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18 फ़रवरी 2016

तीन रंग वाली आज़ादी

-हिमांशु पंड्या
मैं सबसे संवेदनशील मुद्दे नारे-पोस्टर-सभा पर ही बात करूंगा. उसके बहाने कई बातें आयेंगी.

पहली बात, मैं अब यह दावे से कह सकता हूँ कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा वहां लगाया ही नहीं गया था.यह जी टीवी था जिसने 'भारतीय कोर्ट जिंदाबाद' को बड़ी कुशलता से वॉइस ओवर के जरिये 'पाकिस्तान जिंदाबाद' में बदला और फिर जब उसमें एबीवीपी के लोग ही फंसने लगे तो मूल वीडियो प्रस्तुत कर दिया लेकिन तब तक वह 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का हौव्वा खडा कर चुका था जो लोगों की स्मृति में बस गया. वैसे यह सबसे कम आपत्तिजनक नारा है मेरी निगाह में, पर आपकी में है तो ये आपकी जानकारी के लिए है.

जो जीटीवी एक बार धोखा कर सकता है, उसके बाकी वीडियोज को भी शक की निगाह से देखिये. वॉइस ओवर से कुछ का कुछ बनाया जा सकता है. दूसरा वीडियो जो काफी अँधेरे में था, जिसमें 'भारत की बर्बादी' वाला नारा दिया गया, मैं उसके सन्दर्भ में खास तौर पर ये बात कह रहा हूँ. बहरहाल, यह नारा सर्वाधिक आपत्तिजनक है. इसका बचाव कोई भी नहीं कर सकता, सबको इसकी निंदा करनी चाहिए. सबने की भी, सभी दलों ने की, लिखित में भी पर्चे जारी कर की, फ़ौरन की. पर उसे किस किसने दिखाया ? 

जेएनयू में छात्र-छात्राओं की एकजुटता
'इंशा अल्लाह' का नारा कोई वामपंथी लगा ही नहीं सकता. डीएसयू ( -वह संगठन, जिससे कभी जुड़े रहे विद्यार्थियों ने यह कार्यक्रम रखा था) में तो सबसे 'कड़े' वामपंथी होते हैं, चौबीस कैरेट वाले ! ( मजाक कर रहा हूँ, हालांकि उस संगठन में भी मेरे अच्छे दोस्त रहे हैं. लडाइयां बहसें भी हुईं पर जब मेरे राज्य राजस्थान में 'सूचना के अधिकार' के तहत स्टैच्यू सर्किल, जयपुर पर चल रहे धरने में भागीदारी के लिए जेएनयू के साथियों से मैंने कहा तो जो छ दोस्त मेरे साथ जयपुर चले, उसमें तीन डीएसयू वाले ही थे.और वह कोई वामपंथी आन्दोलन नहीं था.) उसी तरह ( कन्हैया कुमार के संगठन ) एआईएसऍफ़ वाले राष्ट्रवाद को प्रश्नचिह्नित करने वाला कोई नारा नहीं लगा सकते. सबके नारे और उनकी राजनीति स्पष्ट है. 'न हिन्दू राष्ट्र न नक्सलवाद/ एक रहेगा हिन्दुस्तान' यह एसएफआई का नारा है, इसे आइसा कभी नहीं लगाएगी. दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि संयुक्त मोर्चे/जुलूस में यह नारा एसएफआई भी नहीं लगाएगी. आप शायद समझ रहे होंगे.




बहरहाल, अब वो नारे जिनसे मुझे कोई दिक्कत नहीं है. और जो इस घटाटोप में बुरे मान लिए गए हैं. सबसे पहले 'आज़ादी' का नारा. आपने देखा होगा, उसमें एक के बाद एक कई आजादियों की मांग की जाती है. यह एक बहुत सुन्दर नारा है और यह अनेक मौकों पर दिया जाता है. यह हमारी आज़ादी को व्यापक अर्थों में ले जाने की मांग करता है.खुद बाबा साहब आंबेडकर ने राजनीतिक आज़ादी को नाकाफी कहते हुए सामाजिक आज़ादी के लिए लम्बी लड़ाई की जरूरत बतायी थी.हमारे दोस्त पंकज श्रीवास्तव ने इसका एक रूप प्रस्तुत किया है, मैं उसे साभार ले रहा हूँ : 

मैं भी माँगूँ आज़ादी
तुम भी माँगो आज़ादी
सामंतवाद से आज़ादी,
पूँजीवाद से आज़ादी,
साम्राज्यवाद से आज़ादी
कारपोरेट से आज़ादी,
जातिवाद से आज़ादी,
ब्राह्मणवाद से आज़ादी
मर्दवाद से आज़ादी..
राम भी माँगे आज़ादी
रहमान भी माँगे आज़ादी
सांप्रदायिकता से आज़ादी
दंगाइयों से आज़ादी
फ़ासीवाद से आज़ादी
लूटपाट से आज़ादी
लड़ के लेंगे आज़ादी
छीन के लेंगे आज़ादी..
आज़ादी भाई आज़ादी
हमें चाहिए आज़ादी...


तस्वीर-1. कश्मीर की अर्ध-विधवाएं
इस नारे ने निर्भया/ज्योति के आन्दोलन के समय एक नया आयाम और लोकप्रियता पायी. जिस समय निर्भया के निर्मम बलात्कार-हत्या के बाद पितृसत्ता द्वारा लड़कियों पर पाबंदियां बढ़ने और उनके कपड़ों-आचरण-घूमने-दोस्ती वगैरह को दोष देने का खतरा मंडरा रहा था, उस समय बहुत जागरूक ढंग से प्रमुख स्त्री संगठनों और जेएनयू के विद्यार्थियों ने इसे पितृसत्ता से लड़ाई पर फोकस करने में काम में लिया. उन मूल्यों से लड़ाई में काम लिया जो स्त्री को कमजोर और संरक्षणीय मानते थे,उनकी हिफाजत का जिम्मा मर्दों को देते थे और इस नाते स्त्री के हितैषी होने की छवि प्रस्तुत करते थे लेकिन दरअसल उसकी गुलामी की जंजीरें तैयार करते थे. ( कोई चैनल उन् नारों को न समझ पाने के कारण 'अनऑडिबल' कह रहा था, मुझे हंसी आ गयी.मुझसे पूछ लेते, पर नहीं , वह आपको नहीं समझ आयेगा, आपको सिर्फ 'कश्मीर मांगे आज़ादी' सुनाई देगा.) 'बाप से मांगे आज़ादी/ खाप से मांगे आज़ादी/ सुनसान सड़क पर आज़ादी/रात में घूमने की आज़ादी ...' इस तरह यह नारा बढ़ता जाता है, इसमें कई आयाम लोगों ने अपनी समझ और सूझ से जोड़े. इसी क्रम में यह समझना जरूरी है कि जब निर्भया आन्दोलन चल रहा था, तब इसकी मध्यवर्गीय सीमाओं को लांघने की कोशिश की गयी. इसमें सोनी सोरी ( एक आदिवासी बहन, जिसे बिना सबूतों के नक्सलवादी कहकर जेल में डाला गया, जिनकी योनि में दंतेवाडा एस पी अंकित गर्ग ने पत्थर भर दिए थे और इस वीर एस पी को भारत सरकार ने गैलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया.) या मनोरमा ( मणिपुर की बहन, जिसे आसाम राइफल्स के जवानों ने 10 जुलाई, 2004 को उठा लिया और अगले दिन उसका बलात्कृत क्षत विक्षत शव सड़क पर मिला और जिसके पांच दिन बाद मणिपुर की कुछ स्त्रियों ने भारत का सर्वाधिक मार्मिक झकझोर देनेवाला प्रतिरोध करते हुए नग्न होकर इस भारतीय राष्ट्र के सामने एक पोस्टर दिखाया जिस पर लिखा था - "इंडियन आर्मी, रेप अस". ) या कुनन पोश्पोरा की महिलाओं( कश्मीर के कुपवाड़ा का एक गाँव जहां 23 फरवारी ,1991 की रात फोर्थ राज राइफल्स के जवानों ने वहां की अनगिनत महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया,पूरी रात.) के सवाल क्यों नहीं शामिल होंगे. इसमें खैरलांजी के दलित परिवार की सुरेखा और प्रियंका भोटमांगे क्यों नहीं आयेंगी. 

29 सितम्बर,2006 को भोटमांगे परिवार के चार लोगों की नृशंस हत्या की गयी. दोनों मां-बेटी को गाँव भर में नग्न परेड और बलात्कार के बाद मारा गया. महिला आन्दोलन का मानना था कि जाति,धर्म,राष्ट्र के भाले सबसे पहले महिलाओं के ही शरीर में घोंपे जाते हैं और इसलिए कोई भी महिला मुद्दा इन सब पर हमला किये बिना,इकलौता नहीं लड़ा जा सकता.इस तरह इस लड़ाई में जातिगत शोषण से लेकर AFSPA जैसे कानूनों के विरोध ने भी जगह ली. छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को भी आज़ादी चाहिए, कॉर्पोरेट लूट से. कश्मीर को आज़ादी चाहिए आफ्सपा जैसे घोर मानव विरोधी क़ानून से. पूरे मुल्क को आज़ादी चाहिए हमारी नसों में घुस चुके जातिवाद के जहर से.

