23 अगस्त 2011

“मेरा पूरा जीवन ही भहरा गया, ऐसी स्थिति में बुरके की परवाह कौन करेगा”.

(अभी-अभी जम्मू कश्मीर में राज्य मानवाधिकार आयोग ने 38 जगहों पर पाए गए 2000 से ज्यादा गैर-चिह्नित कब्रों के जांच का आदेश दिया है. पुलिस और सैन्य बलों का दावा है कि इनमें से अधिकांश कब्र सीमापार के ऐसे आतंकवादियों के हैं जिनकी पहचान संभव नहीं हो पाई. लगभग 600 कब्रों पर स्थानीय लोगों ने दावा किया है कि वे उनके परिजनों के हैं. जम्मू कश्मीर में लोग गायब होते हैं और ऐसे ही किसी कब्र का हिस्सा बन जाते हैं. अज्ञात आतंकवादी के ठप्पे के साथ. गायब होने के राजनीतिक पहलू पर प्रकाश डालता परवीना अहंगर का यह साक्षात्कार आपसे साझा कर रहा हूँ.)
कश्मीर की स्थितियों पर ’ग़ायब लोगों के माता-पिताओं का संघ’, जम्मू और कश्मीर, की संस्थापक और अध्यक्ष परवीना अहंगर का एक साक्षात्कार
[ग़ायब लोगों के माता-पिताओं का संघ (एसोसिएशन ऑफ पैरेंट्स ऑफ़ डिसएपियर्ड पर्संस: एपीडीपी) जम्मू और कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा ’ग़ायब’ किए गए लोगों के संबंधियों का संगठन है. ग़ायब हुए लोगों की स्थिति के बारे में पता लगाने और उन्हें न्याय दिलाने के उद्देश्य से 1994 में इस संस्था का गठन हुआ. इसके गठन में परवीना अहंगर की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी. 1991 में परवीना के बेटे जावेद अहंगर को भारतीय सैन्य बलों ने उठा लिया था जिसके बाद से अब तक उसकी कोई ख़बर नहीं है. सैन्य बलों ने अपने तलाशी-और-घेरेबंदी अभियान में उसे उसके चाचा के घर से उठा लिया था, जहां वह रात में पढ़ाई कर रहा था. तड़के परवीना को यह ख़बर मिली कि उसके बेटे को एक वैन में सैनिक ले गए हैं.
यहीं से अपने बेटे को खोजने की उसकी लंबी और सतत लड़ाई की शुरुआत हुई; अथाह पीड़ा और व्यथा से भरी एक लड़ाई; एक लड़ाई जिसे वह साहस और धैर्य के साथ लगातार लड़ रही है: उस वेदना के बावज़ूद जब उसके 19 वर्षीय बेटे जावेद को उठा लिया गया था, जिसके बारे में वह कहती है कि वह जख्म अभी भी उतना ही ताजा है जितना उस ख़बर को पढ़ते वक़्त था. बर्बरता और दमन के बीच गहरे संकल्प के जरिए उसने अपने लिए रास्ता निकालना सीख लिया है. वह कहती है कि उसके बेटे के साथ ही उसका डर भी ग़ायब हो गया. अपने बेटे को खोजने के लिए वह थाना-दर-थाना, पूछ्ताछ-केंद्र-दर-पूछ्ताछ-केंद्र, कैंप-दर-कैंप, अस्पताल-दर-अस्पताल भटकी. वह अपने जैसे अन्य बहुत लोगों से मिली जो अपने-अपने लाडलों को खोज रहे थे.
1994 में परवीना ने श्रीनगर उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की. नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों की मदद से कई-कई याचिकाओं के दायर होने का सिलसिला चालू है. अधिक-से-अधिक ’ग़ायब’ लोगों के परिवारों के सदस्य एकजुट हुए, साथ-साथ न्यायालय गए, साथ-साथ प्रदर्शन किए. उन्हें पकड़ लिया गया, कारागार में रखा गया और यहां तक कि उन लोगों ने पुलिस फायरिंग भी झेली, लेकिन भारतीय राजसत्ता के बर्बर सैन्य बलों का उन लोगों ने साहस और एकजुटता के साथ डटकर मुकाबला किया. इस तरह एपीडीपी के समेकित संघर्ष और प्रयास से ’ग़ायब’ लोगों को खोज निकालने का आंदोलन शुरू हुआ, जो कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है.]
