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05 अप्रैल 2017

गांव बचेगा तो गाय बचेगी


 चन्द्रिका
 (मूलरूप से द वायर में प्रकाशित)

वे गाय को बचा रहे हैं और गांव को खत्म कर रहे हैं. गांव बचेगा तो गाय खुद ही बच जाएगी. वैसे यह कहना भी ख़तरनाक हो गया है. फिलहाल कुछ भी कहना ख़तरनाक हो गया है. सुनने के लिए दो लोगों के नाम बचे हैं और इसी के उन्माद में जाने कितने लोग फंसे हैं. फंसे हैं कि उन्हें लगता है कि यही है जो उन्हें उबार देगा. उन्हें उनके दुख और डर से निकाल लेगा. वे भीतर से डरे हुए लोग हैं जो उन्मादी हो गए हैं. हत्या और उन्माद के लिए उन्हें वहीं से ताकत मिल रही है. जबकि एक को दूसरे से शोहरत मिल रही है.

जहां कोई नाम बहुत बड़ा बना दिया जाता है. उसकी मान्यता बढ़ा दी जाती है और एक समूह भक्त बन जाता है. धर्म, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी कहीं भी इसे देखा जा सकता है. वे एक अदृश्य ताकत के बल पर फलते-फूलते हैं और तलवार की तरह समाज के चेहरे पर झूलते हैं. वे, जो गाय की रट लगाए हुए हैं. वे जो कोई भी मांस न खाने की हठ लगाए हुए हैं. वे गाय प्रेमी नहीं हैं. अगर होते तो गाय और गांव के संबध को समझते. कि वह गांव खत्म हो रहा है जहां गाय रह पाती थी. गांव वह बच रहा है जहां गाय की जगह दो गऊ जैसे बूढ़े ही बच पा रहे हैं. इसी विकास की प्रक्रिया ने गाय पालने वाले लोगों को गांव से बाहर कर दिया है. खेतीबाड़ी तबाह कर उन्हें शहर में भर दिया है. शहरों और शहरों के बीच अथाह भरे हुए इलाकों के बीच जो रिक्त स्थान है, वही गांव है. इन रिक्त स्थानों को गाय से नही भरा जा सकता. गाय से कोई भी रिक्त स्थान नहीं भरा जा सकता. फिलहाल जहां-जहां गाय लिखा जा रहा है, जहां-जहां गाय बोला जा रहा है. नफरत का कोई और ही चीज घोला जा रहा है. दो समुदायों के बीच जो बना हुआ, बचा हुआ रिश्ता था उसका धागा खोला जा रहा है.

गाय के बहाने वे उससे अपनी नफरत जता रहे हैं. सुअर (बाराह) जो उनके मिथक में ईश्वर था उसके खाए जाने, मारे जाने पर सवाल तक नहीं उठा रहे हैं. सवाल नहीं उठना चाहिए. न गाय पर न सुअर पर. खानपान के अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक कारण हैं. वैसे उन्हें किसी की संस्कृति का सम्मान नहीं है. उन्हें किसी से प्यार नहीं है. न मुल्क से, न गाय से, न गांव से, न गोरू से. क्योंकि गांव और गाय वाले मुल्क का बचना एक अलग तरह से बसना है. पूरी तरह से एक अलग अर्थव्यवस्था को रचना है. जिसे उजाड़ा गया और उजाड़ा जा रहा है. गाय से प्यार बगैर चरागाहों के नहीं हो सकता. गाय से प्यार बिना बैलों और हरवाहों के नहीं हो सकता. शहर चरागाह नहीं बना सकते. वहां हम हल बैल नहीं चला सकते. वहां तो हम खुद ही हर रोज कातिक के बैल बने हुए हैं. शहर जितने बड़े हैं हम उतना ज्यादा मिट्टी में सने हैं. इन घनी बस्तियों की बहुतायत आबादी जमीन से ऊपर सीढ़ियों वाले छतों की है. जानवरों ने अभी अपने को इस मुताबिक नहीं बनाया. सीढ़ियों पर चढ़ने और छतों पर रहने के लायक खुद को नहीं ढाला. हम हैं कि यह सब नहीं सोचते. अपनी ज़िंदगी और अपनी आंख से न देखकर गाय और गोबर में अड़े हुए हैं.

वन बीएचके में कोई कैसे गाय बसाएगा. बस वह अपनी दौड़ती-फिरती ज़िंदगी में जब भी गाय का नाम सुनेगा भावुक हो जाएगा. उसके लिए वन बीएचके की भी जरूरत नहीं. ट्रेन की सीट पर भी बैठकर गाय को लेकर भावुक हुआ जा सकता है. गाय को पालने और बचाने की बात वहीं पर ठहरी हुई है और हररोज ट्रेन हमे शहर की तरफ लिए जा रही है. शहर की भीड़ हररोज और बढ़ रही है. आसपास के गांव को अपने भीतर कर रही है. इंसान का ही रहना यहां मुहाल है. यह तो गाय को बचाने और बसाने का सवाल है.

सारे रोजगार, सारे संस्थान शहर में हैं. सारी मुफलिसी, सारी तंगी घर में है. एक को तो छोड़ देना पड़ेगा. या इस विकास के रास्ते को ही मोड़ देना पड़ेगा. शहर टूटेंगे गांव तभी बस पाएगा. गाय तभी बस पाएगी. जब गाय सिर्फ धरम के लिए नहीं होगी. जब गोमूत्र सिर्फ पीने के लिए नहीं होगा. जब गोबर सिर्फ हवन के लिए नहीं होगा. वह खेतों में खाद के लिए होगा, उपजाऊं अनाज के लिए होगा. हमारे जीवन की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा होगा. होंगे सारे जानवर. गाय जैसा होगा उनका भी होना.

