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26 जून 2013

वरवर राव से बातचीत तीसरा भाग.



माओवादियों के वार्ताकार होने के आधार पर आप तब कैसा महसूस करते हैं जब मीडिया माओवाद को ‘आंतरिक आतंकवाद’ और ‘देश के लिए बड़े खतरे’ जैसा कहता है?

मीडिया तो वैसे ही बनाता है। ये नहीं कि मनमोहन सिंह ने कहा है इसीलिए मैं...। रोजाना मीडिया वही प्रचार कर रहा है और उसे मानने के लिए भी मिडिल शासक तैयार हैं। ऐसी स्थिति बनी है, इसीलिए समस्या हो रही है लेकिन अब एक अंतर आ गया है। ग्रास-रूट लेवल पर जो संघर्ष कर रहे हैं, आदिवासी लोग हैं, दलित लोग हैं, किसान-मजदूर लोग हैं, वे अपने लिए, अपने साथ रहकर काम करने वाले माओवादी क्या कर रहे हैं, ये समझ गए हैं। वे मीडिया पर निर्भर नहीं हैं उनके बारे में समझने के लिए। जो टाउन्स में, अर्बन्स में रहने वाले मिडिल-क्लास लोग हैं, उनको तो सही पहचान माओवादियों के बारे में नहीं हो रही है, यह एक बड़ी समस्या है क्योंकि 1857 से लेकर आज तक हम देखते हैं कि संघर्ष करने वाले किसान-मजदूरों को बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा था क्योंकि उसे मालूम होता था कि ग्रास-रूट लेवल पर क्या हो रहा है। आज ऐसा नहीं है। अगर है भी तो दूसरी बात है कि आज बुद्धिजीवियों को खरीद लिया गया है। कॉरपोरेट सेक्टर ने उन्हें खरीद लिया है। पहले गाँव में जब टीचर होते थे, उनका बहुत ही कम वेतन हुआ करता था। वेतन न हो तो गाँव की जनता के ऊपर निर्भर होकर बच्चों को पढ़ाते थे। यानी, वे जनता के साथ रहते थे। आज स्थिति बदल गई है। आज टीचर को, प्रोफेसर को एक लाख रुपए वेतन मिलता है और पढ़ाने की कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। तो क्या अपेक्षा करते हैं? क्योंकि बात यहाँ तक आ गई बुद्धिजीवी के लिए कि अब वे चेतना से जनता के पक्ष को रख सकते हैं, स्थिति से जनता के पक्ष नहीं रख सकते। स्थिति बहुत बदल गई है, हमारी लाइफ़-स्टाइल बहुत बदल गई है। हर तरफ़ से टैक्स मिल रहा है। घर आकर कार देता है, बाद में इंस्टॉलमेंट में कीमत लेता है। टी.वी. देता है। सभी उपकरण जो मनोरंजन के, रहने के हैं, आपके घर में आ जाते हैं, इंस्टॉलमेंट में ले सकते हैं और सरकार भी बहुत बड़े पैमाने पर आपको वेतन देती है। यह सहूलियत सॉफ्टवेयर में है, यूनीवर्सिटीज में है, हर जगह है, आपको जनता से अलग करने के लिए। ऐसी स्थिति में आप जनता का पक्ष लेने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि आपकी वैसी स्थिति नहीं है। भूख को महसूस करने की स्थिति ही नहीं है आपकी। भूखी पीढ़ी का पक्ष कैसे रख सकते हैं? चेतना से रख सकते हैं, कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। अब कितने लोग हो सकते हैं जो अपनी चेतना को...। आज देखिए न, एक विरोधाभास है, आदिवासी लोग जंगल में रहते हैं और हमारी जो ये पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है, ये तो नंबर से बनने वाली है। अब एक नंबर से बनने वाली पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी, जिसे मेजोरिटी डेमोक्रेसी कहते हैं। इस मेजोरिटी डेमोक्रेसी में आठ-दस प्रतिशत रहने वाले आदिवासियों की चेतना डिसाइड नहीं करती तो कौन-सी बात डिसाइड कर सकती है क्योंकि मैंने केरल जाकर देखा था, वहाँ चार प्रतिशत ही आदिवासी लोग हैं। 1970 से लेकर नब्बे के दशक तक जनता के लिए लिखने वाला, एक बड़ा मशहूर लोक-साहित्य का कवि, रामाकृष्णा मिनिस्टर बन गया। बहुत ही अच्छी तरह आदिवासियों के लिए लिखा। मैंने उनसे पूछा, ‘यह नेशनल पार्क क्यों बनवाया? आदिवासी महिला के ऊपर इतना क्यों हमला हो रहा है? यहाँ की जो जाति है, जिसका नाम कुछ है, जो एंटी नेशनल पार्क स्ट्रगल चलाया है।’ कहा, “नहीं-नहीं, जमाना बदल गया है।” “नहीं-नहीं, जमाना नहीं बदला, तुम बदल गये हो।” और एसेम्बली में बैठकर रेजोल्यूशन करते हैं एंटी-आदिवासी क्योंकि पूरे गैर-आदिवासी लोग हैं। वे डिसाइड कर रहे हैं। इसीलिए तो मेरा कहना है कि बात (आदिवासियों के संबंध में) ज्यादा लोग पूछ रहे हैं, ऐसा नहीं होता है। अब सोम पेटा हुआ है। वहाँ समस्या खासकर किसके लिए आ रही है? फिशरमैन (मछुआरों) के लिए आ रही है, किसानों के लिए आ रही है। श्रीकाकुलम जिले की आबादी में वे लोग माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक) ही हो सकते हैं और उनकी जिंदगी खत्म हो रही है। ये संख्या से निश्चय करते हैं या न्याय-अन्याय से डिसाइड करते हैं? महाभारत में जब पांडव जंगल में जा रहे होते हैं तो द्रौपदी उनके साथ जाती है, कुन्ती नहीं जा पाती। तो कुन्ती द्रौपदी से एक बात कहती है – “सुनो! अब तो बारह साल के लिए इन लोगों की तुम्हीं देखभाल कर लेना। ये युधिष्ठिर है, बड़ा है, तुम्हारे मन में भी उसके लिए सम्मान है। पकाने और खिलाने के समय तुम यह बात मन में रखती हो, मुझे बताने की जरूरत नहीं। भीम है, वो तो छीन लेता है, उसके बारे में भी कुछ कहने की जरूरत नहीं। अर्जुन है, उसके लिए तुम्हारे मन में प्रेम है। इन तीनों के बारे में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं पर ये जो नकुल-सहदेव हैं, छोटे बच्चे हैं। ये पूछते नहीं, ये मुँह से कहते नहीं हैं। इनके बारे में सोचो।” यानी oppressed of oppressed के बारे में, जिसे न्याय मिलना है, उसके बारे में सोचो। यानी आज की डेमोक्रेसी की एक परिभाषा यह होनी चाहिए कि एक्सप्रेशन मे कौन-से लोग Oppressed हैं? उनको क्या मिलना चाहिए? आदिवासियों में भी बंजारों को बहुत कुछ मिल रहा है लेकिन कोया, गोंड, इन लोगों को क्या मिल रहा है? दलितों में भी माला (मेहतर) जैसी जाति को मिल रहा है, लेकिन मादिगा (चमार), को क्या मिल रहा है? डक्करी को क्या मिल रहा है? सब-कास्ट को क्या मिल रहा है? यह सोचना ही डेमोक्रेसी होती है, न्याय होता है। ये सब चेतना से डिसाइड कर सकते हैं मगर मेजोरिटी-माइनॉरिटी, ये जो पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की बातें हैं, उससे तो नहीं हो सकता।

माओवाद-नक्सल आन्दोलन और आदिवासी उन्मूलन के सन्दर्भ में क्या भारतीय मीडिया का नजरिया बदलना चाहिए?