'कावो' की तरफ से करेन गैब्रियल और वसंता ने परवीना अहंगर से बातचीत की जब वह एक सभा को संबोधित करने दिल्ली आई हुई थीं. वार्तालाप के सार को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है:
कावो: क्या मौजूदा परिस्थितियों के चलते कश्मीरी महिलाएं इस आंदोलन में शामिल होने को मज़बूर हुईं या वे खुद इसके लिए प्रतिबद्ध हैं, अथवा इसलिए कि इस हद तक युवा मारे गए हैं, और गुम हुए हैं, या फिर उनके दिमाग में कश्मीर के आत्म-निर्णय का सवाल है?
परवीना अहंगर: नहीं, यह सिर्फ़ पुरूषों का आंदोलन नहीं है. यह हर व्यक्ति का आंदोलन है और हर कोई इसको समर्थन दे रहा है. लेकिन ऐसी कश्मीरी महिलाएं बड़ी तादाद में हैं जिन्होंने अपने बच्चे खोए हैं अथवा ’ग़ायब’ होते देखे हैं. मिसाल के तौर पर, एक महिला ने अपने गुमशुदा बच्चे की तलाश में राज्य के सभी कारागारों को छान लिया. इसलिए ऐसी स्थितियों ने उन्हें मज़बूर किया है. उन्हें अपने बेटों की तलाश करनी पड़ती है और उनसे संबंधित किसी भी समाचार के लिए संघर्ष करना पड़ता है, और यह उनकी मजबूरी है. लेकिन जहां तक आंदोलन को समर्थन देने का सवाल है, हर कोई इसके पक्ष में है और कश्मीर की महिलाएं कोई अपवाद नहीं हैं.
कावो: कश्मीर की महिलाओं पर भारतीय सैन्य जमावड़े का क्या असर पड़ा है, इस संबंध में आप कुछ विचार दे सकती हैं?
परवीना: महिलाओं ने काफी सहा है, और इसका एक लंबा इतिहास है. कोनन केशपुरा बलात्कार केस को लीजिए, जहां यौन हिंसा की शिकार को गहरा मानसिक आघात और सामाजिक दबाव झेलना पड़ा था, और कोई भी उससे शादी करने को तैयार नहीं था. पिछले साल भी शोपियां में बलात्कार और हत्या का मामला देखने को आया. किसी भी तरह से सही जांच नहीं हुआ और भारतीय सैन्य बलों द्वारा किए गए अत्याचार को कालीन के नीचे दबा दिया गया.
कावो: क्या मौजूदा सैन्य जमावड़े के संदर्भ में यह कहना सही होगा कि इसमें पुरूषों के मुकाबले महिलाओं को अलग तरीके से भुगतना पड़ रहा है?
परवीना: हां. महिलाएं ने अनेक तरीकों से भुगता है, और ठीक इसी तरह उनकी प्रतिक्रियाएं भी कई तरीकों से जाहिर हुई है. उन्होंने अपने बेटों को खोया है, अपने ग़ायब अथवा मृत पिताओं की वेदना से वे गुजरीं हैं. महिलाओं का एक और टुकड़ा है जो अर्ध-विधवा है, वे जो अपने ग़ायब पति के घर लौटने का इंतजार कर रही है. वे पीड़ित लोग हैं. ऐसे बच्चों की संख्या भी बड़ी तादाद में हैं जिन्होंने अपने जिंदा पिता का मुंह नहीं देखा, जिनके पिता भारतीय सैन्य बलों द्वारा पहले ही मार गिराए गए. जब उनसे पूछा जाता है कि, तुम्हारे पिता कौन है? वे अपने पिता को नहीं पहचान पाते. इसलिए, कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में स्मारक बनाए गए हैं ताकि ऐसे बच्चे कम-से-कम स्मारक को पहचान पाए कि उनके पिता कहां है. यहां तक ऐसी महिलाएं, जो सामान्य तरीके से अपना गुजर-बसर कर रही थी, अत्याचारों से पीड़ित होकर उन्हें भी बाहर निकलना पड़ा है. कई महिलाएं, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया, असहाय भटकी हैं क्योंकि उसके बाद कोई उनकी मदद करने वाला नहीं था. वे बाहर काम और रोजगार ढूंढने के लिए विवश हुईं है, जबकि किसी सामान्य स्थिति में ऐसा नहीं होना चाहिए.
कावो: आपके खयाल से, आज़ादी के संघर्ष ने महिलाओं की जीवन को किस तरह बदला है?