पर ऐसा नहीं होगा इस सरकार से. इससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा और उससे पहले की भी सरकार से नहीं होगा. क्योंकि इस मुल्क के विकास के लिए उनके पास वही खाका है. जिससे बना न्यूयार्क है, जिससे बना ढाका है. मुल्क हमारे अलग हैं पर उनका विकास, हमारा विकास एक है. गाय के मामले में वे हमसे ज्यादा नेक हैं. हम बड़ी आबादी वाले देश को बगैर गांव के नहीं जीना था. हमारे कपड़े अलग थे हमे अपने तरीके से सीना था. हम न्यूयार्क नहीं हो सकते, हम जापान नहीं हो सकते. कई मुल्कों की लाशों पर चमकता हुआ शहर दुनिया में बहुत कम बन सकता है. अमेरिका बनना कई मुल्कों के इतिहास, भूगोल को निगल जाना है. अमरीका बनना कई मुल्कों का पड़ोसी मुल्कों से युद्ध कराते रहना है. अमेरिका होना दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार तैयार करना है. हथियार तैयार करना भविष्य में तबाही और भय की उम्मीद को ज़िंदा रखना है. दुनिया में हम सबको असुरक्षित रखने का ही नाम है सबसे विकसित देश का नाम. हम उसी का पीछा करते हुए कुछ दशक पीछे हैं. शायद हम हमेशा पीछा करने वाले देश ही रहेंगे. हम आगे तभी जा सकते हैं जब वह पीछे जाए. इस एक लाइन वाली दुनिया की व्यवस्था में ऐसे ही सबको खड़े होना है. आगे जाने के लिए कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि अपने से आगे वाले को पीछे छोड़ा जाए, इसके लिए उसकी बांह मरोड़ा जाए.

हमे भारत बनाना था. जहां सबको बसना था. जहां इतिहास में सबके हिस्से थे. जहां जातीयों के जुल्म के भी किस्से थे. हमे उसे खतम करना था. हमने वह नहीं किया. हमने वह नहीं सोचा. दुनिया के उन मुल्कों के उधारी विकास को हमने अपनी मिल्कियत बना ली. अब जो है वह भयावह है. उनके विकास का ही मॉडल शहर है कि हमे भी उसे ज़हर की तरह पीना पड़ रहा है. मौत के पहले हर रोज की मौत को जीना पड़ रहा है. युवा उम्र के लोग अफवाह की तरह फैल गए हैं, इन शहरों में. निराधार, हर रोज बदल दिए जाने वाली ख़बर की तरह. पहले उन्हें नौकरी न पाने के ख़तरे हैं, नौकरी पाने के बाद इसके छिन जाने के ख़तरे हैं. इन खतरों से जो बचा हुआ मोहलत का वक्त होता है उसमे वे खुद भी खतरनाक हो जाते हैं. कहीं उन पर ख़तरा है तो कहीं वे उससे उबरने के लिए खुद खतरा बन रहे हैं. उन्माद यहीं से पैदा होता है. व्यवस्था उन्हें खतरे में डालती है और उससे उबरने के लिए उन्हें खतरनाक बनाती है. तब गाय ही सबसे बड़ा सवाल बना दिया जाता है. गांव वहां से फिर भी हट जाता है.

जिन्हें इतनी असुरक्षाओं के बीच ज़िंदा रहना और बचे रहना है उन्हें नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती. नैतिकता उस ढांचे से पनपती है जहां आप जीवन जी रहे होते हैं. अर्थतंत्र पर टिकी इस दुनिया में आर्थिक तंगी के बीच आप किसी को ईमानदार नहीं बना सकते. ईमानदार बनाने की धारणा बना सकते हैं. इस आधार पर एक राजनैतिक पार्टी बना सकते हैं. सदी के सबसे बड़े झूठ को सच बना सकते हैं. और भी बहुत कुछ बना सकते हैं पर ईमानदार इंसान नहीं बना सकते. क्योंकि इंसान अपने समाज की जरूरतों और ढांचों से अपने मूल्य बनाता है. न कि उसके मूल्य के आधार पर ढांचा बन पाता है. बहते हुए नाले का पानी अगर साफ हो तो सारी चीजें अपने मूल रंग में दिख सकती हैं. एक-एक चीज को निकालकर उसे धुलकर उसका रंग दिखाना सिर्फ बहकावा है. ऐसे बहकावे में ही उन्माद भी है, हिंसा भी है और वह सबकुछ है जो पूर्णता में किसी चीज को देखने से रोक देगा. गाय दिखेगी, गांव नहीं दिखेगा. विकास सुनाई पड़ेगा और हर कोई परेशान रहेगा.       

10 अक्टूबर 2015

अफ़वाहों से बचिए और अपना पक्ष तय कीजिए

-दिलीप ख़ान
पहले बिसाड़ा में मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या हुई, उसके बाद बिहार चुनाव में ये चुनावी मुद्दा बना। अब धीरे-धीरे मसला जब पेंदी में बैठने लगा था तो एक बार फिर मैनपुरी में चार लोगों को बुरी तरह पीटा गया। इस बार जान नहीं गई, लेकिन सिर्फ जान ही बची। दर्जन भर से ज़्यादा उन दुक़ानों को ख़ाक कर दिया गया, जिनके मालिक मुस्लिम थे। आरोप वही। एक ख़ास तरह की भीड़ ने उन चारों पर ये आरोप लगाया कि वो गोहत्या करने के बाद गाय की खाल उतार रहे थे!  

