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31 अगस्त 2013

नियमगिरि : देश में जारी जनांदोलनों के लिए नजीर

लिंगराज आजाद
साक्षात्कार

नियमगिरि की पहाड़ियों में बसे डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने पिछले 19 अगस्त को रायगढ़ा जिले की जरपा गांव में संपन्न हुई अंतिम पल्ली सभा में भी ब्रितानी कंपनी वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को नामंजूर कर दिया। ओडिसा सरकार उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर कालाहांडी और रायगड़ा जिले में कुल बारह पल्ली सभा ( ग्राम सभा) आयोजित की थी, ताकि आदिवासी इस परियोजना के पक्ष या विपक्ष में प्रस्ताव पारित करें। पल्ली सभाओं का यह एकमुश्त फैसला वेदांता कंपनी और राज्य सरकार के लिए एक शिकस्त की तरह है। इस फैसले का असर कितना व्यापक होगा और क्या नियमगिरि की पहाड़ियां इससे महफूज रहेंगी, इसी मसले पर नियमगिरि सुरक्षा समिति के महामंत्री और समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय सचिव लिंगराज आजाद से
अभिषेक रंजन सिंह ने बातचीत की, प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश...

प्रश्न- आजाद जी, सभी बारह पल्ली सभाओं ( ग्राम सभाओं) ने एक स्वर में नियमगिरि की पहाड़ियों पर वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना को खारिज कर दिया है। इस फैसले को किस तरह देखते हैं आप ?
उत्तर- सबसे पहले तो मैं उच्चतम न्यायालय को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस मामले की गंभीरता समझते हुए 18 अप्रैल 2013 को ओडिसा सरकार को पल्ली सभा आयोजित कराने का आदेश दिया था। जैसा कि आपको पता है कि डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने सभी पल्ली सभाओं में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना को सिरे से खारिज कर दिया। मेरे ख्याल से आदिवासियों का यह फैसला देश में जल, जंगल, जमीन और पहाड़ों को बचाने के लिए जारी जनांदोलनों के लिए एक नजीर पेश करेगा। नियमगिरि की पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने जो एकजुटता दिखाई है, हम उसे सलाम करते हैं।  
प्रश्न- कालाहांडी और रायगढ़ा जिले में नियमगिरि की पहाड़ियों पर कुल 112 गांव बसे हैं, फिर ओडिसा सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में ही पल्ली सभाओं का आयोजन क्यों किया ?
उत्तर- यह सवाल काफी महत्वपूर्ण है। नियमगिरि सुरक्षा समिति भी यह मांग कर रही थी कि उन सभी गांवों में पल्ली सभाएं आयोजित हों, जहां डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध आदिवासी निवास करते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों पर 112 गांवों में डोंगरिया कोंध और पहाड़ के नीचे तराई में 50 गांवों कुटिया कोंध आदिवासी रहते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं का आयोजन किया। दरअसल, ओडिसा सरकार ने कालाहांडी और रायगढ़ा जिले की सिर्फ बारह गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाकर उच्चतम न्यायालय के फैसले की मनमानी व्याख्या की है, जो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करती है। अगर सरकार ने सभी गांवों में पल्ली सभाओं की बैठक बुलाती, तो निश्चित रूप से बारह की बजाय 162 गांव नियमगिरि में खनन परियोजना को नामंजूर कर देती।
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह इतनी आसानी से पीछे हट जाएगी?
उत्तर- यह कहना जल्दबाजी होगी कि पल्ली सभाओं के प्रस्ताव के बाद वेदांता समूह चुपचाप बैठ जाएगी, क्योंकि कंपनी ने इस इलाके में करोड़ों रुपये का निवेश किया है। निश्चित रूप से वह नई रणनीति बनाएगी। हमें पता है कि उनके पास बेशुमार दौलत और ओडिसा सरकार का समर्थन भी हासिल है, लेकिन स्थानीय आदिवासियों के पास सिर्फ हिम्मत है उनसे लड़ने के लिए। पल्ली सभाओं की जीत से ग्रामीणों का हौसला बुलंद हुआ है। यह संघर्ष प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए है और इसकी रक्षा के लिए हम आखिरी दम तक लड़ेंगे। देश की न्यायपालिका पर हमें पूरा यकीन है कि वह गरीब और लाचार आदिवासियों के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
प्रश्न- पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नियमगिरि की पहाड़ियों का कितना महत्व है?
उत्तर- पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए सिर्फ नियमगिरि की पहाड़ियों और यहां मौजूद जंगल ही नहीं, बल्कि सभी पहाड़ों और जंगलों की अहमियत एक जैसी है। नियमगिरि की श्रृंखलाएं हजारों साल पुरानी हैं। यहां के जंगलों में वृक्षों की सैंकड़ों किस्में हैं, अनगिनत जड़ी-बूटियां हैं और वन्यजीवों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, वराह, हिरण, हाथी समेत कई जीव-जंतु रहते हैं। नियमगिरि की पहाड़ियों की वजह से यहां अच्छी बारिश होती है। स्थानीय आदिवासियों की जीविका इन्हीं पहाड़ों और जंगलों पर निर्भर है। धान यहां की मुख्य फसल है, जबकि पानी की उपलब्धता से तराई इलाकों में मछली पालन भी किया जाता है। यहां खेतों में पूर्णतः प्राकृतिक ढंग से सिंचाई होती है। बोरिंग और कुएं की कोई आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यहां दर्जनों की संख्या में झरने मौजूद हैं। अब आप फर्ज कीजए, अगर बॉक्साइट के लिए नियमगिरि के जंगलों को नष्ट कर पहाड़ों को बारूदी सुरंग से तोड़ दिया जाएगा, तो यहां की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली कैसे महफूज रह पाएगी। एक तरफ पूरी दुनिया वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से चिंतित है साथ ही वन्यजीवों को बचाने के लिए नित्य नए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर पहाड़ों और जंगलों के साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार किया जा रहा है।
प्रश्न- इन सबके बावजूद विकास की जरूरत को कैसे खारिज किया जा सकता है ?
उत्तर- सरकार की नजर में विकास क्या है ? क्या विकास की एकमात्र परिभाषा आर्थिक विकास ही हैं वह भी प्राकृतिक संसाधनों और इंसानी जान की कीमत पर। माफ कीजए, अगर सरकार की दृष्टि में विकास का अर्थ यही है, तो हमें उनका यह मॉडल स्वीकार नहीं है। आर्थिक विकास के नाम पर पिछले ढाई दशकों के दौरान काफी तबाही हो चुकी हैं। भारत में तथाकथित विकास के नाम पर 10 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ है। विस्थापित होने वालों में आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है, जिन्हें जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया है। आज तक उनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस इंतजामात नहीं किए गए हैं। केंद्र और राज्य सरकारें ब्रिटिश राज्य में बनी भूमि अधिग्रहण कानून के सहारे किसानों से उनकी जमीनें छीनकर पूंजीपतियों के हवाले कर रही हैं। इसके खिलाफ जहां आवाजें उठती हैं, उन आवाजों को गोलियों और लाठियों के सहारे दबाने का प्रयास किया जाता है।
प्रश्न- नियमगिरि की पहाड़ियों में वेदांता कंपनी को खनन की इजाजत मिले अथवा नहीं इस बारे में राजनीतिक दलों की क्या राय है?
उत्तर- प्रदेश की सत्ताधारी बीजू जनता दल की भूमिका के विषय में कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नवीन पटनायक सरकार पूरी तरह उसके पक्ष में खड़ी है। वर्ष 2009 में पर्यावरणीय मंजूरी निरस्त होने के बाद वेदांता कंपनी की बजाय ओडिसा माइनिंग कॉरपोरेशन ने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल की थी, इससे साफ जाहिर होता है कि राज्य सरकार हर स्तर पर वेदांता कंपनी का सहयोग कर रही है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है, तो पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी साल 2009 में नियमगिरि के इलाकों में आए थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमारी पार्टी आपके साथ खड़ी है और आप हमें नियमगिरि आंदोलन में अपना सिपाही समझें। हालांकि कांग्रेस ने केंद्र और राज्य स्तर पर अभी तक कोई ऐसा प्रयास नहीं किया है। कम्युनिस्ट पार्टियों का समर्थन इस आंदोलन को जरूर हासिल है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी शक्ति उतनी नहीं है कि वे कुछ ज्यादा कर सकें।
प्रश्न- ओडिसा सरकार का आरोप है कि नियमगिरि सुरक्षा समिति की अगुआई में चल रहे इस आंदोलन को माओवादियों का समर्थन हासिल है, इस बात में कितनी सच्चाई है ?
उत्तर- केंद्र और राज्य सरकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जा रहीं आंदोलनों को माओवादी आंदोलन कहकर कुचलना एक शगल बन चुका है। यह पहला जनांदोलन है, जहां कानूनी हस्तक्षेप ( उच्चतम न्यायालय की ओर से पल्ली सभा कराने का आदेश ) जनांदोलनों में सकारात्मक भूमिका निभा रही है। बात जहां तक माओवादियों के समर्थन की है, तो राज्य सरकार को यह पता होना चाहिए कि माओवादियों ने पिछले दिनों पर्चा चस्पां कर पल्ली सभा को नौटंकी करार दिया था। हमारे और माओवादियों के सिद्धांत में काफी अंतर है। यह अलग बात है कि नियमगिरि बचाओ आंदोलन में उनकी ओर से कोई बाधा नहीं पहुंचाई जा रही है। हमारा यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है, वैसे भी उड़ीसा शांतिपूर्ण आंदोलनों का गढ़ रहा है। गंधमर्दन, बालियापाल, चिल्का और हीराकुंड किसान आंदोलन इसके सुंदर उदाहरण हैं।
प्रश्न- मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का दावा है कि उनके शासन में प्रदेश का चौतरफा विकास हुआ है और वे राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए कृतसंकल्प हैं?

उत्तर- बेशक, विकास जरूर हुआ है, लेकिन जनता का नहीं, बल्कि उनकी सरकार में शामिल मंत्रियों, उनकी पार्टी के विधायकों और सांसदों का। बीजेडी के शासन में जनता भले ही समृद्ध नहीं हुई हो, लेकिन नौकरशाहों और अधिकारियों की चौतरफा कमाई जरूर बढ़ी है। इतिहास में नवीन पटनायक का नाम एमओयू मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज किया जाएगा, जिन्होंने निजी कंपनियों के साथ अनगिनत समझौते पर दस्तखत ओडिसा की जनता और उसकी खुदमुख्तारी को गिरवी रख दिया। 

06 जून 2013

जनता होशियार : हमारे संसदीय राजा आखेट पर निकले हैं


सुष्मिता

एक सवाल-एक बात: 4                                                

फोटो- दख़ल की दुनिया.
माओवादियों के द्वारा छत्तीसगढ़ में 25 मई को हुई कार्रवाई के बाद कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार बहस का विषय बने हुए हैं. इन्हीं सवालों पर बहस के लिए 'एक सवाल-एक बात' शीर्षक से कुछ कड़िया प्रस्तुत की जा रही हैं. बहस के लिए आप अपने सवाल और अपनी बात dakhalkiduniya@gmail.com पर भेज सकते हैं. सुष्मिता ने यह आलेख ग्रीनहंट के शुरुआती समय में लिखा था जिसे दखल की दुनिया ने एक बुकलेट के रूप में प्रकाशित किया था. बहस में इसकी सार्थकता को देखते हुए इसे यहाँ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है. 


