23 अक्तूबर 2008

मनसे की राजनीति वर्तमान संसदवादी गलियारे की एक खिड़की है:-


दिनों दिन विस्फोटों की संख्या बढ़ती जा रही है आतंकवादियों के नाम पर मुस्लिमों को पकडा़ जा रहा है सिमी के कार्यकर्ताओं को पकडा़ जा रहा है जिस पर पिछले छः साल से प्रतिबंध लगा है जब्कि अब तक सिमि पर एक भी जुर्म साबित नहीं हो पाया है उडी़सा में हिन्दूओं द्वारा इसाईयों पर हमले केरल की सबसे पुरानी चर्च में तोड़-फोड़ पिछले दो माह से महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा प्रांतवाद और भाषावाद के आधार पर उत्तर भारतीयों की पिटाई, राज ठाकरे की गिरफ्तारी और उसके फलस्वरूप महाराष्ट्र में उग्र प्रदर्शन ये महज कुछ घटनायें नहीं है जो मनमाने तरीके से पूरे देश में घट रही हैं बल्कि यह चुनाव के नजदीकी के संकेत हैं दरासल यह संसदीय पार्टियों की राजनीति का एक हिस्सा है जिसका चुनाव के पूर्व घटित होना जरूरी है ताकि हाल में आयी आर्थिक मंदी बढ़्ती महंगायी न्युक्लियर डील के पेंच पर से जनता का ध्यान हटाया जा सके इस तरह के मसले में जन भावनाओं को भड़काकर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां उसे वोट बैंक में बदलने में कामयाब हो सकती है इसके अलावा उनके पास अब वोट लेने का और कोई चारा नहीं बचा है क्योंकि किसानों की कर्ज माफी जैसे दिखावे छठे वेतन आयोग के लागू होने का सच इस कमर तोड़ मंहगाई में खो चुका है और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में किसान आत्महत्यायें और बढी़ हैं
पिछले दो महीने से लगातार उत्तर भारतीयों पर जारी हमले जिसे राज ठाकरे के उग्र भाषणों के जरिरे पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूम कर भड़काने का प्रयास किया गया उसी का यह परिणाम था कि रेलवे विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा में मुंबई आये उत्तर भारतीयों पर मनसे के कार्यकर्ताऒं द्वारा उत्तर भारतीयों की पीटा गया और इसके पश्चात राज ठाकरे की नाटकीयता पूर्वक देर रात कुछ मअमूली धाराऒं के तहत गिरफ्तारी हुई जिसके बाद उन्हें जमानत भी मिल गयी और दो महीने तक उनके भाषण और मीडिया से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया सवाल उठता है कि क्या यह मामला उतना ही सरल है जितना दिख रहा है पिछले दो महीने से जब राज ठाकरे इस तरह के भड़काऊ भाषण दे रहे थे और उनके कार्यकर्ता मुंबई में जगह-जगह उपद्रव कर रहे थे तब सरकार ने क्यों नहीं चेता क्या वह किसी बडी़ घटना घटित होने के फिराक में थी राज्ठाकरे की यह बयान बाजी कि सरकार की हिम्मत हो तो पकड़ कर दिखाये इस बात का संकेत करती कि प्रांतवाद और भाषावाद की राजनीति करने वाले राज ठाकरे को राज्य सरकार की कमजोर ताकत का पता था या फिर राज्य सरकार की मिली भगत से सब कुछ चल रहा था चुनाव की नजदीकी के बढ़ते इसके पीछे कुछ और ही पेंच हैं जिसके कारण राज्य सरकार ने झारखण्ड कोर्ट के आदेश के बाद देर रात राज ठाकरे को कुछ मामूली धाराओं के तहत गिरफ्तार ्करने को मजबूर हुई और चंद बयान बाजियाँ देना भी उसकी मजबूरी थी इस आपसी राजनीतिक मसले को समझना जरूरी है कि आगामी चुनाव में शिवसेना का कमजोर होता जनाधार फिर से शिवसेना के रूप में पाया जाना मुश्किल था अतः मनसे शिवसेना के एक नये