आज-कल जो माहौल बना है, वहां ठहरकर सोचने का स्पेस ख़त्म होता जा रहा है। अफ़वाह फैली और जान लेने की कोशिश शुरू हो गई। पुलिस इस बार जैसे-तैसे जान बचाने में क़ामयाब रही। फिर हुआ क्या? कुछ गाड़ियां जलीं और कुछ दुकानें, कुछ लोग बुरी तरह पीटे गए। लेकिन 'भीड़' शांत नहीं है। वो कहीं और इसी मुद्दे पर फिर जमा होगी। मोबाइल भीड़ जहां-तहां एक ही मुद्दे पर एक ही तरह की हरकत कर रही है। बिना प्रमाण के, बिना किसी ठोस वजह के।

अख़लाक़ के घर में तो अब साबित हो चुका है कि गोमांस नहीं था। गोहत्या का भी कोई मामला नहीं था। फ्रिज़ में जो था उसके लिए कभी दंगे की नौबत देश में नहीं आई। अख़लाक़ के घर में मटन था, बीफ़ नहीं। पुलिस की रिपोर्ट ये बता रही है। मैनपुरी में जो घटा, वो भी लगभग अख़लाक़ की कहानी का दोहराव है। पुलिस बता रही है कि मरी हुई गाय को कुछ हिंदुओं ने कुछ मुसलमानों को बेच दिया और वे उसकी खाल उतार रहे थे। बस्स, खाल उतारने की दिमाग़ में कौंधी तस्वीर धीरे-धीरे गोहत्या के अफ़वाह में तब्दील हो गई और उस 'भीड़' को फिर से मौक़ा मिला कथित धर्मरक्षा के नाम पर चार लोगों को मौत के घाट उतारने की हर मुमकिन कोशिश करने का।

अफ़वाहों के दौर में भीड़ की बौद्धिकता लगातार कम होती जाती है। जब भी अफ़वाहों के आधार पर कोई समूह रिएक्ट करता है तो वो तार्किक तरीके से सोचने की अपनी सारी शक्ति ख़ुद से बाहर छोड़ आता है। लोग मौक़े के मुताबिक़ रिएक्ट करते हैं। आम तौर पर उनके दिमाग़ में एक तस्वीर बनती है और वो तस्वीर अचानक कई तस्वीरों को जन्म देती हैं, जिनमें आख़िरी तस्वीर का पहले के साथ कोई रिश्ता हो, ये ज़रूरी नहीं।
बूचड़खाना खोलने के लिए संगीत सोम की दरख़्वास्त

दादरी और मैनपुरी में जो कुछ हुआ या आगे कहीं और होने वाला है, वो हमारे सामने क्या चुनौती पेश कर रहा है? क्या इन तमाम लोगों का उसका कोई ठोस राजनीतिक रुझान नहीं है? क्या ये महज अफ़वाहों के शिकार लोग हैं और ये अप्रत्याशित तौर पर धर्म रक्षा के जज़्बे से इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं? अगर हां, तो फिर इन्हें ठहरकर दो मिनट सोचना चाहिए कि फिर वे कौन लोग हैं जो इनको ऐसी करतूत के लिए उकसाते हैं? दो मिनट के लिए भूल जाइए कि सारे के सारे एक ख़ास राजनीतिक समूह से सीधे तौर पर जुड़े लोग ही हैं। हो सकता है आप योजनाकारों में शामिल ना हों, हो सकता है कि आप हमलावर भी ना हों, लेकिन अगर आप इन हमलों को वैध क़रार देते हैं तो उनसे अलग भी नहीं है।

सवाल ये है कि गोमांस और गोहत्या को किस तरह देखा जाए? ठीक है कि ये किसी एक धर्म के लोगों के लिए आस्था का मसला है, लेकिन क्या अपने धर्म के मुताबिक़ दूसरों को भी ज़बर्दस्ती जीने लायक बनाकर छोड़ेंगे आप? दादरी में अगर अख़लाक़ के घर में मटन की जगह बीफ़ होता तो क्या होता? क्या फिर वो हत्या वैध हो जाती? बीफ़ रखना या खाना उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित नहीं है, गोहत्या ज़रूर प्रतिबंधित हैं। इस तरह अगर किसी के प्लेट में बीफ़ है तो वो किसी भी तरह क़ानून का भी उल्लंघन नहीं कर रहा। दूसरी बात, अगर उल्लंघन कर भी रहा है तो आपको कोई हक़ नहीं है कि किसी की जान ले लें।

जिस पार्टी के लोग अख़लाक़ की हत्या में आरोपित हैं और जिस पार्टी का एक नेता मुज़फ़्फ़रनगर दंगे का आरोपी है, उनकी निजी ज़िंदगी कैसी है? संगीत सोम का एक हलफ़नामा अब मीडिया में तैर रहा है जिसमें वो बूचड़खाना खोलने के लिए सरकार से लाइसेंस की मांग की थी। तो आर्थिक फ़ायदे के लिए संगीत सोम को बूचड़खाना खोलने से कोई परहेज नही है, लेकिन राजनीतिक फ़ायदे के लिए अख़लाक़ पर गोहत्या का आरोप लगाकर उसकी हत्या को वैधता देने में हैं। राजनीतिक फ़ायदा इसमें है कि वो सभी आरोपितों के पक्ष में बयान दें। जो बीजेपी देश भर में घूम-घूम कर बीफ़-बीफ़ चिल्ला रही है उसी बीजेपी की गोवा सरकार ने मार्च महीने में बीफ़ की क़िल्लत देखते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक से बीफ़ आयात करने का फ़ैसला किया। गोवा में रोज़ाना 30 से 50 हज़ार किलोग्राम बीफ़ की खपत होती है। जो नरेन्द्र मोदी लोक सभा चुनाव में पिंक रिवोल्यूशन का नारा देते फिर रहे थे, उसी नरेन्द्र मोदी के शासन में भारत दुनिया में बीफ़ का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया।

उनको अफ़वाहों से फ़ायदा है, उनको इस बात से फ़ायदा है कि धार्मिक तौर पर लोग गोलबंद हो जाए। हम-आप जो 60-70 साल से किसी इलाक़े में बिना दंगा-फ़साद के साथ रह रहे हैं, उसके लिए क्या फ़ायदा? एक दिन की घटना के बाद गहराए जख़्म को भरने में दशकों लग जाएंगे। मुज़फ़्फ़रनगर पहले ऐसा कहां था? फ़रीदाबाद की घटना याद कीजिए। वहां भी गांव छोड़कर जाना पड़ा था। दादरी के बिसाड़ा गांव में जब मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या हुई तो उसके बाद भी पड़ोसी गांव में मांस का टुकड़ा पुलिस ने बरामद किया। यानी पूरे इलाक़े में नियोजित तरीके से मांस के नाम पर दंगा भड़काने की कोशिश जारी है। ऐसे में हमें-आपको तय करना है कि किस तरफ़ रहेंगे? वो तो मोहम्मद अख़लाक़ का एक बेटा एयरफोर्स में हैं, इसलिए देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं मांगा जा रहा, नहीं तो जो माहौल है, वैसे में किसी भी मुस्लिम पर कोई भी आरोप लगा दें, सफ़ाई आरोप लगाने वालों को नहीं उस व्यक्ति को देनी होती है जिस पर आरोप लगा है। बाद में आरोप ग़लत साबित हो जाए तो भी आरोप दाग़ने वालों की कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं होती।