सामंती युग में राजा-महाराजा जंगलों में शिकार खेलने जाते थे। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे. अब समय बदल गया है. इसलिए अब राजा का शौक भी बदल गया है. अब तो जंगली जानवर बचाए रखने की चीज बन गए हैं. इसलिए अब जंगलों में रहने वाले आदिवासियों का शिकार होगा. राजा अपने शागिर्दों के साथ नए शिकार पर जाने की तैयारी कर रहा है. टीवी चैनलों पर युद्ध के धुन बजने लगे हैं. यहां तक कि चैनलों ने ‘लाइन ऑफ़ कंट्रोल’ की घोषणा भी कर दी है। इसका नाम दिया गया है ‘आपरेशन ग्रीन हंट’। गृह मंत्रालय ने देश की सबसे गरीब जनता पर युद्ध की घोषणा कर दी है। यह हमला नक्सलवाद को खत्म करने के नाम पर किया जानेवाला है. हालांकि नक्सलवाद के बारे में पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल के विचार थोड़े अलग थे. उनका मानना था कि नक्सलवाद देश के लिए उतना बड़ा खतरा नही है जितना बढ़ा-चढ़ाकर इसे दिखाया जाता है. महज एक साल में इतना बड़ा क्या बदलाव हो गया? मुंबई हमले के बाद चिदंबरम को गृह मंत्री बनाया गया और रातों-रात पूरा परिदृश्य बदल गया. अब नक्सलवादी देश की विकास में सबसे बड़ी बाधा बन गए.
चिदंबरम के इस दृष्टिकोण के पीछे चिदंबरम की व्यावसायिक पृष्ठभूमि भी है। चिदंबरम देश की सबसे बड़ी कारपोरेट धोखाधड़ी करनेवाली कंपनी एनरान के वकील थे। इसके बाद वे पर्यावरण नियमों की अनदेखी करने के लिए कुख्यात दुनिया की सबसे बड़ी खदान कंपनी ‘वेदान्ता’ के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के सदस्य रहे। वितमंत्री बनने से पहले उन्होंने अपने इस पद से इस्तीफा दे दिया. इनकी व्यावसायिक पृष्ठभूमि को समझने के बाद चिदंबरम की चिंता को समझना आसान हो जाता है. लेकिन इसके बावजूद चिदंबरम के दावों को समझना जरूरी है. क्या वास्तव में माओवादी देश की विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं? क्या माओवादियों को खत्म करने से विकास का रास्ता पशस्त हो जाएगा? क्या इन सैनिक हमलों से माओवादियों का खात्मा हो जाएगा?

‘आपरेशन ग्रीन हंट’ और प्रतिरोध
आपरेशन ग्रीन हंट जनता के खिलाफ एक सरकारी बर्बर युद्ध है जिसे तीन चरणों में चलाया जाना है. सबसे पहले छतीसगढ़-आंध्रप्रदेश-उड़ीसा के सीमावर्ती इलाके से इसकी शुरुआत होनी है. इस आपरेशन में स्थानीय बलों के अलावा लगभग एक लाख अर्द्धसैनिक बलों को लगाया जाना है. इस काम में अमरीकी अधिकारी भी लगे हुए हैं. सरकार का कहना है कि आदिवासी इलाकों का विकास इसलिए नहीं हो पाया है चूंकि इनपर माओवादी काबिज हैं. इसलिए जरूरी है विकास के लिए सबसे पहले इन इलाकों को खाली कराया जाए. लेकिन यह सच्चाई से कोसों दूर है. यदि सच में माओवादी इन इलाकों के विकास में बाधा हैं तो फिर सरकार उन इलाकों का विकास क्यों नहीं करती जहां माओवादी नहीं हैं? सरकार के आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो देश के 604 में से महज 182 जिले माओवादियों के प्रभाव में हैं. सरकार बाकी के जिलों का विकास क्यों नहीं करती? इन इलाकों में भी माओवादी लगभग 25 सालों से ही हैं इससे पहले सरकार को इसकी विकास की चिंता क्यों नहीं थी. राजस्थान, यूपी अब भी बुरी तरह पिछडे हुए है। सरकार इसको विकास का माडल क्यों नहीं बनाती?
लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही है। सरकार ने झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और छतीसगढ़ के तमाम पहाड़ और जंगलों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर दिया है. 2008 के मध्य तक पहाड़ों और खदानों से संबंधित उड़ीसा में 65 एमओयू, झारखंड में 42 एमओयू और छतीसगढ़ में 80 एमओयू बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ किए गए हैं. आदिवासी जनता के पैरों तले बड़ी मात्र में बहुमुल्य खनिज हैं. छतीसगढ़ में एक तरफ सरकार ने 2005 में एमओयू किया तो दूसरी तरफ उसके अगले ही दिन कांग्रेस के नेतृत्व में सलवा जुडुम की घोषणा हुई. यह एक सरकारी बर्बर गिरोह है जो वियतनाम में अमरीका द्वारा गठित खुनी गैंगों की तर्ज़ पर बनाया गया है. केन्द्र सरकार के ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जनवरी, 2008 में गठित 15 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट (स्टेट एग्रेरियन रिलेशंस एंड अनफिनिशड टास्क ऑफ़ लैंड रिफार्म ) का सलवा जुडुम के बारे में कहना है कि, ‘‘खुले रूप से इस घोषित युद्ध का अंत अब तक के सबसे बड़ी जमीन हड़प में होगा...टाटा और एस्सार स्टील भारत में उपलब्ध सबसे बेहतर लौह अयस्क की खदान के लिए सात या इससे अधिक गांवों को लेना चाहते थे. आदिवासियों के प्रारंभिक प्रतिरोध के बाद सरकार ने अपनी योजना वापस ले ली. एक नया दृष्टिकोण जरुरी था. यह सलवा जुडुम के साथ सामने आया जो मुरियाओं द्वारा गठित था, इनमें से कुछ पहले माओवादियों के ही कार्यकर्ता थे. इसके पीछे व्यापारी, ठेकेदार, और खदान वाले लोग थे. सलवा जुडुम को धन उपलब्ध करानेवालों में टाटा और एस्सार प्रथम थे. 640 गाँव सूने हो गए. इनको जला दिया गया और सत्ता की मदद से बंदुक की नोंक पर खाली कराया गया. दंतेवाड़ा की कुल जनसंख्या का लगभग आधा साढ़े तीन लाख लोग विस्थापित हो गए. उनकी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. उनकी बेटियों को मार दिया गया और नवयुवकों को अपंग बना दिया गया. जो जंगल में नहीं भाग सके उन्हें सलवा जुडुम द्वारा संचालित शिविरों में ले जाया गया. ताजा जानकारी के अनुसार इन खाली किए गए 640 गांवों को टाटा और एस्सार लेने के लिए तैयार है.’’
इससे साबित हो जाता है कि इन इलाकों को खाली करवा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाना है. सरकार का कहना है कि विकास का यही रास्ता है.
दरअसल यह कम तीव्रतावाले युद्धों की साम्राज्यवादी रणनीति का एक हिस्सा है। इसका इस्तेमाल मुलतः वियतनाम युद्ध के दौरान किया गया था. साम्राज्यवादियों ने संघर्ष के इलाकों में वहीं के लोगों को लेकर अपने तंत्र खड़े किए और इसका इस्तेमाल अपने युद्धों के लिए किया. इसने सत्ता के पक्ष में एक हिस्से को गोलबंद करने की कोशिश भी की. इसी अनुभव का इस्तेमाल आज भारत में हो रहा है. सरकार द्वारा छतीसगढ़ में सलवा जुडुम, झारखंड में नासुस, आंध्रप्रदेश में कई विजलैंट गैंग, असम में सुल्फा, प बंगाल में हर्मद वाहिनी इत्यादि इसके कुछ उदाहरण हैं. इन गिरोहों का काम मुलतः संघर्षरत जनता पर दमन ढाना होता है. यह वितीय पूंजी के पक्ष में एक जनमत का भी निर्माण करता है. नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत जनता, उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ संघर्षरत जनता के खिलाफ इसने जनगोलबंदी के साथ-साथ हमला भी किया. हमें यह समझना चाहिए कि साम्राज्यवाद अपने हमलों में उस देश के पूंजीपति वर्गों को भी शामिल करता है. वियतनाम पर अमरीकी हमले के समय वहां के तमाम बड़े पूंजीपति अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ खड़े थे. इसको समझे बगैर जनसंघर्ष को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. इस तरह आॅपरेशन ग्रीन हंट साम्राज्यवादियों के पक्ष में जनता के खिलाफ छेड़ी जानेवाली युद्ध है.
कई लोग मानवीय और आम नागरिकों के नुकसान होने के तर्क पर इस हमले का विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि इस लडाई के बीच में आदिवासी फंस गए हैं. इनका कहना है कि माओवादियों के निचली कतार के लोग भी तो गरीबी के कारण ही इस लड़ाई में हैं. यह समझ देश के मध्य वर्ग के चरित्र को ही सामने रखता है. यह वर्ग सोचता है कि कोई गरीब कैसे राजनीतिक लक्ष्यों के लिए लड़ सकता है. यह मध्य वर्ग का एक पारंपरिक चरित्र है और वह गरीबों को ऐसे ही देखते आया है. यह वर्ग यह नहीं समझ पाता कि इन गरीबों के लिए मध्य वर्ग के तरह स्कूल नहीं हैं बल्कि गरीबों के राजनीतिक प्रशिक्षण का केन्द्र संघर्ष ही है. इन गरीबों ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखा दी है. लालगढ़ ने भी गरीब जनता के राजनीतिक चेतना को सामने रख दिया है. सच तो यह है कि इन गरीबों की जगह देश के मध्य वर्ग और संसदीय वामपंथियों की लड़ाई आजिविका के लिए है और अब यह राजनीतिक लक्ष्यों को काफी पीछे छोड़ आया है. कुछ लोगों की आलोचना है कि माओवादी महज स्थानीय मुद्दों में ही उलझे रहते हैं और उनका राष्ट्रीय राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं होता. दरअसल ये लोग स्थानीय संघर्षों के राजनीतिक अंतर्वस्तु को समझ नहीं पाते तथा संसद के अंदर के बहसों को ही मूल संघर्ष समझते हैं. वे एक जमींदार और पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के बीच के संबंधों को ठीक से नहीं समझ पाते. वे इन ग्रामीण लड़ाइयों के शहरों के साथ के संबंधों को नहीं समझ पाते. नीचे से उपर तक सरकारी मशीनरी शासक वर्गों के इशारे पर ही काम करती है, यह है सामंतों, दलाल पूंजीपतियों और साम्राज्यवादियों का वर्ग. साम्राज्यवाद इन स्थानीय दलालों के जरिए ही शोषण चलाता है. इसके लिए वह स्थानीय संरचनाएं भी खड़ा करता है और ये साम्राज्यवादी शोषण के एक औजार बन जाते हैं. यदि चुपचाप लूट को बर्दाश्त किया जाए तो ये कुछ नहीं करते लेकिन जैसे ही इनकी आमदनी के हजारवें हिस्से पर भी चोट होता है तो ये बौखला जाते हैं. जैसा कि मार्क्स ने चर्च के बारे में कहा था कि इनको लाख गालियां दो ये कुछ नहीं कहेंगे लेकिन जैसे ही इनकी आमदनी के हजारवें हिस्से पर भी चोट होगा तो ये बौखला जाएंगे. अपने मुनाफे पर चोट से यह वर्ग बौखला गया है. इस तरह इन तमाम स्थानीय लड़ाइयों की राष्ट्रीय राजनीति में एक भूमिका है. यह भूमिका आज देश की जनता के सामने है कि किस तरह आदिवासियों के विस्थापन और साम्राज्यवादी लूट को मुद्दे के रुप में इन स्थानीय लड़ाइयों ने ही सामने लाया न कि संसद ने.
आज नक्सलवादियों को ‘अराजकतावादी’ और ‘आतंकवादी’ कहा जा रहा है. इस काम में वाम से दक्षिण तक काफी मुस्तैदी से जुटे हैं. लेकिन सच तो यह है कि 1970 में अपनी पार्टी के लाइन की तुलना में आज ये काफी उदार हुए हैं. उस समय सीपीआइ(एमएल) ने सफाया को संघर्ष के एकमात्र स्वरूप के रूप में स्वीकार किया था. इसके अलावा जनसंगठन और जनसंघर्ष को संशोधनवाद माना जाता था. माओवादियों ने इसमें कार्यनीतिक गलती की बात कहते हुए इसमें सुधार किया और सफाया को महज एक संघर्ष का स्वरुप तथा जनसंगठन-जनसंघर्ष को क्रांति के एक अभिन्न हिस्से के रुप में स्वीकार कर अपनी गलती सुधारी लेकिन पार्टी की बुनियादी रणनीति से दृढ़ता पर डटे रहे. सशस्त्र संघर्ष के मसले में बदलाव बस इतना हुआ कि 1970 में पार्टी के पास सशस्त्र संघर्ष की एक ठोस दिशा थी लेकिन व्यवहार में इसे और ठोस होना था. माओवादियों ने उस ठोस दिशा पर कायम रहते हुए व्यवहार में इसे ठोस किया. हालांकि इन्होने भी काफी बाद में किया जब इन्हे आंध्रप्रदेश में भारी नुकसान उठाना पड़ा. शांतिपूर्ण संघर्ष का स्वाद तो खुद माओवादियों को भी चखना पड़ा. 2004 में वार्ता के दौर में इन्होने 10-15 लाख लोगों तक की रैलियां की. इसके जरिए इन्होने अपने जनाधार और जनसमर्थन के बारे में उठने वाले तमाम सवालों का करारा जबाब दिया. लेकिन इसके बाद भारी पैमाने पर इनके कार्यकर्ताओं की हत्या की गई और अंततः उन्हे आंध्रप्रदेश से पीछे हटना पड़ा. क्या किसी भी संघर्ष का राजनीतिक चरित्र केवल इसलिए खत्म हो जाता है चूंकि वह हथियारबंद संघर्ष में विश्वास करती है? हथियारबंद संघर्ष तो महज संघर्ष का एक पहलु है. अगर माओवादी संघर्ष को केवल सैनिक रुप से देखते तो इस विशाल सेना के सामने कबका झुक गए होते. इसके बजाए उनका जनता की ताकत में विश्वास है. इसीलिए उन्होने इस हमले को व्यापक जनगोलबंदी और सैनिक प्रतिरोध के बदौलत हराने की बात कही है. सच तो यह है कि आदिवासियों का मसला इसिलिए एजेंडे में आया है. चूंकि उनके एक हाथ में राजनीति तो दुसरे में हथियार है. नर्मदा के विस्थापितों का दर्द कौन सुनने गया? हाल का विस्थापन पहला नहीं है बल्कि इससे पहले भी विस्थापन हुए हैं.
विकास या लूट और जमीन हरण
पूंजीवादी विकास बिना हिंसा के रास्ता पकड़े आगे नहीं बढ़ सकता. यदि ऐतिहासिक तथ्यों पर नजर डाली जाए तो यह सरकार भी वही कर रही है जो पहले इंगलैंड, अमरीका, लैटिन अमरीका और वियतनाम जैसे देशों में किया गया था. यह वह दौर था जब सामंतवाद को तोड़कर पूंजीवाद खड़ा हो रहा था. 16 वीं शताब्दी के शुरू में इंगलैंड में भी सामंतों ने सामुहिक भूमि से किसानों को खदेड़कर उनकी जमीनों को भेड़ों के बाड़े में बदल दिया था. हालांकि इस सामूहिक जमीन पर किसानों का भी उतना ही अधिकार था जितना सामंतों का. इसके बावजूद इन किसानों को भारी हिंसा के जरिए उन जमीनों से उजाड़ दिया गया. जमींदारों ने एक नारा दिया था कि खेती की जमीनों को भेड़ों के बाड़े में बदल डालो. इस काम को उस दौर में बढ़ते ऊन के भाव ने भी काफी गति दी. इसके अलावा इसका दूसरा फायदा यह हुआ कि पूंजीपतियों को भारी मात्रा में काफी सस्ते मजदूर मिल गए. अमरीका का इतिहास भी वहां कि आदिम प्रजाति रेड इंडियंस के भारी नरसंहार और खून से लिखी गई. वेस्टवार्ड मुवमेंट के नाम से चर्चित इस परिघटना में हम इसे देख सकते हैं. उस दौरान उन इलाकों में सोने के खदानों पर कब्जा करने के लिए भारी मात्रा में बाहरी लोग गए. रेड इंडियंस की पूरी प्रजाति को लगभग नष्ट कर दिया गया. रेड इंडियंस वहां के मूल निवासी थे. आज वहां उन्हें अजायबघरों में रखा जाता है. लैटिन अमरीका और वियतनाम में भी वहां के आदिवासियों की पूरी प्रजाति को ही खत्म कर दिया गया. भारत में भी उनके उतराधिकारी यही नरसंहार चलाना चाहते हैं. अब आदिवासियों के सामने दो ही रास्ते हैं कि या तो विकास के इस ऐतिहासिक परिघटना का हिस्सा बनें या फिर एक नई तरह की विकास का इतिहास रचें. इतिहास गढ़ने के सवाल पर पारंपरिक से लेकर वामपंथी पार्टियां कान खड़े कर लेंगी. बाड़ाबंदी आंदोलन के भारतीय उतराधिकरी कहेंगे कि कोई भी इतिहास गढ़ने कि बात अतीत हो गई. अब हमें नए तरह से सोचना चाहिए. संसद की पुजारी वामपंथी पार्टियां कहेंगी कि नरसंहार तो ठीक नहीं है लेकिन कोई शांतिपूर्ण रास्ता तलाशना होगा. हिंसक संघर्ष के बजाए सामाजिक सद्भाव से ही कुछ मिल सकता है. मतलब इनका पतन वर्ग संघर्ष से अब वर्ग सहयोग तक हो गया. कई अन्य लोग कहेंगे कि सेज के खिलाफ संघर्ष तो ठीक है लेकिन लोकतंत्र में जनवादी क्रांति की बात करना अनुचित है. इस तरह संसदीय वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक अपने निष्कर्ष में यही कहते हैं कि विकास की कोई नई रणनीति नहीं हो सकती. भले ही पुरानी रणनीति को ही मानवीय बनाया जा सकता है,