कश्मीर में फौज
यह सिर्फ एक लंबा उदाहरण था यह समझाने के लिए कि अधिकारों के लिए चल रही सारी लडाइयां आज़ादी की ही लडाइयां हैं. और ये आपस में जुडी हुई भी हैं. ‘आज़ादी’ – यह दुनिया का सबसे खूबसूरत लफ्ज़ है. बराबरी और भाईचारा इसका हाथ पकडे बिना नहीं आ सकते. आपको इससे डर क्यों लगता है ? आप नहीं चाहते कि इस मुल्क के सभी भाई बहन आज़ाद हों ? आपकी बेटियाँ देर रात घर आयें तो आपको चिंता न हो. यदि किसी के साथ उसके रंग या जन्म या लिंग या भाषा या क्षेत्र किसी भी आधार पर भेदभाव होता है तो सबसे पहले उसकी आज़ादी का हनन होता है, उन अधिकारों का हनन होता है, जो इस आज़ाद मुल्क ने अपने आज़ाद नागरिकों को देने का वादा किया था. क्यों यह मुल्क डेढ़ दशक से आमरण अनशन पर बैठी एक महिला की आवाज़ नहीं सुनना चाहता ? ( और जानकारी के लिए, यह पूरी दुनिया में सबसे लंबा आमरण अनशन बन चुका है. हैट्स ऑफ़ टू नेशन व्हिच डू नॉट वांट टू नो!)

और आपकी जानकारी के लिए, मैं हर साल जब साहित्य की अपनी कक्षा में आधुनिक काल पर आता हूँ तो सबसे पहले ‘आधुनिकता’ क्या है, इसी पर बात करता हूँ और आधुनिकता के सबसे जरूरी तत्त्व के रूप में इसी आज़ादी का मोल और अर्थ समझाता हूँ. ( दूसरा तत्त्व है – तर्क ) अब क्या आप मेरी कक्षा को भी देशद्रोही साबित करेंगे ? क्या उन किताबों को भी जला देंगे, जिनसे मैंने यह सीखा है ? 

अब रहा आख़िरी नारा – ‘तुम कितने अफज़ल मारोगे / हर घर से अफज़ल निकलेगा’. यदि मेरी अब तक की बातों का सिरा पकडके आप यहाँ तक पहुंचे तो इसे समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि इसका सीधा मतलब यही है कि राज्य की हिंसा सिर्फ प्रतिहिंसा को जन्म देती है. वैसे चर्चा तो इसकी भी की जा सकती है कि जब सामने से नारा लग रहा हो ‘जो अफज़ल की बात करेगा / वो अफज़ल की मौत मरेगा’ तो वो कौनसा यार्डस्टिक या पैमाना है, जो एक को राष्ट्र समर्थक और दूसरे को राष्ट्रद्रोही घोषित करता हो. दूसरी ओर का दूसरा नारा तो जगत्प्रसिद्ध है ही जिसमें दूध मांगने पर खीर देने की बात कही गयी है और खीर मुझे बचपन से ही बहुत पसंद है इसलिए मैं इस नारे का अर्धांश बचा लेना चाहता हूँ सभी खीर प्रेमियों की ओर से. मैं ‘दूसरी ओर’ यह भाषा काम में नहीं लेना चाहता था पर जब दो छोर हैं ही और आप एक छोर की बात सुन चुके हैं तो मेरा फ़र्ज़ है कि अनसुने छोर की ही बात बताऊँ. इसमें लगे हाथ यह भी जोड़ लीजिये कि अफज़ल को कश्मीर में लाखों लोग शहीद मानते हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने अपने निर्णय में उसके खिलाफ षड्यंत्र में प्रत्यक्ष भागीदारी के ठोस सबूत न होने की बात को स्वीकारा है और लिखा है कि उसे इस देश के ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए फांसी दी जाए. इसका क्या मतलब होता है ? क्या इसे कोई न्यायिक हत्या कहे तो वह दोषी है इस मुल्क का ? इस आयोजन के आयोजकों ने अपने पर्चे में यही कहा था. इस कार्यक्रम का नाम था –‘द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस’. यह आगा शाहिद अली के 1997 में आये कविता संग्रह का नाम है. 

1990 में कश्मीर में सात महीनों तक डाक नहीं बंटी थी, यह इसका सन्दर्भ है. क्या उनकी तकलीफ को बाकी मुल्क को जानने का अधिकार नहीं है ? अपने को इस पूरे राष्ट्र का ठेकेदार मानने वाले पत्रकार का वह क्लिप आपने देखा होगा जिसमें उसने उमर खालिद को हनुमंथप्पा का नाम लेकर चुप करवा दिया था. चुप क्या करवा दिया था, माइक निकाल दिया था. आपको लगा ऐसा करके उसने भारतीय राष्ट्र की तरफ से उमर को चुप करवा दिया था. लांसनायक हनुमंथप्पा ने इस मुल्क के लिए जान दी थी तो इस मुल्क के लोगों की बात को, उन लोगों की बात को – जिसे यह मुल्क नहीं सुन पा रहा, पहुंचाने की कोशिश करने वाला उनकी विरासत का उत्तराधिकारी है या उस आवाज़ को चुप कराने वाला ? और क्या उसका अपने मुल्क के अभागे भाइयों से प्यार , देशद्रोह है ? ठीक से सोचिये, कहीं हमारी राष्ट्रवाद की अवधारणा में कोई बुनियादी कमी तो नहीं है ? 

इस चित्र को फिर ध्यान से देखिये, जिसे देखकर आपका खून खौल रहा था. इसमें एक चित्र कश्मीर की अर्धविधवाओं का है, वे मजलूम औरतें जिनके शौहर लापता हैं, जो बरसों से इस उम्मीद में जी रही हैं कि किसी दिन वे वापिस आ जाएंगे, वे उन कहानियों के सहारे जीवित हैं कि फलां का शौहर-बेटा-बाप तेरह साल बाद अचानक मिल गया था.दूसरा चित्र उनके यहाँ बरसों से स्थायी रूप से रह रही फ़ौज का है और तीसरा अफज़ल गुरु का है, जिसे वे अपने साथ हुए अन्याय का प्रतीक मानते हैं. ये तस्वीरें बर्बादी की कामना नहीं बल्कि जो बर्बाद हो रहा है, उसकी ओर आपका ध्यान दिलाने के लिए हैं.

अफ़ज़ल गुरु
वापिस नारों पे आईये. ‘बर्बादी’ वाला वह नारा कितनी देर का है ? बीस सैकंड ? तीस सैकंड ? जो मुल्क पंद्रह साल से गूँज रही अपनी बेटी की पुकार नहीं सुन रहा, उसने तीस सेकंड्स के नारे इतनी फुर्ती से कैसे सुन लिए ? इस सारी बहस को तो खैर जाने ही दीजिये कि उस केऑस में कोई नारा कितनी जल्दी रुकवाया जा सकता था, पर यह जान लीजिये कि इस मुल्क ने फिलहाल इतनी ‘सहिष्णुता’ दिखा रखी है कि वह इन इलाकों में उठने वाले आक्रोश के स्वरों की आसानी से ‘उपेक्षा’ कर देता है. यहाँ तक कि ऐसी आवाजों के साथ केंद्र , राज्य संचालन के दायित्त्व भी बाँट लेता है. जेएनयू इस देश का , कम से कम मानविकी, सामाजिक विज्ञान और गैर तकनीकी अनुसंधान में अकेला विश्वविद्यालय है जो अखिल भारतीय चरित्र का है. इसकी प्रवेश परीक्षा आनेवाली 16-19 मई को देश के बावन शहरों में होगी. यह विश्वविद्यालय एक छोटा भारत है. बड़ा भारत जब अपने दूरदराज के कोनों की आवाज़ दूरी के कारन सुन नहीं पा रहा होता, तब इस छोटे भारत में ये आवाजें पास पास आती हैं, कई बार केरल का लड़का, बिहार के लड़के का रूम पार्टनर बनता है. इस छोटे भारत में एक वे एक दूसरे की बातें सुनना-समझना-लड़ना-झगड़ना सब सीखते हैं. तब थोड़ा हौसला आता है, दूरियां मिटती हैं और यह छोटा भारत उस सपने को पाने की कोशिश करता है, जिसे दरअसल बड़े भारत को एक न एक दिन पाना ही है.

आपने जिन नौ दस बच्चों के चित्र टीवी पर देखे हैं ना, वे सब अलग अलग प्रान्तों के हैं, उनका साथ आना इस मुल्क को कमजोर नहीं, मजबूत बनाता है, शब्द के वास्तविक अर्थ में मजबूत. दबाव की एकता नहीं, साथ की एकता, प्यार की एकजूटता. कम से कम इस छोटे भारत में तो यह प्रयोग होना चाहिए. किसी दिन बड़े भारत में भी हम इस सपने को पा लेंगे.

और अब आखिर में मैं यह बता ही दूं – यह आज़ादी का नारा मूलतः कश्मीर का ही है और अब अगर मैं हिचकते हुए यह भी बता दूं कि यह नारा सबसे पहले कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़नेवालों ने ही लगाया था तो अब तो आप मेरे मुंह से ‘आज़ादी’ इस लफ्ज़ का उच्चारण सुनकर मुझे देशद्रोही तो नहीं कहेंगे ना ? मैं इस मुल्क से बहुत प्यार करता हूँ , अपने अल्मा मैटर से प्यार करता हूँ जिसने मुझे पूरे मुल्क से प्यार करना सिखाया.

