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08 नवंबर 2011

जी-20 सम्मेलन और यूरोज़ोन संकट


------दिलीप ख़ान

यूरोज़ोन संकट के थपेड़े से जूझते यूरोप में इससे पार पाने की कवायदें पिछले कई महीनों से जारी है। हालात ये है कि यूरोपीय संघ के भीतर यूरोज़ोन को ढहने से बचाने की कोशिश करने वाले देशों की स्थिति भी ख़राब होती जा रही है। ग्रीस के बाद इटली की खस्ताहाल हालात सिर्फ़ एक कैलेंडर वर्ष की आर्थिक नीतियों का न तो परिणाम है और न ही इससे कुछ महीनों में पार पाया जा सकता है। जब ग्रीस को घोषित मोटे बेलआउट के बाद भी वहां की स्थिति में सुधार महसूस नहीं किया तो यह जाहिर हो गया कि जिस स्थिति की कल्पना की जा रही है यह उससे कहीं बदतर है। जी-20 के लिए जब यूरोप के भीतर ऐसी आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि मौजूद थी और यूरोज़ोन मामले में महीनों से सक्रिय रहने वाले फ्रांस को जब इसकी मेजबानी करनी थी, तो पहले से ही यह तक़रीबन स्पष्ट लग रहा था कि बातचीत का ताना-बाना यूरोज़ोन संकट के इर्द-गिर्द ही बुना जाएगा।

जी-20 की स्थापना जब 1999 में की गई तो इसका एजेंडा था कि कैसे 1997 में पैदा हुए एशियाई आर्थिक संकट से निपटा जाए। इस तरह अपने स्थापना के समय से ही यह समूह आर्थिक संकटों के आस-पास की बातचीत पर केंद्रित रहा है बल्कि यह कहना ज़्यादा मुनासिब होगा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से उभरने वाले आर्थिक संकटों की रोक-थाम ही इसका उद्देश्य बन गया। दुनिया के 20 सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थों को एक मंच पर लाकर वैश्विक आर्थिक विकास का जो ख्वाब बुना गया था उसकी सारी ऊर्जा वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने में खप रही है। इसलिए मौजूदा यूरोज़ोन संकट की बहस अपने चरित्र में जी-20 के देशों के लिए नई नहीं है। 2008 के वाशिंगटन सम्मेलन, 2009 के लंदन और पीट्सबर्ग सम्मेलन और 2010 के टोरंटो और सियोल सम्मेलन का ज़्यादातर हिस्सा तेजी से बढ़ती आर्थिक मंदी पर खरचा गया। 

हर साल इस समूह के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों की बैठक बुलाने के पीछे यह मक़सद काफ़ी मज़बूती के साथ नत्थी रहता है कि वैश्विक वित्तीय प्रवाह को बरक़रार रखने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाए। कांस में संपन्न हुई मौजूदा बैठक जी-20 के राष्ट्रध्यक्षों की छठी बैठक थी जोकि वित्तीय अर्थव्यवस्था और आर्थिक संकटों की तात्कालिक वजहों के पड़ताल पर केंद्रित थी। ग्रीस के संकट की भयावहता उसके भूगोल से बाहर निकल आई है और यूरोपीय देशों के साथ-साथ दुनिया के ज़्यादातर शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं की यह चिंता बन गई है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक ढांचे को किस तरह बचाया जाए। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो की मुहिम दर्ज़नों देशों में फैल गई है। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि वॉल स्ट्रीट की जगह पर स्थानीय आर्थिक प्रतीकों का इस्तेमाल हो रहा है।

जिस तरह वॉल स्ट्रीट आंदोलन को अमरीकी हुक्मरान छोटा करके दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं ठीक उसी तरह यूरोज़ोन संकट को भी यूरोपीय देश कमतर करके वैश्विक मंच पर पेश कर रहे हैं। लेकिन आपसी बातचीत और बैठक में यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है। जी-20 बैठक के दौरान प्रेस कांफ्रेंस में जब ग्रीस के प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंड्रू और इटालवी प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी यह कह रहे थे कि वे अपने-अपने देश को इस संकट से उबारने में सफल होंगे तो शायद उन्हें यह पता नहीं था कि उनकी इस प्रचार सामग्री को उनके देश के लोग ही खारिज करने में जुट जाएंगे। जी-20 को ख़त्म हुए हफ्ता भर भी नहीं हुआ है और यह चर्चा ज़ोरो पर है कि पापेंद्रू और बर्लुस्कोनी इस्तीफ़ा देने वाले हैं। अर्थव्यवस्था की चरमराहट की मिसाल यह है कि ग्रीस में पापेंद्रू की जगह प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर जिनका नाम सामने आ रहा है उनमें यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पूर्व उपाध्यक्ष लुकास पापाडेमोस और वित्त मंत्री इवांजेलोस वेनीज सबसे प्रमुख हैं। बर्लुस्कोनी यह तो कह रहे हैं कि स्थिति ज़्यादा गंभीर नहीं है लेकिन इस्तीफे की ख़बर के बीच सफाई देने से नहीं चूक रहे हैं कि इससे इटली की प्रतिभूति बाज़ार भारी दबाव में आ गया है। ये विरोधाभासी वक्तव्य फिलवक्त यूरोज़ोन और बेलगाम वैश्वक वित्तीय अर्थव्यवस्था की विफलता को छुपाने और पूंजीवाद की नीति में आई बड़ी दरार को भरने की असफल कोशिश को दर्शा रहे हैं। 