सच्चाई यह है कि बुर्जुआ विकास के इस रणनीति के लोकतांत्रिक बनने की कोई गुंजाइश नहीं है. लूट और नरसंहार तो इसका अंतर्निहित चरित्र है. इससे नरसंहार और जमीन के हरण को अलग नहीं किया जा सकता. इसका कारण यह है कि यह अपनी समृद्धि का इतिहास अपनी मेहनत के बल पर नहीं बल्कि जनता की बहुसंख्या के शोषण, लूट और हत्या पर लिखता है. अब तक का इतिहास तो यही रहा है. जो लोग बीच का रास्ता तलाशने की बात कहते हैं वे इस बात का जबाब नहीं देते की नर्मदा के विस्थापितों का क्या हुआ. आदिवासी इलाकों में लगे बड़े-बड़े उद्योगों का कौन सा फायदा आदिवासियों को मिला? आदिवासियों के पैरों के नीचे से निकला कोयला तो दिल्ली को चकाचैंध करता है लेकिन आदिवासी बिना दवा दारु के मर-खप जाते हैं. छतीसगढ़ से निकला लोहा जापान के स्कुटर उद्योग को चमकाता है लेकिन यहां के आदिवासी आज तक स्कुटर के बारे में नहीं जानते. तमाम आदिवासी अपने ही घरों को उजाड़ कर लगाए गए उद्योगों के बाबुओं से लेकर किरानियों तक के गुलाम बन गए. आदिवासी बेटियां दिल्ली और अन्य बड़े शहरों के रइस घरों की दासी बन गईं. खुद अपना ही घर बेगाना हो गया. जंगल पर फारेस्टर का कब्जा तो जमीन पर बड़े लुटेरे दैत्यों का कब्जा. चिदंबरम जी को समझना चाहिए की यह इक्सवीं सदी है न कि सोलहवीं सदी. आदिवासियों ने अपने पिछले संदर्भों से समझा है कि समझौते का मतलब है कि इन बाबुओं की गुलामी करो. अपनी बेटियों को इन बाबुओं के हवाले कर दो. अब यह आदिवासियों को मंजुर नहीं है. पिछले साठ सालों में पहली बार आदिवासियों का सवाल एजेंडे पर आया है. आज तक संसद में बैठे लोंगों ने बर्बादी और लूट के सिवाय क्या दिया. पुर्व जस्टीश पीबी सावंत ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में माओवादियों को इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होने आदिवासियों के एजेंडे को देश के सामने रख दिया है. त्रासदी यह है कि अब भी उन्हीं इलाकों की बात हो रही है जिन इलाकों में संधर्ष है, इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि यदि अविकास और शोषण के कोहरे से निकलना है तो संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है. तमाम पिछड़ी जनता के लिए यह एक सबक होगी.
बीसवीं सदी के मध्य तक इस आबादी के पास इस नरसंहार से बचने की कोई ठोस वैकल्पिक योजना नहीं थी. खासकर उन आदिवासियों के पास जिनको अबतक उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया गया था. कार्ल मार्क्स ने 19 वीं सदी में पूंजीवादी दैत्य और लूट से मुक्ति का जनता को उपाय बताया. उन्होने मेहनतकशों को स्पष्ट कर दिया कि ब्यापक जनता की बदहाली का कारण बाबुओं और पूंजीपतियों की समृद्धि है. इससे मुक्ति के लिए मार्क्स ने समाजवादी क्रांति का हथियार मेहनतकशों के हाथों में दिया. इसके बाद लेनिन ने 20 वीं शताब्दी के शुरू में बताया के यह पूंजीवादी दैत्य अब साम्राज्यवाद में बदल गया. उन्होने यह भी बताया के यह दैत्य अब और खूनी हो गया है. यानी इसके अंदर की प्रगतिशील चिजें भी अब प्रतिगामी हो गई हैं. मुनाफे की गिरती दरों की वजह से अब इन हत्यारों के खून की प्यास और बढ़ गई थी. इस आबादी को अब और खतरा बढ़ गया था. ये तमाम आबादियां उस समय ब्रिटेन या फिर यूरोप के उपनिवेश थे. ऐसे समय में माओ-त्से-तुंग ने इस आबादी को नरसंहार से बचने का रास्ता सुझाया. उन्होने कहा कि दो ही रास्ते हैं. या तो सत्ता की चाबी अपने हाथों में लेने के लिए कुर्बानियां दो या फिर नरसंहार का दंश झेलो. लेकिन नरसंहार की तुलना में कुर्बानियां नगण्य होगी. उन्होने उस आबादी को रास्ता सुझाया जो अब भी पूर्व पूंजीवादी संबंधों के दौर से गुजर रही थी और इसक साथ-साथ कई साम्राज्यवादी देशों के शोषण का शिकार थी. उन्होनें कहा कि इसका हल एक नई तरह की जनवादी क्रांति है जो बराबरी के लिए रास्ता प्रशस्त करेगी. यह वही ऐतिहासिक कार्यभार है जिसे पूरा करने से बुर्जुआ वर्ग ने अपनी जबाबदेही खींच ली थी. लेकिन अब इस जनवादी क्रांति का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथों में होगा. इस तरह से अर्धऔपनिवेशिक शोषण के शिकार जनता के हाथों में नवजनवादी क्रांति का एक नया हथियार था. माओ ने इसे पूरा करने का ठोस रास्ता भी सुझाया. आज छतीसगढ़ से लेकर उडीसा, प बंगाल, बिहार, झारखंड की जनता इतिहास से सबक लेकर इसी लड़ाई को आगे बढ़ा रही है. अब वह समझती है कि कोई भी सम्मानजनक समझौता इस व्यवस्था में संभव नहीं है. इसलिए किसी नए विकल्प और नए रास्ते की ही जरुरत है. एक अध्ययन के अनुसार उड़ीसा में मौजूद बाक्साइट की कीमत 2004 की कीमत पर 2270 अरब डालर है. यह रकम भारत के सकल घरेलु उत्पाद से दोगुनी है. वर्तमान में इसकी कीमत 4000 अरब डालर के करीब होगी. इसमें सरकार को आधिकारिक रुप से महज सात फीसदी रायल्टी मिलेगी. इसके अलावा झारखंड, छतीसगढ़ में लगभग 4000 अरब डालर से अधिक की अकूत खनिज अलग है. यह विकास है या फिर लूट इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं.

