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18 मई 2015

सलवा-जुड़ुम -2 सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना

फोटो: साभार बीबीसी
यूपीए ने जिस सलवा-जुडुम की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के साथ मिलकर की थी. अब उसे क्रमांक में लिखने की जरूरत आन पड़ी है. उसे सलवा जुड़ुम-1 कहा जाएगा. क्योंकि बीजेपी शासन की मदद से सलवा-जुड़ुम -2 की शुरुआत करने की घोषणा स्थानीय नेताओं द्वारा कर दी गई है. इन घोषणाओं से यह भ्रम पैदा होता है कि सलवा-जुड़ुम -१ ख़त्म हो गया था. शायद उसे महेन्द्र कर्मा की मौत के बाद ख़्त्म हुआ मान लिया गया हो या यह 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर द्वारा जो आदेश दिया गया था उसके बाद खत्म मान लिया गया रहा हो. आदेश में इसे पूरी तरह से बंद करने को कहा गया था और सरकार को जनसंहारो में संलिप्त बताया गया था. सलवा-जुडुम पर यह फैसला इसके शुरू होने के लगभग 6 साल बाद आया था. इन 6 सालों में हत्या, बलात्कार और आगजनी की जाने कितनी घटनाएं घटी. छः लाख लोग अस्त-व्यस्त हो गए और कई अपने गांव फिर कभी लौटकर नहीं आए. राज्य के इस अभियान के खिलाफ उनमें से कई आदिवासी माओवादियों के साथ भी जुड़े, वे लड़कियां भी जिनके भाई सलवा-जुड़ुम में शामिल थे. और उन्होंने एक मजबूत विरोध जताया. क्या फिर से सलवा-जुडुम-2 का शुरू होना इन घटनाओं का दुहराव होगा. क्या इतिहास खुद को दुहराता है. क्या यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं है. निश्चय ही यह सब सवाल जब तक हल किए जाएंगे. जब तक इन पर नागरिक समाज से आवाज़ें उठनी शुरू होंगी कई कत्लेआम कर दिए जाएंगे. जबकि यह सच है कि सलवा-जुडुम के बंद करने के आदेश के बाद यह कभी बंद नहीं हुआ था. सरकार और विपक्ष के राजनेता इस पर पूरी तरह से खामोश हैं. क्योंकि आदिवासियों के साथ होने वाले सुलूक में संसद का पक्ष-विपक्ष एक साथ खड़ा है. भाकपा माओवादी ने इस पर अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी की है जिसे यहां देखा जा सकता है.  विज्ञप्ति: हिन्दी अंग्रेजी       

26 अगस्त 2013

हेम की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने की अपील


मशीन नौजवानों पर मुकदमे थोपती है: वह उन्हें कैद करती है, यातनाएं देती है, मार डालती है. ये नौजवान इसके नाकारेपन के जीते जागते सबूत हैं...निकम्मी मशीन हर उस चीज से नफरत करती है, जो फलफूल रही है और हरकत कर रही है. यह सिर्फ जेलों और कब्रिस्तानों की तादाद ही बढ़ाने के काबिल है. यह और कुछ नहीं बल्कि कैदियों और लाशों, जासूसों और पुलिस, भिखारियों और जलावतनों को ही पैदा कर सकती है. नौजवान होना एक जुर्म है. हर सुबह हकीकत  इसकी पुष्टि करती है, और इतिहास भी जो हर सुबह नए सिरे से जन्म लेता है. इसलिए हकीकत और इतिहास दोनों पर पाबंदी है.           -एदुआर्दो गालेआनो


