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05 मई 2015

सोन का पानी लाल है...भाग-3

अकलू चेरो की गवाही
(आंबेडकर जयन्‍ती पर कनहर में हुए गोलीकांड का अविकल विवरण)


अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

''... उस दिन हम लोग तीन साढ़े तीन सौ रहा होगा... महिला और पुरुष। पहले धरना में जुट के न हम लोग यहां आए थे। उसके बाद जब वहां आए तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया। अब नाम नहीं बता पाएंगे... सब लगे हैं जासूसी में... उनको कमीशन मिल रहा है न भाई। तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया उनको। अब गाड़ी आ के खड़ा हो गयी तुरंत पुलिस की... जहां बाउंड्री किया है। हम कहे देखो अब नहीं सपोर्ट कर पाओगे... गाड़ी आ गयी। पहिला गाड़ी आया, दूसरा आया, फिर तीसरा आया। तीन गाड़ी आया। इतना कहते हुए सारे लोग चले गए धरनास्‍थल से। जब आए हैं तो हम जो हैं मोर्चा पर रहे। हम सोचा कि मोर्चा पर नहीं रहेंगे तो कोई संभाल नहीं पाएगा। मोर्चा पर रहने के वजह से यह घटना मेरे साथ घटी। वहां से जब चले हैं, यहां आते तक पुलिस वगैरह भी, पीएसी के लोग भी भाई, कोई अभी लाइट्रिन-बाथरूम नहीं नाश्‍ता पानी नहीं... छह बजे क बाते रहा। तब तक से वहां रोकना शुरू... हम कहे कोई मत मानना, एकदम चलते रहना, हम हैं न! भाई बात होगा तो बात हम करेंगे... आप लोग सुनना, पास करना- हां, ठीक कह रहे हैं... ऐसे करना। तब से वहां से रोकने का समय ही नहीं मिला उन लोगों को। तब फिर पूछते हुए गाड़ी से उतर गए। फिर कुछ लोग गाड़ी स्‍टार्ट किए, बीच में आ गए। हम कहे अगर बीच में गाड़ी अगर हॉर्न मारेगा तो तुम लोग चक्‍का जाम करे रहना, रुकना नहीं, जाने नहीं देना। ऐसा ही किया लोग। आगे-आगे हम और महिला-पुरुष चलते रहे।

अब जो है डीएम साहब उधर से चले। हमको मौका नहीं दिए। उतर के चले हैं डंडा पटकते से चले हैं। इसके बाद गाली-गलौज देने लगे, एकाध महिलाओं पर डंडा चला दिए। डीएम रहे, कोतवाल रहे, इंस्‍पेक्‍टर साहब रहे... मोर्चे पर। मौके से रहे डीएम साहब, दरोगा रहे कपिल यादव, कोतवाल रहे। इसके बाद में जो है... जब उन लोग गोली चलाया हमारे ऊपर... अचानक से... ऊ लोग जान रहे थे कि रस्‍ता हम लोग देबे नहीं करेंगे। माइक'वाइक का कहां समय था उन लोग के पास... वो लोग बोले, जाना नहीं है, चलो... लाउडस्‍पीकर पर कोई चेतावनी नहीं दिए। ओरिजिनल गोली मार दिया... ऐसा हमको मालूम होता न कि गोली मारेंगे तो ऐसा घटना होबे नहीं करता... हमको मारकर के अपने हाथे में गोली मार लिए हैं और कह दिए कि ये मारे हैं... बताइए... ई कपिलदेव। इन लोग का जो पीएसी गाड़ी है... जो बस वाली, बीचे में रोक दिया। ऊ लोग सोचे कि बीच में बसवे लगा दो त कइसे जनता क्रास करेगा। त जनता जब पहिले से सतर्क है न... कुछ उधर से पत्‍थरबाजी पीएसी की ओर से तो कुछ इधरो से चलने लगा। गडि़यो पर मार दिया, सिसवा सब फूट फाट गया। उन लोग कहे कि ये प्राइवेट बस पर क्‍यों मार दिया। हम कहे आपे लोग क गडि़या है... अंदाजा है... बात कर रहे हैं। उस समय लगभग पचास-पचपन के आसपास पुलिस रहे होंगे। कोई आदेश नहीं था ऊपर से... कुच्‍छ नहीं, सब अपना मनमानी किया।

वो तो हमको निगाह चढ़ाया था 23 मार्च को भगत सिंह के दिवस पर... हम लोग हर साल मनाते हैं। उसी दिन हमको निगाह चढ़ाया था। हम भी समझ गए थे। त हम लोग कहे कि हम लोग का जलूस उठेगा... पूरा मार्केट बाजार होते हुए जलूस उठेगा और धरने स्‍थल पर भगत सिंह क चित्र टांग टूंग के हम लोग अगरबत्‍ती जलाएंगे, फिर जनता घर जाएगी। 

करीब 250 जनता त एकदम चलते रहा... 100 जनता करीब पीछे रहा, त फुटने लगा। देखा पीछे जब त एतना जलता फुटने लगा। गोली लगने के बावजूद हम कहा कि ठीक कर रहा है तुम लोग न, भाग जाओ। फिर कोई कहा कि भगो मत, जो हुआ होना था, हो गया। फिर सब वापस आ गया। वो जो अपने को गोली लगाए हैं न... तो हम लोग त पीछे हैं, वो लोग क रस्‍ता अइसे है। हम लोग के आने से पहले ऊ लोग यहां आकर के हास्पिटल में दुद्धी दवा-इलाज कराना शुरू कर दिए। ये त हम लोग फोन किए, तब मीडिया वाला अखबार लत्‍ता पहुंचे। दो साथी हमको ले जाने को तैयार हो गए- एक लक्ष्‍मण और अशर्फी।*** ऊ लोग चल दिए। गाड़ी आया। उसमें हमको बैठाए हैं। उसके बाद दुद्धी आए। उसके बाद महेशानंद क लड़का गौरव... उनको पता चल गया। ऊ दौड़कर आए हैं। फिर तुरंत कराए... फिर लिखने-पढ़ने का काम, दवा करने का काम कराए। कहा कि पानी बोतल सब कर देते हैं लेकिन इनको हम यहां इनको भर्ती नहीं कर पाएंगे क्‍योंकि गोली लगा है... सरकारी अस्‍पताल में। त वहां से रेफर होके आ गए रॉबर्ट्सगंज। तो अशर्फी और लक्ष्‍मण जो बोले हैं, ऊ लोग भी साथ आए। मीडिया वाला को पता चल गया होगा, तो वहां ऊ लोग भी आए। बातचीत किए। फिर इहों से रेफर हुआ... बोला यहां भी नहीं होगा। लास्‍ट में यहां बीएचयू पहुंचे हैं बनारस में।

जब यहां बस खड़ा हुई है तो ये हुआ कि हम लोग चलेंगे घर इनको भर्ती करा के... त कौन कौन रहेगा- अशर्फी और लक्ष्‍मण। अब देखिए इनकी धोखा। हमारा आदमी जो रेगुलर रहने वाला, उनको चाय के नाम पर लेकर ऊ चले गए। ऊ लोग दूनो लापता हैं। हमको भी नहीं पता कहां हैं। वहां से आदेश है इन लोग को दिक्‍कत नहीं होना चाहिए। बताइए, जो हमारा दवाई, इलाज, पानी करता, उसको उठा ले गया। दूनों गायब हैं। कोई हमको कहा कि होटल में हैं। गांव नहीं पहुंचे। उसी दिन से गायब हैं... मंगलवार को।

इंस्‍पेक्‍टर साहब आएंगे अभी। कल से यहां पुलिस भी दो आ रहे हैं। इंस्‍पेक्‍टर साहब आए थे, पूछे कि दवा ठीक हो रहा है। वो अनाप-शनाप नहीं बोलते। कोई धमकी नहीं दिए हैं। सुन्‍दरी के हाल बहुत गंभीर है अभी... हमको बहुत अखर रहा है। अभी हम होते वहां तो... उस दिन 20 या 15 लोग घायल हुए थे। तुरंते दुद्धिए में उन लोग का दवाई हुआ। महिला लोग थे। डॉक्‍टर साहब हमसे पूछे कि ठीक हैं तो हम बोले कि थोड़ा प्रॉब्‍लम है। वो बोले कि जब कहोगे तब छोड़ देंगे।

कल से जैसे पुलिस आ रहा है, तो हमारे दिमाग में आ रहा है कि शायद पुलिस सोचता होगा कि हमको जइसे छोड़ेंगे तो वो पकड़ लेंगे। ऐसा हमको लग रहा है। हमको डरने की बात नहीं है।'' 

(19 अप्रैल, सुबह साढ़े आठ बजे)



***(सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव ने 20 अप्रैल को बताया कि लक्ष्‍मण और अशर्फी को गिरफ्तार कर के मिर्जापुर की जेल में रखा गया है और उनके ऊपर सरकारी काम में बाधा डालने, बलवा करने और पुलिस पर हमला करने के आरोप हैं। उन्‍हें कहां से और कब उठाया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गयी।) 




सोन का पानी लाल है...भाग-2

अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

कनहर बांध के मामले में कुछ तो है जो छुपाया जा रहा है। कुछ है जो उजागर तो हो गया है लेकिन शीशे की तरह साफ़ नहीं है। एक सच उनका है जिनके घर डूब जाएंगे। इन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस पर सवाल है। यह सवाल हमेशा से रहा है। भाखड़ा-नंगल से लेकर रिहंद तक एक से ज्‍यादा बार विस्‍थापित होने वाले परिवारों को साठ साल में कायदे से उचित मुआवज़ा नहीं मिला। नर्मदा की लड़ाई तीस साल से हमारे सामने है। बहरहाल, दूसरा सच उनका है जिनके घर नहीं डूबेंगे। जिनके घर डूब रहे हैं, वह आदिवासी ग्रामीण है। जिनके नहीं डूब रहे, वह मोटे तौर पर गैर-आदिवासी और शहरी है। चूंकि इस तबके को बांध बनने से कोई नुकसान नहीं है, लिहाज़ा इस तबके को बांध बनने तक कुछ न कुछ फायदा ज़रूर है। जब 2800 करोड़ का एक बांध बनता है तो उसमें बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है। किसी का डम्‍पर चलता है। कोई ट्रक चलवाता है। कोई रोड़ी देता है। कोई बालू और कंक्रीट देता है। कोई मजदूर सप्‍लाई करता है। किसी का गेस्‍ट हाउस चमक जाता है। एक बांध के इर्द-गिर्द एक समूची परजीवी अर्थव्‍यवस्‍था खड़ी हो सकती है। इसका मतलब कि बांध से नुकसान झेलने वाले और उससे लाभ उठाने वाले वर्ग वास्‍तव में परस्‍पर शत्रुवत स्थिति में होते हैं। इन दोनों से इतर एक तीसरा पक्ष भी है। इसका अपना सच है। यह सच उन लोगों से जुड़ा है जो कनहर बांध के खिलाफ़ आंदोलन का नेतृत्‍व कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनका बांध बनने से कोई निजी नुकसान तो नहीं हो रहा, लेकिन फिर भी वे बांध के खिलाफ और आदिवासी ग्रामीणों के साथ खड़े माने जाते हैं। रोमा इसी पक्ष की नुमाइंदगी करती हैं, लेकिन कनहर बांध के संबंध में उनकी सक्रियता बहुत पुरानी नहीं मानी जाती है।