हिंसा का सवाल
अब फिर हिंसा का सवाल सामने आ जाता है. लेकिन इतिहास साक्षी है कि ऐतिहासिक रुप से हिंसा की जिम्मेवारी तथाकथित समृद्धि का तानाबाना रचने वाले नरसंहारियों पर है न कि आदिवासी और मेहनतकश जनता पर. आज समूचे देश के सामने यह सवाल यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है कि आप किसकी हिंसा कि आलोचना करेंगे रोमन साम्राज्य के हत्यारों की या फिर स्पार्टकस के नेतृत्व में विद्रोह करने वाले गुलामों की. जाहिर तौर पर स्पर्ताकास के विद्रोह में हिसा और बर्बादी हुई. यदि कभी हिंसा का इतिहास लिखा गया तो यही बात सामने आएगी कि दुनिया कि समूची हिंसा में प्रतिरोध की ताकतों की हिस्सेदारी न के बराबर है. हिंसा का सहारा तो सबसे पहले सत्ता में बैठे वर्गों ने लिया. कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट की लड़ाई में खून की नदी बह गई. इस्लाम का उदय तो युद्ध करते हुए ही हुआ. एक अध्ययन बताता है कि सर्वाधिक भयंकर और युद्ध का अभिशाप और ‘गौरव’ 20वीं सदी को ही है. इस सदी के केवल 25 वर्षों में जितनी हत्यायें की गई है, अतीत में किसी एक सदी में भी नहीं हुई है. इस हिंसा कि वजह मुनाफे और वर्चस्व की लड़ाई थी. भारत में तो हिंसा की पूरी संस्कृति ही रही है. रामायण और महाभारत की कहानियां हिंसा और खून से लथपथ है. भारत में बौद्धों को भारी पैमाने पर हिंसा के जरिए शंकराचार्य के चेलों ने नष्ट किया. अबतक जनता मालिकों के लिए अपना जान गंवाती रही है लेकिन अब वह अपने बेटे-बेटियों के लिए लड़ रही है. यह बात जरुर नई है.

दरअसल शासकों को हिंसा शब्द से आपति होती है. शासकीय भाषा में इसी हिंसा को शक्तिपूजा, बल की साधना, आत्मरक्षा, देश की सुरक्षा आदि कहा जाता है. इतिहास में इस बात के कहीं भी प्रमाण नहीं हैं कि कोई भी राजा बगैर हथियारों के सत्ता में कायम रहा हो. जिस वर्ग के हाथ में सत्ता रहा है उस वर्ग के हाथ में हथियार भी रहे है. राष्ट्रीयता के संघर्ष वाले इलाकों को खून के समंदर में डुबो दिया गया है. अकेले काश्मीर में पिछले 20 सालों में 70,000 जानें गई हैं. इनमें दसियों हजार लोगों का टार्चर किया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हजारों लोग लापता हो गए. समूचा उतर-पूर्व सरकारी हिंसा और आतंक का रंगमंच बना हुआ है. महज दो महीने पहले मणिपुर में एक निहत्थे युवक को सरेआम गोली मारकर मुठभेड़ बता दिया गया. तहलका ने जब इस हत्या कि सिलसिलेवार तस्वीर छापी तो इसपर एक जांच की घोषणा हो गई. आंध्रप्रदेश में ही पिछले एक दशकों में सैंकड़ों छात्रों सहित लगभग चार हजार युवकों की हत्या कर दी गई. गुजरात के दंगों में ही लगभग दो हजार मुस्लिमों को मार दिया गया. इन लोगों का हत्यारा कौन है? कौन इन होनहार बेटों को लील रहा है. संघर्ष के इलाके ऐसे इलाके में तब्दील हो गए हैं जहां बेटियां लापता हो जाती हैं और फिर उनकी नंगी लाशें बरामद होती है. मायें अपने बेटों का उम्र भर इंतजार करती है लेकिन पूरी उम्र इंतजार खत्म नहीं होती. बहनों को अपने भाइयों की कोई खबर नहीं मिलती. 1970 के दशक में पूरा प बंगाल नवयुवकों के खून से लथपथ हो गया. पिछले एक दशक में बर्ज में डुबने के कारण 1,80,000 किसानों ने अपनी जान दे दी. कौन है इन सबका हत्यारा? इन बेटे-बेटियों का जुर्म बस इतना था कि ये यथास्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. यदि हिंसा के सवाल का हल ढूंढ़ना है तो इनके हत्यारों को ढूंढ़ना होगा. कितनी अजीब बात है कि सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करनेवाले देश में जन हत्या खुद एक सत्तापोषित राजनीति है. जनता ने तो व्यवहार से ही सीखा है कि यदि संघर्ष को एक मुकाम पर पहुंचाना है तो खूद को सशक्त करना होगा और शासक वर्गों के हथियार पर एकाधिकार को तोड़ना होगा. कौन अपनी सुख-शांति नीलाम कर देना चाहता है. हिंसा तो सत्ताओं का प्रिय शगल रहा है. सत्ता में बैठे लोग और धनाढ्य लोग रोमन साम्राज्य के थियेटरों में रंगमंच पर हत्या और महिला-पुरुष संबंधों की वास्तविक दृश्यों का लुत्फ उठाते थे. इसके बाद साम्राज्यवादियों ने विश्वयुद्धों में इस हत्या का लुत्फ उठाया. हिरोशिमा-नागासाकी के हत्यारो और हिटलर ने फिर इनकी विरासत को आगे बढ़ाया. इस तरह हिंसा और हत्या की पूरी जबाबदेही भी इन सत्ताओं के माथे है न कि संघर्षरत जनता के माथे. जनता ने तो इस हिंसा से मुक्ति के लिए प्रतिरोध शुरु किया चूंकि इनके पास इसके अलावा आत्महत्या ही एकमात्र विकल्प था.