बदलना तो चाहिए ही लेकिन भारतीय मीडिया के सेल्फ इंटरेस्ट से तो समस्या आती है। उसका इंटरेस्ट तो है ही मगर उससे ज्यादा क्या चाहेगा? जन-आंदोलन को अपना मीडिया बनाना है, एक वैकल्पिक मीडिया बनाना चाहिए, जनता का मीडिया बनाना चाहिए और वह ग्रास-रूट लेवल से बनती आनी चाहिए क्योंकि समझिए, आपने एक ग्लास हाउस (शीशे का घर) बना लिया है। अब ग्लास हाउस के ऊपर पत्थर डालने वाले लोगों की हिफ़ाजत के लिए ग्लास हाउस में रहने वाले तो काम नहीं करते। तो ग्लास हाउस पर पत्थर डालने वाले लोगों के लिए एक अलग मीडिया बननी है। तो जैसा (सत्यजीत राय की फिल्म) प्रतिद्वंद्वी में एक कैरेक्टर कहता है कि “सिर्फ बम डालना ही नहीं है, अपना बम तुमको ही बनाना है।” तो क्रांति करने वाले जैसे क्रांति के लिए अपने आप शस्त्र बनाते हैं या पुलिस-स्टेशन पर हमला करके छीन लेते हैं, वैसे ही अपना मीडिया भी खुद बना लेना है या जनांदोलन के प्रभाव से मीडिया के ऊपर दबाव लाकर अपनी बातें रखने के लिए उसके ऊपर दबाव डालना है। जब दबाव बनता है, जैसे 2004 में जब दबाव बना तो हमारी ख़बरें दी गईं। जब दबाव नहीं बनता है, तो हमारी ख़बरें नहीं दी जाती हैं। जैसा मार्क्स ने भी कहा है कि केवल जल-जंगल-जमीन की मुक्ति नहीं, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भी मुक्त करना है Judges are to be judged, prosecutors are to be prosecuted. वह होना है। उसके लिए अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को हमें मुक्त करना है। इसे करने के लिए वैकल्पिक मीडिया बनाना है, वैकल्पिक पीपुल्स मीडिया बनाना है, वैकल्पिक भाषा को बनाना है, वैकल्पिक संस्कृति को बनाना है। आज ‘वैकल्पिक’ नहीं हो सकता है, वो ‘पीपुल्स’ (जनता का) ही होना चाहिए। मगर उस पर आक्रमण हो रहा है। उसे इस आक्रमण से मुक्त करके हमें जनता के हित में करना है।

क्या तेलुगु, तमिल, मलयालम, बंगला जैसी भाषाई पत्रकारिता ज्यादा जनपक्षीय भूमिका निभाती है?

क्रांति की स्थिति बहुत आगे रही तो मजबूरन उसका पक्ष लेते हैं, वैसी नहीं रही तो पक्ष नहीं लेते। दूसरी तरफ़ जितनी अंग्रेजी, हिन्दी भाषाओं का निहित स्वार्थ है उतना निहित स्वार्थ नहीं रहे तो थोड़ा बचते हैं। समझिए, दैनिक भास्कर है। दैनिक भास्कर की छत्तीसगढ़ में बहुत सी कोयले की कंपनियाँ हैं तो उसका निहित स्वार्थ ज्यादा होता है। वहीं आंध्र प्रदेश का एक छोटा-मोटा न्यूज पेपर होता है, उतना निहित स्वार्थ नहीं होता है, तो रिपोर्ट नहीं होती है। यहीं आप छत्तीसगढ़ आंदोलन को देखिए। दंडकारण्य आंदोलन के बारे में भोपाल से आने वाले, अलग क्षेत्रों से आने वाले, रायपुर से आने वाले हिंदी पेपर्स में रिपोर्टिंग बहुत रिटॉर्टेड (तोड़ी-मरोड़ी गई) होती है, लेकिन हैदराबाद से आने वाला जब भद्राचलम से रिपोर्टिंग करता है, तो उतना ‘बायस्ड’ (पक्षपातपूर्ण) नहीं होता क्योंकि उसका उतना निहित स्वार्थ नहीं है, तो फ़र्क होता है। तमिल मीडिया वहाँ के ईलम के इश्यू को लेकर क्या रिपोर्टिंग करता है? एल.टी.टी.ई. के बारे में वह क्या रिपोर्टिंग करता है? केरल में यू.ए.पी.ए. लागू किया जा रहा है, वहाँ का मीडिया कोई रिपोर्टिंग नहीं करता है। तो वहाँ भी एक निहित स्वार्थ काम करता है और ज्यादातर पूरे मीडिया को कंट्रोल कर रही हैं मल्टीनेशनल कम्पनियाँ। यहाँ तक कि क्षेत्रीय अख़बार भी मल्टीनेशनल कंपनियों के दलाल बन गए हैं। एक भी अख़बार या चैनल ऐसा नहीं है जिसके ऊपर टाटा या अम्बानी का कंट्रोल न हो। नमस्ते तेलंगाना नाम का एक न्यूज पेपर है। उसका एक चैनल है, टी न्यूज चैनल। ये टी न्यूज चैनल, राज न्यूज से लिंक होता है, जी.टी.वी. से लिंक होता है, क्योंकि अलग से चल नहीं सकता। एक विशिष्टता होती है जो कि मल्टीनेशनल कम्पनी की ही होती है, यही समस्या है।

पोस्को, जैतापुर, कुंडनकुलम, तेलंगाना की ख़बरें इन दिनों राष्ट्रीय मीडिया की बड़ी ख़बर नहीं हैं। ख़बरें कौन रोकते हैं – सरकार या उद्योगपति?

दोनों ही। उद्योगपति के लिए सरकार रोकती है। उद्योगपति भी छोटे-मोटे तो हैं नहीं। उद्योगपति कॉरपोरेट हैं और ख़बरें उनके इंटरेस्ट में सरकार रोकती है। इंटरेस्ट उनका है।

अम्बानी परिवार के ख़िलाफ़ देश के किसी हिस्से में कोई ख़बर लीक नहीं हो सकती। आखिर क्यों?

क्योंकि कल ही अरुंधति रॉय कह रही थीं, “आप क्यों इतनी बहस कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी बनेगा या राहुल बनेगा? यह बहस क्यों? जो भी बने, बनाने वाला अम्बानी है, टाटा है।” सवाल यह है, देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन होते हैं? दिखने वाले कठपुतली हैं ये लोग। इनको चलाने वाले तो अलग हैं – अंबानी है, टाटा है, बात यह है। इसलिए अम्बानी के विरोध में कहीं ख़बर लीक नहीं हो सकती।

आप जनपक्षीय पत्रकारिता की दिशा में प्रेस-काउंसिल और काटजू जी की भूमिका से संतुष्ट हैं?

(हँसते हुए) नहीं हैं, क्योंकि खासकर हमारा अनुभव है कि जब ‘चेयरमैन ऑफ़ दि प्रेस काउंसिल’ होते हुए काटजू यहाँ आया था, हम कुडनकुलम में ‘फैक्ट फाइंडिग’ के लिए गए थे। वरलक्ष्मी (हमारी संस्था की सचिव) भी गई थी जो वहाँ गिरफ्तार कर ली गई। देश-भर के एक ऑल इंडिया फैक्ट फाइंडिंग, आर.डी.एफ. ने आयोजित किया। वहाँ क्रांति चलाने के लिए उड़ीसा, दिल्ली, राँची सहित अन्य जगहों से लोग आए थे। यहाँ से वरलक्ष्मी और तीन लोग गए जो वहाँ गिरफ्तार कर लिए गए। एक महीने के लिए जेल में रहे। मीडिया ने इनका फोटो लगाकर खूब प्रचार किया कि ‘ये सब माओवादी हैं। वरलक्ष्मी माओवादी है और वरलक्ष्मी का पति एक ‘अंडरग्राउंड’ माओवादी नेता है।’ जबकि सच्चाई यह है कि वरलक्ष्मी की शादी ही नहीं हुई है। तमिल न्यूज पेपर, तमिल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने खूब झूठा प्रचार किया। दैनिक ईनाडु है, जिसका सबसे बड़ा सरक्युलेशन रहता है। उसने भी ख़बर छापी। हमने प्रोटेस्ट किया, तो उसका कहना था कि ‘आप भी लिखिए, हम वह भी छापेंगे।’ आज कोई बड़ा विषय होता है, कल हमारा खंडन होता है और दूसरा न्यूज आता है। इसे लेकर हमने प्रेस-काउंसिल से शिकायत की। प्रेस-काउंसिल का चेयरमैन दो-तीन रोज के लिए यहाँ आया था। उसके एजेंडे में यह मुद्दा ही नहीं था। मैं उससे मिलने के लिए गया तो पता चला कि वह मुख्यमंत्री से मिलने गया है, तो मैं पुष्पराज के कहने के बाद प्रेस-काउंसिल के एक सदस्य से मिला। तो प्रेस-काउंसिल के सदस्य ने कहा कि ‘मुझे शिकायत ही नहीं मिली है। आप फिर से दीजिए।’ यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि इतना बड़ा जनांदोलन चल रहा है, इतने छात्रों ने खुदकुशी कर ली है, तेलंगाना मुद्दे को लेकर हजारों लोग परेशान हैं लेकिन वह (काटजू) यहाँ आकर इसके विरोध में बयान देकर जाता है और ईनाडु के बारे में जो शिकायत आती है, वो नहीं लेता है। कहता है कि ‘मुझे सी.एम. ने डिनर पर बुलाया है।’ आपको तो रामोजी राव डिनर देता है, आपको तो मुख्यमंत्री डिनर देता है, तो आप कैसे शिकायत लीजिएगा? आप ही बोल रहे हैं कि ‘मैं नहीं जा सकता हूँ, मैं नहीं ले सकता हूँ।’ यह कैसा जनपक्ष होता है? हाँ, हमको लगता है कि जो सेक्युलर डेमोक्रेटिक इश्यूज हैं, उन पर उसका रवैया तो ठीक लगता है लेकिन समस्या यह है कि जब मुद्दा वर्ग का होता है तो हम कहीं भी न्याय की आशा नहीं कर सकते।

भारतीय मीडिया की वह भूमिका जिसने आपको निजी तौर पर बहुत दुखी किया? आप जनांदोलनों की वैकल्पिक मीडिया के बारे में क्या सोचते हैं?