जी-20 की हालिया बैठक के बाद जो विज्ञप्ति जारी की गई उसमें यह प्रमुखता से माना गया कि पिछले बैठक के बाद से इन देशों में बेरोज़गारी और इकोनॉमिक रिकवरी का स्तर पहले से भी ज़्यादा पिछड़ा है। इससे पार पाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं की पहलकदमी को किस तरह इस संकट से उबरने में इस्तेमाल किया जाए और संकट में फंसे अर्थव्यवस्थाओं को दिए जाने वाले मदद का स्वरूप कैसा हो, लेकिन वैश्वीकरण के जिस बिंदु पर ज़ोर दिया गया वह ग़ौरतलब है। जी-20 ने माना कि वैश्वीकरण के मौजूदा स्वरूप में सामाजिक पहलू पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है। रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा को हासिल करने को लक्ष्य बनाया गया है। एक जी-20 कार्यबल बनाने की बात कही गई है जो युवाओं को रोज़गार के अवसर मुहैया कराने की दिशा में काम करेगी। फ्रांस में बेरोज़गारी को लेकर बीते साल लंबे समय तक चले छात्र आंदोलन ने वैश्वीकरण के उत्पाद के तौर पर बेरोज़गारी को सरकार के सामने खोलकर रख दिया था, ऐसे में फ्रांस में हुई बैठक में रोज़गार पर एक्शन लेना ज़रूरी हो गया था। वित्तीय फर्म की विशालता को उस हद तक कतरने की बात कही गई जहां तक यह विफल साबित न हो जाए।

इस सम्मेलन में छिटपुट तरीके से कृषि विकास, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार पर भी बात की गई लेकिन इन मामलों में कोई उल्लेखनीय पहलकदमी नहीं ली गई। बैठक के दौरान कई ग़ैर-सरकारी संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए वित्त से पहले आदमी का नारा लगाया। द्वितीय वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से जी-20 के हर बैठक ने विरोध झेला है। इसमें आमंत्रित किए गए चार देशों में इथियोपिया के शामिल होने की वजह से हॉर्न अफ्रीकी देशों में खाद्यान्न संकट और भुखमरी के सवाल उठे जोकि काफी महत्वपूर्ण है। बीते कुछ सालों में पूर्वी अफ्रीकी देशों में हज़ारों लोगों ने भूख की वजह से जान दी है। इस पर काबू पाने के लिए चावल भंडारण की एक योजना भी बनाई गई है जिसमें जी-20 एशियान+3 की मदद करेगा।

हालांकि बीते साल की बैठक में जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे कांस सम्मेलन में भी थोड़े फेरबदल के साथ उन्हीं बिंदुओं को ताजे लक्ष्य के तौर पर सामने रखा गया है। हालिया बैठक में यह साफ नज़र आ रहा था कि एजेंडों और उपायों को लेकर सदस्य देशों के बीच काफी मतांतर है। अमरीका और ब्रिटेन ने यूरोज़ोन संकट में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। असल में अमरीका की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ सालों से जिस तरह खुद संकट के चक्र में फंसी हुई है उससे किसी भी तरह का वित्तीय पैकेज देना अमरीका के लिए अभी मुश्किल नज़र आ रहा है। अमरीकी कांग्रेस के दबाव में ओबामा ने कांस से उठ रही इस आवाज़ को कि आईएमएफ के फंड को बड़ा कर यूरोज़ोन संकट से उबरने में खर्च किया जाए, यह कहकर थामा कि पहले यूरोज़ोन खुद इस पर लगाम कसने की कोशिश करें। ओबामा ने यूरोज़ोन देशों से अपील की कि पहले उनकी सरकारें यह पता लगाने की कोशिश करें कि कहां से इस संकट की मनोवैज्ञानिक शुरुआत हुई थी। ब्रिटेन ने भी बेलआउट पैकेज के विस्तार में उदासीनता दिखाई। यूरोपीय संघ का सदस्य होने के बावज़ूद ब्रिटेन यूरोज़ोन में शामिल नहीं है और मौजूदा संकट शुरू होने के बाद ब्रिटेन के भीतर यह आवाज़ भी तेजी से उठनी शुरू हो गई कि ब्रिटेन को मानवाधिकार और माइग्रेशन मामलों में भी खुद को यूरोपीय संघ से अलग कर लेना चाहिए। ब्रिटेन की बड़ी आबादी यह मानती है कि उनका देश इसलिए बच गया क्योंकि वह यूरोज़ोन में शामिल नहीं है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री केमरॉन ने यूरोज़ोन के देशों को यह चेतावनी भी दी कि मौजूदा संकट महज एक बानगी भर है और इससे भयानक स्थिति पैदा हो सकती है। ब्राज़ील ने भी यूरोपीय देशों को अपने स्तर पर संकट से निपटने की सलाह दी। जी-20 की बैठक पर यूरोज़ोन के देशों ने जिन उम्मीदों से निगाहें टिकाईं थीं उस अर्थ में तो यह राहत पहुंचाने वाली बिल्कुल साबित नहीं हुई। 

आर्थिक संकट से घिरे यूरोप के देशों के लिए आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद बहुत क्षीण नज़र आ रही है। इटली पर अपनी जीडीपी से 120 फीसदी ज्यादा का कर्ज़भार है। बेलआउट पैकेज के भरोसे इटली भविष्य की ओर मुंह ताक रहा है, लेकिन यूरोज़ोन के दो सबसे शक्तिशाली देश, फ्रांस और जर्मनी की भीतरी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति भी बहुत सुकूनदेह नहीं है। फ्रांस ने ऐहतियातन बड़े सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के वेतनवृद्धि पर रोक लगाने की योजना बनाई है।