संगीत सोम और संजीव बालियान जैसे नेता देशभक्त हैं। गिरिराज सिंह बीफ़ और मटन की तुलना बहन और पत्नी से कर रहे हैं। यानी स्त्री को मांस के बराबर तौल रहे हैं। ये क्या स्लिप ऑफ टंग है या राजनीतिक परवरिश? ये लोग लगातार देशभक्त बने रहेंगे। देशभक्ति के ऐसे माहौल में देशभक्तों की पहचान बहुत ज़रूरी हो गई है। 

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20 जून 2012

शौकत पर लश्कर का ठप्पा लगाने की फिराक में यूपी एटीएस


 -राजीव यादव
 आने वाले दिनों की खतरनाक आहटजेल की काल कोठरी या पुलिस प्रताड़ना से उसे डर नहीं लगता। उसे फिक्र हैं अपनी ग्यारह साल की बच्ची हाजरा का, जो सेरिब्रल पैरालिसिस से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और फिक्र है अपने उस भाई वाहिद अली (25 वर्ष) का जो हर अनजान व्यक्ति की आहट सुनके डर जाता है। और उसकी इस हालत का जिम्मेवार वो अपनी खामोशी को मानता है। पर अब उसने अपनी खामोशी तोड़ने का फैसला किया है। इस पूरी दास्तान से यह बात हमारे सामने आएगी कि कैसे लश्कर-ए-तैयबा,  इंडियन मुजाहिदीन,  हूजी और न जाने किन-किन संगठनों के नाम पर बेगुनाह मुसलमानों को कभी एरिया कमाण्डर तो कभी मास्टर माइण्ड कहा जाता है, पर असल के मास्टर माइण्ड कौन हैं, ये अबूझा रह जाता है।
इस शख्स का नाम है- शौकत अली। उम्र- 45 वर्ष। पुत्र साबित अली।  गांव- श्रीनाथपुर, थाना कन्धई, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश। मैं जब इस शख्स से मिला तो मेरे दिमाग में एक खाका बनने लगा कि अगर इस शख्स ने अपनी खामोशी उन तमाम लोगों की तरह नहीं तोड़ी होती तो इसके बारे में हमें जो जानकारी मिलती या इसकी जो हालत होती वो बड़ी भयावह होती। शौकत पर यूपी एटीएस द्वारा आतंकवाद का ठप्पा लगाने से पहले ही उसकी जुबानी उसकी दास्तान को सुनने की कोशिश करते हैं।
शौकत उस दिन काफी परेशान हो गया। जब उसके भाई नासिर अली (40 वर्ष) को 11 जून 2012 को साढ़े दस बजे के तकरीबन जिला अस्पताल प्रतापगढ़ पहुंचने पर कुछ अनजान व्यक्तियों ने उससे पूछताछ की। नासिर जान गए कि वे एटीएस के लोग हैं। उन लागों ने इधर-उधर की बात करते हुए नासिर की पर्ची को जांचा। फिर उनका एक सहयोगी जो फोन पर था उसने पूछा कि इसे उठाना है,  तो पर्ची जांच चुके व्यक्ति ने कहा- अभी नहीं। नाशिर खुदा का शुक्र  कहते हुए कहते हैं कि उस दिन हमने लू के मारे अपने मुंह पर गमछा बांधा था, वे लोग पहचान नहीं पाए पर जब पर्ची देखा तो वे सन्तुष्ट हो गए, पर जब तक मैं अस्पताल में था वे वहीं रहे। जब मैं साइकिल से वहां से निकला तो वे पांचों अपने दो पहिया से वहां से निकल चले।
इसके पीछे की कहानी शौकत बताते हैं कि मैंने अपने मोबाइल नम्बर 08726692670 से 10 जून 2012 को दिन में 9 बजे के तकरीबन अपने मित्र मास्टर शमीम को फोन किया कि मैं कल 11 जून 2012 को अपने बेटे अब्दुल्ला अज्जाम को दिखाने के लिए जिला अस्पताल प्रतापगढ़ आउंगा। पर मैं कुछ व्यक्तिगत कारणों से नहीं जा सका। पर मेरे भाई अपने को दिखाने 11 जून 2012 को जब जिला अस्पताल गए तो उनसे हुई पूछताछ से यह बात स्पष्ट होती है कि मेरे मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया गया है। ऐसे में जिस तरीके से उन लोगों ने भाई नासिर से कहा कि इसे नहीं उठाना है उससे यह भी स्पष्ट होता है कि वे मुझे उठाने की फिराक में थे। दरअसल मेरे भाई और मेरी शक्ल काफी मिलती जुलती है।
शौकत अली
 शौकत जब अपनी कहानी फ्लैश बैक से शुरु करते हैं तो उसमें कहीं ठहराव नहीं होता। ठहरती है तो बस उनकी जिन्दगी और एक संगठन जिसके इर्द-गिर्द उनके खिलाफ साजिशों दौर शुरु होता है। शौकत बीएससी करने के बाद एसआईएम जिसे अब सिमी कहा जाता है से जुड़े और फिर 1992 में बीएड करने के बाद 1995 से प्राइमरी अध्यापक के रुप में कार्य करने लगे।
2001 में एसआईएम के प्रतिबंधित होने के बाद देश के तमाम मुस्लिम नौजवानों की तरह शौकत भी खुफिया और बेनामी सादी वर्दियों के पूछताछ के आदी हो गए। और उन्हें लगने लगा कि जैसे वो उनके जीवन का हिस्सा हो गए हों। पर 2008 का दौर वे कभी नहीं भूलेंगे क्योंकि यह वह दौर था जब यूपी एटीएस की सादी वर्दियों के बूटों की आवाजें उनके दरवाजे गाहे-बगाहे कभी भी दस्तखत दे देती।