बताते हैं कि कनहर नदी को बचाने के लिए बांध के विरोध में आंदोलन का आरंभ गांधीवादी कार्यकर्ता महेशानंद ने आज से पंद्रह साल पहले किया था। उनके लोग आज भी गांवों में आदिवासियों के बीच सक्रिय हैं लेकिन महेशानंद समूचे परिदृश्‍य से नदारद हैं। दिलचस्‍प बात यह है कि बांध-विरोधी ग्रामीणों से लेकर बांधप्रेमी प्रशासन तक महेशानंद के बारे में एक ही राय रखते हैं जो अकसर एक ही जैसे वाक्‍य में भी ज़ाहिर होती है, ''वो तो भाग गया।'' 18 अप्रैल की सुबह जब सोते हुए ग्रामीणों पर लाठियां बरसायी गयीं, उसके कुछ देर बाद सुन्‍दरी गांव में आंदोलन का महिला नेतृत्‍व मानी जाने वाली सुकालो ने फोन पर बताया था, ''यहां कोई लीडर मौजूद नहीं था। महेशानंद तो भाग गया है। कहीं छुपा हुआ है।'' भीसुर गांव के नौजवान शिक्षक उमेश प्रसाद कहते हैं, ''सब लीडर फ़रार हैं। गम्‍भीरा, शिवप्रसाद, फणीश्‍वर, चंद्रमणि, विश्‍वनाथ- सब फ़रार हैं। इसीलिए जनता परेशान है। पहले ये लोग महेशानंद के ग्रुप के थे, बाद में इसमें रोमा घुस गयीं।'' य‍ह पूछने पर कि यहां के लोग अपने आंदोलन का नेता किसे मानते हैं, उन्‍होंने कहा, ''यहां के लोग तो गम्‍भीराजी को ही अपना नेता मानते हैं, लेकिन उनको फरार मानकर ही चलिए। जब से आंदोलन बदरंग हुआ, रामप्रताप यादव जैसे कुछ लोग बीच में आकर समझौता कर लिए। महेशानंद भी समझौते में चले गए हैं। रोमाजी तो यहां हइये नहीं हैं, बाकी आंदोलन तो उन्‍हीं का है। उन्‍हीं के लोग यहां लाठी खा रहे हैं।''

आंदोलन के नेतृत्‍व के बारे में सवाल पूछने पर पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं, ''महेशानंद आंदोलन छोड़कर भाग गए हैं। उन्‍होंने मान लिया है कि उनके हाथ में अब कुछ भी नहीं है। उनका कहना है कि बस उनके खिलाफ मुकदमा नहीं होना चाहिए। उनके जाने के बाद रोमाजी ने कब्‍ज़ा कर लिया है।'' आंदोलन पर ''कब्‍ज़े'' वाली बात इसलिए नहीं जमती क्‍योंकि लोग अब भी इसे रोमा का आंदोलन मानते हैं। ऐसा लगता है कि प्रशासन को दिक्‍कत दूसरी वजहों से है। यादव कहते हैं, ''महेशानंद बांध क्षेत्र से बाहर के इलाके में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाते थे। इससे हमें कोई दिक्‍कत नहीं थी।'' प्रशासन को दिक्‍कत रोमा के आने से हुई। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''रोमाजी बहुत अडि़यल हैं।'' वे इसके लिए ''पिग-हेडेड'' शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। वे कहते हैं, ''वे कहती हैं कि हमें बात करनी ही नहीं है... आप हमें गोली मार दीजिए, हम बांध नहीं बनने देंगे। उन्‍होंने संवाद की कोई जगह छोड़ी ही नहीं है। आखिर हम कहां जाएं?''

माना जाता है कि रोमा का यह समझौता नहीं करने वाला रवैया ही जनता को और महेशानंद के पुराने लोगों को उनके पाले में खींच लाया है। इसके अलावा महेशानंद के आंदोलन से हट जाने का लाभ कुछ दूसरे किस्‍म के समूहों ने भी उठाया है। मसलन, पीयूसीएल की राज्‍य इकाई से लेकर भाकपा(माले)-लिबरेशन और आज़ादी बचाओ आंदोलन के लोग भी अचानक इस आंदोलन में सक्रिय हो गए हैं। पड़ोस के सिंगरौली में महान के जंगल और नदी को बचाने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था ग्रीनपीस के सहयोग से जिस महान संघर्ष समिति का गठन हुआ था, वह भी अब सोनभद्र के आंदोलन में जुड़ गयी है। ये सभी धड़े रोमा को आंदोलन का असली नेता मानते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि 14 और 18 अप्रैल को जब कनहर के आदिवासियों पर पुलिस का कहर टूटा, तब और उसके बाद भी रोमा वहां नहीं मौजूद रहीं क्‍योंकि उनके आते ही उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया जाता। लोग इस बात को भी समझते हैं।

बांध के विरोध में अलग-अलग संगठनों का इतना बड़ा गठजोड़ बनने के जवाब में बांध समर्थक लोगों ने भी आंदोलन खड़ा कर दिया है। इस आंदोलन का नाम है ''बांध बनाओ, हरियाली लाओ''। दिलचस्‍प है कि इस आंदोलन में भाकपा(माले) के कुछ पुराने लोग शामिल हैं जिनमें अधिवक्‍ता प्रभु सिंह प्रमुख हैं। भीसुर गांव के रामप्रकाश कहते हैं, ''माले वाले भी हक के लिए ही लगे हुए हैं, लेकिन इनमें से कुछ लोग हैं जो बिचौलिये का काम कर रहे हैं। वे इधर भी हैं और उधर भी हैं।'' माले के एक स्‍थानीय नेता कहते हैं, ''हम लोग यहां स्थिति को ब‍हुत संभालने की कोशिश किए। रोमा तो हम लोगों के बाद आयीं और बने-बनाए आंदोलन में घुस गयीं।''

इस मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू यहां की विधायक रूबी प्रसाद से जुड़ा है। स्थानीय प्रशासन ने विधायक रूबी प्रसाद की अध्यक्षता में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के मसले पर 16 जून 2014 को ग्रामीणों की एक सभा बुलायी। तहलका में प्रकाशित ''कनहर कथा'' में अंशु मालवीय लिखते हैं, ''इस सभा में हजारों लोग मौजूद थे। मंच पर आकर सभी ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध के विरोध में बात रखी। यहां वक्ताओं में वे ग्राम प्रधान भी मौजूद थे जिन्होंने बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रखा है। अंत में मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासन को सौंपा गया, लेकिन जब इस सभा की कार्यवाही की रपट प्रधानों के पास पहुंची तो वे चकित रह गए। इसमें सिर्फ सरकारी अधिकारी एवं विधायक के वक्तव्य थे। जनता के विरोध को उसमें जगह ही नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि प्रशासन एवं सरकार एक कृत्रिम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।''

रूबी प्रसाद की सभा में उठी ग्रामीणों की बांध के विरोध में आवाज़ों के चलते कई लोगों को यह भ्रम हुआ था कि विधायक खुद बांध के विरोध में हैं। पुलिस अधीक्षक यादव इसे साफ़ करते हुए कहते हैं कि रूबी प्रसाद तो बांध के समर्थन में हैं। लोगों को भ्रम है। विधायक ने खुद यादव से कहा था कि ''अगर आप खाली नहीं करवा पा रहे (बांध स्‍थल को प्रदर्शनकारियों से) तो कहिए हम करवा दें।'' यादव दावा करते हैं, ''सभी पार्टियों के लोग बांध के समर्थन में हैं। एक सौ एक परसेंट लोग चाहते हैं कि बांध बने।''

एक सौ एक परसेंट लोगों से यादव का आशय उन लोगों से है जिन्‍हें बांध के बनने से कोई नुकसान नहीं हो रहा। इसमें सरकार, प्रशासन, गैर-आदिवासी शहरी वर्ग और हर राजनीतिक दल शामिल है। ये सब बांध के समर्थन में एकजुट हैं, लिहाजा आदिवासी ग्रामीण बिलकुल अकेले पड़ गए हैं। कुल 22000 के आसपास इन आदिवासियों को कोई भी मनुष्‍यों के बीच नहीं गिन रहा। यह संख्‍या सिर्फ उनकी है जो उत्‍तर प्रदेश की सीमा में रहते हैं। कनहर की डूब में आने वाले छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के गांवों को भी गिन लिया जाए तो 101 परसेंट का बर्बर चेहरा और साफ हो जाएगा। गोलीकांड के बाद कनहर के आदिवासियों की आखिरी उम्‍मीद रोमा, स्‍थानीय नेता गम्‍भीरा और शिवप्रसाद पर टिकी थी। रोमा मौके पर पहुंच पाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि उन्‍हें जिला बदर कर दिया गया है जबकि गम्‍भीरा को 20 अप्रैल की रात इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया जब वे पीयूसीएल के वकील रविकिरण जैन के घर गए हुए थे। गम्‍भीरा को वहां से सोनभद्र लाकर पूछताछ की गई और बाद में जेल भेज दिया गया।

बांध विरोधी आंदोलन में सक्रिय भीसुर के एक नौजवान दुखी मन से कहते हैं, ''आंदोलन की दिशा टूटने के कगार पर जा चुकी है। जनता बहुत चोटिल हो चुकी है। आधे लोग धरने से उठकर चले गए थे। उन्‍हें किसी तरह वापस लाया गया है। पूरा इलाका धारा 144 लगाकर सील कर दिया गया है। जैसे ही लोग जमा होते हैं, कोई न कोई पुलिस की मुखबिरी कर देता है।''