जनांदोलन का मीडिया बन रहा है और बनाया भी जा रहा है। छोटी-छोटी डॉक्यूमेंट्री फिल्में बन रही हैं। हाल ही में संजय काक ने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है ‘रेड आंट ड्रीम’ (माटी के लाल)। उन्होंने तीन मुद्दे लिए हैं। दंडकारण्य में क्या हो रहा है? जब अरुंधति रॉय गई थीं तो संजय काक भी गए। दंडकारण्य में कैसा जनतंत्र है? क्या प्रयोग किए जा रहे हैं? किन सपनों को हासिल करने के लिए वहाँ के लोग सोच रहे हैं? एक नियमगिरी आदिवासी ने क्या-क्या संघर्ष किए हैं? क्योंकि बाहर की दुनिया यह समझ रही है कि नियमगिरी एक स्पॉण्टेनियस (स्वत:स्फूर्त) आंदोलन है। वो (मीडिया) पूरा सच नहीं बता रहा है। वहाँ भी माओवादियों की भूमिका है। ज्यादा तो नहीं, मगर भूमिका है। तीसरा पंजाब को लेकर। भगत सिंह को लेकर आज तक क्रांति की क्या परंपरा है? क्या चल रहा है मल्टीनेशनल कम्पनियों में? इन तीनों को मिलाकर डॉक्यूमेंट्री बनाई है काक ने। हम इस फिल्म को इफ्लू (इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी, हैदराबाद) में भी ले जाकर दिखाएंगे। तो एक वैकल्पिक, जनता के पक्ष में लेकर मीडिया आना चाहिए और इसके लिए छोटे-छोटे प्रयास होने चाहिए। ये हो रहे हैं और होंगे।

एन.जी.ओ. के कार्यों को मीडिया ने ‘विकासपरक पत्रकारिता’ का नाम दिया है। क्या आप एन.जी.ओ. की लीक से हो रही पत्रकारिता से संतुष्ट हैं?

कैसे संतुष्ट हो सकते हैं? क्योंकि उसका उद्देश्य यह है कि सारांश के तौर पर वह साम्राज्यवाद की सेवा कर रहा है। खासकर यह होता है कि क्रांति की बात को लेकर प्रचार होता है, तो क्रांति को ‘रिफॉर्म’ में खत्म करने के लिए एन.जी.ओ. आ रहा है, कॉन्सस (जागरूकता) में आ रहा है। मैंने हाल ही में एक फिल्म देखी थी, मिनुगुरुलु। इसे अमेरिका में रहने वाले एक एन.आर.आई. ने यहाँ आकर यह बनायी है। मुझे लगा कि इसे एक्शन एड सपोर्ट कर रहा है। थीम अच्छी है, बनाया भी बहुत अच्छा है। नेत्रहीन विद्यार्थियों का मुद्दा है। उनके होस्टल, उनके स्कूल, कितनी बुरी हालत में हैं! उनके लिए जो फंड मिलता है, उसे वहाँ के चलाने वाले खा जाते हैं और उनके लिए जो कमेटी है, कमेटी का चेयरमैन कैसे फंड को खा जाता है? फिल्म अच्छी बनी है। ‘अंधा होने से पहले वह अच्छा फोटोग्राफ़र था। बाद में एक एक्सीडेंट में वह अंधा हो गया। तो वो अपनी यादों के सहारे, अपने ज्ञान से, कैमरा लगाकर पूरी फिल्म बनाता रहता है, बहुत अच्छा! अगर क्रिएटिविटी देखी जाए तो as an art-piece, best art-piece. अब उसका पूरा-पूरा प्रयास होता है कि ये सब चीजें, नीचे जो हो रही हैं, उन्हें वह कलेक्टर को बताए। ये सब करके, कैमरा लगा के, और वह भी कलेक्टर के अटेंशन के लिए एक बड़े वाटर टैंक के ऊपर से कहता है कि ‘मैं खुदकुशी कर लूँगा।’ तो नीचे बहुत-से लोग आते हैं, पुलिस आती है, तो कलेक्टर भी आता है। तब उसने फिल्म बनाई। पूरा रिफॉर्म हो जाता है। यानी इससे क्या निकलता है देखने वालों को? जितना भी हो रहा है, भ्रष्टाचार हो या जो भी हो, कलेक्टर के नीचे एक सिस्टम है, उसी से हो रहा है। इसमें कलेक्टर नहीं है, इसमें पोलिटिकल सिस्टम नहीं है, इसमें दूसरे लोग नहीं हैं और ये रिफॉर्म करने वाला भी वही पालिटिकल सिस्टम है। वही रिफॉर्म करता है, ये फिल्म में है। जैसे ‘अंकुरम’ एक अच्छी जेन्यूइन फिल्म थी। फिल्म का एक पात्र झूठे मुठभेड़ में मारा गया, उसके बारे में जो बयान दिया गया, उस बयान को लेकर सरकार ने जाँच कराई और उसके लिए सजा भी दी। यह संदेश देने के लिए बहुत प्रभावशाली और बहुत विश्वसनीय फिल्म बनाई है। इसका उद्देश्य है रिफॉर्म की बात करना, वह कहीं सच्चाई में नहीं हो रहा है। आजाद के एन्काउंटर के बारे में सुप्रीम कोर्ट में गए तो बेंच ने कहा, “ये कैसे हो सकता है? रिपब्लिक अपने बच्चों को आप मार रहा है?” When we have petition the Supreme Court that was the first reaction of the Supreme Court. अन्त में क्या निकला है? सी.बी.आई. ने जाँच की, रिपोर्ट दी, क्या निकला है? दूसरी तरफ़ हमारा अनुभव है, कलेक्टर का अपहरण कर लिया, बहुत से डिमांड रखे, जनता के, आदिवासियों के। क्या नतीजा निकला? एक भी आदिवासी को नहीं छोड़ा, एक भी डिमांड पूरी नहीं की। समझिए, आप बताते हैं कि यह होने से बहुत रिफॉर्म आया है तो देखिए कि कहाँ आया है? सारे एन.जी.ओ. की कोशिश यह होती है कि क्रांति से रिफॉर्म में ले जाएँ, तो खासकर एन.जी.ओ. की भूमिका यह हो रही है कि लोगों की चेतना को वर्ग-संघर्ष की ओर न ले जाओ, वर्ग-संकट की ओर न ले जाओ, क्लास-कोलैबोरेशन (वर्ग सहभागिता) और एडजस्टमेंट (वर्ग सामंजस्य) में ले जाओ क्योंकि ये भी कॉरपोरेट स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट (संरचनात्मक सामंजस्य) करते हैं। एन.जी.ओ. स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट के लिए काम कर रहे हैं और इसीलिए मीडिया उनका बहुत प्रचार करता है।

क्या भारत में ‘प्रो-एस्टेब्लिस्मेंट जर्नलिज्म’ के समानांतर ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट जर्नलिज्म’ खड़ा हो पाया है?

अब ऐसा नहीं है कि मीडिया में ही एंटी-एस्टेब्लिशमेंट लोग हैं, मगर वह तो ‘dominated by, controlled by Pro-establishment’. अब अपनी-अपनी छोटी-छोटी पत्रिकाएँ निकालनी हैं, इसीलिए तो एक समय था कि कलकत्ते में ‘छोटी पत्रिकाओं का आंदोलन चला। पीपुल्स मीडिया का एक आंदोलन आना चाहिए तो उतने पैमाने पर नहीं हो सकता, फिर भी अलग-अलग क्षेत्रों में डि-सेंट्रेलाइज्ड (विकेंद्रीकृत) रूप में आना चाहिए। अभी कोशिश हो रही है, ये बंद नहीं होनी चाहिए, बल्कि और भी ज्यादा होनी चाहिए।

भारत के बहुल पेशेवर पत्रकारों और चंद गैर-पेशेवर पत्रकारों के लिए आपकी कोई अपील?

जाइए, वहाँ देखिएगा, जहाँ ग्रास-रूट पर संघर्ष हो रहा है। जाइए, देखिए, आपको जो लगे, वो रखिए। बिना गए, बिना देखे, जो आपको दिया गया है, वो मत बताइए। सच्चाई को बाहर लाइए। बस...।


10 फ़रवरी 2013

लोकतंत्र के लिए एक मुकम्मल दिन: अरुंधति राय


भारत के फासीवादी राज्य द्वारा अफजल गुरु की हत्या पर लेखिका-कार्यकर्ता अरुंधति राय का लेख. अनुवाद: रेयाज उल हक. साभार: द हिंदू.
 