लोकतंत्रः सिद्धांत और व्यवहार
क्या लोकतंत्र महज हाथों में लगाए गए नीली स्याही का प्रतीक भर रह गया है. अगर लोकतंत्र का मर्म पुछना है तो सुगना से पुछिए. एसपीओ ने उसका बलात्कार किया और फिर कहा कि तुमसे शादी कर लेंगे. मकदम मुके से पुछिए जिसके पति की पिछले महीने हत्या कर दी गई. कश्मीर और मणिपुर की महिलाओं से पुछिए. सुप्रीम कोर्ट ने जब ज्यादतियों की जांच की बात की तब मानवाधिकार आयोग ने इन हत्याओं और बलात्कार के लिए माओवादियों को ही जवाबदेह ठहरा दिया. जबकि बलात्कार से पीड़ित महिलाओं के बयान तक नहीं लिए गए. ये लोग महज नाम नहीं बल्कि इस लोकतंत्र के शिकार लोगों का प्रतीक बन गए हैं.
लोकतंत्र एक बहुत ही निरीह शब्द बनकर रह गया है. इसका इस्तेमाल साम्राज्यवादी से लेकर फासीवादी तक अपने-अपने फायदों के लिए करते हैं. यानी हरेक तरह का कुकर्म इस लोकतंत्र के नाम पर ही होता है. लेकिन लोकतंत्र सच में कोई ऐसी चीज नहीं थी. एक राजनीतिक संस्था के रुप में लोकतंत्र फ्रांस की राज्य क्रांति के साथ सामने आया. जहां बुर्जुआ वर्ग ने बसटिले को ध्वस्त करते हुए समानता, एकता और बंधुत्व का नारा दिया. सामंतों की जागीरें जप्त कर ली गई और जोतनेवालों को बांट दिया गया. इस तरह यह एक सामंतवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई थी जिसकी बुनियाद औद्योगिक क्रांति ने गढ़ी थी. जोतनेवालों को जमीन, महिलाओं की आजादी, मेहनतकशों को अपेक्षाकृत अधिक अधिकार जैसे कई कई प्रगतिशील काम इसने किए. लेकिन मुनाफे की प्यास यहां भी बरकरार रही. 19 वीं सदी के उतरार्द्ध में पूंजीपतियों के मुनाफे की दर में गिरावट होने लगी. अब यह मंदी का शिकार हो गया था. 20 वीं सदी के शुरु में यह अपने विकास के चरम पर पहुंच गया और अब मुनाफे की लूट के लिए यह पूरी तरह जनविरोधी हो गया. अब वित्तिय पूंजी के युग में लोकतंत्र भी बड़े पूंजीपतियों का गुलाम हो गया. मुक्त व्यापार की धारणा से लैस अमरीकी साम्राज्यवाद के लिए भी लोकतंत्र एक आम जुमला हो गया. लेकिन इसका दंश भी वियतनाम और चिली की जनता को झेलना पड़ा. इराक और अफगानिस्तान तो अब भी इस ‘लोकतंत्र’ का दंश झेल रहे हैं. दरअसल लोकतंत्र अब मुक्त व्यापार का पूरक बन गया था.
भारत का तो कहना ही क्या. अंग्रेजों के जाने के बाद तमाम जमींदार और पूंजीपति ही राष्ट्रभक्त बन गए. ये वही लोग थे जो नीचले स्तर पर अंग्रेजों के लिए काम करते थे. सारे राजे-रजवाड़े ही भारतीय जनता के भविष्य निर्धारक बन गए. दुनिया में लोकतंत्र जहां सामंतवाद को ध्वस्त कर खड़ा हुआ वहीं यह भारत में सामंतवाद के गठजोड़ में खड़ा हुआ. फासीवाद भारतीय संसद की एक मुख्य विशेषता भी है. भारतीय संसद को इतने अधिकार प्राप्त हैं कि यह जब चाहे संसद को रद्द कर दे. आपातकाल के रुप में इसका व्यावहारिक इस्तेमाल हुआ. यह गैरजनवादी हो सकता है लेकिन कानूनी रुप से जायज था. संकट के दौर में तो यह और ज्यादा प्रतिगामी हो गया है. आज सत्ता का ज्यादा से ज्यादा केन्द्रीकरण कैबिनेट और उससे भी ज्यादा संसदीय समितियों में हो गया है. संसद का मतलब पक्ष और विपक्ष दोनो होता है. लेकिन आज कोई भी पार्टी सबसे पहले अपनी पार्टी की कार्यसमिति में मुद्दों को को तय करता है और फिर इसे कैबिनेट में पास करा लेता है. संयुक्त सरकार के बावजूद बहुमत वाली पार्टी को इसका फायदा होता है. संसद में पास होने की गुजाइश में इसे संसद में लाया जाता है नहीं तो अध्यादेश के रुप में इसे लागू कर दिया जाता है. अब बिल की जगह अध्यादेशों ने ले ली है. संसदीय राजनीति ने 1947 के बाद से जाति, धर्म और क्षेत्रवाद जैसे तमाम प्रतिगामी चीजों का इस्तेमाल किया है. कई लोगों का तर्क है कि जाति, धर्म के कारण लोकतंत्र का नुकसान हुआ है जबकि सच तो यह है कि संसदीय राजनीति ने इन संस्थाओं का इस्तेमाल कर इसकी खाई को और बढ़ा दिया है. संसदीय राजनीति में जगह बनाने के लिए क्षेत्रवादी उन्माद बढ़ाया जाता है. क्षेत्रवाद राष्ट्रीयता का सवाल नहीं बल्कि संसदीय राजनीति का साईड अफेक्ट है.आज सत्ता को प्राप्त तमाम आपातकालीन अधिकार ही शासन के आम औजार बन गए हैं. संसद आर्थिक और विदेश मामलों में बहस के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती हैं ऐसे में भारतीय लोकतंत्र भारतीय जनता पर दमन ढाने के एक और औजार के रुप में सामने आता है.
इस बाजार के युग में संसद खुद एक बाजार बन गयी है. सांसद रिश्वत कांड, नोट के बदले वोट कांड, तहलका घोटाला इसके ताजा और खूलेआम उदाहरण हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में संसदीय पार्टियों का आधिकारिक घोषित खर्चा लगभग 2 अरब डालर (लगभग 92 अरब रुपए)था. लेकिन आकलनकर्ताओं का मानना है कि यह आंकड़ा 10 बिलियन डालर (लगभग 460 अरब रुपए) के बराबर होगा. इस खर्चे में वामपंथी पार्टियों की हिस्सेदारी भी कम नहीं है. इन पार्टियों के पास यह धन कहां से आता है? यह किसकी कमाई का पैसा है? स्विस बैंक में खरबों डालर किसकी कमाई का पैसा जमा है? कौन है इसका मालिक? यह साबित करता है कि संसद को जमीदारों और पूंजीपतियों के हाथों में गिरवी रख दिया गया है.
हमें पढ़ाया जाता है कि जनता की ताकत संसद में निहित होती हैं. संसदीय वामपंथी तो संसद के पुजारी बन गए हैं. इनके लिए हरेक समस्याओं का रामबाण है इनको चुनाव जिताकर संसद भेजना. सच तो यह है कि संसद में जमींदारों और पूंजीपतियों की ताकत निहित है. पिछले साठ सालों में संसद ने कितने फैसले जनता से जुड़े हुए लिए? आज तक भूमिहीनों को जमीन क्यों नहीं दी जा सकी? दलित आज भी जूते के नीचे रखे जाने वाली चीज क्यों रह गए हैं? पहचान की राजनीति के नाम पर खड़ी हुई कई दलितवादी, पिछड़ावादी पार्टियों ने लूट का साम्राज्य खड़ा किया और साम्राज्यवाद के एक नंबर दलाल साबित हुए. आदिवासी इतने सालों बाद भी महज शिकार खेलने की चीज रह गए हैं. पूंजीपतियों से जुड़े फैसले रातों-रात लिए जाते हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में श्रम सुधारों और कर रियायतों को रातों-रात पास कर दिया जाता है. संसदीय वामपंथियों के साथ दिक्कत यह है कि ये संसद की ताकत और सत्ता की दमनकारी ताकत का आकलन तो अधिक करते हैं. लेकिन जनता की ताकत पर अब उनको विश्वास नहीं रह गया. जनता ने तो भारी निराशा के बाद ही सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना.
संसद और विधानसभाएँ गरीब जनता को अधिकार नहीं दे सकती. इसका ताजा उदाहरण बिहार साबित हुआ है.बिहार की सरकार ने भूमि सुधार आयोग गठित किया. आयोग ने अपनी अनुसंशाएं सरकार को सौंप दी. सरकार ने ना-नुकुर करते हुए बटाइदारी की चर्चा शुरु की. यह पुनः एक एजेंडा बन गया. इसके तुरंत बाद के उपचुनाव में सरकार को भारी हार झेलनी पड़ी. कहा जाने लगा कि इसकी वजह बटाइदारी है. फिर सरकार ने बातचीत भी बंद कर दी. बाकि कुछ हो या न हो इससे इतना तो साफ हो जाता है कि जो भी सरकार भूमिहीनों के लिए जमीन, गरीबों के लिए अधिकार की बात करेगी उसे अपदस्थ कर दिया जाएगा. वामपंथियों ने भी क्या किया. प बंगाल में 1982 में विधानसभा चुनाव और 1983 में पंचायत चुनाव में वाम फ्रंट की जीत के बाद आपरेशन बर्गा और बंजर जमीनों के वितरण का काम भी बंद हो गया. यही नहीं 2004 के मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 14.31 फीसदी बर्गादार विभिन्न जगहों पर पिस्थापित हो गए. यदि कुल वितरित जमीनों पर नजर डाली जाए तो सितंबर 2001 तक कुल 10.58 लाख एकड़ बंजर जमीनों को वितरित किया गया और दर्ज किए हुए बर्गादार 11.08 लाख एकड़ पर काबिज थे. यदि दोनों को मिलाकर देखा जाए तो भूमि सुधार के अंदर आने वाली जमीन का यह महज 15.5 फीसदी है. नरेगा, इंदिरा आवास योजना की लूट में क्या वामपंथी पार्टियों के पंचायत प्रधान शामिल नहीं हैं? इसका मतलब है कि मुख्य सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन सी पार्टी है. हमें यह समझना चाहिए कि अर्धसामंतवाद का खात्मा अर्धऔपनिवेशिक परिस्थितियों में संभव नहीं है. दलाल बड़े बुर्जुआ और जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली सत्ता भूमिहीनों और गरीबों को अधिकार नहीं दे सकती है. यदि देश में सबसे अधिक कही भूमि सुधार हुआ भी है तो वह है जम्मु और काश्मीर न कि प बंगाल.
जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है तो यह भी उसी समय तक कायम रहता है जब तक यह सत्ता के लिए चुनौती न बन जाए. इसका ताजा उदाहरण लालगढ़ है. वहां पुलिय संत्रास प्रतिरोध समिति ने प्रतिरोध के तमाम जनवादी स्वरुपों पर खुद का कायम रखा. इसने अपने लक्ष्यों और मांगों के साथ कोई समझौता नहीं किया. जब आंदोलन एक उंचाई पर पहुंचा तो सुरक्षा बलों का भारी दमन इस इलाके में शुरु हो गया. अंततः इसने हथियार उठाने की घोषणा कर दी और कहा कि अब दमन की वजह से जनवादी प्रतिरोध की कोई गुजाइश नहीं बच गई. यानी कि कोई भी संघर्ष यदि इमानदारी के साथ अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है तो उसे अंततः संघर्ष के स्वरुप के बंधन से निकलना ही होगा.
इस तरह भारत का लोकतंत्र एक मृग-मरीचिका की तरह है. बाहर से देखने के लिए कुछ और और अंदर से कुछ और. विधायिका से लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका तक वित्तिय पूंजी की गुलाम हो गई है. खदान कंपनी वेदान्त के पर्यावरण संबंधी काले रिकार्ड को देखते हुए वहां के एक व्यक्ति ने इसे खदानों का ठेका देने पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की. न्यायाधीश जस्टीश कपाड़िया ने भरी अदालत में कहा कि स्टरलाइट एक अच्छी कंपनी है. यह ठेका स्टरलाइट को दिया जाए. इसमें हमारा शेयर भी है. हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ समिति ने जंगल के तबाह होने के चलते खनन की छुट नहीं देने की सलाह दी थी. यहां यह जानना जरुरी है कि स्टरलाइट वेदान्ता की ही एक सहायक कंपनी है. इस तरह हम देखते हैं कि समुचा तंत्र वित्तिय पूंजी की तीमारदारी में व्यस्त है ऐसे में तो जनता की बात करनी भी बेमानी है.