इस शहर में मुखबिरों की कमी नहीं है। हर आदमी एक संभावित मुखबिर है। सोनभद्र का शहरी समाज बिलकुल सिंगरौली की तर्ज पर विकसित हो रहा है जहां हर आदमी हर दूसरे आदमी को मुखबिर मानता है, हर कोई हर किसी पर अविश्‍वास करता है और छोटी-छोटी टुच्‍ची आकांक्षाओं व हितों का नतीजा अंतत: पुलिस की लाठी और गोली के रूप में दिखायी देता है जिसे ''लॉ ऑफ दि लैंड'' कह कर जायज़ ठहराया जाता है। ऐसा समाज बनाने में स्‍थानीय मीडिया की भूमिका सबसे ज्‍यादा नज़र आती है। सोनभद्र के प्रमुख अख़बारों में खबरों का प्रमुख स्रोत पुलिस और प्रशासन हैं। पत्रकार सच्‍चाई को सामने नहीं लाने के लिए कटिबद्ध हैं क्‍योंकि उनके अपने हित झूठ के कारोबार के साथ जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के बाद आदिवासी ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफी की ख़बर को इस कदर दबाया गया कि उसे सामने लाने के लिए दिल्‍ली से एक तथ्‍यान्‍वेषी दल को यहां आना पड़ा, जिसमें यह लेखक भी शामिल था।

इस तथ्‍यान्‍वेषी दल में कुल छह लोग थे- भाकपा(माले)-लिबरेशन की कविता कृष्‍णन, ग्रीनपीस की प्रिया पिल्‍लई, स्‍वतंत्र स्‍त्री अध्रिकार कार्यकर्ता पूर्णिमा गुप्‍ता, स्‍वतंत्र पत्रकार रजनीश, विंध्‍य बचाओ अभियान से देबोदित्‍य सिन्‍हा और यह लेखक। साथ में बनारस से पत्रकार सिद्धांत मोहन भी जुड़ गए थे। गोलकांड की सच्‍चाई को दबाने के लिए स्‍थानीय प्रशासन किस हद तक जा सकता है, उसका पता इस दल के सामने खड़ी की गयी मुश्किलों और इसके उत्‍पीड़न से लगता है। इस दल ने 19 अप्रैल की सुबह बनारस में भर्ती अकलू चेरो से मुलाकात कर के उसका बयान दर्ज किया, जिसके सीने में 14 को गोली लगी थी। इसके बाद शुरू हुआ पुलिसिया निगरानी का सिलसिला, जो अगले दिन वापसी तक लगातार जारी रहा।

बनारस से रॉबर्ट्सगंज के बीच 19 अप्रैल को कड़ा पहरा था। हमारी गाड़ी को रास्‍ते में तीन बार रोकर जांचा गया। किसी तरह सूरज ढलते-ढलते दुद्धी के गांवों में जब दल ने प्रवेश किया, तो उसे बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्‍या होने वाला है। कोरची से कुछ दूरी पर बघाड़ू नाम का एक गांव है। यह गांव आधा डूब में आता है। यहीं पर शाम सात बजे के आसपास दल के सदस्‍य एक चाय की दुकान के बाहर बैठकर सुस्‍ता रहे थे कि जंगल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक पुलिस की कुछ गाडि़यां आकर रुकीं। अचानक कुछ पुलिसवाले एक सादे कपड़े वाले अफसर के नेतृत्‍व में नीचे उतरे और उन्‍होंने पूछताछ शुरू कर दी। सादे कपड़े वाले अफसर ने अपना परिचय नहीं बताया, अलबत्‍ता उसकी गाड़ी पर उपजिला मजिस्‍ट्रेट अवश्‍य लिखा हुआ था। पहले पूछा गया कि आप यहां क्‍या कर रहे हैं। फिर कहा गया कि यह नक्‍सली इलाका है और वे हमारी सुरक्षा करने आए हैं। उसके बाद कविता कृष्‍णन पर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने का आरोप लगाते हुए सादे कपड़े वाले अफसर ने कहा, ''ज्‍यादा होशियारी मत दिखाइए वरना बेइज्‍जत हो जाएंगी।'' ऐसा कहते हुए उसने कविता औश्र दल की महिला सदस्‍यों के साथ बदतमीज़ी की और मोबाइल छीनने की कोशिश की। दल के सदस्‍य देबोदित्‍य सिन्‍हा ने जब इस कार्रवाई पर आपत्ति जतायी तो अफसर ने कहा, ''यही नक्‍सली है। इसे अंदर करो।'' कुछ हस्‍तक्षेप के बाद जब यह मामला ठंडा हुआ तो पुलिस ने दल के ड्राइवर को पकड़कर उसे धमकाना शुरू किया। बड़ी मुश्किल से उसे छुड़ाया गया तो कथित मजिस्‍ट्रेट ने सामान की तलाशी के आदेश दे डाले। एसडीएम की मौजूदगी में पुलिसवालों ने एक-एक कर के सबका सामान जांचना शुरू किया। जब दल की महिलाओं ने पुरुषों द्वारा महिलाओं के सामान की जांच पर आपत्ति जतायी, तब महिला सिपाहियों को बुलाने के लिए वायरलेस करने की बात कही गयी लेकिन अंत तक कोई नहीं आया।

छत्तीसगढ़ की सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर अंधेरे जंगल में पुलिस का व्‍यवहार ऐसा था जैसे आतंकवादियों के साथ किया जाता है। तकरीबन एक घंटे तक पुलिस ने दल को हिरासत में रखा। कथित मजिस्‍ट्रेट का आग्रह था कि दल को दुद्धी थाने ले जाकर पूछताछ की जाए। जब दल ने जिलाधिकारी को भेजे पत्र की प्रति दिखायी, तब अचानक खुद को मजिस्‍ट्रेट कह रहा सादे कपड़ों वाला शख्‍स कहीं गायब हो गया और एक सभ्‍य पुलिस इंस्‍पेक्‍टर जाने कहां से आ गया। इस दौरान घटना की सूचना बड़े पैमाने पर फोन और एसएमएस से फैलायी जा चुकी थी। कुछ पत्रकारों ने सोनभद्र के डीएम को फोन भी कर दिया था। इस दबाव में इंस्‍पेक्‍टर ने माना कि प्रशासनिक स्‍तर पर दल के आने की सूचना को निचले अधिकारियों तक नहीं भेजा गया था और यह एक चूक है। इसके बावजूद दल को गांव में रुकने से मना किया गया और नक्‍सलियों सुरक्षा के नाम पर खदेड़ कर दुद्धी तहसील तक ले आया गया।

बाज़ार में पुलिस की गाडि़यां नदारद हो गयीं और अचानक खुद को एसडीएम बताने वाले एक और अधेड़ शख्‍स सादे कपड़ों में अवतरित हुए। आखिर जंगल में मिला खुद को मजिस्‍ट्रेट कहने वाला वह शख्‍स कौन था? इसका पता अब तक नहीं चल सका है। बार-बार कहने पर जिलाधिकारी ने भी उसकी पहचान उजागर नहीं की। बहरहाल, रात में दुद्धी के जिस डीआर पैलेस नामक होटल में कमरा देखा गया, उसने भोजन के बाद कमरा देने से इनकार कर दिया। उसके ऊपर संभवत: कोई दबाव था, जिसका उद्घाटन सवेरे हुआ। रात में खुद को होटल का मालिक बताने वाले मनोज जायसवाल नाम के व्‍यक्ति से बातचीत कर के रुकने का इंतज़ाम हुआ लेकिन रात भर होटल की गश्‍त लगने की आवाज़ें आती रहीं। सवेरे पता चला कि रात में होटल में मौजूद कर्मचारी के पास थाने से दो बार फोन आए थे और पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे।

अगले दिन सुबह होटल से बाहर निकलते ही दल को पुलिस ने घेर लिया। डीएस यादव नाम के पुलिसकर्मी ने दल के ऊपर लौट जाने का भारी दबाव बनाया। यह दल जब घायलों से मिलने अस्‍पताल पहुंचा तो वहां पुलिस ने भीतर जाने से रोकते हुए धारा 144 का हवाला दिया। डीएम से फोन पर बातचीत के बाद भीतर जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन असली दृश्‍य अभी बाकी था। थोड़ी देर बाद एक दो सितारा पुलिसकर्मी देवेश मौर्य एक उत्‍तेजित भीड़ को लेकर विजयी भाव में अस्‍पताल पहुंचे। यह भीड़ भड़काऊ नारे लगा रही थी और किसी तरह दल को बाहर निकालने पर आमादा थी। ''एनजीओ वापस जाओ'', ''विकास विरोधी मुर्दाबाद'', ''आइएसआइ एजेंट वापस जाओ'', ''मारो जुत्‍ता तान के'', आदि नारे लगाने वाले करीब डेढ़ सौ लोग थे जिन्‍होंने अस्‍पताल को घेर लिया था। पुलिस वालों में इस भीड़ में दोगुनप उत्‍साह आ गया था। संदीप कुमार राय नाम के एक पुलिसकर्मी ने पत्रकार सिद्धांत मोहन से चुटकी लेते हुए कहा, ''सबका समय आता है। कल तक आपका था, आज हमारा समय है।'' यह भीड़ पूरी तरह पुलिस की ओर से प्रायोजित थी जिसमें बाज़ार के लोग, व्‍यापारी, वकील और ठेकेदार शामिल थे जो बांध समर्थक हैं।

एक बार फिर डीएम के हस्‍तक्षेप के बाद पुलिस ने उग्र भीड़ को पीछे धकेला और तकरीबन दो घंटे तक दल को अस्‍पताल में बंधक बनाए रखने के बाद उसकी गाड़ी तक पुलिस संरक्षा में छोड़ा गया। इसके बावजूद एसडीएम की जिस गाड़ी में दल के सदस्‍यों को उनके होटल तक ले जाया गया, उस पर पीछे से जूते और चप्‍पल फेंके गए। दो बजे रॉबर्ट्सगंज में डीएम से बैठक थी। वहां जाते वक्‍त हाथीनाला पर एक बार फिर दल को पुलिस ने रोका और सबके नाम लिखवाए। डीएम से इन घटनाओं की बाबत पूछे जाने पर संक्षिप्‍त-सा जवाब मिला, ''अगर अभद्रता हुई है तो आइ फील सॉरी फॉर इट।''

