रहण करने के लिए जब लोग निकलते हैं तो यह खतरा कदम कदम पर उनके सामने खडा रहता है. इससे ना केवल उनकी आजीविका का स्त्रोत बल्कि उनकी पूरी जीवन शैली ही बुरी तरह प्रभावित हो रही है. अतः हम मांग करते हैं की:


१. ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल रोक दिया जाए.

२. सी आर पी एफ को इन क्षेत्रों से हटाया जाए.

३. सी एन टी एक्ट का संशोधन ना किया जाए..

४. वनों पर आधारित गाँव वासियों के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकार प्रदान करने वाले वन अधिलर अधिनियम को लागू किया जाए.

५. सार्वनिक निगमों और कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा लागू की जा रही विभिन्न प्रयोजनाओं के विरोध में जनता के ओर से उठ रही आवाज़ के मद्दे नज़र इन पर पुनर्विचार किया जाए ताकि जनता के विरोध को उसकी जायज़ एहमियत मिले.

६. सी आर पी एफ और पुलिस की ज्यादतियों के सभी मामलों की न्यायोचित जांच पूरी की जाए और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ यथाशीघ्र की जाए.

23 मार्च 2012

भगत सिंह को लेकर कुछ गैरवाजिब चिंताएं

सुधीर विद्यार्थी

1. भगत सिंह को अकादमिक चिंतन या बौद्धिक विमर्श की वस्तु न बनाया जाये। यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का बिन्‍दु बनने से बहुत पहले भगतसिंह लोक के बीच नायकत्व हासिल कर चुके थे। उन पर सर्वाधिक लोकगीत रचे और गाये गये। मुझे खूब याद पड़ता है कि अपनी किशोरावस्था में गाँवों में मेलों और हाटों में पान की दुकानों पर आइने के दोनों तरफ और ट्रकों के दरवाजों पर भगतसिंह की हैट वाली तथा चन्द्रशेखर आजाद की मूँछ पर हाथ रखे फोटुएं हुआ करती थीं। शुरुआत में जनसंघ के लोगों ने भी उन्हें इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए बम फेंकने वाले एक बहादुर नौजवान, जो हँसते हुए फाँसी का फंदा चूमता है, के रूप में जिन्‍दा बनाये रखा। प्रगतिशीलों के विमर्श में तो वे बहुत देर से आये। जानना यह होगा कि भगतसिंह या आजाद की जगह लोक के मध्य है। वहीं से दूसरा भगतसिंह पैदा होगा, अकादमीशियनों के बीच से नहीं।


2. इस समय को पहचानिए कि जहाँ बिग बी के साथ भोजन करने की नीलामी दस लाख रुपये तक पहुँच रही हो, जिस समाज में मुन्नी बदनाम होती है तो फिल्म हिट हो जाती है यानी बदनाम होने में अब फायदा है सो इसे हम बदनाम युग की संज्ञा दे सकते हैं, कॉमनवेल्थ खेलों में जहाँ पग-पग पर हमें गुलाम होने का अहसास कराया जाता हो और हम गुलाम रहकर खुशी का अनुभव भी कर रहे हों; इसी कॉमनवेल्थ का तो कवि शंकर शैलेंद्र ने अपने मशहूर गीत ‘भगतसिंह से’ में विरोध किया था जिसमें कहा गया था- मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से/ रुत ऐसी है आँख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से। कामनवेल्थ कुटुंब देश का खींच रहा है मंतर से/प्रेम विभोर हुए नेतागण रस बरसा है अंबर से) तो ऐसे निकृष्ट संस्कृति विरोधी और इतिहास विरोधी समय में हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि भगतसिंह को याद करने अर्थ केवल एक समारोह अथवा प्रदर्शनप्रियता में तब्दील होकर न रह जाये। मैं मानता हूँ कि भगतसिंह को सेमिनारों और जेएनयू मार्का विश्‍वविद्यालयी चर्चाओं से बाहर निकाल कर उन्हें जनता के मध्य ले जाने की पहल करने का उपयुक्त समय भी यही है।

