07 नवंबर 2011

प्रेस की आज़ादी की अवश्य पड़ताल होनी चाहिए


जस्टिस मार्कंडेय काटजू

भाग-दो

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि इस संक्रमण काल में हमारी जनता को आधुनिक, वैज्ञानिक युग की ओर अग्रसर करने में मीडिया को सहायक की भूमिका अदा करनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए मीडिया को तार्किक और वैज्ञानिक विचारों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए, लेकिन ऐसा करने के बजाय हमारी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न तरह के अंध-विश्वासों को परोसता रहता है।

यह सच्चाई है कि बहुतायत भारतीयों का बौद्धिक स्तर बहुत कम है— वे जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंध-विश्वासों में जकड़े हुए हैं। हालांकि सवाल यह है: तार्किक और वैज्ञानिक विचारों के प्रचार-प्रसार के जरिये मीडिया को हमारे लोगों के बौद्धिक स्तर को उन्नत करना चाहिए, या इसे कमजर्फ़ स्तरों पर लुढ़कते हुए इसे क़ायम रखना चाहिए?

यूरोप में, पुनर्जागरण के युग में, मीडिया (जो कि उस वक़्त सिर्फ़ प्रिंट मीडिया ही था) ने लोगों के मानसिक स्तरों में इज़ाफ़ा किया, उसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा तार्किक चिंतन का प्रचार प्रसार करते हुए लोगों की मानसिकता में बदलाव लाए। वॉल्तेयर ने अंध-विश्वास पर आक्रमण किए और डिकेंस ने जेल, स्कूलों, अनाथालयों, अदालतों आदि की भयानक दशाओं की आलोचनाएं की। हमारी मीडिया को भी क्या यही सब नहीं करना चाहिए?

एक समय में, राजा राम मोहन रॉय जैसे साहसी लोगों ने अपने अख़बारों मिरातुल अख़बार और संबाद कौमुदी में सती-प्रथा, बाल-विवाह और पर्दा-प्रथा के ख़िलाफ़ आलेख लिखे। निखिल चक्रवर्ती ने 1943 के बंगाल अकाल की भयावहता के बारे में लिखा। प्रेमचंद और शरत्‍चंद्र चट्टोपाध्याय ने सामंती रिवाज़ों और महिलाओं के उत्पीड़न के बारे में लिखा। सादत हसन मंटों ने विभाजन के ख़ौफ़ के बारे में लिखा।

लेकिन आज की मीडिया में हमें क्या दिखता है?

कई चैनल नक्षत्र-शास्त्र पर आधारित कार्यक्रम दिखाते हैं। नक्षत्र-शास्त्र को खगोल-विज्ञान से गड्‍डमगड्‍ड नहीं किया जाना चाहिए। खगोल-विज्ञान एक विज्ञान है, जबकि नक्षत्र-शास्त्र पूरी तरह अंध-विश्वास और गोरखधंधा है। यहाँ तक कि एक सामान्य विवेक भी हमें यह बता सकता है कि तारों और ग्रहों की परिक्रमा और किसी आदमी के 50 या 80 साल में मरने, या किसी के इंजीनियर या डॉक्टर या वकील बनने के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे देश में अधिकांश लोग नक्षत्र-शास्त्र को मानते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए क्योंकि उनका मानसिक स्तर कमतर है। इस मानसिक स्तर में लोट-पोट होने और इसको जारी रखने के बजाए मीडिया को इसको उन्नत करने की कोशिश करनी चाहिए।

कई चैनल दिखाते हैं कि ज़िक्र करते हैं और दिखाते हैं कि कोई हिंदू देवता कहां पैदा हुए थे, कहाँ कहाँ वे रहे, वग़ैरह वग़ैरह। क्या यह अंध-विश्वास को फैलाना नहीं है?

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि समूची मीडिया में कोई अच्छा पत्रकार नहीं है। कई बेहतरीन पत्रकार हैं। पी. साईनाथ एक ऐसे ही नाम हैं जिनका नाम भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो कई राज्यों में किसान आत्महत्याओं के मामलों को उजागर करने की कहानी (जिसे कई सालों तक दबाया गया) कभी कही ही नहीं जाती। लेकिन ऐसे अच्छे पत्रकार अपवाद हैं। बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जो जन-हितों पर खरा उतरने की कोई चाहत नहीं रखते।

मीडिया के इन दोषों को दूर करने के लिए मुझे दो चीज़ें करनी हैं। पहला, मेरा प्रस्ताव है कि प्रत्येक दो माह या अन्य किसी निश्चित अंतरल में मीडिया के साथ (इलेक्टॉनिक मीडिया सहित) नियमित बैठकें हों। ये बैठकें समूची प्रेस कौंसिल की होने वाली नियमित बैठकें नहीं होंगी, लेकिन अनौपचारिक मेल-जोल होगा जहाँ हम मीडिया से संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श करेंगे और उनका लोकतांत्रिक तरीक़े से, अर्थात बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करेंगे। मेरा यक़ीन है कि 90 फ़ीसदी समस्याएँ इन तरीक़ों से सुलझाई जा सकती हैं। दूसरा, एक हद के बाद, जहाँ मीडिया का एक हिस्सा उपरोक्त सुझाए गए लोकतांत्रिक प्रयासों के बावजूद इन्हें अनुत्पादक साबित करने की हठ पर अड़ा हो, कठोर उपायों की ज़रूरत पड़ेगी। इस संबंध में, मैंने प्रधानमंत्री को प्रेस आयोग अधिनियम में संशोधन करने का आग्रह किया है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रेस कौंसिल (जिसका संशोधित नाम मीडिया आयोग हो सकता है) के दायरे में लाया जाए और इसे और शक्ति-संपन्न बनाया जाए — मिसाल के लिए, सरकारी विज्ञापन बंद करना, या किसी अतिरेक स्थित में, कुछ समय के लिए मीडिया हाउस के लायसेंस को निरस्त करना। जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है: “बिन भय होय न प्रीत।” यद्यपि, इसका इस्तेमाल सिर्फ़ बेहद, अतिरेक स्थितियों में और लोकतांत्रिक उपायों के असफल होने के बाद ही किया जाएगा।

यहाँ एक आपत्ति हो सकती है कि यह तो मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करना है। ऐसी कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती जो कि अमूर्त और परम हो। सभी स्वतंत्रताएँ तर्कसंगत सीमा का विषय होती हैं, और इसमें ज़िम्मेदारी भी निहित होती है। एक लोकतंत्र में, हर कोई जनता के प्रति उत्तरदाई है, और इसीलिए हमारा मीडिया भी है।

निष्कर्षतः, भारतीय मीडिया को अब आत्म-चिंतन, एक उत्तदायित्व की समझ और परिपक्वता विकसित करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं हैं कि इसे सुधारा नहीं जा सकता। मेरी मान्यता है कि गड़बड़ी करने वालों में 80 फ़ीसदी एक धैर्यपूर्ण बातचीत के ज़रिए, उनकी ग़लतियों को इंगित करके अच्छे लोग बनाए जा सकते हैं और धीरे धीरे उन्हें उस सम्मानजनक रास्ते की ओर अग्रसर किया जा सकता है जिस पर यूरोप का मीडिया नवजागरण काल में चल रहा था।

अनुवाद -- अनिल मिश्र

(अनुवादक, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में ’शांति प्रक्रिया और भारत-पाकिस्तान की मीडिया’ पर शोध कर रहे हैं।)

इंडियन एक्सप्रेस में 05 नवंबर 2011 को प्रकाशित

1 टिप्पणी:

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