पुलिस अधीक्षक का कहना था कि ''आपको इलाके में चुपके-चुपके नहीं जाना चाहिए था।'' जब ईमेल से भेजे गए पत्र का हवाला दिया गया तो यादव बोले, ''ईमेल की क्‍या विश्‍वसनीयता है?'' जांच दल की महिलाओं के साथ हुए दुर्व्‍यवहार पर यादव ने कहा, ''अगर आपने बता दिया होता कि पत्रकार हैं तो कोई दिक्‍कत नहीं होती।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या इसका मतलब यह माना जाए कि आपको सामाजिक कार्यकर्ताओं से दिक्‍कत है, तो यादव ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति खुले तौर पर अपना विद्वेष जाहिर किया। बाद में निजी बातचीत में यादव ने कहा, ''हमें गुप्‍तचर विभाग से सूचना मिली थी कि दिल्‍ली से जो टीम आ रही है, वह गांवों में जाकर लोगों को संगठित करने का काम करेगी।''
जांच दल से मुलाकात के बाद 20 अप्रैल की देर शाम जिलाधिकारी संजय कुमार ने एक प्रेस नोट जारी किया। उसमें लिखा है:
''वाकई 'कनहर सिंचाई परियोजना' के विस्थापितों को सभी अनुमन्य सुविधाएं दी जाएंगी। किसी विस्थापित को विस्थापन राशि के लिए भटकना नहीं होगा। डूब क्षेत्र के सुन्दरी, भीसुर, कोरकी, कुदरी, बड़खोरा आदि गांवों में कैम्प लगाकर दस दिनों के अन्दर चेक वितरण का कार्य किया जाएगा।'' उक्त बातें जिलाधिकारी श्री संजय कुमार ने कनहर सिंचाई परियोजना के डूब के गांव सुन्दरी के प्राथमिक विद्यालय प्रांगण में वरिष्‍ठ सपा नेता इस्तयाक अहमद की पहल पर कनहर विस्थापितों के साथ खुली बातचीत/बैठक में कहीं।
''जिलाधिकारी श्री कुमार ने मौके पर मौजूद राबर्ट्सगंजजिलाध्यक्ष समाजवादी पार्टी अविनाश कुशवाहा, जिला महासचिव विजय यादव, विधानसभा अध्यक्ष दुद्धी श्री अवध नारायण यादव, जुबैर आलम, डा. लवकुश प्रजापति, तकरार अहमद, नूरूल हक सदर, चन्द्रमणि, ग्राम प्रधान कुदरी इस्लाउद्दीन, ग्राम प्रधान सुन्दरी राम प्रसाद, प्रधान कोरची रमेश कुमार, प्रधान भीसुर परमेश्‍वर यादव के सार्थक प्रयासों की तारीफ करते हुए सारा श्रेय ग्रामीणों/विस्थापितों को दिया।''

अगले दिन इस प्रेस नोट को सारे स्‍थानीय अखबारों ने प्रमुखता से छापा, लेकिन किसी ने भी यह सवाल पूछने की ज़हमत नहीं उठायी कि जिलाधिकारी की इस बैठक में समाजवादी पार्टी के वे तमाम नेता क्‍यों मौजूद थे जो उसी सुबह दुद्धी अस्‍पताल के बाहर जांच दल के खिलाफ नारा लगाते और गाली देते पाए गए थे। 22 अप्रैल के अखबारों में यह ख़बर तो छपी कि सुन्‍दरी गांव में सर्वे का काम शुरू हो गया है, लेकिन किसी ने भी यह सूचना मिलने के बावजूद छापने की ज़हमत नहीं उठायी कि अकलू के साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी जिन्‍हें 14 के बाद से लापता बताया जा रहा था, वे मिर्जापुर जेल में हैं। अलबत्‍ता जो खबरें छापी गयीं उनका शीर्षक कुछ ऐसे था:

1. कनहर बांध के निर्माण ने अब पकड़ी रफ्तार (हिन्‍दुस्‍तान)
2. कनहर परियोजना मार्च 2018 तक होगी पूरी (हिन्‍दुस्‍तान)
3. पुलिस पर हमले का मुख्‍य आरोपी गिरफ्तार (दैनिक जागरण, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)
4. सुंदरी गांव में शुरू हुआ सर्वे (दैनिक जागरण)
5. एसडीएम, कोतवाल का हमलावर बंदी (अमर उजाला, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)

इनके अलावा एक अप्रत्‍याशित खबर सभी अखबारों के सोनभद्र संस्‍करण में 22 अप्रैल को प्रकाशित हुई:
 ''खनन हादसे में दो खान अफसरों समेत आठ फंसे''
 यह खबर 27 फरवरी 2012 को बिल्‍ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में हुए एक हादसे की मजिस्‍ट्रेटी जांच से जुड़ी है जिसमें 11 मजदूर मारे गए थे। लंबे समय से इाकी जांच चल रही थी लेकिन अचानक इस जांच को पूरा कर के जिलाधिकारी संजय कुमार ने रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें दो खन अधिकारी, एक डीएफओ और आठ लोगों को दोषी बना दिया गया है। स्‍थानीय अखबार ''वनांचल एक्‍सप्रेस'' के संपादक शिवदास का कहना है, ''यह रिपोर्ट इसलिए लायी गयी है ताकि कनहर में हुए गोलीकांड पर परदा डाला जा सके और प्रशासन की साफ-सुथरी छवि को सामने लाकर आदिवासियों के दमन पर उठी ताज़ा बहस को कमजोर किया जा सके।''

कनहर की जटिल कहानी यहीं रुकने वाली नहीं है। बांध पर लगातार काम जारी है। इलाके में पुलिस बल बढ़ा दिया गया है। जांच दल के आने से जो खबरें और तस्‍वीरें बाहर निकल पायी हैं, उनसे प्रशासन बहुत चिंतित है क्‍योंकि मामला सिर्फ एक अवैधानिक बांध बनाने का नहीं बल्कि पैसों की भारी लूट और बंटवारे का भी है जिसके सामने आने का डर अब पैदा हो गया है। इसके अलावा जांच दल की वापसी के बाद कनहर की ओर राष्‍ट्रीय मीडिया ने भी अपना रुख़ कर लिया है। एनडीटीवी ने छोटी ही सही लेकिन एक अहम खबर आदिवासियों के दमन पर 21 अप्रैल को प्रसारित की है। जांच दल से दुर्व्‍यवहार की खबरें अंग्रेज़ी के अखबारों में आने के बाद उम्‍मीद बंधी है कि कि शायद यह मामला आने वाले दिनों में राष्‍ट्रीय फ़लक पर उठ सकेगा।

इस दौरान कनहर के आदिवासियों के लिए सोशल मीडिया पर अच्‍छा-खासा समर्थन जुटा है। वरिष्‍ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्‍तव ने कनहर गोलीकांड पर फेसबुक पर जो लिखा है, सोन नदी के ऊपर फैले अभद्रता के राज पर उससे बेहतर लिखना मुमकिन नहीं:
''यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बर्लिन से ट्वीट कर चिंता ज़ाहिर की है हेम्बोल्ट विश्वविदयालय के अभिलेखागार से लोहिया जी की वह थीसिस ग़ायब है जिस पर उन्हें डॉक्टरेट दी गयी थी। ख़बर सुनते ही तमाम समाजवादी पत्रकार और लोहियावादी सोशल मीडिया पर रोना-पीटना मचाने लगे हैं। उन सबके लिए सूचना है कि डॉक्टर लोहिया की थीसिस अधबने कनहर बाँध में ख़ून से लिथड़ी पड़ी है। कुछ पन्ने सोनभद्र पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं। दम हो तो बचा लें समाजवादी थीसिस को!''

सोन का पानी लाल है...भाग-१

यूपी पुलिस की संगीनों पर चिपके हैं लोहिया की गुम थीसिस के पन्‍ने
अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

इस साल अक्षय तृतीया पर जब देश भर में लगन चढ़ा हुआ था, बारातें निकल रही थीं और हिंदी अखबारों के स्‍थानीय संस्‍करण हीरे-जवाहरात के विज्ञापनों से पटे पड़े थे, तबपश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के कुछ घरों में पहले से तय शादियां अचानक टाल दी गई थीं। कई अनब्‍याही लड़कियों के अभागे बाप बेमौसम बरसात और ओले से बरबाद फसल की भेंट गए, तो कई के भाई लेटी हुई गेहूं की बालियों और सड़े हुए आलू देखकर सदमे आ गए थे। खबरों की मानें तो बुलंदशहर, इटावा, बुंदेलखण्‍ड और मैनपुरी के किसान आगरा के पागलखाने के चक्‍कर लगा रहे थे। तबाही पूरब में भी हुई थी, लेकिन बनारस से सटे सोनभद्र में कहर कुदरत ने नहीं बल्कि पुलिस की लाठियों ने बरपाया था। इस इलाके में कम से कम दो शादियां ऐसी थीं जो अगर टली नहीं, तो उनमें रोका और कन्‍यादान करने के लिए लड़की का बाप नहीं आ सका।

फौजदार (पुत्र केशवराम, निवासी भीसुर) के बेटे का 22 अप्रैल को तिलक था। अगले हफ्ते उनके बेटे की शादी होनी थी। पड़ोस के गांव में 24 अप्रैल को देवकलिया और शनीचर (पुत्र रामदास, निवासी सुन्‍दरी) की बेटी की शादी थी। फौजदार समेत देवकलिया और शनीचर सभी 20 अप्रैल तक दुद्धी तहसील के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में भर्ती थे। देवकलिया की बेटी घर पर अकेली थी। 20 की शाम को अचानक फौजदार और शनीचर को गंभीर घायल घोषित कर के पांच अन्‍य मरीज़ों के साथ जिला चिकित्‍सालय में भेज दिया गया जबकि देवकलिया को दस मरीज़ों के साथ छुट्टी दे दी गयी। देवकलिया जानती थी कि चार दिन में अगर वह शादी की तैयारी कर भी लेगी तो उसके पति शनीचर को अस्‍पताल से नहीं छोड़ा जाएगा क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश के समाजवादी राज में अस्‍पताल का दूसरा नाम जेल है। समाजवाद की इस नयी परिभाषा को आए यहां बहुत दिन नहीं बीते हैं।