नहीं था क्या? मेरा मतलब, कल का दिन. दिल्ली में बसंत ने दस्तक दी. सूरज निकला था और कानून ने अपना काम किया. नाश्ते से ठीक पहले, 2001 में संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु को खुफिया तरीके से फांसी दे दी गई और उनकी लाश को तिहाड़ जेल में मिट्टी में दबा दिया गया. क्या उन्हें मकबूल भट्ट की बगल में दफनाया गया? (एक और कश्मीरी, जिन्हें 1984 में तिहाड़ में ही फांसी दी गई थी. कल कश्मीरी उनकी शहादत की बरसी मनाएंगे.) अफजल की बीवी और बेटे को इत्तला नहीं दी गई थी. ‘अधिकारियों ने स्पीड पोस्ट और रजिस्टर्ड पोस्ट से परिवार वालों को सूचना भेज दी है,’ गृह सचिव ने प्रेस को बताया, ‘जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक को कह दिया गया है कि वे पता करें कि सूचना उन्हें मिल गई है कि नहीं.’ ये कोई बड़ी बात नहीं है, वो तो बस एक कश्मीरी दहशतगर्द के परिवार वाले हैं.

एकता के एक दुर्लभ पल में राष्ट्र, या कम से कम इसके मुख्य राजनीतिक दल, कांग्रेस, भाजपा और सीपीएम (‘देरी’ और ‘समय’ पर छोटे-मोटे मतभेद को छोड़ दें तो) कानून के राज की जीत का जश्न मनाने के लिए एक साथ आए. राष्ट्र की चेतना ने, जिसे इन दिनों टीवी स्टूडियो के जरिए लाइव प्रसारित किया जाता है, अपनी सामूहिक समझ हम पर उंड़ेल दी – धर्मात्माओं सरीखे उन्माद और तथ्यों की नाजुक पकड़ की वही हमेशा की खिचड़ी. यहां तक कि वो इन्सान मर चुका था और चला गया था, झुंड में शिकार खेलने वाले बुजदिलों की तरह उन्हें एक दूसरे का हौसला बढ़ाने की जरूरत पड़ रही थी. शायद अपने मन की गहराई में वे जानते थे कि वे सब एक भयानक रूप से गलत काम के लिए जुटे हुए हैं.

तथ्य क्या हैं?

13 दिसंबर 2001 को पांच हथियारबंद लोग इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस के साथ एक सफेद एंबेस्डर कार से संसद भवन के दरवाजों से दाखिल हुए. जब उन्हें ललकारा गया तो वो कार से निकल आए और गोलियां चलाने लगे. उन्होंने आठ सुरक्षाकर्मियों और माली को मार डाला. इसके बाद हुई गोलीबारी में पांचों हमलावर मारे गए. पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामों के अनेक वर्जनों में से एक में अफजल गुरु ने उन लोगों की पहचान मोहम्मद, राणा, राजा, हमजा और हैदर के रूप में की. आज तक भी, हम उन लोगों के बारे में कुल मिला कर इतना ही जानते हैं. तब के गृहमंत्री एल.के. अडवाणी ने कहा कि वे ‘पाकिस्तानियों जैसे दिखते थे.’ (उन्हें पता होना ही चाहिए कि ठीक-ठीक पाकिस्तानी की तरह दिखना क्या होता है? वे खुद एक सिंधी जो हैं.) सिर्फ अफजल के कबूलनामे के आधार पर (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बाद में ‘खामियों’ और ‘कार्यवाही संबंधी सुरक्षा प्रावधानों के उल्लंघनों’ के आधार पर खारिज कर दिया था) सरकार ने पाकिस्तान से अपना राजदूत वापस बुला लिया था और पांच लाख फौजियों को पाकिस्तान से लगी सरहद पर तैनात कर दिया था. परमाणु युद्ध की बातें होने लगीं थीं. विदेशी दूतावासों ने यात्रा संबंधी सलाहें जारी कर दी थीं और दिल्ली से अपने कर्मचारियों को बुला लिया था. असमंजस की यह स्थिति कई महीनों तक चली और भारत के हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए.

14 दिसंबर, 2001 को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने मामले को सुलझा लिया है. 15 दिसंबर को उसने दिल्ली में ‘मास्टरमाइंड’ प्रोफेसर एस.ए.आर. गीलानी और श्रीनगर में फल बाजार से शौकत गुरु और अफजल गुरु को गिरफ्तार किया. बाद में उन्होंने शौकत की बीवी अफशां गुरु को गिरफ्तार किया. मीडिया ने जोशोखरोश से स्पेशल सेल की कहानी का प्रचार किया. कुछ सुर्खियां ऐसी थीं: ‘डीयू लेक्चरर वाज टेरर प्लान हब’, ‘वर्सिटी डॉन गाइडेड फिदायीन’, ‘डॉन लेक्चर्ड ऑन टेरर इन फ्री टाइम.’ जी टीवी ने दिसंबर 13 नाम से एक ‘डॉक्यूड्रामा’ प्रसारित किया, जो कि ‘पुलिस के आरोप पत्र पर आधारित सच्चाई’ होने का दावा करते हुए उसकी पुनर्प्रस्तुति थी. (अगर पुलिस की कहानी सही है, तो फिर अदालतें किसलिए?) तब प्रधानमंत्री वाजपेयी और एल.के. आडवाणी ने सरेआम फिल्म की तारीफ की. सर्वोच्च न्यायालय ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से यह कहते हुए मना कर दिया कि मीडिया जजों को प्रभावित नहीं करेगा. फिल्म फास्ट ट्रेक कोर्ट द्वारा अफजल, शौकत और गीलानी को फांसी की सजा सुनाए जाने के सिर्फ कुछ दिन पहले ही दिखाई गई. उच्च न्यायालय ने ‘मास्टरमाइंड’ प्रोफेसर एस.ए.आर. गीलानी और अफशां गुरु को आरोपों से बरी कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी रिहाई को बरकरार रखा. लेकिन 5 अगस्त, 2005 के अपने फैसले में इसने मोहम्मद अफजल को तिहरे आजीवन कारावास और दोहरी फांसी की सजा सुनाई.

कुछ वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा, जिन्हें बेहतर पता होगा, फैलाए जाने वाले झूठों के उलट, अफजल गुरु ’13 दिसंबर, 2001 को संसद भवन पर हमला करने वाले आतंकवादियों’ में नहीं थे न ही वे उन लोगों में से थे जिन्होंने ‘सुरक्षाकर्मी पर गोली चलाई और मारे गए छह सुरक्षाकर्मियों में तीन का कत्ल किया.’ (ये बात भाजपा के राज्य सभा सांसद चंदन मित्रा ने 7 अक्तूबर, 2006 को द पायनियर में लिखी थी). यहां तक कि पुलिस का आरोप पत्र भी उनको इसका आरोपी नहीं बताता है. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कहता है कि सबूत परिस्थितिजन्य है: ‘अधिकतर साजिशों की तरह, आपराधिक साजिश के समकक्ष सबूत नहीं है और न हो सकता है.’ लेकिन उसने आगे कहा: ‘हमला, जिसका नतीजा भारी नुकसान रहा और जिसने संपूर्ण राष्ट्र को हिला कर रख दिया, और समाज की सामूहिक चेतना केवल तभी संतुष्ट हो सकती है अगर अपराधी को फांसी की सजा दी गई.’

संसद हमले के मामले में हमारी सामूहिक चेतना का किसने निर्माण किया? क्या ये वे तथ्य होते हैं, जिन्हें हम अखबारों से हासिल करते हैं? फिल्में, जिन्हें हम टीवी पर देखते हैं?

कुछ लोग हैं जो यह दलील देंगे कि ठीक यही तथ्य, कि अदालत ने एस.ए.आर. गीलानी को छोड़ दिया और अफजल को दोषी ठहराया, यह साबित करता है कि सुनवाई मुक्त और निष्पक्ष थी. थी क्या?

फास्ट-ट्रेक कोर्ट में मई, 2002 में सुनवाई शुरू हुई. दुनिया 9-11 के बाद के उन्माद में थी. अमेरिकी सरकार अफगानिस्तान में अपनी ‘विजय’ पर हड़बड़ाए हुए टकटकी बांधे थी. गुजरात का जनसंहार चल रहा था. और संसद पर हमले के मामले में कानून अपनी राह चल रहा था. एक आपराधिक मामले के सबसे अहम चरण में, जब सबूत पेश किए जाते हैं, जब गवाहों से सवाल-जवाब किए जाते हैं, जब दलीलों की बुनियाद रखी जाती है – उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में आप केवल कानून के नुक्तों पर बहस कर सकते हैं, आप नए सबूत नहीं पेश कर सकते – अफजल गुरु भारी सुरक्षा वाली कालकोठरी में बंद थे. उनके पास कोई वकील नहीं था. अदालत द्वारा नियुक्त जूनियर वकील एक बार भी जेल में अपने मुवक्किल से नहीं मिला, उसने अफजल के बचाव में एक भी गवाह को नहीं बुलाया और न ही अभियोग पक्ष द्वारा पेश किए गए गवाहों का क्रॉस-एक्जामिनेशन किया. जज ने इस स्थिति के बारे कुछ पाने में अपनी अक्षमता जाहिर की.