परवीना: बहुतेरे ऐसे लोग हैं जो कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं अथवा वे जो आज़ादी के संघर्ष को क़ायम रखने का दावा करते हैं. लेकिन व्यक्तिगत रूप से, मैंने खुद अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है. हमें यह जानने के लिए आज़ादी की ज़रूरत है कि उन दस लाख से अधिक कश्मीरियों के साथ क्या हुआ जो बिना किसी सुराग के वर्षों से ’ग़ायब’ हैं, ताकि हम उनका नसीब जान पाए और कम से कम उनको सही तरीके से दफ़ना सके और उन्हें आरामगाह में पहुंचा सके. निजी स्तर पर हमारे लिए, खास तौर से उनके लिए जो गुमशुदगी के मसले पर काम कर रहे हैं, आज़ादी के बड़े संघर्ष का हिस्सा होते हुए यह न्याय और अपने प्रियजनों को क्या हुआ है, इसको जानने का भी संघर्ष है.
कावो: 1990 की तुलना में हालिया समय के जन-प्रदर्शनों में महिलाओं की संख्या में क्या कोई वृद्धि हुई है? अगर ऐसा है तो यह क्या रेखांकित करता है?
परवीना: आज़ादी के आंदोलन का एकदम शुरुआत से ही महिलाएं अखंड हिस्सा रही है और किसी भी स्तर पर इसमें कोई बदलाव नहीं है. आपने गौर किया होगा कि पत्थर फेंकने के प्रतिरोध के चरम पर उस पत्थर फेंकने वाले समूह में महिलाओं की भी भागीदारी थी. विभिन्न तरीके के संघर्षों में महिलाएं सदैव मौजूद रही हैं.
कावो: यदि एक स्वतंत्र कश्मीर बनता है तो इसके निर्माण में क्या महिलाओं की कोई ख़ास भूमिका रहेगी?
परवीना: एक उदाहरण लेते हैं, शिक्षित होने के बाद कश्मीर की महिलाएं खामोश नहीं बैठेगी. आंदोलन में अपनी भूमिका को लेकर मैं जागरूक हूं और गुमशुदा व्यक्तियों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष चालू रखने की ज़रूरत से भी. मेरे घर में मेरे बीमार पति हैं जो दस ऑपरेशनों से गुजर चुके हैं. फिर भी, अपने सभी निजी व्यथाओं और पीड़ाओं के बावज़ूद, मैं एक विस्तृत कारण के लिए समर्पित हूं जिसे मैं भली-भांति समझती हूं और इसके लिए मैं हमेशा संघर्ष करूंगी.
कावो: क्या कश्मीर में मौजूदा सैन्य जमावड़ों और इसके साथ चलने वाली हिंसाओं, जिसके चलते हज़ारों कश्मीरी पुरूष ग़ायब हो चुके हैं, उसने महिलाओं पर बेतरह आर्थिक बोझ डाला है, और वे ऐसी स्थिति से कैसे निबटती हैं?
परवीना: लोग, ख़ासकर महिलाएं, जिनके परिजन ’ग़ायब’ हो चुके हैं, कई कठिनाईयों का सामना करते हैं. अपने संगठन की तरफ से ऐसी महिलाओं की हम किसी-किसी तरीके मदद करते हैं, और अपने तरफ से इसके लिए हम हरसंभव कोशिश करते हैं.
कावो: कश्मीर के समाज में शिक्षित महिलाएं कितने फीसदी हैं? मौजूदा राजनीतिक स्थिति ने शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच और अवसर को किस तरह प्रभावित किया है? क्या कश्मीर का आंदोलन महिलाओं तक शिक्षा की पहुंच को उपलब्ध कराने की ज़रूरत के प्रति जागरूक है?
परवीना: आज पूरी दुनिया शिक्षित और साक्षर है, लेकिन यदि आप मेरे बारे में पूछेंगी, तो मैं नहीं हूं. ज्ञान प्रकाश है. अगर मैंने पढ़ाई की होती तो आपके साथ बातचीत करने के लिए मुझे अनुवादक की ज़रूरत नहीं होती और अपना ई-मेल चेक करने के लिए किसी व्यक्ति की, और शायद मैं कुछ और योगदान देने में सक्षम होती.
कावो: भू-सुधार के बाद लैंगिक रूप से संपत्ति संबंध में क्या बदलाव आए? क्या संपत्ति का वे बारिस बन सकती हैं?