सोनभद्र उत्‍तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जि़ला है। यहां की आधे से ज्‍यादा ज़मीन जंगल की है और दुनिया के सबसे पुराने जीवाश्‍म भी यहीं की विंध्‍य श्रृंखलाओं में पाए जाते हैं। आदिवासी बहुल यह जि़ला अपने आप में इकलौता है जिसकी सीमा चार राज्‍यों से एक साथ लगती है- छत्‍तीसगढ़, बिहार, झारखण्‍ड और मध्‍यप्रदेश। पिछले पांच महीने से अचानक इस जि़ले को 'विकास' नाम का रोग लग गया है। इसके पीछे पांगन नदी पर प्रस्‍तावित कनहर नाम का एक बांध है जिसे कोई चालीस साल पहले सिंचाई परियोजना के तहत मंजूरी दी गयी थी। झारखण्‍ड (तत्‍कालीन बिहार), छत्‍तीसगढ़ (तत्‍कालीन मध्‍यप्रदेश) और उत्‍तर प्रदेश के बीच आपसी मतभेदों के चलते लंबे समय तक इस पर काम रुका रहा और बीच में दो बार इसका लोकार्पण भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी लागत भी आरंभिक 23 करोड़ रुपये से बढ़कर 2800 करोड़ रुपये हो गयी। चूंकि 2014 के लोकसभा चुनाव ने तय कर दिया था कि इस देश पर वही राज करेगा जो 'विकास' का जुमला रटेगा, लिहाजा खुद को समाजवादी कहने वाले भी इस लोभ से अछूते न रह सके। पिछले साल जिस वक्‍त अखिलेश यादव की सरकार ने नयी-नयी विकास परियोजनाओं का एलान करना शुरू किया, ठीक तभी उनकी सरकार को इस भूले हुए बांध की भी याद हो आयी। कहते हैं कि उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने इसमें खास दिलचस्‍पी दिखायी और सोनभद्र को हरा-भरा बनाने के नाम पर इसका काम शुरू करवा दिया। खुली निविदा के माध्‍यम से हैदराबाद की कंपनी हिन्‍दुस्‍तान इंजीनियर्स सिंडीकेट (एचईएस) इन्‍फ्रा प्राइवेट लिमिटेड को बांध निर्माण का सौ फीसदी ठेका दे दिया गया। दिसंबर में काम शुरू हुआ तो ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू किया। प्रशासन से उनकी पहली झड़प 23 दिसंबर 2014 को हुई। इसके बाद 14 अप्रैल, 2015 को आंबेडकर जयन्‍ती के दिन पुलिस ने धरना दे रहे ग्रामीणों पर लाठियां बरसायीं और गोली चलायी। एक आदिवासी अकलू चेरो को छाती के पास गोली लगकर आर-पार हो गयी। वह बनारस के सर सुंदरलाल चिकित्‍सालय में भर्ती है। इस घटना के बाद भी ग्रामीण नहीं हारे। तब ठीक चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह सोते हुए ग्रामीणों को मार कर खदेड़ दिया गया, उनके धरनास्‍थल को साफ कर दिया गया और पूरे जिले में धारा 144 लगा दी गयी।

फौजदार, शनीचर और देवकलिया उन पंद्रह घायलों में शामिल सिर्फ तीन नाम हैं जिन्‍हें 20 अप्रैल तक दुद्धी के ब्‍लॉक चिकित्‍सालय में बिना पानी, दातुन और खून से लथपथ कपड़ों में अंधेरे वार्डों में कैद रखा गया था। प्रशासन की सूची के मुताबिक 14 अप्रैल की घटना में 12 पुलिस अधिकारी/कर्मचारी घायल हुए थे जबकि सिर्फ चार प्रदर्शनकारी घायल थे। इसके चार दिन बाद 18 अप्रैल की सुबह पांच बजे जो हमला हुआ, उसमें चार पुलिसकर्मियों को घायल बताया गया है जबकि 19 प्रदर्शनकारी घायल हैं। दोनों दिनों की संख्‍या की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि 18 अप्रैल की कार्रवाई हिसाब चुकाने के लिए की गयी थी। इस सूची में कुछ गड़बडि़यां भी हैं। मसलन, दुद्धी के सरकारी चिकित्‍सालय में भर्ती सत्‍तर पार के जोगी साव और तकरीबन इतनी ही उम्र के रुकसार का नाम सरकारी सूची में नहीं है। इसी तरह सुन्‍दरी गांव से दो महिलाएं 18 अप्रैल की घटना के बाद से ही लापता बतायी जा रही हैं जिनके बारे में तीन तरह की बातें सुनने में आयी हैं। एक स्‍थानीय पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर दावे से कहते हैं कि इनकी मौत हो गयी है और इन्‍हें पुलिस ने मौके पर ही दफना दिया है। कुछ दूसरे पत्रकारों का मानना है कि वे दोनों 14 अप्रैल की घटना में नामजद थीं और अभी जेल में हैं। जिले के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं कि कोई भी लापता नहीं है, यह सब अफ़वाह है। पुलिस अधीक्षक की बात पर इसलिए आशंका होती है क्‍योंकि 14 अप्रैल की घटना में गोली से घायल अकलू चेरो के दो साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी, जो अकलू के साथ बनारस तक गए थे, वे भी 20 अप्रैल तक लापता ही माने जा रहे थे जब तक कि खुद यादव ने इस संवाददाता के पूछने पर यह स्‍वीकार नहीं कर लिया कि वे दोनों मिर्जापुर की जेल में बंद हैं। इसका मतलब है कि जो लापता बताये जा रहे हैं वे जेल में भी हो सकते हैं। इसके अलावा 14 के हमले में घायल तीन और 18 के हमले में घायल छह ग्रामीणों (सरकारी सूची के मुताबिक) का कोई पता नहीं लग पाया है। इनमें से कुछ रॉबर्ट्सगंज के जिला चिकित्‍सालय में भर्ती हो सकते हैं। सूची में एक नाम 18 अप्रैल को घायल मनोज खरवार का है जो छत्‍तीसगढ़ के बलरामपुर का बताया गया है। अफ़वाह तो 18 अप्रैल को कुछ लोगों के मरने की भी थी, लेकिन यहां जिंदा लोगों की पहचान को लेकर ही इतना संशय है कि छत्‍तीसगढ़ के एक अखबार ने सोनभद्र जिले के सुन्‍दरी गांव के अकलू को भी छत्‍तीसगढ़ का बता दिया था।

अगर आपको लगता है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के संबंध में दी गयी उपर्युक्‍त सूचनाएं अधूरी हैं, तो आप बिलकुल ठीक सोच रहे हैं। जान जोखिम में डालकर भी अगर इतने ही तथ्‍य निकल पाएं, तो हम समझ सकते हैं कि सच्‍चाई को छुपाने के लिए प्रशासन की ओर से कितना ज़ोर लगाया जा रहा होगा। हम वास्‍तव में नहीं जान सकते कि बांध की डूब से सीधे प्रभावित होने वाले गांवों सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के कितने घरों में इस लगन बारात आने वाली थी, कितने घरों में वाकई आयी और कितनों में शादियां टल गयीं। कितने घर बसने से पहले उजड़ गए और कितने बसे-बसाये घर बांध के कारण उजड़ेंगे, दोनों की संख्‍या जानने का कोई भी तरीका हमारे पास नहीं है। दरअसल, यहां कुछ भी जानने का कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि आप सरकारी बयानों पर जस का तस भरोसा कर लें। वजह इतनी सी है कि यहां एक बांध बन रहा है और बांध का मतलब विकास है। इसका विरोध करने वाला कोई भी व्‍यक्ति विकास-विरोधी और राष्‍ट्र-विरोधी है।

सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव इस बात को बड़े सहज तरीके से समझाते हैं, ''पूरी पब्लिक साथ में है कि बांध बनना चाहिए। सरकार साथ में है। तीनों राज्‍य सरकारों का एग्रीमेंट हुआ है बांध बनाने के लिए... हम लोगों ने जितना एहतियात बरता है, उसकी पूरी पब्लिक तारीफ़ कर रही है।'' यादव का यह बयान एक मान्‍यता है। इस मान्‍यता के पीछे काम कर रही तर्क-प्रणाली को आप सोनभद्र के युवा जिलाधिकारी संजय कुमार के इस बयान से समझ सकते हैं, ''हमने जो भी बल का प्रयोग किया, वह इसलिए ताकि लोगों को मैसेज दिया जा सके कि लॉ ऑफ दि लैंड इज़ देयर...। आप समझ रहे हैं? ऐसे तो लोगों में प्रशासन और पुलिस का डर ही खत्‍म हो जाएगा। कल को लोग कट्टा लेकर गोली मार देंगे... आखिर हमारे दो गज़ेटेड अफसर घायल हुए हैं...! बेचारे एसडीएम ने अपनी जेब से दस लाख अपने इलाज पर खर्च किया है!''