तब भी, शुरुआत से ही, केस बिखर गया. अनेक मिसालों में से कुछेक यों हैं:

पुलिस अफजल तक कैसे पहुंची? उनका कहना है कि एस.ए.आर. गीलानी ने उनके बारे में बताया. लेकिन अदालत के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि अफजल की गिरफ्तारी का संदेश गीलानी को उठाए जाने से पहले ही आ गया था. उच्च न्यायालय ने इसे ‘भौतिक विरोधाभास’ कहा लेकिन इसे यों ही कायम रहने दिया.

अफजल के खिलाफ सबसे ज्यादा आरोप लगाने वाले दो सबूत एक सेलफोन और एक लैपटॉप था, जिसे उनकी गिरफ्तारी के वक्त जब्त किया गया. अरेस्ट मेमो पर दिल्ली के बिस्मिल्लाह के दस्तखत हैं जो गीलानी के भाई हैं. सीजर मेमो पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो कर्मियों के दस्तखत हैं, जिनमें से एक अफजल के उन दिनों का उत्पीड़क था, जब वे एक आत्मसमर्पण किए हुए ‘चरमपंथी’ हुआ करते थे. कंप्यूटर और सेलफोन को सील नहीं किया गया, जैसा कि एक सबूत के मामले में किया जाता है. सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि लैपटॉप के हार्ड डिस्क को गिरफ्तारी के बाद उपयोग में लाया गया था. इसमें गृह मंत्रालय के फर्जी पास और फर्जी पहचान पत्र थे जिसे आतंकवादियों ने संसद में घुसने के लिए इस्तेमाल किया था. और संसद भवन का एक जी टीवी वीडियो क्लिप. इस तरह पुलिस के मुताबिक, अफजल ने सभी सूचनाएं डीलीट कर दी थीं, बस सबसे ज्यादा दोषी ठहराने वाली चीजें रहने दी थीं, और वो इसे गाजी बाबा को देने जा रहा था, जिनको आरोप पत्र में चीफ ऑफ ऑपरेशन कहा गया है.

अभियोग पक्ष के एक गवाह कमल किशोर ने अफजल की पहचान की और अदालत को बताया कि 4 दिसंबर 2001 को उसने वह महत्वपूर्ण सिम कार्ड अफजल को बेचा था, जिससे मामले के सभी अभियुक्त के संपर्क में थे. लेकिन अभियोग पक्ष के अपने कॉल रिकॉर्ड दिखातेहैं कि सिम 6 नवंबर 2001 से काम कर रहा था.

ऐसी ही और भी बातें हैं, और भी बातें, झूठों के अंबार और मनगढ़ंत सबूत. अदालत ने उन पर गौर किया, लेकिन पुलिस को अपनी मेहनत के लिए हल्की की झिड़की से ज्यादा कुछ नहीं मिला. इससे ज्यादा कुछ नहीं.

फिर तो वही पुरानी कहानी है. ज्यादातर आत्मसमर्पण कर चुके चरमपंथियों की तरह अफजल कश्मीर में आसान शिकार थे – टॉर्चर, ब्लैकमेल, वसूली के पीड़ित. जिसको संसद पर हमले के रहस्य को सुलझाने में सचमुच दिलचस्पी हो, उसे सबूतों की एक घनी राह से गुजरना होगा, जो कश्मीर में एक धुंधले जाल की तरफ ले जाती है, जो चरमपंथियों को आत्मसमर्पण कर चुके चरमपंथियों से, गद्दारों को स्पेशल पुलिस ऑफिसरों से, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप को स्पेशल टास्क फोर्स से जोड़ती है और यह रिश्ता ऊपर, और आगे की तरफ बढ़ता जाता है. ऊपर, और आगे की तरफ.

लेकिन अब इस बात से कि अफजल गुरु को फांसी दी जा चुकी है, मैं उम्मीद करती हूं कि हमारी सामूहिक चेतना संतुष्ट हो गई होगी. या हमारा खून का कटोरा अभी आधा ही भरा है?

12 मई 2012

भारतीय ज्ञानपीठ को गौरव सोलंकी का पत्र.

21 जून 2011

बीबीसी हिंदी के संवाददाता सलमान रावी को एक माओवादी का खुला खत

यह पत्र हमे मेल के जरिए प्राप्त हुआ एक लम्बे वक्त तक इन्टरनेट से दूर होने के कारण यह खत देर से प्रकाशित हो सका। माडरेटर