दरअसल,  2008 में शौकत के घर यूपी एटीएस की यह दस्तक इलाहाबाद के चक हिदायत उल्ला से आमिर महफूज की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुई। 15 अगस्त 2008 के अमर उजाला प्रतापगढ़ के संस्करण में एक खबर छपी की इलाहाबाद से गिरफ्तार हुए आमिर महफूज को शौकत जाली नोट सप्लाई करता था। दरअसल इसके पीछे की कहानी कुछ और ही थी। 10-11 अगस्त 2008 में आमिर महफूज को घूरपुर (इलाहाबाद) के थाने वालों ने बुलाया कि तुम अपने बहनोई मौलाना अशफाक को बुलाओ तब तुम्हें छोड़ेगे। पुलिस वालों की अनुसार मौलाना अशफाक को लंबे समय से पुलिस खोज रही थी। इस बीच आमिर महफूज के घर वालों ने 12-13 अगस्त में डीएम-एसपी वगैरह को फैक्स कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने कहानी बनाने के लिए 14 को उसे जाली नोटों के साथ गिरफ्तार करने का दावा किया।
शौकत को इस कहानी में लाने की वजह यह थी की मौलाना अशफाक जो मालेगांव के थे उससे शौकत के जरिए ही आमिर महफूज की बहन की शादी हुई थी। बहरहाल, खबर यह भी है कि आमिर महफूज पिछले दिनों छूट गया है और उसके जिस बहनोई को पुलिस बहुत खोजने का दावा कर रही थी लोग बताते हैं कि वो आज भी वहीं रहते हैं।
बहरहाल, यह कहानी शौकत की है। 2008 के स्वतंत्रता दिवस के दिन छपी इस खबर से ही शौकत को गुलामी की बेडि़या जकड़ने लगती हैं। इस बारे में शौकत से कोई सीधी पूछताछ नहीं की गई। बल्कि विकास क्षेत्र बेलखरनाथ धाम के जिस प्राथमिक विद्यालय नौहर हुसैनपुर में शौकत पढ़ाते थे के प्रधानाध्यापक राम प्रताप पटेल से एलआईयू के इस्पेक्टर ओपी पाण्डेय ने पूछतछ की। प्रधानाध्यापक से खास तौर पर आर्थिक स्थित, रहन-सहन, व्यवहार के बारे में पूछा गया। जब प्रधानाध्यापक ने कहा कि वो सामान्य रहन-सहन वाले व्यक्ति हैं और साइकिल से चलते हैं, मामूली मकान में रहते हैं तो एलआईयू इस्पेक्टर ने कहा कि आप सामान्य आदमी बता रहे हैं पर वो तो जाली नोट छापता है।
इन हालात में आस-पास के लोगों और स्कूल में अध्यापकों और छात्रों की निगाहों में शौकत अपने को दोषी मानने लगता है। हर नए चेहरे के सामने वह जवाब देने को तैयार हो उठता है। क्योंकि जब न तब कोई भी दरवाजे की कुंडी खटका देता और देर तक उससे पूछताछ के नाम पर एक लंबी खामोशी के लिए उसे तैयार कर चला जाता। भारतीय नागरिक से ज्यादा भारतीय मुसलमान होने के संकट से जूझ रहा शौकत देश की सुरक्षा के नाम पर जवाब दर जवाब देता रहा। पर उसे संदेह रहता था कि उसके हर जवाब से उसे किसी बड़ी साजिश में फसाने के सबूत गढ़े जा रहे हैं।
शौकत बताते हैं कि सितम्बर-अक्टूबर 2008 के तकरीबन एक दिन यूपीएटीएस के लोग मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे कहा कि प्रतापगढ़ की रानीगंज तहसील में एक आदमी तलहा अब्दाली रहता था। क्या तुम उसे जानते थे? मैंने अपनी जानकारी के अनुसार उन्हें बता दिया कि उससे मेरी मुलाकात को एक अरसा हो गया है। उससे पहली बार मेरी मुलाकात 98-99 के तकरीबन रानीगंज ईद मिलन समारोह में हुई थी। उसके बाद कभी कभार रानीगंज बाजार और प्रतापगढ़ शहर आते जाते उससे कभी-कभार मुलाकात हुई। उसके बाद लंबे समय से मेरी उससे कोई मुलाकात नहीं हुई। इसके बाद यूपीएटीएस के लोगों ने कहा कि हम तलहा को खोज रहे हैं अगर कोई जानकारी मिले तो हमें बताना। उन लोगों ने कहा कि तलहा प्रतापगढ़ के किसी स्कूल में अभी भी पढ़ाता है और साथ ही कहा कि वह तुम्हारे सम्पर्क में है। मैंने उनसे तलहा से किसी भी प्रकार के सम्पर्क और सम्बन्ध से इनकार कर दिया।
तलहा के बारे में पूछताछ का यह सिलसिला कईयों के साथ हुआ और हो भी रहा है। दरअसल, तलहा हो या फिर पिछले दिनों चर्चा में रहे यासीन भटकल उर्फ इमरान उर्फ शाहरुख और न जाने कौन-कौन ये सब खूफिया थ्योरी के क्रिएशन हैं। जिनको खूफिया खुद प्लांट करती है और उसके बाद उनके पीछे-पीछे अपनी जांच की फर्जी पटकथा रचती है। शौकत को फांसने की पटकथा भी इसी से मिलती-जुलती है।
प्रतापगढ़ की एसओजी में रहे हेमंत भूषण जब एटीएस में गए तो फरवरी-मार्च 2009 में फिर से वे तलहा की तफ्तीश में शौकत से मिले। शौकत बताते हैं कि वो कहते थे कि वे पूर्वांचल के एटीएस इन्चार्ज हो गए हैं। हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि हमें लंबे समय से तलहा अब्दाली की तलाश है। क्या तुम्हारे पास उसका कोई फोटो है? मेरे मना करने के बाद कि मेरे पास उसका कोई फोटो नहीं है उन्होंने कहा कि वह देश की सुरक्षा के लिए एक खतरनाक व्यक्ति है। मुझसे उन्होंने पूछा कि कहां का रहने वाला था, तलहा अब्दाली? तो मैंने कहा कि उसने अपने बारे में बताया था कि वो बाराबंकी का रहने वाला है। इस बात पर हेमंत ने कहा कि नहीं वो सीतापुर का रहने वाला है। मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम। हेमन्त ने कहा कि आप को हमारा सहयोग करना चाहिए और कहीं से उसकी फोटो और जो भी जानकारी उपलब्ध हो सके