इसलिए लिखता हूँ – “असली नारे लगानेवाले को ढूंढो !” यह नारा भी दरअसल जेएनयू को बचा नहीं रहा है. एक नौजवान – जिसका नाम उमर खालिद है, उसे आपने बिना सबूत के आतंकवादी बनाकर पूरे मुल्क को उसकी तस्वीर दिखा दी है. दिल्ली की सड़कों पर उसके चित्र वाले पोस्टर लगा दिए हैं. बजरंग दल नामक सांस्कृतिक दल के कार्यकर्ता उसके खून से तिलक करके अपना अनुष्ठान पूर्ण करना चाहते हैं. यदि आज उसे कुछ हो गया ना, तो इस छोटे भारत में तो सम्वाद के सारे रास्ते बंद हो ही जायेंगे , पर आपकी कमीज़ पर जो खून के दाग लगेंगे,उनका क्या होगा ? माना,अखलाक का मारा जाना हम नहीं रोक सकते थे पर रोहित का मारा जाना एक क्रमबद्ध हत्या थी. उसका निष्कासन, उसका बहिष्कार, उसकी प्रताड़ना सब धीरे धीरे घटित हुआ था. उसे भी ‘राष्ट्र विरोधी’ ही घोषित किया गया था. ठीक है, आपको तब पता नहीं चला, पर इस बार तो आपकी आँखों के सामने सब हो रहा है.कन्हैया कुमार, उमर खालिद, रामा नागा, श्वेता राज,आशुतोष कुमार,अनंत प्रकाश नारायण ये सब नाम नहीं हैं,आपके विवेक की कसौटी हैं. अभी हम एक रोहित की हत्या का पश्चाताप भी नहीं कर पाए हैं, दूसरे रोहित को खुदसे बिछड़ने देंगे ? 







17 मार्च 2013

अफजल गुरु की याद में

भारत के फासीवादी राज्य द्वारा मो. अफजल गुरु की कानूनी हत्या के बाद आई प्रतिक्रियाओं में सबसे ज्यादा पढ़ी गई प्रतिक्रियाएं अरुंधति राय की हैं. उन्होंने लगातार इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया है. और सबसे मजबूत दलीलों के साथ दर्ज कराया है. 2006 में संसद पर हमले के मामले के विभिन्न पहलुओं पर लेखों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ था- 13 दिसंबर: ए रीडर. उसमें एक लेख और उसकी प्रस्तावना अरुंधति ने ही लिखी थी. यह संग्रह अपने नए रूप में और कुछ नई सामग्री के रूप में फिर से प्रकाशित हो रहा है. इसके लिए अरुंधति ने एक नई प्रस्तावना लिखी है. इसका अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है, जिसे हाशिया पर संपादित करके पोस्ट किया जा रहा है.


अफजल गुरु की याद में

नई दिल्ली के जेल में ग्यारह साल के बाद, जिसमें से ज्यादातर वक्त एकांत में कालकोठरी में मृत्यु दंड की प्रतीक्षा में बीता था, फरवरी की एक साफ सुथरी सुबह, अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। भारत के एक पूर्व सॉलीसीटर जेनरल व सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता ने इसे हड़बड़ी में छुपाकर लिया गया फैसला बताया है; फांसी दिए जाने का यह ऐसा फैसला है, जिसकी वैधता पर गंभीर प्रश्न चिह्न लग गए हैं।

जिस व्यक्ति को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन उम्र कैद और दो मृत्यु दंड की सजा तजवीज की हो, और जिसे लोकतांत्रिक सरकार ने फांसी पर लटकाया हो, उस प्रक्रिया पर वैधानिक प्रश्न कैसे लगाया जा सकता है? क्योंकि फांसी पर लटकाए जाने के सिर्फ दस महीने पहले, अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट में वैसे कैदियों की याचिका पर कई बैठकों में सुनवाई पूरी हुई थी जिनमें कैदियों को बहुत ज्यादा समय तक जेल में रखा गया है। उन कई मुकदमों में एक मुकदमा अफजल गुरु का भी था जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। लेकिन अफजल गुरु को फैसला सुनाए जाने से पहले ही फांसी दे दी गई है।

सरकार ने अफजल के परिवार को उनका शरीर सौंपने से मना कर दिया है। उनका अंतिम संस्कार किए बगैर, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के संस्थापक मकबूल भट्ट की कब्र की बगल में दफना दिया गया, जो कश्मीर की आजादी के सबसे बड़े प्रतीक थे। और इस तरह तिहाड़ जेल के चहारदीवारी के भीतर ही दूसरे कश्मीरी की लाश अंतिम रस्म अदा किए जाने की प्रतीक्षा कर रही है। उधर कश्मीर में मजार-ए-शोहदा के कब्रिस्तान में एक कब्र लाश के इंतजार में खाली पड़ी है। जो लोग कश्मीर को जानते-समझते हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे कल्पित, भूमिगत आदमकद कोटरों ने अतीत में कितने चरमपंथी हमलों को जन्म दिया है।

हिन्दुस्तान में, ‘कानून का राज कायम होने’ का ढ़िंढोरा पीटे जाने का जश्न थम गया है, सड़कों और गलियों में गुंडों द्वारा फांसी पर चढ़ाए जाने की खुशी में मिठाई बंटनी बंद हो गयी है (आप कितनी देर बिना चाय ब्रेक के मुर्दे के पोस्टर को फूंक सकते हैं?), कुछ लोगों को फांसी की सजा दिए जाने पर आपत्ति जताने और अफजल गुरु के मामले में निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) हुई या नहीं, कहने की छूट दे दी गई। वह बेहतर और सामयिक भी था, एक बार फिर हमने ज़मीर से लबालब जनतंत्र देखा।
बस उन बहसों को नहीं देख सके जो छह साल पहले ही चार साल देर से शुरू हुई थीं। सबसे पहले यह किताब 2006 के दिसबंर में छपी थी जिसके पहले भाग के लेखों में विस्तार से सुनवाई के बारे में चर्चा हुई है। इसमें कानूनी विफलता, ट्रायल कोर्ट में उन्हें वकील नहीं मिलने की बात, कैसे सूत्रों के तह तक नहीं जाया गया और उस समय मीडिया ने कितनी घातक भूमिका निभायी।

इस नए संस्करण के दूसरे खंड में फांसी दिए जाने के बाद लिखे गए लेखों और विश्लेषणों का एक संकलन है। पहले संस्करण के प्राक्कथन में कहा गया है, 'इसलिए इस पुस्तक से एक आशा जगती है' जबकि यह संस्करण गुस्से में प्रस्तुत किया गया है।

इस प्रतिहिंसक समय में, अधीरता से कोई भी यह पूछ सकता है: विवरणों और कानूनी बारीकियों को छोड़िए। क्या वे दोषी थे या वे दोषी नहीं थे? क्या भारत सरकार ने एक निर्दोष व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया है?

जो भी व्यक्ति इस किताब को पढ़ने का कष्ट करेगा, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि अफजल गुरु के ऊपर जो आरोप लगाए गए थे, उनके लिए वे दोषी साबित नहीं हुए थे- भारतीय संसद पर हमला रचने के षड्यंत्रकारी या फिर जिसे फैशन में 'भारतीय लोकतंत्र पर हमला' भी कहा जाता है, (जिन्हें मीडिया लगातार गलत तरीके से अपराधी ठहराता रहा है जबकि अभियोजन पक्ष द्वारा उन पर हमला करने का आरोप नहीं लगाया गया और न ही उन्हें किसी का हत्यारा कहा गया। उनके ऊपर हमलावरों का सहयोगी होने का आरोप था)। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध के लिए उन्हें दोषी पाया और उन्हें फांसी की सजा दी। अपने उस विवादास्पद फैसले में, जिसमें ‘समाज के सामूहिक विवेक को तुष्ट करने के लिए’ किसी को फांसी पर लटका दिए जाने की बात कही गई है।  उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था, केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य थे।

आतंकवाद विशेषज्ञ और अन्य विश्लेषक गौरव के साथ बता रहे हैं कि ऐसे मामलों में 'पूरा सच' हमेशा ही मायावी होता है। संसद पर हमले के मामले में तो बिल्कुल  यही दिखता है। इसमें हम 'सच' तक नहीं पहुंच पाए हैं। तार्किक रूप से, न्यायिक सिद्धांत के अनुसार 'उचित संदेह' की बात उठनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक आदमी को जिसका अपराध महज ‘उचित संदेह से परे’ स्थापित नहीं हो पाया, फांसी पर लटका दिया गया।

चलिए हम मान लेते हैं कि भारतीय संसद पर हमला हमारे लोकतंत्र पर हमला है। तो क्या 1983 में तीन हजार ‘अवैध’ बांग्लादेशियों का नेली जनसंहार भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? या 1984 में दिल्ली की सड़कों पर तीन हजार से अधिक सिखों का जनसंहार क्या था? 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था क्या? 1993 में मुंबई में शिवसैनिकों के नेतृत्व में हजारों मुसलमानों की हत्या भारतीय लोकतंत्र पर हमला नहीं था? गुजरात में 2002 में हुए हजारों मुसलमानों जनसंहार क्या था? वहां प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य, दोनों प्रकार के सबूत हैं जिसमें बड़े पैमाने हुए जनसंहार में हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के तार जुड़े हैं। लेकिन ग्यारह साल में क्या हमने कभी इसकी कल्पना तक की है कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है, फांसी पर चढ़ाने की बात को तो छोड़ ही दीजिए। खैर छोड़िए इसे। इसके विपरीत, उनमें से एक को- जो कभी किसी सार्वजनिक पद पर नहीं रहे- और जिनके मरने के बाद पूरे मुंबई को बंधक बना दिया था, उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। जबकि दूसरा व्यक्ति अगले आम चुनाव में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है।