प्रिय सलमान रावी,
लाल सलाम।
बीबीसी में 18 और 19 मई को लगातार प्रसारित आपकी दो रिपोर्टें सुनने के बाद मैं खुद को यह खत लिखने से रोक नहीं पा रहा हूं। जाहिर है ये दोनों ही रिपोर्टें सलवा जुडूम और एसपीओ के बारे में थीं। आपने उनकी समस्याओं और उनके दिलों को हुए जख्मोंका बड़ी संजीदगी के साथ जिक्र किया। उनकी तनख्वाहों और तकलीफों का काफी संवेदना के साथ बयान किया। आमतौर पर मीडिया और पत्राकारिता को लेकर यह बताया जाता है कि पत्रकारों को दोनों पक्षों के बारे में लिखना चाहिए। निष्पक्षऔर तटस्थहोना चाहिए जिसकी आप और आपकी बीबीसी हर दूसरे दिन ढिंढ़ोरा पीटते हैं। लेकिन आपकी इन दो रिपोर्टों ने - बाकी को अगर छोड़ भी दें तो - साफ तौर पर साबित कर दिया कि आपके ये दावे कितने खोखले हैं। पर इसकी चर्चा से पहले कुछ और बातें की जाएं।
सलवा जुडूम के बारे में अब यह स्थापित हो चुका है कि यह कुछ और नहीं था बल्कि सरकार द्वारा खड़ा किया गया एक आतंकी अभियान था। केन्द्र व राज्य सरकारों ने - यानी केन्द्रीय गृह मंत्रालय, सेना व पुलिस के आला अधिकारियों ने साझे तौर पर इसकी योजना बनाई थी। इसके लिए लोगों को अलग-अलग तरीके से इकट्ठा कर गिरोह बनाए गए थे। इन गिरोहों से पैदा हुए एसपीओ और कोया कमाण्डो को बाकायदा प्रशिक्षित किया गया ताकि विद्रोह- विरोधी कार्रवाहयों (counter-insurgency operations) में इन्हें कारगर ढंग से आजमाया जा सके। इनके साथ सुविधा यह है कि इन्हें एक साथ कई मोर्चों पर लगाया जा सकता है और इन्हें अनेक नामों से बुलाया जा सकता है। पत्रकारों को रुकवाना है या स्वामी अग्निवेश जैसे लोगों पर अंडे फिकवाना है तो इन्हें सलवा जुडूमआंदोलनसे जुड़े हुए लोगों के रूप में पेश किया जा सकता है। किसी माओवादी कैम्प या दस्ते पर हमला करना है तो इन्हें बहादुर कोया कमाण्डोके रूप में पेश किया जा सकता है। और आदिवासियों की हत्या, बलात्कार, गांव-दहन आदि करतूतों को मुख्य रूप से इन्हीं लोगों के जरिए अंजाम दिलवाना कई मायनों में सरकार के लिए सुविधाजनक होगा। मैं नहीं समझता कि इन सभी पहलुओं से आप वाकिफ नहीं होंगे।
जब राजसत्ता ने लोकतंत्रका चोला ओढ़ रखा हो, ऐसे में जनसंघर्षों का दमन करने में उसके सामने कुछ पेचीदगियां होती हैं। उसे अलग-अलग संगठनों को सामने लाने पर मजबूर होना पड़ता है ताकि अपने दमनकारी व तानाशाहाना चेहरे को ढंक दिया जा सके। कभी-कभी अपने दूसरे अंगों, जैसे कि अदालतों या अन्य आयोगों के द्वारा उसके सामने मुश्किलें खड़ी की जाती हैं क्योंकि सभी अंगों पर लोकतंत्र का दिखावा करने का दबाव रहता है। इसलिए शासक वर्ग सलवा जुडूम को लाते भी हैं और किसी परिस्थिति में उससे मुकर भी जाते हैं। फिर उसे दण्डकारण्य शांति संघर्ष मोर्चाका नाम देते हैं या फिर मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंचया बस्तर स्वाभिमान मंचका नाम दे देते हैं। उदाहरण के लिए चिंतलनार काण्ड में कोया कमाण्डो और एसपीओ को आगे किया गया। और उन्होंने इस सच्चाई को सफाई के साथ छुपा दिया है कि दरअसल इसकी योजना केन्द्रीय गृहमंत्रालय के निर्देश पर बनाई गई थी और इसे रमनसिंह, विश्वरंजन व लांगकुमेर के मार्गदर्शन में एसएसपी कल्लूरी के हाथों अंजाम दिलवाया गया था। जनता को हमेशा भ्रम की स्थिति में रखना इनका मकसद होता है ताकि व्यवस्था पर लोकतंत्रका मुखौटा बने रहे। फिर मामला जब तूल पकड़नेलगता है तो राजसत्ता तुरंत ही अपने दूसरे अंगों को मोर्चे पर लगा देती है जैसा कि चिंतलनार की घटना में कलेक्टर और कमिशनर को उतारा गया और बाद में जांच के लिए एक आयोग का गठन किया गया। यह सारी कवायद वह इसलिए करती है ताकि मामले को ठण्डाकिया जा सके और अपने लोकतंत्रका मखौल उड़ने से बचाया जा सके।
सलवा जुडूम कुछ और नहीं था, बल्कि मछलियों को पकड़ने के लिए तालाब से पानी खाली करवानेकी दरिंदगी भरी नीति थी, जिसका केन्द्र बिंदु आदिवासियों को उनके रिहायशी इलाकों से, जहां वे हजारों सालों से रहते आ रहे हैं, बाहर निकालकर रणनीतिक बसावटों (strategic hamleting) की योजना के तहत सड़कों के किनारे सरकारी कैम्पों में बसाना था। लेकिन कोई यूं ही आदिवासियों को अपनी जगहों से खदेडा नहीं जा सकता। उपनिवेशकाल से भी अगर देखेंगे तो पाएंगे कि आदिवासी अपने जंगल और जमीन के लिए जान दे सकता है, लेकिन कभी उससे अलग नहीं हो सकता। और वर्तमान संदर्भ में, ये आदिवासी पिछले 25 वर्षों (1980-2005) तक युद्ध से संगठित हो रहे थे। ऐसे में इन्हें जंगलों से खदेड़ना और राहतशिविरों में घसीटना भला कैसे मुमकिन?
मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि कुछ बुनियादी मामलों पर आपको स्पष्टता दिलाई जा सके। दुनिया के काउंटर इंसर्जेन्सी आज काउंटर टेर्ररिज़्म सिद्धांत को आपने पढ़ा ही होगा। मलया में 1940 के दशक में इसी नीति को लागू किया गया था। उसके बाद भारत के महान तेलंगाना किसान संघर्ष मेंब्रिग्सयोजना के नाम से इसी नीति को लागू किया गया था। और पेरू जैसे कई लातिनी अमेरिकी देशों में भी इसे लागू किया गया था। बस्तर में भी सलवा जुडूम के नाम से इसी नीति को आजमाने की कोशिश की गई ताकि आदिवासियों को जंगलों से खाली करवाया जा सके तथा टाटा, एस्सार वगैरह-वगैरह को बिठाया जा सके। और साथ ही, इसके एवज में रमनसिंह, ब्रजमोहन अग्रवाल, महेंद्र कर्मा और विश्वरंजन जैसों को हासिल करनी है मोटी दलाली। दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और भारत के दलाल कार्पोरेट घराने संसाधनों की लूटखसोट के लिए कितने उतावले हैं और मौजूदा वैश्विक संकट के चलते यह उनके लिए कितना जरूरी हो गया, यह बात आप भी जानते हैं।
अब यह सवाल अप्रासंगिक हो चुका है कि सलवा जुडूम एक आंदोलन था या नहीं था। इसके पीछे शोषक शासक वर्गों की रणनीति क्या रही, यह एक बार स्पष्ट कर लेने के बाद अब उसके बाकी पहलुओं को समझना मुश्किल नहीं है। यहां एक तरफ माओवादी और दूसरी तरफ सरकार (मीडिया की भाषा में) या फिर एक तरफ आदिवासी और दूसरी तरफ सरकार जिसके पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदि - इन्हीं दो खेमों में बंटा हुआ नहीं है सब कुछ। विभिन्न प्रकार के मानवाधिकार संगठन (दोनों सरकारी और गैर-सरकारी) तथाकथित नागरिक समाज, मीडिया आदि-आदि कई दूसरे पहलू हैं इस मसले के। तो क्या दिखलाकर या क्या बताकर इन सभी को चुप किया जा सकता था? या कम से कम इनके विरोध या प्रतिरोध को कम किया जा सकता था? यही सोचकर बड़े सुनियोजित तरीके से यह प्रचार शुरू किया गया था कि बस्तर में माओवादियों की नीतियों से नाराज आदिवासियों ने अपने आपको संगठित कर सलवा जुडूमआंदोलन शुरू किया। बार-बार दोहराकर यह बताया गया था कि माओवादी सड़कें बनाने नहीं देते हैं, तेंदूपत्ता तोड़ने नहीं देते हैं, आदिवासी संस्कृति के साथ छेड़छाड़ करते हैं आदि-आदि। उसके बाद शुरू हुआ बस्तर में एक काला अध्याय जिसकी तुलना में बहुत कम उदाहरण मिलेंगे। क्योंकि इसमें एक साथ घर जलाए गए। लोगों को काट-काटकर मार डाला गया। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। लोगों की लाशें नदियों में फेंक दी गईं। सम्पत्ति लूटी गई और बाहरी दुनिया को इस बारे में कुछ भी पता चलने नहीं दिया गया। हालांकि, सरकारी हिंसा और भी कई जगहों में हुई थी, लेकिन यहां जिस ढंग से हुई, इसके उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलेंगे। जैसे कि एक ही गांव को एक बार नहीं, बल्कि कई बार किश्तों में जलाया गया। कुछ गांवों पर 30-35 बार तक हमले हुए। हर बार कुछ-कुछ लोगों को मार डाला गया। एक-एक गांव में 2-3 से लेकर 15-20 तक लोगों की हत्या की गई। सिंगारम, गोमपाड़, सिंगनमडुगु, पालाचेलमा, कोतरापाल, मनकेली, हरियाल, ताकिलोड़, ओंगनार और भी दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां सरकारी बलों के हाथों मारे जाने वालों की संख्या दस-पंद्रह से ऊपर है। साम, दाम, भेद और दण्ड के सभी हथकण्डे अपनाकर हर बार कुछ परिवारों को शिविरों में ले जाया गया।