यह बात अपने आप में चौंकाने वाली है कि एक एसडीएम ने अपने इलाज पर अपनी जेब से दस लाख रुपये कैसे खर्च कर दिए। ज़ाहिर है, होगा तभी खर्च किए होंगे। सुन्‍दरी, भीसुर और कोरची के आदिवासियों के पास अपने ऊपर खर्च करने को सिर्फ आंसू हैं। समय के साथ वे भी अब कम पड़ते जा रहे हैं। दुद्धी के अस्‍पताल में भर्ती जोगी साव (जिनका नाम घायलों की सरकारी सूची में दर्ज नहीं है) हमें देखते ही फफक कर रो पड़ते हैं। गला भर्रा जाता है। इशारे से दिखाते हैं कि कहां-कहां पुलिस की मार पड़ी है। पैर के ज़ख्‍म दिखाने के लिए हलका सा झुकते हैं तो कमर पकड़कर ऐंठ जाते हैं। इनकी उम्र सत्‍तर बरस के पार है। 18 अप्रैल की सुबह धरनास्‍थल पर ये सो रहे थे। जब पुलिस बल आया, तो नौजवानों की फुर्ती से ये भाग नहीं पाए। वहीं गिर गए। वे रोते हुए बताते हैं, ''ओ दिन हमहन रह गइली ओही जगह... एके बेर में पहुंच गइलन सब... धर-धर के लगावे लगलन डंटा। मेहरारू के झोंटा धर के लेसाड़ के मारे लगलन... लइकनवो के नाहीं छोड़लन...।'' जोगी साव के शरीर पर डंडों के निशान हैं। उनके आंसू नहीं रुकते जब वे हाथ दिखाते हुए कहते हैं, ''एक डंटा मरले हउवन... दू डंटा गोड़े में... तब जीप में ले आके इहां गिरउलन।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या कोई मुकदमा भी दर्ज हुआ है उनके खिलाफ़, वे बोले, ''मुकदमा त दर्ज नाहीं कइलन, बाकी कहलन कि अस्‍पताल में चलिए, जेल नहीं जाना पड़ेगा।''

जब हम 20 अप्रैल को दुद्धी अस्‍पताल के इस वार्ड में पहुंचे, तो कुल आठ पुरुष यहां भर्ती थे। महिला वार्ड में पांच महिलाएं थीं और अस्‍पताल के गलियारे में दो घायलों को अलग से लेटाया गया था। कुल दस पुरुषों में बस एक नौजवान था जिसका नाम था मोइन। बाकी नौ पुरुषों की औसत उम्र साठ के पार रही होगी। गलियारे में पहले बिस्‍तर पर जो बुजुर्ग लेटे थे, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। नाम- बूटन साव, गांव कोरची। इन्‍हें भी डंडे की मार पड़ी थी। चोट दिखाते हुए बोले, ''आप जनते के तरफ से हैं न?'' हां में जवाब देने पर बोले, ''हम लोगों को छोड़वा दीजिए घर तक''। और इतना कह कर वे अचानक रोने लगे। यह पूछने पर कि कब यहां से छोड़ने को कहा गया है, बूटन बोले, ''छोड़ेंगे नहीं... किसी को मिलने भी नहीं आने दे रहे हैं। बोले हैं यहीं रहना है, नहीं तो जेल जाओ।''

सुन्‍दरी में 18 अप्रैल की सुबह साठ-सत्‍तर साल के बूढ़ों के सिर पर डंडा मारा गया है। औरतों के कूल्‍हों में डंडा मारा गया है। जहूर को पुलिस ने इतनी तेज़ हाथ पर मारा कि तीन उंगलियां ही फट गयी हैं। पुलिस अधीक्षक यादव कहते हैं, ''सिर पर इरादतन नहीं मारा गया, ये ''इन्सिडेन्‍टल'' (संयोगवश) है।'' ''क्‍या तीनों बुजुर्गों के सिर पर किया गया वार ''इन्सिडेन्‍टल'' है?'' इस सवाल के जवाब में वे बोले, ''बल प्रयोग किया गया था, ''इन्सिडेन्‍टल'' हो सकता है। हम कोई दुश्‍मन नहीं हैं, इसकी मंशा नहीं थी।'' ''और 14 अप्रैल को अकलू के सीने को पार कर गयी गोली?'' यादव विस्‍तार से बताते हैं, ''पुलिस ने अपने बचाव में गोली चलायी। थानेदार (कपिलदेव यादव) को लगा कि मौत सामने है। वैसे भी हमारे यहां पहले एसडीएम पर हमला हो चुका है। सबसे पहले अकलू ने बांस की पटिया से थानेदार को मारा। फिर उसके भाई रमेश ने थानेदार के हाथ पर कुल्‍हाड़ी से हमला किया। पुलिस अफसर नीचे गिर गया। उसे लगा कि वह नहीं बच पाएगा, तो उसने रक्षा के लिए हवा में दो राउंड फायर किया।'' यह पूछे जाने पर कि हवा में फायर करने से अकलू की छाती के पास गोली कैसे लगी, यादव कहते हैं,''थानेदार ''लेड डाउन'' (पीछे की ओर झुका हुआ) था, ऐसी आपात स्थिति में ज्‍योमेट्री नहीं नापी जाती है। उसने खुद कहा कि उसे पता ही नहीं चला कि गोली कहां लगी है।''

यादव के मुताबिक आपात स्थिति में ''ज्‍योमेट्री'' नहीं नापी जाती है। उनके हिसाब से एकबारगी अगर मान भी लें कि पुलिस ने गोली ''आत्‍मरक्षा'' में चलायी और सिर पर डंडा ''संयोगवश'' चल गया, तो सवाल उठता है कि गांवों में घुसकर लोगों को पहाड़ तक खदेड़ देना, औरतों के साथ बदतमीज़ी करना, घरों पर हमला करना, उनके मुर्गे-मुर्गियां पकाकर खा जाना कौन सी गणित कहलाता है? यादव पूछते हैं, ''आप ही बताइए कौन सा घर तोड़ा गया। पुलिस आज तक गांव में नहीं घुसी है।'' डीएम भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। ''और पीएसी?'' इससे भी वे इनकार करते हैं। यादव पलटकर कहते हैं, ''तब तो आपने यह भी सुना होगा कि छह लोगों को मारकर पुलिस ने दफना दिया है?'' हमारे इनकार करने पर वे दोबारा इस बात पर ज़ोर देते हैं। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''हज़ारों मैसेज सर्कुलेट किए गए हैं कि छह लोगों को मारकर दफनाया गया है। इंटरनेशनल मीडिया भी फोन कर रहा है। एमनेस्‍टी वाले यही कह रहे हैं। हम लोग पागल हो गए हैं जवाब देते-देते। इतनी ज्‍यादा अफ़वाह फैलायी गयी है। चार दिन तक हम लोग सोये नहीं। ''  


कौन फैला रहा है यह अफ़वाह? जवाब में जिलाधिकारी हमें एक एसएमएस दिखाते हैं जिसमें 18 तारीख के हमले में पुलिस द्वारा छह लोगों को मार कर दफनाए जाने की बात कही गयी है। भेजने वाले का नाम रोमा है। रोमा सोनभद्र के इलाके में लंबे समय से आदिवासियों के लिए काम करती रही हैं। 14 अप्रैल की घटना के बाद जिन लोगों पर नामजद एफआइआर की गयी उनमें रोमा भी हैं। पुलिस को उनकी तलाश है। डीएम कहते हैं कि कनहर बांध विरोधी आंदोलन को रोमाजी ने अपना निजी एजेंडा बना लिया है। ''तो क्‍या सारे बवाल के केंद्र में अकेले रोमा हैं?'' यह सवाल पूछने पर वे मुस्‍करा कर कहते हैं, ''लीजिए, सारी रामायण खत्‍म हो गयी। आप पूछ रहे हैं सीता कौन है।'' डीएम और एसपी दोनों अबकी हंस देते हैं। 

26 फ़रवरी 2014

तस्वीर के पर्दे में: मुज़फ्फरनगर राहत शिविरों से लौट कर

रियाज़ उल हक़

मलकपुर शिविर, शामली. अपनी बीमार मां और हताश पिता से बीच चार लोगों के परिवार के लिए आटा गूंधते हुए निसा कैमरा देख कर रुकती नहीं. बस मुस्कुरा देती है. पास के खाट पर उसकी मां की सांसें दमे से उखड़ रही हैं और पिता धुआं उगलते चूल्हे में आग जलाने की कोशिश कर रहे हैं.

बिना दीवारों वाली यह एक ऐसी जगह है जहां रातों में तापमान दो डिग्री तक गिर जाता है. हवा से बचाने के लिए उनके पास पॉलिथीन की चादरों, फटे कपड़ों और चीथड़े हो चुके कंबलों के अलावा कुछ नहीं है. आसपास गन्ने की सूखी हुई पत्तियां हैं, लकड़ी की चिन्नियां हैं, न्यूमोनिया से मरते बच्चों की फेहरिश्त है, खाली पेट दिन गुजारने की मजबूरियां हैं और अपने घर से बेदखल कर दिए जाने की जलील यादें हैं. इन सबके बीच वह कौन सी चीज है जो उन्हें कैमरे के सामने मुस्कुरा उठने के लिए तैयार करती है?

क्या यह सिर्फ कैमरे के आगे खड़े होकर मुस्कुराने की आदत भर है?

लेकिन यह मुमकिन नहीं है. मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत के जो एक लाख से ज्यादा लोग अपने घरों से उजाड़ दिए गए हैं, गुजर बसर की आखिरी उम्मीदें भी जिनसे छीन ली गई हैं, जिनकी हरेक पुरानी चीज को उनकी जिंदगी से बाहर कर दिया गया है- यह सिर्फ एक आदत भर नहीं हो सकती कि वे कैमरे के आगे मुस्कुराएं.

इसका संबंध काफी हद तक इससे है कि वे अपनी जिंदगी में फोटोग्राफ्स को किस तरह लेते आए हैं.

यह यकीन किया जाता है कि फोटोग्राफ किसी एक चुने हुए पल को हमेशा के लिए, या कम से कम लंबे समय तक के लिए, सहेज कर रख लेता है. वक्त गुजर जाता है, आदमी गुजर जाते हैं, जगहें बदल जाती हैं, लेकिन तस्वीरों में बचा कर रखा हुआ वह पल ज्यों का त्यों बना रहता है. बदले हुए हालात में वह उस जिंदगी की यादगार के रूप में मौजूद रहता है. फोटोग्राफ द्वारा यह भूमिका अपना लेने के कारण इंसानी याद्दाश्त पर उस खास मौके को हमेशा ज्यों का त्यों बचा कर रखने की जिम्मेदारी नहीं रहती. और चूंकि एक फोटोग्राफ भौतिक रूप में मौजूद रहता है न कि महज किसी की याद में, इसलिए वह सबके लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होता है. इस सहूलियत के कारण फोटोग्राफ्स को उन हालात के एक सच्चे सबूत की तरह लिया जाता है, जिनसे एक खास वक्त में जिंदगी को गुजरना पड़ा था.

यानी ये आदतें नहीं बल्कि यादें हैं, जो इन हालात में फोटोग्राफ के लिए तैयार होने को सहज बनाती हैं.