आशा की किरण
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब पूरी दुनिया एक भारी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है. ऐसा दौर संघर्षों और उथल-पुथल से भरा हुआ दौर होता है. ऐसे संकट में शासक वर्ग का और फासीवादी होना लाजिमी है. देश की सबसे गरीब जनता के पैरों के तले से जमीन छीनने के लिए युद्ध की घोषणा हो चुकी है. शासकवर्गीय पाटियों की तो बात ही छोड़ दें वामपंथी भी नक्सलवादियों पर बर्बर हिंसा में लिप्त रहने का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना कर रह हैं और इस तरह वे अंततः फासीवादी ताकतों के साथ ही खड़े हो रहे हैं. इन लोगों में केवल माओवादियों को खत्म किए जाने के तरीकों को लेकर बहस है. इनका बस ये कहना है कि माओवादियों को सैनिक हमले के बजाए विकास के बल पर खत्म किया जाना चाहिए. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन्हे सैनिक कार्रवाई और विकास के समन्वय में खत्म किया जाना चाहिए. ऐसे लोगों के लिए फिदेल कास्त्रो द्वारा कोलंबिया के एक क्रांतिकारी संगठन फार्क पर किए गए हमले का जेम्स पेत्रास द्वारा दिया गया जबाब पर्याप्त है. जेम्स पेत्रास ने कहा था,‘‘ इन तर्कों (फार्क के बर्बर हिंसा में शामिल होने) के साथ कास्त्रो को 20वीं सदी के शुरु के रूस की क्रांति से लेकर चीन और वियतनामी क्रांतियों की भी आलोचना करनी चाहिए. क्रांतियां निदर्यी होती हैं लेकिन कास्त्रो यह भूल जाते हैं कि प्रतिक्रांतियां कहीं अधिक निर्दयी होती है. युद्ध के दौरान वियतनाम में खड़े किए गए खुफिया नेटवर्क की तरह ही युरीब (कोलंबिया की सरकार) ने स्थानीय अधिकारियों को शामिल कर स्थानीय खुफिया नेटवर्क गठित किया. वियतनामी क्रांतिकारियों ने इस खुफिया नेटवर्क के स्थानीय सहयोगियों का सफाया इसलिए किया क्योंकि ये दसियों हजार वियतनामी ग्रामीण मिलिशिया के फांसी और हत्या के लिए जिम्मेवार थे.’’
इन तमाम आलोचनाओं को मुंह चिढ़ाते हुए आदिवासी अपने दुश्मन के सामने सीना ताने खड़े हैं. देश की सबसे गरीब जनता कह रही है कि संसद में बैठे लोग भले ही साम्राज्यवादियों के जुठन खाने के लिए आपस में लड़ते रहें हम अपने बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए युद्ध में शामिल होने जा रहे हैं. हमने अपनी मुक्ति का एजेंडा देश के सामने रख दिया है. हम कोई भी पुराना विकल्प स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. अब देश को तय करना है. तय करना है उन सभी को जो ‘आइवरी टावर’ पर बैठे सुनहरे सपने बुनते हैं. बेहतर भविष्य की कल्पनाओं में डूबे रहते हैं. अब समय आ गया है जब हम तय करें कि हमें किसके पक्ष में खड़ा होना है. रोमन साम्राज्य के हत्यारों के पक्ष में या फिर स्पार्टाकस के पक्ष में. एक सकारात्मक संकेत यह है कि देश की व्यापक जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों के पक्ष में खड़ा होने का जज्बा दिखाया है भले ही संसद और विधानसभाओं में बैठी तमाम ताकतें सरकार के साथ खड़ी हों. जीत अंततः जनता की ही होगी चूंकि जनता ही इतिहास का निर्माण करती है. सत्तायें तो केवल और केवल दमन करती है.

10 नवंबर 2010

उत्तराखंड में आयोजित "जनता पर युद्ध" के खिलाफ कन्वेंशन




उत्तराखंड (अल्मोड़ा)से हर्ष पाण्डेय द्वारा "जनता पर युद्ध" के खिलाफ कन्वेंशन की भेजी गयी इस लम्बी रिपोर्ट कों बिना काट-छाँट के यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

विभिन्न संगठनों की ओर से आयोजित जनता पर युद्ध के खिलाफ कन्वेशन की शुरूआत करते हुए नैनीताल समाचार के सम्पादक राजीव लोचन साह ने सभी अतिथियों का परिचय कराया। अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि यहा अघोषित आपातकाल की स्थिति बन गई है। जहां जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना जुर्म बन गया है और शांतिपूर्वक आन्दोलन कर रहे आन्दोलनकारियों पर बर्बरता की जा रही है। इन्कलाबी मजदूर केन्द्र के खीमानन्द ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर आदिवासियों को अपना दुश्मन मानकर सरकार उन पर युद्ध थोप रही है तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ मिलकर उन्हें उनके अधिकारों से बेदखल कर रही है। देश में जिस तरह से समाजवाद तथा कम्युनिस्ट शब्द को बदनाम कर दिया गया है उससे इसके पीछे का रचा जा रहा षडयन्त्र अब साफ हो रहा है। यह युद्ध केवल आदिवासी इलाकों की क्रान्तिकारी शक्तियों का ही दमन नहीं है अपितु यह पूरे भारत में काम कर रही क्रान्तिकारी शक्तियों का दमन है। इसके खिलाफ एकजुट होकर जन कार्यवाही करने की जरूरत है। जिस तरह से पूंजीवाद संकट की ओर जा रहा है उसका प्रतिवादी होना अपरिहार्य है। इस स्थिति में जनता का दमन बढ़ेगा। जिसके लिये हमें तैयार रहना होगा तथा जनवादी संगठनों, न्याय पसंद लोगों एवं वुद्धिजीवियों को इसका विरोध करना होगा। क्रांति मजदूर वर्ग के नेतृत्व मे होती है और हमें मजदूर वर्ग को संगठित करके देश में व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष को मुकाम तक पहुॅंचाना होगा। राजनैतिक बंदी रिहाई कमेटी के एड0 दीवान धपोला ने कहा कि ग्रीन हंट, सलवा जुडूम का विरोध करने वाले एवं जन सरोकारों से सम्बन्ध रखने वाले लोगांे के प्रति सरकार तथा विपक्ष जो कार्यवाही कर रहा है उसके खिलाफ यह कार्यक्रम एक आवश्यकता है। आज इस तरह के कन्वेन्शन द्वारा अगला रास्ता तैयार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। इस भूमिका को भी हम लोगांे ने ही निभाना है। आज के हालातों के अनुसार लोग इन परिस्थितियों से जी चुरा रहे हैं। वह पैसिव हो रहे हैं। माना की 60 साल का बुजुर्ग कुछ नहीं कर सकता लेकिन वह अन्याय के खिलाफ लड़ रही युवा पीढ़ी को मोरल सपोर्ट तो दे सकता है। हम अप्रत्यक्ष रूप से नई पीढ़ी की मदद कर सकते हैं। लेकिन नहीं। आज जो समाज के लिये काम करता है उसकी दुगर्ति उसके परिवार तथा उसके दोस्तों से ही शुरू हो जाती है। उत्तराखण्ड राज्य यहां की जनता ने बड़ी मेहनत से प्राप्त किया है। लेकिन विगत दस सालों में यहां पुलिस फोर्स की संख्या बढ़ी है आईएएस की संख्या बढ़ी है। बजट का अधिकांश भाग टीए डीए में ही जा रहा है। पहाड़ों में आईटीबीपी एसएएबी के मुख्यालय बन गये लेकिन जनता को मिलने वाली सुविधायें नहीं बढ़ी। कुछ साल पहले संघर्ष करने वाले लोग भी थे तथा उनके मददगार भी थे। लेकिन आज परिस्थितियां इसके विपरीत हैं। हमें यह सोचना चाहिये कि हम किस तरह से सोसिलिस्टों की मदद के लिये आगे आ सकते हैं। आरडीएफ के प्रदेश महासचिव केसर राना ने कहा कि आज समय जिस दौर में है उस दौर में पूरा भारत एक ज्वालामुखी पर बैठा है। देश मंे उत्पीड़न की सीमायें तेज हो रही है। कॉरपोरेट जगत जो चाह रहा है शासक वर्ग वही कर रहा है। छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड इसके जीते जागते उदाहरण हैं। इन इलाकों में वेदान्ता तथा पास्को जैसी कम्पनियों ने आदिवासियों का जीना दूभर कर दिया है। कमीशन पाने के लिये शासक वर्ग कॉरपोरेट जगत की सेवा कर रहा है। यह खनिज प्रदेशों में खास तौर से देखा जा सकता है। जो उनके खिलाफ बोल रहा है उसे देशद्रोही बताया जा रहा है। अभी कुछ दिनों पूर्व कश्मीर मुद्दे पर अरून्धती रॉय ने अपना वकत्व्य जारी किया और तमाम शासक वर्ग के आंखों की किरकिरी बन गई। जो लोग कश्मीर या माओवादियों के समर्थन में बोल रहे हैं उनका रास्ता जेलों की ओर जा रहा है। देश में बेरोजगारी, युवाओं के सवालों को अनदेखा किया जा रहा है। जो लोग बंगाल, छत्तीसगढ़ या झारखण्ड में लड़ रहे हैं उन्होंने लड़ाई को ही जारी नहीं बल्कि लड़ाई के पैमाने को भी बदला है। आज विचारों को भी सेंसर किया जा रहा है। यदि कोई मार्क्स, लेनिन, लोहिया, जेपी, माओ के विचारों को मानता है तो हर किसी को किसी भी विचार को मानने की आजादी होनी चाहिये।
उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के गोविन्द लाल वर्मा ने कहा कि मैं तो यह समझता हूॅं कि इस देश की सत्ता गोरी चमड़ी की जगह काली चमड़ी वालों के हाथ में आ गई है। हमें केवल राजनैतिक आजादी मिली सामाजिक नहीं। तमाम लोग मताधिकार का प्रयोग करके शासन तो बनाते हैं लेकिन शासक नहीं हो पाते। वास्तव में सत्ताधारी वह हैं जो अपनी पत्नी को 10 करोड़ की कोठी उपहार में दे सकते हैं या अपने बच्चे के जन्मदिन पर हवाई जहाज खरीद सकते हैं। जिसके दिन में तड़पन आती है वहीं अपना आक्रोश प्रकट कर सकता है। जब जनता के हक हकूकों की बात कहो तो शासक वर्ग कुचलने के लिये आ जाता है। जिस बात के लिये मध्य भारत तथा उत्तर पूर्वी भारत के लोग लड़ रहे हैं वो दमन से और भी अधिक बढे़गा। सोमानाथ सांस्कृतिक संगठन के मोहन सनवाल ने अपनी बात को इस गीत के माध्यम से व्यक्त किया।