इस सर्द, बुदजिली भरे रास्ते में, खाली, अतिरंजित इशारों की नकली प्रक्रिया के तहत भारतीय मार्का  फासीवाद हमारे उपर आ खड़ा हुआ है।

श्रीनगर के मजार-ए-शोहदा में, अफजल की समाधि के पत्थर पर (जिसे पुलिस ने हटा दिया था  और बाद में जनता के आक्रोश की वजह से फिर से रखने के लिए बाध्य हुई) लिखा है:

‘देश का शहीद, शहीद मोहम्मद अफजल, शहादत की तिथि 9 फरवरी 2013, शनिवार। इनका नश्वर शरीर भारत सरकार की हिरासत में है और अपने वतन वापसी का इंतजार कर रहा है।’

हम क्या कर रहे हैं, यह जानते हुए भी अफजल गुरु का एक पारंपरिक योद्धा के रूप में वर्णन करना काफी कठिन होगा। उनकी शहादत कश्मीरी युवकों के अनुभवों से आती है जिसके गवाह दसियों हजार साधारण युवा कश्मीरी रहे हैं। उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है, उन्हें जलाया जाता है, पीटा जाता है, बिजली के झटके दिए जाते हैं , ब्लैकमेल किया जाता है और अंत में मार दिया जाता है।( उन्हें क्या-क्या यातनाएं दी गई उसका विवरण आप परिशिष्ट तीन में पढ़ सकते हैं)। जब अफजल गुरु को अति गोपनीय तरीके से फांसी पर लटका दिया गया, उन्हें फांसी पर लटकाए जाने की प्रक्रिया को बार-बार प्रहसन के रूप में पर्दे पर दिखाया गया। जब पर्दा नीचे सरका और रोशनी आयी तो दर्शकों ने उस प्रहसन की तारीफ की। समीक्षाएँ मिश्रित थी  लेकिन जो कृत्य किया गया था, वह सचमुच ही बहुत घटिया था।

'पूर्ण' सच यह है कि अब अफजल गुरु मर चुके हैं और अब शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे कि भारतीय संसद पर हमला किसने किया था। भारतीय जनता पार्टी से उनके भयानक चुनावी नारे को छीन लिया गया है: 'देश अभी शर्मिंदा है, अफजल अभी भी जिंदा है' । अब भाजपा को एक नया नारा तलाशना होगा।

गिरफ्तारी से बहुत पहले अफजल गुरु एक इंसान के रूप में पूरी तरह टूट चुके थे। अब जब कि वे मर चुके हैं, उनकी लाश पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है। लोगों के गुस्से को भड़काया जा रहा है। कुछ समय के बाद हमें उनकी चिट्ठियां मिलेगीं, जो उन्होंने कभी नहीं लिखीं, कोई किताब मिलेगी, जो उन्होंने नहीं लिखी । साथ ही, कुछ ऐसी बातें भी सुनने को मिलेंगी जो उन्होंने कभी नहीं कहीं। ये बदसूरत खेल बदस्तूर जारी रहेगा लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलेगा। क्योंकि जिस तरह वे जीते थे और जिस तरह वे मरे, वह कश्मीरी यादों में लोकप्रिय रहेगा, एक नायक के रूप में, मकबूल भट्ट के कंधे से कंधा मिलाकर और उनकी मिली-जुली आभा से हिल-मिल कर।

हम बाकी लोगों के लिए, उनकी कहानी तो बस ये है कि भारतीय लोकतंत्र पर वास्तविक हमला कश्मीर में सैनिकों के बल पर भारतीय साम्राज्य है।

मोहम्मद अफजल गुरु की रूह को सुकून मिले।

25 जनवरी 2013

कश्मीर पर तो राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए


-अरुंधति राय
(पीयूडीआर ने जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा उत्पीड़न पर ‘इम्प्यूटिनी फॉर एलिजिड परपेट्रेटर्स एंड क्वेस्ट फॉर जस्टिस इन जम्मू एंड कश्मीर’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 214 घटनाओं के हवाले से स्थिति की भयावहता स्पष्ट की गई है। रिपोर्ट के आख़िरी पन्नों में परिशिष्ट के रूप में कुछ दस्तावेजों को भी स्कैन कर लगाया गया है। कश्मीर की राजनीतिक स्थितियों पर अरुंधति लिखती रही हैं, पीयूडीआर की इस रिपोर्ट के मौके पर उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में जो भाषण दिया, पेश है उसका हिंदी तर्जुमा)

मैं ये कहना चाह रही हूं कि कश्मीर में सैनिकों द्वारा जो उत्पीड़न हो रहे हैं वो किसी सैनिक का निजी विचलन नहीं है बल्कि ये सांस्थानिक योजना है। .....अल्जीरिया जब फ्रांस का उपनिवेश था तो उस समय एक फ्रांसीसी सैनिक ने कहा कि ये मेरा काम है कि मैं अल्जीरिया में मानवाधिकार को तोड़ूं, यहां के लोगों को धमकाकर रखूं, लोगों को यातनाएं दूं। मुझे ऐसी ही पाठ पढ़ाई गई है! इसलिए मानवाधिकार हनन का मसला किसी का निजी मामला भर नहीं है, ये सांस्थानिक है और ऐसी स्थिति में इस तथ्य पर नज़र दौड़ाइए कि कैसे भारतीय सेना ये कहती है कि कश्मीर में वे सेना द्वारा हुए मानवाधिकार हनन की जांच खुद अपनी संस्था के मार्फ़त करवाएगी! इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए?
.....कश्मीर की हालत बेहद ख़स्ता है और इस लिहाज से पीयूडीआर ने जो काम किया है उसकी हमें ज़रूरत है। कश्मीर के बारे में लोगों के पास अब सूचनाएं आने लगी हैं। इसलिए कई दफ़ा सुधिजन ये कहने लग जाते हैं, अरे यार, क्या होगा इन आंकड़ों और बातों का, क्या फ़ायदा होने जा रहा? लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में काम करने वालों को लगातार काम करते रहना चाहिए क्योंकि इन कामों के पुलिंदों में असर छुपा होता है। 

मुझे नर्मदा घाटी की एक बात याद आ रही है: एक गांव में आदिवासी लोग अपने खेत में रोपनी कर रहे थे। वो गांव डूब क्षेत्र में आने वाला था, तो मैंने पूछा कि जब फ़सल डूबनी ही है तो वो क्यों रोपनी कर रहे हैं? गांव वालों ने जवाब दिया कि वो जानते हैं कि फ़सल डूब जाएगी, लेकिन वे और कर क्या सकते हैं। फ़सल रोपना उनका काम है और वो ऐसा करेंगे। इसलिए डुबोने वालों को अपना काम करने दीजिए, आप अपना काम करते रहिए। 
बहरहाल, ये रिपोर्ट महज इन आंकड़ों की सूची और घटनाओं का संग्रहण नहीं है कि कितने लोग कश्मीर में मारे गए और कितनों को यातनाएं मिलीं, बल्कि ये हमारे सामने कहीं ज़्यादा गंभीर सवाल उछालती है। ये हमें बताती है कि वास्तव में सैन्य कब्जेदारी का नतीजा किस रूप में सामने आ रहा है। सैन्य अत्याचार की इन घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसा नहीं है कि एक सेना का जवान आया और यातना बरसा गया, एक सेना का जवान आया और ख़ून बहा गया, वास्तव में ये सांस्थानिक मसला है। ये घटनाएं भटकाव या अपवाद को रेखांकित नहीं करतीं। उनको उन्हीं खातिर तैयार किया गया है और वे जो वहां कर रहे हैं वही उनका कर्तव्य है!
मैं कई बार कश्मीर गई हूं और मैंने देखा है वहां के लोगों की आंखों में क्या है? आफ़्सपा जैसे क़ानून के साए में जी रहे कश्मीर में अत्याचार के कैसे-कैसे वारदात अंजाम दिए जाते हैं ये इधर के लोगों की कल्पना से परे हैं। कश्मीर के (तकरीबन) किसी भी घर में चले जाइए वहां दस्तावेज़ों से भरा प्लास्टिक का थैला आपको मिल जाएगा। लोग आपको बताएंगे,- मैंने यहां एफआईआर किया, वहां अर्जी डाली, फिर ऊपर गया, अदालतों के चक्कर काटे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसी निराशा हर घर में पसरी मिलेगी। दस्तावेज़ों के पुलिंदों के बावज़ूद कुछ नहीं हो रहा! पूरी अवाम के साथ ये किस तरह का बरताव है?