लेकिन, जैसा कि इतिहास में कई बार देखा गया, इतनी भारी हिंसा और बर्बरता के बावजूद भी लोगों ने घुटने नहीं टेके। आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि मजबूत हुआ। माओवादी लड़ाकों के हौसले पस्त नहीं हुए, बल्कि वे इस भीषण संग्राम में तपकर फौलाद बन गए। हालांकि इसके दूसरे पहलू भी हैं - कई जवान लड़के (चाहकर भी और न चाहते हुए भी) एसपीओ बन गए और कई लोग एक विकट परिस्थिति में जनता के ऊपर की गई सरकारी हिंसा और अत्याचारों में भागीदार बन गए और वहां से पीछे आने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसी मशीनरी (machinery) का हिस्सा बनकर तथाकथित राहत शिविरों में रह गए। कुछ तो पहले से लम्पट किस्म के थे, कुछ ऐसे थे जिन्हें या जिनके परिवार के सदस्यों को क्रांतिकारी संघर्ष के दौरान किसी न किसी रूप से दण्डित किया गया था। कुछ नौजवान ऐसे भी थे जिन्हें दरअसल हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना चाहिए था, जिनके साथ मारपीट कर या जान से मारने की धमकियां देकर जबरन एसपीओ बनाया गया। और इस तरह न चाहते हुए भी वे क्रांति के विरोधी खेमे में चले गए।
बहरहाल, इस तर्क को अब रद्दी के टोकरे में पहुंचा दिया जा चुका है कि माओवादियों कीगलतियोंया ज्यादतियोंके चलते सलवा जुडूम आंदोलनशुरू हुआ था। आप पूछ सकते हैं कि क्या माओवादियों की कोई गलती नहीं रही? क्यों नहीं रहेगी? किसी भी आंदोलन के दौरान गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन गांवों को जलाना, घरों को लूटना, लोगों के शरीर के अंगों को काट-काटकर हत्या करना, महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या - यह सब माओवादियों की किस गलतीको सुधरने के लिए किया गया ? माओवादियों की किन गलतियोंके कारण जनता को ऐसीसजाएंदी गईं? इस आरोप में उतना ही दम है जितना कि बुश की उस दलील में था कि चूंकि इराक के पास मानव संहार के हथियार थे, इसलिए उन्हें हमला करना पड़ा। और इसमें उतनी ही सच्चाई थी जितनी कि उसके उत्तराधिकारी ओबामा के इस दंभ में है कि लीबिया में उन्हें इसलिए बमबारी शुरू करनी पड़ी क्योंकि वहां पर गद्दाफी लोगों को मार रहा था।
और आदिवासी समाज के अंदर सलवा जुडूम से सांस्कृतिक विनाश जिस हद तक हुआ उसका अंदाजा तक लगाना मुश्किल है। एक ही परिवार का एक भाई क्रांतिकारी संघर्ष में है तो दूसरे को किसी न किसी तरीके से एसपीओ बनाया गया। ऐसे कई परिवार हैं। पढ़िए - बी.डी. दमयंती की किताब ’हरी-भरी जिंदगी पर कहर बरपाता राज्य’। तो इसलिए, एसपीओ और कोया कमाण्डो सिर्फ माओवादियोंके दुश्मन नहीं हैं जैसाकि आपने अपनी रिपोर्ट में कहा है। वो पूरे बस्तर के आदिवासी समाज के दुश्मन बने हैं। बस्तर की संस्कृति के दुश्मन बने हैं। कुल मिलाकर बस्तरिया जन जीवन के दुश्मन बने हैं।
हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। एसपीओ के साथ निपटने में क्रांतिकारी आंदोलन की नीति हमेशा वर्गीय दृष्टिकोण पर ही आधरित रही। मजबूरी में जनता के खिलाफ अपराधों में शामिल होने वालों को भी वापस गांवों में आने पर माफ किया गया। कई लोग जो एसपीओ बनकर या राहत शिविर में शामिल होकर प्रति-क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो चुके थे, ऐसे लोगों के भी खेतों, फसलों, मवेशियों और घरों को बचाकर रखा गया और जब वे माफी मांगकर वापस आ गए तो उन्हें उनके सुपुर्द कर दिया गया। कई एसपीओ वापस आ गए और गांवों में पहले जैसा रहने लगे हैं। और एकाध लोग अपनी रायफल के साथ भी भागकर चले आए। सिर्फ कट्टर और जालिम किस्म के एसपीओ के साथ सख्ती से निपटा जा रहा है जोकि जनता के हितों की रक्षा के लिए जरूरी भी है।
आखिरकार सलवा जुडूम पराजित किया गया। इसका श्रेय बुनियादी तौर पर बस्तरिया जनता के प्रतिरोधी संघर्ष को जाता है। और साथ ही जाता है उन तमाम जनवाद पसंदों , प्रगतिशील ताकतों और जनवादी संगठनों को जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर भी अथक प्रयासों और कानूनी लड़ाइयों से सलवा जुडूम के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया। सलवा जुडूम के पराजित होने का मतलब यह है कि वह आज उस रूप में नहीं रहा जैसाकि वह 2005-08 के बीच हुआ करता था। सलवा जुडूम गया, लेकिन उसके द्वारा पैदा किए गए एसपीओ अभी भी हैं, बल्कि उन्हें अब और ज्यादा संगठित और विस्तारित किया गया।
अब फिर मैं आपकी रिपोर्टों की तरफ आता हूं जहां से मैंने इस खत की शुरूआत की। आपने बड़ी संजीदगी के साथ कह दिया है कि एसपीओ की कई समस्याएं हैं। हां जी, हत्यारों की भी समस्याएं जरूर होती हैं ! गुण्डों और बलात्कारियों को भी जरूर कोई न कोई समस्या होगी ही। 2 साल के बच्चे सरकारी सशस्त्र बलों ने 1 अक्टूबर 2009 को गोमपाड़ गांव के दो साल के नन्हे सुरेश की उंगलियां काट दीं और अक्टूबर 2005 में मूकावेल्ली गांव के एक डेढ़ साल के नन्हे बच्चे के सिर में गोली मारी से लेकर 80 साल की बूढ़ी तक को गोली मारकर, गांवों को जलाकर, घरों से मुरगे, बकरों से लेकर जेवर, कपड़े, बरतन तक लूटने वाले डकैतों और दरिंदों की भी समस्याएं होती हैं। समस्याएं सभी की हो सकती हैं। गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम करने वाले बाबू बजरंगी जैसे भाड़े के टट्टुओं को भी समस्याएं होंगी ही। यह आप पर है कि आप उनकी समस्याओं के प्रति कितना इत्तेफाक रखते हैं और कितनी संवेदना दिखाते हैं।
हां, यह बात भी अपनी जगह दुरुस्त है सलमान जी! एसपीओ की भी तनख्वाएं बढ़नी चाहिए! उन्हें भी पक्के मकान मिलने चाहिए! बल्कि उन्हें पुलिस में ले लेना चाहिए! मीडिया के लगातार कवरेज से सरकार भी जरूर इस पर ध्यान देगी। देगी भी क्यों नहीं? आखिर माओवादियों का खात्मा जो करना है। उसके बाद क्या होगा? सलमान जी! आप खुद से सवाल कर लीजिए कि ऐसी रिपोर्टों से क्या आप गुण्डों, हत्यारों, डकैतों और बलात्कारियों कोसुविधओंकी बात तो नहीं कर रहे? जाने या अनजाने में कहीं आप इस बात की हिमायत तो नहीं कर रहे कि उनकी करतूतों में और ज्यादा इजाफा हो? क्या आपको एहसास है कि दोनों पक्षों की रिपोर्टिंगया निष्पक्ष रिपोर्टिंगके फेर में आपने खुद को किस जगह पहुंचा दिया?! आप उन लोगों की समस्याओं और सुविधाओं की चर्चा कर रहे हैं जिन लोगों की नियुक्ति व प्रशिक्षण तथा हथियारबंद कर आदिवासियों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने आपत्ति की और छत्तीसगढ़ सरकार की खिंचाई की?! जरा खुद से पूछ लीजिए कि आप कहां खड़े हैं?
सलमान जी! आपसे हमारा सीधा सवाल है कि क्या आपने अपने करीब एक साल के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान ऐसे किसी सलवा जुडूम से पीड़ित आदिवासी का कभी इंटरव्यू लिया जिसका घर जलाया गया हो या लूटा गया हो, या फिर जिसका कोई परिवार सदस्य मारा गया हो। चिनारी और ओंगनार गांवों के लोगों की बमुश्किल 10 सेकण्ड वाली एक आडियो क्लिप को को छोड़ दें तो आज तक आपने कभी भी किसी आदिवासी की आवाज अपनी रिपोर्ट में नहीं सुनाई जो सरकारी बलों की बर्बरता का शिकार हुआ हो। क्या आपने किसी ऐसी महिला की आपबीती सुनने की कोशिश की जिसके साथ तथाकथित सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया हो। क्या आपने तिम्मापुरम, मोरपल्ली, ताड़िमेट्ला और पुलानपाड़ के सरकारी हिंसा से पीड़ित लोगों के दिलों में हुए ताजा जख़्मों को छूने की कोशिश की? क्या आपने यह देखने की कोशिश की कि घर जलाए जाने के बाद वे किन हालात में जी रहे हैं? उनकी क्या समस्याएं हैं और क्या परेशानियां हैं, उन्हें खाने को कुछ मिल भी रहा है या नहीं, क्या आपने इसकी रिपोर्ट करने की कोशिश की? जब ताडमेटला और उसके आसपास के ग्रामीणों के शरीर पर हुए गहरे जख्म, दिलों के जख्मों का भरना तो नामुमकिन है भरे तक नहीं, आपका अपनी रिपोर्ट में यह कहना कि सलवा जुडम के कैम्पों में रहने वाले अपने दिलों में कई जख्मों को लिए जी रहे हैं’, क्या बस्तर के दसियों हजार लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कना नहीं है?