वे यादें खौफ और आतंक में डूबी हुई रातों की यादें हैं. जब मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, सहारनपुर और बागपत जिलों के दूर दराज के उनके गांवों में प्रभुत्वशाली हिंदू भू-स्वामी जातियों तथा खाप पंचायतों के नेतृत्व में दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जनसंहार, औरतों पर यौन हमले, आगजनी और लूटपाट की गई. झूठी खबरों और अफवाहों के बूते पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया गया कि उनका गांवों में रहना मुमकिन नहीं रह गया. मुस्लिम आबादी वाले मुहल्लों पर हमले हुए, उनकी दुकानें और मकान लूट लिए गए. औरतों के खिलाफ किए गए अमानवीय अपराधों की ऐसी शिकायतें हैं, जिन पर एकबारगी यकीन नहीं होता. आरा मशीन पर उन्हें चीर देने की शिकायतें. कांच के टुकड़ों पर, निर्वस्त्र करके नाचने पर मजबूर करने की शिकायतें. मुस्लिम गोरी औरतों को हमलावरों द्वारा जबरन अपने घर में कैद कर रख लेने की शिकायतें.

शामली जिले के फुगाना गांव में मेहरदीन की नंगी लाश पिंकू जाट के घर में बल्लियों से लटकी हुई मिली. एक दूसरे गांव में घटना की पड़ताल करने दिल्ली से गई एक टीम को कहा गया कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि मुसलमान कितनी संख्या में मार दिए गए? उनके तो बच्चे ज्यादा होते हैं.

सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता. कम से कम उस व्यवस्था को तो बिल्कुल ही नहीं, जिसे बटन दबा कर बदल देने के दावों की गूंज अभी ठीक से खत्म भी नहीं हुई है. मेहरदीन की तरह सीधे हमले में मार दिए गए लोगों की तादाद सरकारी तौर पर अधिक से अधिक 80 है लेकिन गैर सरकारी तौर पर यह संख्या 130 के ऊपर जाती है. जो इन हमलों में जीवित बच गए वे एक अनिश्चित भविष्य में दाखिल हुए. उनमें से ज्यादातर पिछले चार महीनों से ज्यादा वक्त इन शिविरों में गुजार चुके हैं, जहां बाहर से आ रही नाकाफी मदद किसी तरह जिंदा रख पा रही है. कभी कभी वह भी नहीं. जैसे कि चित्तमखेड़ी, बागपत से आईं महबूबा के लिए अपनी बच्ची को भूल पाना मुश्किल हो रहा है. 2 दिसंबर को बुखार और उल्टी शुरू हुई तो उन्होंने पाया कि उसे ठंड लगी है. अगले दिन सवेरे वे उसे पास के कैराना कस्बे में एक डॉक्टर को दिखाने ले गईं. इंजेक्शन देकर इंतजार करने के बाद भी जब उसकी हालत नहीं सुधरी तो डॉक्टर ने उन्हें लौटा दिया. उस रात दो बजे उनकी बच्ची गुजर गई. खुशनुमा! अब बस यह एक नाम बचा रह गया है, एक खाली जगह की शक्ल में, जो यह महसूस कराता है कि वह बच्ची कभी इस दुनिया में हुआ करती थी.

महबूबा के पति फावड़े की मजदूरी करते हैं. यानी जमीन के मालिक प्रभुत्वशाली तबके के गन्ने के खेतों में काम करते हैं. उनके पास अपनी जमीन नहीं हुई कभी. सांप्रदायिक हमलों में परिवार के उजड़ जाने और रोजगार खो बैठने के बाद उनके पास कुछ भी नहीं है, सिवाय इस तंबू के, जूट की रस्सियों से बुनी हुई एक खाट के, दर्जन पर कपड़ों के और कुछ बरतनों के. आप इसे एक दुस्वप्न भरी जिंदगी कह सकते हैं, जो पिछले साल सितंबर में शुरू हुई.

लेकिन महबूबा के लिए इसकी शुरुआत कभी हुई ही नहीं. वे इसे हमेशा से जीते आए हैं. अपनी सात साल की बेटी के बाल ठीक करते हुए वे बताती हैं, ‘कई साल पहले मेरे ससुर बारू को बीच मोहल्ले में मार दिया गया पीट पीट कर. न कोई केस बना न किसी को सजा हुई. जिन्होंने मारा वे ऊंची जाति के हैं. जमीन उनकी है, पुलिस और सरकार में उनका रोब-दाब है. हम कौन हैं? हम तो उनकी हाजिरी में जीने वाले लोग हैं. हमारी कोई ताकत नहीं है.’ इस साल जब रमजान का महीना चल रहा था, जबरन उन्हीं तबकों से आने वाले लोगों ने मस्जिद पर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया, जिस पर अजान दी जाती थी और रोजा खोलने के वक्त का ऐलान होता था. कोई कुछ न कर सका. महबूबा कहती हैं, ‘बच्चे पूछते हैं कि हम मुसलमान क्यों हैं? हम जिस तरह जीना चाहते हैं, हमें इसकी आजादी क्यों नहीं है? हमारे पास आज तक एक मस्जिद तक नहीं है. बस एक चबूतरा है, जिसे हम मस्जिद कहते हैं.’

और अब महबूबा से वह गांव भी छूट गया है जिसमें एक चबूतरेनुमा मस्जिद हुआ करती थी. और अगर सरकार की चली तो यह शिविर भी छूट जाएगा. प्रेस और अदालतों में राहत शिविरों की दुर्दशा की खबरों की चर्चा के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने जबरन शिविरों को बंद कराया जाने लगा है. साल के पहले हफ्ते में, जब मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में तापमान शून्य के आसपास गिर गया था, पुलिस और प्रशासन ने जबरन शिविरों को खाली कराया. जिस वक्त महबूबा अपनी बच्ची के बाल संवार रही थीं, सरकारी अधिकारियों की गाड़ियों का एक काफिला मलकपुर शिविर से धूल उड़ाता हुआ रवाना हुआ. वे इस शिविर को खाली कराने के लिए 12 घंटे में दूसरी बार आए थे. पहली बार वे आधी रात के बाद उस वक्त आए थे जब उन्हें उम्मीद थी कि लोग सो रहे होंगे. लेकिन परिवारों के मर्द और बच्चे सड़क को घेरे हुए रात भर बैठे रहे थे, ताकि पुलिस को जबरन शिविर में घुसने से रोका जा सके. अगले दिन दोपहर में जब वे दोबारा आए तो फिर लोगों ने उन्हें घेर कर वापस लौटा दिया. इलाके में लगभग सभी शिविरों में यह कहानी थोड़े-बहुत अंतर से दोहराई गई.

मलकपुर, नूरपुन खुरगान, सुनेठी और लोई जैसे करीब 25 राहत शिविरों में रह रहे तीस हजार से अधिक लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है. शिविर छोड़ कर वे जाएंगे कहां? जिन लोगों ने पिछले चार महीनों में कभी अपने पुराने गांव लौटने की कोशिश की, उन्हें अपमान और धमकियां सहनी पड़ीं. खेड़ी गांव, जिला शामली के मो. सलीम दिसंबर में एक बार अपने गांव लौटे थे. उनके मकान पर प्रभुत्वशाली जाट समुदाय के लोगों ने कब्जा कर लिया है. सलीम को देख कर उन्होंने गाली गलौज की और कहना शुरू किया कि ‘मुल्ले फिर आ गए. देखते हैं कि ये कैसे यहां रहते हैं.’ डरे हुए और अपमानित सलीम लौट आए.

राज्य या केंद्र, किसी भी सरकार ने इनको फिर से बसाने की कोई कोशिश नहीं की है. लेकिन ये हमेशा के लिए विस्थापित जिंदगी जीते रहें, इसे यकीनी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है. सरकार राहत शिविरों में रह रहे सभी लोगों को पीड़ित मानने को राजी नहीं. इसलिए उन्हें मुआवजा भी नहीं मिलेगा. अगस्त सितंबर के दौरान इन इलाकों में हुए सांप्रदायिक हमलों के कारण 162 गांवों के मुसलमान विस्थापित हुए. लेकिन सरकार महज 9 गांवों को ही ‘दंगा’-ग्रस्त स्वीकार करने को तैयार है. वे गांव हैं- लाक, लिसाढ़, बहावड़ी, कुतबा, कुतबी, मोहम्मदपुर रायसिंह, काकड़ा, फुगाना, और मुंडभर. सरकार इन गांवों के कुल 1800 परिवारों को प्रति घर पांच लाख की रकम मुआवजे के बतौर देने की बात कर रही है. लेकिन एक घर में अगर अनेक परिवार हों तब या तो यह रकम बंट कर बहुत थोड़ी सी रह जाएगी या फिर रकम किसी एक परिवार के पास ही रहेगी और बाकी परिवारों को कोई रकम नहीं मिल पाएगी. ऐसा अनेक मामलों में देखने में आया भी है.

राज्य सरकार ने अब तक जिन गिने-चुने लोगों को मुआवजा राशि दी है, उन्हें इसके लिए एक हलफनामा दायर करना पड़ा है कि वे लौट कर अपने गांव नहीं जाएंगे. अगर गए तो यह राशि उनसे उसी तरह जब्त कर ली जाएगी जैसी बकाया लगान वसूला जाता है.

बाकी 153 गांवों के विस्थापित लोगों के बारे में सरकार का कहना है कि वे मुआवजे की लालच में शिविरों में रह रहे हैं, जबकि उनका कोई नुकसान नहीं हुआ है. यह सही नहीं है. लोगों ने हमले से आतंकित होकर गांव छोड़ा और जो लोग पीछे रह गए वे मार दिए गए या लापता हैं, जैसे कि लिसाढ़ से आए अलीबान के अब्बा के साथ हुआ. अगस्त सितंबर में जब वे लोग गांव से भागे तो उनके अब्बा नसीरुद्दीन नहीं आए. उनके साथ साथ 12 दूसरे लोगों ने भी गांव छोड़ना कबूल नहीं किया. अगले दिन वे सभी 13 लोग मार दिए गए. उनमें से सिर्फ दो की लाश मिल पाई. साफ है कि अगर लोग गांव से नहीं भागते तो मार दिए जाते.

अलीबाज का एक सवाल है: ‘जिस घर में मेरे चाचा (अजमू), चाची (अलीमन) और अब्बा (नसीरुद्दीन) का कत्ल कर दिया गया, मैं वहां जाकर कैसे रह सकता हूं? मुझे यह भरोसा कौन दिलाएगा कि वहां मुझे मार नहीं दिया जाएगा?’

अलीबाज ने सिर्फ अपने परिजन ही नहीं खोए हैं. उन्होंने अपनी जिंदगी को लगातार तबाह होते देखा है. और यह एक ऐसी घटना है जिसे कैलेंडर की कुछ तयशुदा तारीखों में नहीं मापा जा सकता. यह इस व्यवस्था में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों का सामाजिक इतिहास भी बनाता है.