3. मेरा निवेदन है कि भगतसिंह को कृपया देवत्व न सौंपें और न उन्हें क्रान्‍ति‍ का आदिपुरुष बनायें। भगतसिंह कोई व्यक्ति नहीं थे, अपितु उनके व्यक्तित्व में संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास बोल रहा है। सत्तर साल लम्‍बे क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन ने भगतसिंह को पैदा किया। भगत सिंह उस आंदोलन को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने वाले एक व्यक्ति ही थे। वे स्वयं विकास की प्रक्रिया में थे। कल्पना करिए कि यदि भगतसिंह की जेल में लिखीं चार पुस्तकें गायब न हो गई होतीं तब उनके चिंतन और बौद्धिक क्षमताओं का कितना बड़ा आयाम हमारे सम्मुख प्रकट हुआ होता। दूसरे यह कि आगे चलकर भारतीय क्रान्‍ति‍ के मार्ग पर उन्हें और भी बौद्धिक ऊँचाई हासिल करनी थी। पर इस सबको लेकर उनके मन में कोई गर्वोक्ति नहीं थी,बल्कि एक विनीत भाव से उन्होंने स्वयं सुखदेव को संबोधित करते हुए कहा था कि क्या तुम यह समझते हो कि क्रान्‍ति‍ का यह उद्यम मैंने और तुमने किया है। यह तो होना ही था। हम और तुम सिर्फ समय और परिस्थितियों की उपज हैं। हम न होते तो इसे कोई दूसरा करता। और कितना आत्मतोष था उस व्यक्ति के भीतर जिसने बलिदान से पूर्व यह भी कहा कि आज मैं जेल की चहारदीवारी के भीतर बैठकर खेतों, खलिहानों और सड़कों से इंकलाब जिंदाबाद का नारा सुनता हूँ तो लगता है कि मुझे अपनी जिन्‍दगी की कीमत मिल गई। ….और फिर साढ़े तेईस साल की इस छोटी सी जिन्‍दगी का इससे बड़ा मोल हो भी क्या सकता था।


4. आवश्यक तौर पर देखा यह भी जाना चाहिए कि भगतसिंह के साथ पूरी क्रान्‍ति‍कारी पार्टी थी। हम पार्टी और संपूर्ण आंदोलन को क्यों विस्मृत कर जाते हैं। हम यह क्यों नहीं याद रखते कि भगत सिंह के साथ चन्द्रशेखर आजाद का सर्वाधिक क्षमतावान और शौर्यमय नेतृत्व था। क्या भारतीय क्रान्‍ति‍कारी आंदोलन का मस्तिष्क कहे जाने वाले कामरेड भगवतीचरण वोहरा पार्टी के कम महत्वपूर्ण व्यक्ति थे जिन्होंने बम का दर्शन जैसा तर्कपूर्ण और बौद्धिक प्रत्युत्तर देने वाला पर्चा ही नहीं लिखा, बल्कि नौजवान भारत सभा और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन के घोषणापत्र आदि उन्होंने लिपिबद्ध किये। हमने विजय कुमार सिन्हा, जिन्हें दल में अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी, को भी हमने भुलाने योग्य मान लिया। यह सच है कि हम विजय दा से भगतसिंह की एक फुललेन्थ की जीवनी की अपेक्षा कर रहे थे जो उनेक जीवित रहते पूरी नहीं हो पाई। पर मेरा यहाँ जोर देकर कहना यह है कि हमने बटुकेश्‍वर दत्त से लेकर सुशीला दीदी, धन्वंतरि, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य मास्टर रुद्रनारायण सिंह आदि सबको भुलाने देने में पूरी तरह निर्लज्जता का परिचय दिया। हमने इनमें से किसी की शताब्दी नहीं मनाई। यह सब स्वतंत्र भारत में जीवित रहे पर हमने इनमें से किसी क्रान्‍ति‍कारी की खैर खबर नहीं ली। क्या पूरी पार्टी और उसके सदस्यों के योगदान और अभियानों को विस्मृत करके अपनी समारोहप्रियताओं के चलते भगतसिंह को हम उस तरह का तो नहीं बना दे रहे हैं- उतना ऊँचा और विशाल, जिसकी तस्वीर को फिर अपने हाथों से छूना मुश्किल हो जाये हमारे लिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी आत्ममुग्धताओं में ही डूबे यह सब देख समझ ही न पा रहे हों। इससे भविष्य के क्रान्‍ति‍कारी संग्राम को बड़ा नुकसान होगा क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे।