...सवाल ये है कि हम इस रिपोर्ट का क्या करें, हमें कश्मीर के बारे में क्या करना चाहिए? चलिए एक सामान्य उदार भारतीय के लिए इसके मायने ढूंढते हैं। आप देखिए न, अन्ना हज़ारे के साथ और दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध में हुए आंदोलन में डूबते-उतराते लोग कहां खड़े हैं? कौन बोल रहा है कश्मीर पर? उनके पोजिशन और मुद्दे साफ़ हैं। कश्मीर से उनको क्या लेना-देना? लेकिन एक उदार राजनीति के व्यक्ति को भी इस मुद्दे पर साथ होना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर के मुद्दे उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है! मैं कारण बताती हूं। आज़ादी के 60 साल बाद तक पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ़ और बीएसफ़ ने नागालैंड, मणिपुर और कश्मीर में कब्जेदारी की बदौलत जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और इस दौरान उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसने सांस्थानिक रूप ले लिया। राष्ट्रवादियों को बस मैं ये बताना चाहती हूं कि रक्षा बलों ने जो कसरत उन इलाकों में की है वे अब भारत की “मुख्यभूमि’ में उनका इस्तेमाल करने लग गई हैं। छत्तीसगढ़ में यही कार्रवाई हो रही है और धीरे-धीरे इसकी परास बढ़ती जा रही है.....

....रक्षा बलों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर तो सवाल भी नहीं उठते। बड़ी आबादी यातना देने वालों की पांत के साथ खुद को नत्थी पाती है, इस महसूसियत में एक तरह का वर्चस्व का पुट शामिल होता है, इसलिए ये मज़ा देता है। मुझे संसद भवन पर हुए हमले के तुरंत बाद हुए एक टीवी शो की याद आ रही है जो शायद सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित हुआ था, उसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कह रहे थे,  “हां, ये सच है कि अफ़जल गुरू को मैंने यातनाएं दी है, मैंने उसकी गुदा में पेट्रोल डाला है, मैंने उसको बेतरह पीटा है, लेकिन अफसोस उसने कुछ नहीं कबूला।” उस चर्चा में कई राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार और पत्रकार भी थे, शायद राजदीप सरदेसाई शो को एंकर कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस अधिकारी की आपकबूली पर एक वाक्य नहीं बोला। पुलिस अधिकारी ने दावा ठोका कि उसने राष्ट्रहित में ऐसा किया है।....इसलिए मेरा ये मानना है कि ये रिपोर्ट ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के लिए नहीं है और न ही उन लोगों के लिए है जिन्हें ऐसी यातनाओं को देखने-सुनते में मज़ा हासिल होता है। 

ये उन लोगों के लिए है जो वाकई इन यातनाओं को संदर्भ सहित जानने-समझने की चाह रखते हैं, जो ये समझना चाहते हैं कि बीते छह दशकों में कश्मीर में वाकई हुआ क्या है? बड़ी आबादी की राजनीति को खारिज करने से उपजे सवाल को लेकर कई लोग असहज और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ये ढोंग नहीं है, राजनीति है। मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आज यदि एक कश्मीरी पंडित 200 लोगों का संदर्भ देकर एक किताब लिखता है तो लोग उसको हाथों-हाथ लेते हैं, कश्मीर का एक भयावह चेहरा लोगों के सामने नमूदार होने लगता है। लेकिन आज ही अगर आप हज़ारों पेज के दस्तावेज़ के साथ उसी कश्मीर पर सैंकड़ों पेज का किताब लिखेंगे तो लोग तवज्जो तक नहीं देंगे। यही राजनीति है। राजनीति यही है कि बहुसंख्य आबादी को क्या रास आ रहा है और लोग किस मुद्दे के साथ तादात्मय बना पा रहे हैं। लेकिन ऐसे काम लगातार होते रहना चाहिए, कश्मीर पर ये बढ़िया रिपोर्ट है, जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।
(अंग्रेज़ी भाषण को सुनते समय हिंदी अनुवाद: दिलीप खान)

01 जनवरी 2011

कश्मीर की स्थिरता

-दिलीप ख़ान
उत्तरी कश्मीर के पुलिस डीआईजी मुनीर अहमद ख़ान की माने तो सोपोर ज़िले में अभी बीस आतंकवादी सक्रिय है और इसके कारण वहां अगले दिनों में भी अस्थिरता बनी रह सकती है. पुलिस दस्तावेजों के मुताबिक इस साल अब तक 25 से अधिक आतंकवादियों को सोपोर में मारा जा चुका है. आतंकवादियों पर बात करते हुए ’बीस’ के साथ पुलिस ने ’लगभग’ ’आस-पास’ या ’से ज़्यादा’ जैसे शब्द नहीं लगाए और इस तरह उसने अपनी सक्षमता को दिखाया कि वे ऐसी घटनाओं का गुप्त विवरण रखते हैं! मुनीर ख़ान के इस बयान को यदि कश्मीर पुलिस की हो रही आलोचनाओं की पृष्ठभूमि में देखे तो मामला अधिक स्पष्ट होगा. हाल के दिनों में कश्मीर में चल रहे हलचलों, जिसमें पत्थर फेंकने वाले समूहों के साथ पुलिसिया झड़प केंद्रीय है, ने इन दिनों एक नया मोड़ ले लिया है. कश्मीर विषयक मामले में देश की राजनीतिक संवेदनशीलता एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन इस संवेदनशीलता का प्रदर्शन कैसे हो, यह उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है. कश्मीर की पुलिस इन दिनों बेतरह सक्रिय है.
कॉलेज के एक सहायक प्रोफ़ेसर नूर मोहम्मद भट्ट को सिर्फ़ इस बिनाह पर राजद्रोह के आरोप के साथ गिरफ़्तार करना कि उसने कश्मीर में चल रहे मौजूदा प्रदर्शनों पर प्रश्न-पत्र तैयार किया, न सिर्फ़ एक भयादोहन है बल्कि इससे घाटी के लोगों का पुलिस से विश्वास और कम होगा. प्रश्न-पत्र के जिस बिंदु पर पुलिस ने ज़ोर दिया कि इसमें ’पत्थर फेंकने वाले समूहों’ पर टिप्पणी करने को मांगा गया था कि वे देशभक्त हैं अथवा नहीं, वह एक मत आधारित प्रश्न था और उस आधार पर राजद्रोह का आरोप लगाना बेहद आपत्तिजनक है. क्या हमारी देशभक्ति इतनी कमज़ोर है कि एक प्रश्न से यह ढह जाएगी? शैक्षणिक संस्थानों में यदि समसामयिक विषयों पर मत-प्रतिमत निकल कर नहीं आएंगे तो यह लोकतांत्रिक नींव को कमज़ोर करने वाला ही प्रयास होगा और हमारे सामने यह लोकतंत्र का एकरेखीय मॉडल पेश करेगा, जिसमें एक मत के तले दूसरा दब कर रह जाएगा. पुलिस द्वारा की गई इस गिरफ़्तारी में विश्वविद्यालय प्रशासन के रूख का इंतजार करना भी शामिल नहीं था. दुनिया में अधिकांश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को इतनी स्वायत्तता दी गई है कि वे अपने नियम-क़ायदों से चलते हैं और देश के आला अधिकारियों को भी विश्वविद्यालय में मामूली कार्रवाई करने से पहले विश्वविद्यालय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है. पुलिस ने न सिर्फ़ इस मामले में सीधे हस्तक्षेप किया बल्कि इसके बाद सिलसिलेवार तरीके से विश्वविद्यालयों के प्रश्न-पत्र को आधार बनाकर एक और प्रोफ़ेसर को दोषी क़रार दिया. इस प्रोफ़ेसर पर अश्लीलता का आरोप लगाते हुए पुलिस ने यह दावा किया कि ऐसी हरकतों को बर्दास्त नहीं किया जाएगा. डीआईजी अब्दुल गनी मीर की चिंता का दायरा यह था कि इसे अकेले प्रो. शाद रमज़ान नहीं कर सकते तथा इस घटना में कुछ और लोग भी शामिल रहे होंगे और उन शामिल लोगों को भी नहीं छोड़ा जाएगा. इस मामले को प्रोफ़ेसर की ग़लती यह बतायी जा रही है कि उन्होंने विद्यार्थियों को परीक्षा में अंग्रेज़ी से उर्दू में एक ऐसा परिच्छेद अनुवाद करने को दिया जिसमें महिलाओं के स्तन का ज़िक्र था. इस परिच्छेद में जीववैज्ञानिक तरीके से महिला स्तन का ज़िक्र किया गया था और इस तरह के विवरण छात्र-छात्राएं अपने स्कूल के दिनों में ही पढ़ चुके होते हैं. कश्मीर पुलिस की यह ग़ैरजिम्मेदार सतर्कता है. ये उसी तरह का उपक्रम है जैसे देश के अन्य हिस्सों में कुछ साल पहले कुछ पुलिसकर्मियों ने ’ऑपरेशन मजनूं’ के तहत प्रेमी युगलों को पार्कों में पीटा था. कश्मीर की पुलिस ’नैतिक पुलिस’ और ’देशभक्त पुलिस’ में तब्दील हो गई है.
विश्वविद्यालय को लेकर पुलिस इसलिए इतनी चौकस है क्योंकि कश्मीर के मौजूदा आंदोलन में वह युवाओं की संख्या देख चुकी है और वह इस बात को अच्छी तरह जानती है कि यदि कुछ शिक्षकों पर कार्रवाई की जाती है तो यह बांकी युवाओं के लिए एक संदेश का काम करेगी. कश्मीर विश्वविद्यालय के क़ानून विभाग पर किसी शरारती तत्त्व द्वारा पाकिस्तान का एक छोटा सा झंडा लगा देने के बाद जिस तरह कुछ मीडिया समूहों ने रिपोर्टिंग की उससे ऐसी कार्रवाई करने के लिए पुलिस का हौसला और बढ़ता है. एक अख़बार ने लिखा कि ’पुलिस ने मौके पर पहुंच कर झंडा कब्जे में ले लिया’, गोया झंडा न हो कोई विस्फोटक सामग्री हो!
कश्मीर में खुद पुलिस को लेकर कई आंदोलन चले हैं. शोपियां कांड में पुलिस के कथित अपराध को लेकर घाटी महीनों बंद रही थी. वहां पुलिस विरोधी कुछ ऐसे संगठन बने हैं जो अपनी राजनीति में कत्तई अलगाववादी नहीं है. ऐसी स्थिति में पुलिस आतंकवादियों को मारने में सफ़लता हासिल कर लेगी, लेकिन सही मायनों में सोपोर स्थिर नहीं हो पाएगा.
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21 अगस्त 2010