भारत देश में घुस गये रे बेईमान, नौजवानों जागो होनौजवानों जागो हो,
बुद्धिमानों जागो होभारत देश में घुस गये रे बेईमान, नौजवानों जागो
झारखण्ड और उड़ीसा, सीआरपीएफ दमन करे लूटती पुलिसा
घर-घर कर दिये तबाह नौजवानों जागो हो
देश में घुस गये रे बेईमान, नौजवान जागो
जंगल की जो बात करेगा, पुलिस फौज के हाथ मरेगा
जनता हो गई परेशान, नौजवान जागो हो
भारत देश में घुस गये रे बेईमान नौजवान जागो
रोजगार, खाना नहीं मिलता, घर घर जा जनता को लूटते
लूट मची है आज, नौजवान जागो हो
भारत देश में घुस गये रे जवान नौजवान जागो हो।
निर्दोषों को पकड़ ले जाते, मुठभेड़ बताकर खुद मार के आते
कुचक्र चलना है आज, नौजवान जागो हो
भारत देश में घुस गये रे बेईमान, नौजवान जागो हो।
खून ए जिगर से धरती के लालों, धरती को लाल बनाने वालों
ले लो लाल सलाम, नौजवान जागो हो
भारत देश में घुस गये रे बेईमान, नौजवान जागो हो।

परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कमलेश ने कहा कि जनता के खिलाफ सरकार पिछले कई सालों से सरकार आदिवासी इलाकों में चला रही है। सरकार के लिये यह विकास के लिये आवश्यक कत्लेआम है। पूंजीपतियों को फर्क नहीं पड़ता कि उनके लिये कितना कत्लेआम हो रहा है। यह उनके लिये कोई अनोखी चीज नहीं है। हम लोगों को समझना होगा कि यह झारखण्ड, उड़ीसा या छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि पूरे भारत की मेहनतकश जनता पर थोपा गया युद्ध है। सरकारों ने यह साफ कर दिया है कि वह अमेरिका में बैठे अपने रिश्तेदारों के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन इसका व्यापक प्रतिरोध नहीं हो रहा है। अगर इस बडे़ युद्ध को रोकना है तो श्रम को संगठित करना होगा। तभी हम विकास के उस मॉडल की ओर बढ़ पायेंगे जहां मजदूर विकास का प्रणेता होगा। रचनात्मक शिक्षक मण्डल की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य डा0 कपिलेश भोज ने कहा कि आज हम जिस दौर में ऑपरेशन ग्रीन हंट की बात कर रहे हैं उसे हमें व्यापक पहलू के स्तर तक समझना होगा। उन्होंने कहा कि 1947 में सत्ता हस्तान्तरण के बाद लूट का नया आयोजन हुआ। हम 1947 को पूंजीवाद के नये चरण के रूप में देख सकते हैं। लेकिन दुनिया में कभी ऐसा नहीं हुआ है कि श्रमिकों के दमन का विकल्प न सोचा गया हो। सर्वप्रथम कार्लमार्क्स ने बताया कि पूंजीवाद का उपचार क्या है। दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है जो अच्छी जिन्दगी न चाहता हो लेकिन ऐसा नहीं होता। पूंजीवाद का जो विश्लेषण कार्लमार्क्स ने किया वह आपने आप में एक विज्ञान है। वो मुक्तिदायी सिद्धान्त है जो लेनिन ने रूस में और माओ ने चीन में लागू किया। हिन्दुस्तान का जो वर्ग तकलीफों से जूझ रहा है वो अपने अन्तरविरोधों से भी जूझ रहा है। हमें यह देखना होगा कि जनता की बात करने वाली क्या कोई पार्टी मजबूत हो रही है या नहीं। किसी भी देश में जब दमन या उत्पीड़न होता है तो शासक वर्ग जनता की चेतना को शून्य करने का काम करता है। वही हिन्दुस्तान का शासक वर्ग भी कर रहा है। वर्तमान शिक्षा का ढांचा विद्यार्थियों को व्यक्तिवादी तथा भयग्रस्त बना रहा है। नशाखोरी से युवा वर्ग को नशेड़ी बनाया जा रहा है। जहां भी बदलाव आता है सबसे पहले वहां के शिक्षक, विद्यार्थी तथा वुद्धिजीवी अग्रणी भूमिका में होते हैं। वरिष्ठ कवि नीलाभ ने कहा कि जिस तरह की घटनायें हो रही हैं उनमें शान्त रह पाना असम्भव है। उन्होंने कहा कि मैं देश नहीं जानता, मैं लगातार सोचता हूॅं की देश क्या है। चंडीदास ने कहा है कि अगर कोई सत्य है तो वह मानुष सत्य है। लेकिन आज मानव ही मानव का दमन कर रहा है। कोई भी जनता अपना हक चाहती है। जनता जिस तरह से जीना चाहती है वह उसका अधिकार है। कश्मीर की जनता यदि चाहती है कि वह अपने ढंग से जिये तो ये अधिकार उसे क्यों नहीं मिलता ये सोच के परेशानी होती है। क्या आप लोगों ने उत्तराखण्ड इसलिये बनाया कि बिल्डर यहां आकर इसे लूटें। क्या हमने हत्यायें करने वाले लोग तैयार करने के लिये उत्तराखण्ड बनाया। अभी हम 94 किमी0 की यात्रा करके यहां पहुॅंचे हैं तो हमने देखा की पहाड़ जगह जगह से टूट गया है। जनता पर युद्ध कबसे शुरू हुआ। बिरसा मुण्डा भी जनता के युद्ध में शामिल था, भगत सिंह भी जनता के लिये लड़ा। हमारी दोस्त अरून्धती रॉय कहती है कि जिनका विकास हो रहा है उनसे पूछो। अगर गौर से अपने चारों और दिखेगा तो आपको विस्थापन दिखेगा जो युद्ध की पहली निशानी है। पंजाब, बिहार में धरपकड़ शुरू हुई है अब यहां भी होगी। पूर्वाेत्तर में केरल की फौज, उड़ीसा में पंजाब की फौज तथा झारखण्ड में और कहीं की फौज भेजकर अपने को अपनों के खिलाफ लड़ाया जा रहा है। और यह क्या नाम रखे गये हैं।
चक्कर खनिजों का है झारखण्ड और आसपास के इलाकों में 4 ट्रिलियन बाक्साइट है। जिससे एक टन एल्यूमिनियम बनाने के लिये 1टन पानी, बेशुमार बिजली तथा बिजली के लिये बांध बनाने की आवश्यकता पडे़गी। जिससे बाद में हथियार बनायें जायेंगे। अब हमें तय करना है कि क्या हम सिर्फ हथियारों के लिये यह कीमत चुकायेंगे। भगवान ना करे कल अगर उत्तराखण्ड में भी कोई खनिज निकल आयेगा तो यहां भी यह सब शुरू हो जायेगा। पी चिदम्बरम गृह मंत्री बनने से पहले वेदान्ता का स्लीपिंग डायरेक्टर था। वो साल में केवल दो मीटिंग अटैण्ड करता था जिसके लिये उसे 28 लाख रूपये मिलते थे। गृहमंत्री बनने के बाद उसने इस्तीफा दे दिया। जो लोग सोचते हैं कि जनता को ज्यादा समय तक मूर्ख बनाया जा सकता है तो वे सबसे बडे़ मूर्ख हैं। पंजाब तथा देश के अन्य हरित क्रांति वाले राज्यों में किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। चिदम्बरम तो यह भी कहता है कि देश की 85 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में आ जाये। अब कोई तुक तर्क ताल नहीं रह गया है। मुझे याद है शराब माफियाओं का विरोध कर रहे पत्रकार उमेश डोबाल की हत्या हुई थी। लेकिन शराब माफिया आज भी सक्रिय है। इलाहाबाद की सामाजिक कार्यकर्ता सीमा काफी समय से रिमांड पर चल रही है। उसे हर 15 दिन की रिमांड समाप्त होने के बाद फिर रिमांड पर ले लिया जाता है। उसका पति विश्व विजय भी गिरफतार कर लिया गया। कॉमरेड आजाद, हेम पांडे की हत्या कर दी गई। इलाहाबाद में अब कोई सीमा का नाम नहीं लेता हो सकता है यहां भी कोई प्रशान्त राही का नाम न लेता हो। अब तो सरकार ने जनता के लिये आन्दोलन करने वालों के खिलाफ प्रचार भी शुरू कर दिया है। वे कहते हैं कि माओवादी हर साल 15 हजार करोड़ रूपये की वसूली कर रहे हैं। तमाम समाचार पत्रों के माध्यम से प्रचार किया जा रहा है। जो विद्रोह कर रहा है वह राजद्रोही बताया जा रहा है। मैं तो कहता हूॅं कि यह राजपत्रित आतंकवाद है। आपको एक वर्दी मिली है एक बंदूक मिली है और बस गोलियां बरसा रहे हैं। आज इंटरनेट से राई रत्ती जान सकते हैं। बीते दिनों होंडा कम्पनी के मजदूरों पर लाठीचार्ज हुआ। अब यह आग फूट रही है लेकिन मजदूर अभी एक सूत्र में नहीं हैं। मित्तल, जिंदल, टाटा सभी आपस में लड़ रहे हैं। लेकिन जब जनता की बात आती है तो ये सब एक हो जाते हैं। तो यह बहुत जरूरी है कि हम भी एक सूत्र में रहे। वो एक दो चार को मार सकते हैं। पचास सौ को बंद करा सकते हैं। लेकिन पूरे देश की आबादी को नहीं। इसलिये अब वे तरह तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। युद्ध में सब होता है और यह युद्ध है। लोग अब यह बात जान रहे हैं। वो जानना चाहते हैं ऐसा कौन सा रास्ता है जिससे विकास का रास्ता निकल सकता है।उत्तराखण्ड वन पंचायत सरपंच संगठन के गोविन्द सिंह मेहरा ने अपनी बातों को अपने चुटीले अंदाज में कहते हुए कहा कि हमने लूटतंत्र को लोकतंत्र मान लिया है। सरकार कह रही है हम पानी बचाने के लिये गांव गांव में नदियों पर चैक डैम बना रहे हैं। उसे सरकार की उपलब्धि बताया जा रहा है लेकिन चैक डैम गांव वाले अपने अपने घराट चलाने के लिये कई वर्षाें से बना रहे हैं। सरकार ने हमारी जल संस्कृति को नल संस्कृति तथा वन संस्कृति को धन संस्कृति में बदल दिया है। पेड़ लगाने के नाम पर पैसे लिये जा रहे हैं। हमें यह देखना होगा कि हम इन 10 सालों में कहां पहुॅंच गये हैं। जिन खेतों में कभी गेंहूॅं, धान होते थे आज वो भूमि कंकरीट के जंगल से पटी चुकी है। जल, जंगल और जमीन से जनता के अधिकार समाप्त कर दिये गये हैं।क्रान्तिकारी लोक अधिकार संगठन के पीआर आर्या ने कहा कि भारत का पूंजीपति वर्ग जनता का दमन कर रहा है तथा जनता के लिये लड़ने वाले लोगों को राक्षस तथा अलगाववादी बताकर उन्हें भटका रहा है। अब देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यह युद्ध फैल रहा है और पुलिस दमन लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन हमें यह देखना है कि जो हो रहा है क्या जनता उसका प्रतिकार कर रही है। क्या हमारा नेतृत्व जनता को गोलबंद कर सकता है या नहीं। हम शासक वर्ग को तानाशाह कह सकते हैं गालियां दे सकते हैं लेकिन हमें अपनी कमजोरियां नहीं दिखती। हमारे देश में एक टोकरा भर के क्रान्तिकारी दल हैं लेकिन हम एक दूसरे की बात नहीं सुनते। यह टटपूंजियां संकीर्णता क्यों आती है। क्या यह किसी की निजी ठेकेदारी है। हमें सबसे पहले अपनी कमजोरियां तलाशनी चाहिये। शासक वर्ग इतना बदहवास हो गया है कि वह आन्दोलन कर रही जनता पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवा रहा है। लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह अनजाने में जनता को लाठी उठाना सीखा रहा है। जवाहर लाल नेहरू तथा मनमोहन सिंह को खड़ा कर देखिये। दोनों का बौनापन आपको दिख जायेगा। हमारी देश के जो संचालन केन्द्र हैं व्यापारिक केन्द्र हैं वहां क्रान्तिकारी नहीं हैं। हमें इन केन्द्रों पर भी सक्रियता बढ़ानी होगी। एक सच्चे योद्धा और मेहनतकश के रूप में हमारी जिम्मेदारी क्या है। हमें जनता को एक सूत्र मंे पिरोना होगा। देश में 40 करोड़ मजदूर हैं। जिन्हें हमें एक सूत्र में पिरोना होगा। पंूजीपतियों ने पहला हमला मजदूर पर ही क्यों किया। क्यों कि वे जानते थे कि मजदूर वर्ग संगठित हो सकता है। मजदूरों के बाद दूसरा हमला किसानों पर हुआ। सिंगूर, कलिंगनगर में जनता लड़ रही है। जो नाभि क्षेत्र है जो संचालन केन्द्र हैं वहां हमारी पकड़ कमजोर है। हमें नये नये संचालन केन्द्रों पर अपनी पकड़ मजबूत बनानी होगी। क्यों कि क्रान्तिकारी बरगद की पूजा नहीं करता वह नये भ्रूण को सींचता है।राजनैतिक बंदी रिहाई कमेटी के पान सिंह ने कहा कि समाज के मजदूर वर्ग के बीच काम किये जाने कि जरूरत है। उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ में दमन किया जा रहा है लेकिन भ्रूण रूप में ही सही जनता की सत्ता का काम चल रहा है। उन्होंने दिखा दिया है कि जनता कभी याचक नहीं होती। लेकिन सरकार की इस भ्रूण को कुचलना चाहती है। उत्तराखण्ड में भी जब जब विकल्प की बात आई है दमन शुरू हुआ है। ग्रीन हंट के खिलाफ जनता की लड़ाई पूरे देश में चल रही है। राज्य में आपदा के समय जनता को देने के लिये जमीन नहीं है लेकिन टाटा, मित्तल को प्रदेश में उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित किया जा रहा है। आरडीएफ के केन्द्रीय महासचिव राजकिशोर ने कहा कि आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था यदि अन्यायपूर्ण है तो वह जनता पर युद्ध है। ब्रिटिशकाल से ही यह ढांचा ऐसा खड़ा किया गया है जो जनता पर युद्ध है। भूमण्डलीकरण उदारीकरण के फलस्वरूप शोषण का विस्तार हो रहा है। भूमि का विकेन्द्रीकरण से केन्द्रीकरण हुआ है। जनता का प्रतिरोध भी बढ़ रहा है। आज नक्सलबाड़ी का आन्दोलन 22 राज्यों में फैल गया है। जो आन्दोलन नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ वह माओवाद के रूप में फैल रहा है। जिसे विरोधी शक्तियां आतंकवाद, बलात्कारी कह कर प्रचारित कर रही हैं ताकि जनता उनसे घृणा करे। यह जनता पर मनोवैज्ञानिक हमला है। आज सैकड़ों लोगों को फांसी की सजा सुनाई जा रही है कई लोगों को बिना मुकदमे के गिरफतार किया जा रहा है। जहां पर प्रतिरोध हो रहा है वहां लोगों पर न्यायिक एवं कानूनी हमला किया जा रहा है। आज की तारीख में प्रतिवर्ष दो लाख महिलायें प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं 5 लाख बच्चे प्रतिवर्ष कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। हरित क्रांति का नारा देकर नाटक किया जा रहा है। आज हरित क्रांति वाले राज्यांे में ही किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। हजारों लोग बाढ, सूखे की चपेट में आने से मर रहे हैं। क्या आज किसी भी दफतर में बिना पैसे के काम होते हैं। चुनाव की राजनीति हो रही है। जनता का अधिकार तभी तक है जब तक वह वोट नहीं देती। नक्सलबाड़ी का आन्देालन तब शुरू हुआ जब किसान जमींदारों से भूमि प्राप्त करने के लिये लड़े। 1947 के बाद भी ब्रिटिश सामाजिक, आर्थिक, ढांचा हम पर थोपा गया। नक्सलबाड़ी में जमीन के लिये लड़ाई लड़ी गई। लेकिन आज सरकार फौज के द्वारा हमारी जमीन, जंगल, नदियां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंप रही है। उसके बाद हमारे खनिजों से माल तैयार कर हमें ही बेचा जा रहा है। सरकार कहती है हम विकास कर रहे हैं। लेकिन असल में माओवादी देश के इतिहास को समझते हैं। माओवादियों पर तोहमत लगाई जाती है कि ये हिंसा करते हैं। लेकिन वेा चाहते हैं उत्पादन प्रक्रिया बदली जाये। लेकिन कभी भी शासक वर्ग इस व्यवस्था को बदलने के लिय तैयार नहीं हुआ। अगर हम विदेशों को समृद्ध बनायेंगे तो खुद कंगाल हो जायेंगे। हम वो माल बना रहे हैं जो अमेरिका को पसंद है। सरकार खेत के विकास का साधन नहीं दे सकी और कहती है विकास कर रहे हैं। हमारा कभी भी स्वतंत्र और आर्थिक विकास नहीं हुआ है। उन्हांेने कहा कि संसदीय धारा में लाल झंडे वाले जो लेाग चले गये हैं वो कभी भी कम्यूनिस्ट नहीं कहलाये जायेंगे। लोकतंत्र का पालन फौज भेजकर नहीं किया जा सकता। किसान मजदूरों की शक्ति प्रबल शक्ति है। हमें शासक वर्ग के खिलाफ असहमति तथा असहमत लोगों को एकजुट करना होगा और विरोध की राजनीति को संगठित करना होगा। जनता को मनोवैज्ञानिक ढंग से गुमराह करने की साजिश के खिलाफ समानान्तर आन्दोलन चलाना होगा। अन्यायपूर्ण नीतियों और संसदीय लूट के खिलाफ अपनी ताकत को एक करना होगा। लालगढ़ के 1200 गांवों में जनता की कमेटी कायम है। वो लोग बैठकर सोचते हैं कि गांवों का विकास कैसे होगा। चाहे सड़क का प्रबंध करना है या स्कूल का प्रबंध करना है या चिकित्सालय का प्रबंध करना है। हमारे देश में खेत में काम करने वालों को अकुशल मजदूर कहा जाता है। आज देश में खेती का विकास नहीं हो रहा है। अगर हम देश का विकास करना चाहते हैं तो हमें उस विकास नीति को अपनाना होगा जो जनता का विकास करे। हमें संसदीय प्रणाली की लूट के खिलाफ एकता पैदा करनी होगी। तब जाकर हम जनता पर जो युद्ध चल रहा है उसे ध्वस्त कर सकते हैं। कन्वेन्शन के मुख्य वक्ता पूर्व आईएएस बीडी शर्मा ने कहा कि माओवाद का जो हव्वा फैलाया जा रहा है वह कुछ भी नहीं है। दरअसल बात वहां के प्राकृतिक संसाधनों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेचने के लिये रचे जा रहे षडयन्त्र के खिलाफ आन्दोलित माओवादियों का दमन करने की है। बस्तर में आयरन इंडस्ट्री स्थापित करने के लिये मात्र 6 आदिवासी परिवारों को विस्थापित किया गया। जबकि वहां लाखों लोग निवास करते हैं। इसका कारण यह था कि वहां केवल 6 परिवारों के ही मतदाता पहचान पत्र बने थे। प्राकृतिक संसाधन पहले से ही जनता के थे तो इन पर सरकार का हक कैसे हो गया। जो गलती हिटलर ने की वहीं यहां की सरकार भी कर रही है। हिटलर ने अनेक युद्ध जीते पर सोवियत रूस से नहीं जीत सका। क्यों कि वहां उसकी लड़ाई समाज से थी। यहीं गलती यहां भी दोहराई जा रही है। छत्तीसगढ, झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा में सरकार समाज से लड़ रही है। राज्य की शक्ति कभी भी समाज की शक्ति पर हावी नहीं हो सकती। आदिवासी कभी भी अंग्रेजों के गुलाम नहीं रहे। आदिवासी क्षेत्रों में आजादी से पहले जनता का ही अधिकार था। अंग्रेजों के आगमन के बाद धीरे-धीरे राज्य ने उन पर नियंत्रण करने की कोशिश की। आदिवासी सदियों से अपने बारे में खुद तय करते आ रहे हैं। संविधान लागू होने का दिन आदिवासियों के लिये अंधेरी रात था। आदिवासी अपने झगड़े स्वयं निपटाते हैं। पुलिस तक बहुत कम मामले आते हैं। संविधान के लागू होने के बाद हमारे सभी अधिकार छिन लिये गये। मैं तो कहता हूॅं ग्रामीण भारत को जानबूझकर खत्म किया जा रहा है। यहां तक की मनरेगा में तक किसानों को अकुशल मजदूर बताया गया है। वरिष्ठ पत्रकार पीसी जोशी ने सारे वक्ताओं की बातों को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी को सरकार द्वारा चलाये जा रहे दमन के खिलाफ आवाज उठानी होगी। हम सभी जनपक्षीय ताकतों को एक होना होगा। उत्तराखण्ड लोकवाहिनी के केन्द्रीय अध्यक्ष डा0 शमशेर सिंह बिष्ट ने कार्यक्रम का समापन करते हुए कहा कि जनता पर तरह तरह के जुल्म ढ़ाये जा रहे हैं। टिहरी बांध का पानी 832 मीटर तक बढ़ा दिया जाता है। यह भी जनता पर थोपा जा रहा एक युद्ध ही है। हमें इसे भी समझना होगा। हमने जनता को एकजुट करना होगा। क्यों कि चिपको आन्दोलन, नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन, वन आन्दोलन सहित सभी आन्दोलनों का नेतृत्व जनता ने किया किसी राजनैतिक दल ने नहीं। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि माओवादी सबसे बडे़ देश भक्त हैं और अपनी जिन्दगी अपना कैरियर अपना परिवार को त्याग करते हुए जनता के बीच में जाकर उनका नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज न्यायप्रिय एवं जनवाद पसन्द लोगों को एकमंच पर लाने की जरूरत है।