5. भगतसिंह के स्मरण के साथ एक खतरा यह भी है कि पिछले कुछेक वर्षों से हम देख रहे हैं कि उन्हें पगड़ी पहनाने का षड्यन्त्र बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। पर पंजाब के उस क्रान्‍ति‍कारी नौजवान का सिर इतना बड़ा हो गया कि अब उस पर कोई पगड़ी नहीं पहनाई जा सकती है। हम वैसा भ्रम भले ही थोड़ी देर को अपने भीतर पाल लें। यद्यपि शताब्दी वर्ष पर तो यह खुलेआम बहुत बेशर्मी के साथ संपन्न हुआ। देखा जाये तो हुआ पहले भी था जब मैं पंजाब के मुख्यमंत्री श्री दरबारा सिंह के आमंत्राण पर 1982 में चण्डीगढ़ में उनसे मिलने आया तो देखा कि उनके कार्यालय में भगतसिंह का जो चित्र लगा है उसमें उन्हें पगड़ी पहनाई गई है। अब विडंबना देखिए कि कोई आज उस पगड़ी को केसरिया रंग रहा है तो कोई लाल। इसमें आरएसएस से लेकर हमारे प्रगतिशील मित्र तक किसी तरह पीछे नहीं हैं। एक सर्वथा धर्मनिरपेक्ष क्रान्‍ति‍कारी शहीद को धर्म के खाँचे में फिट किये जाने की कोशिशों से सवधान रहना चाहिए। यहाँ अपनी बात कहने का हमारा अर्थ यह भी है कि सब भगतसिंह को अपने अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहे हैं। कोई कहता हे कि वे जिन्‍दा होते तो नक्सलवादी होते। उनके परिवार के ही एक सदस्य पिछले दिनों उन्हें आस्तिक साबित करने की असफल कोशिशें करते रहे। यह कह कर कि भगतसिंह की जेल नोटबुक में किसी के दो शेर लिखे हुए हैं जिनमें परवरदिगार जैसे शब्द आए हैं जो उनकी आस्तिकता को प्रमाणित करते हैं। सर्वाधिक तर्कहीन ऐसे वक्तव्यों की हमें निंदा ही नहीं, अपितु इसका विरोध करना चाहिए। यादविन्दर जी को भगतसिंह का लिखा ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा आलेख आँखें खोल कर पढ़ लेना चाहिए। मैं यहाँ निसंकोच यह भी बताना चाहता हूँ कि दूसरे राजनीतिक दल भी बहुत निर्लज्ज तरीके से इस शहीद के हाथों में अपनी पार्टी का झण्‍डा पकड़ाने का काम करते रहे जो कामयाब नहीं हुआ। धार्मिक कट्टरता और पुनरुत्थानवाद के इस युग में भगत सिंह की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पैरोकारी की हम सबसे अधिक जरूरत महसूस करते हैं। लेकिन ऐसे में जब गाँधी और जिन्ना को भी डंके की चोट पर धर्मनिरपेक्ष बताया जा रहा हो, और भाजपा के अलंबरदार स्वयं को खालिस और दूसरों को छद्म धर्मनिरपेक्ष बताते हों तब वास्तविक धर्मनिरपेक्षता जो नास्तिकता के बिना सम्‍भव नहीं है, उसका झण्‍डा कौन उठाए? यह साफ तौर पर मान लिया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्मसमभाव कतई नहीं है जैसा कि हम बार-बार, अनेक बार प्रचारित करते और कहते हैं। यह हमारा सर्वथा बेईमानी भरा चिंतन है जिसका पर्दाफाश किया जाना चाहिए। विचार यह भी किया जाना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता आखिर कितनी तरह की? रघुपति राघव राजाराम जपने वाले गाँधी भी धर्म निरपेक्ष थे, मजहब के नाम पर मुस्लिम होमलैंड ले लेने वाले जिन्ना भी धर्मनिरपेक्ष थे और भगतसिंह भी। तब इनमें से कौन सही धर्मनिरपेक्ष है, और धर्मनिरपेक्षता आखिर है क्या बला?