उसे हमें बताएं। इसके बाद उनके साथ आए एक सिपाही से हेमन्त भूषण के सामने ही तय हुआ कि मैं अगले दिन रानीगंज क्षेत्र जाकर जिन लोगों से भी जानकारी प्राप्त हो सकती है, उन्हें प्राप्त कराऊं। उस दरम्यान 2009 लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा था। मैंने रानीगंज पहुंचकर हेमन्त भूषण के सहयोगी एटीएस के सिपाही को फोन किया कि मैं रानीगंज आ गया हूं, आप आ जाइए। इस पर एटीएस के सिपाही ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आप अकेले क्यों चले गए? साथ चलने की बात हुई थी जब। तो मैंने कहा कि यहां आकर जानकारी ही आपको इक्ट्ठा करनी थी तो मैंने सोचा कि मैं जब यहां आया हूं तो आपका भी यह काम कर दूं। इस पर उसने जानकारियों में कोई दिलचस्पी न दिखाते हुए कहा कि आप ही इक्ट्ठा कर लो। और आगे से साथ चलने को कहा जाय तो साथ ही चला करो।
दरअसल, यहां जानकारियां इकट्ठा करने की फिराक में एटीएस नहीं थी वो शौकत को कर्ही अनजान जगह से उठाने की फिराक में थी। क्योंकि जिस दिन शौकत को एटीएस अकेले बुलाने का यह प्रपंच कर रही थी, उसी दिन इलाहबाद के आमिर महफूज के भाई आरिफ महफूज को भी इलाहाबाद में उठाया था। पर पूर्व निर्धारित पटकथा में शौकत के अकेले जाने की हरकत ने पुलिस को एक कदम पीछे हटने को मजबूर किया और उसने आरिफ महफूज को भी छोड़ दिया।
शौकत बताते हैं कि बाद में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण का फोन आया कि मैं उनसे इलाहाबाद या लखनऊ आकर मिलू। पर मैंने मना कर दिया कि जब मैं आपसे बात कर लेता हूं और जिस वक्त भी आप कहते हैं तो ऐसे में मेरा कहीं दूसरी जगह आने का क्या मतलब है। हेमंत बार-बार मुझे घर से कहीं दूर बुलाने की कोशिश करता। पर मैंने एटीएस के बारे में जिस तरह सुन रखा था, वैसे में मैं कहीं दूसरी जगह अकेले में एटीएस वालों से मिलना मुनासिब नहीं समझता था।
एटीएस के हेमन्त भूषण से इस मुलाकात के दस-पन्द्रह दिन बाद ही शौकत की पत्नी फरीदा महजबीन द्वारा संचालित स्कूल शहपर पब्लिक स्कूल, आजादनगर प्रतापगढ़ में शौकत के नाम से एक कोरियर आया। इस कोरियर को भेजने वाले का नाम तलहा अब्दाली था और यह कोरियर इलाहाबाद से भेजा गया था। जिस पर बाराबंकी का पता लिखा था। शौकत बताते हैं कि इस कोरियर में एक उर्दू भाषा में लिखा पत्र था जो मेरे नाम से संबोधित था। जिसमें लिखा था कि मुझे लश्कर-ए-तैयबा का एरिया कमाण्डर बना दिया गया है, आपके स्कूल में असलहे छिपा दिए गए हैं। इस पत्र में एक महत्वपूर्ण बात के रुप में यह लिखा था कि खवातीन (महिला) की विंग भी कायम हो चुकी है। यह पत्र मिलने के साथ ही आप अपना काम शुरु कर दीजिए।
इस पत्र के मिलने के बाद शौकत और उसका पूरा परिवार डर व दहशत में आ गया। दूसरे ही दिन शौकत ने जिलाधिकारी और एसपी को एक पत्र के माध्यम से इस पत्र के बारे में सूचित करते हुए इस पत्र की फोटो कापी नत्थी कर उन्हें प्रेषित कर दिया। इसके बाद शौकत को लगा कि एटीएस भी तलहा के बारे में पूछताछ कर रही है और उसके नाम से ही पत्र आया है तो ऐसे में एटीएस को सूचित कर देना चाहिए। शौकत ने एटीएस अधिकारी हेमंत भूषण को फोन किया और कोरियर आए पत्र का पूरा ब्योरा दिया। हेमन्त ने आकर शौकत से उस खत की मूल प्रति ले ली और कहा कि क्या जरुरत थी एसपी-डीएम को बताने की, मुझसे पहले बताया होता। चलो अब तो बता ही दिया, लेकिन अब जो भी हो पहले मुझे बताना। शौकत ने इसके बारे में एलआईयू को भी सूचित कर दिया था।
शौकत से इस पत्र के बारे में आईबी ने भी पूछताछ की। पर लंबे समय तक जब प्रशासनिक हल्के से को कोई जानकारी नहीं मिली तो उसने सूचना अधिकार के तहत एसपी कार्यालय से जानकारी मांगी। इतने गंभीर सवाल पर प्रतापगढ़ का एसपी कार्यालय शौकत को सूचना से वंचित रखा।
शौकत बताते हैं कि हेमन्त का मुझे लगातार फोन आता कि मुझसे डीआईजी साहब बात करना चाहते हैं, मैं आकर उनसे मिल लूं। मैंने हेमन्त से कहा कि आप तो जानते ही हैं कि मेरी आठ साल की बच्ची हाजरा जो सेरिब्रल पालिसी से पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक रुप से विकलांग है और उसकी देख-रेख के चलते मैं कहीं जा नहीं पाता हूं। ऐसे में जो भी बात करनी है आप मुझसे फोन पर बात कर लें। मैं कहीं नहीं आ पाउंगा। हेमन्त का बार-बार जोर रहता कि मैं घर से दूर कहीं उससे मुलाकात करुं।