कश्मीर में जूते चलने के निहितार्थ

दैनिक भास्कर में प्रकाशित आलेख बिना काट-छांट के यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है -मॉडरेटर
दिलीप खान
हाल के वर्षों में जूता फेंकना राजकीय दमनात्मक कार्रवाई के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शित करने के एक नए वैश्विक तरीके के रूप में विकसित हुआ है. इराक में अमरीकी सैनिक आक्रमण और हस्तक्षेप से आहत आकर स्थानीय पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी द्वारा तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके जाने को दुनिया भर के लोगों ने टेलीविज़न-सेट पर देखा. यही क़िस्सा भारत के गृहमंत्री पी. चिदंबरम के साथ दुहराया गया और एक बार फिर जूता फेंकने वाला पत्रकार था. अभी कुछ दिन पहले बरमिंघम में आसिफ़ अली ज़रदारी पर भी जूता फेंका गया और इससे पहले चीन में बेन जियाबाओ पर भी जूता उछाला गया. हालिया घटनाक्रम के तहत जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर 15 अगस्त के दिन किसी सस्पेंडड पुलिस अधिकारी ने जूता फेंका. प्रत्येक बार ऐसी घटना के बाद राज्य की तरफ़ से यह कोशिश की जाती है कि इसे लोकप्रिय जनभावना के तहत देखे जाने से टाला जाए. इसके लिए कुछ आसान तर्क भी जुटा लिए जाते हैं कि विरोध का यह छिछला तरीका है और सभ्य समाज में ऐसी हरकत वृहत्तर आबादी का सच नहीं हो सकता, या फिर ऐसी अलोकतांत्रिक और अमर्यादित हरक़त कुछ सनकी दिमाग़ों का सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए की गई कवायद है. लेकिन उमर अब्दुल्ला प्रकरण में फ़ारूख अब्दुल्ला की तत्काल टिप्पणी कि उनका बेटा जूते-वाले ’इलीट समूह’ का हिस्सा बन गया, का संदेश शायद यही है कि महान लोगों के विरोधी हर समाज में पैदा होते हैं और अगर महानता को हासिल करना है तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि विरोधी अनिवार्य तौर पर समाज के भीतर मौजूद हो. इस तरह प्रकारांतर से वे जॉर्ज बुश के इराकी नीतियों को भी सही ठहरा गए और यह बताने का भरसक प्रयत्न भी कर गए कि कश्मीर में सब ठीक-ठाक है.
लेकिन बहुत साफ़ है कि कश्मीर के मौजूदा राजनीतिक हालात में नेशनल कांफ्रेंस को लेकर घाटी के भीतर असंतोष भरा मत बन रहा है. युवाओं का एक बड़ा हिस्सा अलगाववादी दल हुर्रियत के पक्ष में सामने आ रहा है और बेहद निडरता से ’गो इंडिया, गो बैक’ अभियान को साधने की कोशिश कर रहा है. युवाओं का यह तबका बंद, कर्फ्यू, बारूद और पत्थर के साए में बड़ा हुआ है जिसमें उम्र के हिसाब से स्वाभाविक खिलंदड़ापन कम विकसित हुआ है. उन्हें सामान्य आज़ाद जीवन जीने का शीघ्र कोई विकल्प चाहिए. यह विकल्प अगर उमर अब्दुल्ला सरकार नहीं मुहैया करा रही है तो वे अलगाववादी धड़ों के साथ अपने को खड़ा कर लेते हैं. लगभग बीस साल बाद घाटी में इस तरह का दृश्य बन रहा है जब सरकार के विरोध में उग्र और अंतहीन दिखने वाले प्रदर्शन हो रहे है. ख़ास बात यह है कि हुर्रियत की दोनों धड़े यह ज़ोर देकर कह रही है कि युवाओं का यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन है जिसको वे केवल समर्थन दे रही हैं. पिछले एक साल में कश्मीर की राजनीति बेहद उठा-पटक भरे दौर से गुजरी है. शोंपिया में दो युवतियों की बलात्कार के बाद हत्या के मामले पर जांच समितियों की परस्पर-विरोधी रिपोर्ट और सरकार द्वारा उस मामले पर नाटकीय तरीके से लिए गए फैसलों से आंदोलन शुरू हुआ तो वह उमर अब्दुल्ला पर सैक्स स्कैंडल में फंसे होने के विवाद, इस्तीफ़ा से लेकर इस साल के जून में आंदोलनकारी युवकों की भीड़ पर पुलिस द्वारा फ़ेंके गए आंसू बम से एक नौजवान की मौत के बाद यह मौजूदा रूप में सामने आ रहा है.
पिछले एक महीने में इस प्रदर्शन में 58 लोगों की मौत हो चुकी है. सैंकड़ों घायल है. घायलों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी शामिल है. बीते सप्ताह सईद फ़ारूख बुखारी नामक एक उन्नीस वर्षीय छात्र का कथित तौर पर पुलिसिया टॉर्चर से मारे जाने के बाद हज़ारों लोग उसके अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने के लिए कर्फ्यू को तोड़ कर निकल आए. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने सईद की मौत के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए इस घटना की निंदा की. ऐसी प्रत्येक घटना के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लेकर असंतोष और भड़का है.
इस संवेदनशील घड़ी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब सर्वदलीय़ बैठक बुलाई और उसमें कश्मीर की स्वायत्तता को लेकर प्रस्ताव रखा गया तो कश्मीर के प्रधानमंत्री के तौर पर फ़ारूख अब्दुल्ला का नाम सामने आया. ऐसे में नई दिल्ली में स्वायत्तता की पहलकदमी होना कश्मीरियों के लिए मौज़ूदा आंदोलन के पक्ष में तो रहा लेकिन यह न तो तात्कालीन समस्या का समाधान है और न ही इस बात की कोई गारंटी है कि यह प्रस्ताव संसद में पारित हो ही जाएगा. मीरवाइज उमर फ़ारूख ने भारत सरकार को कश्मीर से सैन्य-बल वापस बुलाने, आफ़्सपा ख़त्म करने और कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच द्वि-पक्षीय मामला न मानते हुए इसमें कश्मीर को शामिल कर त्रि-पक्षीय तरीके से हल किए जाने की अपील करने के साथ-साथ स्थानीय कश्मीरियों की भावना को समझने के लिए ’कश्मीर की दीवारों पर लिखी इबारतो’ को पढ़ने को कहा है. स्थानीय कश्मीरी लोगों ने पिछ्ले चुनाव में सहभागिता के जिस स्तर को दिखाते हुए 60 फ़ीसदी से अधिक मतदान किया और उमर अब्दुल्ला की पार्टी को बहुमत के साथ विधानसभा में लाया उससे उनकी दैनंदिन की समस्याओं का खात्मा कहीं से भी होता नज़र नहीं आया. विरोध में फ़िर जूता फ़ेंकना आसान तरीका तो नज़र आता ही है.
लेखक स्वतंत्र पत्रकार है.
मो.-9561513701, ई-मेल dilipk.media@gmail.com