पच्चीस साल पहले तक अलीबाज के पास पहले अपने दो हथकरघे हुआ करते थे, जिस पर बुने कपड़ों को उनके मुहल्ले के लोग घूम घूम कर बेचा करते थे. पूंजी की कमी, सूत की महंगाई और सरकारी मदद की गैर मौजूदगी में उन्हें यह काम बंद कर देना पड़ा. इसके बाद वे शहर की दुकानों से थोक में कपड़े खरीद कर गांव गांव में बेचने लगे. लेकिन 20 साल यह काम करने के बाद इस काम को भी बंद कर देना पड़ा, क्योंकि उनके पास पर्याप्त पूंजी नहीं बच पाती थी. सो उन्होंने घूम घूम कर रद्दी-कबाड़ खरीद कर बेचना शुरू किया. इस धंधे में उनका यह तीसरा साल था. लेकिन अब धंधा भी हाथ से गया और थोड़ी बहुत जमा पूंजी भी. उनके पास कुल मिला कर 300 गज जमीन हुआ करती थी, जिस पर उनके घर के सात कमरे थे. उन्हें दुख इस बात का है कि जब हिंदू समूह ने हमला किया तो उनमें वे दलित भी थे, जिनके पास उन्हीं जितनी जमीन है. या उतनी भी नहीं. वे समझ नहीं पाते कि आखिर दलितों को उनसे क्या शिकायत थी?

अगर इलाके में जमीन के मालिकाने पर नजर डालें तो इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है. इलाके में ज्यादातर जमीनों के मालिक संपन्न जाट हैं. सबसे संपन्न 4.78 फीसदी लोगों के पास कुल भूमि का 26.73 फीसदी मालिकाना है, जबकि सबसे नीचे के 60 फीसदी लोगों के पास करीब 20 फीसदी जमीन है. जाहिर है इस दूसरे समूह के पास बहुत छोटी जोतें हैं-एक हेक्टेयर से भी कम. भूमिहीन लोगों में मुस्लिम और दलित सबसे बड़े दो समूह हैं. वे अपनी आजीविका के लिए जाटों के खेतों और उनके द्वारा संचालित दूसरे धंधों पर निर्भर हैं. वे एक दूसरी वजह से भी निर्भर हैं. संपन्न जाट महाजनी का एक समांतर धंधा भी करते हैं. वे 10 फीसदी तक की ऊंचे सूद पर पैसा गरीब भूमिहीनों को देते हैं. कुरमल गांव से आकर नूरपुर खुरगान में रह रहे मो. दिलशाद ने 2003 में 40000 हजार रुपए एक जमींदार सूदखोर से लिए थे, जिसके बदले में उनपर 2006 में एक लाख 80 हजार रुपए की देनदारी थी. पैसा न चुका पाने की हालत में उन्हें जमींदारों के यहां बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, जो ज्यादातर मामलों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है. इस प्रभुत्वशाली तबके का कानूनी और साथ साथ कानून के बाहर की राजनीतिक-सामाजिक संगठनों पर पूरा कब्जा होता है-चाहे वह पंचायतों के सरपंच हों, मुखियाहों या प्रधान या फिर खाप पंचायतें हों. उनका पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण होता है. दिशलाद ने मुसलमानों द्वारा झेले जा रहे सामंती उत्पीड़न और हमले के डर के बारे में बताया, ‘अगर हम नए कपड़े पहनें तो वे हमें गाली देते हैं और सूअर कहते हैं. वे हमारे साथ गाली के बगैर बात ही नहीं करते…और तो और वे किसी को भी कभी भी गिरफ्तार करा सकते हैं.’

खेती से होने वाले आय को सूद पर चलाने और बाजार की स्थिरता के बीच भारी मशीनी के इस्तेमाल की वजह से खेती की उत्पादकता में कोई खासी तरक्की नहीं दिखी है, राज्य की उत्पादकता में सात फीसदी वृद्धि दर के बरअक्स इस इलाके में खेती की वृद्धि दर महज 4.5 फीसदी है. जाहिर है कि बड़े किसान, जो ज्यादातर गन्ना की खेती करते हैं और जिन्हें अपर्याप्त सरकारी समर्थन मूल्य की शिकायत रही है, संकट का सामना कर रहे हैं. इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है. इस संकट ने एक सामाजिक तनाव को पैदा किया है, जिसका नतीजा सांप्रदायिक हमले के रूप में सामने आया है और जो पूरे देश में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे हमलों का ही एक हिस्सा है. दलित तबका आर्थिक और समाजिक रूप से संपन्न और भूस्वामी जाट तबके पर इस कदर निर्भर है, कि वह उनके दबाव से तब बाहर नहीं जा सका, जब खाप पंचायतों के जरिए आरएसएस और संपन्न तबके ने मुसलमानों पर हमले की योजना पर अमल किया.

इसलिए, जिन्हें मुआवजा नहीं मिला है, वे भी अब अपने गांव नहीं लौटना चाहते. अब दोबारा उस बंधुआ जिंदगी को जीने की चाहत उनमें नहीं है.

वे अपने गांव नहीं लौट सकते. वे शिविरों में नहीं रह सकते. उनके पास कोई संसाधन नहीं है. वे कहां जाएं?

महबूबा गुस्से में हैं, ‘आग लगा दो अपने मुआवजे में. मेरी बच्ची को जिंदा कर दो.’

जिस जगह पर उनकी बच्ची दफ्न है, उसे छोड़ कर वे कहीं नहीं जाएंगी.

याद. अपनी मरी हुई बच्ची की याद, जो इस जमीन पर दफ्न है. इसलिए वे इस जमीन से नहीं जाएंगी. इंसान किसी को क्यों याद करता है. अब हम उस जगह पर पहुंच गए हैं जहां हम यह सवाल कर सकते हैं: चीजें याद में क्यों बनी रहती हैं? खास कर अगर वो नाइंसाफी और जुल्म से, गुनाह और जुर्म से जुड़ी हुई हों? ऐसी यादों के बने रहने के साथ यह उम्मीद जुड़ी होती है कि इनका कभी इंसाफ होगा. इंसाफ की यह उम्मीद किसी हुकूमत या व्यवस्था से भी हो सकती है और किसी ऐसी ताकत से भी जिनके बारे में उन्हें यकीन हो कि वह मौजूद है और वह सबकुछ देखती और इंसाफ करती है.

हुकूमत और व्यवस्था ने उनके सामने बार बार यह साफ किया है कि वे उनसे कोई उम्मीद नहीं रखें. ठंड से ठिठुरते हुए जिन हफ्तों में उन्हें पुलिस और प्रशासन से शिविरों की हिफाजत के लिए रात-रात भर सड़कों जागते हुए बैठना पड़ा, उत्तर प्रदेश की सरकार और प्रशासन मुलायम सिंह के गांव सैफई में भव्य जलसे में जुटा हुआ था. इस आयोजन में 200 से 300 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसके अलावा सात हजार की आबादी वाले इस गांव के लिए 334 करोड़ रुपए की योजनाएं मौजूदा सरकार के दौरान घोषित की गई हैं. लेकिन सांप्रदायिक हमलों में तबाह लोगों को बहाल करने की जरूरत इस सरकार को कभी महसूस नहीं हुई.

अगर सरकार और मौजूदा व्यवस्था इस इंसाफ को यकीनी नहीं बनाती तो जब तक यह इंसाफ मिल नहीं जाता, तब तक के लिए जरूरी है कि अपराध के सबूत बने रहें. और जिनके खिलाफ ये अपराध किए गए हैं, वे भी. बदहाली और तकलीफों से गुजर रही जिंदगी के बीच कैमरे के सामने अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने में किसी झिझक के न होने के पीछे यह जिद है. राहत शिविरों में रह रहे हजारों लोग महसूस करते हैं कि उन पर किया गया हमला एक कौम के रूप में उनके अस्तित्व पर किया गया हमला है. वे महसूस करते हैं कि एक पूरे समुदाय के रूप में उनकी जिंदगी को तबाह कर देना इस हमले का मकसद है. वे यह भी बताते हैं कि यह ऐसा हमला नहीं है, जिसे महज तारीखों के साथ गिनाया जा सके. यह शायद उनके होने के साथ ही शुरू हो गया था. इसलिए, जब वे काले से डिब्बे के भीतर एक शटर के खुलने और बंद होने के बीच कैमरे की तरफ देखना चुनते हैं तो वे एक बयान दे रहे होते हैं कि एक संप्रदाय के रूप में मिटा दिए जाने की सारी कोशिशों के बावजूद वे बने हुए हैं. यहां. इस तरह. हाड़ मांस की शक्ल में. रगों में दौड़ते हुए खून और आती जाती सांसों के साथ. ताकि सनद रहे.

वे जानते हैं कि अगर यादें बनी रहीं तो इंसाफ की उम्मीदें भी बची रहेंगी. अगर उन्हें भुला दिया गया तो जुर्म का आखिरी सबूत भी मिट जाएगा. वे देखते हैं कि कैसे उनकी सारी तकलीफों को, उनके दर्द और उनकी बेदखली को पिछले चार महीनों में झुठलाने की कोशिशें हुई हैं. ये कोशिशें तब हुई हैं जब एक लाख लोग इन चार महीनों में उजड़े और राहत शिविरों में बसने को मजबूर किए गए. अगर वे यहां से चले गए तो क्या कोई मानेगा कि यहां कोई जुर्म हुआ भी था? अगर इस जुर्म के होने को स्वीकार करना है तो सबसे पहले उनकी मौजूदगी को भी स्वीकार करना होगा, जिन के खिलाफ जुर्म हुआ.

जाहिर है अब तक उन्हें निराशा ही मिली है. लेकिन इस दुनिया में चार गुना चार हाथ के तंबू के सामने अपने परिवार के लिए आटा गूंथती इस लड़की की तस्वीर जब तक रहेगी, वह इंसानी याद को इस बेचैनी से निजात दिलाती रहेगी कि इंसाफ की जरूरत को साबित करने वाली अकेली वही नहीं है. एक तस्वीर भी है.

(इस लेख में फोटोग्राफी संबंधी कुछ बुनियादी स्थापनाओं के लिए लेखक जॉन बर्जर और सूसन सॉन्टैग का आभारी है.)