           साथी हेम जुल्म और नाइंसाफियों के इस इतिहास से वाकिफ हैं और इस हकीकत को बदलने के सपने देखते हैं, इसलिए आज वे जेल में हैं. शुक्रवार को महाराष्ट्र पुलिस ने उन्हें महाराष्ट्र के गढ़चिरोली से तब गिरफ्तार कर लिया, जब वे प्रख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता प्रकाश आम्टे के अस्पताल में अपने हाथ का इलाज कराने के मकसद से वहां जा रहे थे. पुलिस, मीडिया और दक्षिणपंथी गिरोहों के एक हिस्से ने फौरन यह प्रचार करना शुरू किया कि वे एक ‘जानेमाने नक्सली कूरियर’ हैं. यह भारतीय राज्य की झूठ फैलाने वाली दमनकारी मशीन का नया कारनामा है, जो लगातार जनता की हिमायत में लिखने, बोलने और काम करने वाले छात्रों, नौजवानों और कार्यकर्ताओं पर हमले कर रही है, उन्हें गिरफ्तार कर रही है, उन पर झूठे मुकदमे थोप रही है और दूसरे अनेक तरीकों से परेशान कर रही है. हेम इसके सबसे हालिया शिकार हैं. हम साथी हेम की गिरफ्तारी की तीखे शब्दों में निंदा करते हैं और उनके बारे में फैलाए जा रहे झूठे प्रचार का खंडन करते हैं.
सच यह है कि जेएनयू से पिछले सेमेस्टर तक चीनी भाषा से बी.ए. कर रहे हेम एक उत्साही संस्कृतिकर्मी और छात्र कार्यकर्ता हैं. उनके गाए हुए गीतों में दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमों और मजदूरों की जिंदगी के बदतरीन हालात और उनके बहादुराना संघर्षों के किस्से हुआ करते हैं. वे बहुत अच्छी डफली बजाते हैं और नाटकों में अभिनय करते रहे हैं. जेएनयू आने से पहले वे उत्तराखंड में, जहां के वे रहने वाले हैं, उनकी पहचान राज्य के अग्रणी जनपक्षधर संस्कृतिकर्मियों में से एक की हुआ करती थी. पिछले तीन सालों से वे जेएनयू के रिवोल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट के एक सक्रिय कार्यकर्ता थे और उन्होंने हमें गांवों, कस्बों और शहरों में उत्पीड़ित जनता द्वारा गाए जा रहे अनेक ऐसे गीत सिखाए, जिनमें इंसाफ और बराबरी की बुनियाद पर एक नए समाज के सपनों की गूंज है. साथ ही उन गीतों में मौजूदा शासक वर्ग के जनविरोधी, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक विरोधी चरित्र को भी उजागर किया जाता है. ये गीत साम्राज्यवाद, सामंतवाद और ब्राह्मणवाद के गठजोड़ को दिखाते हैं: चोर चीटर बैठे हैं भाई, होशियार-खबरदार, लड़ना है भाई ये तो लंबी लड़ाई है तथा दूसरे ऐसे ही दर्जनों गीत जनता के संघर्षों को आवाज देते हैं और उत्पीड़नकारी शासक वर्ग की असलियत को जनता के सामने उजागर करते हैं. हमें इसमें कोई भ्रम नहीं है कि कॉमरेड हेम अपने इन गीतों और जनता की जुझारू संस्कृति में अपने योगदान के कारण ही राज्य द्वारा निशाना बनाए गए हैं.
यह राज्य उन सभी आवाजों को कुचल देना चाहता है, जो लोकतंत्र और विकास के इसके बहरे कर देने वाले शोर से ऊपर उठ कर जनता तक पहुंचती हैं और बताती हैं कि उनको जो कुछ बताया-सुनाया जा रहा है वह झूठ का पुलिंदा है. यह उन सारी निगाहों को जेल की अंधेरी कोठरियों में कैद कर देना चाहता है, जो गहराई तक धंसे हुए इसके बदसूरत चेहरे को देखने की कोशिश करती हैं और अवाम की निगाहें बन जाती हैं. यह राज्य उन सारे दिमागों को अपने खरीदे हुए गुलामों में बदल देना चाहता है, जो जुल्म और नाइंसाफी के इस जाल को काट कर एक नई दुनिया का सपना देखने की काबिलियत रखते हैं. इससे इन्कार करने पर उनके सपनों पर पाबंदी लगा दी जाती है. पिछले दिनों में हमने देखा कि किस तरह महाराष्ट्र में सक्रिय राजनीतिक-सांस्कृतिक संगठन कबीर कला मंच के साथियों को कैद किया गया, विद्रोही पत्रिका के संपादक सुधीर ढवले, कलाकार अरुण फरेरा, जन गायक जीतन मरांडी और उत्पल बास्के को गिरफ्तार किया गया, लेखक-चिंतक कंवल भारती गिरफ्तार किए गए, सीमा आजाद और विश्वविजय को ढाई वर्षों तक जेल में रख गया, स्वीडेन के पत्रकार यान मिर्डल के भारत आने पर पाबंदी लगा दी गई और अमेरिकी पत्रकार डेविड बार्सामियन को भारत में उतरने नहीं दिया गया. इन कदमों से भारत का खौफजदा निजाम इस गलतफहमी में है कि वह जनता की हिमायत में उठने वाली आवाजों को खामोश कर सकता है. लेकिन एक निजाम तभी खौफजदा होता है जब जनता उसकी बुनियादें पहले ही खोखली कर चुकी होती है. संघर्षरत जनता के गीत, उसकी कविताएं, उसके नाटक इस निजाम की खोखली बुनियाद वाले किले की दीवारों पर दस्तक दे रहे हैं. चाहे तो वह अपने कान बंद कर सकता है, ये गीत कभी बंद नहीं होंगे. 
हम अपने प्यारे साथी हेम की फौरन बिना शर्त रिहाई की मांग करते हैं और यह भी मांग करते हैं कि उनके ऊपर लगाए गए फर्जी केसों को रद्द किया जाए.


02 फ़रवरी 2012

शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान 11 फ़रवरी को


                                                    
मुंबई: 11 फ़रवरी को मुंबई मराठी पत्रकार संघ में शाम 5 बजे से अहमदाबाद के मशहूर वकील और एक्टिविस्ट मुकुल सिन्हा पहले शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान में लोगों को संबोधित करेंगे। गोधरा जनसंहार से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों और गोधरा की घटना के बाद मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुई बर्बर कार्रवाई को उजागर करने के अलावा गुजरात के भीतर हुई कई फ़र्जी मुठभेड़ों को प्रकाश में लाने वाले मुकुल सिन्हा 'विभ्रम जिसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं" (The illusion called Secularism) के  विषय पर बोलेंगे।

मुंबई में रहने वाले 32 वर्षीय युवा वकील शाहिद आज़मी की उनके दफ़्तर में  11 फरवरी 2010 को कुछ 'अनजान" लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी। शाहिद के एक क़रीबी मित्र के मुताबिक, शाहिद बाकी वकीलों की तरह नहीं थे जो महज पैसा कमाने के लिए वकालत करते हैं। वो न्याय के लिए निडरता से लड़ते थे। उन्होंने मालेगांव विस्फोट मामले के फ़र्जी आरोपितों सहित आंतकवाद से संबंधित कई मुकदमें लड़े।

व्याख्यान की अध्यक्षता जाने-माने स्कॉलर प्रोफ़ेसर जैरस बैनेजी करेंगे जो लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़ में पढ़ाते हैं। इस अवसर पर अन्य वक्ता हैं - वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही, मुंबई हाई कोर्ट के अधिवक्ता मिहिर देसाई, जमीअत लीगल सेल, महाराष्ट्र के सचिव मौलाना गुलज़ार आज़मी और शाहिद आज़मी के बड़े भाई आरिफ़ आज़मी।

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