परवीना: हां, इस संबंध में कुछ दिक्कतें हैं. मैं इसे एक उदाहरण के जरिए कह सकती हूं. एक विवाहित महिला को उसके पति के ’गुमशुदा’ होने के बाद उसका घर छोड़ना पड़ा. उसके पास एक पांच साल का बच्चा था. उसे उसके माता-पिता के घर वापस जाने को मज़बूर किया गया, और हमारी संस्था ने उसे रोजगार दिलाने में मदद की. इसलिए समय-समय पर ऐसी समस्याएं उठती रहती हैं. हालांकि अपने माता-पिता की संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार है, और पुरूष के साथ वह भी संपत्ति का बारिस हो सकती है. यदि एक बेटे को संपत्ति का दस हिस्सा दिया जाता है तो एक बेटी को पांच हिस्सा. बेटी अपने ससुराल की संपत्ति की भी वारिस होती है, अपने पति की अथवा अपने बेटे की. लेकिन महिलाओं को मुश्किलात का सामना करना पड़ता है क्योंकि चीज़ें हमेशा ठीक-ठीक नहीं चलतीं. जब किसी महिला के पति मारे जाते हैं तो उसे दुबारा शादी करने में अक्सरहां दिक्कत झेलनी पड़ती है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति को ढूंढना बहुत मुश्किल होता है जो उसके पहले शादी से हुए बच्चों की जिम्मेदारी वहन करने को तैयार हो.
कावो: अक्सर ऐसा कहा जाता है कि कश्मीर में सैन्य संघर्ष के उदय के साथ ही महिलाओं पर खास तौर से प्रतिकूल इस्लामी प्रतिक्रियाएं हुई है, और इसके बाद से जीवन उनके लिए और अधिक रूढ़ हो गया है. क्या वाकई ऐसा है? अगर है तो महिलाएं इससे कैसे निबट रही है और क्या करने की ज़रूरत है?
परवीना: अगर आप मुझसे पूछे तो मैं बुरका पहनती हूं. लेकिन अपने बच्चे को खोने के बाद मैंने सारे जन-प्रदर्शनों और जुलूसों में शिरकत की है. मुझे कोर्ट, जेल और प्रताड़ना केंद्रों में जाना पड़ता था. मेरा पूरा जीवन की पलट गया, और ऐसी स्थिति में बुरके की परवाह कौन करेगा.
कावो: क्या आप समस्याओं के बारे में बता सकतीं हैं, यदि कोई हो तो, जिसे आपने अपने संघर्ष के दौरान एक महिला होने की वजह से महसूस किया?
परवीना: मेरे परिवार को बहुत झेलना पड़ा है. मेरे पति एक व्यवसाय करते थे लेकिन बीमार होने के बाद से अब वह काम नहीं कर सकते. मेरे कुछ बच्चे पढ़ाई पूरी नहीं कर सके. मेरी एक बेटी को दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मेरा एक बेटा मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का काम करता है. सो, निजी तौर पर मैंने बहुत झेला है.
कावो: अपनी आवाज़ को सुनाने और संगठित होने में आपका किस तरह की दिक्कतों से साबका होता है?
परवीना: व्यक्तिगत रूप से, अपने परिवार के प्रति मैं बहुत चिंतित हूं क्योंकि मेरे से उनकी बहुत उम्मीदें बंधीं हैं, मौजूदा स्थिति मेरे लिए एक आघात की तरह है. राज्य के प्राधिकार अथवा सरकार के प्रति न तो मेरे मन में बहुत सम्मान है और न ही मैं उनमें यकीन करती हूं अथवा किसी फ़ायदे के लिए उनसे संपर्क साधती हूं. 1994 के बाद से हमने यह तय किया कि हम उनके पास नहीं जाएंगे क्योंकि हमारी पीड़ाओं के लिए वे ही जिम्मेदार हैं. हम राजनीतिक दलों से भी संपर्क नहीं करते हैं. श्रीनगर में सहानुभूति रखने वाले प्रेस/मीडिया है जो हमारी मदद करते हैं.
कावो: क्या आपको लगता है कि समाज को सामान्य तौर पर तथा कश्मीर के समाज को खास तौर पर बदलने में और मौजूदा संघर्ष की प्रकृति को बदलने में महिलाओं की कोई विशेष भूमिका होनी चाहिए?