तटस्थया निष्पक्षरिपोर्टिंग से बड़ा भद्दा मजाक कुछ और नहीं हो सकता। यहां लकीरें साफ तौर पर खींची हुई हैं। एक तरफ बस्तरिया जनता है जो अपने जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए और अपने घरों को, खेतों को, फसलों को और बच्चों को बचाने के लिए लड़ रही है जिसका नेतृत्व माओवादी पार्टी और उसकी सेना पीएलजीए कर रही हैं। दूसरी तरफ सोनिया, मनमोहन, चिदम्बरम, प्रणब मुखर्जी, मोंटेक सिंह, रंगराजन, रमनसिंह, महेंद्र कर्मा, विश्वरंजन, लांगकुमेर, कल्लूरी जैसे लोग हैं जो दरअसल टाटा, एस्सार, जिंदल, मित्तल, अम्बानी आदि बड़े कार्पोरेट आकाओं और साम्राज्यवादियों, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के दलाल हैं। पुलिस, अर्धसैनिक, कोबरा, एसटीएफ, कोया, एसपीओ, सलवा जुडूम, शांति संघर्ष मोर्चा, मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच-चाहे जो भी नाम हो-सभी भाड़े के टट्टू उनकी राज मशीनरी के अलग-अलग पुरजे हैं। इन परस्पर विरोधी खेमों के बीच ऐसी कोई जगह ही नहीं है जिसे तटस्थकहा जा सके और जहां पर खड़े होकर रेफरी का काम किया जा सके।
वैसे ताड़मेटला, चिंतलनार और मोरपल्ली गांवों में उड़ रही राख से भरी धूल और खण्डहरों में तब्दील हुए घरों के बीच खड़े होकर आप क्या निष्पक्षरिपोर्टिंग करेंगे? यही न कि यहां का पूरा इलाका बारूदी सुरंगों से पटा पड़ा हैऔर यहां जाने वाली सड़कों में कदम-कदम पर मौत बिछी हुई है। आप मीडिया वालों को माओवादी हिंसाका शब्द मुंह से निकालने में तनिक भी देर नहीं लगती! लेकिन आंखों के सामने मची बर्बरता को देखने के बाद भी एसपीओ से आप बड़े प्यार से पूछते हैं कि अच्छा, तिम्मापुरम में घरों को कौन जलाया था। जब आपको सरकार द्वारा बरती गई हिंसा पर मजबूरी में कुछ कहना भी पड़ता है तब भी आप बड़ी सावधनी से कथितशब्द जोड़ना नहीं भूलते हैं, जबकि इसके आपके पास पर्याप्त सबूत मौजूद होते हैं, जिसके आधर पर आप साफतौर पर कह सकें कि हां, घरों को कोया कमाण्डो, एसपीओ और कोबरा बलों ने चिदम्बरम, रमनसिंह, शेखर दत्त और विश्वरंजन द्वारा रची गई साजिश के तहत ही जलाया था।
यह रिपोर्ट लिखते-लिखते 26 मई को छत्तीसगढ़ में बारूदी सुरंगों के बारे में भी आपकी रिपोर्ट आ गई रेडियो बीबीसी हिंदी में। और आपने गरियाबंद में मारे गए पुलिस वालों के जनाजे की ही नहीं, बल्कि आपने एक प्रकार से उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्टतक पेश कर दी अपनी रिपोर्ट में, यह कहकर कि लाशों को देखने से ऐसा लगता है कि मरने के बाद माओवादियों द्वारा धरदार हथियारों से काट दिया गया होगा;माओवादियों के कट्टर दुश्मन दैनिक भास्कर तक ने ऐसा लिखने का साहस नहीं किया। मेरा आपसे एक और सीध सवाल है कि क्या आपने ऑपरेशन ग्रीनहंट के दौरान अगस्त 2009 से दिसम्बर 2010 तक सरकारी बलों द्वारा मारे गए 181 बस्तरिया आदिवासियों में से किसी एक की भी लाश के बारे में कभी रिपोर्ट पेश की? छोड़िए, किसी आदिवासी की लाश को अपनी आंखों से देखा?
और जहां तक आपकी बारूदी सुरंग वाली रिपोर्ट का सवाल है, उसमें यह दोहराने के चक्कर में कि यहां कदम-कदम पर बारूदी सुरंगों का खतरा हैआप इस कठोर सच्चाई को पूरी तरह नजरअंदाज कर गए कि दरअसल शोषक शासक वर्गों ने टाटा, एस्सार, जिंदल, मित्तल जैसे कार्पोरेट घरानों को यहां आमंत्रित कर बोधघाट, रावघाट जैसी विनाशकारी परियोजनाएं शुरूकर तथा इन्हें बिना किसी विरोध के आगे बढ़ाने की मंशा से पहले सलवा जुडूमऔर बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंटशुरू कर बस्तरिया जनता की जिंदगी को पहले से एक महा विस्फोट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। किसी चीज के ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक पहलुओं की तह तक जाने की कोशिश किए बगैर सतही व सनसनीखेज बातों तक सीमित होना, क्या यही है तटस्थताजिसका दावा बीबीसी बार-बार करती है? जब 20-25 झोंपड़ियों वाले किसी गांव को चारों तरफ से अत्याधुनिक मारक हथियारों से लैस 500 से लेकर 1000-1200 तकसुरक्षाबल घेर लेते हैं जो भी आदमी मिलता है तो उसे मार डालते हैं जहां महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार एक आम बात है, जहां फर्जी मुठभेड़ रोजमर्रे की सच्चाई है घरों में आग लगाना जहां एसपीओ, कोया कमण्डो और सीआरपीएपफ का रूटीन का काम है - ऐसी जगह पर लोगों के पास बचाव के क्या उपाय बचे हैं, जरा हमें बताइए। क्या जनता को आत्मरक्षा करने का अधिकार नहीं है? जरा आप खुद को उस जगह पर खड़े करते हुए एक बार कल्पना कीजिए - क्या ऐसी परिस्थितियों में आप किसी न किसी तरीके से प्रतिरोध करेंगे या नहीं? इसके लिए कोई न कोई औजार या हथियार ढूंढ़ेंगे या नहीं? बस, बस्तर की जनता भी यही कुछ कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में बस्तरिया जनता के पास प्रेशर बम’, ‘टिफिन बम’, ‘बूबी ट्रैप’, ‘बारूदी सुरंगआदि अस्त्र-शस्त्र आ गए। किसी इलाके पर कब्जा करने के लिए नहीं, किसी का घर उजाड़ने के लिए नहीं, किसी की जमीन छीनने के लिए नहीं... सिर्फ और सिर्फ अपने आपको जिंदा रखने के लिए उन्हें ये सब इकट्ठा करने पड़ रहे हैं। हालात ने ही जनता को हथियार उठाने और बारूद बिछाने पर मजबूर किया। लेकिन एक बात साफ है। अगर जनता का यह प्रतिरोध, खासकर 2005 से लेकर अभी तक जारी संगठित व सक्रिय प्रतिरोध नहीं रहा, तो यहां आज कुछ भी नहीं बचता। कॉर्पोरेट दैत्यों के विकासबुलडोजर तले पिसकर अब तक आधे बस्तर कब्रिस्तान में तब्दील हो चुका होता। जगदलपुर में टाटा, एस्सार, जिंदल, मित्तल जैसी बड़ी-बड़ी कार्पोरेट कम्पनियों के अलीशान दफ्तर खुल चुके होते जिसके इर्द-गिर्द कॉर्पोरेट मीडिया के लोग वफादार कुत्तों की तरह पूंछ हिलाते हुए घूमते रहते!
हां, बमों या बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में कभी-कभी गलतियां हो रही हैं। कुछ घटनाओं में आम लोग मारे गए हैं। हमें खेद है। जो खून बहा है वह हमारा ही था, हमारे अपने ही लोगों का था। इतना ही नहीं, बारूद के इस्तेमाल और प्रयोगों के दौरान मारे गए हमारे कार्यकर्ताओं और जन मिलिशिया की संख्या भी कम नहीं है। हम ऐसी हर गलती से सीख ले रहे हैं। लेकिन किसी गलती को दिखाकर पूरे संघर्ष पर और उसके औचित्य पर उंगली उठाना कहां तक जायज है, जरा सोचिए। गलती के लिए हमारी आलोचना कीजिए। हमारी खामियों और कमियों की चर्चा कीजिए। आपका हमेशा स्वागत है। बहस को असली समस्याओं पर फोकस करने वाले ईमानदार और निर्भीक लोग ही यह काम कर सकते हैं।
बस्तर, कुल मिलाकर दण्डकारण्य का संघर्ष आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच चुका है। इस संघर्ष को कुचलने के लिए शासक वर्ग एड़ी-चोटी एक कर रहे हैं। अब सेना भी उतार दी गई है। भारतीय सेना और बस्तरिया जनता के बीच एक भीषण संग्राम शुरू होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा है। इस पर सभी की नजरें हैं। खासकर उन कॉर्पोरेट गिरोहों की जो यहां एक बार आदिवासियों या माओवादियों का सफाया होते ही इस पूरी धरती को दबोचने के लिए ताक में बैठे हुए हैं। ये इतने खतरनाक हैं कि इनके पास देशों तक को खरीद सकने वाली दौलत मौजूद है। इनकी पहुंच काफी दूर तक है। मीडिया पर पूरा इन्हीं लोगों का नियंत्रण है जोकि आप भी जानते हैं। देश की निधर्नतम जनता के खिलाफ कॉर्पोरेट वर्गों द्वारा छेड़े गए इस युद्ध में कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा संचालित मनोवैज्ञानिक युद्ध एक अहम हिस्सा है। अंत में, आपको, आप जैसे उन तमाम पत्रकारों को, जो निष्पक्षताया तटस्थताका झण्डा उठाए हुए हैं मेरी अपील है कि आप इस गलतफहमी से बाहर आइए। क्योंकि न्याय और अन्याय के बीच तटस्थतानहीं रहती। क्योंकि शोषकों और मेहनतकशों के बीच निष्पक्षनहीं रहता।


विनम्रता के साथ,
अमन,
दण्डकारण्य से
1
जून २०११