20 फ़रवरी 2017

चुनावतंत्र में लोकतंत्र की खोज



(मूल रूप से दैनिक जागरण में प्रकाशित)
बहुत कम बरस ही बीते हैं कि हमने लोगों के द्वारा चुनी सरकारों को वैधता दी है. हमारे इतने लंबे इतिहास में सत्तर साल ज़्यादा नहीं होते. इसके पहले ईश्वर प्रदत्त मानी जाने वाली परिवारवादी राजशाहियों का इतिहास काफी लंबा रहा है. धीरे-धीरे वे खत्म हुए और अब कहीं भी बचे. राजशाही ख़त्म होने से पहले लोगों के ज़ेहन से वह मूल्य गया जिसमे यह माना जाता था कि राजा ईश्वर का दूत है. उसकी जगह नया मूल्य लोकतंत्र बना. लोगों का चुनाव ही सर्वोपरि माना जाने लगा. अब कम--बेस पूरी दुनिया ने इसे अपना लिया है. चुनाव की व्यवस्था लोकतंत्र की व्यवस्था हो गयी है. जबकि मूल्य के बतौर लोकतंत्र हम अपने समाज में आज भी नहीं स्थापित कर पाए हैं. भारत में लोकतंत्र का आना सामाजिक संघर्षों, आंदोलनों और क्रांतियों के तहत नहीं हुआ. बल्कि यह सत्ताहस्तांतरण के क्रम में अपना लिया गया. ऐसी कई व्यवस्थाएं अपना ली गई जो सामाजिक मांग से पैदा नहीं हुई थी. इसलिए समाज की मानसिकता सामंती रही और केवल व्यवस्था का ढांचा बदल गया. जब भी चुनाव का वक्त आता है लोकतंत्र के उत्सव के तौर पर इसे पेश किया जाता है. लोगों में यह भावना भर दी गई है कि वोट करना उनका अधिकार है. जनता सर्वोपरि है और जनता सत्ता को बदल सकती है. पिछले कुछ वर्षों में हम यह देख सकते हैं कि कांग्रेस जैसी पार्टी का एकाधिकार खत्म हुआ है. स्थानीय स्तर पर अन्य पार्टियां भी सक्रिय हुई हैं और उन्हें जीत भी हासिल हुई है. पर लोगों का मत और मताधिकार लोकतंत्र को तब तक मजबूत नहीं करता जबतक उनकी अपनी चेतना विकसित हो. उनका अपना कोई मत या विचार बने. समाज में हर व्यक्ति के भीतर लोकतांत्रिक चेतना को विकसित किए बगैर हम लोगों से उनके मत और विचार देने की अपेक्षा नहीं कर सकते. भारत जैसी सघन आबादी वाले देश में लोगों के द्वारा अपना नेता चुना जाना एक मुश्किल काम है. कई लाख की आबादी से तीन या चार की संख्या में कोई उठता है और लोगों को उनमे से किसी एक को चुन लेना होता है. उनमे से बहुत कम लोग अपने द्वारा चुने जाने वाले नेता को ठीक-ठीक जान रहे होते हैं. ऐसे में उनके मत देने का आधार यह नहीं होता कि वह उनका प्रतिनिधि है और वे एक दूसरे से परिचित हैं. वे अपने नेता को भलिभांति पहचान रहे होते हैं. बल्कि उसके आधार बहुत अलग होते गए हैं. ऐसे में भले ही मतदान के प्रतिशत बढ जाएं पर लोकतंत्र अपने सही मायने में कमजोर होता गया है. लोग जिसे वोट करते हैं वह उसकी शोहरत के कारण उससे वाकिफ होते हैं. तो शोहरत वह चीज होती है जो मत के निर्धारण में सहायक होती है. जबकि शोहरत मिलने और शोहरत पाने के बहुत से कारण हो सकते हैं. अपराध और पैसा शोहरत के लिए एक जरूरी चीज बन गया है. आपराधिक प्रवृत्ति भले ही बदनामी की शोहरत देती हो. जबकि ज्यादातर लोग अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति के खिलाफ होते हैं बावजूद इसके आपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं का लोगों के द्वारा चुनकर आना लगातार बढ़ा है. तो किसी भी तरह की शोहरत समाज में एक नायक खड़ा कर देती है. इस शोहरत को बढ़ाने के लिए यह जरूरी होता है कि एक बड़ा प्रचारतंत्र खड़ा किया जाए. जिसके पास जितना बड़ा प्रचारतंत्र होगा उसे उतनी ज़्यादा शोहरत हासिल होगी और वह उतने बड़े नेता के तौर पर उभर कर अएगा. ऐसे में लोगों के पास चुनने के विकल्प के तौर पर वही लोग मिलते हैं जिनके पास शोहरत और पैसा होता है. क्योंकि लोग उन्हीं को जान पाते हैं और पार्टियां उन्हें अपना समर्थन देती हैं. लिहाजा यह सैद्धांतिक बात ही बनकर रह जाती है कि लोकतंत्र में कोई भी चुनाव लड़ सकता है और लोग किसी को भी चुन सकते हैं. व्यवहारिकता में अमीरियत और शोहरत वाले तीन या चार लोगों में से जनता को किसी को चुनना होता है. लोगों के पास यह बहुत छोटा विकल्प होता है. लोगों के मत का निर्धारण यहां इसी आधार पर होता है. आबादी और इलाके इतने बड़े होते हैं कि लोगों की पहुंच अपने नेताओं से नहीं हो पाती बल्कि नेताओं के अपने गिरोह होते हैं जो उनके प्रचारतंत्र को स्थानीय स्तर पर मजबूत बनाते हैं. यह नेताओं द्वारा अघोषित चुना गया प्रतिनिधि मंडल है जो जमीन पर उसकी साख को बनाने और मजबूत करने का काम करता है. लिहाजा इतना बड़ा इलाका होना और लोगों के साथ उनके संपर्क होना एक दुरूह सी चीज हो जाती है. जिसे लोग शिकायत के तौर पर इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उनका नेता चुनाव के बाद नहीं दिखाई पड़ता.