24 अगस्त 2009

कश्मीर में मीडिया

शेवंती निनन
अनुवाद: सत्यम कुमार सिंह
शांति अहिंसा विभाग महात्मा गाधी अंतर्राष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय
मीडिया और कश्मीर के बीच एक अलग तरह का रिश्ता है शायद देश में कोई ऐसा राज्य नही है जिसने कश्मीर जितना राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कवरेज प्राप्त किया हो और शायद ही दिल्ली को छोड़ कर जनसंख्या अनुपात में मीडिया की इतनी मौजूदगी हो। मगर फिर भी इस राज्य के विकास से संदर्भित सच्चाई को मालूम करना बिल्कुल ही मुश्किल बना हुआ है। क्योंकि यहाॅ सत्य के कई संस्करण हमेशा बने रहते हैं।
देश के अन्य हिस्सों में कश्मीर भले ही सामान्यतः की तरफ लौटता नजर आता हो, शायद ऐसा इसलिए भी क्योंकि वहाॅ अब लगातार चुनाव हो रहे है। लेकिन सैन्यीकरण अब भी बहुत ज्यादा है। वहाॅ जो लोग रहतें हैं वो लगातार बने इस तनाव को महसूस कर सकतें हैं। वहाॅ जाकर ही इसे भली भाॅती देखा जा सकता है। कोई भी छोटी सी घटना अशांति की चिंगारी के लिए काफी होती है। फिलहाल कश्मीरी जनता और मिलिटेंट पत्रकार भारतीय राज्य के सार्मथ के प्रति कम ही चिंतित हैं। कश्मीर पर रिपोर्टिंग करते वक़्त भारतीय पत्रकार इसको नज़र अंदाज कर देते हैं। उनकी रिर्पोटिंग में राष्ट्रवाद का रंग भर जाता है। जब कोई कश्मीरी संवाददाता किसी भारतीय अख़बार अथवा भारतीय पत्रिका के लिए स्टोरी फाइल करता है तो वो इस बात से बिल्कुल आश्वस्त नही रहता कि ख़़बर वैसी ही छपेगी जैसे उसने लिखी/लिखा था। वे जो इन रिर्पोटों को डेस्क या उच्च स्तर पर संपादित करते है, राष्ट्र विरोधी समझ कर कुछ अंशों को हटा देतें हैं। कश्मीरी पत्रकार विशेष सुविधाप्राप्त और अभिशप्त दोनों ही है। पश्चिमी दुनियाॅ के फेलोशिप और प्रतिभागी के रुप में इन युवा पत्रकारांे को खोजा जाता है। यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के किसी भी काॅनफ्लििक्ट् मीटिंग के आयोजन में आयोजक कश्मीर के प्रतिभागी को शामिल करने के लिए आतुर रहतें हैं। वही दूसरी तरफ जो कश्मीर में रहकर राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय व स्थानीय रिर्पोटिंग करतें है उन्हे बमुश्किल ही विरोधी विषयों पर लिखने की स्वतंत्रता रहती है। पत्रकारिता में प्रवेश करने के समय से ही उनका पेशे में काॅनफ्लििक्ट् कवरेज होता है। वो आपको बतायेंगें की ‘‘किसी अन्य विषयों पर रिर्पोटिंग कैसे होती है’’ ये हम भूल चूके हैं।
ये लेख बतायेगा की कश्मीर में मीडिया किस तरह से एक परिवेक्षक न होकर कर्ता की भूमिका अदा कर रहा है।
जम्मू और कश्मीर में जो एक बात समान है वो है एक समृद्धि मीडिया की उपस्थिति। अस्सी लाख की आबादी वाले इस राज्य में मीडिया की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। श्रीनगर में दैनिक अखबारों की संख्या 71 और जम्मू में लगभग 61 है। इनमें से ज्यादातर चार पृष्ठीय ब्लैक एण्ड व्हाइट चित्र वाले कहे जा सकतें है। और जम्मू में चार पृष्ठीय खेलकूद के रंगीन अखबार भी हैं। कम उद्योग वाले इस राज्य में मीडिया एक रहस्यमयी तौर पर बढता उद्योग है। यहाॅ मीडिया में कोई मंदी नही है। इस साल के प्रारम्भ मंे ही साप्ताहिक अखबार ‘‘कश्मीर लाइफ’’ को लांच किया गया, उर्दू दैनिक ‘‘रायजिंग कश्मीर’’ आने को है, और ऐसा ही कश्मीर टाइम्स के उर्दू संस्करण के साथ है। एक हिंदी और अंग्रजी का अखबार भी जम्मू में प्रकाशित होने जा रहा है।
संवाददाताओं और संपादकों से एक-एक बातचीत आपको बतायेगी की कैसे एक ठीक-ठाक संपादक और रिर्पोटर (जो आसानी से नही मिलते) वाले अखबार भी केवल अपने पृष्ठीय क़ीमत और विज्ञापन से अकेले ही लाभ देने वाले है। विज्ञापन की आमद उद्योग के बजाय रिटेल आउटलेट से ज्यादा है और कुछ प्रमुख प्रकाशकों तक ही पहुॅचता है। राज्य सरकार का कुल सालाना विज्ञापन बजट 5 करोड़ का है, जो कुछ बढ भी सकता है परन्तु फिर भी ये 378 प्रकाशकों के इस व्यवसाय को बनाये रखने के लिए फिलहाल पर्याप्त नही है। डीएवीपी विज्ञापन जो केंद्र सरकार के द्वारा दिया जाता है सरकुलेशन के आधार पर राज्य के बहुत ही कम प्रकाशकों को मिलता है। तो फिर विशिष्ट कहानियों के साथ विज्ञापन और बैंक लोन से कश्मीर की मीडिया को रहस्यमयी आर्थिक मदद कौन करता है़? सत्ता के कई प्रतिष्ठान जिसमें राज्य सरकार और इंटीलीजेंस एजेंसियाॅ शामिल हैं सोचती है की जम्मू एण्ड कश्मीर बैंक और मिलिटेंट्स से अब जबकि आज क्षेत्रीय अखबारों को उतना फंड नही मिल पाता जितना उन्हे पहले मिल जाता था। जैसाकि आप संर्घष के पहले ही दिन से आप यह पायेंगंे कि यहाॅ संघर्ष मीडिया के लिए एक बहुत बडा प्रोत्साहन रहा है। 1990 के पहले तक यहाॅ उर्दू के केवल तीन प्रकाशक थे जिसमें कांग्रेस का ‘‘खि़दमत’’ भी शामिल है। द कश्मीर टाइम्स अंग्रेजी का एक मात्र अखबार जम्मू के बाहर से प्रकाशित होता था। आज अखबारों की संख्या अलग ही कहानी कहती है।
कुछ मायनों में पत्रकारों के लिए यह एक आरामदायक जगह है। सरकारी अर्पाटमेंट प्रेस काॅलोनी कई प्रकाशकों को कार्यालय के लिए जगह उपलब्ध कराती हैं। उद्यमशीलता के लिए बेहतर है। यहाॅ तक की एक एनडीटीवी का संवाददाता मंत्री का बॅगला हथियाया हुआ है। ये एक ऐसी जगह भी है जहाॅ श्रमजीवी पत्रकार मीडिया मालिक है। कम से कम दिल्ली प्रेस के 3 प्रतिनिधी खुद का प्रकाशन रखतें है। हालांकि इनका नाम सूचीबद्ध नही है। संर्घष के इस धधकते केंद्र के चलते यहाॅ से कई पत्रकार विश्वव्यापी वृहद यात्रा कर चुके होते हैं। ऐसा पहले नही था जब आपको कश्मीर में पत्रकार बनने के लिए जान जोखिम में डालनी पडती थी। पर आज उत्तर पूर्व काम के लिहाज से एक खतरनाक जगह है।
जम्मू कश्मीर पत्रकारिता की मुख्य रीढ़ केएनएस, सीएनएस, यूएनएस, एपीआई, पीबीआई तथा कुछ अन्य न्यूज एजेंसिंयाॅ हैं। ये सभी मिलकर जम्मू और श्रीनगर के सभी छोटे अखबारों को दर्जनों स्टोरी मुहैया कराती है। जो इन्हे बगैर किसी रिर्पोटिंग स्टाफ के कार्य करने में सक्षम बनाती है। इन एजेंसियों की स्टोरी को कश्मीर के सभी सत्ता के केंद्र पोषित करते हैं। अगले दिन इन्ही में से कुछ स्टोरी स्टाफ बाईलाइन बनती है। राज्य, मीडिया कवरेज को आसान बनाता है। आपको बहुत सारे रिर्पोटर से नही मिलना होता है। आपको केवल ख़बर लेना है या फिर न्यूज एजेंसी से कुछ सामाग्री लीक करनी है। इनका ग्राहक बनना न केवल सस्ता है बल्कि व्यवहार में कभी-कभी ये मुफ्त भी है। उर्दू दैनिक ‘‘निदा-ए-मसरीक’’ के संम्पादक का कहना है ‘‘मैं एक एजेंसी का पिछले चार साल से उपयोग कर रहा हॅू। मैने कोई भुगतान नही किया और अभी तक उन्होने मुझसे कुछ नही पूछा। मुछे कभी एक बिल तक नही आया।’’ जाहिर है जो उनकी स्टोरी का उपयोग करतें हैं न्यूज एजेंसी को उनके भुगतान की जरुरत नही होती, संभवतः वे उन स्टोरीदाताओं से भली प्रकार प्रतिपूर्ति पा लेतें हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर में सत्ता के बहुत सारे केंद्र है और यह भी कि सत्य के कई संस्करण। क्षेत्रीय अखबार किसी विशेष मिलीटेंट संगठन द्वारा बंद कर दिये जाने या फिर उनसे वित्त पोषण द्वारा पहचाने जाते हैं। या फिर इससे कि वह उसको प्रतिबिंबित करता हो जो भारतीय इंटीलीजेंस उनसे करवाना चाहती है। पिछले साल के अमरनाथ भूमि हस्तांरण विवाद के अखबार और केबल टीवी कवरेज से यह स्पष्ट हो जाता है कि जम्मू के अखबार कश्मीर के अख़बार से अलग सत्य को देखते है।
एक कश्मीरी पत्रकार जो दिल्ली के अखबारों के लिए काम करता है कहता है ‘‘पैसा दोनों तरफ से आता है। अखबारों को भी पैसा दिया जाता है पहले तो बढाने चढाने के लिए अगर छेडछाड है तो उसे बलात्कार कहने के लिए आपको पैसा मिलता था.......अब स्थिति बदल चुकी है। मीडिया न केवल प्रोपोगंडा का टूल है बल्कि प्रति विद्रोह का भी साधन है। और प्रोपोगंडा करने वालों और विद्रोह करने वालों दोनो के अपने संस्करण हैं।
इस गर्मी में शोपियाॅं में एक कथित कत्ल और बलात्कार इस बात का क्लासिक उदाहरण है कि सच्चाई को अलग तरीके से कह कर उसका स्वरुप गढा जाता है। 29 मई को दो महिला अपने पारिवारिक सेब बागान से आते समय गायब हुयी और अगली सुबह वो मृत पायी गयी। बलात्कार और क़त्ल करने वाला एक संदिग्ध भी था। एक एफ आई आर काफी कुछ कहता, रिश्तेदारों ने माॅग की लेकिन उसे रजिसटर्ड नही किया गया था। जब पोस्टमार्टम से एटाप्सी हुयी तो परिणाम विरोधाभासी थे और अशंाति के कारण को सच साबित कर रहे थे। जमीनी सत्य के विभिन्न संस्करणों से कैसे रिपोर्ट तैयार किये जातें है यह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तीन अखबार और एक टीवी चैनल की केस स्टडी बताती है। एनडीटीवी एटाप्सी रिपोर्ट को तरजीह दे रही थी तो वही इंडियन एक्सप्रेस और मेल टुडे राज्य द्वारा बयां घटना को प्रश्न करने की तरफ झुके हुए थे। यह एक कथित बलात्कार था जबकि पुलिस की शुरुआती कोशिश इस बात पर जोर देने की थी की वो डूब कर मर गयी होगीं। द हिंदू ने इसी सिद्धांत पर भरोसा किया जबकि क्षेत्रीय अखबारों का कहना था कि डूब के मरने के लिए नदी काफी छिछली थी।
जबकि क्षेत्रीय नेता लगातार विरोध करते रहे और घटना दबने का नाम नही ले रही थी। तब एक जाॅच पडताल की टीम और एक न्यायिक आयोग ने महिलाओं के मरने की दशा की छानबीन की। इसने पुलिस के द्वारा सबूत के साथ छेड़छाड वाली एक अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। और यह पुलिस के अपराध में शामिल होने के संदेह का कारण था।
कश्मीर के पत्रकार आपको बिल्कुल अनौपचारिकता में यह बतायेंगे की शेष भारत के टिप्पणीकारों और रिर्पोटरों के राष्ट्रवादिता से लगातार विचलित किए जाते रहे है। कश्मीर में मीडिया की स्थिति पर बात करते हुए श्रीनगर की एक बैठक में उर्दू अखबार के एक सम्पादक का कहना था ‘‘मनोवैज्ञानिक रुप से हम सभी मिलीटेंट हैं।’’ और तब जब वो स्पष्टतः कहें कि हम कश्मीरी पहले हैं। भारत के टेलीवीज़न में छोटे सुरक्षा विशेषज्ञों और भूतपूर्व राजनयिकों को अलगाव वादी राजनेताओं के विरुद्ध देखते समय साफ जाहिर होता है कि वो स्वयं को राष्ट्रीय हित के पक्ष में रख रहें है। संर्घषरत राज्य मणिपुर में इम्फाल से प्रोफेसर लोकेंद्र इस प्रवृत्ति को बेहतर तरीके से समायोजित करते हैं। मेरे साथ एक साक्षात्कार में उन्होने कहा था ‘‘मुख्य धारा की मीडिया सोचती है कि वो राष्ट्र है। वो ये नही सोचती की राष्ट्र को कौन बनाता है।’’