रूप में आयी जहाँ बाला साहेब ठाकरे का चेहरा बदल कर एक युवा व्यक्ति राज ठाकरे का हो गया है जो कि पहले शिवसेना में ही थे शिव सेना के प्रभाव में आया जन मान्स अब धीरे-धीरे विमुख हो रहा था क्योंकि शिव सेना के पास कोई ठोस आधार नहीं था जिस पर वह खडी़ होकर राजनीति कर सके और अपना जन मत जुटा सके अब जबकि राज ठाकरे ने मनसे के रूप में प्रांतवाद और भाषावाद को आधार बनाकर चुनाव के पहले जल्द से जल्द अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिये जुटे हैं ऎसे में घट रही ये घटनायें अंततः कांग्रेस को ही मजबूत करेगी क्योंकि प्रान्तवाद के जरिये जन मान्स को ज्यादा दिन तक नहीं बांधा जा सकता इसका एक पक्ष और है जिसका फायदा यूपी बिहार की क्षेत्रीय पार्टियाँ हिंसा हुए लोगों के साथ हमदर्दी जताकर उठायेंगी उनके लिये भी यह एक मसाला ही है जो नजदीकी चुनाव में मुद्दों के अकाल मेम मिल जा रहा है साथ में जिस रोजगार के सवाल को लेकर राजठाकरे जनता को गुमराह कर रहे हैं वह सवाल वर्तमान सत्ता व्यवस्था की समस्या है जिसका किसी भी पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं है वह जनसंख्या बढोत्तरी और रोजगार की कमी व रोजगार गारंटी जैसी असफल योजनायें चलाकर सिर्फ गुमराह कर सकती है वर्तमान सत्ता व्यवस्था के सामने सबको रोजगार सबको शिक्षा दे पाना संभव नहीं रह ग्या है पर वह प्रांतवाद भाषावाद क्षेत्रवाद को आधार बनाकर विट की राजनीति कर सकती है महाराष्ट्र मेम ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र में एक बडा़ युवा वर्ग जिसे न शिक्षा मिल पा रही है न ही रोजगार ऎसे में उसकी उर्जा को आस्था भावना क्षेत्रवाद भाषावाद प्रान्त्वाद के आधार पर विभाजित करके ही संसदीय पार्टीयां इस शक्ति को काबू में रख सकती हैं या अपने साथ ले सकती हैं वर्ना इन पार्टीयों को सबसे बडा़ भय यह है कि ये युवा वैकल्पिक व्यवस्था की लडा़ई लड़ रहे आंदोलनों के साथ न चले जायें जो कि उन सबके लिये सबसे बडा़ खतरा हैं इन पार्टियों को पता है कि आस्था अमूर्त विकास आतंकवाद जैसे कुछ ऎसे टूल हैं चुनाव के पहले जिनका इश्तेमाल कर जनता को गुमराह किया जा सकता है और संसदीय राजनीति से मोह भंग होने की स्थिति को रोकने का प्रयास किया जा सकता है जिसे आमजन को समझने की जरूरत है और क्षेत्र भाषा व आस्था से हटकर समानता मानवता और वर्ग विहीन समाज के लिये संघर्ष करने की जरूरत है.

3 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्‍कुल, यह संसदीय बदबू का सड़क पर फैलना और फैलाया जाना ही है।

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  2. गीता-ओ-कुरान जला दो, बाइबल का करो प्रतिवाद,
    आओ मिल कर लिखें हम एक महाराष्ट्रवाद.

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  3. ye yak dam thike nahi he .state ke aur vartaman rajnati ke voto ki rajnati ka side iffect he.ithas gahav he ki bharat vibjan koi yak din me nahi huva rha. ashok ke samraje ko patan ke laiye 89 sal lagyai. bijvapan to to samanna hoga.baki to ithas parivatan ka powerhouse he,abkon kaise parivatan karita he vo both important he.

    kalu

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