6. इधर भगतसिंह को संसद का पक्षधर साबित करने के भी प्रयत्न हुए और हो रहे हैं। संसद में भगतसिंह का चित्र या मूर्ति लगवाने का क्या अर्थ है। जिस संसदीय चरित्र और उसकी कार्यवाहियों के विरोध में उन्होंने, दल के निर्णय के अनुसार पर्चा और बम फेंका, क्या आज उस संसद और उसके प्रतिनिधियों की चाल-ढाल और आचरण बदल कर लोकोन्मुखी और जनपक्षधर हो गया है। यदि नहीं तो क्यों भगतसिंह पर काम करने वाले उन पर पुस्तकें जारी करवाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री की चिरौरी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। क्या हम वर्तमान संसदीय व्यवस्था के पैरोकार या पक्षधर होकर भगतसिंह को याद कर सकते हैं। आखिर क्यों भगतसिंह की शहादत के 52 वर्षों बाद उनकी बहन अमर कौर को भारत की वर्तमान संसद के चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली पर उँगली उठाते हुए वहाँ घुसकर पर्चे फेंकने पड़े, जिसमें उठाए सवालों पर हमें गौर करना चाहिए। पर इस मुक्त देश में पसरा ठंडापन देखिए कि किसी ने भी 8 अप्रैल 1983 को अमर कौर की आवाज में आवाज मिलाकर एक बार भी इंकलाब जिंदाबाद बुलंद नहीं किया, जबकि यह दर्ज रहेगा कि इसी गुलाम देश ने तब भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के स्वर में अपना स्वर बखूबी मिला दिया। जानने योग्य यह भी है कि पिछले दिनों संसद में भगतसिंह की जो प्रतिमा लगी उसमें वे पगड़ी पहने हुए हैं और वहाँ उनके साथ बम फेंकने वाले उनके अभिन्न बटुकेश्‍वर दत्त नदारद हैं।

7. जरूरी है कि भगतसिंह को याद करने और उनकी पूजा या पूजा के नाटक में हम फर्क करें। आज सारे जनवादी और प्रगतिशील राजनीतिक व सांस्कृतिक सामाजिक संगठन भगतसिंह को याद कर रहे हैं। दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी भी। यह चीजों को घालमेल करने की घिनौनी कोशिशें हैं ताकि असली भगतसिंह अपनी पहचान के साथ ही अपना क्रान्‍ति‍कारित्व भी खो बैठें। आखिर क्या कारण है कि भगतसिंह आज तक किसी राजनीतिक पार्टी के नायक नहीं बन पाए। यह सवाल बड़ा है कि आजाद की शहादत के बाद हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ को पुनर्जीवित करने के कितने और कैसे प्रयास हुए और वे कामयाब नहीं हुए तो क्यों? और क्यों आजादी के बाद कोई राजनीतिक दल हिसप्रस का झण्‍डा पकड़ने का साहस नहीं कर सका?