20 अगस्त 2009

कश्मीर के चिंताजनक राजनीतिक हालात

अनिल (लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में मीडिया के छात्र हैं)
पिछले दिनों जम्मू कश्मीर विधानसभा में जो परिदृश्‍य देखेने को मिला, उसके राजनीतिक कारणों की गहराई में जाना ज़रूरी है। विपक्ष प्रमुख महबूबा मुफ़्ती द्वारा अध्यक्ष की कुर्सी के पास आकर उनपर माइक फेंकना चरम राजनीतिक निराशा का एक नमूना मात्र है। लगभग दो महीने पहले 29 मई की रात को शोपियां में दो युवतियों के सामूहिक बलात्कार और फिर हत्या के विरोध में समूचा कश्मीर आमजन की विरोध कार्रवाइयों से सुलग उठा। लेकिन इस पूरे प्रकरण पर सत्ता पक्ष ने जिस तरह का रवैया अख़्तियार किया, वह न सिर्फ़ टाल-मटोल का था, बल्कि दोषियों को न्यायालय के दायरे से मुक्‍त रखने का भी था। ’युवा छवि’ वाले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपनी कार्यप्रणाली पर सवाल से जब घिर गए तभी उन्होंने इसके न्यायलयीन जांच के आदेश दिए। कश्मीर घाटी में इस घटना के दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए सरकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार भूमिका के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन हुए, उसमें कई लोग मारे गए तथा कई अन्य घायल हुए। इन विरोध प्रदर्शनों को रोकने के फौज़ी अभियान के फलस्वरूप संवेदनशील कश्मीर घाटी में जान माल का भारी नुक़सान हुआ।
इन तनावपूर्ण स्थितियों के बाद भी दोषियों को बचाने की जो कोशिशें हुईं, उससे उबलती घाटी में यही संदेश गया कि सत्तापक्ष हर बार की तरह इस मामले में भी लीपापोती करने पर आमादा है। वैसे, जम्मू-कश्‍मीर राज्य में सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों के बारे में शेष भारत को किसी तरह की तथ्यात्मक जानकारी तक नहीं मिल पाती है। अतः बहुत स्वाभाविक है कि कश्मीर में मानवाधिकारों के भयावह उल्लंघन के बारे में हमारे यहां किसी तरह की कोई चिंता नहीं तक होती है। कश्मीरी जनता जीने तक के मूलभूत अधिकार से महरूम है. न्यायालयीन जांच में शोपियां में हुई हत्याओं के पहले बलात्कार के ठोस सबूत मिले हैं। सड़कों पर पहले जन गुस्से के सार्वजनिक प्रदर्शन पर पाबंदी लगाकर और विरोधियों का दमन करके सरकार इस मसले से निजात पाना चाहती थी। लेकिन राजनीतिक संवेदनहीनता की यह हद थी कि सदन में इस मसले पर विपक्ष प्रमुख को अपनी बात कहने की अनुमति तक नहीं दी गई। इन नाज़ुक मौक़ों पर सदन का लोकतंत्र इतना संकुचित क्यों हो जाता है कि ऐसी अमानवीय घटनाओं के बारे में स्वस्थ और गंभीर बातचीत के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं?
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सेक्स स्कैंडल मामले में इस्तीफ़ा देने के ’नैतिक कर्तव्य’ की दुहाई देते हुए दोष मुक्‍त न होने तक मुख्यमंत्री पद पर नहीं बने रहने का जो दावा किया है, वह कश्मीर की स्थितियों को देखते हुए अवास्तविक तथा दिखावटी ज़्यादा है। क्योंकि अगर वे वाकई ’दोष मुक्‍त’ और जनता के मुद्दों के प्रति चिंतित होते तो शोपियां मसले पर इतनी लापरवाही कभी नहीं दिखाते। फिर विपक्ष-प्रमुख द्वारा शायद मजबूरी तथा तीव्र आक्रोश में ही ऐसा तरीका अपनाया गया होगा जो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हंगामाख़ेज़ अस्थिरता पैदा कर सके। पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ़्ती ने पिछले कुछ महीनों में, सड़क पर कश्मीर में प्रशासनिक लीपापोती के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है और काफ़ी जनसमर्थन जुटाया है, बावजूद इसके सरकार द्वारा सदन में उन्हें न बोलने देने रवैया अलोकतांत्रिक ही नहीं, बल्कि यह तानाशाही भी है।
राजनीतिक और समाजिक स्तर की चुनौतियों की गंभीरताओं को समझने के लिए अगर सदनों में चर्चा करने का दायरा सिमटता जाएगा, तो लाख लोकतंत्र की दुहाई दी जाए, विधानसभाओं में हंगामों, मारपीट और अभद्रताओं के नज़ारे आम हो जाएंगे। वैसे देखा जाए तो संसद या विधानसभाओं के सदनों में इस तरह की गरिमाहीन घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी मात्रा में हुई हैं. यह इन संस्थाओं की विश्‍वसनीयता पर एक बड़ा सवाल है। कश्मीर का मसला इन सभी मामलों से भिन्न इसलिए भी है क्योंकि ’आत्मनिर्णय के अधिकार’ की मांग करने वाली कश्मीरी जनता अब दिनोंदिन, हर तरह के दमन को झेलते हुए खुलकर सड़कों पर आ रही है। आत्मनिर्णय के अधिकार के इस लहर का असर वहां की विधानसभा में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। वहां पिछले सत्रह वर्षों में सुरक्षा बलों द्वारा किए गए अत्याचारों और उसके राजनीतिक संरक्षण का कोई हिसाब नहीं है। सत्ताधारी दल अपने अपने तरीक़ों से इन मामलों पर पानी छींटने की कोशिश करते हैं। ऐसे में यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि कश्मीरी जनता को कब तक आंसू गैस, लाठियों, गोली और बम-बारूदों के बीच जीवन गुज़ारने की यातना झेलनी पड़ेगी?