दूसरी बात समाज के हर व्यक्ति में लोकतांत्रिक मूल्य विकसित होने की है. जिस समाज में मूल्य के तौर पर लोकतंत्र बन पाया हो वहां राज्य के तौर पर लोकतंत्र का बन पाना एक मुश्किल काम है. परिवार और गांव की छोटी इकाई के स्तर पर इसे बेहतर रूप में देखा जा सकता है. निर्णय लेने की आज़ादी, व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं, अपने जीवन के हक़ हमारे समाज में नहीं बन पाए हैं. परिवार का मुखिया परिवार के सभी निर्णयों को निर्धारित करता है. औरतों के निर्णय भी वहीं से तय होते हैं. औरतों की आधी आबादी का मत उनके घर के मुखिया का मत होता है. जबकि घर के मुखिया का मत निर्धारण किन्हीं अन्य वर्चस्वों के आधार पर होता है. गांव में विचारों का निर्धारण जातिगत या इसी तरह के वर्चस्वों के आधार पर होता है. ऐसे में लोग जिनके मातहत होते हैं उनका मत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में मताधिकार का मायने वर्चस्व के मताधिकार है. लोगों का यह आत्मनिर्णय नहीं होता बल्कि यह वर्चस्व के निर्णयों का मतदान बन जाता है. यानि जब समाज में और परिवार में लोकतंत्र और उसके मूल्य नहीं होंगे तो राज्य के चुनाव प्रक्रिया या व्यवस्था निर्धारण में इसका होना असंभव होगा. एक बड़े पैमाने पर औरतों को जिनकी आबादी आधी आबादी के बराबर हैं इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सच में हिस्सा बनाना और उनके मत का निर्धारण उनकी अपनी चेतना और विचार के आधार पर होना तभी संभव है जब उनके भीतर लोकतंत्र और बराबरी के मूल्य विकसित हो पाएं. जब लोकतंत्र में जनता द्वारा जनता के साशन की बात कही गयी थी तो वह एक पुराना दौर था जब बहुत सी चीजों की मौजूदगी नहीं थी. लोगों का एकमत बनने का जो प्रस्ताव रहा होगा शायद उसके मूल में उनकी चेतना रही होगी. तब हमारे प्रचारतंत्र के दायरे कम होते थे और अपने इर्दगिर्द की चीजों पर सोचना और उसे समझना और उसके अनुसार मत करने को ही जनमत के तौर पर देखा गया होगा. पर अब जबकि मीडिया आपके मत को तय कर रहा है तो क्या जो चुनाव या पार्टी या नेताओं को लेकर लोगों तक जानकारी पहुंच रही है वह हमारे नजदीकी सरोकारों से जुड़ी हुई है. इसलिए चुनाव और मत तैयार करना अब मीडिया का काम हो गया. वह हमारी चेतना और हमारे इर्दगिर्द से नहीं बन रहा है. बल्कि वह बन रहा है पड़ोसी मुल्क पर हमले करने और आतंकवाद और साम्प्रदायिकता, मिशाइल और देशभक्ति को खड़े करने और फिर उस पर एक राय बनाने से. इसलिए जो पुरानी अवधारणा जनमत से लोकतंत्र की थी वह टूटती हुई दिखती है. क्योंकि जनमत को बनाने के टूल बदल गए हैं और जिनके पास धन का बल है वे जनमत तैयार कर सकते हैं.

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन भवानी प्रसाद मिश्र और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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