8. विचार यह करिए कि अब भावी इंकलाब का आधार क्या होगा। आजाद के नेतृत्व में भगतसिंह और दूसरे सारे युवा क्रान्‍ति‍कारी अधिकांशतः मध्यवर्ग से आए थे। आज पूँजीवादी व्यवस्था और बाजार के अनापशनाप विस्तार ने मध्यवर्ग को नागरिक से उपभोक्ता में तब्दील कर दिया है। नई पीढ़ी पूरी तरह कैरियर में डूबी है। उसके सपनों में अब देश और समाज नहीं है। वहाँ नितांत लिजलिजे व्यक्तिगत सपनों की कंटीली झाडि़याँ उग आई हैं। समाज टूट रहा है तो सामाजिक चिंताएं कहाँ जन्मेंगी। निम्न वर्ग जिन्‍दगी जीने की कशमकश में डूबा रह कर दो जून की रोटी मुहैया नहीं कर पा रहा है तो दूसरी ओर उच्च वर्ग क्रान्‍ति‍ क्यों चाहेगा? क्या अपने विरुद्ध? ऐसा तो सम्‍भव ही नहीं है। तब फिर क्रान्‍ति‍ का पौधा कहाँ पनपेगा और उसे कौन खाद-पानी देगा। यह बड़ा सवाल हमारे सामने मुँह बाये खड़ा हुआ है और हम हवा में मंचों पर क्रान्‍ति‍ की तलवारें भाँज रहे हैं। हम जो थोड़ा बहुत क्रान्‍ति‍ के नाम पर कुछ करने की गलतफहमियाँ पाल रहे हैं, क्या वह हमारा वास्तविक क्रान्‍ति‍कारी उद्यम है। कौन जानता है हमें। जिनके लिए क्रान्‍ति‍ करने का दावा हम करते रहे हैं, वे भी हमसे सर्वथा अपरिचित हैं। आप जेएनयू के किसी एअरकंडीशंड कमरे में तीसरी मंजिल पर बैठकर तेरह लोग क्रान्‍ति‍ की लफ्फाजी करेंगे तो देश की जनता आपको क्यों पहचानेगी। याद रखिए कि जेएनयू देश नहीं है। पूछिए इस मुल्क के लोगों से छोटे शहरों, कस्बों, देहातों में जाकर अथवा सड़क पर चलते किसी आम आदमी को थोड़ा रोककर इन बौद्धिक विमर्श करने वाले लोगों के बारे में पूछिए तो वह मुँह बिचकाएँगे। वे तो इनमें से किसी को भी जानते बूझते नहीं। तो आप कर लीजिए क्रान्‍ति‍। इस देश की साधारण जनता आपसे परिचित नहीं है। न आप उसके साथ खड़े हैं, न ही वह आपके साथ। ऐसे में क्या आप जनता के बिना क्रान्‍ति‍ करेंगे? लगता है कि इस देश में अब थोड़े से हवा हवाई लोग ही क्रान्‍ति‍ की कार्यवाही को संपन्न करने का ऐतिहासिक दायित्व पूरा कर लेंगे। जनता अब उनके लिए गैरजरूरी चीज बन गई है।

9. आज भाषा का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा है। यह आजादी के सवाल से गहरे तक जुड़ा हुआ है। अपनी भाषा के बिना आप आजादी की कल्पना नहीं कर सकते। पर आज सब ओर गुलामी की भाषा सिर माथे और उसकी बुलंद जयजयकार। भाषा का मामला सिर्फ भाषा का नहीं होता, वह संस्कृति का भी होता है। भगतसिंह ने यों ही भाषा और लिपि की समस्या से रूबरू होते हुए अपनी भाषाओं की वकालत नहीं की थी। क्या हम अंग्रेजी के बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते? भाषा आज सबसे अहम मुद्दा है। हम उस ओर से आँखें न मूंदें और न ही उसे दरकिनार करें। भाषा के बिना राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता।