परवीना: एक मिसाल लीजिए कि जब महिलाएं प्रतिरोध करने बाहर निकलती है तो यह पुरूषों को भी सुरक्षा देता है. यदि अगली क़तार में महिलाएं होती हैं तो शक्ति का इस्तेमाल करने में सैन्य बल अधिक चौकस रहते हैं. अगर आगे-आगे लड़के रहे तो उसे आसानी से पुलिस पकड़ लेगी. इसलिए कश्मीर की महिलाएं इस भूमिका में हैं. जब किसी को पकड़ा जाता है तो वे इसका विरोध करती है और उनकी खोज में जेल जाती हैं.
कावो: कश्मीर के संघर्ष में महिलाओं की विशाल भागीदारी से क्या कश्मीर की आज़ादी के नज़रिए में कुछ बदलाव आएगा?
परवीना: महिलाओं की विशाल भागीदारी आंदोलन के लिए यकीनन बेहतर होगा, क्योंकि निजी तौर पर महिलाओं ने अधिक सहा है. पुरूषों के मुकाबले अपने बच्चों से वे अधिक जुड़ी होतीं हैं; वे अजन्में बच्चे को अपने गर्भ में नौ महीनों तक पालती है और उनको जन्म देतीं हैं. अपने बच्चों के प्रति महिलाएं अधिक सहृदय होती हैं और भावुक तौर पर उनसे अधिक जुड़ी होतीं हैं. यदि एक महिला के बेटे को गोली से उड़ाया जाता है या उसे ’गायब’ किया जाता है, तो वह बहुत ज़्यादा क्षति महसूस करती है. इसलिए मेरे सहित, कश्मीर की महिलाएं बेहतर समाज के लिए संघर्ष करती रहेंगी.
कावो: ऐसी अशांत स्थिति में शांति स्थापना के लिए महिलाओं के बारे में आपके क्या ख़याल हैं?
परवीना: कश्मीर में आज कोई शांति नहीं है, और शांति की इन लंबी बातचीतों के बावज़ूद यह कहीं मौजूद नहीं हैं. जब आधारभूत मसलों को हल किया जाएगा सिर्फ़ तभी जा कर कुछ शांति आ पाएगी और तभी मामला का भी निबटारा हो पाएगा, लेकिन उससे पहले नहीं. बांदीपुरा की एक महिला का उदाहरण ले लीजिए जिसका एक तीन साल का बच्चा शहीद हुआ और एक बेटा ’ग़ायब’ है और वह खुद बहुत बीमार महसूस कर रही है और लगातार एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टरों के पास दौड़ रही है. हमारी संस्था उसे श्रीनगर मेडिकल कॉलेज ले गई जहां उसका इलाज चल रहा है. वहां उसके लीवर का परीक्षण हुआ जिससे यह जाहिर हुआ कि उसमें चार धब्बे हैं. उस महिला ने डॉक्टर से कहा कि उसे कोई बीमारी नहीं है: ये चार धब्बे उनके चार बेटे हैं! कश्मीर में हमारे यहां एक किंवदंती है, जो एक ऐसी गाय के बारे में है जिसने अपने सात बछड़ों को खो दिया था. उसके लीवर में भी सात छेद थे. इस तरह ये घटनाएं समरूपी हैं. कश्मीर के लोग, ख़ास तौर से महिलाएं ऐसी मानसिक पीड़ा और दर्द में जी रही है. मूलभूत मसलों को हल करना होगा. भारतीय सैन्य कब्जे के कारण, जैसा कि इस मामले में हुआ, घोर व्यथा सहने वाली महिलाओं के पक्ष में हम खड़े रहते हैं. उसके तीन बेटों के मारे जाने और एक के ग़ायब होने के बाद उसने अपने पति को भी खो दिया जिसकी मौत कैंसर के कारण हुई. हम हर महीने उसके लिए 1000 रु की व्यवस्था करने की कोशिश करते हैं ताकि वह अपना ईलाज जारी रख सके.
कावो: इस तरह के घोर दमन के कारण भारतीय राज्य के ख़िलाफ़ क्या महिलाओं का उग्र रूप से अधिक उभार होगा?
परवीना: ऐसे भयानक दमन से हम बेहद गुस्से में हैं कि वे बंदूक नहीं रख रखतीं, हम, कश्मीर की महिलाएं भारतीय सैन्य बलों पर निहत्थे आक्रमण करेंगे. -अनुवाद: दिलीप ख़ान

8 टिप्‍पणियां:

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