यूपी एटीएस की इस आपराधिक पूछताछ में शौकत ने भाई वाहिद अली (25 वर्ष) को एक खतरनाक बीमारी की चपेट में जाते देखा। वो घर आने-जाने वाले व्यक्ति और अनजान व्यक्ति से डरने लगा। वो इस डर में कपड़े निकाल कर फेकना और इस तरह की तमाम पागलपन की हरकतें करने लगा है। जिसका इलाज उसने नूर मंजिल लाल बाग, लखनऊ में साइक्रेटिक के डाक्टर एस नायडू से करवाया। आज वो फिर से हो रही इस पूछताछ से परेशान हो रहा है। इस पूरी पूछताछ ने शौकत के पूरे पारिवारिक जीवन को तहस-नहस कर दिया है।
पर एटीएस कहां रुकने वाली थी। अक्टूबर 2009 में एटीएस अधिकारी हेमन्त भूषण 26/11 की बाम्बे की घटना का टेलीफोनिक टेप लेकर शौकत के विद्यालय नवहर हुसैनपुर आए। शौकत को टेप सुनाकर हेमंत ने पूछा कि क्या यह आवाज तलहा अब्दाली की है। तो शौकत ने कहा कि मेरी याददाश्त की हद तक तलहा अब्दाली की आवाज नहीं लगती। इस पर हेमन्त भूषण ने मुझसे कहा कि आजकल वो इंडिया से बाहर है, हो सकता है उसकी आवाज बदल गई हो। तो मैंने उनसे साफ कहा कि मैं आवाज पहचानने में असमर्थ हूं।
28 फरवरी 2012 को कुछ लोग आजमगढ़ एटीएस कहकर शौकत से मिले। शौकत बताते हैं कि वो लोग बीआरसी शीतलागंज जहां पर मेरा विभागीय प्रशिक्षण चल रहा था वहां आए पहले आकर उन्होंने मुझसे सिमी के बारे में और उनके लोगों के बारे में पूछताछ की। उसके बाद उन लोगों ने तलहा के बारे में पूछताछ की कि वह प्रतापगढ़ कब आया कब तक रहा। वहां पर किन-किन लोगों से उसके सम्बन्ध और रहे। रानीगंज के अब्दुल कादिर अंसारी के बारे में तफसील से पूछताछ की और उसके घर के लोकेशन के बारे में पूछा। जो व्यक्ति मुझसे प्रमुख रुप से बात कर रहा था उस व्यक्ति का नाम अश्वनी था, जो घंटो की बातचीत में कुछ बात करने के बाद फोन पर दूर हट कर बात करने लगता। उनका प्रयास था कि मैं उनके साथ चलूं। लेकिन मैंने उनके साथ चलने के उनके प्रस्ताव को टाल दिया।
शौकत बताते हैं कि 12 मई 2012 को लखनऊ एटीएस के नाम पर कुछ लोग फिर उसके घर आए। उन्होंने बताया कि वे रानीगंज से होकर आए हैं। जहां तलहा अब्दाली रहता था। उन्होंने बहुत सारे नाम पूछ-पूछकर मुझसे उनके बारे में जानना चाहा। जो नाम मुझे याद है वो कुछ इस तरह के थे- शाहबाज (भदोही), अब्दुल कयूम (लखीमपुर खीरी), खालिद (आजमगढ़), इस्माल, रियाज भटकल आदि। इन बातों में एक खास बात यह रही की उन्होंने शहबाज के बारे में पूछते हुए कहा कि शहबाज लश्कर वाला और फिर उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा कि आप भी तो लश्कर के ही हैं न? उन्होंने मुझसे पूछा कि आप को मालूम है, तलहा पकड़ा गया? जब मैंने कहा कि नहीं तो उन लोगों ने कहा हम ही ने पकड़ा है, कोई बच नहीं पाएगा। मुझसे मेरी फोटो मांगी जब मैंने कहा कि नहीं है तो उन लोगों ने मोबाइल से मेरी फोटो खींची। उन लोगों ने मेरे पूरे परिवार की डिटेल ली। जाते-जाते कहा कि जरुरत पड़ी तो आपको लखनऊ एटीएस आॅफिस बुलाया जाएगा।
अब शतरंज की इस आतंकी बिसात पर शौकत एटीएस का एक मोहरा है, जिसे वो कभी भी चल देना चाहती है। इसी तरह सीतापुर के रहने वाले शकील से भी लंबे समय तक पूछताछ कर उस पर आतंकवाद का आरोप लगा दिया। यहां गौर करने की बात है कि शकील को फरवरी में गिरफ्तार किया और उसी दरम्यान शौकत पर भी एटीएस का शिकंजा फिर से मजबूत हुआ। दूसरे कि शकील को 12 मई 2012 को दिल्ली एटीएस ने दुबग्गा लखनऊ से उठाया और उसी दिन यूपी एटीएस जो शकील की गिरफ्तारी से पल्ला झाड़ रही है वो शौकत के घर गई। अब सवाल तलहा अब्दाली का है कि आखिर वो कौन है तो इसका जवाब भी एटीएस के हेमंत ने शौकत को फरवरी-मार्च 2009 के तकरीबन ही दे दिया था। जब हेमंत ने शौकत से पूछा कि तलहा कहां का है तो उसने बताया कि बाराबंकी का तो हेमंत ने कहा कि नहीं सीतापुर। अब हो न हो यह पूरी खूफिया थ्योरी बशीर पर आकर टिकती है। बशीर, शकील का बहनोई है और उसे 5 फरवरी 2012 को उन्नाव से उठाया गया था, जो बाराबंकी का रहने वाला है और सीतापुर में लंबे समय तक रहा है।
यहां अहम सवाल यह है कि अगर तलहा अब्दाली हो या फिर कोई और जब वह गिरफ्तार कर लिया गया तो शौकत से किस तरह की पूछताछ? शौकत कहते हैं कि मैं चाहता हूं की सरकार सालों-साल से चल रही मेरी इस पूछताछ की जांच करवाए। इसने मेरे पूरे परिवार को तबाह कर दिया। मैंने देश की सुरक्षा के सवाल पर उनकी हर स्तर पर मदद की। पर आज मैं जब स्कूल में अपने बच्चों के सामने खड़ा होता हूं तो नजर नहीं मिला पाता हूं। क्योंकि जब न तब एटीएस के लोग मेरे स्कूल में आ धमकते हैं। मैंने इस चुप्पी में अपने भाई के पागलपन को देखा है कि किस तरह वो हर नई आहट से डर जाता है।
शौकत की इस दास्तान को सुनते-सुनते रात के दस बज गए। हमने उनसे कहा कि इतनी रात कहां जाएंगे। तो शौकत का जवाब था, बेटी परेशान होगी, मेरी पत्नी को भी पैरों से दिक्कत है?