10. अब तीन अन्य गौर करने वाली बातों पर हम अपना पक्ष और चिंताएं प्रकट करेंगे। वह यह कि आज भी ईमानदारी से भगतसिंह को याद करने वालों को वर्तमान सत्ता और व्यवस्था उसी तरह तंग और प्रताडि़त करती है, जिस तरह साम्राज्यवादी हुकूमत किया करती थी। शंकर शैलेंद्र का ‘भगतसिंह से’ गीत गाने पर संस्कृतिकर्मियों पर यह कह कर प्रहार किया जाता है कि यह गीत 1948 में सरकार ने यह कह कर जब्त किया था कि यह लोकप्रिय चुनी हुई सरकार के विरुद्ध जनता के मन में घृणा पैदा करता है। मैं स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्‍या शंकर शैलेंद्र के इस गीत पर से 1948 के बाद से अभी तक सरकारी पाबंदी हटी है अथवा नहीं। यदि ऐसा हुआ है तो कब? दूसरा यह कि कई वर्ष पहले पाकिस्तान की फौज हुसैनीवाला से भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के स्मारकों को तोड़कर ले गई। हमने क्यों नहीं अब तक उन स्मारकों की वापसी की मांग पाकिस्तान सरकार से की। क्या वह हमारा राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। और तीसरा विन्दु यह है कि कुछ वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महोत्सव हुआ था, मेला लगा था। यह तब की बात है जब भगतसिंह पर एक साथ कई-कई फिल्में आई थीं यानी हमारे बॉलीवुड को भी क्रान्‍ति‍ करने का शौक चर्राया था। बाजार और बॉलीवुड में यदि भगतसिंह को बेचा जा सकता है तो इसमें हर्ज क्या है। बाजार हर चीज से मुनाफा कमाना चाहता है। पर मैं यहाँ फिल्मों में भगतसिंह को बेचने की बात नहीं कर रहा, न ही इस बात पर चिन्‍ता प्रकट कर रहा हूँ कि उन्होंने तुडुक तुडुक और बल्ले बल्ले करके भगतसिंह जैसे क्रान्‍ति‍कारी नायक को पर्दे पर नाचना दिखा दिया। मैं यहाँ बात कुछ दूसरी कहना चाहता हूँ। लखनऊ के उस मेले में एक रेस्त्रां बनाया गया था जिसका दरवाजा लाहौर जेल की तरह निर्मित किया गया। उसमें बैरों को वह ड्रेस पहनाई गई थी जिसे जेल के भीतर भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पहना था। पानी जो वहाँ परोसा जा रहा था उसे काला पानी का नाम दिया गया था और घिनौनापन देखिए कि खाने के नाम पर स्वराज्य चिकन और काकोरी कबाब। यह हद से गुजर जाना है। लखनऊ एक प्रदेश की राजधानी है–सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक दलों का केंद्रीय स्थान। पर सब कुछ कई दिनों तक उस जगह ठीक ठाक चलता रहा। कोई हलचल नहीं। कोई विरोध नहीं। क्या हम वास्तव में मर चुके हैं, क्या हमारे भीतर कोई राष्ट्रीय चेतना शेष नहीं है। क्या हमें अपने राष्ट्रीय नायकों और शहीदों का अपमान कतई विचलित नहीं करता। क्या इतिहास के सवाल हमारे लिए इतने बेमानी हो गए हैं कि वे हमारे भीतर कोई उद्वेलन पैदा नहीं करते। कुछ लोग थोड़े वर्षों से तीसरा स्वाधीनता आंदोलन नाम से एक संगठन चला रहे हैं। शहीदेआजम भगतसिंह के दस्तावेजों को सामने लाने लाने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम करने वाले प्रो. जगमोहन सिंह जी भी उससे जुड़े हैं। पर इस संगठन के चिंतन के प्राथमिक बिन्‍दु पर गौर करिए कि आंदोलन चलाने से पहले ही उसने घोषित कर दिया कि इंडिया गेट को ध्वस्त कर वहाँ शहीदों की बड़ी मीनार बनाना है। क्या यही इस देश का तीसरा स्वतंत्राता युद्ध होगा। कल तक हम अपने बीच बचे रहे जिन्‍दा शहीदों को कोई सम्मान और आदर नहीं दे पाए, उनकी ओर आँख उठाकर भी हमने देखा नहीं, उन्हें ठंडी और गुमनाम मौत मर जाने दिया पर आज उनके ईंट पत्थर के बुत खड़े करने में हमारी गहरी दिलचस्पी है। भगतसिंह को याद करने वाले संगठन कितनी गलतफहमियों में जी रहे हैं यह देखने के लिये आँखों को ज्यादा फैलाने की आवश्यकता नहीं है। क्या यह भी गौर करने लायक सच्चाई और त्रासदी नहीं है कि वामपंथी और साम्यवादी आंदोलन ही नहीं भगतसिंह के अनुयायी कहे जाने वाले लोगों और संस्थाओं ने भी सैद्धांतिक मीनमेख और थोड़े विमर्शों में स्वयं को अधिक उलझा लिया है। उनके बीच निर्लज्ज किस्म की संकीणताएं भी विद्यमान हैं। भगतसिंह का नाम स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए लिया जाना कतई ठीक नहीं।

(समकालीन तीसरी दुनि‍या/मार्च 2012 से साभार)