09 फ़रवरी 2011

सुनो मायावती ,ये तुम्हारा यूपी हैं.

आवेश तिवारी
सुनो मायावती ,ये तुम्हारा यूपी हैं जहाँ औरत रोती है या मरती है
सरोज की माँ मेरे पैरों को जकड कर पूछती है कि "का गलती रहल हमरे बिटिया क "?उसका पति उसे पीछे खींच लेता है हटो ये पुलिस वाले नहीं हैं ,और अगले ही पल वो गिर कर बेहोश हो जाती है हाँ मै उत्तर प्रदेश की दलित मुख्यमंत्री मायावती की चाकरी करने वाला पुलिस वाला भी नहीं हूँ ,एक अखबार वाला हूँ जिसके पास न तो कोई नंबर वन कहे जाने वाला अखबार है न ही सबसे तेज चलने वाला कोई चैनल सरोज की अस्मत न लुट पाए तो उसका गला घोंट कर मार डाला ,वो अपने स्कूल में माँ सरस्वती को सजाने के लिए फूल माला लेने गयी थी .जहाँ उसकी लाश पड़ी है वहीँ इर्द गिर्द रंग बिरंगे फूल और चमकीले कपडे पड़े हुए हैं ,अकाल मौत के लिए जाना जाने वाले उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल सोनभद्र जनपद के सिंधिवा डामर गाँव में घटी ये घटना ,प्रदेश की सत्ता के चेहरे पर पुती उस कालिख को और भी सुर्ख करती है जो पिछले एक सप्ताह के दौरान अलग अलग जगहों पर घटी बलात्कार की एक दर्जन लौमहर्षक घटनाओं के बाद नजर आने लगी है शर्मनाक ये कि सोनभद्र में आदिवासी उत्पीडन की वारदात जहाँ लगातार बढती जा रही है ,पुलिस अधीक्षक और जिला अधिकारी सड़कों के साथ साथ अपने उन चेहरों पर रंग रोगन करने में जुटे हैं जो उन्हें कल मुख्यमंत्री के सोनभद्र आगमन के दौरान दिखाना है

सोनभद्र के दुद्धी कोतवाली के ग्राम पंचायत बघाडू के सिंधिया डामर गाँव में मंगलवार को बसंत की धूप पीली न होकर काली थी आदिवासी बालिका विद्यालय में ११ वी की छात्र सरोज (१५) की लाश एक प्राथमिक विद्यालय के पास एक झाडी में मिली ,शव के गले में मृतका के पैजामे का नाडा था ,गाँव वालों ने जब सबेरे १० शव को देखा को तो सबके होंश उड़ गए घर वालों ने बताया कि सरोज अपने दादा के घर रहकर पढाई कर रही थी ,सोमवार को वो हमेशा की तरह स्कूल जाने के लिए निकली ,चूँकि स्कूल में पूजा की सारी तैयारियां उसे ही करनी थी तो वो अपने साथ कुछ कपडे वगैरह भी लेकर गयी थी स्कूल से वो अपनी सहेली कल्पना के साथ पूजा का और समान लेने बस से कुछ ही किलोमाटर दूर दुद्धी के लिए रवाना हो गयी ,दुद्धी पहुँचने पर उसने अपनी सहेली को बाजार में समान लेने को कहा और खुद अपने पिता के घर फूल -माला लेने चली गयी ,मगर न तो वो पिता के घर पहुंची और न ही वापस अपने दादा के घर ,सरोज के पिता ये सोच कर शांत बैठे रहे कि वो दादा के घर है वही दादा ये सोचते रहे कि वो पिता के घर गयी होगी

सरोज की हत्या के बाद पुलिसिया कार्यवाही और भी चौका देने वाली रही पुलिस ने हत्या के आरोप में गाँव के ही पनिका बिरादरी के दो युवकों और सरोज की सहेली कल्पना को गिरफ्तार कर लिया है पुलिस का कहना है कि विश्वनाथ नाम के एक युवक का सरोज के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था सरोज इस युवक से शादी करना चाहती थी वही युवक कल्पना को भी चाहता था जो गाँव के रिश्ते में सरोज की बुआ लगती थी ,उस युवक ने कल्पना से शादी करने के लिए सरोज को रास्ते से हटाने का निर्णय लिया और अपने एक साथी और कल्पना के साथ घटना को अंजाम दे दिया पुलिस इस बात से भी इनकार कर रही थी कि बलात्कार की कोई कोशिश की गयी जबकि सरोज का नग्न शव पूरी घटना की सच्चाई बयां कर रहा था सोनभद्र में आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में शत प्रतिशत न्याय की गुंजाइश नहीं के बराबर होती है